Book Title: Agam Sutra Satik 13 Rajprashniya UpangSutra 02
Author(s): Dipratnasagar, Deepratnasagar
Publisher: Agam Shrut Prakashan
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मूल-२०
२४१ अनेकशतानि अनेकशतसङख्यानिवृन्दानि परिवारो यस्याःसा तथा तस्याः, महतिमहालियाए परिसाए' अतिशयेन महत्या पर्षदः 'ओहबले' इति ओघेन-प्रवाहेण बलं यस्य, न तु कथयतो बलहानिरुपजायते इति भावः।
एवं जहा उववाइए तहा भाणियव्वमिति, एवं यथा औपपातिके ग्रन्थे तथा वक्तव्यं, तचैवं-'अइबले महाबले अपरिमियबलवीरियतेयमाहप्पकंतिजुत्ते सारदनवणियमहुरगंभीरकुंचनिग्घोसदुंदुभिस्सरे उरेवित्थडाए कंठेवट्टियए सिरेसमावन्नाए अगरलाए अमम्मणाए फुडविसयमहुरगंभीरगाहिगाए सव्वक्खरसन्निवाइयाए गिराए सव्वभासाणुगामिणीए सव्वसंसयविमोयणीए अपुणरुत्ताए सरस्सईए जोयणनीहारिणा सरेणं अद्धमागहाए भासाए भासइ
अरिहाधम्मपरिकहेइ,तंजहा–अस्थिलोए अस्थि अलोएअस्थिजीवेअस्थि अजीवेत्यादि, तावत् यावत्तए णं सा महइमहालिया मणुस्सपरिसा ।
मू. (२१) तए णं से सूरियाभे देवे समणस्स भगवओ महावीरस्स अंतिए धम्मं सोचा निसम्म हतुट्ट जाव हयहियए उठाए उठेति उट्टित्ता समणं भगवं महावीरं वंदइ नमसइ वंदित्ता नमंसित्ता एवं वयासी
अहन्नं भंते ! सूरियाभे देवे किं भवसिद्धिए अभवसिद्धते ? सम्मदिट्टी मिच्छदिट्ठी? परित्तसंसारिते अनंतसंसारिए ? सुलभबोहिए दुलभवोहिए? आराहते विराहते ? चरिमे अचरिमे?, सूरियामाइ समणे भगवं महावीरे सूरियाभं देवं एवं वदासी।
सूरियाभा ! तुभं णं भवसिद्धिए नो अभवसिद्धिते जाव चरिमे नो अचरिमे ।
वृ.समणस्स भगवओमहावीरस्सअंतिएधम्मंसोच्चा निसम्म हट्टतुट्ठासमणं भगवंमहावीर तिक्खुत्तो आयाहिणपयाहिणं करेइ करित्ता वंदइ नमसइ २ ता एवं वयासी-सुयक्खाएणंभंते निग्गंथे पावयणे, नस्थि णं केई समणे माहणे वा एरिसं धम्ममाइक्खित्तए, एवं वइत्ता जामेव दिसिं पाउब्भूता तामेव दिसिं पडिगया।
तएणं सेए सराया समणस्स भगवतो महावीरस्स अंतिए धम्मं सोच्चा निसम्म हट्टतुट्ठचितमा दिएजाब हरिसवसविसप्पमाणाहियए समणंभगवंमहावीरंवंदइ नमसइवंदित्तानमंसित्ता पसिणाइंपुच्छइपुच्छित्ताअट्ठाइं परियाएइपरियाइत्ताउट्ठाए उठेइ उद्वित्ता समणं भगवं महावीर वंदइ नमसइ२ एवं वयासी-सुयक्खाएणंभंते! निगंथे पावयणे सावएरिसंधम्ममाइक्खित्तए, एवं वइत्ता हत्यिं दुरूहइ दुरुहिता समणस्स भगवतो महावीरस्स अंतियाओ अंबसालवनाओ चेइयाओ पडिनिकखमइ पडिनिक्खमित्ता जामेव दिसिं पाउडभूए तामेव दिसि पडिगते" इति, इदंच प्रायः सकलमपिसुगमंनवरंयामेव दिशमवलम्ब्य, किमुकतं भवति? यतोदिशः सकाशात् प्रादुर्भूतः-समवसरणे समागतस्तामेव दिशं प्रतिगतः।
सम्प्रतिसूर्याभो देवोधर्मदेशनाश्रवणतोजातप्रभूततरसंसारविरागः स्वविषयं भव्यत्वादिकं पिपृच्छिषुर्यत्करोति तदाह-'तए णमि'त्यादि, "भवासिद्धिए'इति । भवैः सिद्धिर्यस्यासी भवसिद्धिको, भव्य इत्यर्थः, तद्विपरीतोऽभवसिद्धिकः, अभव्य इत्यर्थ, भव्योऽपि कश्चिन्मिथ्याद्दष्टिर्भवति कश्चित्समयग्दृष्टिस्तत आत्मनः सम्यगष्टित्वनिश्चयाय पृच्छति[ 8 ]16
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