Book Title: Agam 44 Chulika 01 Nandi Sutra
Author(s): Devvachak, Jindasgani Mahattar, Punyavijay
Publisher: Prakrit Granth Parishad
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Page #1 -------------------------------------------------------------------------- ________________ PRAKRIT TEXT SERIES Vol. IX NANDĪSUTTAM WITH CŪRNI PRAKRIT TEXT SOCIETY AHMEDABAD-380007 Jan Education Interationals or private Personal use only Page #2 -------------------------------------------------------------------------- ________________ સુકૃdળા સહભાગી પૂજયપાદ ઘર્મતીર્થudiાવક સિદ્ધાંતસંક્ષક અપ્રમત્તજ્ઞાનોપાસક મચ્છથવિર દિવંગત આચાર્યGiણવંત શ્રીમદ્ વિજય મિત્રાનંદસૂરીશ્વરજી મહારાજા ની પ્રેરણાથી સ્થપાયેલ, પ.પૂ.પં. શ્રી પદ્મવિજયજી ગણિવર જૈન ગ્રંથનાળા દ્રસ્ટ, અમદાવાદ તરફથી પૂજયપાદ વાત્સલ્યવારિસ્થિ આચાર્યદેવેશ શ્રીમદ્ વિજય ગરચંદ્રસૂરીશ્વરજી મ.સા. તથા પૂ.આ.01.ના વિદ્ધાળશિષ્યરત્6ી પ્રવથાકાર પૂ.ગણિવર્યશ્રી diધ્યદર્શન-વિજયજી મહારાજના ઉપદેશથી આ ગ્રંથ પ્રકાશનનો સંપૂર્ણ આર્થિક સહકાર પ્રાપ્ત થયો છે. સંસ્થા સુકૃતoળા સહdiામી દ્રસ્ટની શ્રુતdiળી અઠ્ઠમોદના કરે છે. Page #3 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Jain Education Intemational Page #4 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Prakrit Text Society Series No. 9 NANDĪSUTTAM by DEVAVĀCAKA with the CŪRŅI by JINADĀSA GAŅI MAHATTARA Edited by MUNI SHRI PUNYAVIJAYAJI General Editors Dr. V. S. AGRAWALA Pandit DALSUKH MALVANIA PRAKRIT TEXT SOCIETY AHMEDABAD-380007 2004 Page #5 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Published by RAMANIK SHAH Secretary PRAKRIT TEXT SOCIETY Shri Vijay Nemisurishvarji Jain Swadhyay Mandir 12, Bhagat Baug Society, Sharada Mandir Road, Paldi, Ahmedabad-380007. Reprint : May, 2004 Price : 150/ Available from: 1. Saraswati Pustak Bhandar, Ratanpole, Ahmedabad-1. 2. Parshwa Prakashan, Zaveriwad, Relief Road, Ahmedabad-1. 3. Motilal Banarasidas, Delhi, Varanasi. Printed by : K. Bhikhalal Bhavsar Manibhadra Printers 3, Vijay House, Nava Vadaj, Ahmedabad-380013. Tel. 27642464, 27640750 Jain Education Intemational Page #6 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्राकृतग्रन्थपरिषद् ग्रन्थाङ्क ९ सिरिदेववायगविरइयं नंदीसुत्तं सिरिजिणदासगणिमहत्तरविरइयाए चुण्णीए संजयं संशोधकः सम्पादकश्च मुनिपुण्यविजयः जिनागमरहस्यवेदिजैनाचार्य श्रीमद्विजयानन्दसूरिवर (प्रसिद्धनाम - आत्मारामजीमहाराज) शिष्यरत्न प्राचीन जैनभाण्डागारोद्धारकप्रवर्तकश्रीमत्कान्तिविजयान्तेवासिनां श्रीजैन आत्मानन्दग्रन्थमालासम्पादकानां मुनिप्रवरश्रीचतुरविजयानां विनेयः प्राकृत ग्रन्थ परिषद् अहमदाबाद- ३८०००७. इस्वी सन् २००४ For Private Personal Use Only Page #7 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशक: रमणीक शाह सेक्रेटरी प्राकृत टेक्स्ट सोसायटी, श्री विजयनेमिसूरीश्वरजी जैन स्वाध्याय मंदिर १२, भगतबाग सोसायटी, शारदामंदिर रोड, पालडी, अहमदाबाद-३८०००७. पुनःमुद्रण : मई, २००४ मूल्य : रू. १५०/ मुद्रक: माणिभद्र प्रिन्टर्स ३, विजय हाउस, पार्थ टावर, बस स्टेन्ड के पास, नवावाडज, अहमदाबाद-३८००१३. फोन : २७६४२४६४, २७६४०७५० Jain Education Intemational Page #8 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकाशकीय स्व. आगमप्रभाकर पू. मुनिराज पुण्यविजयजी म.सा. द्वारा संपादित श्री जिनदास गणि महत्तर विरचित चूर्णि सह देववाचक कृत 'नंदीसूत्र' का पुनःमुद्रण प्रकाशित करते हुए हमें आनंद अनुभव हो रहा है। करीब दस वर्ष से ग्रंथ की सभी नकलें समाप्त हो चुकी थीं। प.पू.आचार्य भगवंत श्रीमद् मित्रानंदसूरीश्वरजीकी प्रेरणा से स्थापित प.पू.पं. पद्मविजयजी गणिवर जैन ग्रंथमाला ट्रस्ट, अहमदाबाद की आर्थिक सहाय से यह पुनःमुद्रण का कार्य संभवित हो पाया है। प.पू.आचार्यदेवेश श्रीमद्विजयनरचन्द्रसूरीश्वरजी म.सा. तथा प.पू.आचार्यश्री विजय-मित्रानंदसूरीश्वरजी के शिष्यरत्न पू. गणिवरश्री भव्यदर्शनविजयजी म.सा. एवं संस्था के प्रकाशन कार्य में अत्यंत उत्साहपूर्वक प्रेरणा देनेवाले पू.मुनिश्री धर्मतिलकविजयजी म.सा. के हम अत्यंत आभारी हैं । आर्थिक सहाय दाता ट्रस्ट के प्रति भी आभार व्यक्त करते हैं। पुनर्मुद्रण का कार्य सुचारु ढंग से पेश करने के लिए माणिभद्र प्रिन्टर्स के श्री के. भीखालाल भावसार को भी धन्यवाद । प्राकृत ग्रन्थ परिषद् अहमदाबाद वैशाख शुक्ल पूर्णिमा, वि.सं. २०६० रमणीक शाह मानद् मंत्री - Jain Education Intemational Page #9 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Jain Education Intemational Page #10 -------------------------------------------------------------------------- ________________ गंथसमप्पणं बग्मयसायरबीईतरंतमण-चयग-काय जोगाणं । वरजिणआगमपयाणकरणे अपमनजोगाणं ॥१॥ जोगाजोगविहन्नूण नूग गंभीग्मिाए गरिमाणं । 'आगमउद्वारय 'वरउवाहिमंताण संतागं ॥२॥ आयरियपुंगवागं सागरापंदमूरिणामागं । महणायसदसञ्चावयाग दुसमम्मि कालम्मि ॥ ३ ॥ करकमलकोसमझे तागं संपइ दिवंगयाग मा । अप्पिज्जइ गंथोऽयं विणरगं पुण्ण विजएणं ॥४॥ Page #11 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ग्रन्थसमर्पण जिनका मन-वचन-काययोग श्रेष्ठ श्रुतसागरकी तरंगोंमें तैरता था, जो श्रेष्ठ जिनागमके प्रकाशनमें अप्रमत्तयोगसे प्रवृत्त थे, योगअयोग के विवेक में कुशल थे, गाम्भीर्यगुणकी गरिमासे अन्वित थे, 'आगमोद्धारक 'की श्रेष्ठ पदवोसे विभूषित सन्त थे, और दुःषमकालमें जिन्होंने अपने आपमें 'महानाद' शब्दको सत्य सिद्ध किया था ऐसे साम्प्रत कालमें दिवंगत आचार्यश्रेष्ठ श्रीसागरानन्दसूरिजीके पवित्र करकमल रूप कोषमें यह ग्रन्थ विनयपूर्वक समर्पित करता हूँ। पुण्यविजय Jain Education Intemational Page #12 -------------------------------------------------------------------------- ________________ गाला। प्रकाशकीय निवेदन जैन आगम ग्रन्थों के प्रकाशनके लिए अब तक अनेक व्यक्ति और संस्थाओंने प्रयत्न किया है। ई. १८४८ में सर्व प्रथम स्टिवेन्सन ने कल्पसूत्रका अनुवाद प्रकाशित किया किन्तु वह क्षतिपूर्ण था । वस्तुतः वेबर ही सर्वप्रथम विद्वान माने जायंगे जिन्होंने इस दिशामें नया प्रस्थान शुरू किया। उन्होंने ई. १८६५-६६ में भगवती सूत्रके कुछ अंशो का संपादन किया और उन पर टिप्पणीरूप अपना अध्ययन भी लिखा । राय धनपतसिंह बहादुरने आगमों का प्रकाशन १८७४ में शुरू किया और कई आगम प्रकाशित किये किन्तु उनका मूल्य हस्तप्रतों की मुद्रित आवृत्तिसे कुछ अधिक था । फिर भी- विद्वानों को दुर्लभ वस्तु सुलभ बनानेका श्रेय उन्हें है ही। जेकोबीका कल्पसूत्र (ई. १८७९), और आचारांग (ई. १८८२), ल्युमनका औपपातिक (ई. १८८३ ) और आवश्यक (ई. १८९७), स्टेइन्थलका ज्ञाताधर्मकथा का कुछ अंश (ई. १८८१), होर्नलका उपासकदशा (ई. १८९०), ३ आचारांग (ई. १९१०) इत्यादि ग्रन्थ आगमों के संपादनकी कला में आधुनिक विद्वानों को संमत ऐसी पद्धति को अपनाकर प्रकाशित हुए थे। फिर भी लाला सुखदेव सहायद्वारा ऋषि अमोलककृत हिन्दी अनुवाद के साथ (ई.१९१४-२०) जो ३२ आगम प्रकाशित हुए तथा आगमोदय समिति द्वारा समग्र सटीक आगमों का ई. १९१५में जो मुद्रण प्रारंभ हुआ उनमें उस पद्धति की उपेक्षा ही हुई । आचार्य सागरानन्दमूरि द्वारा संपादित संस्करण शुद्धिकी और मुद्रण की दृष्टि से राय धनपतसिंहके संस्करणसे आगे बढा हुआ है और विद्वानोंके लिये उपयोगी भी सिद्ध हुआ है। इस संस्करणके प्रकाशनके बाद जैनधर्म और दर्शनके अध्ययन और संशोधन में जो प्रगति हुई उसका श्रेय आचार्य सागरानन्दमूरिको है। किन्तु इतना होने पर भी आगमों की आधुनिक पद्धतिसे समीक्षित वाचना की आवश्यकता तो बनी ही रही थी। पाटनमें ई.१९४३ में आगम प्रकाशनके लिए जिनागम प्रकाशिनी संसदको स्थापना की गई किन्तु उससे अब तक कुछ भी प्रकाशन हुआ नहीं। पू. पा. मुनिश्री पुण्यविजयजी लगातार चालीससे भी अधिक वर्ष से इस प्रयत्नमें हैं कि आगमोका सुसंपादित संस्करण प्रकाशित हो । उन्होंने इस दृष्टिसे प्राचीन प्रतों की शोध करके कई मूल आगमों और उनकी प्राकृत-संस्कृत टीकाओं के पाठ संशोधित किए हैं। इतना ही नहीं उन्होंने टीकाओं में या अन्य ग्रन्थों में आगमोंके जो अवतरण आये हैं उनका आधार लेकर भी परशुद्धिका प्रयत्न किया है। उनके प्रयत्नको ही मुख्यरूपसे नजर समक्ष रख कर स्वतन्त्र भारत के प्रथम राष्ट्रपति डान्द प्रसादने ई. १९५३ में प्राकृत ग्रन्थ परिषद्की स्थापना की । अबतक इस परिषद् के द्वारा प्राकृत भाषाके कई महत्वक ग्रन्थ सुसंपादित होकर प्रकाशित हुए हैं। तथा पं. हरगोविंददासका सुप्रसिद्ध पाइयसदमण्णवो भी पुनः मुद्रित हुआ है । प्राकृत ग्रन्थपरिषद् के द्वारा सटीक आगमों का प्रकाशन होना है यह जानकर केवल मूल आगमों के प्रकाशनके लिए बंबईके महावीर जैन विद्यालयन ई. १९६० में योजना बनाई और पू. मुनिश्री का सहकार मांगा जो सहर्ष दिया गया। यह परम हर्षका विषय है कि प्राकृत ग्रन्थ परिषद् अब अपने मुख्य ध्येय के अनुसार आगमप्रकाशनके क्षेत्रमें भी प्रवेश कर रही है और समग्र आगमके मंगलभूत नन्दीसूत्र आ० जिनदास महत्तर कृत चूर्णि और आचार्य हरिभद्रकृत वृत्ति आदिके साथ नवम और दशम ग्रन्थके रूपमें प्रकाशित कर रही है। इसका श्रेय पू. पा. मुनिराज श्री पुण्यविजयजी को है जिन्होंने बढे परिश्रम से इनका संपादन दीर्घकालीन अध्यवसायसे अनेक हस्तप्रतो और टीकाओंके आश्रयसे किया है। इसके लिए प्राकृत अन्य परिषद् और विद्वज्जगत उनका ऋणी रहेगा । ता. २९-६-६६ दलसुख मालवणिया मंत्री Jain Education Intemational Page #13 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Jain Education Intemational Page #14 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Jain Education Intemational प्राकृतग्रन्थपरिषद् प्रथाङ्क ९ - नन्दिसत्रमूलको 'जे.' सज्ञकप्रतिके प्रथम पत्रकी प्रथम पृष्टि और अंतिम (२६वा) पत्र की द्वितीय पृष्टि । महाभापायाएका प्रम यमित RANDA यायाKिIRL धनकायमाबिना म मायामा मेदवारमा SHANG मानसिनेमा INEMA M EDAALASAHARASHERepairl E HTRAISRONICICICIAtassiutictikotuRAR Horietoripadan HINESENAMSTERatniketakers FJMetana SayaparagyeREAthala ame R WATE apeNLASLEL PACHE sistatemestern PURPRETAs 5M नन्दिसत्र मूल की 'ख' संज्ञक प्रतिके प्रथम और अतिम (१९वा) पत्र की द्वितीय पृष्ठि । wala BARADAP नियम ---- -unitytes नन्दिसत्र चूर्णिकी 'जे.' संज्ञकप्रतिका जिस पत्र से प्रारंभ होता है उस १८वे पत्रको और अंतिम (२.३वा) पत्र की द्वितीय पृष्टि। Page #15 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Jain Education Intemational माकृतग्रस्थपरिषद पन्थाङ्क ९ yिanामना मातालयाविधिवापनावमालकी विनिमय विधिमक्यामिsuita DERATIRADITIESENSITIATRITERARMERRIORamNSINGER INETHuaireADARATHKHEDENIHAUHATTARRIEDNANDHARMA MPHIRSSRAMumrajterWADESHINAGARMITRAMMAHINSAR TRAORDIARRIALIANTHESERHIpal UPEERINHEAL PREENASIKHISTOTHARMERanchamiaktalki BBCRILMngatertaNPCIALR 300E FIRST 'खं.' संतक नन्दि सत्रमूलके साथ लिखी गई श्रीम व्यगिरिविरचितनन्दिसूत्र काकी प्रतिके प्रथम और अंतिम (२४७वे) पत्र की द्वितीय पृष्टि । APERare - याबाट कमायामाबारवालय पाजयमहामदावारासह यस्यागुणमहरालवाद्यवाद रातो PLEARASHESTERE Area गरमाणाविवागारमादिहियायासास सम्मघापहवणापमुक्यसगरममाहा गानउत्तयाधजायगामाया सपाक्षमाहत्माममणमामणमापनमयमा अषमायापवनका वा M TRANSLATIBARMERREETENDANESEAR T नन्दिसूत्रमूलकी 'सं.' संज्ञरूपतिके प्रथम और अंतिम (८२वे) पत्रकी द्वितीय पृष्ठि । Page #16 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Jain Education Intemational पादश्रीमरयायतमाथीशामताधिष्टायकायमाथीदनादिस्यिसन्यो । नमाजयजयाजीवाडणीवियागयजाणदाङगनाहाङगधा जयगणियामादानावाशाडायमणालावातिन्यराणयानिमायामा नयमालागागाजियश्मणामनावीरा॥श्नईसबगद्यागमनकिणसवी रस्मानसरापुरतमसिनम्मानमुटामायणानवशागहरयातरियसणार सहरलागासिंघनगरनहारकडवारवागाराधिसंङमती aaबारयस्मनमासम्म यारियलस्साअगाडिवकरसङगादासयासंबवकरमाया नहंसालगडासाराचा सातवानटामध्यजन्तरतासघरदमातगवनमनाया मुदिघासमाद कम्मराजलादविणिग्गयरसासनश्यादीदनालस्तवमा ६वद्याधरकानयरमाण गुणकसरालम्ससाव गणमरियखिडमाजि॥ रावसामध यममम्मनसमायणसदस्सयवस्मतसंकममयलंगप्रकिरियराजसधहररमात ज्यमघवदातमालसम्ममहडछाmusaनियाददनासगरमाaarतयादव, लमस्मानाणुाद्याच्याऊपनदमसंघसरमाणनधिलागिटारससमाधाडापामगरस यारकादरानगवनसंघसमुहमादस्मशमम्मसmasग्वगाढावगाण्ढय dur क्षिम मंडिलमामंडलपावसामणिविद्यावाविद्याशा faaeeमाणविनामानिमाविमादामालदणामअनचरायमुयमा विदारकासावर विवीचारपखागसमहायवरकाणासायसिंविषयसिंघासासमाहासाप्रामा श्कालिमहरमासमुहामायणा अणुमागायपारियाणाणादसााकण्यस ववदारासितासियारणतिमाहमानवालिसीव्हडिबहावयलायनिंदालसामयाक्षायादी सागरयमतापखुडियाधिमाणपदिनीयामहवियाविमाणपविलिचाएगानचापाविवाहालियापरुणावाटमागकालाचवायम्म धरावधायस्माविसमाणाववायरसावलधारावायादविदानवायावहाणामासाहागरातागपारिद्यावविद्या/निरयावलिमाणका पिणाकसित्राविधिाणशालिग्राणageसा मासाविसतावदिशाविसमावणाणावारणमावणाणामहायुमिनाamm तिम्मानिसगगाणाससिपियर्मिनाहरसासरहामायणालाचालणारा मछगएविडस्वाहासासवासाप्रमाणनगा। पाकिंचायारसायडरमाणस्ससमवायरसविवादा तामाकदवामगदसाप/यंतग उदमागणुरावा दिमागण्यावागणाणा विवागमद्यस्मादिडिवाटारमासाबक्षिा पियसिंयमसहसाखापगाव/मmuzafण्श्छ मिस्मसारमामासाकासासाहासाश्रमायudaमाममणाणसानण्याबmarएणादिसामिासमु हिसामिायण जाणागिनिंदासमना ॥ar ॥शुनेलवधाकल्याणम बावापावादिधबुधेनदीमनापति SESH नन्दिसूत्रमूलकी 'मा०' संज्ञकप्रतिके प्रथम पत्र को द्वितीय पृष्ठि और अंतिम (१४वे) पत्र की 'दृतीय पृष्ठि । Page #17 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्राकृतग्रन्थपरिषद ग्रन्थाङ्क ९ Jain Education Intemational बरिनसवाल EECAPAR वारियवमामिवाद कामियगानमनिसायतिसमवायकत्रिदीक्षसम्राममहियापवानावादामबहनिम्नवरा मिलता। नंदिसबका eumiकरीनावगंगासागप्रणाणावदामियनयमाश्याचगंधार मोगामिममियतबविणएमिनकाम न वादिलवणसिरमाबादयसनमणधचायगवामाजमामान्यनामाकरणगियकमपयडीवहागा MARI Gaamsagसमयहाणसदीयक्षायनिह्यागाचवायममोरवनाकानामालावल्य निरकावकालियमयरगिएधायलसिंवमयर दीवासीदवारगपयनपतमिमायापागापयत्ययाविमार मिश्रणयरणियमामबादस्वेदिवायरिएखसानानि मनमहनविश्कामविश्परिकमभाना समायमणधारक्ष्मिवातवेदिामामिरमकालिययययसाधारस्यवाणतिमयमा खिमासमापवादनाम वागायरिमिकमवमयानन्यायाक्वायमणपाजामहसुयसमायारानागाणवायषवादावरमागगनविय पादिमछलकमलगत्रमरिवाजानवियजगरिययहरदयाउ बिमारपचीसाव्यानरहणमागविहसमानियवाण व्यायवावमाननाजजनवममादिका पहिया पत्रवाददन्यदिनमायरिपनक्मयाच्यकारमामनाग dिance मीणामसणियनिसानियसवाणियमनवारयनिध बाद लोयामरस्कानससमा काकालमहणानियाणपमिजारवाणीपायलमामिमगdिnagaनियममसनमविणाममतिमहरयाणमीलडाण महियागोजगप्पालामालकामजनजाताम पणमामिलरकरणपाएयाययण पाडियामादिंपणिवश्यालय जियन्तनगवतेकालियनुयसपमानवाणमित्रापमिरमानास्सपलबुखए तिपिशवली मजाकडेगवानगिरि गरमभरिमामासयममगज गभिजिीनारंगीगे नस्त्रिानाशालाममामतिविपन्नत जहा जाणियाश्रयाणियाविक अहिली नावविपतमापालिकाव्हियूनायनादिनामिाणपनावेनाणकयनमामिमाममा विपना जहाणपकचापकरकंबामकिपाकापचरविरुपात दियेपवरकबा नादियषधरकामकिदियपञ्चरकादियवरकरचय पन्ना बहा दियपनाकंचम्फदिलापकघाणिचियपचकरसादिययरक फालिदियपश्चरकम दिय पक्षकासकिने दियफवारकानाऽदिययवस्कनितिनत्रागंजाहिणाणपक मायकायनाणचाकवलापावरकामकिसहिनापपरका इदिमापपयरकंडविधामननपचवावउक्मप्रियंदार लवqयदिबावाशरमिरियागंबादाराहरवाग्ववनियो मन MIN कत्रका एमाल MEENA AMANAN D मुनगर HिAI HIRA + देशमा एमाला matterst कालयमाप्रमाणामागाहपत्रपमत्रसनयसम्महिंडिपयनगसास्वयवासाछाकामनगगनवनियमएम्मागामणयनाम पनि विवर्मन शिवपालमा विठिकमतविलमध्यममामश्चछविहंपागलेतदवसायामकमनीपातयामापसिएराधना MANTHANI पानी पिया निधासतितिानमविलातीप्रायसामागताधामनिरिक्शातागंकमतीमारनावमाश्ययनाएदयीपावमिहाहात मित्राकडागययाराआवजानिससंचारमतले सिरियजावनामयम्सारबाहादीबनधादमापन्नस्मयकातामुनीमायक सोनभरख मानजोतरदीवागवासनाचिदियागपत्रगामिभाग गएनाविजागतिधामतिमनचवालमतामहाश्वाहसnिata Maiअवस्यिवागविलयविखसावितिमिरतरागावत्रेजाम नियामति कालमतीनहान्नघलियमम्स प्रसारवयतिना धम -20 नमामि सुमी प गाभागविपलिवधमकामावतिलागेनाणनिपामनियतीतत्रणायचातावविधतमर्शबियानातगानिसहयाप माना तगीवितिमिरलगवानापतियामतिनाबानामतीर्ण तिनाबमाणयामनिसिघनायागमनागजातानिपामतितिसाच निजी मनोन उसममानजरिव्ययगानिपानातिनागपyaनाgrammपरिबिंतियलपायगामाणमारवनानिबईयागपमा वरितमानसमागमनागमतिकमाणका विपन्नताजसानवाकवलनागियोतिबाकवलना बरसकिंमनचलनामावलमलमागविलासंसानियनकक्लनालयानजागितकवलमाSAND भग एचमिकिसननिमक्केवलनागासानागिरविदंपन्नत्रापर मममयसयोगिनवकवनमामेवायपरमसमयमानागिनवधाक का समापियामदयाकामसमयमानापिनवळकेवलनाचायरिममभयमानागिलकेवळनार्णवामनमनामनवकवलना। aar RAMANस्याणासायनिकमागिनवाकवलनायिनागिनवचलनाणंविधामपनहापटमममयमाजागिनवछकेवलनागचात्रपट नयमित A समथनाजोगिन 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श्रोजिनभद्रसूरि ताडपत्रीय ज्ञानभंडारकी ताडपत्रीय प्रति है। यूची में इस प्रतिका क्रमाङ्क ७७ है। इसमें पत्र १ से २६ में नन्दीसूत्र मूल है और पत्र १ से २९७ में श्रीमलयगिरिमूरिकृत वृत्ति है । प्रतिकी लंबाई-चौडाई ३३॥ २॥ इंच है । प्रतिपत्रमें पत्रकी चौडाईके अनुसार चार या पांच पंक्तियां लिखी हैं। प्रति तीन विभागमें लिखी गई है। प्रति शुद्धतम है। पुष्पिकाके लेखानुसार इस प्रति का संशोधन खरतरगच्छीय आचार्य श्रीजिनभद्रसूरिने स्वयं किया है। अनेक स्थानपर आपने उपयोगी टिप्पनीयाँ भी की हैं, जो हमने हमारे मुद्रणमें तत्तत् स्थान पर दे दी हैं । प्रति की लिपि सुन्दरतम है । अन्तमें लेखककी पुप्पिका इस प्रकार है --- स्वस्ति । संवत् १४८८ वर्षे श्रीसत्यपुरे पौष वदि १० दिने श्रीपार्श्वदेवजन्मकल्याणके श्रीखरतरगणाधिपैः श्रीजिनराजरिपट्टालंकारसारैः प्रभुश्रीमजिनभद्रमूरिसूर्यावतारैः श्रीनन्दिसिद्धान्तपुस्तकं स्वहस्तेन शोधितं पाठितं च । तच श्रीश्रमणसङ्घन वाच्यमानं चिरं नन्दतु ।। सामान्यतया श्रीजिनभद्रमूरिके उपदेशसे लिखाई गई प्रतियाँ स्तम्भतीर्थ(खंभात)निवासी खरतरगच्छीय श्रावक परीक्षित धरणाशाह या श्रीमालिज्ञातीय (१) बलिराज-उदयराजकी पाई गई हैं । किन्तु इस प्रतिमें इन तीनों मेंसे किसीके नामका उल्लेख नहीं है। यहां यह भी स्पष्ट होता है कि अपने विहारगत क्षेत्रोंमें भी आचार्य श्रोजिनभदमूरिको अन्य मुख्य कार्योंके साथ साथ पुस्तकलेखन-संशोधन-अध्यापनादि कार्य भी था । . सं० प्रति—यह प्रति पाटन-संबवीपाडाके लघुपोशालिक ताडपत्रीय जैन ज्ञानभंडारकी ताडपत्रीय प्रति है। इसके पत्र ८२ हैं। प्रतिपत्रमें तीन या चार पंक्ति लीखी हैं । प्रतिपंक्तिमें ४० से ४३ अक्षर लिखे हैं। प्रति दो विभागमें लिखी है। इसकी लंबाई-चौडाई १४४ १।।। इंचकी है। प्रतिको लिपि सामान्यतया अच्छी है। अन्तमें लेखक की पुष्पिका नहीं है। इसके अन्तमें अनुज्ञानन्दी नहीं है। खं० प्रति-यह प्रति खंभातके श्रीशान्तिनाथताडपत्रीय जनज्ञानभंडारकी ताडपत्रीय प्रति है। प्राच्यविद्यामंदिरबडौदासे प्रकाशित इस भंडारकी सूची में इसका क्रमाङ्क ३८ है । इसमें पत्र १ से १८ में नन्दीसूत्र मूल है, पत्र १८-१९ में अनुज्ञानन्दी है और पुनः पत्र १ से २४७ में नन्दीसूत्रकी मलयगिरीया वृत्ति है। प्रतिकी लंबाई-चौडाई ३१॥४२॥ इंच है। ताइपत्रकी चौडाईके अनुसार तीनसे पाँच पंक्तियाँ लिखी हुई हैं । प्रतिपंक्ति में १०१ से ११९ अक्षर लिखे पाये जाते हैं। प्रति शुद्धप्राय है और लिपि सुन्दरतम है । प्रति तीन विभागमें लीखी गई है । अन्तमें इस प्रकारकी पुष्पिका है स० १२९२ बर्षे वैशाख शुदि १३ अधेह वीजापुरे श्रायकपौषधशालायां श्रीदेवभद्रगणि पं० मलयकीर्ति पं० अजितप्रभगणिप्रभृतीनां व्याख्या ततः संसारासारतां विचिन्त्य सर्वज्ञोक्तं शास्त्रं प्रमाणमिति मनसि ज्ञात्वा सा० धणपालसुन सा• रत्नपाल ४० गजमुत ठ० विजयपाल श्रे० देल्हासुत श्रे० वील्हण महं० जिणदेव महं• बीकलजुत ठ० आसपाल श्रे० साल्हा ठ० सहजासुत ठ० अरसीह सा० राहडसुत सा० लाहडप्रभृतिसमस्तश्रावकैः मोक्षफलप्रार्थकैः समस्तचतुर्विधसंबस्य पठनार्थ वाचनार्थ च समर्पणाय लिम्वापितम्॥छ।। नन्हीं विजापुरके श्रावकोंकी लिखाई हुई अन्य कई नाडपत्रीय प्रतियां खंभातके इस भाण्डागारमें विद्यमान हैं। Page #19 -------------------------------------------------------------------------- ________________ डे० प्रति-यह प्रति अहमदाबादके डेला उपाश्रयके ज्ञानभंडारकी है। इसमें मलयगिरीया टीका भी पंचपाठरूपसे लिखित है । साथमें अनुज्ञानन्दी भी है । कागज पर लिखी हुई यह प्रति अनुमान सत्रहवीं सदीमें लिखी मालूम होती है । ल० प्रति-यह प्रति अहमदाबाद लवारकी पोलके उपाश्रयके ज्ञानभंडारकी है। इसकी पत्रसंख्या ३५ हैं । हरेक पत्रमें नव पंक्तियाँ हैं । हरेक पंक्ति में ३१ से ४२ अक्षर लिखे हैं। प्रतिकी लिपि सुन्दरतम है। अक्षर मोटे हैं। कागज पर लिखी हुई इस प्रतिके अंतमें लेखककी पुष्पिका इस प्रकार है नन्दी सम्मत्ता ॥छ। सं. १४८५ वर्षे फाल्गुन सुदि ७ शनी श्रीभीमपल्लीय....[अक्षर बीगाड दिये हैं। श्रीः ॥छ।। शुभं भवतु ॥छ।।। इस पुष्पिकामें जो अक्षर बिगाड दिये हैं उनके स्थानमें बहार इस प्रकार नये अक्षर लिखे हैंसाह श्रीवच्छासुत साह सहिसकस्य स्वपुण्यार्थ पुस्तकभंडारे कारापिता मुत वर्धमानपुस्तकपरिपालनार्थ ॥ छ । मो० प्रति—यह प्रति पाटन-श्रीहेमचंद्राचार्य जैनज्ञानमंदिर में स्थित मोदी ज्ञानभंडारकी है। यह प्रति विक्रमकी सोलहवीं सदीमें लिखी हुई है। शु० प्रति—यह प्रति : श्रीहेमचन्द्राचार्यजैनज्ञानमंदिरमें स्थित शुभवीरजैनज्ञानभंडारकी है । प्रति प्रायः शुद्ध है। प्रति अनुमान सत्रहवीं सदीके उत्तरार्द्ध में लिखी प्रतीत होती है । मु० प्रति—यह प्रति आगमोद्धारक श्रीसागरानन्दसूरिवग्सम्पादित श्रीमलयगिरिकृतटीकायुक्त है । जो आपने आगमवाचनाके समय सम्पादित की है। यह आवृत्ति वि. सं. १९७३में आगमोदयसमिति-सुरतकी ओरसे प्रकाशित हुई है। चूर्णीकी प्रतियाँ जे० प्रति—यह प्रति जेसलमेर किलेमें स्थित श्रीजिनभद्रीय ताडपत्रीय जैन ज्ञानभंडारकी ताडपत्रीय प्रति है। इसका क्रमाङ्क ४१० है। इस क्रमांकमें तीन ग्रन्थ हैं-१. दशवकालिक अगस्त्यसिंहीया चूर्णी पत्र १८४ । २. नन्दीसूत्रचूर्णी पत्र १८५-२२३ । ३. अनुयोगद्वारसूत्रचूर्णी पत्र १२४-२७५ । इनमेंसे नन्दीचूर्णी और अनुयोगद्वारचूर्णी, ये दोनों चूर्णीयाँ किसी गीतार्थकी संशोधित हैं। प्रतिकी लंबाई-चौडाई २५४२॥ इनकी है। प्रतिके अंतमें लेखनसंवत् या लेखककीपुष्पिका नहीं है । तथापि प्रतिका रंग-ढंग देखनेसे प्रतीत होता है कि-यह प्रति तेरहवीं सदीमें लिखित है । प्रति शुद्धप्राय है। आ० प्रति—यह प्रति आगमोद्धारकजी श्रीसागरानन्दसूरिमहाराजसम्पादित मुद्रित प्रति है। जिसका प्रकाशन श्रीऋषभदेवजी केशरीमलजी श्वेताम्बर संस्था-रतलामकी ओरसे हुआ है। पूज्यश्रीको इसकी कोई अच्छी प्रति न मीलनेके कारण यह बहुत अशुद्ध छपी है । फिर भी एक प्रत्यन्तरकी तोरसे हमारे संशोधनमें यह आवृत्ति काममें ही आई है। दा० प्रति-यह प्रति जिनागमज्ञ पूज्य श्रीविजयदानसूरिमहागाससम्पादित मुद्रित प्रति है। जो भाई हीरालालके द्वारा प्रकाशित है। इसमें भी काफी अशुद्धियाँ हैं। तथापि पूज्य सागरानन्दसूरिम० की आवृत्तिकी अपेक्षा यह कुछ अच्छी अ चर्णिके सम्पादन और संशोधनके समय पाटन-श्रीहेमचन्द्राचार्यजैनज्ञानमंदिरकी एक प्रति और श्रीलालभाई दलपतभाई भारतीय संस्कृति विद्यामंदिरकी प्रतिको भी सामने रक्खी थी। ये दोनों प्रतियां क्रमशः सोलहवीं और सत्रहवीं सदीमें लिखी हुई प्रतियां हैं और अशुद्धिभरपूर प्रतियाँ हैं । तथापि शुद्ध पाठोंके निर्णयमें ये भी सहायक हुई है। इस चूर्णीके संशोधनमें हमारे लिये मुख्य आधारस्तम्भ जे० प्रति ही है, जो अतीव शुद्ध प्रति है। सूत्रप्रतियोंकी विशेषता सं० डे० मो०, ये तीन प्रतियोंका प्रतिलेखनके बाद किसी विद्वानने संशोधन नहीं किया है। Jain Education Intemational Page #20 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जे. खं० ल. शु०, ये चार प्रतियाँ संशोधित प्रतियाँ हैं। इनमें भी जे० प्रतिका संशोधन खरतरगच्छीय गीतार्य आचार्य श्रीजिनभद्रसरिने किया है, जिसमें आपने नन्दीसूत्रके प्रक्षिप्त पाठादिके विषयमें स्थान स्थान पर टिप्पणीयां की हैं, जो हमने हमारे इस प्रकाशनमें दी हैं, देखो पृ. ५ टि. १०, पृ. ८ टि. १०, पृ. १० टि. ७, पृ. ११ टि. ११, पृ. १२ टि. ५ इत्यादि। शु० प्रति अधिकतर अंशमें खं० प्रतिसे मीलनीझुलती होने पर भी जुदा कुलको मालुम होती है। इसमें स्थविरावलिकी प्रक्षिप्त मानी जानेवाली गाथायें नहीं हैं, देखो पृ.८ टि. १०, पृ.१० टि. ७, पृ. ११ टि. ११ । लदे परिपत्रमें जो तीन गाथायें प्रक्षिप्त हैं वे भी इस प्रतिमें नहीं हैं, देखो पृ. १२ टि. ५। इसी प्रकार मनःपर्यवज्ञानके द्रव्यक्षेत्रादिविषयक सूत्रपाठमें जो सूत्रपाठ चूर्णीकार एवं हरिभद्रसूरिको अभिप्रेत है वह इस प्रतिसे पाया गया है, देखो पृ. २३ टि. ३। ऐसी जो जो अन्यान्य विशेषतायें इस प्रतिको हैं उनका पादटिप्पणीयोंमें उल्लेख कर दिया है। यहां पर परीक्षण एवं अभ्यासकी दृष्टिसे नरीक्षण करनेवाले विद्वानोंसे प्रार्थना है कि इस मुद्रणमें पृ. १० टि. ७, पृ.११ टि.११ आदि दो-चार स्थानोंमें P प्रतिका निर्देश किया है वह P प्रति कौनसी ! और किस भंडारकी थी? यह मेरी स्मृतिसे चला गया है। फिर भी यहाँ इतनी सूचना कर देता हूँ कि-शु० प्रति कुछ अंशमें इस Pप्रतिसे मीलतीझुलती प्रति है। अर्थात् जैसेगोविंदाणं पि णमो० तथा तत्तो य भूयदिन्ने० ये दो गाथायें P प्रतिमें नहीं हैं इसी तरह शु० प्रतिमें भी उपलब्ध नहीं हैं, देखो पृ. १० टि. ७ । यद्यपि प्रस्तुत मुद्रणमें इस स्थानमें Pप्रतिके साथ शु० प्रतिका उल्लेख छुट गया है किन्तु भंडारमें जा कर शु० प्रतिको पुनः देखके निश्चित किया है कि गोविंदाणं पि णमो० तथा तत्तो य भूयदिने० ये दोनों गाथायें शु० प्रतिमें भी नहीं है । एवं-वंदामि अजधम्म० तथा वंदामि अजरविवय० ये दो गाथायें शु० प्रतिमें नहीं हैं, देखो पृ. ८ टि. १०। चूर्णी एवं टीकाओंमें इन चार गाथाओंका उल्लेख या व्याख्यान नहीं है। नन्दीसूत्रकी ऐसी और भी प्रति मेरे देखनेमें आई है, जिसमें ये गाथायें नहीं हैं। फिर भी नन्दीसूत्रको प्राचीन ताडपत्रीय प्रतियोंमें और दूसरी बहुतसी पंद्रहवीं-सोलहवीं शती में लिखित कागजकी प्रतियोंमें ये गाथायें अवश्य ही उपलब्ध हैं। यहां प्रश्न होता है कि-चूर्णिकार और टीकाकारोंने इन गाथाओका स्पर्श तक क्यों नहीं किया है । जे. और मो० प्रतिकी विशेषता यह है कि इसमें प्रायः लुप्तव्यञ्जनके स्थानमें अस्पष्ट यश्रुतिके प्रयोग न होकर केवल अ और आ की श्रुतिवाले प्रयोग ही हैं, जो पूज्य श्रीसागरानन्दमूरिमहाराजके मुद्रणमें नजर आते हैं। ये दो प्रतियाँ उस परम्पराकी हैं, जिसमें अस्पष्ट यश्रुतिके प्रयोग कम हैं। आदि ण प्रयोगके स्थानमें नका प्रयोग मुख्य है। जैसे किनाण नाह नमंसिय नियम नंदिघोस निग्गय नाल निम्मल सुयनिस्सिय आदि । ___ डे०२० प्रतियाँ नप्रयोगके विषयमें जे०मो० प्रतियोंके समान हैं, किन्तु इन प्रतियोंमें अस्पष्ट यश्रुतिके प्रयोग हो प्रयुक्त हैं। खं०सं० प्रतियोंमें णप्रयोगकी प्रधानता है। किन्तु सं० प्रतिमें फुरन्त महन्त समन्ता आदि परसवर्णके प्रयोग नजर आते हैं, इतना खं० और सं० प्रतिका भेद है। इसी तरह सं० और खं० प्रतिका अन्तर यह है कि खं० प्रतिमें चडुलियम्वा पदीवम्बा आदि जैसे प्रयोग भी प्रयुक्त दिखाई देते हैं देखो पृ. १६ टि० ३।। उपर आठ प्रतियों का परिचय दिया गया है, जो आज उपलब्ध प्रतियों में प्राचीन प्रतियाँ हैं। इतनी प्रतियाँ एकत्र करने पर भी चूर्णिकार एवं वृत्तिकारसम्मत ऐसे अनेक पाठ हैं जो इन इतनी प्रतियोंसे भी प्राप्त नहीं हुए हैं। इनका सूचन पादटिप्पणियों में यथास्थान किया है। इस नन्दीसूत्रके संशोधन. पाठ, पाठभेद, पाठोंकी कमीबेशीके निर्णयके लिये चूणि, हरिभद्रवृत्ति, मलयगिरिवृत्ति, श्रीचन्द्रीय Page #21 -------------------------------------------------------------------------- ________________ टिप्पन, इन चारोंका समग्रभावसे उपयोग किया गया है, इतना ही नहीं, किन्तु जहाँ जहाँ नन्दीसूत्रके उदरण, व्याख्यान आदि आये हैं ऐसे द्वादशारनयचक्र, समवायाङ्गसूत्र एवं भगवतीसूत्रकी अभयदेवीया वृत्ति, विशेषावश्यकमलधारीया वृत्ति, पाक्षिकसूत्रवृत्ति आदि अनेक शास्त्रोंका उपयोग भी किया है, जिसकी प्रतीति इस सम्पादनकी पादटिप्पणियोंको देखनसे होगी। नन्दीसूत्रकी चूणिके संशोधनके लिये मेरा आधारस्तम्भ जैसलमेरकी प्रति ही है। अगर यह प्रति प्राप्त न होती तो इसका जो गौरवपूर्ण सम्पादन हुआ है, वह शक्य न बनता । संस्कृत टीका निर्माणके बाद चूर्णियोंका अध्ययन कम हो जानेसे प्रायः आज ज्ञानभंडारोंमें जो जो आगमिक या आगमेतर शास्त्रोके चूर्णिग्रन्थोकी हस्तप्रतियाँ हैं, वे सभी अशद्धिभाण्डागारस्वरूप ही हो गई हैं। इतनी बात जरूर है कि-ज्यों ज्यों प्रति प्राचीन त्यो त्यो अशुद्धियाँ कम रहती हैं। किन्त एक ही युगकी प्रतियों के लिये यह अनुभव हुआ है कि अगर वह प्रति प्राचीन प्रतिकी या भिन्न प्रदेशस्थित प्रतिकी नकल न हो कर, उसी युगकी या प्रदेशकी उत्तरोत्तर नकलकी नकल हो, तब तो उत्तरोत्तर अशुद्धियोंकी वृद्धि ही होती रही है। इतना ही नहीं पंक्तियाँकी पंक्तियाँ और सन्दर्भ के सन्दर्भ गायब हो गये हैं। अस्तु, मेरेको जैसलमेरकी प्रति मीली, यह मैं सिर्फ अपना ही नहीं, साथमें सब शास्त्रपाठी जैन गीतार्थ मुनिगण एवं विद्वानोंका भी सौभाग्य समझता हूं। ___ अनेक आगमोंकी चूर्णि, वृत्ति आदिके अवलोकनसे प्रतीत हुआ है कि-अगर प्राचीन एवं अलग अलग कुलकी प्रतियाँ प्राप्त न हो तो मुद्रणादिमें प्रायः सैंकडों अशुद्धियाँ पाठपरावृत्तियाँ आदि रहनेका सम्भव रहता है, इतना ही नहीं सन्दर्भके सन्दर्भ छूट जाते हैं । विद्वान् संशोधकोंके ध्यानमें लानेके लिये मैं यहाँ एक बातको उद्धृत करता हूं ___ अनुयोगद्वारसूत्रकी चूर्णिका संशोधन मैंने पाटन-ज्ञानभंडारकी दो प्राचीन ताडपत्रीय हस्तप्रतियाँ और ग्वंभातके श्रीशान्तिनाथ ज्ञानभंडारकी दो ताडपत्रीय प्रतियाँ, एवं चार प्रतियोंके आधारसे सुचारुतया कर लिया । कुछ शंकास्थान होने पर भी दिलमें विश्वास हो गया था कि-एकंदर संशोधन अच्छा हो गया है। किन्तु जब जैसलमेर जानेका मोका मिला, और वहकि ज्ञानभंडारकी प्राचीन ताडपत्रीय प्रतिसे तुलना की तो कितने ही शङ्कास्थान दूर हुए, इतना ही नहीं, परन्तु अलग अलग स्थानमें हो कर दश-बारह पंक्तियाँ जितना दूसरे कुल की प्रतियोंमें छूट गया हुआ नया पाठ प्राप्त हुआ और अनेकानेक अशुद्धियां भी दूर हुई। यह प्राचीन प्राचीनतम एवं अलग अलग कुलकी प्रतियोंके उपयोगका साफल्य है। - प्रसंगवश यहाँ यह कहना भी उचित है कि-इस नन्दीसूत्रचूर्गीक संशोधन एवं सम्पादनमें साद्यन्त उपयोगमें लाई गई प्रतियोंके अलावा दूसरी अनेक प्रतियाँ मैंने समय-समय पर देखी हैं, इससे ज्ञात हुआ है कि-जैसलमेरकी प्रतिकी अपेक्षा इन प्रतियोंमें त द ध आदि वर्णोके प्रयोग विपुल प्रमाणमें नजर आये हैं। नन्दीसूत्रके प्रणेता नन्दीसूत्रकारने नन्दीसूत्रमें कहीं भी अपने नामका निर्देश नहीं किया है, किन्तु चूर्णिकार श्रीजिनदासगणि महत्तरने अपनी चूर्णिमें सूत्रकारका नाम निर्दिष्ट किया है, जो इस प्रकार है " एवं कतमंगलोवयारो थेरावलिकमे य दंसिए अरिहेमु य दंसितेसु दूसगणिसीसो देववायगो साहुजणहितढाए इणमाह" [पत्र १३] इस उल्लेखद्वारा चूर्णिकारने नन्दीसूत्रप्रणेता स्थविर श्रीदेववाचक हैं-ऐसा बतलाया है। आचार्य श्रीहरिभद्रसूरि एवं आचार्य श्रीमलयगिरिसूरिने भी इसी आशयका उल्लेख अपनी अपनी टीकामें किया है, किन्तु इनका मूल आधार चूर्णिकारका उल्लेख ही है। चूर्णिकारके उल्लेखसे ही ज्ञात होता है कि-नन्दीसूत्रके प्रणेता नन्दिसूत्रस्थविरावलिगत अंतिमस्थविर श्रीदुष्यगणिके शिष्य श्रीदेववाचक हैं। Page #22 -------------------------------------------------------------------------- ________________ पंन्यासजी श्रीकल्याणविजयजीमहाराजने अपने 'वीरनिर्वाणसंवत् और जैन कालगणना' निबन्धमें (नागरीप्रचारिणी भाग १० अंक ४) अनेकानेक प्रमाण और युक्ति द्वारा नन्दीसूत्रप्रणेता स्थविर देववाचक और जैन आगमोंकी माथुरी एवं वाल्लभी वाचनाओंको संवादित करनेवाले श्रीदेवर्द्धिगणि क्षमाश्रमगको एक बतलाया है। नत्यकर्मग्रन्थकार आचार्य श्रीदेवेन्द्रसूरि महाराजने अपनी स्वोपज्ञ वृत्तिमें देवर्दिवाचक, देवर्द्धिक्षमाश्रमण नामके उल्लेखपूर्वक अनेकवार नन्दीसूत्रपाठके उद्धरण दिये हैं, यह भी उन्होंने देववाचक और देवद्धिक्षमाश्रमणको एक व्यक्ति मानके ही दिये हैं। यह भी श्रीकन्यागविजयजी महाराजकी मान्यताको पुष्ट करनेवाला सबूत है। तथापि नन्दीकी स्थविरावलीमें अंतिम स्थविर दुष्यगगि हैं, जिनको नन्दी दृकिारने देववाचकके गुरु दरशाये हैं। तब कल्पसूत्रकी वि. सं० १२४६ में लिखित प्रतिसे ले कर आज पर्यन्तकी प्राचीन-अर्वाचीन ताडपत्रीय एवं कागजको योंमें स्थविरावलिके पाठोंकी कमी वेशीके कारण कोई एक स्थविरका नाम व्यवस्थितरूपस पाया नहीं जाता है। इस कारण इन दोनों स्थविरोंको एक मानना कहां तक उचित है, यह तज्ज्ञ विद्वानोंके लिये विचारणीय है । देववाचक और देवर्द्विक्षमाश्रमण इन नाम और विशेषगउपाधिमें भी अंतर है। साथमें यह भी देखना जरूरी है कि नन्दीसूत्रकी स्थविरावलीमें वायगवंस, वायगपय, वायग, इस प्रकार वायग शब्दका ही प्रयोग मिटता है, दूसरे कोई वादी, क्षमाश्रमग, दिवाकर जैसे पदका प्रयोग नजर नहीं आता है। अगर देववाचकको क्षमाश्रमणकी भी उपाधि होतो तो नन्दीवुर्णिकार जरूर लिखते । जैसे द्वादशारनयचक्रटीकाके प्रणेता सिंहवादी गणि क्षमाश्रमण, विशेषावश्यककी अपूर्ण स्वोपज्ञ टोकाको पूरी करनेवाले कोट्टार्यवादी गणि महत्तर, सन्मति सर्कके प्रणेता वादी सिद्धसनगणी दिवाकर आदि नामोंके साथ दो विशेषण-उपाधियाँ जुडी हुई मिलती हैं इसी तरह देववाचकके लिये भी दो उपाधियांका निर्देश जरूर मिलता। अतः देववाचक और देवद्रिक्षमाश्रमण, ये दोनों एक ही व्यक्ति है या भिन्न, यह प्रश्न अब भी विचारणीय प्रतीत होता है । कल्पसूत्रकी स्थविरावली और नन्दीसूत्रकी स्थविरावलीका मेलझोल कैसे, कितना और कहां तक हो सकता है, यह भी विचारार्ह है । वाचकपदकी अपेक्षाकृत प्राचीनता होने पर भी कामसूत्रकी समयसमय पर परिवर्धित स्थविरावलीमें थेर और खमासमग पदका ही निर्देश नजर आता है, यह भी दोनों स्थविर और स्थविरावलीकी विशेषता एवं भिन्नताके विचारका साधन है। यहाँ पर प्रसंगोपात्त एक बात स्पष्ट करना उचित है कि-भद्रेश्वरमूरिकी कहाव में एक गाथा निम्नप्रकारकी नजर आती है-- वाई य खमासमणे दिवायर वायगे ति एगट्टा । पुचगयं जस्सेसं जिणागमे तम्मिमे नामा ॥ अर्थात-बादी, क्षमाश्रमण, दिवाकर और वाचक, ये एकार्थक-समानार्थक शब्द हैं। जिनागममें जो पूर्वगत शास्त्र हैं उनके शेष अर्थात् अंशोका पारम्परिक ज्ञान जिनके पास है उनके लिये ये पद हैं। इस गाथासे यह स्पष्ट है कि-इन उपाधियोंवाले आचार्योंके पास पूर्वगतज्ञानकी परंपरा थी। किन्तु आज जैन परम्परामें जो ऐसी मान्यता प्रचलित है कि-इन पदधारक आचार्योंको एक पूर्व आदिका ज्ञान था, यह मान्यता भ्रान्त एवं गलत प्रतीत होती है। कारण यह है कि-अगर आचाराङ्गादि प्राथमिक अंगआगम शीर्णविशीर्ण हो चूके ये, इस दशामें पूर्वश्रुतके अखंड रहनेकी संभावना ही कैसे हो सकती है। स्थविर श्रीदेववाचककी नन्दीसूत्रके सिवा दूसरी कोई कृति उपलब्ध नहीं है । चूर्णिकार नन्दीसूत्रचूर्णिके प्रणेता आचार्य श्रीजिनदास गणि महत्तर हैं। सामान्यतया आज यह मान्यता प्रचलित है किजैन गम उपरके भाष्योंके प्रणेता श्रीजिनभद्र गाण क्षमाश्रमण और चूणियोके रचयिता श्रीजिनदास गणि महत्तर Jain Education Intemational Page #23 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ही हैं, और ऐसे प्राचीन उल्लेख पट्टावली आदिमें पाये भी जाते हैं; किन्तु भाष्य-चूर्णियोंके अवगाहन बाद ये दोनों मान्यताएं गलत प्रतीत हुई हैं। यहाँ पर भाष्यकारोंका विचार अप्रस्तुत है, अतः सिर्फ यहाँ पर जैन आगमोके उपर जो प्राचीन चूर्णियाँ उपलब्ध हैं उन्हीके विषयमें ही विचार किया जाता है। आज जैन आगमोके उपर जो चूर्णिनामक प्राकृतभाषाप्रधान व्याख्याग्रन्थ प्राप्त हैं उनके नाम क्रमश: ये हैं--- १ आचामङ्गचूर्णि २ सूत्रकृताङ्गचूणिं ३ भगवतीचूर्णि ४ जीवाभिगमचूर्णि ५ प्रज्ञापनासूत्रशरीरपदचूर्णि ६ जम्बूद्वीपकरणचूर्णि ७ दशाकल्पचूर्णि ८ कल्पचूर्णि ९ कल्पविशेपचूणि १० व्यवहारसूत्रचूर्णि ११ निशीथमूत्रविशेषचूणि १२ पश्चकल्पचूर्णि १३ जीतकल्पबृहचूर्णि १४ आवश्यकचूर्णि १५ दशकालिकचूर्णि श्रीअगस्त्यसिंहकृता १६ दशकालिकचूर्णि वृद्धविवरणाख्या १७ उत्तराध्ययनचूर्णि १८ नन्दीसूत्रणि १९ अनुयोगद्वारणि २० पाक्षिकचूर्णि। उपर जिन वौस चूर्णियोंके नाम दिये हैं उनका और इनके प्रणेताओंके विषयमें विचार करनेके पूर्व एतद्विषयक चूर्णिग्रन्थों के प्राप्त उल्लेखोंको मैं एकसाथ यहाँ उद्धृत कर देता हूँ, जो भविष्यमें विद्वानों के लिये कायमकी विचारसामग्री बनी रहे । (१) आचारागचूर्णी । अन्तः से हु निरालंबणमप्पतिद्वितो। शेषं तदेव ॥ इति आचारचूर्णी परिसमाया ॥ नमो सुयदेवयाए भगवईए ।। ग्रन्थानम् ८३०० ॥ (२) सूत्रकृताङ्गचूर्णी । अन्तः सदहामि जध सूत्रेति तब्वं सवमिति ॥ नमः सर्वविदे वीराय विगतमोहाय || समाप्तं चेदं सूत्रकृताभिधं द्वितीयमङ्गमिति । भद्रं भवतु श्रीजिनशासनाय । सूगडांगचूर्णिः समाप्ता || ग्रन्थानम् ९५०० ॥ (३) भगवतीचूर्णि - श्रीभगवतीचूर्णिः परिसमातेति ॥ इप्ति भद्रं ॥ सुअदेवयं तु वंदे जीइ पसाएग सिक्खियं नाणं । विइयं पि बतव (बंभ)देवि पसन्नवाणि पगिवयामि || ग्रंथानं ६७०७॥श्री।। (४) जीवाभिगमचूर्णि इस चूर्णीकी प्रति अद्यावधि ज्ञात किसी भंडारमें देखने नहीं आई है। (५) प्रज्ञापनाशरीरपदचूर्णि । अन्तः जमिहं समयविरुद्धं बद्धं बुद्धिविकलेण होजा हि । तं जिगवयगविहन्नू खमिऊगं मे पसोहिंतु ॥ १॥ । सरीरपदस्स चुण्णी जिणभदखमासमणकित्तिया समत्ता । अनुयोगद्वारचूर्णि पत्र ७४ । याकिनीमहत्तरासूनु आचार्य श्रीहरिभद्रसूरिकृत अनुयोगद्वारलधुवृत्ति पत्र ९९ में भी यही उल्लेख है। (६) जम्बूद्वीपकरणचूणि । अन्तः एवं उवरिल्लभागस्स तेरासियं पउंजियच्वं । विरुवेहबुड्ढीओ आगेयवाओ॥ जंबुद्दीवपण्णत्तिकरगाणं चुण्णी समत्ता ।। (७) दशाश्रुतस्कन्धचूर्णि । अन्तः जाव णया वि । जाव करणओ-सवेसि पि णयाणं० गाधा ॥ दशानां चूर्णी समाप्ता ।। (८) कल्पचूर्णी आउयवजा उ० गाहा ९९ । वित्थरण जहा पिसेसावस्सगभासे । 'सामित्तं चेव पगडीगं को केवतियं बंधइ ! खवेइ वा केत्तियं को उ? त्ति जहा कम्मपगडीए । एतं पसंगेण गतं । Jain Education Intemational Page #24 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अन्तः तओ य आगणातो छिण्णसंसारी भवति संसारसंततिं छेत्तुं मोक्खं पावतीति ॥ कल्पचूर्णी समाप्ता ॥ ग्रन्थाग्रम्-५३०० प्रत्यक्षरगणनया निर्णीतम् ॥ [सर्वग्रन्थाग्रम् - १४७८४ ॥ (९) कल्पविशेष चूर्णि - पविसेसचुगी समतेति ॥ (१०) व्यवहारचूर्णि । अन्तः व्यवहारस्य भगवतः अर्थविवक्षाप्रवर्तने दक्षम् । विवरणमिदं समा श्रमगगणानाममृतभूतम् ॥१॥ (११) निशीथ विशेषचूर्णि । आदि: नमिऊ रहंताणं, सिद्धाण य कम्मचक्कनुकाणं । सयणसिहविमुक्का सवसाहूग भावेण ॥१॥ सविसेसायरजुत्तं काउ पगामं च अत्थदायिस्स । पज्जुण्णवमासमणस्स चरण करणाणुपालस्स ॥२॥ एवं कयपणामी पकपणामस्स विवरणं वने । पुत्रायरियकथं चिय अहं पितं चेव उ विसेसे || ३ || भणिया विमुत्तिचूला अहुणाऽवसरो जिसीहचूलाए । को संबंधी तिस्सा भण्णइ, इगमो निसामेहि ||४|| तेरहवा उदेशके अन्तमें-' ? संकेर जड उडविभूसणस्स तणामसरिणामस्स । तस्स सुतेणेस कता विसेस चुनी मिसीहस्स || पंद्रहवा उद्देश अन्तमें— रैविकरमभिधाणकखरसत्तमवग्गंत अवरजुएणं । गामं जस्सित् सुते तिस्से कया चुण्णी ॥ सोलहवा उद्देशके अन्तमें देडो सीह थोरा य ततो जेट्ठा सहोयरा । कणिट्ठा देउलो गणो सत्तमो य तिइज्जिओ । एतेसि मज्झिमोजो उ मंत्री (मंदधी) तेण वित्तिता ( चिन्तिता) | अन्तः जो गाहा चेवंविधपागडो फुडपदस्थो । रइओ परिभासाए साहून अनुद्वा ॥ १ ॥ ति-च-प-मागे विपग-ति-निगक्खरा ठवे तेसिं । पढन नतिएहिं विदुः सरजुएहिं णामं कथं जस्स ||२|| गुरुदिण्णं च गणितं महत्तरतं च तस्स तुद्वेण । तेण कतेसा चुण्णी विसेसनामा निसीहस्स || ३ || भगवतीए । जिणदासगणिमहत्तरेण रइया मिसीहकुण्णी समत्ता ॥ (१२) पञ्चल्लचूर्णि । अन्तः पप भेओ पचिओ मोक्खसाहगाए । जं चरिऊग सुविहिया करेंति दुक्खक्खयं धीरा ॥ पञ्चकल्पचूर्णिः समाप्ता ॥ ग्रन्थप्रमाणं सहस्रत्रयं शतमेकं पञ्चविंशत्युत्तरम् ३१२५ ॥ (१३) जीतकल्पह चूर्णी । अन्तः इति जेण जीदाणं साहूयारपंकपरिमुद्धिकरं । गाहाहिं फुडं रइयं महरपवत्थाहिं पावगं परमहियं ॥ १ ॥ १. इस गाथासे ज्ञात होता है कि चूर्णिकार श्रीजिनदासगणिमहत्तर के पिता का नाम नाग अथवा तो चन्द्र होगा । २. इस गाथाके अर्थका विचार करनेसे चूर्णिकार श्रीजिनदासगणि महत्तरकी माताका नाम प्राकृत गोवा संस्कृत गोपा अधिक संभवित है । ३. इस गाथामें उल्लिखित देइड आदि, चूर्णिकार श्रीजिनदासगणि महत्तरके सहोदर भाई हैं । Page #25 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जिणभदखमासमणं निच्छियमुत्तऽथदायगामलचरणं । तमहं वंदे पयो परमं परमोवगारकारिणं महग्धं ।। २ ॥ ॥जीतकल्पचूर्णिः समाप्ता । सिद्धसेनकृतिरेषा ।। (१४) आवश्यकचूर्णी । अन्तः करणनयो—सवेसि पि नयागं० गाधा ॥ इति आवस्सगनिज्जुत्तिचुण्णी समाप्ता ।। मंगलं महाश्रीः ।। (१५) दशकालिकसूत्रअगस्त्यसिंहचूर्णी । अन्तः एवमेत धम्मसमुकित्तगादिचरण-करणाणेगपरूवणागभं नेवाणगमणफलावसागं भवियजणागंदिकरं चुण्णि समासवयणेण दसझालियं परिसमत्तं ।। नमः । वीरवरस्स भगवतो तित्ये कोडीगणे सुविपुलम्मि । गुगगयवहाभस्सा वैरसामिस्स साहाए ॥१॥ महरिसिसरिससभावा भावाऽभावाण मुगितपरमत्था । रिसिगुत्तखमासमणा खमा-समाणं निधी आसि ॥२॥ तेसिं सीसेण इमा कलसभवमइंदणामधेन्जेगं । दसकालियस्स चुण्णी पयाण रयणातो उवणथा ।। ३ ।। रुयिरपद-संधिणियता डेयपुणरुत्तवित्थरपसंगा । वक्खाणमंतरेणावि सिस्समतिबोधणसमत्था ॥ ४॥ ससमय-परसमयणयाण जंथ ण समाधितं पमादेणं । तं खमह पसाहेह य इय विण्णत्ती पवयणीणं ॥५॥ ॥ दसकालियचुण्णी परिसमत्ता ॥ (१६) दशकालिकसूत्रचूणि वृद्धविवरणाख्या । अन्तः अज्झयणाणंतरं 'कालगओ समाधीए' जीवणकालो जस्स गतो समाहोए त्ति । जहा तेण एत्तिएण चेव ...... आराहगा भवंति त्ति ॥ दशवकालिकचूर्गी सम्मत्ता ॥ ग्रन्थाग्रन्थ ७४०० ॥ (१७) उत्तराध्ययनचूणि । अन्तः वाणिजकुलसंभूतो कोडियगणितो य वज्जसाहीतो । गोवालियमहतरओ विक्खातो आसि लोगम्मि ।। १ ।। ससमय-परसमयविऊ ओयस्सी देहिमं सुगंभीरो । सीसगणसंपरिवुडो वक्वाणरतिप्पियो आसी ॥२॥ तेसि सीसेण इमं उत्तरझयणाण चुग्गिखंडं तु । रइयं अगुग्गहत्थं सीसाणं मंदबुद्धीणं ।। ३ ।। जं एत्थं उस्मुत्तं अयाणमाणेण विरतितं होजा । तं अणुओगधरा मे अणुचिंतेउं समारेंतु ॥ ४॥ ॥ षट्त्रिंशोत्तराध्ययनचूर्णी समाप्ता ॥ ग्रन्थाग्रं प्रत्यक्षरगणनया ५८५० ॥ (१८) नन्दीमत्रचूर्णि । अन्तः णि रे ण ग म त ण ह स दा जि या (?) पसुपतिसंखगजट्रिताकुला । कमद्विता धीमतचिंतियक्खरा फुडं कहेयंतऽभिधाण कत्तुणो ॥१॥ शकराज्ञो पञ्चसु वर्षशतेषु व्यतिक्रान्तेपु अष्टनवतेषु नन्द्यध्ययनचूर्णी समाप्ता इति ॥ ग्रन्थानम् १५०० ॥ (१९) अनुयोगद्वारसूत्रचूर्णि । अन्तः चरणमेव गुणो चरणगुणो । अहवा चग्णं चारित्रम् , गुणा खमादिया अणेगविधा, तेनु जो जहदिओ साधू सो सव्वणयसम्मतो भवतीति ॥ ॥ कृतिः श्रीश्वेताम्बराचार्यश्रीजिनदासगणिमहत्तरपूज्यपादानामनुयोगद्वाराणां चूर्णिः ॥ १. इस चूर्णि पर टिप्पन रचनेवाले श्रीश्रीचंद्रमूरिजी प्रस्तुतचूणिका बृहच्चूणिके नामसे उल्लेख करते हैं । Jain Education Intemational Jain Education Intermational Page #26 -------------------------------------------------------------------------- ________________ (२०) पाक्षिकसूत्रचूर्णि । अन्तः अनुष्टुपभेदेन छंदसां ग्रंथाग्रं चत्वारि शतानि ४०० ॥ पाक्षिकप्रतिक्रमणाची समातेति ।। शुभं भवतु सकल संघस्य । मंगलं महाश्रीः ।। २. उपर जिन बीस चूर्णियोंके आदि-अन्तादि अंशोंके उल्लेख दिये हैं. इनके अवलोकनसे प्रतीत होता है कि-प्रज्ञापनासूत्रके बारहवें शरीरपदकी चर्णि श्रीजिनभद्रगणि क्षमाश्रमण कृत है। आज इसकी कोई स्वतन्त्र हस्तप्रति ज्ञानभंडारोंमें उपलब्ध नहीं है, किन्तु श्रीजिनदासगणि महत्तर और आचार्य श्रीहरिभद्रसूरिने क्रमशः अपनी अनुयोगद्वारसूत्र उपरकी चूर्णि और लघुवृत्तिमें इस चूर्णिको समग्र भावसे उद्धृत कर दी है, इससे इसका पता चलता है। श्रीजिनभद्रगगि क्षमाश्रमणने प्रज्ञापनासूत्र उपर सम्पूर्ण चूर्णी की हो, ऐसा प्रतीत नहीं होता है । इसका कारण यह है कि प्राचीन जैन ज्ञानभंडारोंमे प्रज्ञापनासूत्रचूर्णीकी कोई हाथपोथी प्राप्त नहीं है। दूसरा यह भी कारण है कि-आचार्य श्रीमलयगिरिने अपनी प्रज्ञपनावृत्तिमें सिर्फ शरीरपदकी वृत्तिके सिवा और कहीं भी चूर्गीपाठका उल्लेख नहीं किया है। अतः ज्ञात होता है कि श्रीजिनभद्रगणि क्षमाश्रमणने सिर्फ प्रज्ञापनासूत्रके बारहवें शरीरपद पद पर ही चूर्णी की होगी। आचार्य मलयगिरिने अपनी वृत्तिमें इस चूर्णीका छ स्थान पर उल्लेख किया है। २. नन्दीसूत्रचूर्णी, अनुयोगद्वारचूर्णी और निशीथसूत्रचूर्णीक प्रणेता श्रीजिनदासगणि महत्तर हैं । जो इन चूर्णीयोंके अन्तिम उल्लेखसे निर्विवाद रूपसे ज्ञात होता है। निशीथचूर्णिके प्रारम्भमें आपने अपने विद्यागुरुका शुभनाम श्रीप्रद्युम्न क्षमाश्रमण बतलाया है। संभव है कि आपके दीक्षागुरु भी ये ही हों । इन चूर्गियोकी रचना जिनभद्र गणि क्षमाश्रमणके बादकी है। इसका कारण यह है कि-नन्दीचर्णिमें चर्गिकारने केवलज्ञान-केवलदर्शनविषयक युगपदुपयोगएकोपयोग-क्रमोपयोगकी चर्चा की है एवं स्थान स्थान पर जिनभद्रगणिके विशेषावश्यक भाष्यकी गाथाओंका उल्लेख भी किया है। अनुयोगद्वारचूर्णीमें तो आपने श्रीजिनभद्रगणिकी शरीरपदचूर्गीको सायन्त उद्धृत कर दी है। अतः ये तीनों रचनायें श्रीजिनभद्रगणिके बादकी ही निर्विवाद सिद्ध हैं। ३. दशवैकालिकचूर्णीक कत्ता श्रीअगस्त्यसिंहगगी हैं। ये आचार्य कौटिकगगान्तर्गत श्रीवज्रस्वामीकी शाखामें हुए श्रीऋषिगुप्त क्षमाश्रमणके शिष्य हैं । इन दोनों गुरु-शिष्योंके नाम शाखान्तरवर्ति होनेके कारण पट्टावलीयोंमें पाये नहीं जाते हैं । कल्पसूत्रकी पट्टावल्लीमें जो श्रीऋषिगुप्तका नाम है वे स्थविर आर्यसुस्तिके शिष्य होनेके कारण एवं खुद वज्रस्वामीसे भी पूर्ववती होनेसे श्रीअगस्यसिंहगणिके गुरु ऋषिगुप्तसे भिन्न हैं । कल्पसूत्रको स्थविरावलीका उल्लेख इस प्रकार है थेग्स्स णं अजमुहत्थिस्स वासिटुसगुत्तस्स इमे दुवालस थेरा अंतेवासी अहावच्चा अभिण्णाया होत्था । तं जहाथेरे य अग्जरोहण १ जसभद्दे २ मेहगणी ३ य कामिड्ढी ४ । सुद्विय ५ सुप्पडिबुद्धे ६ रक्खिय ७ तह रोहगुत्ते ८ य ॥१॥ इसिगुत्ते ९ सिरिगुत्ते १० गगी य बंभे ११ गणी य तह सोमे १२ । दस दो य गणहरा खलु एए सीसा सुहत्थिस्स ॥ २॥ स्थविर आर्यमुहस्ति श्रीवज्रस्वामीसे पूर्ववर्ती होनेसे ये ऋषिगुप्त स्थविर दशकालिकचूर्णिप्रणेता श्रीअगस्यसिंह के गुरु श्रीऋषिगुम क्षमाश्रमणसे जुदा है, यह स्पष्ट है। आवश्यकचूर्णी, जिसके प्रणेताके नामका कोई पता नहीं है, उसमें तपसंयमके वर्णनप्रसंगमें आवश्यकचूर्णिकारने इस प्रकार दशवकालिकनीका उल्लेख किया हैन. चू२ Jain Education Intemational Page #27 -------------------------------------------------------------------------- ________________ तवो दुविहो–बझो अन्भतरो य। जधा दसवेतालियचुण्णीए चाउलोदणंत (? चालणेदाणंत) अलुद्धेणं णिज़रष्टुं साधून पडिवायणीयं ८ । [आवश्यकचूगी विभाग २ पत्र ११७] । आवश्यकचूर्णिके इस उद्धरणमें दशकालिक का नाम नजर आता है । दशवकालिकसूत्रके उपर दो चूर्णीयाँ आज प्राप्त हैं--एक स्थविर अगस्यसिंहप्रणीत और दूसरी जो आगमोद्धारक श्रीसागरानन्दसूरि महागजने रतलामकी श्रीऋषभदेवजी केशरीमलजी जैन श्वेताम्बर संस्थाकी ओरसे सम्पादित की है, जिसके कत्ताके नामका पता नहीं मीला है और जिसके अनेक उद्धरण याकिनीमहत्तरापुत्र आचार्य श्रीहरिभद्रसूरिने अपनी दशवैकालिकसूत्रकी शिष्यहितावृत्तिमें स्थान स्थान पर वृद्धविवरणके नामसे दिये हैं। इन दो चूर्गियोंमेंस आवश्यकचूर्णिकारको कौनसी चूर्णि अभिप्रेत है ?, यह एक कठिनसी समस्या है। फिर भी आवश्यकचूर्णीके उपर उल्लिखित उद्धरणको गौरसे देखनेसे अपन निर्णयके समीप पहुंच सकते हैं। इस उद्धरणमें "चाउलोदणंतं" यह पाठ गलत हो गया है । वास्तवमें "चाउलोदणंतं" के स्थानमें मूलपाठ "चालणेदाणंत" ऐसा पाठ होगा । परन्तु मूलस्थानको विना देखे ऐसे पाठोंके मूल आशयका पता न चन्ने पर केवल शाब्दिक शुद्धि करके संख्याबन्ध पाठोंको विद्वानोंने गलत बनाने के संख्यावन्ध उदाहरण मेरे सामने हैं। दशवैकालिकसूत्रकी प्राप्त दोनों चूर्णियोंको मैंने बराबर देखी है, किन्तु "चाउलोदणंत"का कोई उल्लेख उनमें नहीं पाया है और इसका कोई सार्थक सम्बन्ध भी नहीं है। दशवैकालिकसूत्रकी अगत्यसिंहीया चूर्णिमें तपके निरूपणकी समाप्ति के बाद "चालणेदाणि" [पत्र १९] ऐसा चूर्णिकारने लिखा है, जिसको आवश्यकचूर्णिकारने "चालणेदाणंतं" वाक्यद्वारा सूचित किया है । इस पाठको बादके विद्वानोंने मूल स्थानस्थित पाठको विना देखे गलत शाब्दिक सुधारा कर बिगाड दिसा-रेसा निश्चित रूपसे प्रतीत होता है। अतः मैं इस निर्णय पर आया हूं कि-आवश्यकचूर्णिकारनिर्दिष्ट दशवैकालिकचूणि अगस्त्यसिंहीया चूर्णी ही है। और इसी कारण अगस्यसिंहीया चूर्णी आवश्यकचूर्णिके पूर्वको रचना है। आचार्य श्रीहारेभद्रसूरिने अपनी शिष्यहितावृत्तिमें इस वृणीका खास तौरसे निर्देश नहीं किया है। सिर्फ रइवका = सं० रतिवाक्या नामक दशवकालिकसूत्रकी प्रथम चूलिकाकी व्याख्या में पित्र २७३-२] "अन्ये तु व्याचक्षते" ऐसा निर्देश करके अगस्यसिंहीथा चूर्णीका मतान्तर दिया है । इसके सिवा कहीं पर भी इस चर्णिके नामका उल्लेख नहीं किया है। • इस अगस्यसिंहीया चर्णिमें तत्कालवर्ती संख्याबन्ध वाचनान्तर-पाठभेद, अर्थभेद एवं सूत्रपाठोंकी कमी-वेशीका काफी निर्देश है, जो अतिमहत्त्वके हैं। यहाँ पर ध्यान देने जैसी एक बात यह है कि-दोनों चर्णिकारोंने अपनी चणीमें दशवकालिकसूत्र उपर एक प्राचीन चर्णी या वृत्तिका समान रूपसे उल्लेख रइवकाचलिका की च में किया है । जो इस प्रकार है"एत्थ इमातो वृत्तिगतातो पदुद्देसमेत्तगाधाओ । जहा दुक्खं च दुस्समाए जीविउं जे१ लहुसगा पुणो कामा २ । सातिबहुला मणुस्सा ३ अचिरडाणं चिमं दुक्खं ४ ॥ १॥ ओमजणम्मि य खिसा ५ वंतं च पुणो निस वियं भवति ६ । अहरोवसंपया वि य ७ दुलभो धम्मो गिहे गिहिणो ८ ॥२॥ निवयंति परिकिलेसा ९ बंधो ११ सावजजोग गिहिवासो १३ । एते तिणि वि दोसा न होति अणगारवासम्मि १०-१२-१४ ॥ ३॥ साधारणा य भोगा १५ पत्तेयं पुण्ण-पावफलमेव १६ । नीयमवि माणवाणं कुसग्गजलचंचलमणिचं १७ ॥४॥ Jain Education Intemational Page #28 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ११ णत्थि य अवेदयित्ता मोक्खो कम्मरस निच्छओ एसो १८ । पदमदारसमेतं वीरवयणसासणे भणितं ।। ५।।" अगस्त्यसिंहीया चूर्ती दूसरी मुद्रित चूर्णीमें [पत्र ३५८] "एल्थ इमाओ वृत्तिगाधामो। उक्तं च" ऐसा लिखकर उपर दी हुई गाथायें उद्धृत कर दी हैं। इन उल्लेखोंसे यह निर्विवाद है कि-दशवकालिकसूत्र के उग, इन दो चूमियोंसे पूर्ववती एक प्राचीन चूर्णी भी थी, जिसका दोनों चूर्णीकारोंने वृत्ति नामसे उल्लेख किया है। इससे यह भी कहा जा सकता है कि-आगमांक उपर पद्य और गद्यमें व्याख्याग्रन्थ लिखनेकी प्रणालि अधिक पुगणी है। और इससे हिमवंतस्थविरावलीमें उल्लिखित निम्न उल्लेख सत्यके समीप पहुंचता है "तेषामार्यसिंहानां स्थविराणां मधुमित्रा-ऽऽयस्कन्दिलाचार्थनामानौ द्वौ शिष्यावभूताम् । आर्यमधुमित्राणां शिष्या आर्यगन्धहस्तिनोऽतीवविद्वांसः प्रभावकाश्चाभवन् । तैश्च पूर्वधरस्थविरोत्तंसोमास्वातिवाचकरचिततत्त्वार्थोपरि अशीतिसहस्रश्लोकप्रमाणं महाभाष्यं रचितम् । एकादशाङ्गोपरि चाऽऽयस्कन्दिलस्थविराणामुपरोधतस्तैर्विचरणानि रचितानि । यदुक्तं तद्रविताऽऽचाराङ्गविवरणान्ते यथा थेरस्स महमित्तस्स सेहेहिं तिपुवनागजुलेहिं । मुणिगणविवंदिहिं ववगयरायाइदोसेहिं ॥ १ ॥ वंभदीवियसाहामउडेहिं गंधहत्थिविबुहेहिं । विवरणमेयं रइयं दोसयवासेसु विक्रमओ ।। २ ।। आचाराङ्गैमूत्रके इस गन्धहस्तिविवरणका उल्लेख आचार्य श्रीशीलाइने अपनी आचारावृत्तिके उपोद्घालमें भी किया है । कुछ भी हो, जैन आगमोंके उपर व्याख्या लिम्वनेकी प्रणाली अधिक प्राचीन है। ४. उत्तराव्यनमूत्रचूर्णिके प्रणेता कौटिकगणीय, वत्रशाखीय एवं वाणिजकुलीय स्थविर गोपालिक महत्तरके शिष्य थे । इस चूर्णिकारने चूर्णिमें अपने नामका निर्देश नहीं किया है। इनका निश्चित समयका पता लगाना मुश्किल है । तथापि इस चूर्णिमें विशेषावश्यकभाष्यकी स्वोपज्ञ टीकाका सन्दर्भ उल्लिखित होनेके कारण इसकी रचना जिनभद्रगणि क्षमाश्रमणके स्वर्गवासके बादकी है। विशे मावस्यक भाष्य की स्वोपज्ञ टीका, यह जिनभद्रगणि क्षमाश्रमणको अन्तिम रचना है । छद्वे गणधरवाद तक इस टीकाका निर्माण होने पर आपका देहान्त हो जानेके कारण बादके समग्र ग्रंथकी टीकाको श्रीकाहार्यवादी गणी महत्ताने पूर्ण की है। ५. जीतसल्पहचीके प्रणेता श्रीसिद्धसेनगगी हैं। इस वृर्णिके अन्त में आपने सिर्फ अपने नामके अतिरिक्त और कोई उल्लेख नहीं किया है। श्रीजिनभद्रगणि दामाश्रमणकृत ग्रन्थके उपर यह चूणी हानेके कारण इसकी रचना श्रीजिनभद्रगणिके बादकी स्वयंसिद्ध है। इस चूर्णिको टिप्पनककार श्रीश्रीचन्द्रमूरिने चीना से दरशाई है-- नवा श्रीमन्महावीरं परोपकृति हेतवे । जीवकल्प व्याख्या काचित् प्रकाश्यते ॥ १॥ उपरनिर्दिष्ट सान चूगीयोंके अतिरिक्त ने चीयोंके रचपिकानापका पता नहीं मिलता है । तथापि इन चीयों के अवलोकनसे जो हकीकत ध्यानमें आई है इसका यहाँ उनीख कर देता हूं। __ यद्यपि आचाराङ्गचूी और मूत्र कृताङ्गचूगीक रचयिताके नाम का पा नहीं मिला है तो भी आचाराम चूर्णीमें वृर्णिकारने पंद्रह स्थान पर नागार्जुनीय वाचनाका उख किया है, उनसे सात स्थान पर "नांतनागज्जुणिया" इस प्रकार बहुमानदर्शक 'भदन्त'शब्दका प्रयोग किया है, इससे अनुमान होता है कि ये चूर्णिकार नागार्जुनसन्तानीय कोई स्थविर होने चाहिए । सूत्रकृताङ्गचू में जहां जहां नागार्जुगो व वाचनाका उडख मूर्णिकारने किया है वहां सामान्यतया Jain Education Intemational Page #29 -------------------------------------------------------------------------- ________________ नागज्जुणिया इतना ही लिखा है । अतः ये दोनों चूर्णिकार अलग अलग ज्ञात होते हैं। सूत्रकृताङ्ग पूर्णीमें जिनभद्रगगीके विशेषावश्यकभाष्यकी गाथायें एवं स्वोपज्ञ टीकाके सन्दर्भ अनेक स्थान पर उद्धृत किये गये हैं, इससे इस चूर्णिकी रचना श्रीजिनभद्रगणिके बादकी है; तब आचाराङ्गचूर्णीमें जिनभद्रगणिके कोई ग्रन्थका उल्लेख नहीं हैं, इस कारण इस चूर्णीकी रचना श्रीजिनभद्रगणिके पूर्वकी होनेका सम्भव अधिक है। भगवतीसूत्रचूर्णिमें श्रीजिनभद्रगणीक विशेषणवतीग्रन्थकी गाथाओंके उद्धरण होनेसे, और कल्पचूर्णीमें साक्षात् विसेसावस्सगभासका नाम उल्लिखित होनेसे इन दोनों चूर्णियोंकी रचना निश्चित रूपसे श्रीनिनभद्रगगीके बादकी है। दशासूत्रचूर्णीमें केवलज्ञान-केवलदर्शनविषयक युगपदुपयोगादिवादका निर्देश होनेसे यह चूर्णी भी श्रीजिनभद्रगगीके बादकी है। आवश्यकचूर्णिके प्रणेताका नाम चूर्णीकी कोई प्रतिमें प्राप्त नहीं है । श्रीसागरानन्दसूरि महाराजने अपने सम्पादनमें इसको जिनदासगणिमहत्तरकृत बतलाई है। प्रतीत होता है कि-आपका यह निर्देश श्रीधर्मसागरोपाध्यायकृत तपागच्छीय पट्टावलीके उल्लेखको देख कर है, किन्तु वास्तवमें यह सत्य नहीं है। अगर इसके प्रणेता जिनदासगणि होते तो आप इस प्रासादभूत महती वृमि नभद्र गणिके नामका या विशेषावश्यकभाष्यकी गाथाओंका जरूर उल्लेख करते । मुझे तो यही प्रतीत होता है कि-इस चूर्णाकी रचना जिनभद्रगणिके पूर्वकी और नन्दीसूत्ररचनाके बादकी है । दशवकालिक (पद्धविवरण)में और व्यवहारचूर्णीमें श्रीजिनभद्रगणिकी कोई कृतिका उद्धरण नहीं है, अतः ये चूर्णीयाँ भी जिनभद्रगणि क्षमाश्रमणके पूर्वी होनी चाहिए । जम्बूद्वीपकरणचूर्णी, यह जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिकी चूर्णी मानी जाती है, किन्तु वास्तवमें यह जम्बूद्वीपके परिधि-जीवाधनुःपृष्ठ आदि आठ प्रकारके गणितको स्पष्ट करनेवाले किसी प्रकरणकी चूर्णी है। वर्तमान इस चूर्णीमें मूल प्रकरणकी गाथाओंके प्रतिक मात्र चूर्णिकारने दिये हैं, अतः कुछ गाथाओंका पता जिनभद्रीय वृहत्क्षेत्रसमासप्रकरणसे लगा है, किन्तु कितनीक गाथाओंका पता नहीं चला है। इस चूर्णीमें जिनभद्रीय बृहत् क्षेत्रसमासकी गाथायें भी उद्धृत्त नजर आती हैं, अतः यह चूर्णी उनके बादकी है। यहां पर चूर्णियोंके विविध उल्लेखोंको लस्यमें रख कर चूर्णिकारोके विषयमें जो कुछ निवेदन करनेका था, वह करनेके बाद अंतमें यह लिखना प्राप्त है कि-प्रकाश्यमान इस नन्दीमत्रचूर्णीके प्रणेता श्रीजिनदासगणि महत्तर हैं. जिसका रचनासमय स्पष्टतया प्राप्त नहीं है, फिर भी आज नन्दीसूत्रचूर्णोकी जो प्रतियाँ प्राप्त हैं उनके अन्तमें संवतका उल्लेख नजर आता है, जो चूर्णीरचनाका संवत् होनेकी संभावना अधिक है । यह उल्लेख इस प्रकार है शकरज्ञः पञ्चसु वर्षशतेषु व्यतिक्रान्तेषु अष्टनवतेषु नन्द्यध्ययनचूर्णी समाप्ता इति । अर्थात् शाके ५९८ (वि. सं. ७३३) वर्षमें नन्यध्ययनचूर्णी समाप्त हुई। इस उल्लेखको कितनेक विद्वान् प्रतिका लेखनसमय मानते हैं, किन्तु यह उल्लेख नन्द्यध्ययनचूर्णिकी समाप्तिका अर्थात् रचनासमाप्तिका ही निर्देश करता है, लेखनकालका नहीं। अगर प्रतिका लेखनकाल होता तो 'समाप्ता' ऐसा न लिख कर 'लिखिता' ऐसा ही लिखा होता । इस प्रकार गद्यसन्दर्भमें रचनासंवत् लिखनेकी प्रथा प्राचीन युगमें थी ही, जिसका उदाहरण आचार्य श्रीशीलाङ्ककी आचाराङ्गवृत्तिमें प्राप्त है। १. "श्रीवीरात् १०५५ वि• ५८५ वर्षे याकिनीसूनुः श्रीहरिभद्रसूरिः स्वर्गभाक् । निशीथ-वृहत्कम्पभाष्या-ऽऽवश्यकादिचूर्णिकाराः श्रीजिनदासमहत्तरादयः पूर्वगतभुतघरश्रीप्रद्युम्नक्षमणादिशिभ्यत्वेन श्रीहरिभद्रसूरितः प्राचीना पव यथाकालभाविनो बोध्याः। १११५ श्रीजिनभद्रगणियुगप्रधानः । अयं च जिनभद्रीयध्यानशतककाराद् भिन्नः सम्भाव्यते।' इपियन एण्टीक्वेरी पु. ११. पृ॰ २५३ ॥ Jain Education Intemational Jain Education Intermational Page #30 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सूत्र और जूणिकी भाषा नन्दीमूत्र और इसकी चूर्णिकी भाषा का स्वरूप क्या है ? इस विषयमें अभी यहाँ पर अधिक कुछ मैं नहीं लिखता हूं। सामान्यतया व्यापकरूपसे मेरेको इस विषयमें जो कुछ कहना था, यह मैंने अखिलभारतीयप्राच्यविद्यापरिषत्-श्रीनगरके लिये तैयार किये हुए मेरे "जैन आगमधर और प्राकृत वाङ्मय" नामक निबन्धमें कह दिया है, जो ' श्रीहजारीमल स्मृतिग्रन्थ 'में प्रसिद्ध किया गया है, उसको देखनकी विद्वानोंको सूचना है। परिशिष्टादि चूर्णिके अन्त में पांच परिशिष्ट और शुद्धिपत्र दिये गये हैं। पहले परिशिष्टमें मूल नन्दीसूत्र में जो गाथायें हैं उनको अकारादिक्रममें दी गई हैं। दूसरे परिशियमें नन्दीचूर्णिमें चूर्णिकारने उद्धन किये उद्धरणोंको अकारादिक्रमसे दिये हैं। तीसरा परिशिष्ट चूर्णिगत पाठान्तर और मतान्तरोका है। चौथे परिशिष्टमें नन्दीसूत्र और चूर्णिमें आनेवाले ग्रन्थ, ग्रन्थकार, स्थविर, नृप, श्रेष्ठी, नगर, पर्वत आदि विशेषनामांका अनुक्रम है। पांचवे परिशिष्टमें सूत्र और चूर्णिमें आनेवाले विषयद्योतक एवं व्युत्पत्तिद्योतक शब्दोंका अनुक्रम दिया गया है। इन परिशिष्टोंके बादमें शुद्धिपत्रक दिया गया है । वाचक और अध्येता विद्वानोंसे नम्र निवेदन हैं कि इस ग्रन्थको शुद्धिपत्रके अनुसार शुद्ध करके पढ़ें । संशोधन और सम्पादन इस ग्रन्थके संशोधनमें अनेक महानुभाव विद्वान् व्यक्तियोंका परिश्रम है। खास तोरसे पं. भाई अमृतलाल मोहनलाल भोजकका इस सम्पादनमें महत्त्वका साहाय्य है। जिसने चूर्णि और मूल सूत्रकी प्रामाणिक प्राण्डुलिपि (प्रेसकॉपी) तैयार की है, साधन्त प्रपत्र देखे हैं और इस ग्रन्थके महत्त्वपूर्ण परिशिष्ट भी किये हैं। भाई श्री दलसुखभाई माल वणिया-मुख्यनियामक ला. द. भारतीय संस्कृतिविद्यामंदिर-अहमदाबाद तथा पंडित बेचरदासभाई दोसीने मुद्रणके बादमें साद्यन्त देखकर अशुद्धियोंका परिमार्जन किया है, जिसके फलस्वरूप शुद्धिपत्र दिया है। भाई श्रीदलसुख मालवणिया का आगगोंके संशोधनमें शाश्वत साहाय्य प्राप्त है, यह परम सौभाग्यकी बात है। वसंत प्रिन्टींग प्रेसके संचालक श्री जयंति दलाल और मेनेजर श्री शांतिलाल शाह प्रमुख प्रेसके सर्व भाईओं का प्रस्तुत मुद्रणकार्यमें आंतरिक सहयोग भी हमारे लिए चिरस्मरणीय है। चूर्णिमाहित नन्दीसूत्रके संशोधनमें मात्र ग्रन्थकी प्रतियोंका ही आधार रखा गया है, एसा नहीं है, किन्तु मूलमूत्र एवं चूर्णिके उद्धरण प्राचीन व्याख्याप्रन्थों में जहाँ जहाँ भी देखने में आये उनसे भी तुलना की गई है। इस प्रकार प्राचीन प्रतियाँ, प्राचीन उद्धरणों के साथ तुलना एवं अनेक विद्वानोंके बौद्धिक परिश्रमके द्वारा इस नन्दीसूत्र एवं चर्णि संशोधन और सम्पादन किया गया है। मैं तो सिर्फ इस संशोधन एवं सम्पादनमें साक्षीभूत ही रहा हूं। अतः इस ग्रन्थके महत्त्वपूर्ण संशोधन एवं सम्पादन का यश हम सभीको एकसमान है। अन्तमें गीतार्थ मुनिप्रवर एवं विद्वानोंसे मेरी नम्र प्रार्थना है कि मेरे इस संशोधनमें जो भी छोटी मोटी क्षति प्रतीत हो, इसकी मुझे सूचना दी जायगी तो जरूर अतिरिक्त शुद्धिपत्रकी तोग्से उसको आदर दिया जायगा । सं. २०२२ माघ शुक्ल पूर्णिमा अहमदाबाद मुनि पुण्यविजय Jain Education Intemational Page #31 -------------------------------------------------------------------------- ________________ चूर्णियुक्त नन्दीसूत्रका विषयानुक्रम १५ ७-१२ विषय चूर्णिकारका उपक्रम-प्रारम्भ गाथा १३ मङ्गलसत्र-गाथा २-३ महावीरपरमात्माकी स्तुति गाया ४-१७ सङ्घस्तुतिसूत्र-श्रीसंघकी रथ, चक्र, नगर, पद्म, चन्द्र, सूर्य, समुद्र और मन्दरगिरिके रूपकों द्वारा स्तुति गाथा १८-१९ जिनावलीसूत्र- चोवीस जिनोंको नमस्कार गाथा २०-२१ गणधरावलीसूत्रभगवान् महावीरके ११ गणधरोंकी स्तुति गाथा २२-४२ स्थविगवलीसूत्रश्रुतस्थविरोंकी स्तुति गा. २२ सुधर्मा, जम्बूस्वामि, प्रभवस्वामि, शय्यम्भव, गा. २३ यशोभद्र, सम्भूताय, भद्रबाहु, स्थूलभद्र, गा. २४ महागिरि, सुहस्ती, बहुल, गा. २५ स्वाति, श्यामार्य, शाण्डिल्य, जीवधर, गा. २६ आर्यसमुद्र, गा. २७ आयमङ्गु, गा. २८ आर्यनन्दिल, गा. २९ वाचक आर्यनागहस्ती, गा. ३० रेवतिनक्षत्र वाचक, गा. ३१ सिंहवाचक, गा. ३२ स्क्रन्दिलाचाय, गा. ३३ हिमवन्त गा. ३४-३५ नागाजुन वाचक, गा. ३६-३८ भूतदिनाचाय, गा. ३९ लौहित्य, ४०-४१ दुष्यगणि, गा. ४२ सामान्यरूपसे सर्व स्थविरों की स्तुति गा. ४३ पर्षत्सूत्र-ज्ञानके-शास्त्रके अधिकारि-अनधिकारी शिष्यों की परीक्षा लिये शलघन, कुट, चालनी, परिपूगक, हंस आदिके लाक्षणिक उदाहरण और ज्ञपर्यद् अज्ञपर्षद् एवं दुर्विदग्धपर्पत् १२ शानसूत्र- पांच ज्ञानके नाम मत्यादि पांच ज्ञानकी व्युत्पत्ति, कम आदिका निरूपण मत्यादिज्ञानोंका प्रत्यक्ष परोक्ष रूपमें विभाजन १४ विषय प्रत्यक्षज्ञनके इन्द्रिय प्रत्यक्ष मोइन्द्रिय प्रत्यक्ष दो मेद इन्द्रियप्रत्यक्षके पांच भेद नोइन्द्रियप्रत्यक्षके तीन भेद अवधिप्रत्यक्षके दो भेद-क्षायोपशमिक और भवप्रत्ययिक क्षायोपशमिक तथा गुणप्रत्ययिक अवधिज्ञानका स्वरूप अवधिज्ञानके आनुगामिकादि छ भेद १५-२१ १ ग्रामिक अवधिज्ञानका स्वरूप, उसके न और मध्यगत भेद तथा पुरतो अन्तगत, मागतो अन्तगत, पाश्वतो : अन्तगतादि प्रभेदों का स्वरूप,उन में प्रतिविशेष आदिका निरूपण २ अनानुगामिक अवधिज्ञान ३ वधमानक अवधिज्ञान, गाथा ४४-४५ अवधिज्ञानका जघन्य और उत्कृष्ट अवधिक्षेत्र. गा. ४६-४९ द्रव्य-क्षेत्र-काल-भानकी अपेक्षासे अवधिज्ञानकी वृद्धिका स्वरूप गा ५० द्रव्य-क्षेत्र काल-भावका पारस्परिक वृद्धिका स्वरूप गा. ५१ क्षेत्र-कालकी सूक्ष्मताका निरूपण ४ हीयमान अवधिज्ञान ५ प्रतिपाति अवधिज्ञान ६ अप्रतिपाति आधिज्ञान द्रव्य क्षेत्र काल भाव आश्री अवधिज्ञानका स्वरूप गा. ५२ अवधिज्ञानका उपसंहार मनःपयवज्ञानका अधिकारी मनःपयवज्ञानके ऋजुमत विपुलमति दो भेद ३१-३२ द्रव्य क्षेत्र काल भाव आश्री ऋजुमति विपुलमतिमनःपर्यवज्ञानका स्वरूप और गा. ५३ मनःपयवज्ञानका उपसंहार चूर्णिमें- अष्ट रुचकप्रदेश और उपरिम-अधस्तन क्षुल्लकप्रतरका स्वरूप १७-१८ १९ Jain Education Intemational Jain Education Intermational Page #32 -------------------------------------------------------------------------- ________________ चणियुक्त नन्दीसूत्रका विषयानुकम सूत्र २५ विषय केरल ज्ञान के भवस्थ और मिकेवलज्ञान दो भेट ३४-३६ भवस्थकेवलज्ञानके भेद और स्वरूप सिद्धके लज्ञान के अनन्तरसिद्ध परम्पर सिद्ध दो भेद अननरसिद्धके तीर्थसिद्ध, अतीर्थमिद्ध आदि पंद्रह भेद चूणिमें-पद्रह भे में का विस्तृत स्वरूप परम्परांसद्ध विज्ञान द्रव्य क्षेत्र काल भाव आश्री कंवलज्ञानका २६ ३ २८ चूर्णिमें केवलज्ञान-कैवलदानविषयक युगपदुपयोग-एकोपयोग-कमोपयोगवादी चर्ना २८-३० गा ५४-५५ केवयज्ञानका उपसंहार ३० परोक्षज्ञानके आभिनिबंधिक श्रुतज्ञान द भेद ३१ आभि नोधिकज्ञान और श्रुतज्ञानकी देव सहभाविता चूणिमें -मतिज्ञान और श्रुतज्ञानका पृथकरण मतिज्ञान और मतिअज्ञान तथा श्रुतज्ञान और श्रुतअज्ञानका तात्त्विक विवेक ३२ आभिनिवाधिक ज्ञानके श्रुतनिश्रित अश्रुतनिश्रित दो मेद अश्रुतनिश्रित आभिनिवाधिकज्ञानके भेद, स्वरूप और उहाहरण गा. ५६ अश्रुतनिश्रित आभिनियोधिकके औत्पत्तिकी आदि चार भेद गा. ५७-६. औत्पत्तिको मतिका स्वरूप और उदाहरण गा. ६१-६३ वनयिकी मतिका स्वरूप और उदाहरण, गा.६४-६५ कमजा मतिका स्वरूप और उदाहरण, गा. ६६-६९ पारिणामिक मतिका स्वरूप और उदाहरण ध्रुनिश्रित मतिज्ञान के अपग्रह, ईहा आदि चार भेद अवग्रह के अर्थावग्रह व्यजनावग्रह दो भेद ३४ न्यञ्जनावग्रहके मेद और स्वरूप भर्थावग्रहके मेद और एकाथिक शब्द ईहाके मेद और एकाधिक शब्द विषय ५२ आयके भेद और एकाथिक शब्द ३५ धारणाके मेद और एकाथिक शब्द ५४ ५६ २८ प्रकार के मतिज्ञानका और व्यअनाव ग्रह का प्रतिव'धक और मालक दृष्टान्त द्वारा रूपनिरूपण द्रव्यक्षेत्र काल भाव आश्री आभिनियोधिक सानका स्वरूप ४२ गा. ७०-७५ आभिनिवोधिक ज्ञानके भेद, अर्थ, कालमान, शब्दश्रवणका स्वरूप, एकाथिक शब्द और एसंहार श्रुतः नके चौदह भेद ६०-६३ १ अमरचक संज्ञाक्षर, व्य जनाक्षर और लध्यक्षर, तीन भेद और स्वरूप ६४ २ गा. ७६ अनक्षरध्रुत ६५-६८ ३ संजिथुनके कालिक्युपदेश, हेनूपदेश और दृष्टिवादोपदेश तीन प्रकार, स्वरूप और ४ असंज्ञिश्रुत ४५-४७ चूर्णिमें -ईहा, अपोह, मागणा, गवेषणा, चिन्ता, विमर्श इन शब्दोंके अर्थका स्पष्टीकरण ५ सम्यक्श्रुत-द्वादशाङ्गी के नाम ६ मिथ्याश्रुत-भारत, रामायण हेभी मासुरुपख आदि प्राचीन अनेक जैनेतर शास्त्रोंके नाम और सम्यक्श्रुत-मिथ्याश्रुतका तारिक विवेक ४९-५० ७१-७३ ७-८ यादि-अनादि ९-१० सपर्यवसित अपयवसित श्रुतज्ञान, और उनका द्रव्य क्षेत्र काल भाव आश्री स्वरूप ५१ ७४-७५ पर्यवाग्राक्षरका निरूपण और अतिगाढ कर्मावृत दशामें भी जीवको अक्षर के अनन्तमें भाग जितने ज्ञानका शाश्वतिक सद्भाव ५२ चूर्णिमें- अक्षरपटल का विस्तृत निरूपण ५२-५६ . ११-१२ गमिक अगमिक श्रुतज्ञान १३-१४ अङ्गप्रविष्ट और अङ्गबाह्यश्रुत ५६ अङ्ग बाह्यश्रुतके आवश्यक और आवश्यकव्यतिरिक्त दो प्रकार आवश्यकश्रुत आवश्यकश्रुतके कालिक और उत्कालिक दो प्रकार Jain Education Intemational Page #33 -------------------------------------------------------------------------- ________________ चूर्णियुक्त नन्दीसूत्रका विषयानुक्रम पृष्ठ ५८ विषय उत्कालिकश्रुत के २९ नाम चूर्णिमें- २९ उत्कालिकQतके नामोंका व्युत्पत्त्यर्थविवरण कालिकश्रुतके २९ नाम चूर्णिमें-कालिक ध्रुतके नामोंका व्युत्पत्यर्थविवरण । टिप्पणी में नामोंकी कमीबेशीका निर्देश आवश्यकव्यतिरिक्तश्रुतका उपसंहार अङ्गप्रविष्टश्रुतके १२ नाम १ आचारागसूत्रका स्वरूप २ सूत्रकृताङ्गसूत्रका स्वरूप ३ स्थानाङ्गसूत्रका स्वरूप ४ समवायाङ्गसूत्रका स्वरूप ५ विवाहप्रज्ञप्तिअङ्गसूत्रका स्वरूप ६ ज्ञाताधर्मकथाङ्गसूत्रका स्वरूप ७ उपासकदशाङ्गसूत्रका स्वरूप ८ अन्तकृद्दशाङ्गसूत्रका स्वरूप ९३ ९ अनुत्तरौपपातिकदशाङ्गसूत्रका स्वरूप ९४ १० प्रश्नव्याकरणदशाङ्गसूत्रका स्वरूप ११ विपाकसूत्रके दुःखविपाक सुखविपाक दो प्रकार, उनका वर्णन और स्वरूप ९६ १२ दृष्टिवाद अंगके पांच भेद . ९७-१०५ परिकर्मदृष्टिवादके सात प्रकार और इनके भेद १.६ सूत्ररष्टिवादके २२ प्रकार १०७ पूर्वगतदृष्टिवाद-चौदह पूर्व सूत्र विषय १.८-१० अनुयोगदृष्टिवादके मूलप्रथमानुयोग और गंडिकानुयोग दो प्रकार तथा इनका स्वरूप ७६ चूर्णिमें सिद्धगण्डिकाका वर्णन १११ चूलिका दृष्टिवाद ११२-१३ दृष्टिवादका परिमाण और विषय ११४ द्वादशाङ्गीके विराधकोंको हानि ११५ द्वादशाङ्गीके आराधों को लाभ ११६ द्वादशाङ्गीकी शाश्वतिकता ११. द्रव्य क्षेत्र काल भाव आश्री श्रुतज्ञान का स्वरूप ८२ ११८ गा. ८१ श्रुतज्ञानके चौदहभेद, गा. ८२ श्रुतज्ञानका लाभ, गा. ८३ बुद्धिके आठ गुण, गा. ८५ सूत्रार्थश्रवणविधि, गा. ८५ सूत्रव्याख्यानविधि और उपसंहार-मन्दीसूत्रकी समाप्ति प्रथम परिशिष्ट- नन्दीसूत्रगत गाथाओंका अकारादिक्रम द्वितीय परिशिष्ट- नन्दीचूर्णिगत उद्धरणोंका अकारादिक्रम तृतीय परिशिष्ट- नन्दीचूर्णीगत पाठान्तर और मतान्तरोंका निर्देश ८८ चतुर्थ परिशिष्ट-नन्दीसूत्र और चूर्णिगत . प्रन्थ, ग्रन्थकार, स्थविर, नृप, श्रेष्ठी, नगर आदि के विशेषनामोंका अकारादिक्रम पञ्चम परिशिष्ट- नन्दीसूत्र और चूर्णिगत विषयविभाग और व्युत्पत्तिदर्शक शब्दोंका अकारादिक्रम ६८ ७. Jain Education Intemational Page #34 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Jain Education Intemational waनमायामसुतरवंधनादाणमंगला शिक्षादिविलाणंदणदानंदविवाणएमियानंदायमोजदादापिसोक्याधीवरमाया विधोगितावामय साबमाडवाणासावालालमायणखोगददाताणगाविद्यमीरवतिरियारमाधिपासमानामाकंदामलामाकविकासाप्ताकाटनानिलिमादमी संवायवारमayeमाणधिमारनामविलासयममधिनियमावस्यामणमधर्मपन्नातवमबखतारनेविशवसमणमा ममंगलपातिशतसमयमंगलाणावसयमारोवाणियासयोगारखपायाप्रचियताणमयमयगादरियणवेमधेशवालियंकानावासकायविध उनमायकाबानिधकरणमावासोसायरायधिवगायपहमापनमोकारकास्वानविनयविमाशासात दियाविधिमयकमायारीमदोवमसक्यानिकाय मावापरणवादिणायनानसवाइयतिनितमतिरामगतिविनावापानलीवानसिंताजीनामविनयनिमीतमंदादियाउनरसीलरकविणाविविदUHURRE परमिंतागामाणाविद्याप नवाजादिकामदिंदापशेणीपवनामानिनिविमिहिोताणपाविद्यायामामृदयानिमगादानाधमाधम्यागासायोगालूमदणाम निमबीरयाणामालविकावाहीबागविहारणोऊदायर्डपमावि विश्वविद्यालयामकाणातिनिधियाणगापमाननबनेमाकवलाममाविस नाईसदवाझाहविविवाक्सिबानायसवावगविसवमसिलोमाविसन ग मानवाबगरमा जवानाधा निशामायामिवियरुश्वाचावाधावरियमण्यम दवानरायपरिमायधम्मामरकाशालाबाजaaमकथयभितएछसमानानवधायशयकारिवाधिभिाऊगासनानागवारपदबारी नगाणादाझज्याता मनापानवायायामकारणानासायासणिवासोमsanimयावयबापरिपत्रमाणनद्यावयंचत्रिविसेसानाममधमाकयानादका तात्राशिसमानामवमन्नाशिवाननववाननादिवायादवाकवविविलयनिकगासनामामागिरिनविद्यमाणस्कशनातगणाधाकदंश्यामापादयणकापक्षिाकातकाः वासमायधिस्काताजगपणादोनयनित्रानतरवान नमधमाशालामगादतादेसिवानवनितिगर्दीविगामासिवाकव्यातजामणगायरसावात्रावतापविलापरिनयति मोबानगवास विपरीसरदोवसमादियाविद्यमाणाविमानसत्रायश्यियानागाविसमवेऽनिािमानहायाननवाननमभ्साबसमधनदिसिनासवान नामदोaिilsinaपितामहोसायगावमसन्माणपितामोकामासनमाणहिमादिनाकामाधामादितारकाणनातांमागवयमपिता एवंदमानमत्राणामपिता मदोसवतियाननक्वाननधामावादिधरिमानानपिनाकापटवरडमनिवसतासमानियासतविरमायधमालगवायाणी नाकामानामावास्यानण एवश्वनाविसअमनामबाणाकामनामसायसंधारणाकियामनिलालपविणवामदादिणाणंचारिमयानिमचनणापकाउरकेश्करणसविकासमविपदमा नाएयापागातएवास्ववaamavणायकानपरिताडीवाइविधांबासमवधायनवेतिविनिमयागमवावणानानिधिग्रामवासनावण कयामागामानादिकालनानिधनावप्रतिउधकमावविवस्त्यादिमकालयनिकतावकमाविकालतावत्रणानविवादलमनाविद्यावाविवाभवतणावावर जीवाशिमवण्नतियुननियाजधालामावतण्यात्रिकायधिवरियाणवाश्वमामयंजाबनवेनातिसमयावलिमाकानीविनाविशिवकालमामयतणावधिवावाय शादिखतरकायनाशिकयोमक्षयमांगासिंधुश्वादिधमिरापोडरमजदमचालायलणावावावायवमायामवायएमावास्यास्यसमश्यताम्रध्यानपावामा सुषमाणयावहितंडावापादिवाकयनलानाववसदादिविद्यमाणानकासामावताविनाशवाणदिमाययावीदक्षा शववालमंगलवा विएफविवाकिमाणामधेनवाचावहिायनियमाचादियामानवियामबंद्योपानदेवानामावविदिहावणधाशन अमंगमावनिएकाविशवसामाधारका मानिसधाखामावगविक्यानबञ्चालसंगम विदयारायणदायगाणाकवलासपासवानावालया। रामदादिमापनियामानिधिराधोधनेगानामहाअदिवाशिमामा मालपासणवायलागारमोनियमवादिनसको तनिष्णविराष्ट्राधारानाचणासखाणीवमबदवाणापासणवास म ध्यामायनमसामनिविलसाजासाशिवहोमवार अयारादियामध्यमवयीनमाम्यवमासिकामया अभिमभावहाशिवाशिकरणाजयूमयमाघालायरिपक्षीमहामायण दीवभिशागमायामानयिमवासनमा मनाचगावलगाड़ममाणायमणवायविरियाविशदवाविवरयानमा समहिनामिविरकमाऊटकाहेश्यसमिधाणका नन्दिसूत्रचूर्णिकी श्री हेमचन्द्राचार्य जैन ज्ञानमन्दिर (पाटन) की प्रतिके प्रथम पत्र की द्वितीय पृष्ठि और अंतिम पत्र की प्रथम पृष्ठि । Page #35 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Jain Education Intemational प्राकृतग्रन्थपरिषद ग्रन्थाङ्क ९ पणानाम्याचारामष्टिगाजायजगजीवाजामवियाणानजायजगणदाज नदीसूत्र मतादाजगबंधुजयश्जापियामाहालयवाजयश्यागयतावातिबयाणपहिमा अयशबाइयालजयवादमामव्हावाराससबजयाबायासतद्देत्रिणमाया स्मातराखरतसियालद्द। अयस्यानमाणवायरयासरि टादमा विखहरासघनया स्तदातभरकंडवरित्रयायाधसंजमतव बारयशनामासम्मतयारियल झायणदिवेकरसननादानसयासंघचक सातदेसालपडाय सियतवतियमवरिटाडानशासंघरदसतगवल्सबायसदि घासनविकारयालादविणायचयरयाणदादतालमा.मदव्याधरकनियामाय गाकसरालासावगडणमऊयरिगरिखडम्यनिगरातयबुदमासेवामाता KHNAATERIAL - R नरिमन एमालाANTA.३२५.०४-१-५-२ . मर५ तिवाणायाधमकदंवावासमदसाबाअंतगडदमावाणुनाराववाश्यदसावायला वागणवाविवागमवादिहावायवासवदधयणायद्यावदिसवाणुटागोवाशाजाणियाम तालायरियासतंसावाणुमाकिमणुमकवाणुमाकवश्कालंगवतियाणुमायादिकरखा है शिमातालपवतियानसताना एमालामाशामणमयीणाम एवमणायतावादयताएदा हरापातञ्चसयहियामधारयणायमा याएकापायावसंगहालसंवरण शिकारवधितिकरणलवालावडहायला पदावरेखवण्तदायासमणुमायामाशामायापलाएदासम्मलालासंगराएवाईफायहामुदिशाना T A लाखसंतवचाराधा सायश्रीतामुत्साहमाहिमकरणमधएपाधनकलडारिकारापतापुतवईमानकरतिपालनाal नन्दिसूत्रमूलकी 'ल.' संज्ञकातिके प्रथम पत्रकी और अंतिम (३५वे ) पत्रकी द्वितीय पृष्ठि । Page #36 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ।। णमो त्थु णं समणस्स भगवो महइ-महावीर-वद्धमाणसामिस्स ॥ णमो अणुओगधराणं थेराणं । सिरिदेववायगविरइयं नंदीसुत्तं । सिरिजिणदासगणिमहत्तरविरइयाए चुण्णीए संजुयं । ॥ नमो भगवते वर्द्धमानाय ॥ सबसुतखंधगादीणं मंगलाधिकारे णंदि त्ति वत्तव्वा । णंदणं णंदी, गंदंति वा अणयेति गंदी, गंदंति वा गंदी, पमोदो हरिसो कंदप्पो इत्यर्थः । तस्स य चतुविहो निक्खेवो । गतासु णाम-वणासु दवणंदी जाणगो अणुवउत्तो । अहवा जाणग-भवियसरीरवतिरित्तो वारसविधो तूरसंघातो इमो भंभा १ मकुंद २ मद्दल ३ कडंब ४ झल्लरि ५ हुडुक्क ६ कंसाला ७ । काहल ८ तलिमा ९ वंसो १० पणवो ११ संखो १२ य बारसमो ॥१॥ भावणंदी गंदिसदोवयुत्तभावो । अहवा इमं पंचविहणाणपरूवगं णंदि त्ति अज्झयणं, तं च सुतंसेण सव्वसुतम्भंतरभूतं । तं च सव्वसुतारंभेसु विग्योवसमणथमादीए मंगलं पयुज्जति । तस्स य मंगलट्ठाणावसरपत्तस्स गुरवो विणेयस्स अत्थ-सुतगोरवुप्पादणत्थं अविच्छेदसंताणागतमुतप्पदरिसणत्यं च इमं थेरालि कहेत्ता ततो से 10 अत्थं कहयंति । सव्यसुतत्था य जतो तित्थगरप्पभवा, अतो भत्तीए पंण्णवग-सावग-पढग-चिंतगा य पढमताए णमोकारं करेत्ता भणंति [सुत्तं १] जयइ जगजीवजोणीवियाणओ जगगुरू जगाणंदो । जगणाहो जगबंधू जयइ जगपियामहो भयवं ॥१॥ जयति गाहा । सोतिदियादिविसय-कसाय-परीसहोवसेग्ग-चउघातिकम्म-ऽटुप्पगारं वा परप्पवादिणो य जिणमाणो जितेंद्र वा जयति त्ति भण्णति । जगं ति-खेत्तँलोगो तम्मि जे जीवा तेसिं जाओ जोणीओ-सच्चित्त-सीतसंवुडादियाओ चउरासीतिलक्खविहाणा वा विविहपगारेहिं जाणमाणो बियाणी । अहवा जो जहा जेहिं कम्महिं जाए जोणीए उववजति तं तहा जाणति त्ति विसिट्ठो जाणगो वियाणगो । अहवा जगग्गहणातो धम्मा-ऽधम्माऽऽगास-पुग्गलग्गहणं, जीव त्ति सन्नजीवग्गहणं, जोणि त्ति-जीवा-जीवुप्पत्तिठाणं, जहा य ज उप्पज्जति विग- 20 च्छति धुवं वा तं तहा सव्वं जाणइ त्ति वियाणगो। अनेन वचनेन केवलनाणसामत्थतो सबभावे सव्वहा जाणति १क्खंधतादीणं आ० दा० ॥ २ अणाए त्ति आ० । अणेण ति दा० ॥ ३ गयाओ णाम-दृवणाओ। दव आ• दा० ॥ ४ मादीय मंगलटुं पयु आ०॥ ५ वलियं कहेत्ता आ० दा० ॥ ६ कथयति आ० दा० ॥ ७ पण्णावग' आ. दा. ॥ ८ जिणवसभो सललियवसभविक्कमगती महावीरो इत्युत्तरार्धपाठभेदप्रचूर्णौ । नाय पाठभेदः कस्मिंश्चिदपि सूत्रादर्श उपलभ्यते ॥ ९ सग्गावधाति आ० । सग्गुवघाति दा. ॥ १० खेत्तभावो तम्मि आ० दा० ॥ For Private & Personal use only Page #37 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जिणदासगणिमहत्तरविरइयाए चुण्णीए संजुयं [सु० १-२ गा. २-८ त्ति ख्यापितं भवति । 'जगगुरु' ति जगं ति-सबसण्णिलोगो, तस्स भगवानेव गुरुः । कथम् ? उच्यते[जे० १८६ प्र०] गृणाति शास्त्रार्थमिति गुरुः, ब्रवीतीत्यर्थः, तिरिय-मणुये-देवा-ऽसुराए परिसाए धम्ममक्खाति । जो वा जं पुच्छति तं सव्वं कहयति त्ति तेण गुरू, अनेन वचनेन परोपकारित्वं प्रदर्शितं भवति । जगा-सत्ता ताण आणंदकारी जगाणंदो। कहं ? उच्यते-सव्वेसिं सत्ताणं अव्वावादणोवदेसकरणत्तातो। जतो भणितं-"सव्वे सत्ताण 5 इंतव्या ण परियावेतन्या ण परिघेत्तव्या ण अजावेतव" [आचा० श्रु.१ अ.४ उ.२ सू. ३] त्ति । विसेसतो सण्णीणं धम्मकहणत्तातो आणंदकारी, ततो वि विसेसतो भन्यसत्ताणं ति । अनेन वचनेन हितोपदेशकर्तृत्वं दर्शितं भवति । जगा-सत्ता ते अण्णेहिं परिभविज्जमाणे रक्वइ त्ति जगणाहो। कह? उच्यते-मणो-वयण-काएहिं कत-कारिता-ऽणुमतेहिं रक्वंतो जगणाहो भवति । अनेन वचनेन सन्चपाणीणं सणाहता दंसिता भवति । 'जगबंधु' त्ति जगा-सत्ता तेसिं बंधू जगबंधू । कहं ? उच्यते-जो अप्पणो परम्स वा आवतीए वि ण परिचयति सो वंधू, भगवं च मुट्ठ वि 10 परीसहोवसग्गादिसु वाहिज्जमाणो वि सत्तेसु बंधुत्तं अपरिच्चयंतो ण विराहेति ति अतो जगवंध, अनेन वचनेन सव्वसत्तेमु सबंधुता दंसिता भवति । पितामहो त्ति जो पितुपिता स पितामहो, सो य भगवं चेव । सव्वसत्ताणं पितामहो कहं ? उच्यते-सर पत्ताण अहिंसादिलक्खणो धम्मो पिता रक्खणत्तातो, सो य धम्मो भगवता पणीतो अतो भगवं धम्मपिता, एवं सव्वसत्ताणं भगवं पितामहो त्ति । अनेन वचनेन धम्मं पडुच्च आदिपुरिसत्तं ख्यापित भवति। एतीए गाहाए, पच्छद्धस्स पाढंतरं इमं-"जिणवसभो सललियवसभविक्कम [जे० १८६ द्वि०] गती महावीरो।" जिण 15 एव वसभी जिणवसभो । वसभो त्ति संजमभारुव्वहणे । चंकमतो सुभा गायसंचालणक्रिया सललितं भण्णति । वाम-दाहिणाणं वा पुरिम-पच्छिमचलणाणं जं कमुक्खेवकरणं स विक्कमो भण्णति, दुपदस्स पुण एगचलणुक्खेवो चेव विक्कमो । सेसं कंठं ॥१॥ किंच जयइ सुयाणं पमवो तिथंयराणं अपच्छिमो जयइ । . जयइ गुरू लोगाणं जयइ महप्पा महावीरो ॥२॥ 20 जयति सुताणं० गाहा। राग-दोसादिअरी जिणंतो जितेंसु वा जयति त्ति। [ सुताणं '] सव्वमुताणं ति, मुतांणत्यो भगवंतातो पभवो । 'पभवो' त्ति पस्ती। अणिढुवयणपरिहारातो पच्छिमो वि अपच्छिमो भण्णति, अहवा पच्छाणुपुवीए अपच्छिमो, रिसभो पच्छिमो। अविसिहजीवलोगस्स विसिसण्णिजीवलोगस्स वा, अहवा सम्मदिट्ठिमादिसंजता-ऽसंजतलोगस्स गुरू। महं आता जस्म सो य अकम्मवीरियसामत्थतो महात्मा, केवलादिविसिट्ठलद्धिसामत्थतो वा महात्मा ॥२॥ किंच25 भदं सव्वजगुज्जोयगस्स भदं जिणस्स वीरस्स । भई सुरा-ऽसुरणमंसियस्स भई धुयरयस्स ॥३॥ __ भई सन्व० गाहा । भायते भाति वा भद्रम् , तं भगवतो भवतु त्ति । सव्वजगं ति-लोगो । अट्ठविहो वि लोगनिक्खेवो भाणितव्यो [आव०नि० गा० १०५७] । सेसं कंठं ।।३।। इमं संघस्स रहरूवर्ग १ य-सदेवा जे. दा० ॥ २५ एवमक्खा जे० ॥ ३ "सव्वे पाणा सव्वे भूया सव्ये जीवा सव्वे सत्ता ण हतब्वा ण अजावेयव्वा ण परियावेयवा ण परिघेत्तव्वा ण उद्दवेयव्वा'" इतिरूपं सूत्रमाचाराने ॥ ४ विसंघेह आ० ॥ ५ 'महो भवति । अनेन आ• ॥ ६ स्थगरा सं० ॥७ णाणत्थाणं भग आ० ॥ ८ 'च्छिमो बीरो, रिसभो आ• ॥ Jain Education Interational Page #38 -------------------------------------------------------------------------- ________________ मंगलं संघाथुई य] सिरिदेववायगविरइयं गंदीमुत्तं । [सुत्तं २] भई सीलपडासियस्स तव-णियमतुरगजुत्तस्स । संघरहस्स भगवओ सज्झायसुणंदिघोसस्स ॥ ४॥ भई सील० गाहा। रहो सामण्णतो पंचमहन्वतमइओ। उस्सितो नि तस्सऽटारससीलंगसहस्ससिता जतपंडागा । बारसविहो तबो: इंदिय-गोइंदियो य णियमो एते अस्सा। सज्झायसद्दो पंदियोसो। सेसं कंठं ॥४॥ 5 संघस्सेव इमं चक्करूवर्ग__संजम-तवतुंबा-यस्स णमो सम्मत्तपारियलस्स। अपडिचक्कस्स जओ होउ सया संघचकस्स ॥ ५ ॥ संजम० गाहा । विमुद्धभावचकस्स सत्तरसविधो संजमो तुवं । तस्स बारसविहतवोमता अरगा। पारियल्लं ति-जा बाहिरपुट्ठयस्स वाहिरब्भमी, सा से सम्मत्तं कतं, जम्हा अग्गेहिं चरगादिएहिं जेतुं [जे० १८७ प्र०] ण 10 सकति तम्हा एयं जयति, अप्पडिचकं च एतं । णमो एरिसस्स [ संघ]चक्कस्सेति ॥५॥ इमं संघस्सेव णगररूवगं गुणभवणगहण ! सुयरयणभरिय ! दंसणविसुद्धरच्छागा ! । संघणगर! भदं ते अक्खंडचरित्तपागारा ! ॥६॥ गुणभवणगहण० गाहा । तम्मि पुरिससंघणगरे इमे गुणा-पिंडविमुद्धि-समिति-गुत्ति-दव्यादिअभिग्गहमासादिपडिमा-गोयरे य चरगादिया, एमादिउत्तरगुणा तम्मि संघणगरे भवणा कता, भवण त्ति घरा, तेहिं 15 गहणं ति-निरंतरं संठिता घणा । तं च संघपुरिसणगरं अंगा-ऽगंगादिविचित्तसुतरयणभरितं । खयोवसमितादिसम्मत्तमइयरच्छायो य, मिच्छत्तादिकयारवज्जितत्तणतो विसुद्धाओ । मूलगुणचरित्तं च से पागारो, सो य अखंडो त्ति-अविराधितो निरंतिचार इत्यर्थः । सेसं कंठं ॥ ६॥ इमं पि संघम्सेव पर्दुमरूवर्ग कम्मरयजलोहविणिग्गयस्स सुयरयणदीहणालस्स । पंचमहव्वयथिरकण्णियस्स गुणकेसरालस्स ॥७॥ सावगजणमहुयैरिपरिखुडस्स जिणसूरतेयबुद्धस्स । संघपउभस्स भदं समणगणसहस्सपत्तस्स ॥८॥ [ जुम्मं ] कम्मरय० गाहा । कम्म एव रयो कम्मरयो । अहवा जं पुन्यबद्धं तं कम्म, बज्झमाणं रयो, तं सव्वं पि १ भई सील० इति संजमतव० इति गुणभवण० इति च सूत्रगाथात्रिकं श्रीहरिभद्रसूरिवृत्तौ श्रीमलयगिरिपादवृत्तौ च पश्चानुपूर्ध्या व्याख्यातमस्ति ॥ २ हरि वृत्तौ मलयवृत्तौ च 'सुणेमिघोसस्स इति पाठभेदो निर्दिष्टोऽस्ति । अंगविजाशास्त्रेऽपि" तत्थ सरसंपने हिरन-मेघ-दुंदुभि-वसभ-गय-सीह-सद्ल-भमर-रधणेमिणिग्घोस-सारस-कोकिल-उक्कोस-कोंच-चकाक-हंस-कुरर-बरिहिणततीसर-गीत-याइत-तलतालघोस-उक्कुट्ट-छेलित-फोडित-किकिणिमहुरघोसपादुन्भावे सरसंपण्यं बूया। " इत्यत्र मिणिग्घोस इति पदं वत्तते ।। ३ पडाता आ० ॥ ४ खं० मो० आदर्शयोः केनापि विदुषा 'बारयस्स स्थाने 'बारस्स इति संशोधितं वर्तते। एतत्पाठानुसायेंव मलयगिरिपादव्याख्यानं वर्तते ॥ ५ तवो महाअरगा जे० दा० ॥ ६ अखंडचारित मु० ॥ ७'छाया य आ० दा० ॥ ८ कतवर आ. दा. ॥ ९ णिरचार आ० ॥ १० पउम आ• दो० ॥ ११ यरपरि हे. ल. ।। Page #39 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जिणदासगणिमहत्तरविरइयाए चुण्णीए संजुयं [सु० २ गा. ९-१७ जलोहमिव कल्प्यते । अहवा पुन्नबद्धं कम्मं पंको, बज्झमाणं जलोहो, ततो विणिग्गतो संघपैदुमो । तस्स णालो, मुत एव रयणं सुतरतणं तं से णालो कतो। पंचमहब्बता य से थिर त्ति-दृढा ते कष्णिय त्ति-बाहिरपत्ता कता। गुणा-मूलुत्तरगुणा य से अणेगविहा [ केसरा] तेहिं गुंणेहिं आलस्स ति-अधिकयोगयुक्तस्य गुणकेसरालस्स मूलादिगुणकेसरयुक्तस्य इत्यर्थः ॥७॥ 5 बितियगाहाए-परिवुड ति-परिवारितं, जिणसरस्स धम्मकहणक्खाणतेयेण प्रबोधितं । अणेगसमणसहस्सा य से अभंतरपत्ता कता । एरिसस्स संघपदुमस्स भद्रं भवतु ।। ८ ।। इमं चंद्रसंघरूवर्ग तव-संजममयलंछण ! अकिरियराहुमुहदुद्धरिस ! णिचं । जय संघचंद ! णिम्मलसम्मत्तविसुद्धर्जुण्डागा ! ॥९॥ तवसंजम० गाहा । संवचंदम्स मियो तव-संजमा, तेहिं लंछितो । अकिरिय त्ति-णत्थियवादी ते राहुमुई, 10 तेहिं दुआधरिसो ति-ण सकते जेतुं। 'णिचंति सच कालं। संकादिविसुद्धसम्मत्तं से जोण्डा । सेसं कंठं ॥९॥ सूरसंघरूवगं इमं परतित्थियगहपहणासगस्स तवतेयदित्तलेसस्स । ___णाणुज्जोयस्स जए भई दमसंघसूरस्स ॥१०॥ परतित्थिय० गाहा । हरि-हर-हिरण्ण-सकोलक-चरग-तावसादयो परतित्थिया गहा, तेसिं गाणतेयप्पभं 15 मुतादिणाणप्पभाते णासेति। [जे० १८७ द्वि०] तव-णियमकरणातो य अतीवदित्तिमंतलेस्सो। लेस्स त्ति-रस्सीयो। मुतादिणाणुज्जोतसंपण्णस्स य इमम्मि जए संघसूरस्स भदं भवतु । सेसं कंठं ॥१०॥ इमं संघसमुहरूवर्ग भदं घिईवेलापेखुिडस्स सज्झायजोगमगरस्स । अक्खोभस्स भगवओ संघसमुदस्स रुंदस्स ॥ ११ ॥ भदं घिति० गाहा । जैल-वेदियंतरे जं रमणं सा वेला, सा य मेरा वि भण्णति, एवं संघसमुदस्स धिती 20 वेला, ताए परिवुडो त्ति-वेढितो । वायणादिसज्झायजोगकरणं मगरो । परमवादोपसर्गादिभिर्न क्षुभ्यते । रुंदो महंतो। सेसं कंठं ॥११॥ इमं संघस्स मेरुरूवगं-तस्स य पन्चतस्स इमे स्वगा, तस्स य पन्चतस्स इमे अवयवा-पेढं मेहला उस्सयों सिला, मेहला, कूडा, मेहलाए वणं गुहा, गुहामु य मइंदा मुवण्णादिधातवो, नौगाविधवीरियोसहिपज्जलितो, णिज्यरा य सलिलजत्ता. कहरा य से मयरादिपक्विउपसोभिता. अणुवग्यातिविज्जुलतोसोभितो यसो. कप्पा25 दिरुक्खुबसोभितो य, अंतरंतरेमु य वेरुलितादिरतणसोभितो । एतेसिं पदाणं पडिरूवेण इमाहिं छहिं गाहादि उपसंहारो-- १ 'पयुमो आ० । पउमो दा० ॥ २ गुणेहि अभहितस्स त्ति अधिक आ० ॥ ३ परिकरियस्स जिण आ० ॥ ४ इमं संघस्स चंदरूवगं आ• ॥ ५ 'जोण्डागा शु० । जुन्हागा डे० ॥ ६ मियो णाम तव आ० ॥ ७ संघस्स सूररूवर्ग तिमं आ० ॥ ८धीवेला सं० डे. ल. ॥ ९ परिगयस्स सर्वासु सूत्रप्रतिषु । हरिभद्रयरि-मलयगिरिसूरिभ्यामेतत्पाठानुसारेणव व्याख्यातमस्ति । चूर्णिकृत्सम्मतस्तु पाठः कुत्राप्यादर्श नोपलभ्यते ॥ १० जलवढि (? ढियं) आ०॥ ११ सुक्खडा जे० दा० ॥ १२ मिगिंदा आ० ।। १३ जाणादिविविधदित्तोसहि आ० ॥ १४ संथा(घा)रो आ.॥ Page #40 -------------------------------------------------------------------------- ________________ संघथुई] सिरिदेववायगविरइयं गंदीसुतं । सम्मइंसंणवइरदढरूढगाढावगाढपेढस्स । धम्मवररयणमंडियचामीयरमेहलीगस्स ॥ १२ ॥ णियमूसियकणयसिलायलुज्जलजलंतचित्तकूडस्स । णंदणवणमणहरसुरभिसीलगंधुंद्धमायस्स ।। १३ ॥ जीवदयासुंदरकंदरुद्दरियमुणिवरमइंदइण्णस्स । हेउसयधाउपगलंतरतदित्तोसहिगुहस्स ॥ १४ ॥ संवरवरजलपगलियउज्झरपविरायमाणहारस्स । सावगजणपउरखंतमोरणचंतकुहरस्स ॥ १५ ॥ विणयमयपवरमुणिवरफुरंतविज्जुज्जलंतसिहरस्स । विविहंकुलकप्परुक्खगणयभरकुसुमियकुलवणस्स ॥ १६ ।। णाणवरस्यणदिप्पंतकंतवेरुलियविमलचूलस्स। वंदामि विणयपणओ संघमहामंदरगिरिस्स ॥ १७॥" [छहिं कुलयं ] __ सम्मईसण० गाहा। णियमू० गाहा । जीवदया• गाहा। संवर० गाहा । विणय० गाहा । गाणवर गाहा । संघपनतस्स सम्मईसणं चेव वइरं । तं च संकादिसल्लरहियत्तणयो ददं ति" रूढं ति-चढितं, कहं ? विमुज्झमाणतणयो । गाढं ति-अतीव, अवगाहं ति-ओगाढं, सहहाणतणतो जीवादिपदत्येसु अतीवओगाढं 15 ति वुत्तं भवति । एतं पेढं । धम्मो दुविहो मूलुत्तरगुणेमु । सो य दुविहो वि वरो त्ति-पधाणो। तत्थुत्तरगुणधम्मो रयणा, तेहिं मंडिता जे मूलगुणा ते चामीकरं ति, तं च मुवण्णं, तम्मयी मेहला, तया जुत्तस्स मेहलागस्स ॥१२॥ नियमो ति इंदिय-गोइंदिएसु अणेगविधो, सो य गियमो सिलातला तेहि चेव उस्सितो, अमुभज्झवसाणविरहितत्तणतो कम्मविमुज्झमाणतणतो वा उज्जलमुत्त-ऽत्थाणुसरणतणतो ये जलति चित्तं, चिंतिज्जइ जेण तं चित्तं, तं चेव कूडं ति चित्तकडं तस्स । [जे० १८८ प्र०] गंदंति जेण वगयर-जोतिस-भवण-वेमाणिया विजाहर-मणुया य 20 तेण णंदणं, वणं ति-वणसंडं । तं च लता-वल्लि-वितोणाणेगोसहिसतेहिं गहणं, पत्त-पल्लव-पुप्फ-फलोवेतेहिं मण १ सणवरवहरदढरूढ़ डे० शु. ल. मु० । 'सणओयरहरूढ' सं. ॥ २ढपीढ सं० ॥ ३ लायस्स सं० ॥ ४ 'यलज शु० ।। ५ गंधुद्धमा सर्वास्वपि सूत्रप्रतिषु । गंधद्धमा हरि० वृत्तौ ॥ ६ 'मयंदधस्स डे । 'मईदइंदस्स ल.॥ 'तरयणदित्तो' मो. मु० । 'तरिस्थदित्तो डे• ॥ ८ विणयणयपवर ससूप्र० । 'चूर्णिकृत्सम्मतः सूत्रपाठः कुत्राप्यादर्श नोपलभ्यते ॥ ९विविहगुणक परुषखगफलभरकुसुमाउलवणस्स ससूप्र० । चूर्णिकृत्सम्मतः सूत्रपाठः कुत्राप्यादर्श नोपलभ्यते ।। १. सप्तदशगाथानन्तरं चूर्णिकृदादिभिरव्याख्यातं गाथायुगलमिदमधिकं सर्वास्त्रपि सूत्रप्रतिषूपलभ्यते गुणरयणुज्जलकडयं सीलसुयंधतवमंडिउद्देसं । सुयबारसंगसिहरं संघमहामंदरं बंदे ॥१॥ नगर रह चक्क पउमे चंदे सूरे समुह मेरुम्मि । जो उवमिजइ सययं तं संघ गुणायरं वंदे ॥२॥ अत्राथें जैसू. आदर्श इय टिप्पणी वर्तते-"गुणेत्यादि गाथा २ वृत्तावव्याख्यातम् " ॥ ११ णाणावरण• गाहा जे० दा० । अशुद्धोऽयं पाठभेदः ॥ १२ इंसणं से घरं जे०॥ १३ 'ति चिरवढितं आ० ॥ १४ य उज्जल-दित्तिमं चितिजइ तेण दित्तं, तं चेव आ० । असङ्गतोऽशुद्धश्चार्य पाठः ॥ १५ 'विताणणेगसंठाणसंठितेहिं गहणं जे० दा० ॥ १६ लोचतेहि आ० ॥ Page #41 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जिणदासगणिमहत्तरविरइयाए चुण्णीए संजुयं [मु. ३-५ गा. १८-२४ हारित्तणतो मणहरं, गंधतो सुरभिगंधं । सीलवणसंडे वि जम्हा साधवो गंदंति प्रमोदति रमंतीत्यर्थः। विविहलद्धिविसेसतो य मणहरं सीलवणं, विमुद्धभावत्तणतो य सुगंधं, जहा दव्ववणसंडं गंधेण उदुमातं ति-व्याप्तं तहा सीलगंधेण संघस्स गंधुदुमायस्से ॥१३॥ किंच जं पन्चतासणं सिलारुक्खगहणं तं कंदरं ति । भावे जीवेमु दयाकरणसुंदरं जं तं कंदरं ति । तत्य य 5 उ-प्पाबल्ले, दरितो त्ति-दप्पितो, जीवदयाकरणदप्पितो त्ति वुत्तं भवति । को य सो ? मुणिगणो। सो चेव मुणिगणो मइंदो परप्पवादिसासणसंघमयाण इंदो। कहं ? सितवादउत्तमभावत्तणतो। हेतु त्ति-परखधम्मो कारणं वा, ते सतग्गसो सुत्ते संभवंति । ते य हेतवो धातू, ते य पगलंति परूवणगुहाए । सा य परूवणगुहा णाणादिरतणादिएहिं दित्ता, खेलोसहिमादिओसहीहि वा दित्ता ॥१४॥ एवं दित्तोसहिगुहरस संघस्स संवरो ति-पञ्चक्खाणं, तं चेव सलिलं, किंचि पन्चतग्गातो ओसरितं उज्झरं, 10 ईहावि खाइगभावातो खयोवसमियं उज्झरं, ततो पलंबिता खतोवसमितसंवरदगधारा, सच्चेव धारा हारो, तेण विरायते-सोभति सावगजणो पउरो त्ति-बहू प्रचुरः सो य गीतद्धणीए रवति त्ति-रडती, ते चेव मोरा णाडगादीहि य णच्चांत । जं पधतस्स अट्टै समप्पदेसं रुक्खाकुलं [जे०१८८ द्वि०] च तं कुहरं । एवं संबपञ्चतस्स ईवणमंडवादी कुहरं ति ॥ १५॥ विणयकरणत्तातो विणयमतो मुणी । सो य विणयकरणत्तेण फुरते, तं चेव फुरितं विज्जुतं ति-चकोरितं, 15 तं च उज्जलं ति-निम्मलं, तेण उज्जलत्तेण संघसिहरं जलितमिव लक्विज्जति । संघसिहरं च पावयणिपुरिसा दट्ठव्या । तत्थ य विविहकुलुप्पण्णा साहवो कप्परुक्खा, खीरासवादिलद्धिफलेहि ये गयभरा, लद्धिहेतु द्विता साहको कुसुमिती कुलवग त्ति दवा ॥१६॥ मति-सुतादिनाणा वर ति-पहाणा, ते चेव णाणावेरुलियादिरतणा इव कंता, कंता इति-कंतिजुत्ता। कंतिजुत्तत्तणतो चेव सविसतेण जीवादिपदत्थसरूवोचलंभतो दिपंति । नाणस्स य मलो णाणावरणं, तब्बिगमातो 20 य विगतमलं । चूलामणिरिव सिहरोवरि चूला, सा य णाणातिसयगुणेहिं जुत्ता, जुगप्पहाणो पुरिसो चूला इति । एवं संघपव्वतस्स पेढादिचूलपजवसाणकप्पियस्स बंदामि विणयपणतो त्ति छण्ह वि गाहाणं एतं क्रियापदं ति ॥१७॥ ____एवं चरमतित्थगरस्स संघस्स य पणामे कते इमा अवसैरप्पत्ता आवली भण्णति-सा तिविहा तित्थकर १ गणहर २ थेरावली ३ य । तत्थ तित्थगरावलिदंसणत्थं इमं भण्णति [सुत्तं ३] वंदे उसमें अजिअं संभवमभिणंदणं सुमति सुप्पभ सुपासं । ससि पुष्पदंत सीयल सिज्जंसं वासुपुज्जं च ॥ १८ ॥ १'स्स किया । जं आ० ॥ २ उत्- प्राबल्ये इत्यर्थः ॥ ३ 'उत्तिम आ० ॥ ४ इधावि आ० ॥ ५ बहुः मा० ॥ ६ गीतज्झुणीए आ० ॥ ७ अहे आ० ॥ ८ ण्हाण आ• ॥ ९ 'यणतो आ० दा० ॥ १० दा० ॥ ११ 'ता गुणवण त्ति आ० ॥ १२ कंसादिजुत्त आ०॥ १३ सो य णाणातिसयत्थसरूयोवलंभगुणोहजुया जुगप्पहाणा पुरिसा चूला आ० ॥ १४ त आ०॥ १५ सरापण्णा आ आ० ॥ १६ सेज्जंसं सं• शु० । सेयंसं खं• ॥ Jain Education Intemational Page #42 -------------------------------------------------------------------------- ________________ तित्थयर-गणहर-थेरावलीओ] सिरिदेववायगविरइयं गंदीसुतं । विमलमणंतेइ धम्म संति कुंथु अरं च मल्लिं च ।। मुणिसुब्बय णमि णेमी पासं तह वद्धमाणं च ॥ १९ ॥ [ जुम्मं ] वंदे उसभ० गाहा। [विमल० गाहा य] कंठा ॥१८॥१९॥ चरमतित्थगरस्स इमा गगहरावली [सुत्तं ४] पंढमेत्य इंदभूती बितिए पुण होति अग्गिभूति त्ति । ततिए य वाउभूती ततो वितत्ते सुहम्मे य ॥ २०॥ मंडिय-मोरियपुत्ते अकंपिते चेव अयलभाता य । . मेतज्जे य पभासे य गणहरा होंति वीरस ॥ २१ ॥ [ जुम्म ] एत्थ गणहरावली ॥२०॥२१॥ तो सुधम्मातो थेरावली पवत्ता, जतो [जे०१८९ प्र०] भण्णति [सुत्तं ५] सुहम्मं अग्गिवेसाणं जंबूणामं च कासवं । पभवं कच्चायणं वंदे वच्छं सेज्जंभवं तहा ॥ २२ ॥ - सुहम्मं अग्गिवेसाणं० सिलोगो। समणस्सणं० महावीरस्स कासवगोत्तस्स सुधम्मे अंतेवासी अग्गिवेसायणसगोत्ते । सुहम्मस्स अंतेवासी जंबुणामे कासवे गोत्तेणं । जंबुणामस्स अंतेवासी पभवे कञ्चायणसगोत्ते । पभवस्स अंतेवासी सेजंभवे वच्छसगोत्ते ॥२२॥ जसभदं तुंगियं वंदे संभूयं चेव माढरं । भद्दबाहुं च पाइण्णं थूलभदं च गोयमं ॥ २३ ॥ जसभई० गाहा । सेनंभवस्स अंतेवासी जसभद्दे तुंगियायणे वग्घावञ्चसगोत्ते । जसभइस्स अंतेवासी इमे दो थेरा- भदबाहू पायीणग्गिसगोत्ते, संभूतविजए य माढरसगोत्ते । संभूतविजयस्स अंतेवासी थूलभद्दे गोतमसगोत्ते ॥२३॥ एलावैच्चसगोतं" वंदामि महागिरि सुहत्थिं च। 20 तत्तो कासवगोत्तं बहुलस्स सरिवयं वंदे ॥ २४ ॥ १ मणतय डे. ल. मु० ॥ २ मि खं. जे० मु० ॥ ३ इदं गाथायुगलं चूर्णिकृता चूर्णी .स्वयमेवेत्थमुल्लिखितमस्ति । पढमित्थ इंदभूई बीए पुण होइ यग्गिभूह त्ति । तइए य वाउभूई तओ वियत्ते सुहम्मे य ॥ मंडिय-मोरियपुचे अकपिए चेव अयलभाया य । मेयज्जे य सं० डे० शु• मो० ॥ ४ वायभूई डे० ल• ॥ ५ तहा मो०॥ ६ एकविंशति-द्वाविंशतिगाथयोरन्तराले चूणिकृताऽव्याख्याताऽपि श्रीहरिभद्रसूरि-श्रीमलयगिरिपादाभ्यां स्वस्ववृत्ती व्याख्याता जिनशासनस्तुतिरूपा इयमेका गाथाऽधिका सर्वेष्वपि सूत्रादर्शषु वर्तते व्वुइपहसासणयं जयह सया सवभावदेसणयं । कुसमयमयणासगयं जिणिंदवरवीरसासणयं ॥ जयति शु० । जयउ डे० ल० । जिणंद ल० ॥ ७ जंबुणाम सं० ॥ ८ सिजंभवं ल० मो० ॥ ९ पायन्नं डे० ल० ॥ १० घाईणतिसगोत्ते आ० ॥ ११ ‘वच्छस सं० डे० ल.। 'वत्सस शु०॥ १२ 'गुत्तं शु. ल. ॥ १३ कोसियगोत्तं ससूप्र । श्रीहरिभद्र-मलयगिरिपादाभ्यामेतत्पाठानुसारेणेव व्याख्यातमस्ति । चूर्णिकृत्सम्मतः सूत्रपाठो नोपलभ्यते कुत्राप्यादर्श ॥ Jain Education Interational Page #43 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ॥२४॥ 5 जिगदासगणिमहत्तरविरइयाए चुण्णीप संजय [सु० ५ गा. २५-३२ एलावच्च० गाहा । थूलभद्दस्स अंतेवासी इमे दो थेरा-महागिरी एलावच्चसगोत्ते, मुहत्थी य वासिद्सगोत्ते । सुहत्थिस्स मुद्वित-सुपडिबुद्धादयो आवलीते जहा दसासु [अ० ८ सूत्रं २१०] तहा भाणितव्या, इई तेहिं अहिगारो पत्थि, महागिरिस्स आवलीए अधिकारी । महागिरिस्स अंतेवासी बहुलो बलिस्सहो य दो जमलभातरो कासक्सगोत्ता । तत्थ बलिस्सहो पावयणी जातो, तस्स थुतिकरणे भणंति-"बहुलस्स सरिव्ययं वंदे" । 'सरिव्वयं ति सरिसवयो, वयो य जम्मकालं पडुच्च जा जा सरीरपरिवहिअवस्था सा सा वतो भण्णति ॥२४॥ हारियगोतं साइं च वंदिमो हारियं च सामज्जं । वंदे कोसियगोतं संडिलं अज्जजीयधरं ।। २५॥ हारिय० गाहा । बलिस्सहस्स अंतेवासी साती हारियसगोत्तो । सातिस्स अंतेवासी सामजो हारितसगोत्तो चेव । सामजस्स अंतेवासी संडिल्लो कोसियसगोत्तो, सो य अजनीतधरो ति अजं ति-आर्य आद्यं वा जीतं ति-सुत्तं धरति, मुत्तत्थस्स अविचुतिधरणत्तातो, वंदे त्ति वक्कसेसं । पाढंतरं वा “जीवधरं" ति, आर्यत्वात् जीवं धरेति-रक्षती- 10 त्यर्थः । अण्णे पुण भणंति-संडिल्लम्स अंतेवासी जीवधरो अणगारो, सो य अजसगोत्तो ॥२५॥ संडिल्लस्स सीसो तिसमदखायकित्ति दीव-समुद्देसु गहियपेयालं । वंदे अज्जसमुदं अक्खुभियसमुद्दगंभीरं ॥ २६ ॥ तिसमुद्द० गाहा । पुख-दक्खिणा-ऽपरा ततो समुद्दा, उत्तरतो वेतड्ढो, एतंतरे खातकित्ती । सेसं कंठं ॥२६।। तस्स सीसो [जे० १८९ द्वि०] इमो 15 भणगं करगं झरगं पभावगं णाण-दसणगुणाणं । वंदामि अज्जमंगुं सुयसागरपारगं धीरं ॥ २७॥" भणगं० गाधा । कालियपुन्नसुत्तत्थं भणतीति भणको । चरण-करणक्रियां करोतीति कारकः । सुत्तत्थे य मणसा झायंतो ज्झरको । परप्पवादिजयेण पश्यणप्पभावको । नाग-दंसण-चरणगुणाणं च पभावको आधारो य । सेसं कंठं ॥२७॥ तस्स सीसो णाणम्मि दंसणम्मि य तव विणए णिचकालमुज्जुत्तं । अज्जणंदिलखमणं सिरसा वंदे पसण्णमणं ।। २८॥ १ अत्र चूर्णिकृता हरिभद्रपादैश्च सुहस्ती भगवान् दशाथुतस्कन्धाष्टमाध्ययनस्थविरावयामिय वासिष्ट गोत्रीयः ख्यापितः, किञ्च मलयगिरिसूरिचरणैरयं सूत्रगाथानुलोम्याद् पेलापत्यसगोत्रीयः ख्यापितः, तदत्र तज्ज्ञा एवं प्रमाणम् ॥ २ कोसियगोत्ता दा० ॥ ३ भणिय आ० ॥ ४ 'यगुत्तं सायं च डे० शु० ल०॥ ५ जीवधर इति चूर्गों पाठान्तरम् ॥ ६ " तेषां शाण्डिल्याचार्याणां मार्यजीतधर-आर्यसमुद्राख्यौ द्वौ शिष्यावभूताम् । आर्यसमुद्रस्याऽऽर्यमङ्गुनामानः प्रभावकाः शिष्याः जाताः" इति हिमवन्तस्थविरावस्याम् पत्र ९ ॥ ७ खाइकित्ति ल. ॥ ८ पत्थंतरे आ० ॥ ९ अजमंगू ल. ॥ १. अष्टाविंशतितमगाथानन्तरं शु० प्रतिं विहाय सर्वासु सूत्रप्रतिपु गाथायुगलमिदमधिकमुपलभ्यते चंदामि अजधम्मं वंदे तत्तो य भद्दगुत्तं च । तत्तो य अजवइरं तव-नियमगुणेहि वयरसमं ॥ वंदामि अजरक्खियखमणे रक्खियचरित्तसम्वस्से । रयणकरंडगभूओ अणुओगो रक्खिओ जेहिं ॥ एतद्राथायुगलविषये जेसू. प्रतावियं टिप्पणी- “वंदामि अजधम्म० "एतदपि गाथाद्वयं न वृत्तौ विवृतम् , आवलिकान्तरसम्बन्धित्वादिति सम्भाव्यते ।" ११ अज्झानंदिल ख• ॥ 20 Jain Education Intemational Page #44 -------------------------------------------------------------------------- ________________ थेरावली] सिरिदेववायगविरइयं णंदीमुत्तं । णाणम्मि दं० गाहा । कंठा ॥२८॥ तस्स सीसो.. वड्दउ वायगवंसो जसवंसो अज्जणागहत्थीणं । वागरण-करण-भंगी-कम्मप्पयडीपहाणाणं ॥ २९ ॥ वड्ढतु० गाहा । 'वड्ढतु' त्ति वृद्धि यातु । को य सो ? 'वायगवंसो' वायेंति सिस्साणं कालिय-पुनमुतं ति वातगा-आचार्या इत्यर्थः, गुरुसण्णिहाणे वा सिम्सभावेण वाइतं मुनं जेहिं ते वायगा, वंसो त्ति-पुरिसपत्र- 5 परंपरेण ठितो वंसो भण्णति । सो चेव जसोवज्जणतो संजमोवज्जणतो वा जसवंसो भण्णति, सो य अणागतवंसो इत्यर्थः । कस्स सो एरिसो वसो ? भण्णति, अजणागहीणं ति । केरिसाणं ? ति पुच्छा, भण्णति-जीवादिपदत्थपुच्छामु वाकरणे सहपाहुढे वा पहाणाणं, एवं चरणकरणे कालकरणेमु वा सयभंगविकप्पणामु य तप्परूवणे य तहा कम्मप्पगडिपरूवणाए पधाणाणं पुरिसाणं वड्तु वायगवंसो ॥२९।। तस्स सीसो जचंजणधाउसमप्पहाण मुद्दीय-कुवलयनिहाणं । वड्ढउ वायगवंसो रेवइणक्खत्तणामाणं ॥ ३०॥ जच्चजण गाहा । जचंनणग्गहणं कित्तिमवुदासत्थं, सरीरवण्णेण तन्निभो। तहा सरस-पकमुदियफलसण्णिभो य । कुच्छितो उवलो कुवलयो, सो य कण्हकायो, कुवलयं वा-णीलुप्पलं, कुवलयं वा-रयणविसेसो । रेवतिवायगो त्ति । सेसं कंठं ॥३०॥ तस्स सीसो अयलपुरा णिक्खंते कालियसुयआणुओगिए धीरे । बंभद्दीवग सीहे वायगपयमुत्तमं पत्ते ॥ ३१ ॥ अयलपुरा गाहा । बंभदीवगसाहीणं आयरियाणं समीवे निक्खंतो सीहवायको, उत्तमवायकत्तणं च तकालसुतसंभवं पडुच्च । सेसं कंठं ।। ३१ ॥ तस्स सीसो "जेसि इमो अणुओगो पयरइ अज्जावि अड्ढभरहम्मि । बहुनगरनिग्गयजसे ते वंदे खंदिलायरिए ॥३२॥ जेसि इमो० गाहा । कई पुण तेसिं अणुओगो ? उच्यते-बारससंवच्छरिए महंते दुब्भिक्खकाले भत्तट्ठा अण्णण्णतो फिडिताणं गहण-गुणणा-ऽणुप्पेहाभावातो मुते विप्पगढे पुणो सुभिक्खकाले जाते मधुराए महंते साहसमुदए खंदिलायरियप्पमुहसंषेण 'जो जं संभरति' त्ति एवं संघडितं [जे० १९० प्र० कालियसुतं । जम्हा य एतं मधुराए कतं तम्हा माधुरा वायगा भण्णति । सा य खंदिलायरियसम्मय ति कातुं तस्संतियो अणुओगो भण्णति । सेसं कंठं । अण्णे भणंति जहा-मुतं ण णटुं, तम्मि दुभिक्खकाले जे अण्णे पहाणा अणुओगधरा ते 25 विणट्ठा, एगे खंदिलायरिए संधरे, तेण मधुराए अणुयोगो पुणो साधणं पवत्तितो ति माधुरा वायणा भण्णति, तस्संतितो य अणियोगो भण्णति ॥३२॥ १ भंगिय-कम्म खं. मो. विना । हारि० वृत्तौ अयमेव पाठ आदतोऽस्ति ॥ २ सण्णिधे वा आ० ॥ ३ रेवयण २. ल. ॥ ४ कुच्छितओ धलयो कुवलयो आ० ॥ ५ जेसि तिमो ल० ॥ ६ अणुयोगो दा० ॥ Jain Education Intemational marcon Page #45 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 10 .. जिणदासगणिमहत्तरविरइयाग चण्णीए संजुयं [सु० ५ गा. ३३-४१ तत्तो हिमवंतमहंतविक्कमे धिइपरक्कममहंते । सज्झायमणंतधरे हिमवंते वंदिमो सिरसा ॥३३॥ सत्तो हिम० गाहा । हिमवंतपन्वतेण महंतत्तणं तुल्लं जस्स सो हिमवंतमहतो, इह भरहे णत्थि अण्णो तत्तुल्लो त्ति, एस थुतिवादो । उत्तरतो वा हिमवंनेण सेसदिसामु य समुद्देण निवारितो जसो, हिमवंतनिवारणो 5 जैसो महंतो त्ति अतो हिमवंतमहतो । महंतविक्कमो कहं ? उच्यते-सामत्थतो, महंते वि कुल-गण-संघप्पयोयणे तरति त्ति, परप्पवादिजएण वा विसेसलद्धिसंपण्णतणतो वा महंतविकमो । अहवा परीसहोवसग्गे तवविसेसे वा धितिबलेण परकमंतो महतो । अणंतगम-पजवत्तणतो अणंतधरो तं, महंतं हिमवंतणामं वंदे । सेसं कंठं ॥३३॥ किंच कालियसुयअणुंओगस्स धारए धारए य पुवाणं । हिमवंतखमासणे वंदे णागज्जुणायरिए ॥ ३४॥ कालिय० गाहा । हिमवंतो चेव हिमवंतखमासमणो। तम्स सीसो णागजुणायरितो ॥३४ ।। तस्स इमा गुणकित्तणा मिर्दु-मद्दवसंपण्णे अणुपुट्विं वायगत्तणं पत्ते । ओहसुयसमायारे णागज्जुणवायए वंदे ॥ ३५॥ 15 मिदु-मद्दव० गाहा । 'अणुपुब्बी' सामादियादिसुतन्गहणेण, कालतो य पुरिमपरियायत्तणेण पुरिसाणुपुचितो य वायगत्तणं पत्तो, ओहसुतं च उस्सग्गो, तं च आयरति । सेसं कंठं ॥ ३५ ॥ णागज्जुणवायगस्स सीसी भूतदिण्णो आयरितो । तम्सिमा गुणकित्तणा तिहिं गाहाहि तंवियवरकणग-चंपय विमउलवरकमलगभैंसविण्णे । भवियजणहिययदइए दयागुणविसारए धीरे ॥ ३६॥ अड्ढभरहप्पहाणे बहुविहसज्झायसुमुणियपहाणे । अणुओगियवरखसहे णाइलकुलवंसणंदिकरे ॥ ३७॥ १मणते खं० सं० ल• । जेसू० प्रती 'महंते' इति पाठस्योपरि टिप्पणी यथा- “मणंते' इति वृत्ती व्याख्यातम् ।" इति ।। २ सुतिवादो आ०॥ ३ जसो हिमवंतोत्ति, अतो हिमवंते महंतविकमो, कहं ? आ०॥ ४'णतो अणंतं वा सुतं, महंतं आ०॥ ५ 'गुजोग सं० ॥ ६ मिय-म डे० ॥ ७ पञ्चत्रिंशत्तमगाथानन्तरं P प्रति विहाय सर्वास्वपि सूत्रप्रतिपूपलभ्यत इदं गाथायुगलमधिकम् - गोविंदाणं पि णमो अणुओगे विउलधारणिंदाणं । निच्चं खंति-दयाणं परवणे दुर्भिदाणं ॥ तत्तो य भूयदिन्नं निच्चं तष-संजमे अनिश्चिन्नं । पंडियजणसामन्नं वंदामी संजमविहन्न ।। एतद्गाथायुगलविषये "इदमपि गाथाद्वयं न वृत्तौ कुतश्चित्" इति जेसू० प्रती टिप्पणी ॥ ८ पूरिमपरि आ० । पूरपरि जे० ॥ ९ सर्वास्वपि सूत्रप्रतिषु वरकणगतवियचंपर्य इति पाठ उपलभ्यते। भगवता हरिभद्राचार्यण “वरकणग० गाहा" इति प्रतीकरूपेणष एव पाठः स्वीकृतोऽस्ति । चूर्णी पुनः “तविय० गाहा' इति प्रतीकदर्शनात् चूर्णिकृता तवियवरकणगचंपय० इति पाठ आइतः सम्भाव्यते । श्रीमलयगिरिपादस्तु "वरतवियेत्यादि गाथात्रयम्" इति प्रतीकनिष्टङ्कनेन वरतवियकणगचंपय इति पाठोऽङ्गीकृतो वत्तते । न खल्वेतच्चूर्णिकृद्-मलयगिरिपादनिर्दिष्ट पाठभेदयुगल सूत्रादर्शेषु दृश्यते ॥ १० 'भसिरिव सं० । भसमय हे० ॥ ११ गुओयिय ख० । 'गुमोइय शु० । श्रीहरिभद्र-मलयगिरिभ्यामयमेव पाठः स्वस्ववृत्तौ स्वीकृतोऽस्ति ॥ Jain Education Intemational Page #46 -------------------------------------------------------------------------- ________________ थेरावली] सिरिदेववायगविरदयं गंदीसुतं । भूयहिययप्पगब्मे वंदे हं भूयदिण्णमायरिए । भवभयवोच्छेयकरे सीसे णागज्जुणरिसीणं ॥ ३८॥ [विसेसयं ] तेविय० गाहा । गम्भो त्ति-पोमकेसरा । सेसं कंठं ॥ ३६॥ अड्ड्भरह० गाहा । बहुविहो सज्झायो त्ति-अंगपविट्ठो बारसवियो, अणंगपविट्ठो य कालिय-उकालितो । अणेगविहो । सो य पधाणो त्ति, मुगुणितत्तणेण निस्संको त्ति कातुं । सेसं कंठं ॥३७॥ भूतहितय० गाहा । भूतहितं ति अहिंसा । [जे०१९० द्वि० ] पगब्भं ति-धारिé। अहिंसाभावे पागभता, अतीवअप्पमत्तताए अहिंसाभावपरिणता इत्यर्थः । सेसं कंठं ॥३८॥ भूतांदण्णस्स सीसो लोहिच्चो । तस्स इमा थुती सुमुणियणिच्चा-ऽणिचं सुमुणियसुत्त-ऽत्थधारयं णिचं । वंदे हं लोहिचं सब्भावुब्भावणातचं ॥ ३९॥ सुमुणित. गाहा । मुठ्ठ मुणितं सुमुणितं । किं तं ? भण्णति-जीवो जीवत्तणेण निच्चो, गतिमादिएहिं अणिच्चो । परमाणु अजीवत्तणेण मुत्तत्तेण य निच्चो, दुप्पदेसादिएहिं वण्णादिपज्ज वेहि य अणिच्चो । मुटु त मुणितं मुत्त-ऽत्थं धरेति । णिचकालं पि स्वे भावे ठितो सब्भावो, स-सोभणो वा भावो सम्भावो, स-विज्जमाणो वा भावो सम्भावो, तं उन्भासए तच्चत्तेण, तथ्यत्वेन इत्यर्थः । तं च लोहिचणामं आयरियं वंदे । सेसं कंठं ॥३९॥ तस्स लोभिच्चस्स सीसो दूसगगी । तम्स इमा थुती अत्थ महत्थक्वाणिं सुसमणवक्खाणकहणणेवाणि । पयतीए महुवाणि पयओ पणमामि दूसगणिं ॥ ४०॥" सुकुमाल-कोमलतले तेसि पणमामि लक्खणपसत्थे । पादे पावयणीणं पांडिच्छगसएहि पणिवइए ॥४१॥ अत्थ-महत्य० गाहा । खाणि त्ति-आगरो। सा य अत्थस्स खाणी। किंविसिट्ठस्स ? महत्थस्स। महत्थो य 20 अणेगपज्जायभेदभिण्णो । अहवा भासगरूवो अत्थो, विभासग-सव्वपज्जववत्तीकरो य महत्थो। एरिसस्स अत्थस्स खाणी । का सा ? 'वाणि' ति संवज्ञति । मुभो समण(णो) सुस्समग(णो), तस्स मुस्समणस्स वक्खा[णकहणं ति-अत्थकहणं, तम्मि अत्थकहणे सोताराण करेति वाणी णेवाणी । अहवा वक्वाणं ति-अणुयोगपरूवणं, १ घरकणग० गाद्दा आ० । वरकणगतविय० गाहा दा० ॥ २धारेयव्वं । अहिंसा आ० । धारेव्वं मो०॥ ३ धारयं वंदे । सम्भावुभावणया, तत्थं लोहिञ्चनामाणं ॥ इति मु. पाठः । नाय पाठणि-वृत्तिकृतां सम्मतः, नापि च सूत्रप्रतिघुपलभ्यते ॥ ४ सन् - शोभनो वा भावः सद्भावः, सन्-विद्यमानो वा भावः सद्भाव इत्यर्थः ॥ ५ संघेजमाणो आ० ॥ ६ क्वाणी डे. ल. ॥ ७ सुसवण चूर्णी पाठान्तरम् ॥ ८ वाणी डे. ल. ॥९ वाणी डे. ल.॥ १०'गणी हे. ल.॥ ११ चत्वारिंशत्तमगाथानन्तरं P प्रति विहाय सर्वासु सूत्रप्रतिषु गाथेयमधिकोपलभ्यते-- तव-नियम-सच्च-संजम-विणय-उजव-खंति-मद्दवरयाणं । सीलगुणगहियाणं अणुओगजुगप्पहाणाणं ॥ अत्र “ गद्दियाणं' इति 'गर्दिताना' ख्यातानाम्" इति आवश्यकदीपिकाकृता व्याख्यातमस्ति । एतद्गाथाविषये जेसू० प्रती " एषाऽपि गाथा न वृत्तौ कुतश्चित् " इति टिप्पणी वत्तते ॥ १२ पडि मु० ॥ १३ खाणी, दूसगणि ति संब आ० ॥ Jain Education Intemational Page #47 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जिणदासगणिमहत्तरविरइयाए चुण्णीए संजुयं [मु. ६-७ गा. ४२-४३ कहणं ति-अक्खेवमादियाहि कहाहिं धम्मकहणं । तत्थ कुद्धाण वि आगताणं तस्स वाणी वाणिं जणेति, किमंग पुण धम्मस्सवण?मागताणं ?। अहवा पाढो–“मुसवण" ति तत्थ सत्रण त्ति-कण्णा, तेस मुहं जणेइ त्ति सुस्सवणा, एवं हकारलोवातो भण्णति । अहवा मुस्मरणा सुहस्रवा इत्यर्थः। सेसं कंठं ॥४०॥ इमा वि दुस्सगगिणो चेव चलणथुती सुकुमाल० गाहा । पवयणं-दुवालसंगं गणिपिडगं जम्स अत्थि सो पावयणी, गुरवो त्ति कातुं बहुवयणं भणितं । सेसं कंठं ॥४१॥ एस णमोकारो आयरिययुगप्पहाणपुरिसाणं विसेसग्गहणातो कतो। इमा पुण [जे० १९१ प्र० सामण्णतो मुतविसिट्ठाण केज: जे अण्णे भगवंते कालियसुयआणुओगिए धीरे । ते पणमिऊण सिरसा णाणस्स पैरूवणं वोच्छ ॥ ४२ ॥ ॥ थेरावलिया मम्मत्ता ॥ जे अण्णे० गाहा । कंठा ॥४२॥ एतं च नाणपरूवणज्झयणं अरिहस्स देजति, णो अणरिहम्स देज्जइ । जतो भणितं [सुत्तं ६ ] सेलघण १ कुडग २ चालणि ३ परिपूणग ४ हंस ५ महिस ६ मेसे ७ य । मसग ८ जलूग ९ बिराली १० जाहग ११ गो १२ मेरि १३ आभीरे ॥४३॥ सा समासओ तिविहा पण्णत्ता, तं जहा-जाणिया १ अजाणिया २ दुब्बियड्ढा ३।" ६. सेलघण० गाहा । एत्थ अरिहा इमे कुडेमु-अप्पसत्यवम्मसारिच्छा, पसत्यभावितेसु य अवम्मसारिच्छा। तहा हंस-मेस-जलूग-जाहगसारिच्छा अरिहा, गो-भेरी-आभीरेसु य पसत्थोवणतोवणीता अरिहा । सेसा अणअरिहा ॥४३॥ इमस्स य नाणपरूवणज्झयणस्स परूवणे परिसा जाणिगाइ तिविहा जाणितया । तत्थ जाणियागुण-दोसविसेसण्ण अणभिम्गहिता य कुम्मुइ-मतेसु । सा खलु जाणगपरिसा गुणतत्तिल्ला अगुणवज्जा ॥१॥ कल्पभा. गा. ३६५ ] १ किजह दा०॥ २ वंदिऊण सं। बंदितूण P॥ ३ परूयणं खं०॥ ४ आमीरी सर्वास्वपि सूत्रप्रतिषु । एष एव पाठः श्रीहरिभद्र-मलयगिरिभ्यां व्याख्यातोऽस्ति ॥ ५ एनत्सूत्रानन्तरं जे. डे. मो० शुसं० मु० प्रतिषु चूर्णि-वृत्तिकृद्रिव्याख्यातोऽधिकोऽयं प्रक्षिप्तः सूत्राभासः पाठ उपलभ्यते-- जाणिमा जहा खीरमिव जहा हंसा जे घुटुंति इह गुरुगुणसमिद्धा । दोसे य विवज्जंती तं जाणसु जाणिय परिसं॥ अजाणिआ जहा जा होइ पगइमहुरा मियछावय-सीह-कुक्कुडगभूया । रयणमिव असंठविया अजाणिया सा भवे परिसा ॥ दुब्धियड्ढा जहा' न य कत्थइ निम्माओ न य पुच्छह परिभवस्स दोसेण । वत्थि व्व वायपुण्णो फुड गामेलयवियदो ॥ एतत्पाठविषये जेसू. प्रतावियं टिप्पणी केनापि विदुषा टिप्पिता दृश्यते-“जाणियेत्यारभ्य एतद् गाथात्रयं वृत्तौ न व्याख्यातम् , अतोऽन्यकर्तृक सम्भाव्यते ।" इति ॥ ६ आभीरीसु आ.॥ Jain Education Intemational Page #48 -------------------------------------------------------------------------- ________________ परिसा णाणपरूवणा य] सिरिदेववायगविरइयं णंदीमुत्तं । इमा अजाणियापगतीमुद्धमजाणिय मियछावय-सीह-कुकुरगभूता । रयणमित्र असंठविता सुहसण्णप्पा गुणसमिद्धा ॥२॥ [कल्पभा. गा. ३६७] इमा दुब्बियड्ढाकिंचिम्मत्तग्गाही पल्लवगाही य तैरियगाही य । दुवितड्ढिया उ एमा भणिता तिविद्या भवे परिसा ।। ३॥ , [कल्पभा. गा. ३६९ ] एत्य नाणिया अनाणिया य अरिहा ॥ एवं कतमंगलोवयारो थेरावलिकमे य दंसिए अरिहेमु य दंसितमु दुम्सगणिसीसी देववायगो साहुनणहितद्वाए इणमाह - ७. णाणं पंचविहं पण्णत्तं, तं जहा-आभिणिबोहियणाणं १ सुयणाणं २ ओहिणाणं ३ मणपज्जवणाणं ४ केवलणाणं ५। 10 ७. नाणं आदि । अस्य व्याख्या-जाती णाणं-अवबोहमेतं, भावसाधणो। अहवा गज्जइ अणेणेति नाणं, खयोवसा इएण वा भावेण जीवादिपदत्था णजंति इति णाणं, करणसाधणो। अहवा णजति एतम्हि ति णाणं, नाणभावे जीवो त्ति, अधिकरणसाहणो। पंच इति संखा। विधिरिति भेदो। पण्णत्तं पण्णवितं प्ररूपितमित्यनर्थान्तरम् , अत्थतो तित्थकरेहि, मुत्ततो गणधरेहिं । अहवा पण्णा-बुद्धी, पहाणपण्णेण अवाप्तं पण्णत्तं, सम्मदिटिणा लद्धमित्यर्थः। अहवा पहाणपण्णातो अवाप्तं पण्णनं, तित्थकरसमीयातो गणधरेहिं 15 लद्धं ति वुत्तं भवति । अहवा पण्णा-बुद्धी, तीए अवाप्तं पण्णत्तं, तित्थकर-गणधरा-ऽऽयरिएहिं कहिजंतं [जे० १९१ द्वि०] बुद्धाए पण्णत्तामात । तादत्तणण आधिकतत्थं नाणं संवज्झति । जे पुन्चमाणात्था पंचा मभ्युपगमे जहासदो। अत्याभिमुहो णियतो बोधो अभिनिवोधः, स एव स्वार्थिकप्रत्ययोपादानादाभिनिवोधिकम् । अहवा अभिनियोधे भवं, तेण निव्वत्तं, तम्मतं तप्पयोयणं वाऽऽभिणिवोधिकं । अहवा आता तदभिनिबुज्झए, तेण वाऽभिणिबुज्झते, तम्हा वाऽभिणि बुझते, तम्हि वाऽभिनिबुझए इत्ततो आभिनियोधिकः । स एवाऽऽभि- 20 णिवोधिकोपयोगातो अनन्यवादाभिनिवोधिकम् १। तहा तच्छृणोति, तेण वा मुणेति, तम्हा वा सुणेति, तम्हि वा मुणेतीति मुतं । आत्मैव वा श्रुतोपयोगपरिणामादनन्यत्वाच्छृणोतीति श्रुतम् २। अवधीयते इति अवधिः, तेण वाऽवधीयते, तम्हि वाऽवधीयते, अवधाणं वा अवधिः, मर्यादेत्यर्थः । ताए परंपरोपणिवंधणातो दबादतो अवधीय(यं)त इति अवधी ३। परि-सव्वतोभावेण गमणं पजवणं पज्जवः, मणसि मणसो वा पज्जयो मणपजवी, स एव नाणं मणपज्जवनाणं । तहा पजयणं पन्जयः, मणसि मणसो वा पन्जयः मनःपर्ययः, स 25 एव नाणं मणपज्जयणाणं । तहा आयो पावणं लाभो इत्यनान्तरम् , सचतो आतो पजातो, मणसि मणसो वा पज्जायो मणपजायो, स एव नाणं मणपज्जव(?पज्जाय)णाणं । अहवा मणसि मणसो वा पन्जवा मणपज्जवा, तेसिं तेमु वा नाणं मणपजवनाणं । तहा मणसि मणसो वा पजया [मणपजया], तेसिं तेसु वा नाणं मणपज्जयनाणं । गमणपरावत्तेगो लाभो भेदा य बहुपरावत्ता । मणपजवम्मि नाणे णिरुत्तवयणऽत्य पंचेते ॥१॥४। ] 30 जेनि प्रगयमुद्धा मिग' इति कल्पभाष्ये ॥ २ तुरिय आ० दा• ॥ ३ सतदिट्टिणा आ• ॥ ४ तदित्यनेन अधिकृतार्थम् इत्यर्थः । “तं जहा' इति सूत्रांशे विद्यमानं 'तद्' इति पदमनुलक्ष्येदं वचनम् ॥ ५ इत्यतः इत्यर्थः॥ Jain Education Intemational Jain Education Intermational Page #49 -------------------------------------------------------------------------- ________________ १४ जिणदासगणिमहत्तरविरझ्याए चुण्णीए संजुयं [सु० ८-१४ "केवलमेगं सुद्धं सकलमसाधारणं अणंतं च ।" [विशेषा. गा० ८४ ] इत्यर्थः ५। नाणसहो य सम्बत्थाऽऽभिनिबोधिकादीण समाणाधिकरणो [जे० १५२ प्र०] दट्टयो, तं जहा-आभिनिबोधिकं च तं नाणं च आभिनिबोधिकनाणं । एवं सम्वेमु देदुन्छ । पुच्छा य-किमेस मतिनाणादियो कमो ? एत्थ उत्तरं भण्णति-एस सकारणो उवण्णासो । इमे य ते कारणा-तुल्लसामित्तणतो सबकालाविच्छेदहितत्तणतो इंदिया ऽणिदियणिमित्त5 तणतो तुल्लकवतोवसमकारणतणतो सम्बदव्यादिविसयसामण्णतणतो परुकत्वसामन्नत्तणओ य तब्भावे य सेसणाणसंभवातो अतो आदीए मति-मुताई कताई। तेसु वि य “मतिपुचतं मुतं" [मुत्तं ४३ ] ति पुव्वं मतिणाणं कतं, तस्स य पिट्टतो मुतं ति । अहवा इंदिया-ऽणिदियनिमित्तत्तणमविसिटे वि मति-सुतेसु परोवदेसत्तणमेत्तभेदातो अरिहंतवयणकारणतणतो य मतिविसेसत्तगतो य सुतस्स मतिअगंतरं मुतं ति । मति-सुयसमाणकालत्तणतो मिच्छ इंसणपरिग्गहत्तणतो तन्वित्रजयसाहम्मत्तणतो सामिसाहम्मत्तर्णतो य कत्थइ कालेगलाभत्तणतो य मति-मुताणंतरं 10 अवधि त्ति भणितो । ततो य छउमत्थसामिसामग्णत्तणतो य पुग्गलसियसामण्णतणतो य खयोवसमभावसाम ण्णतणतोय पच्चक्खभावसामण्णतणतो य अबहिसमणंतरं मणपज्जवनाणं ति। सवनाणुत्तमत्तणतो सबविसुद्धत्तणतो य विरतसामिसामण्णत्तणतो य सव्यावसाणलाभत्तणतो य सव्वुत्तमलद्धित्तणओ य तदंते केवलं भणितं ।। ८. तं समासओ दुविहं पण्णत्तं, तं जहा-पच्चक्खं च परोक्खं च । ८. सव्वं पेतं समासतो दुविधं-पञ्चकग्वं च परोक्खं च० इत्यादि । इह अप्पवत्तव्बत्तणतो पुव्वं पञ्चक्खं 15 पण्णविजति । इह जीवो अक्रवो । कहं ? उच्यते-"अशू व्याप्तौ" इति, णाणप्पणताए अत्थे असइ ति इच्चेवं जीवो अक्खो, णाणभावेण वावेति त्ति भणितं भवति । अहवा “अश भोजने" इच्चेतस्स वा सव्वत्थे असइ त्ति अक्रवो, पालयति भुङ्क्ते चेत्यर्थः । अक्खं पति वट्टति त्ति पञ्चक्खं, अणिदियं ति वुत्तं भवति । चसदाओ य से अवधिमादिभेदा दट्टव्वा । अक्खातो [जे० १९२ द्वि० परेसु जं णाणं उप्पजति तं परोक्खं सभेदं चसदाओ इंदिय-मणोनिमित्तं दट्टयमिति । 20 ९. से किं तं पञ्चक्खं ? पञ्चक्खं दुविहं पण्णतं, तं जहा-इंदियपञ्चक्खं च णोईदियपञ्चक्खं च । १०. से कि तं इंदियपचक्खं ? इंदियपच्चक्खं पंचविहं पण्णत्तं, तं जहा-सोइंदियपच्चक्खं चक्खिदियपच्चक्खं घाणिदियपचक्खं रसणेंदियपच्चक्खं फासिदियपञ्चक्खं । से तं इंदियपच्चक्खं । 25 ९. से किं तं पञ्चकग्वं ? पुच्छा । 'से' ति स पञ्चकरखनाणभेदो । 'किं तं' ति परिपण्हे, कतिभेदं ति वुत्तं भवति । तं च किंसरूवं ? ति आयरियो पभेदमुवण्णसितुं तस्सरूवकहणेण पञ्चक्खसरूवं कहितुकामो आह–पञ्चक्खं दुविहं पण्णत्तं ति। १०. इंदियं ति-पुग्गलेहि संठाणणिवत्तिरूवं दबिंदियं, सोइंदियमादिइंदियाणं सव्वातप्पदेसेहिं स्वावरणक्खतोवसमातो जा लद्धी तं भाबिंदियं, तस्स पञ्चक्खं ति इंदियपञ्चक्खं । तं पंचविहं । पर आह-णणु १ वत्तव्वं मो० ॥ २ 'ट्टितित आ० ॥ ३ 'तत्तेण अविसिट्टे वि सति सुते वि परों आ०॥४णतो सम्मत्ताइकाले आ० ॥ ५ घेत्यर्थः आ०॥ ६ परोक्खं, तं चेदं, चस आ० ॥ ७ चक्टुंदिय सं० ॥ ८ जिभिदिय मो० मु०॥ Jain Education Intemational Page #50 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आणुगामियं अणाणुगामियं च ओहिणाणं] सिरिदेववायगविरइयं णंदीमत्तं । दनिदियावत्थियपदेसमेत्तग्गहणतो सेसप्पदेसेमु अणुवलद्धी खयोवसमनिरत्थता वा भवति । आयरिय आह-ण एवं, पदीवदिटुंतसामत्थतो, जहा चतुसालभवणेगदेसजालितो पदीयो सव्वं भवणमुज्जोवेति तहा दबिंदियमेत्तपदेसविसयपडिवोधओ सव्वातप्पदेसोवयोगत्थपरिच्छेययो खयोपसमसाफल्लया य भवति त्ति ण दोसो। भाविंदियोवयारपञ्चकावत्तणतो एतं पञ्चकवं, परमत्थओ पुण चिंतमाणं एतं परोक्वं । कम्हा ? जम्हा परा दबिंदिया, भार्विदियम्स य तदायत्तप्पणतो॥ ११. से किं तं णोइंदियपच्चक्खं ? णोइंदियपच्चक्खं तिविहं पण्णत्तं, तं जहा-ओहिणाणपञ्चक्खं १ मणपज्जवणाणपञ्चक्खं २ केवलणाणपञ्चक्खं ३ । १२. से किं तं ओहिणाणपञ्चक्खं ? ओहिणाणपचक्खं दुविहं पण्णतं, तं जहाभवपञ्चतियं च खयोवसमियं च । दोन्हं भवपञ्चतियं, तं जहा-देवाणं च णेरतियाणं च । दोन्हं खयोवसमियं, तं जहा-मणुस्साणं च पंचेंदियतिरिक्खजोणियाणं च ।। ११-१२. णोइंदियपञ्चक्खं ति इंदियातिरित्तं । तं तिविहं ओहिमादी। अवहि त्ति-मजाया, सा य रूविदव्वेसु त्ति, "रूविस्सऽवधे" [तत्वा. अ. ९ सू. २८ ] त्ति वयणातो, तेसु णाणं ओहिनाणं । 'भवपञ्चईतो' त्ति भणिते भण्णति-णणु ओधी खयोवसमिते भावे, गरगादिभवो से उदइए भावे, कहं भवपच्चइतो भण्णति ? त्ति, उच्यते-सो वि खयोवसमितो चेव, किंतु सो चेव खयोक्समो गरग-देवभवेसु अवस्सं भवति त्ति, दिहतो पक्खीणं आगासगमणं व, एवं भवपञ्चइतो भण्णति । खयोवसमियं पुण णर-तिरियाणं, तेसु णावस्सं उप्पजति 15 त्ति खयोवसममवेक्खति ॥ ग्वयोवसमसरूवं च सुत्तेणेव [जे० १९३ प्र० j भणितं १३. को हेऊ खायोवसमियं ? खायोवसमियं तयावरणिज्जाणं कम्माणं उदिण्णाणं खएणं अणुदिणाणं उवसमेणं ओहिणाणं समुप्पज्जति । अहवा गुणपडिवण्णस्स अणगारस्स ओहिणाणं समुप्पज्जति । १३. को हेतु त्ति इच्चादि । सो य खयोवसमो गुणमंतरेण गुणपडिवत्तितो वा भवति । गुणमंतरेण जहा 20 गगणभच्छादिते अहापवत्तितो छिद्देणं दिणकरकिरण व विणिस्सिता दवमुजोवंति तहाऽवधिावरणखयोवसमे अवधिलंभो अधापत्तितो विष्णेतो। गुणपडिवत्तितो- गुणपडिवण्ण. इत्यादि । उत्तरुत्तरचरणगुणविमुज्झमाणमवेक्ग्वाती अवधिणाण-दसणावरणाण खयोवसमो भवति । तक्खयोवसमे य अवधी उप्पज्जति ॥ १४. तं समासओ छम्विहं पण्णत्तं, तं जहा-आणुगामियं १ अणाणुगामियं २ 25 वड्ढमाणयं ३ हायमाणयं ४ पडिवाति ५ अपडिवाति ६ । १४. आणुगामियं ति । अणुगमणसीलो अणुगामितो, तदावरणखयोवसमाऽऽतप्पदेसविसुद्धगमणत्तातो लोयणं व ॥ १ सूत्रमिदं प्रश्न निर्वचनात्मकमपि उपलभ्यते-से किं तं भवपञ्चइयं ? २ दुण्हं, तं जहा-देवाण य रहयाण य । से कि तं स्वयोवसमियं? २ दुण्ड, तं जहा-मणूसाण य पंचेंदियतिरिक्खजोणियाण य । जे. मो० डे. मु. । किञ्चचूर्णि-वृत्तिकृतां नेदं पश्नोत्तरात्मकं सूत्रं सम्मतम् ॥ २ इयं' ति आ. दा० ॥ ३ दियाणं खं० ॥ Page #51 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जिणदासगणिमहत्तरविरड्याए चुण्णीए संजय [सु० १५-२३ १५. से कि तं आणुगामियं ओहिणाणं? आणुगामियं ओहिणाणं दुविहं पण्णत्तं, तं जहा-अंतगयं च मज्झगयं च । १५. अंतगयं ति। जहा जलंतं वणंतं पचतंतं, अविसिट्ठो अंतसद्दो। एवं ओरालियसरीरंते ठितं गतं ति एगढ़, तं च आतप्पदेसफड्डगावहि, एगदिसोवलंभाओ य अंतगतमोधिण्णाणं भण्णति । अहवा सव्वातप्पदेसविसुद्धेमु वि 5 ओरालियसरीरेगतेण एगदिसिपासणगतं ति अंतगतं भण्णति । अहया फुडतरमत्थो भण्णति-एगदिसावधिउवलद्ध खेत्तातो सो अवधिपुरिसो अंतगतो त्ति जम्हा तम्हा अंतगतं भण्णति । मज्झगतं पुण ओरालियसरीरमज्झे फड्डगविमुद्रीतो सव्वातप्पदेसविमुद्रीतो वा सव्वदिसोवलंभत्तणतो मज्झगतो ति भण्णति । अहवाऽवधिउवल खेत्तस्स वा अवधिपुरिसो मझगतो ति अतो वा मज्झगतो भण्णति ॥ १६. से किं तं अंतगयं ? अंतगयं तिविहं पण्णत्तं, तं जहा-पुरओ अंतगयं १ 10 मग्गओ अंतगयं २ पासतो अंतगयं ३ । १७. से किं पुरतो अंतगयं ? पुरतो अंतगयं से जहानामए केइ पुरिसे उक्कं वा चुडलिअंवा अलाय . मणे वा जोई वा पदी वा पुरओ काउं पणोलेमाणे पणालेमाणे गच्छेज्जा । से तं पुरओ अंतगयं । ___ १८. से किं तं मग्गओ अंतगयं ? मग्गओ अंतगयं से जहाणामए केइ पुरिसे 15 उकं वा चुडलियं वा अलायं वा मणिं वा जोई वा पईवं वा मग्गओ काउं अणुकड्ढेमाणे अणुकड्ढेमाणे गच्छेज्जा । से तं मग्गओ अंतगयं २। १९. से कि तं पासओ अंतगयं ? पासओ अंतगयं से जहाणामए केइ पुरिसे उकं वा चुडलियं वा अलायं वा मणिं वा जोई वा पईवं वा पासओ काउं परिकड्ढेमाणे परिकड्ढेमाणे गच्छेज्जा । से तं पासओ अंतगयं ३ । से तं अंतगयं । 20 २०. से किं तं मज्झगयं ? से जहानामए केइ पुरिसे उकं वा चुडलियं वा अलायं वा मणिं वा जोई वा पईचं वा मत्थए काउं गच्छेज्जा । से तं मज्झगयं । १६-२०. उक्क त्ति-दीविया । चुडलि ति-तणपिडी अग्गे पज्जलिता । अलातं ति-दारुयं जलंत । मणिं वा जलंतं । जोइ ति-मल्लगादिठितं अगणिं जलंतं । पदीयो त्ति-दीवतो । 'पुरतो' ति अग्गतो 'पणोलणं' ति १ सं० प्रती १६-१९ सूत्रषु सर्वत्र अन्तगयं इति परसवर्णान्वितः पाठो दृश्यते ॥ २१७-१९ सूत्रषु चढलिअं इति पाठः जे. मो० ॥ ३ अत्र १७-१९ सूत्रेषु बलि अम्वा अलायम्बा पदीवम्वा मणिम्वा जोतिम्वा इतिरूपः पाठः खं० प्रती वर्तते ॥ ४१७-१९ सूत्रेषु अलायं वा पदीवं वा मणि वा जोति वा पुरतो इति पाठः सर्वास्वपि सूत्रप्रतिषु दृश्यते । न खलु चूर्णि-वृत्तिकृत्सम्मतः पाठः कुत्राप्यादर्श उपलभ्यते तथापि व्याख्याकृन्मतानुसारेणास्माभिः परावृत्त्य मूले पाठ उद्धृतोऽस्ति । अलायं वा मणि वा पदीयं वा जोतिं वा पुरओ इति मु. पाठस्तु नास्मत्समीपस्थेषु आदर्शेषु ईक्ष्यते ॥ ५ काउं समुब्वहमाणे समुन्वहमाणे गच्छिज्जा जे० मो० मु.॥ Jain Education Intemational Page #52 -------------------------------------------------------------------------- ________________ १७ अगाणुगामियं वड्दमागय च ओहिणाणं ] सिरिदेववायगविरइयं णंदीमुत्तं । "णुद प्रेरणे" इत्थगहितस्स दंडग्गहितस्स वा परंपरेण नयनमित्यर्थः । 'मग्गतो' ति पिद्वतो 'अणुकड्ढणं' ति इत्थग्गहितस्स दंडग्गडितस्स वा अणु-पच्छयो कड्ढणं ति । 'पासतो' त्ति दाहिणे वामे वा पासे सा(दो)पासय[जे० १९३ द्वि० जमलहितं । परिकड्वियं ति-हत्थ-डंडगट्टितं वा परि-पासतो द्वितस्स कड्ढणं परिकड्दणं ॥ सीसो पुच्छति २१. अंतगयस्स मज्झगयस्स य को पइविसेसो ? पुरओ अंतगएणं ओहिनाणेणं 5 पुरओ चेव संखेज्जाणि वा असखेज्जाणि वा जोयणाणि जाणइ पासइ, मैग्गओ अंतगएणं ओहिनाणेणं मग्गओ चेव संखेज्जाणि वा असंखेज्जाणि वा जोयणाणि जाणइ पासइ, पासओ अंतगएणं ओहिणाणेणं पासओ चेव संखेज्जाणि वा असंखेज्जाणि वा जोयणाई जाणइ पासइ, मज्झगएणं ओहिणाणेणं सव्वओ समंता संखेज्जाणि वा असंखेज्जाणि वा जोयणाई जाणइ पासइ । से तं आणुगामियं ओहिणाणं । 10 २१. अंतगतस्म मादि। आयरियाऽऽह-पुरंतो० इच्चादि। 'सव्वतो ति सव्वासु वि दिसि-विदिसामु 'समंता' इति सव्वातप्पदसम सम्वेसु वा विसुद्धफड्डगे। अहवा 'सव्वतो' तिसव्वासु दिसि-विदिसासु सव्वातप्पदेसफड्डगेमु य । 'से' इति निद्देसे अवधिपुरिसस्स, 'मंता' इति णाता। अहवा “समत्ता" इति समं-दव्वादयो तुल्ला अत्ता इति-प्राप्ता इत्यर्थः ॥ ___२२. से किं तं अणाणुगामियं ओहिणाणं ? अणाणुगामियं ओहिणाणं से जहा- 15 णामए केइ पुरिसे एग महंतं जोइट्ठाणं काउं तस्सेव जोइट्ठाणस्स परिपेरंतेहिं परिपेरंतेहि परिघोलेमाणे परिघोलेमाणे तमेव जोईट्टाणं पासइ, अण्णत्थ गए ण पासइ, एंवमेव अणाणुगामियं ओहिणाणं जत्थेव समुप्पज्जइ तत्थेव संखेज्जाणि वा असंखेज्जाणि वा संबद्धाणि वा असंबद्धाणि वा जोयणाइं जाणइ पासइ, अण्णय गए ण पासइ । से वं अणाणुगामियं ओहिणाणं ।। 20 २२. णो गच्छंतमणुगच्छति ति अणाणुगामिकं, संकलापडिबद्धद्वितप्पदीवो व्च, तस्स य खेत्तावेक्खखयोवसमलाभत्तणतो अणाणुगामित्तं । परंतं ति-समंततो अगणिमासण्णं, तस्स य जोइस्स सव्वतो दिसि-विदिसासु समंता परिघोलणं ति-पुणो पुणो इतो इतो परिसक्कणं ॥ २३. से किं तं वड्डमाणयं ओहिणाणं ? वड्डमाणयं ओहिणाणं पैसत्थेसु अन्झ१ पासे दोसु वा सयं जम आ० दा० ।। २ मग्गमो अंतगएणं० इत्यादिसूत्रांशः पासओ अंतगपणं० इत्यादिगूत्रांशश्च खं० सं० प्रत्योः पूर्वापरक्रमव्यत्यासेन वर्तते ॥ ३ समत्ता इति पाठभेदचूर्णी निर्दिष्टोऽस्ति ॥ ४ “सव्वायप्पएसेसु इत्यादौ तृतीया सप्तमी " इति नन्दिवृत्तौ श्रीमलयगिरिपादरेतत्पाठोद्धरणे व्याख्यातमस्ति पत्र ८५-२ ।। ५-६-११ ओहिन्नाणं हे. ल. ॥ ७-८ अगणिट्ठा खं० सं० ल• शु० ॥ ९ सर्वासु सूत्रप्रतिषु अत्र जोइट्ठाणं इत्येव पाठो वर्तते ॥ १० पवामेव मु० ॥ १२ अगणिपासेणं, तस्स आ• । अगणिपासणं, तस्स दा• ॥ १३ पसस्थेहिं अज्झवसाणहाणेहिं खं० मो० ॥ चु०३ Jain Education Intemational Page #53 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जिणदासगणिमहत्तरविग्इयाए, चुण्णीए संजुयं [सु० २३-२७ गा. ४४-५१ वसाणट्ठाणेसु वट्टमाणस्स वट्टमाणचरित्तस्स विसुज्झमाणस्स विसुज्झमाणचरित्तस्स सव्वओ समंता ओही वड्डइ । जावतिया तिसमयाहारगस्स सुहुमस्स पणगजीवस्स । ओगाहणा जहन्ना ओहीखेत्तं जहन्नं तु ॥४४॥ सव्वबहुअगणिजीवा णिरंतर जत्तियं भरेज्जंसु । खेत्तं सव्वदिसागं परमोही खेत्तनिद्दिट्ठो ॥ ४५ ॥ अंगुलमावलियाणं भागमसंखेज्ज दोसु संखेज्जा । अंगुलमावलियंतो आवलिया अंगुलपुहत्तं ॥ ४६ ॥ हत्थम्मि मुहत्तंतो दिवसंतो गाउयम्मि बोद्धव्यो। जोयण दिवसपुहत्तं पक्वतो पण्णवीसाओ ॥४७॥ भरहम्मि अद्धमासो जंबुद्दीवम्मि साहिओ मासो । वासं च मणुयलोए वासपुहत्तं च रुयगम्मि ॥४८॥ संखेज्जम्मि उ काले दीव-समुद्दा वि होंति संखेज्जा । कालम्मि असंखेज्जे दीव-समुद्दा उ भइयव्वा ॥४९॥ काले चउण्ह वुड्डी कालो भइयव्वु खेत्तवुड्डीए । वुड्डीए दव्व-पज्जव भइयव्वा खेत्त-काला उ ॥ ५० ॥ सुहुमो य होइ कालो तत्तो सुहुमयरयं हवइ खेत्तं । अंगुलसेढीमेत्ते ओसप्पिणिओ असंखेज्जा ॥ ५१ ॥ से तं वड्डमाणयं ओहिणणं । 20 २३. वर्धनं वड्ढी, पुवावत्थातो उवरुवरि वड्ढमाणं ति, तं च उस्सण्णं चरणगुणविसुद्धिमपेख, ततो पसत्यज्झवसाणट्ठाणा तेआदिपसत्थलेसाणुगता भवंति, पसत्थदव्वलेसाहि अणुरंजितं चित्तं पसत्थज्झवसाणो भण्णति, पसत्यज्झवसाणातो य चरणा-ऽऽतविमुद्धी, चरणा-ऽऽतविसुद्धीतो य चरणपञ्चतलद्धीणं वड्ढी भवति । इमाओ य जहण्णुकोस-विमज्झिमोधिवड्डिदंसणगाहाओ जहा पेढियाँए ॥ ४४-५१ ॥ १'सायट्ठा सं• ॥२ वड्ढमाण ल. ॥ ३ वीसं तु ल । वीसंतो ३० ॥ ४ वि शु० । य मो•॥५ णाणयं से. ॥ ६ क्सत्तणतो पसत्थं आ० दा० ॥ ७ आवश्यकनियुक्तिपीठिकायां गाथाः ३०-३० ॥ Page #54 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 5 वड्ढमाणयाइ ओहिणाणं तन्भेया य] सिरिदेववायगविरइयं णंदीयुत्तं । १९ २४. से किं तं हायमाणयं ओहिणाणं ? हायमाणयं ओहिणाणं अप्पसत्थेहि अज्झवसायट्ठाणेहिं वट्टमाणस्स वट्टमाणचरित्तस्स संकिलिस्समाणस्स संकिलिस्समाणचरितस्स सव्वओ समंता ओही परिहायति । से तं हायमाणयं ओहिणाणं । २४. हाणि त्ति-हस्समाणं, पुलावत्थातो अधोऽधो इम्समागं । तं च वड्ढमाणविपकवतो भाणितव्वं । अप्पसत्यलेस्सोवरंजितं चित्तं अणेगामुभत्थचिंतणपरं चित्तं संकिलिष्टुं भष्णति ।। २५. से किं तं पडिवाति ओहिणाणं ? पडिवाति ओहिणाणं जण्णं जहण्णेणं अंगुलस्स असंखेजतिभागंवा संखेज्जतिभागं वा वालग्गं वा वालग्गपुंहत्तं वा लिक्खं वा लिक्खपुहत्तं वा जूयं वा जूयपुहत्तं वा जवं वा जवपुहत्तं वा अंगुलं वा अंगुलपुहत्तं वा पायं वा पायपुहत्तं वा वियत्थिं वा वियस्थिपुहत्तं वा स्यणि वा स्यणिपुहत्तं वा कुच्छि वा कुच्छिपुहत्तं वा धणुयं वा धणुयपुहत्तं वा गाउयं वा गाउयपुहत्तं वा जोयणं वा जोयणपुहत्तं वा जोयणसयं वा जोयणसय- 10 पुहत्तं वा जोयणसहस्सं व. गोयणसहस्सपुहत्तं वा जोयंणसतसहस्सं वा जोयणसतसहस्सपुहत्तं वा जोयणकोडिं वा जोयणकोडिपहत्तं वा जोयणकोडाकोडिं वा जोयणकोडाकोडिपुहतं वा उकोसेण लोगं वा पासित्ता णं पडिवएज्जा । से तं पडिवाति ओहिणाणं । २५. उप्पण्णोहिनाणस्स पुणो पातो त्ति पडिवाती, नाशेत्यर्थः । तं च खेत्तविसेसोवलंभेणं भण्णति । ते य इमे-असंखेयंगुलभागादिया । दुप्पभिति जाव णव त्ति अंगुलपुढत्तं भष्णति । दो हत्था कुच्छी। पडिवातिणो 15 जाव उक्कोसो लोगमेत्तै एव ।। २६. से किं तं अपडिवाति ओहिणाणं ? अपडिवाति ओहिणाणं जेणं अलोगस्स एगमवि आगासपैदेसं पासेज्जा तेण परं अपडिवाति ओहिणाणं । से तं अपडिवाति ओहिणाणं । ____ २६. अपडिवाति त्ति, सो वि क्खेत्तविसेसोवलंभातो चेद णज्जति, अतो भण्णति अलोगस्स एगमवि त्ति । 20 'वि' पदत्यसंभावणे, किमुत दुपदेसादिउपलंभे ? इत्यर्थः । [जे० १९४ प्र० ॥ २७. तं समासओ चउन्विहं पण्णत्तं, तं जहा-दबओ खेतओ कालओ भावओ। तत्थ दवओ णं ओहिणाणी जहण्णेणं अणंताणि रूविदव्वाइं जाणइ पासइ, उक्कोसेणं १ अप्पसत्येसु अज्झवसायट्ठाणेसुं सं० ॥ २ ओही हायति खं० सं० जे० मो० ॥ ३ गासुतत्थ जे० ॥ ४-५ 'जयभा जे• मु० ॥ ६ पुहुत्त पुहत्त पहुत्त शब्दाः सर्वास्वपि सूत्रप्रतिषु क्रमपरिहारेण आवृत्त्या दृश्यन्ते ॥ ७ विहत्थि वा विहस्थि मो० मु० ॥ ८ धणुं वा घणु जे० मो० मु० ॥ ९ जोयणलक्खं वा जोयणलक्खपुहत्तं जे. मो. मु. ॥ १० →- एतचिह्नमध्यगतः पाठः खं.. नास्ति ॥ ११ मेत्तर वा आ० दा० ॥ १२ सं० विनाऽन्यत्र-पदेसं पासति तेण खं० शु० । पदेसं जाणह पासइ तेण जे० डे. ल. मो० ॥ १३ अविपदत्थो संभा आ• दा० ॥ १४ तत्थ इति खं. सं. ल. शु० नास्ति ।। Jain Education Intemational Page #55 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जिणदासगणिमहत्तरविरड्याए चुण्णीर संजुयं [सु० २८-२९ गा. ५२ सव्वाई रूविदव्वाई जाणइ पासइ १। खेत्तओ णं ओहिणाणी जहण्णेणं अंगुलस्स असंखेज्जतिभागं जाणइ पासइ, उक्कोसेणं असंखेज्जाइं अलोए लोयमेत्ताई खंडाई जाणइ पासइ २। कालओ णं ओहिणाणी जहण्णेणं आवलियाए असंखेज्जतिभागं जाणइ पासइ, उक्कोसेणं असंखेज्जाओ उस्सप्पिणीओ अवसप्पिणीओ अतीतं च अणागतं 5 च कालं जाणइ पासइ ३। भावओ णं ओहिणाणी जहण्णेणं अणंते भावे जाणइ पासइ, उक्कोसेण वि अणते भावे जाणइ पासइ, सव्वभावाणमणंतर्भागं जाणइ पासइ ४ । २७. वित्थरेण खयोवसमविसेसतो असंखेजविधमोधिण्णाणं, ओधिमादिगतिपज्जवसाणं वा चतुइसविधवित्थरो, ते पड़च्च इमं चतुविहं समासतो भण्णति दव्यादि । दबो ओधिण्णाणी जहण्णेणं तेयाभासंतरे अणंते दवे उवलभति, उक्कोसतो सबरूविदन्वाइं । जाणई त्ति नाणं, तं च जं विसेसग्गाहगं तं जाणं, सागारमित्यर्थः । 10 पासति त्ति दंसणं, तं च जं सामण्णग्गाहगं तं दंसणं, अणागारमित्यर्थः । खेत्त-कालतो य सुत्तसिद्धं । भावतो ओधिण्णाणी जहण्णेणं अणंते भावे उवलभति, उक्कोसतो वि अणंते, जहण्णपदातो उक्कोसपदं अणंतगुणं । उक्कोसपदे वि जे भावा ते सव्वभावाण अणंतभागे वर्टेति ॥ २८. ओही भवपञ्चतिओ, गुणपञ्चतिओं य वैण्णिओ एसो । तैस्स य बहू वियप्पा, दव्वे खेत्ते य काले यं ।। ५२ ॥ 15 से तं ओहिणाणं । २८. ओधी भव० गाधा। दबतो बहू विगप्पा परमाणुमादिदव्वविसेसातो । खेत्ततो वि अंगुलअसंखेयभागविकप्पादिया । कालतो वि आरलियअसंखेज्जभागादिया । भावतो वि वण्णपज्जवादिया ॥५२॥ मणपज्जवनाणमिदाणि । तस्स सरूवं वण्णितमादीए [पत्रम् १३]। इदाणि सामी विसेसिज्जइ पुच्छुत्तरेहि २९. [१] से किं तं मणपज्जवणाणं ? मणपज्जवणाणे गं भंते ! किं मर्गुस्साणं 20 उप्पंज्जइ अमणुस्साणं ? गोयमा ! मणुस्साणं, णो अमणुस्साणं। [२] जइ मणु स्साणं किं सम्मुच्छिममणुस्साणं गन्भवतियमणुस्साणं ? गोयमा ! णो सम्मुच्छिममणुस्साणं, गब्भवतियमणुस्साणं। [३] जइ गम्भवकंतियमणुस्साणं किं कैम्मभूम १लोयप्पमाणमेत्ताई खं० सं० विना ।। २ ओसप्पिणीओ उस्सप्पिणीओ खं० सं०॥ ३ सेणं पि अणंते ख० ॥ ४ 'भागो खं० । चूर्णिकृतां हरिभद्रपादानां चायमेव पाठः सम्मतः ।। ५ " ओही खेत्त परिमाणे." इत्याद्यावश्यकनियुक्ति२७-२८गाथायुगलोक्तानि चतुर्दश द्वाराण्यत्रावबोद्धव्यानि ॥ ६ वणिओ दुम्विहो इति वृत्तिकृद्भया निर्दिष्टः पाठमेदः॥ ७ तस्सेय सं०॥ ८ द्वापञ्चाशत्तमगाथानन्तरं सर्वेधपि सूत्रादर्शषु हरिभद्ररिपाद-मलयगिरिचरणव्याख्याता एका गाथाऽधिका उपलभ्यते रतिय-देव-तित्थंकरा य ओहिस्सऽबाहिरा होति । पासंति सव्वओ खलु सेसा देसेण पासंति ॥ ९सम्म ओहि खे० ॥ १० णाणपश्चक्खं मु० ॥ ११ पुव्वसुत्तेहिं आ० ॥ १२ °णाणं भंते ! जे. मो० ॥ १३ मणसाणं सं. । एक्मग्रेऽपि अस्मिन् सूत्र (२९) सर्वत्र बेयम् ॥ १४ उप्पजह इति खं० सं० नास्ति ॥ १५ कम्मभूमि मो. मु० । एवमग्रेऽपि सर्वत्र अस्मिन् सूत्रे (२९) नेयम् ॥ Page #56 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ओहिण्णाणस्स भेया मणपज्जवगाणं च ] सिरिदेववायगविरइयं गंदीमुत्तं । गगम्भवतियमणुस्साणं अकम्मभूमगगब्भवतियमणुस्साणं अंतरदीवगगब्भवतियमणुस्साणं ? गोयमा ! कम्मभूमगगम्भवकंतियमणुस्साणं, णो अकम्मभूमगगम्भवकंतियमणुस्साणं, णो अंतरदीवगगम्भवभूतियमणुस्साणं । [४] जइ कम्मभूमगगन्भवतियमणुस्साणं कि संखेज्जवासाउयकम्मभूमगगब्भवतियमणुस्साणं असंखेज्जवासाउयकम्मभूमगगन्मवकंतियमणुस्साणं ? गोयमा! संखेज्जवासाउयकम्मभूमगगम्भवकंतियमणुस्साणं, णो 5 असंखेज्जवासाउयकम्मभूमगगब्भवतियमणुस्साणं। [५] जइ संखेज्जवासाउयकम्मभूमगगब्भवकंतियमणुस्साणं कि पज्जत्तगसंखेज्जवासाउयकम्मभूमगगब्भवतियमणुस्साणं अपज्जत्तगसंखेज्जवासाउयकम्मभूमगगम्भवकंतियमणुस्साणं ? गोयमा ! पज्जतगसंखेज्जवासाउयकम्मभूमगगम्भवकंतियमणुस्साणं, णो अपज्जत्तगसंखेज्जवासाउयकम्मभूमगगब्भवतियमणुस्साणं। [६] जइ पज्जतगसंखेज्जवासाउयकम्मभूमगगम्भकंतियमणुस्साणं 10 किं सम्मदिट्ठिपज्जत्तगसखेज्जवासाउयकम्मभूमगगम्भवकंतियमणुस्साणं मिच्छदिट्ठिपज्जतगसंखेज्जवासाउयकम्मभूमगगम्भवकंतियमणुस्साणं सम्मामिच्छदिट्ठिपज्जत्तगसंखेज्जवासाउयकम्मभूमगगब्भवतियमणुस्साणं? गोयमा ! सम्मदिट्ठिपज्जत्तगसंखेज्जवासाउयकम्मभूमगगब्भवकंतियमणुस्साणं, णो मिच्छद्दिट्ठिपज्जत्तगसंखेज्जवासाउयकम्मभूमगगब्भवकंतियमणुस्साणं, णो सम्मामिच्छदिट्ठिपज्जत्तगसंखेज्जवासाउयकम्मभूमगगन्भवतियमणु- 15 स्साणं। [७] जइ सम्मद्दिट्ठिपज्जत्तगसंखेज्जवासाउयकम्मभूमगगम्भवकंतियमणुस्साणं किं संजयसम्मदिट्ठिपज्जत्तगसंखेज्जवासाउयकम्मभूमगगम्भवकंतियमणुस्साणं असंजयसम्मद्दिट्ठिपज्जत्तगसंखेज्जवासाउयकम्मभूमगगब्भवतियमणुस्साणं संजयासंजयसम्मदिद्विपज्जत्तगसंखेज्जवासाउयकम्मभूमगगम्भवकंतियमणुस्साणं ? गोयमा ! संजयसम्मदिट्ठिपज्जत्तगसंखेज्जवासाउयकम्मभूमगगब्भवकंतियमणुस्साणं, णो असंजयसम्मदिट्ठिपज्जत्तग- 20 संखेज्जवासाउयकम्मभूमगगब्भवतियमणुस्साणं, णो संजयासंजयसम्मदिद्विपज्जत्तगसंखेज्जवासाउयकम्मभूमगगम्भवतियमणुस्साणं । [८] जेइ संजयसम्मदिट्ठिपज्जत्तगसंखेज्जवासाउयकम्मभूमगगन्भवतियमणुस्साणं किं पमत्तसंजयसम्महिट्ठिपज्जत्तगसंखेज्जवासाउयकम्मभूमगगब्भवतियमणुस्साणं अपमत्तसंजयसम्मदिट्ठिपज्जत्तगसंखेज्जवासाउयकम्मभूमगगम्भवकंतियमणुस्साणं? गोयमा! अपमत्तसंजयसम्मदिद्विपज्जत्तगसंखेज्जवासा- 25 उयकम्मभूमगगब्भवतियमणुस्साणं, णो पमत्तसंजयसम्मदिद्विपज्जतगसंखेज्जवासाउयक १जति खं० । जदि सं० ॥ Jain Education Intemational Page #57 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जिणदासगणिमहत्तरविरइयाए चुण्णीए संजुयं [मु० ३०-३२ म्मभूमगगम्भवतियमणुस्साणं । [९] जइ अपमत्तसंजयसम्मदिट्ठिपज्जत्तगसंखेज्जवासाउयकम्मभूमगगब्भवतियमणुस्साणं किं इड्डिपत्तअपमत्तसंजयसम्मदिट्ठिपज्जत्तगसंखेज्जवासासाउयकम्मभूमगगन्भवतियमणुस्साणं अणिड्ढिपत्तअपमत्तसंजयसम्मबिट्ठिपज्जत्तगसंखेज्जवासाउयकम्मभूमगगब्भवतियमणुस्साणं ? गोयमा ! इड्डिपत्तअपमत्तसंजय5 सम्मदिट्ठिपज्जत्तगसंखेज्जवासाउयकम्मभूमगगन्भवतियमणुस्साणं, णो अणिड्डिपत्तअपमत्तसंजयसम्मदिट्ठिपज्जत्तगसंखेज्जवासाउयकम्मभूमगगब्भवतियमणुस्साणं मणपज्जवणाणं समुप्पज्जइ। _____ २९. किं मणुस्सा० इत्यादि । सम्मुच्छिममणुस्सा गब्भवकंतियमणुस्साण चेव वंत-पित्तादिसु संभवंति । कम्मभूमगा पंचमु भरहेसु पंचमु एरवदेसु पंचमु महाविदेहेमु य । हेमवतादिमु मिधुणा ते अकर्मभूमगा । तिण्णि 10 जोयणशते लवणजलमोगाहित्ता चुल्लहिमवंतसिहरिपादपतिहिता एगृरुगादि छप्पण्णं अंतरदीवगा । किं पज्जत्ताणं अपज्जत्ताणं ? ति । पज्जत्ती णाम-सत्ती सामत्थं । सा य पुग्गलदबोवचया उप्पज्जति । ताओ य छ पज्जत्तीतोआहार-सरीर-इंदिय-आणापाण-भासा-मणपज्जत्ती चेति । तत्य एगिदियाणं चउरो, विगलिंदियाणं पंच, अस्सण्णीणं संववहारतो पंच चेव, सण्णीणं च छ । तत्थ आहारपज्जत्ती नाम खल-रसपरिणामणसत्ती आहारपज्जत्ती । सत्तधातुतया परिणामणसत्ती सरीरपज्जत्ती । पंचण्हमिदियाणं [जे० १९४ द्वि० ] जोग्गा पोग्गला चियित्तु अणाभोगनिव्वत्तित15 विरियकरणेण तब्भावणयणसत्ती इंदियपज्जत्ती । [उस्सास]पोग्गलजोग्गाणापाणूण गहण-णिसिरणसत्ती आणापाणुपज्जत्ती । वइजोग्गे पोन्गले घेत्तूण भासत्ताए परिणामेत्ता वइजोगत्ताए निसिरणसत्ती भासापज्जत्ती । मणजोग्गे पोग्गले घेत्तूणं मणत्ताए परिणामेत्ता मणजोगत्ताए निसिरणसत्ती मणपज्जत्ती । एताओ पज्जत्तीओ पज्जत्तयणामकम्मोदएणं णिवत्तिजंति, ता जेसिं अत्थि ते पज्जत्तया । अपज्जत्तयणामकम्मोदएणं अणिवत्तातो जेसिं ते अपज्जत्तया । अप्पमत्तसंजता जिणकप्पिया परिहारविमुद्धिया अहालंदिया पडिमापडिवण्णगा य, एते 20 सततोवयोगोवउत्तत्तणतो अप्पमत्ता । गच्छवासिणो पुण पमत्ता, कण्हइ अणुवयोगसंभवतातो। अहवा गच्छवासी णिग्गता य पमत्ता वि अप्पमत्ता वि भवंति परिणामवसओ। 'इड्ढिप्पत्तस्से'ति आमोसहिमादिअण्णतरइड्ढिपत्तस्स मणपजवनाणं उप्पज्जइ त्ति । अहवा 'ओहिनाणिणो मणपज्जवनाणं उप्पज्जति' त्ति अण्णे नियमं भणंति ॥ ३०. ते च दुविहं उप्पज्जइ, तं जहा-उज्जुमती य विउँलमती य । ३०. रिजू मती उज्जुमई, सामण्णग्गाहिणि त्ति भणितं होति । एस मणोपजायविसेसो त्ति । ओसणं 25 विसेसविमुहं उवलभति, णातीवबहुविसेसविसिडें अत्थं उवलभइ ति भणितं होति, घडो णेण चिंतिओ ति जाणति । विपुला मती विपुलमती, बहुविसेसग्गाहिणि त्ति भणितं भवति । मणोपज्जायविसेसे जाणति, दिटुंतो जहा-णेण घडो चिंतितो, तं च देस-कालादिअणेगपज्जायविसेसविसिढं जाणति ॥ अहवा रिजु-विपुलमतीणं इमं दवादीहिं विसेससरूवं भण्णति १ सामत्थतो य आ० ॥ २'ला विचिणिसु अणा आ० ॥ ३ तब्भावापायण आ० दा०॥ ४ अणिद्विता ता जेसि आ० ॥ ५ तं च दुविहं उप्पजइ इति खं० सं० नास्ति ॥ ६ उप्पजइ इति शु० नास्ति ॥ ७ विमलमती खं ॥ Jain Education Interational Page #58 -------------------------------------------------------------------------- ________________ मगपञवगाणं तस्सामी तम्भेया य ] सिरिदेववायगविरइयं णंदोमुत्तं । २३ ३१. समासओ चउन्विहं पण्णत्तं, तं जहा-देवओ खेत्तओ कालओ भावओ। तत्थ दव्वओ णं उज्जुमती अणंते अणंतपदेसिए खंधे जाणइ-पासइ, ते चेव विउलमती अन्भहियतराए जाणति पासति। खेत्तओणं उज्जुमती अहे जाव इमीसे रयणप्पभाए पुढवीए उवरिमहेहिल्लाई खुड्डागपयराइं उढे जाव जोतिसम्म उवरिमतले तिरियं जाव अंतोमणुस्सखित्ते अड्डाइज्जेसु दीव-संमुद्देसु मण्णीणं पंचेंदियाणं पज्जत्तगाणं मणोगते भावे जाणइ 5 पासइ, तं चेव विउलमती अड्डाइजेहिं अंगुलेहिं अंब्भहियतरागं विउलतरागं विसुद्धतरागं वितिमिरतरागं "खेत्तं जाणति पासति । कालओ णं उज्जुमती जहण्णेणं पलिओवमस्स असंखेज्जतिभागं उक्कोसेणं पि पलिओवमस्स असंखेज्जतिभागं अतीयमणागयं वा कालं जाणति पासति, तं चेव विउलमती अन्भहियतरागं विउलतरागं विसुद्धतरागं वितिमिरतरागं जाणइ पासइ। भावओ णं उज्जुमती अणंते भावे जाणइ पासइ सबभा- 10 वाणं अणंतभागं जाणइ पासइ, तं चेव विउलमती अँभहियतरागं विउलतरागं विसुद्धतरागं वितिमिरतरागं जाणइ पासइ । ३२. मणपज्जवणाणं पुण जणमणपरिचिंतियत्थपायडणं । माणुसखेत्तणिबद्धं गुणपञ्चइयं चरित्तवओ ॥ ५३॥ से तं मणपज्जवणाणं । १दवओ४। दव्वओ ल० ॥ २ तत्थ इति ख० सं० ल० नास्ति ॥ ३ अन्भहियतराप विउलतराप विसुद्धतराप घितिमिरतराए जाणति जे० डे० मो० ल० । अब्भहियतराप विसुद्धतगप वितिमिरतराए जाणति ख० सं० । एतयोः पाठभेदयोः प्रथमः सूत्रपाठभेदः श्रीमलय िववृत्तावाहतोऽस्ति । द्वितीयः पुनः पाठमेदो भगवता श्रीअभयदेवसूरिणा भगवत्यामष्टमशतकद्वितीयोद्देशके मनःपर्यवज्ञानविषयकसूत्रव्याख्यानावसरे जहा नंदीए इति सूत्रनिर्दिष्टनन्दिसूत्रपाठोद्धरणे तद्वयाख्याने चादृतोऽस्ति । चूर्णि-हरिभद्रवृत्तिसम्मतस्तु सत्रपाठः शु. आदर्श एव उपलभ्यते ॥ ४ उज्नुमती जहनेणं अंगुलस्स असंखेज्जभार्ग उकोसेणं महे जाव मु० । नोपलभ्यते कस्मिश्चिदप्यादर्शऽयं पाठः, नापि चूर्णिकृता वृत्तिकृदयां वाऽयं पाठः स्वीकृतो व्याख्यातो वा वर्तते । अपि च श्रीअभयदेवाचार्येणापि भगवत्यां अष्टमशतकद्वितीयोद्देशके नन्दीपाठोद्धरणे नाय पाठ उल्लिखितो व्याख्यातो वाऽस्ति । नापि विशेषावश्यकादी तट्टीकादिषु वा मनःपर्यवज्ञानक्षेत्रवर्णनाधिकारे जघन्योत्कृष्टस्थानचिन्ता दृश्यते ॥ ५ इमीप ल०॥ ६ उवरिमहेढिल्लेसु खुडागपयरेसु उड्ढे खं० सं० । उवरिमडिल्ले खुडागपयरे उड्ढे खं० सं० विना मलयगिरिवृत्तौ च ॥ ७'तलो खं० सं० शु०॥ ८ समुद्देसु पण्णरससु कम्मभूमीसुतीसाए अकम्मभूमीसु छप्पण्णाए अंतरदीवगेसु सण्णीणं हे. शु. मो. मु.। श्रीमद्भिरभयदेवाचार्यभगवत्यामष्टमशतकद्वितीयोद्देशके नन्दीसूत्रपाठोद्धरणे एष एव सूत्रपाठ अहतोऽस्ति । । ९ 'जेहिमंगु मो० मु०॥ १० अमहियतरं विउलतरं विसुद्धतरं वितिमिरमरं खेत्तं इति हरिभद्र-मलयगिरिवृत्तिसम्मतः सूत्रपाठः जे. मो. मु. ॥ २१ खेतं इति जे० सं० डे० शु० नास्ति । भगवत्यामभयदेवाचार्योद्धते नन्दीपाठेऽपि नास्ति । १२ भगवत्या श. ८ उ. २ नन्दीपाठोद्धरणे ॥ १३ अब्भहियतरागं विउलतरागं इति पदद्वयं खं० सं० लसं० नास्ति | भगवत्यामपि नन्दीपाठोद्धरणे एतत् पदद्वय नास्ति ॥ १४ अत्र अभहियतरागं विउलतरागं वितिमिरतराग इति पदत्रयं खं० सं० ल. भगवत्यां नन्दीसूत्रपाठोद्धरणे च नास्ति, केवलं विसुद्धतरागं इत्येकमेव पदं वर्तते ॥ Jain Education Intemational Page #59 -------------------------------------------------------------------------- ________________ २४ जिणदासगणिमहत्तरविरइयाए चुपूणीए संजुयं [ सु० ३३-३६ ३१-३२. सणिणा मणत्तेण मणिते मणोखंधे अणंते अणंतपदेसिए दबट्टताए तम्गते य वण्णादिए भावे मणपजवनाणेणं पच्चक्खं पेक्खमाणो जाणाति त्ति भणितं । मणितमत्थं पुण पच्चक्खं ण पेक्खति, जेण मणालंबणं मुत्तममुत्तं वा, सो य छदुमत्थो तं अणुमाणतो [जे० १९५ प्र०] पेक्खति त्ति अतो पासणता भणिता । अहवा छदुमत्थस्स एगविहखयोवसमलंभे वि विविधोपयोगसंभवो भवति, जहेत्येव रिजु-विपुलमतीणं उवयोगो, अतो 5 विसेस-सामण्णत्थेसु उवउज्जतो जाणति पासइ त्ति भणितं, ण दोसो । विपुलमती पुण दचट्ठताए वण्णादिएहि य अधिगतरं जाणतीत्यर्थः। उवरिमहेहिल्लाई खुड्डागपतराई ति इमस्स भावणत्थं इमं पण्णविज्जति-तिरियलोगस्स उड्ढाऽहअट्ठारसजोयणसइयस्स बहुमज्झे एत्थ असंखेयंगुलभागमेत्ता लोगागासप्पयरा अलोगेण संवट्टिता सबखुड्डलतरा खुड्डागपतर त्ति भणिता, ते य सव्वतो रज्जुप्पमाणा। तेसिं जे बहुमज्झे दो खुड्डागपतरा तेसि पि बहुमज्झे जंबुद्दीवे रतणप्पभपुढविबहुसमभूमिभागे मंदरस्स बहुमज्झे एत्थ अट्ठप्पदेसो रुयगो,-जत्तो दिसि-विदि10 सिविभागो पत्तो,-एतं तिरियलोगमज्झं । एतातो तिरियलोगमज्झातो रज्जुप्पमाणखुड्डागप्पतरेहिती उपरि तिरियं असंखेयंगुलभागअसंखेयंगुलभागवड्डी, उवरिहुत्तो वि अंगुलअसंखेयभागारोहो चेव, एवं तिरियमुवरिं च अंगुलअसंखेयभागवड्ढीए नाव लोगवड्ढी णेतन्या जाव उड्ढलोगमझं, तातो पुणो तेणेव कमेणं संवट्टो कातन्चो . उवरिलोगंतो रजुपमाणो ततो य उड्ढलोगमन्झातो उवरि हेट्ठा य कमेण खुड्डागप्पतरा भाणितन्ना जाव जाव रज्जुप्पमाणा खुड्डागप्पतर त्ति। तिरियलोगमज्झरज्जुप्पमाणखुड्डागप्पतरेहितो पि हेट्ठा अंगुलअसंखेयभागवड्ढी 15 तिरियं, अहोवगाहेण वि अंगुलस्सअसंखभागो चेव, एवं अहेलोगो वड्ढेतब्बो जाव अहेलोगंतो सत्त रज्जूओ। सत्तरज्जूपयरेहितो उपरुपरि कमेण खुड्डागप्पतरा भाणितबा जाब तिरियलोगमज्झरज्जुप्पमाणा खुड्डागप्पतर त्ति । एवं खुड्डागपरूवणे कते इमं भण्णति-उपरिमं ति-तिरियलोगमज्झातो [जे० १९५ द्वि० ] अहो जाव णव जोयणसता ताव इमीए रयणप्पभपुढवीए उपरिमखुड्डागपतर ति भण्णंति । तदहो अहेलोगे जाव अहेलोइयगामवत्तिणो ते हेडिमखुड्डागप्पतर त्ति भण्णंति, रिजुमती अधो ताव पश्यतीत्यर्थः । अहवा अहेलोगस्स उवरिमा खुड्डागप्पतरा 20 तिरियलोगस्स य हेटिमा खुड्डागप्पतरा ते जाव पश्यतीत्यर्थः। अण्णे भणंति-उवरिम त्ति- अंधोलोगोपरिट्ठिता जे ते उवरिमा । के य ते ? उच्यते--सब्बतिरियलोगवत्तिणो तिरियलोगस्स वा अहो णवजोतणसतवत्तिणो ताण चेव जे हेट्ठिमा ते जाव पश्यतीत्यर्थः, इमं ण घडति, अहेलोइयगाममणपज्जवणाणसंभवपाहण्णत्तणतो । उक्तं च इहाघोलौकिका ग्रामा न तिर्यग्लोकवर्तिनः। मनोगतांस्त्वसौ भावान् वेत्ति तद्वर्तिनामपि ॥१॥ अड्ढातियंगुलग्गहणं उस्सेहंगुलमाणतो। कहं णज्जति ? उच्यते - "उस्सेहपमाणतो मिणे देह" [बृहत्संग्रहणी गा. ३३५) ति वयणातो। अंगुलादिया य जे पमाणा ते सव्वे देहनिष्फण्णा इति, णाणविसयत्तणतो य गं....स्स। रिजुमतिखेत्तोवलंभप्पमाणातो विपुलमती अभतियतरागं खेत्तं उवलभइ त्ति। एगदिसि पि अन्भतियसंभवो भवति त्ति समंततो जम्हा अभइयं ति तम्हा विपुलतरागं भण्णति । अहवा जहा घडो घडातो जलाहारत्तणतो अन्भतितो 30 सो पुण नियमा घडागासखेत्तेण विउलतरो भवति एवं विउलमती अब्भतियतरागं मणोलद्धिजीवदव्याधारं खेत्तं जाणति, तं च नियमा विपुलतरं इत्यर्थः । अहवा आयाम-विक्खंभेणं अभइयतरागं बाहल्लेण विउलतरं खेत्तं १ अंतेलोगोपरिद्वितो जे जे० ॥ २ संभववाहल्लत्तणतो आ• दा• हरिभद्रवृत्तौ च ॥ ३ण दोसो। रिजु दा. मलयगिरिवृत्तौ च । ण दो सारिजुआ० ॥ ४ आ• दा० आवृत्त्योः एतत्सूत्रचूर्णां सर्वत्र अम्भतिय स्थाने अभहिय इति वर्तते ।। Page #60 -------------------------------------------------------------------------- ________________ केवलणाणं तब्भया य] सिरिदेववायगविरइयं गंदीसुतं । २५ उपलभत इत्यर्थः। अहवा दो वि पदा एगट्ठा । विसिट्ठविमुद्धिविसेसदंसगो तरसद्दो त्ति, यथा शुक्लः शुक्लतर इति। किंच-जहा पगासगदनविसेसातो खेत्तविमुद्धि(द्धी) विसेसेणऽक्खिज्जति तहा मणपज्जवनाण-चरणविसेसातो रिजुमणपज्जवणाणिसमी[जे० १९६ प्र० ]बातो विपुलमणपज्जवणाणी विसुद्धतरागं जाणति, मणपज्जवनाणावरणवयोवसमुत्तमलंभत्तणतो वा वितिमिरतरागं ति भण्णति । अहवा पुव्यबद्धमणपज्जवनाणावरणखयोवसमुत्तमलंभत्तणतो विसुद्धं ति भणितं तस्सेवाऽऽवरणवज्झमाणस्सऽभावत्तणतो पुचवद्धस्स य अणुदयत्तगतो वितिमिरतराग-ति 5 भण्णति । अहवा दो वि एते एगट्ठिया पदा। मणपजवनाणस्स सेसं कंठं ॥ इदाणिं केवलनाणं भण्णति, मणपज्जवनाणाणंतरं मुत्तकमुट्टित्तणतो विमुद्धिलाभुत्तमयो य केवलं भण्णति ३३. से किं तं केवलणाणं ? केवलणाणं दुविहं पण्णत्तं, तं जहा-भवत्थकेवलणाणं च सिद्धकेवलणाणं च ___ ३३. से किं तं केवलेत्यादि सूत्रम् । केवलनाणमभेदे वि भेदो भव-सिद्धावत्यादिएहि अणेगधा इमो 10 कज्जति-मणुस्सभवद्वितस्स जं केवलनाणं तं भवत्थकेवलनाणं । चसद्दो उस्सण्णं भेददंसणे । सबकम्मविप्पमुक्को सिद्धो, तस्स जं गाणं तं सिद्धकेवलनाणं ॥ __३४. से किं तं भवत्थकेवलणाणं ? भवत्थकेवलणाणं दुविहं पण्णत्तं, तं जहा-सजोगिभवत्थकेवलणाणं च अजोगिभवत्थकेवलनाणं च । ३४. मणादितो जोगो, सो य जहासंभवातो, तेण सह जोगेण सजोगी, तस्स जं नाणं तं सजोगिभवत्थ- 15 केवलणाणं । अजोगी-सव्वजोगनिरुद्धो सइलेसभावहितो, तस्स जं णाणं तं अयोगिभवत्थकेवलनाणं ॥ ३५. से किं तं सजोगिभवत्थकेवलणाणं ? सजोगिभवत्थकेवलणाणं दुविहं पण्णत्तं, तं जहा-पढमसमयसजोगिभवत्थकेवलणाणं च अपढमसमयसजोगिभवत्थकेवलणाणं च, अहवा चरिमसमयसजोगिभवत्थकेवलणाणं च अचरिमसमयसजोगिभवत्थकेवलणाणं च । से तं सजोगिभवत्थकेवलणाणं । ३६. से किं तं अजोगिभवत्थकेवलणाणं ? अजोगिभवत्यकेवलणाणं दुविहं पण्णत्तं, तं जहा-पढमसमयअजोगिभवत्थकेवलणाणं च अपढमसमयअजोगिभवत्थकेवलणाणं च, अहवा चरिमसमयअजोगिभवत्थकेवलणाणं च अचरिमसमयअजोगिभवत्थकेवलणाणं च । से तं अजोगिभवत्थकेवलणाणं ।। ३५-३६. पढमसमयो केवलणाणुप्पत्तिसमयो च्चेव, अपढमो वितियादिसमयो-जाव सजोगित्तस्स चरमसम- 25 एत्यर्थः । अहवा एसेवऽत्यो समयविकप्पेण अण्णहा दंसिज्जति-सजोगिकालचरिमसमए चरिमोति-पच्छिमो, ततो परं अयोगी भविष्यतीत्यर्थः । अचरिमो त्ति-चरिमो न भवति, चरिमस्स आदिसमयातो आरम्भ ओमत्थगं जाव पढमसमयो ताव अचरमसमया भण्णंति, एतेसु जणाणं तं अचरमसमयभवत्थकेवलनाणं । सेसं कंठं ।। १ 'विसुद्धिविसेसो लदिख आ० दा० ॥ २त्तरमयो आ० दा० ॥ 20 Page #61 -------------------------------------------------------------------------- ________________ २६ जिणदासगगिमहत्तरविरइयाए चुण्णीए संजुयं [सु० ३७-३९ ३७. से तं कि सिद्ध केवलणाणं ? सिद्धकेवलणाणं दुविहं पण्णत्तं, तं जहा-अणंतरसिद्धकेवलणाणं च परंपरसिद्ध केवलणाणं च । ३७. से किं तं सिद्धकेवलनाणेत्यादि सूत्रम् । तत्थ सिद्धकेवलणाणं दुविहं-अणंतरं परंपरं । तत्थ अणंतरं णो समयंतरं पत्तं, सिद्धत्वप्रथमसमयवर्तिन इत्यर्थः ॥ 5 ३८. से किं तं अणंतरसिद्धकेवलणाणं ? अणंतरसिद्ध केवलणाणं पण्णरसविहं पण्णत्तं, तं जहा-तित्थसिद्धा १ अतित्थसिद्धा २ तित्थगरसिद्धा ३ अतित्थगरसिद्धा ४ सयंबुद्धसिद्धा ५ पत्तेयबुद्धसिद्धा ६ बुद्धबोहियसिद्धा ७ इथिलिंगसिद्धा ८ पुरिसलिंगसिद्धा ९ णपुंसगलिंगसिद्धा १० सलिंगसिद्धा ११ अण्णलिंगसिद्धा १२ गिहिलिंगसिद्धा १३ एगसिद्धा १४ अणेगसिद्धा १५ । से तं अणंतरसिद्धकेवलणाणं । 10 ३८. ते पंचदसविधा तित्थसिद्धाइया । 'तित्यसिद्धा' इति जे तित्थे सिद्वा ते तित्थसिद्धा, तित्थं च चातुवण्णो समणसंघो पढमादिगणधरा वा, भणितं च आरिसे--"तित्थं भंते ! तित्थं ? [जे० १९६ द्वि०] अरहादि तित्थं ? गोतमा! अरहा ताव तित्थंकरे, तित्थं पुण चातुवण्णो समणसंघो" [भग. श. २० उ० ८ सू. ६८२] तम्मि तित्थकालभावे उप्पण्णे ततो वा तित्थकालभावातो जे सिद्वा ते तित्थसिद्धा१। अतित्थं-चातुवण्णसंघस्स अभावो तित्थकालभावस्स वा अभावो। तम्मि अतित्थकाल मावे अतित्थकालभावातो या जे सिद्वा ते अतित्थसिद्धा। तं च 15 अतित्थं तित्यंतरे तित्थे वा अणुप्पण्णे जहा मरुदेविसामिणिप्पभितयो २ । रिसभादयो तित्थकरा, ते जम्हा तित्थकर णामकम्मुदयभावे द्विता तित्थकरभावातो वा सिद्धा तम्हा ते तित्थकरसिद्धा ३। अतित्थकरा सामण्णकेवलिणो गोतमादि, तम्मि अतित्थकरभावे द्विता अतित्थकरभावातो वा सिद्धा अतित्थकरसिद्धा ४ । स्वयमेव बुद्धा स्वयंबुद्धा, सतं अप्पणिज्ज वा जाइसरणादि कारणं पडुच्च बुद्धा सतंबुद्धा । स्फुटतरमुच्यते-बाह्यप्रत्ययमन्तरेण ये प्रतिबु दास्ते स्वयंवुद्धा । ते य दुविहा-तित्थगरा तित्थगरवतिरित्ता वा । इह वइरित्तेहिं अधिकारो । किंच-स्वयंबुद्धस्स 20 बारसविहो वि उवही भवति, पुव्वाधीतं से मुतं भवति या ण वा। जति से नत्थि तो लिंग नियमा गुरुसण्णिहे पडिवज्जइ, गच्छे य विहरति । अह पुब्बाधीतमुतसंभवो अत्थि तो से लिंगं देवता पयच्छति, गुरुसणिहे वा पडिवज्जति । जइ य एंगविहारविहरणजोग्गो, इच्छा व से तो एको चेव विहरति, अण्णहा गच्छे विहरतीत्यर्थः । एतम्मि भावे द्विता सिद्धा एतातो वा भावातो सिद्धा सयंबुद्धसिद्धा ५ । 'पत्तेयबुद्धा' पत्तेयं-बाह्य वृपभादि कारणमभिसमीक्ष्य बुद्धाः प्रत्येकबुद्धाः। बहिःप्रत्ययप्रतिबुद्धानां च पत्तेयं नियमा विधारो जम्हा तम्हा य ते पत्तेयबुद्धा, 25 जहा करकंडुमादयो । किंच-पत्तेयबुद्धाणं जहण्णेण दुविहो उक्कोसेणं णवविधो उबही नियमा पाउरणवज्जो भवति। किंच-पत्तेयबुद्धाणं पुन्वाधीतं सुतं णियमा भवति, जहण्णणं एकारसंगा, उक्कोसेणं भिण्णदसपुव्वा । लिंगं च से देवता पयच्छति, लिंगवज्जिता वा भवति । जतो [जे० १९७ प्र०] भणितं-"रुप्पं पत्तेयबुद्धा" [आव. गा. ११३९] इति । एतम्मि भावे एतातो वा सिद्धा पत्तेयबुद्धसिद्धा ६ । बुद्धबोधिता-जे सतंबुद्धेहि तित्थकरादिएहि बोहिता, पत्तेयबुद्धेहिं वा कविलादिएहि बोधिता ते बुद्धवोधिता। अहवा बुद्धवोधिएहिं वोधिता बुद्धबोधिता, एवं मुहम्मा30 दिएहिं जंबुणामादयो भवंति । अहवा बुद्ध इति-प्रतिवुद्धा, तेहिं प्रतिवोधिता बुद्धबोधिता, प्रभवादिभिराचार्यैः । १ अप्पणा जे वा जाई आ० दा० ॥ २ णितमा मो० ॥ ३ पगविधारविधरणजोग्गो आ० ॥ ४ विहारः इत्यर्थः ॥ Jain Education Intemational Page #62 -------------------------------------------------------------------------- ________________ केवलणाणं तब्भेया य] सिरिदेववायगविरइयं णंदीमुत्तं । २७ एतभावे द्विता एतातो वा सिद्धा बुद्धबोधितसिद्धा ७ । 'सलिंगसिद्धा' दवलिंगं पति रजोहरण-मुहपोत्ति-पडिग्गहधारणं सलिंग, एतम्मि दवलिंगे द्विता एतातो वा सिद्धा सलिंगसिद्धा ८। 'अण्णलिंगसिद्धा' तावस-परिवायगादिवकल-कासायमादिदव्वलिंगडिता सिद्धा अण्णलिंगसिद्धा ९। एवं गिहिलिंगे वि-केसादिअलंकरणादिए दन्चलिंगे हिता सिद्धा गिहिलिंगसिद्धा १० । इथिलिंगं ति-इत्थीए लिंग इथिलिंगं, इत्थीए उवलक्षणं ति वुत्तं भवति । तं तिविह-वेदो सरीरनिबत्ती णेवच्छं च, इह सरीरनिबत्तीए अधिकारो, ण वेद-णेवच्छेहि । तत्थ वेदे 5 कारणं-जम्हा वीणवेदो जद्दण्णेणं अंतोमुहुत्तातो उक्कोसेण देसूणपुषकोडीतो सिज्झति, णेवच्छस्स य अणियतत्तणतो, तम्हा ण तेहिं अहिकारो । सरीराकारणिबत्ती पुण णियमा वेदुदयातो णामकम्मुदयाओ य भवति तम्मि सरीरनिव्वत्तिलिंगे ठिता सिद्धा तातो वा सिद्धा इथिलिंगसिद्धा ११ । एवं पुरिस-णपुंसकलिंगा वि भाणितवा १२-१३ । एकसिद्ध त्ति-एकम्मि समए एक्को चेव सिद्धो १४ । अणेगसिद्ध त्ति-एकम्मि समए अणेगे सिद्धा, दुगादि जाव असतं ति । भणितं च 10 बत्तीसा अडयाला सट्ठी बावत्तरी य बोधवा । चुलसीती छण्णउती दुरहित अटुत्तरसतं च ॥१॥१५॥ [बृहत्सं. गा. ३३३] चोदक आह-णणु एते पण्णरस भेदो छभेदहिताअण्णोण्णनिरवेक्खा ण भवंति कहं पंचदसभेद त्ति पण्णता? आचार्य आह-णणु तित्थाऽतित्थपुरिसवि जे० १९७ द्वि० ]भागुप्पण्णा-ऽणुप्पण्णकालभेदतो वा दो भेदा परोप्परविरुद्धा १, तहा तित्थगरणामकम्मुदयातो अभावतो य दो भेदा परोप्परविरुद्धा २, तहा लिंगादिया दवलिंग- 15 पडिवत्तिभेदा परोप्परविरुद्धा ३, तहा मोहुत्तरपगडिवेदभेदोदयतो स्थिमादिसरीरलिंगणिव्यत्ती परोप्परविरुद्धा ४, एगा-ऽणेगा वि एक्ककालसहचरिता-ऽचरितत्तणतो भिण्णा ५, सयंबुद्धादयो वि णाणावरणक्खोवसमविसेसपडिबोधविसेसत्तणतो प्रतिविसिट्ठा ६, एवं तित्थादियाण अण्णोष्णलक अणसभावट्ठिताणं पंचदस भेदा पण्णत्ता, किंचजहा मतिणाणे गच्चादियाण चरिमपज्जवसाणाणं अण्णोष्णाए॒वेधत्तणे वि भेदो इहं पि जइ तहा तो को दोसो ?, किंच-नाणाणयाभिप्पायत्तणतो मुत्तस्स य अणेगगम-पजायत्तणतो अभिधाणभेदत्तणतो य पंचदसभेदकरणं ति ण 20 दोसो ॥ इदाणिं तं चेव सिद्धकेवलणाणं समतभेदतो अणेगधा बिसेसिजति__ ३९. से किं तं परसिद्धकेवलणाणं ? परंपरसिद्धकेवलणाणं अणेगविहं पण्णत्तं, तं जहा-अपढमसमयसिद्धा दुसमयसिंद्धा तिसमयसिंद्धा चउसमयसिद्धा जाव दससमयसिद्धा संखेज्जसमयसिद्धा असंखेज्जसमयसिद्धा अणंतसमयसिद्धा, से तं परंपरसिद्ध केवलणाणं । से तं सिद्धकेवलणाणं । ३९. पढमसमयसिद्धस्स जो वितियसमयसिद्धो सो परो, तस्स वि य अण्णो, एवं परंपरसिद्धकेवलनाणं भाणितव्वं । तं च 'अपढमसमय' इत्यादि । नास्य प्रथमः समयो विद्यत इत्यप्रथमः, द्वितीयसमयसिद्ध इत्यर्थः, सच परंपरसिद्धविसेसणस्स प्रथमः, तस्स परतो वितियादिसमया माणितवा॥ १ मेदा विमेद आ० दा० । अत्रेदमवधेयम्-श्रीमद्भिहरिभद्रपादैः मलयगिरिचरणश्च स्वस्ववृत्तौ तीर्थसिद्धा-उतीर्थसिद्धरूपभेदद्वयान्तः पञ्चदशमेदान्तर्भावं सङ्कल्प्यव चालना-प्रत्यवस्थाने उपन्यस्ते स्तः तदनुसारी पाठभेदोऽपि चूकॊदर्शेषु दृश्यते । किञ्च-चूर्णीसत्कप्राचीनतमे आदर्श षड्भेदान्तः पञ्चदशमेदान्तर्भावावेदकः छम्मेदहिता० इत्यादिः पाठो वरीवृत्यते, आचार्य प्रतिविधानमपि षड्विभागावेदकमेव विद्यते इत्यस्माभिः छम्मेदद्विता० इति पाठ एव मूले आइतोऽस्ति । अत्रार्थे तद्विद एव प्रमाणमिति ॥ २ गत्यादिकानां चरमपर्यबसानानाम् " गइ इंदिए य." तथा "भासग परित्त" इति आवश्यकनियुक्तिगाथा १४-१५ निर्दिष्टानां द्वाराणाम् इत्यर्थः ॥ ३ गुवेक्खताण वि आ० दा० ॥४-५-६-७ सिद्ध केवलणाणं ल. ॥ ८ समयो तम्मि सिद्धो आ० दा०॥ 25 Jain Education Intemational Page #63 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 5 ४०. तं सव्वं पि चतुव्विहं दव्वादियं । 'सव्वदन्व' त्ति धम्मा-धम्माऽऽगासातयो तेहिंतो जीवदव्वा अनंतगुणा, तेहिंतो वि पुग्गलदव्त्रा अनंतगुणा, एते सव्वे सरुवतो जाणति । खेत्तं पि लोगा- लोगभेदभिष्णमणंतं सरूत्रतो जाणति । कालं पि समयाऽऽवलियादियं तीयमणागतसव्वद्धं वा सवतो सव्वं जाणति । भात्रा वि दुविधा भावा - जीवभावा अजीवभावा य । तत्थ जीवभावा कम्मुदयसतत्तपरिणामितलक्खणा गति कसायादिया कम्मुदयलक्खणा अणेगविधा, उवसम[ जे० १९८ प्र० ] खय-खयोत्रसमजीव सतत्तलक्खणा अणेगविहा, 10 पारिणामिता य जीव-भव्वा ऽभव्वत्तादिया, अजीवाऽमुत्तदव्वेसु धम्मा-धम्माऽऽगासा गति द्विति- अवगाहलक्खणा, अगुरुलहुगा य अणंता, पुग्गलदव्या य मुहुम- बादर - विस्ससापरिणता अभिदधणुमादिया अणेगविधा । परमाणुमादीण य वण्णादिपज्जा एगादिया अणंता । एते दव्वादिया सव्वै सव्वधा सव्वत्थ सव्वकालं उवयुक्त्तो सागाराSणागारलक्खणेहिं णाण- दंसणेहिं जाणति पासति य । एत्थ केवलणाण- दंसणोत्रयोगेहिं बहुधा समयसन्भावं आयबुद्धीए पकप्पेता इमं भांति 15 20 जिणदासगणिमहत्तरविरइयाए चुण्णीए संजयं [ सु० ४० ४०. तं समासओ चउव्विहं पण्णत्तं तं जहा- देव्वओ खेत्तओ कालओ भावओ । तत्थ दव्व णं केवलणाणी सव्वदव्वाइं जाणइ पासइ । खेत्तओ णं केवलणाणी सव्वं खेत्तं जाणइ पासइ । कालओ णं केवलणाणी सव्वं कालं जाणइ पासइ । भावओ णं केवलणाणी सव्वे भावे जाणइ पासइ । 25 २८ किंच यी भांति जुगवं जाणइ पासति य केवली नियमा । अण्णे एगंतरियं इच्छंति सुतोवदेसेणं ॥ १ ॥ तत्थ जे ते भांति 'जुगवं जाणति पासति य' ते इमं उववत्ति उवदिसंति to or a वसुं दंसणमिच्छंति जिणवरिंदस्स । जं चिय केवलनाणं तं चिय से दंसणं बेंति ॥ २ ॥ [ विशेषण. गा. १५३-५४ ] जं केवलाई सादी- अपज्जवसिताइं दो वि भणिताई । तो बेंति के जुगवं जाणति पासति य सव्वष्णू ॥ ३ ॥ इ हराssar - णिहणत्तं मिच्छाssवरणक्खयो त्ति व जिणस्स । इतरेतरावरणया अहवा णिक्कारणावरणं ॥ ४ ॥ तह य असव्वण्णुत्तं सव्वदरिसित्तणप्पसंगो य । एतरोवयोगे जिणस्स दोसा बहुविधीता ॥ ५ ॥ [ विशेषण. गा. १९३-१९५] एवं परेण बहुधा भणिते आगमवादी उत्तरं इमं आह भण्णति, भिण्णमुहुत्तोवयोगकाले वि तो तिनाणिस्स । मिच्छा छावट्ठी सागरोवमाइं वयोवसमो ॥ ६ ॥ [ विशेषण. गा. २०२ ] १ दव्यभ ४ । दव्वओ ल० ।। २ तत्थ इति खं० सं० ल० शु० नास्ति ॥ ३व्वाति जा शु० ॥ ४ सव्वभावे खं० ॥ ५णु-दुअणुगादीण आ० दा० ॥ Page #64 -------------------------------------------------------------------------- ________________ केवलणाण-दसणोवओगवायत्थलं ] सिरिदेववायगविरइयं गंदीमुत्तं । २९ जहा छउमत्थस्स मति-सुता-ऽवधिणाणेसु अंतमुहुत्तकालोवयोगसंभवे उवयोगा-ऽणुवयोगेण य छावहिसागरा से ठितिकालो दिट्ठो, तहा जति जिणस्स णाण-दंसणा सादिअपज्जवसाणा उवयोगा-ऽणुवयोगेण भवंति तो को दोसो ? । जति एतं ते णाणुमतं तो इमं ते कहं अणुमतं भविस्सइ ? अह ण वि एतं तो सुण, जहेव खीणंतराइओ अरहा। संते वि अंतरायक्वयम्मि पंचप्पगारम्मि ॥ ७॥ सततं ण देइ [जे०१९८ द्वि० ] लभइ व भुंजइ उवभुंजई य सव्वण्णू । कज़म्मि देइ लभइ व भुंजइ व तहेव इहयं पि ॥ ८॥ किंच दितस्स लभंतस्स व भुंजंतस्स व जिणस्स एस गुणो । खीणंतराइयत्ते जं से विग्धं ण संभवति ॥१॥ उवउत्तस्से मेव य णाणम्मि व दंसणम्मि व जिणस्स । खीणावरणगुणोऽयं, जं कसिणं मुणइ पासति वा ॥ १० ॥ [ विशेषण. गा. २०३-६ ] पुणो पर आह पासंतो वि न जाणइ, जाणं व ण पासती जति जिगिंदो । एवं ण कदाइ वि सो सव्वण्णू सव्वदरिसी य ॥११॥ उत्तरं आचार्य आह जुगवमजाणतो वि हु चतुहिं वि नाणेहिं जह चतुग्णाणी । भण्णइ, तहेव अरहा सव्वण्णू सव्वदरिसी य ॥ १२ ॥ पर एवाऽऽह तुल्ले उभयावरणक्खयम्मि पुव्वयरमुब्भवो कस्स। दुविधुवयोगाभावे जिणस्स जुगवं? ति चोदेति ॥ १३ ॥ उत्तरं आचार्य आह भण्णति, ण एस नियमो जुगवुप्पण्णेसु जुगवमेवेह । होयव्वं उवओगेण, एत्थ सुण ताव दिटुंतं ॥ १४ ॥ जह जुगवुप्पत्तीय वि सुत्ते सम्मत्त-मति-सुतादीणं । णत्थि जुगवोवयोगो सब्चेसु तहेव केवलिणो ॥ १५ ॥ किंच भणितं पि य पण्णत्ती- पण्णवगादीसु जह जिणो समयं । जं जाणती ण पासति तं अणुरतणप्पभादीणि ॥ १६ ॥ [ विशेषण. गा. २१५-२० ] १ पुर्व समुभवो आ० दा० ॥ Page #65 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 10 जिणदासगणिमहत्तरविरइयाए चुण्णीए संजुयं [सु० ४१-४३ गा. ५४-५५ जे भणंति केवलणाण-दसणाण एगत्तं ते इमं हेतुजुत्तिं भणंति जह किर खीणावरणे देसन्नाणाण संभवो ण जिणे । उभयावरणातीते तह केवलदसणस्सावि ॥ १७ ॥ __एस ते हेतुजुत्ती जहा अत्थसाधणं ण संसहइ तहा उत्तर(२) हेतुजुत्तीए चेव भण्णति - देसण्यागोवरमे जह केवलनाणसंभवो भणितो। देसदसणविगमे तह केवलदंसणं होतु ॥ १८ ॥ अह देसनाण-दमणविगमे तव केवलं मतं नाणं । ण मतं केवलदंमणमिच्छामेत्तं णणु तवेदं ॥ १० ॥ [ विशेषण. गा. १५५-५७ ] किंच भण्णति जहोहिणाणी जाणति पासति य भासितं सुत्ते । ण य णाम ओहिदंसण-नाणेगत्तं तह इमं पि ॥ २०॥ [ विशेषण. गा. १७८ ] एवं पराभिप्पाये पडिसिद्धे एगंतरोवयोगता सिद्धा तह विमं भण्णति - जह पासतु तह पामतु, पासति सो जेण दंसणं तं से । जाणइ य जेण अरहा तं से णाणं ति घेत्तव्यं ॥ २१ ॥ [ विशेषग. गा. १९२ ] 15 किंच-सिद्धऽधिकारे एगंतरो जे० १९९ प्र० ]वयोगदंसिगा इमा फुडा गाहा नाणम्मि दंसणम्मि य एत्तो एगतरयम्मि उवउत्ता। सव्वस्त केवलिस्सा जुगवं दो पत्थि उवयोगा ॥ २२ ।। [ विशेषण. गा. २२९ ) किंच भगवतीए उवयोगो पगतरो पणुवीसतिमे सते सिणायस्स । भणितो विगडत्यो चिय छटुद्देसे विसेसेतुं ॥ २३ ॥ [विशेषण. गा. २३२] किंच कस्स व णाणुमतमिणं जिणस्स जति होज दो वि उवयोगा। गृणं ण होंति जुगवं जतो णिसिद्धा सुते बहुसो ॥ २४ ॥ [ विशेषण. गा. २४६ ] ४१. अह सव्वदव्यपरिणामभावविण्णत्तिकारणमणतं । सासयमप्पडिवाती एगविहं केवलं गाणं ॥ ५४ ।। केवलणाणेणऽत्थे गाउं जे तत्थ पण्णवणजोग्गे । ते भासइ तित्थयरो, वेइजोग तयं हवइ सेसं ॥ ५५ ॥ से तं केवलणाणं । से तं पञ्चक्खणाणं । १ वइजोग सुयं हवह तेसिं इत्ययं पाठः वृत्तिकृयां पाठान्तरत्वेन निर्दिष्टोऽस्ति । तथाहि-“अन्ये त्वेवं पठन्ति-'वइजोग सुयं हवइ तेसि' स वाम्योगः श्रुत भवति 'तेषां' श्रोतृणाम् ।" इति हारि० वृत्तौ । “अन्ये स्वेवं पठन्ति-वइजोग सुयं हवइ तेसि' तत्रायमर्थः-'तेषां' श्रोतृणां भावQतकारणत्वात् स वाम्योगः श्रुतं भवति, श्रुतमिति व्यवहियते इत्यर्थः ।" इति मलयगिरयः ॥ २ भवे शु० ॥ ३ अत्र, चूर्णि-वृत्तिकृतां से तं पञ्चपखं इत्येव पाठः सम्मतः । नोपलब्धोऽयं कस्यांचिदपि प्रतौ ॥ 20 Jain Education Interational Page #66 -------------------------------------------------------------------------- ________________ परोक्षज्ञानं तद्भदौ च] सिरिदेववायगविरइयं णंदीमुत्तं । ४१. अह सव्वद्व० गाहा । केवलनाणेण० गाहा । एताओ जहा पेढियाए ॥ ५४ ॥ ५५ ॥ सेसं कंठं ॥ इदाणिं कमागतं बहुवत्तव्वं पारोक्खं भण्णति ४२. से' किं तं परोक्खणाणं ? परोक्खणाणं दुविहं पण्णत्तं, तं जहा-आभिणिवोहियणाणपरोक्खं चे सुयणाणपरोक्खं च । ४२. अक्खस्स इंदिय-मणा परा, तेमु जं णाणं तं परोकावं । मनि-श्रुते परोक्षमात्मनः, परनिमित्तत्वात् , 5 अनुमानवत । णणु सुत्ते इंदियपच्चक्खं भणितं ? उच्यते-सचमिणं, एत्थं जं इंदिय-मणेहिं बहिलिंगपञ्चयमुप्पज्जति तमेगंतेणेव इंदियाण अत्तषो य परोक्खं, अणुमाणतणतो, धूमाओ अग्गिणाणं व । जं पुण सावा इंदिय-मणोनिमित्तं तं तेसिं चेव पञ्चक्ख, अलिंगत्तणतो, अत्तणो अवधिमादि व्य, अत्तणो तु तं एगंतेणेव परोक्खं । इंदियाणं पि तं संवबहारतो पञ्चक्खं, ण परमत्थतो । कम्हा ? जम्हा दधिदिया अचेतणा इति । तं दुविहं - मतिणाणं मुतनाणं च । इह मति-सुताणमुघण्णासकमे कारणं पुव्वुत्तं दट्ठव्वं ॥ मति-मुताण य अभेदसामिणिरूवणत्थं इमं मुत्तं-- 10 ४३. जत्थाऽऽभिोिहियणाणं तत्थ सुयणाणं, जत्थ सुयणाणं तत्थाऽऽभिणिबोहियणाणं । दो वि एयाई अण्णमण्णमणुगयाइं तह वि पुण एत्थाऽऽयरिया णाणत्तं पण्णवेतिअभिणिबुज्झइ ति आभिणिवोहिये, Kणतीति सुतं । “मतिपुर्वयं सुयं, ण मती सुयपुब्विया ।" ४३. जत्थ मतिनाणेत्यादि । 'जत्थ' ति पुरिसे जत्थ व इंदिय-नोइंदियखयोवसमे मतिणाणमथि 15 तत्थेव मुतनाणं पि । अहवा जत्थाभिनिवोधियसरुवं तत्थेव सुतं पि नियमा, अग्गोण्णाणुगता भवंतेते। आहमति-सुताणं अण्णोणाणुगतत्तणतो सामि-काल कारण[जे० १९९ द्वि० खयोवसमतुल्लत्तगतो य एगत्तं पादति, णो दुगपरिकप्पणं ति, अत्रोच्यते, मति-मुताणं अण्णोण्णाणुगताण वि आयरिया भेदमाह दिटुंतसामत्यतो, जहा आगासपइहिताणं धम्मा ऽधम्माण अण्णोण्णाणुगताणं लावणभेदा भेदो दिट्ठो तहा मति-सुताण वि नामि-कालादिअभेदे वि भेदो भण्णति- अभिणिवुज्झतीत्यादि । एवं लक्खणाऽभिधाणभेदा भेदो तेसिं । अहवा इमो 20 मति-सुतविलेसो-"मतिपुचयं सुतं, ण मती मुतपुब्बिया" इति, जतो मुतस्स नतिरेव पुव्वं कारणं । कहं ? उच्यते-मतीए मुतं पाविन्जति, मतिमंतरेण प्रापयितुं शक्यते, गहितं च मतीए पालिजति, परिवत्तयतो णो पणस्सइ ति" जतो, मतिरेवं सुतपुवा ण भवति । णणु मुतं पि सोतुं मती भवति ? उच्यते-तं दव्यमुतं, न भावश्रुतादित्यर्थः । अहवा मति-मुताण भेदकतो विसेसो, मतिणाणं अट्ठावीसइभेदभिण्णं, मुतणाणं पुण अंगा-5 १ चूर्णि-वृत्तिकृतां से कि तं परोक्खं ? परोक्खं दुविहं इति पाठोऽत्र सम्मत; परोक्षज्ञानोपसंहारेऽपि तः से तं परोक्खं इत्येव पाठः स्वीकृतोऽस्ति; किञ्च सर्वेष्वपि सूत्रादर्शषु उभयत्रापि परोक्खणाणं इत्येव पाठ उपलभ्यते ॥ २ चूर्णि-वृत्तिकृद्भिः किल जत्थ मतिनाणं तत्थ सुतनाणं, जत्थ सुतनाणं तत्थ मतिनाणं इतिरूपं सूत्रं मौलभावेनाङ्गीकृतमस्ति । किञ्च-श्रीचूर्णिकदादिभिः मौलभावनाङ्गीकृतमेतद् जत्थ मतिनाणं इत्यादि सूत्रं साम्प्रतीनेष्वादशंषु नोपलभ्यते । अपि च चूण्यवलोकनेनैतदपि ज्ञायते यत् चूर्णिकृत्समयभाविष्वादशेषु पाठभेदयुगलमप्यासीदिति ॥ ३ तत्थ अभि खं० सं ॥ ४ इत्थ आय मो० मु०॥ ५ पण्णवंति शु० । पण्णविति डे० ल । पण्णवयंति मो० मु०॥ ६ अभिणिबोज्झतीति खः । अभिणिबुज्झतीति सं० शु० । अभिणिवुज्झईद ल० ॥ ७°हियं णाणं, सुख० ल. विना ॥ ८ सुइ त्ति मो. मु० ॥ ९ पुवं जेण सुयं खं० डे०। चूणौँ वृत्त्योश्च जेण इति पदं नास्ति । पुर्व सुयं खं० डे० विना ॥१० ण-विधाण दा० ॥ ११ त्ति, जतो मतिमेव सुतं पवण्णो भवति आ०॥ Jain Education Intemational Page #67 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ३२ जिणदासगणिमहत्तरविरइयाए चुण्णीए संजुयं [सु० ४४-४६ गा. ५६-६५ गंगाइभेदभिण्णं अणेगहा । अहवा मति-सुताणं इंदियोवलद्धिविभागतो भेदो इमो-सोतिदियोवलद्धी० गाहा [ विशेषा. गा. १२२ ] पूर्ववद् व्याख्येया। अहवा मति-सुतभेदं भणंति-बुद्धीदिढे० गाहा । [ विशेषा. गा. १२८] एतीए गाहाए अत्थो मति सुतविसेसी य जहा विसेसावस्सगे तहा भाणितव्यो। अण्णे वागसमं मतिणाणं मुंबसमं च सुतणाणं भणंति तं च ण घडति, जम्हा वाग-मुंबदिटुंतेणं मइनाणस्सेव सुतं परिणामो दंसिज्जति, तम्हा तं ण 5 जुज्जते इत्यर्थः। अहवऽण्णो मतिमुतभेदो-अक्खराणुगतं मुतं, अणक्खरं मतिनाणं ति । अहवाऽऽत्मप्रत्यायकं मतिणाणं, स्व-परमत्यायकं मुतनाणं । अहवा मति-मुताण आवरणभेदातो [जे० २०० प्र० ] भेदो दिट्ठो । तकावतोवसमविसेसातो चेव मति-मुताण भेदा भवति ॥ भणितो मति-सुतविसेसी। इदागि जहा मति मुतणाणाण कज्जकारणभेदेहि भेदो दिह्रो तहा मतीए मुतस्स य सम्म-मिच्छविसेसो दंसणपरिग्गहातो भनइ त्ति अतो मुत्तं भण्णति ४४. अविसेसिया मती मतिणाणं च मतिअण्णाणं च । विसेसिया मती सम्मबिहिस्स 10 मती मतिणाणं, मिच्छादिट्ठिस्म मती मतिअण्णाणं । अविसेसियं सुयं सुयणाणं च सुयअण्णाणं च। विसेसियं सुयं सम्मदिहिस्स सुयं सुयणाणं, मिच्छद्दिहिस्स सुयं सुयअण्णाणं। ४४. अविसेसिता मतीत्यादि । सामिणा अविसेसिता मती इमं वत्तव्या-आभिणिवोधिकेत्यादि । चसदो समुच्चये। विसेसिता मतीत्यादि । जता पुण इमेण सामिणा विसेसिता मती भवति तदा इमं वत्तव्या सम्मदिहिस्स मतीत्यादि सूत्रारबद्रं । अविसेसितं मुतमित्यादि एतं पि उवउजिउं एवं चेव वत्तव्यं । अहवा जाव 15 विसेसणेण अविसेसिता मती ताव मती चेव बत्तव्वा । सञ्चेव मती गाण-ऽण्णागसविसेसणातो इमं वत्तव्या आभिनिवोधिकेत्यादि सूत्रसिद्धं । णाण-ऽण्णागसहविसेसणं कहं ? भण्णति-सम्मत्त-मिच्छसामिगुणत्तणतो सम्मदिटिस्स मतीत्यादि सुत्तसिद्धं । सुते वि एवं चेत्र वत्तव्वं । पर आह-तुल्लखयोवसमत्तणतो घडाइवत्थूण य सम्मपरिच्छेदत्तणतो सदादिविसयाण य समुवलंभातो कहं मिच्छदिहिस्स मति-मुता अण्णाणं ति भणिता ? उच्यते सदसदविसेसणातो भवहेत जतिच्छितोवलंभातो। नाणफलाभावातो मिच्छदिट्रिस्स अण्णाणं ॥२॥ 20 मतिपुव्वं मुतं ति कातुं मतिणाणं चेत्र पुव्वं भणामि ४५. से किं तं आभिणिबोहियणाणं ? आभिणिवोहियणाणं दुविहं पण्णत्तं, तं जहासुयणिस्सियं च असुयणिस्सियं च । ४५. से किं तं आभिनिबोधिकेत्यादि मुत्तं । तत्थ 'सुतनिस्सितं' ति सुतं ति-मुत्तं, तं च सामादियादि बिंदुसारपज्जवसाणं । एतं दधमुतं गहितं । तं अणुसरतो जं मतिणाणमुप्पजति तं मुतणिस्साए उप्पण्णं ति सुतातो 25 वा णिसृतं तं सुतणिस्सितं भण्णति । तं च उग्गहेहा-ऽवाय-धारणाठितं चतुभेदं । 'अस्मुतनिस्सितं च' त्ति जं पुण दव-भावसुतणिरवेक्खं आभिणिवोधिकमुप्पज्जति तं अमुयभावातो समुप्पण्णं ति अमुतनिस्सितं भण्णति । तं च उप्पत्तियादिबुद्धिचउक्कं ।। इमं १ जम्हा जे० दा० ॥ २ 'विसेसदसण आ० दा०॥ ३ अयं मूले स्थापितः सूत्रपाठः सं० मो. विशेषावश्यकमलधारीयवृत्ती १९५ पत्र नन्दीसूत्रपाठोद्धरणे उपलभ्यते । श्रीहरिभद्रसूरिणापि स्ववृत्तावयमेव सूत्रपाठो व्याख्यातोऽस्ति । विसेसिया सम्महिहिस्स मती मतिणाणं, मिच्छादिट्टिस्स मती मतिअण्णाणं । एवं अविसे सियं सुयं सुयणाणं च सुयअण्णाणं च। विसेसियं सम्मबिहिस्स सुयं सुयणाणं, मिच्छद्दिहिस्स सुयं सुयअण्णाणं । जे० डे. ल. शु० । अयमेव सूत्रपाठः श्रीमता मलयगिरिणा स्वीकृतो व्याख्यातश्चाप्यस्ति । विसेसिया मती सम्मद्दिहिस्स मतिणाणं, मिच्छहिहिस्स मतिअण्णाणं । अविसेसियं सुयं सुयणाणं सुयअण्णाणं च । विसेसियं सुयं समद्दिहिस्स सुयणाणं, मच्छद्दिहिस्स सुयअण्णाणं । खं० ।। वाणी व उपनामा का विस्तार Jain Education Intemational Page #68 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ३३ असुयगिस्सियं मइणागं उप्पत्तियाइबुद्धीओ य] सिरिदेववायगविरइयं णंदीयुत्तं । ४६. से किं तं असुयणिस्सियं ? असुयणिस्सियं चउबिहं पण्णत्तं, तं जहा उप्पत्तिया १ वेणइया २ कम्मया ३ पारिणामिया ४ । बुद्धी चउविहा वुत्ता पंचमा नोवलब्भइ ॥ ५६ ॥ पुव्वं अदिट्ठमसुयमवेइयतकखणविसुद्धगहियत्या । अव्याहयफलजोगा चुद्धी उप्पत्तिया णाम ॥ ५७ ॥ भैरहसिल १ पणिय २ रुक्खे ३ खुड्डग ४ पड ५ सरड ६ काय ७ उच्चारे ८॥ गय ९ घयण १० गोल ११ खंभे १२ खुड्डग १३ मग्गि १४ त्थि १५ पति १६ पुत्ते १७ ॥ ५८॥ भरह सिल १ मिंढ २ कुकुड ३ वालुय ४ हत्थी ५ [य] अगड ६ वणसंडे ७ । पायस ८ अइया ९ पत्ते १० खाडहिला ११ पंच पियरो १२ य ॥ ५९॥ 10 महुसित्थ १८ मुद्दि १९ यंके २० य णाणए २१ भिक्खु २२ चेडगणिहाणे २३ । सिक्खा २४ य अत्थसत्थे २५ इच्छा य महं २६ सतसहस्से २७ ॥६०॥१। भरणित्थरणसमत्था तिवग्गसुत्तत्थगहियपेयाला। उभयोलोगफलवती विणयसमुत्था हवति बुद्धी ॥ ६१॥ णिमित्ते १ अत्थसत्थे २ य लेहे ३ गणिए ४ य कूब ५ अस्से ६ य ।। 15 गद्दभ ७ लक्खण ८ गंठी ९ अंगए १० रहिए य गणिया य ११ ॥६॥ सीया साडी दीहं च तणं अवसव्वयं च कुंचस्स १२ । निव्वोदएँ १३ य गोणे घोडग पडणं च रुक्खाओ १४ ॥६३ ।। २ । उवओगदिट्ठसारा कम्मपसंगपरिघोलणविसाला । साहुक्कारफलवती कम्मसमुत्था हवति बुद्धी ॥ ६४ ॥ 20 हेरण्णिए १ करिसए २ कोलिय ३ डोएँ ४ य मुत्ति ५ घय ६ पवए ७। तुण्णाग ८ वड्डती ९ पूतिए १० य घड ११ चित्तकारे १२ य ॥६५॥३। १ वेणयिया खं० शु० । वेणतिया सं० ॥ २५८-५९ गाथे खं० शु० डे० ल० प्रतिषु पूर्वापरव्यत्यासेन वर्तते ॥ ३ गंडग खं० ॥ ४ पय ल० ॥ ५ कुक्कड ३ तिल ४ वालुय ५ हत्थि ६ अगड ७ इतिरूपः सूत्रपाठः सर्वास्वपि सूत्रप्रतिष्पलभ्यते । आवश्यकनियुक्त्यादावपीत्थम्भूत एव पाठ उपलभ्यते, तथैव च तत्र सरपि चूर्णी-वृत्तिकृदादिभिः व्याख्यातोऽस्ति । किच्चात्र एतत्सूत्रचूादावव्याख्यानाद् मलयगिरिपादवृत्त्यनुसारी पाठो मूले आइतोऽस्ति ॥ ६ पायल ८ पत्ते ९ अइया १० इति पाठानुसारेण मलयगिरिणा व्याख्यातमस्ति, न चोपलभ्यतेऽयं पाठः कुत्राप्यादर्श ॥ ७२० पणए २१ भिक्खू २२ य चेडग प्रत्यन्तरे ॥ ८ आसे ल.॥ ९ अगए १० गणिया य रहिए य ११ सस्विपि सूत्रप्रतिषु । आवश्यकनियुक्त्यादौ तवृत्त्यादौ च मूलगत एव पाठ उपलभ्यते ॥ १० निवोदपण १३ गोणे शु० ॥ ११ डोवे मो. मु.॥ चु०५ Jain Education Intemational Page #69 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ३४ जिणदासगणिमह्त्तरविरइयाए चुण्णीए संजुयं [मु०४६-५० गा. ६६-६९ 5 अणुमाण-हेउ-दिद्वंतसाहिया वयविवागपरिणामा ।। हिय-णीसेसफलवती बुद्धी परिणामिया णाम ॥ ६६ ॥ अभए १ सेट्ठि २ कुमारे ३ देवी (? वे) ४ उदिओदए हवति राया ५। साहू य गंदिसेणे ६ धणदत्ते ७ साव(? वि )ग ८ अमच्चे ९ ॥६७॥ .. खमए १० अमञ्चपुत्ते ११ चाणके १२ चेव थूलभद्दे १३ य । णासिकसुंदरीनंदे १४ वइरे १५ परिणामिया बुद्धी ॥ ६८॥ चलणाहण १६ आमंडे १७ मणी १८ य सप्पे १९ य खग्गि २० थूभि २१ दे २२ । परिणामियबुद्धीए एवमादी उदाहरणा ॥ ६९ ॥ ४। से तं असुयनिस्सियं । 10 ४६. पुवं० गाहा। [भरहसिल० गाहा]। भरह० गाहा । मधु० गाहा ॥ ५७ ॥ ५८ ॥ ५९॥६०॥ उप्पत्तिया गता १ । इमा वेणतिया भरणि० गाहा। निमित्ते० गाहा । सीता० गाहा ॥ ६१ ।। ६२ ॥ ६३॥ विण जे० २०० द्वि० ]यसमुत्था गता २ । इमा कम्मइया उवओग० गाहा । हेरण्णि गाहा ।। ६४॥६५॥ कम्मइया गता ३ । इमा पारिणामिया15 अणु० गाहा। अभए०गाहा। खमए० गाहा।चलणा०गाहा । एताओ सव्वाओ जहा णमोकार (आव०नि० गा० ९३८-५१) तहा दहन्याओ॥६६॥६७॥६८॥६९।। ४। इदाणिं मुतणिस्सितं उग्गहाइयं सवित्थरं भण्णति ४७. से कि तं सुयणिस्सियं मतिणाणं? सुयणिस्सियं मतिणाणं चउब्विहं पण्णत्तं, तं जहा-उग्गहे १ ईहा २ अवाए ३ धारणा ४। - ४७. इह सामण्णस्स बैबादिअत्थस्स य विसेसनिरवेक्खस्स अणिदेसस्स अवग्रहणमवग्रहः । तस्सेवऽत्थस्स 20 विचारणविसेसण्णेसणमीहा । तस्स विसेसणविसिहस्सऽत्यस्स व्यवसातोऽवायः, तबिसेसावन्तमित्यर्थः। तबिसेसावगतऽत्थस्स धरणं-अविचुती धारणा इत्यर्थः । तत्थ-- ४८. से कि तं उग्गहे ? उग्गहे दुविहे पण्णते, तं जहा-अत्थोग्गहे य वंजणोग्गहे य। ४८. ओग्गहो दुविहो-अत्थोग्गहो वंजणओग्गहो य॥ एत्थ वंजणोग्गहस्स पच्छाणुपुन्वितो 'अत्थोग्गहातो वा पुच्वं वंजणओग्गहो भवइ'त्ति वंजणोग्गहमेव पुवं भणामि १ विवक्कपरि' खं० सं० डे० ल• शु० ॥ २ 'णिस्सेस शु० मो० मु० ॥ ३ खवगे मो० ॥ ४ णामबुद्धीए ल० मु०॥ ५ रूवादिअसेसविसेसनिर आ० दा० । श्रीमलयगिरिपादैस्तु आवश्यकवृत्तौ नन्दिवृत्तौ चायं चूर्णिपाठ एवंरूप उद्धृतोऽस्ति" यदाह चूर्णिकृत्-" सामन्नस्स रूवादिविसेसणरहियस्स अनिद्देस्सस्स अवरगहणमवग्गह' इति ।" [आव० टीका पत्र २२-२ नन्दिवृत्ति पत्र १६८-१] ॥ ६ ‘णविसेसेणेहणमीहा आ० दा० ॥ ७ स्स अवसातो आ० दा० ॥ ८गम इत्यर्थः । तस्विसेसावगमस्स धरणं आ० दा० ॥ Jain Education Intemational Page #70 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सुयणिस्सियं मइणाणं वंजगोग्गहाई य] सिरिदेववायगविरइयं णंदीमुत्तं । ३५ ४९. से किं तं वंजणोग्गहे ? वंजणोग्गहे चउब्बिहे पण्णत्ते, तं जहा-सोर्तिदियवंजगोग्गहे १ घाणेंदियवंजणोग्गहे २ जिभिदियवंजणोगहे ३ फासेंदियवंजणोग्गहे ४ । से तं वंजणोग्गहे। ४९. वंजणाणं अवग्गहो वंजणावग्गहो, एत्य वनणग्गहणेण सहाइपरिणता दव्या घेत्तव्या । वंजणे अवग्गहो । वंजगावग्गहो, एत्थ वंजणग्गहणेण दबिदियं घेत्तव्यं । एतेसिं दोण्ड वि समासाणं इमो अत्थो-जेण करणभूतेण 5 अत्यो वंजिजइ तं वंजणं, जहा पदीवेण घडो। एवं सदादिपरिणतेहिं दव्वेहिं उवकरगिदियपत्तेहिं चित्तेहिं संबद्धेहि संपसत्तेहिं जम्हा अत्थो वंजिजइ ति तम्हा ते दया वंजगावग्णहो भग्णति । एस वंजगावग्गहो मुत्तसिद्धो चतुबिहो। ५०. [१] से किं तं अत्थोग्गहे ? अत्थोग्गहे छबिहे पण्णत्ते, तं जहा-सोइंदियअत्थोग्गहे १ चाखदियअत्थोग्गहे २ घाणिदियअत्थोग्गहे ३ जिभिदियअत्थोग्गहे ४ फासिदियअत्थोग्गहे ५ णोइंदियअत्थोग्गहे ६। [२] तस्स णं इमे एगट्ठिया णाणा- 10 घोसा णाणावंजणा पंच णामधेया भवंति, तं जहा-ओगिण्हणया १ उँवधारणया २ सवणता ३ अवलंबणता ४ मेहा ५) से तं उग्गहे । ५०. [१] से किं तं अत्थोग्गहेत्यादि सूत्रम् । अत्थस्स ओग्गहो: अत्थोग्गहो । सो य वंजणावग्गहातो चरिमसमयाणंतरं एक्कसमयं अविसिटिंदियविसयं गेण्हतो अत्थावग्गहो भवति । चक्खिदियस्स मणसो य वंजणाभावे पढम चेव जं अविसिटमत्थग्गहणं कालयो एगसमयं सो अत्थोग्गही भाणितको । सव्यो वेस विभागेण छविहो 15 दंसिजति, ण पुण तस्सोग्गहस्स काले सदादिविसेसवुद्धी अस्थि । णोइंदियो त्ति-मणो। सो य दधमणो भावमणो य। तत्थ मणपजत्तिणामकम्मुदयातो जोग्गे मणोदव्वे घेत्तुं मणजोग्ग(? ग)परिणामिता दवा दव्वमणो भण्णति । जीवो पुण मणणपरिणामक्रियावण्णो भावमणो । एस उभयरूपो मगदव्यालंबणो जीवस्स नाणवावारो भावमणो भण्णति । तस्स जो उवकरणिदियदुवारनिरवेक्खो घडाइअत्थसरूवचिंतणपरो बोधो उप्पजति सो णोइंदियत्थावग्गहो भवति । [२] घोस त्ति-उदत्तादिया सरविसेसा [जे० २०१ प्र० ] घोसा भण्णंति । बंजणं ति-अभिलावखरा । ते इमे एगट्ठिया पंच-ओगिण्हणता इत्यादि । एते ओग्गहसामण्णतो पंच वि णियमा एगड़िता। उग्गहविभागे पुण कज्जमाणे उग्गहविभागंसेण भिण्णत्था भवंति । सो य उग्गहो तिविहो-वंजणोग्गहो सामण्णत्थावग्गहो विसेससामण्णत्थावग्गहो य। एगहियाण इमो भिण्णत्थो-वंजगोग्गहस्स पढमसमयपविठ्ठपोग्गलाण गहणता ओगिण्हणता भण्णति, 'उ-प्पावल्ले' त्ति कानुं १। वितियादिसमयादिसु जाव वंजणोग्गहो तात्र उवधारणता 25 भण्णति २। एगसामइगसामण्णत्थावग्गहकाले सवणता भण्णति ३। विसेससामण्णत्थावग्गहकाले अबलंवणता १चक्दि खं० सं० ॥ २ "घेजा मो. मु० ॥ ३ ओगेण्ड मो. मु० ॥ ४ अवधाजे० ॥ ५ अवि सव्विदिय आ० । अविसिसविदिय दा० ॥ ६ बुद्धिमत्थि जे० ॥ ७ विसेसावग्गहो सामण्ण आ. दा. । हारि०वृत्ती " त्रिविधवावग्रहः-सामान्यावग्रहः विशेषायग्रहः विशेषसामान्यार्थावग्रहश्च" इति आ० दा० प्रतिगतचूर्णिपाठभेदानुसारि भेदनामत्रयं दृश्यते । किञ्च जेसलमेरुदुर्गस्थप्राचीनतमे ताडपत्रीयादर्श विसावग्गहो इति स्थान बंजणोग्गहो इति पाठो वर्तते । मलयगिरिपादेरपि नन्दिवृत्तौ व्यञ्जनावग्रह इति जे. प्रत्यनुसारि नाम निष्टङ्कितमस्ति । तथाहि-"इहावग्रहस्त्रिधा, तद्यथा-व्यञ्जनावग्रहः सामान्यार्थावग्रहः विशेषसामान्यार्थावग्रहश्च ।" पत्र १७४-२ ॥ ८ भण्णति, आपल्ले आ॰ दा० ॥ 20 Page #71 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जिणदासगणिमहत्तरविरड्याए चुण्णीए संजुयं [सु० ५१-५५ भण्णति ४ । उत्तरुत्तरविसेससामण्णत्थावग्गहेमु जाव मेरया धावइ ताव मेधा भण्णइ ५। जत्थ वंजणावग्गहो नत्थि तत्थ सवणादिया तिष्णि एगट्टिता भवंति । आह–णणु भिण्णत्थेदसणे एगद्वित त्ति विरुद्धं ? उच्यते, ण विरुद्धं, जतो सत्यविकैप्पेमु उग्गहस्सेव सरूवं दंसिज्जति ।। इदाणिं उग्गहसमणंतरं ईहा . ५१. [१] से किं तं ईहा ? ईहा छबिहा पण्णत्ता, तं जहा-सोदियईहा १ चक्खि5 दियईहा २ घाणेंदियईहा ३ जिभिदियईहा ४ फासेंदियईहा ५ णोइंदियईहा ६ । [२] तीसे णं इमे एगट्ठिया णाणाघोसा णाणावंजणा पंच णामधेयाँ भवंति, तं जहाआभोगणया १ मग्गणया २ गवेसणया ३ चिंता ४ वीमंसा ५। से तं ईहा। ५१. [१] सा छबिहा मुत्तसिद्धा। [२] इमे तस्सेगठिया, ते वि ईहासामण्ातो एगट्टिता चेत्र, अत्थविकप्पणातो पुण भिण्णत्था । इमेण 10 विधिणा-आभोयणता इत्यादि । ओग्गहसमयाणंतरं सम्भूतविसेसत्थाभिमुहमालोयणं आभोयणता भण्णति १। तस्सेव विसेसत्थस्स अण्णय-वइरेगबम्मसमालोयणं मग्गणा भण्णति २ । तस्सेवऽत्थस्स वइरेगधम्मपरिचाओ अण्णयधम्मसमालोगणं च गवेसणता भण्मति ३। तस्सेव तद्धम्माणुगतत्थस्स पुणो पुणो समालोयणतेण चिंता भण्मति ४ । तमेवत्थं णिचा-ऽणिचादिहिं दब-भावेहिं विमरिसतो वीमंसा भण्णति ५। एवं बहुधा अस्थमालोयंतस्स उक्कोसतो अंतमुहुत्तकालं सव्या ईहा भवति ॥ ईहाणंतरं अबातो15 ५२. [१] से किं तं अवाए ? अवाए छबिहे पण्णत्ते, तं जहा-सोइंदियावाए १ चक्खिदियावाए २ घाणेदियोवाए ३ जिभिदियावाए ४ फासेंदियौवाए ५ णोइंदियाँवाए । [२] तस्स णं इमे एगट्ठिया णाणाघोसा णाणावंजणा पंच णामधेयाँ भवंति, तं जहाआउट्टणया १ पच्चाउट्टणया २ अवाए ३ बुद्धी ४ विण्णाणे ५। से तं अवाए। ५२. [१] सो छन्धिहो सुत्तसिद्धो । 20 [२] तस्सेगट्टिता इमे पंच, ते य अवायसामध्यत्तणतो णियमा एगद्विता चेच, अभिधाणभिण्णत्तणतो पुण भिण्णत्था । [जे० २०१ द्वि०] इमेण विधिना-आउट्टणता इत्यादि । ईहणभावनियत्तस्स अत्थसरूपडियोधबुद्धरस य परिच्छेदमुष्पादतरस आउट्टणता भणति १। ईहणभावनियट्टस्स वि तमत्यमालोयंत स पुणो पुणो णियट्टणं पञ्चाउट्टणं भण्गति २ । सनहा ईकाए अक्षयणं काहुँ अवधारणावधारितत्थम्स अधारयतो अथातो त्ति भण्या ३ । पुणो पुषो तमत्थावधारणाधारितं युज्झतो बुद्धी भवइ ४ । तम्मि चेवावधारितमत्थे दिसेसे पेक्खतो 25 अवधारयतो य विष्णाणे ति भण्ाति ५ ॥ अनायाणंतरं धारणा १त्थताओ एग आ० ॥ २ 'विधिक जे० ॥ ३ चक्चुदि सं० ॥ ४ धेजा मो० मु० ॥ ५ पहि दंदभावे हिं जे० । विमर्पणं विमर्षः, क्षयोपशमविशेषादेवार्थ स्पष्टतरावबोधतः सद्भूनाथ विशेषाभिमुखमेव व्यतिरेकधर्मपरित्यागतोऽन्वयधर्मालोचनं विमर्षः, नित्या-ऽनित्यादिद्रव्य-भावालोचनमित्यन्ये । ” इति हारि• वृत्तौ । “तत ऊर्य क्षयोपशमविशेषात् सप्टतरं सद्भूतार्थविशेषाभिमुखमेव व्यतिरेकधर्मपरित्यागतोऽन्वयधर्मापरित्यागतोऽन्ययधमनिमर्शन विमर्शः" इति मलयगिरिवृत्तौ ॥६ °य अवाए डे० ॥ ७ चक्वंदिय सं० ॥ ८-९-१०-११-१२ यअवाए डे० ॥ १३ 'धिज्जा मो० मु.॥ १४ आवट्टणया पश्चावट्टणया खं० शु• हारि० मलय. वृत्त्योश्च । आउंटणया पच्चाउंटणया सं. ल. ॥ १५ विण्णाणं सं० सं० ॥ Jain Education Interational Page #72 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ईहावायधारणाओ पडिबोहगदिद्रुतो य] सिरिदेववायगविरइयं णंदीसुत्तं । ५३. [१] से किं तं धारणा ? धारणा छव्विहा पण्णता, तं जहा-सोइंदियधारणा १ चक्खिदियधारणा २ घाणिदियधारणा ३ जिभिदियधारणा ४ फासेंदियधारणा ५ णोइंदियधारणा ६। [२] तीसे णं इमे एगट्ठिया णाणाघोमा णाणावंजणा पंच णामधेया भवंति, तं जहा-धरणा १ धारणा २ ठवणा ३ पतिट्ठा ४ कोडे ५। से तं धारणा। ५३. [१] सा य छभिहा मुत्तसिद्धा।। [२] तोगडिता पंच । ते य सामग्णधारणं पडुच्च णियमा एमट्ठिया, धारणत्थरिकप्पणताए भिग्गत्था । इमेग रिधिणा-धरणा इत्यादि । आगाणंतरं तमत्थं अविचुतीर जहण्णुकोसेणं अंतमुहुत्तं धरतम्स धरणा भण्णाति १ । तमे अल्थं अणुपयोगलणतो विचुतं जहण्णेणं अंतमुहुनातो परतो दिवसादिकालविभागेमु संभरतो य धारणा भण्णति २ । 'ठरण' ति ठापणा, सा य आयावधारियमत्थं पुधावरमालोइयं हियतम्मि ठाइयंतस्स ठवणा भण्णति, पूर्णघटस्थापनाउन ३ । 'पति' ति सो चित आधारितत्थो हितयग्मि प्रभेदेन पइटातमाणो 10 पतिट्ठा भण्यति, जले उपलक्षेपमतिष्ठारत् ४ । 'कोटे' त्ति जहा कोटुगे सालिमादिवीया पक्वित्ता अविणट्ठा धारिजंति तहा अयाताश्चारितमत्थं गुरूवदिखै मुत्तमत्थं वा अविणटुं धारयतो धारणा कोटगसम त्ति कातुं कोढे त्ति वत्ता ५॥ ५४. इचेतस्स अट्ठावीसतिविहम आभिणिवोहियणाणस्स वंजणोग्गहस्स परूवणं करिस्सामि पडिबोहगदिट्ठतेण मल्लगदिटुंतेण य । ५४. इच्चेनस्सेत्यादि गुत्तं । 'इति' उपनदर्शने । 'एतस्स ' ति जं अतिकी अठावीसतिभेदं । ते य के अहावीसं भेदा ? उच्यते-चउचिहो वंजगावग्गहो, छव्यिहो अत्थादग्गहो, छन्यिा ईहा, छबिहो अवायो, छविधा धारणा, एते सव्वे अट्ठावीसं । एत्थ अट्टापसइविहस्स मज्झातो जो वंजणारग्गहो चउनिहो तस्स दिटुंतदुगेण परूवणा॥ ५५. से किं तं पडिबोहगदिट्ठतेणं ? पडिबोहगदिद्रुतेणं से जहाणामए केई पुरिसे 20 कंचि पुरिसं सुत्तं पडिबोहेज्जा 'अमुगा! अमुग!' ति, तत्थ य चोयगे पन्नवगं एवं वयासीकिं एगसमयपविट्ठा पोग्गला गहणमागच्छंति ? दुसमयपविट्ठा पोग्गला गहणप्रागच्छंति?जाव दमम: पपविट्ठा पोग्गला गहणमागच्छंति ? संखेज्जसमयपविठ्ठा पोग्गला गहणमागच्छंति ? असंखेज्जम यपविठ्ठा पोग्गला गहणनागच्छंति ? । एवं वदंतं चोयगं पण्णवगे एवं वंयासी-जो एगलमयपविष्ठा पोग्गला गहणमागच्छंति, णो दुसमयपविट्ठा पोग्गला गहणमा- 25 १ 'धिजा मो० मु० ॥ २ त्रिपञ्चाशत्तमसूत्रानन्तरं श्रीहरिभद्र-श्रीमलयगिरिभ्यां व्याख्यातं सर्वेष्वपि सूत्रादर्शपु एक सूत्रमधिकं यत्तते । तचम् -- उग्गहे पकलामइए, अंतोमुहुत्तिया ईहा, अंतोमुहुत्तिय अवाए, धारणा संखेज वा कालं असंखेज वा कालं । एवं अट्ठा सं० डे० मो० शु० । उग्गहे एक समय, ईहा-ऽवाया मुहुत्तमद्धं ति, धारणा संखेज्ज वा कालं असंखेज या कालं । एवं अट्ठा ल० । उग्गह एक समयं, ईसा-ऽवाया मुहत्तमेतं तु । कालमसंखं संखं च धारणा होति णायचा ॥१॥ एवं अट्टा सं० ॥ ३ एवं अट्ठा सर्वासु सूत्रप्रतिषु वृत्त्योश्च ॥ ४ पयस्स अट्ठा आ. दा० ॥ ५ से णं जहा मो० ॥ ६ कयि शु० ॥ ७ एवं इति खं० सं० नास्ति ॥ ८ चोदगं सं० ॥ ९ वदासी खं० ॥ Page #73 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जिणदासगणिमहत्तरविरझ्याए. चुण्णीए संजुयं [सु० ५६ गच्छंति, जाव णो दससमयपविट्ठा पोग्गला गहणमागच्छंति, णो संखेज्जसमयपविट्ठा पोग्गला गहणमागच्छंति, असंखेज्जसमयपविट्ठा पोग्गला गहणमागच्छंति । सेत्तं पडिबोहगदिटुंतेणं। ५५. से जहाणामयेत्यादि । 'से' त्ति पडिवोधकस्स गिद्देसे । 'जहाणामये' त्ति जहाणा [जे० 5 २०२ प्र०]म, संभवतः आत्माभिप्रायकृतादित्यर्थः। सपण्णुप्पणीय मत्थं तदणुलारि मुत्तं वा अप्पवुद्विविष्णागत्तणयो अगवगच्छमाणो सीसो पुच्छाचोदणातो चोदको, अहरा तमेव मुत्तमत्थं वा 'अघडमाणं' ति मण्णमाणो तद्दोसचोदयो य चोदगो भण्णति । परयणमविरुद्धं निदोसं मुतत्थं पण्णवेतो पण्णगो, विरुद्ध-पुणरुत्तमुत्तं वा अत्थतो अविरुद्धं दरिसेतो पण्णवेति जो सो वा पण्णवगो भण्णति, यथावत् संशयच्छेद्रीत्यर्थः । चोदको संसयमावण्णो पण्णवर्ग पुच्छति-'कि एगसमयादिपविद्या' इत्यादि कंठं । एवं चोदकं पुछाभिप्पायेग वदंतं पण्ण10 वगाऽऽह-'णो एगसमयपविठ्ठा' इत्यादि । जो एस पडिसेहो कतो एस सदाइफुडण्णिागजणगत्तेणं ति णो गहणमागच्छंति, इहरा पोग्गला गगमागच्छंत्येवेत्यर्थः। एवं एगादिसमयपविठ्ठपोग्गलपडिसिद्धेमु इमा अगुण्णा'असंखेजसमयपविट्ठा पोग्गला गहणमागच्छंति' त्ति । इमस्स अणणुयोगत्यो अणुयोगत्यो य । तत्थ अणणुयोगो इमो-जहा पवासी सगिहमेंतो अदाणं पंचाहेण दसाहेण वा वीतीवतित्ता सगिहं पविटो त्ति, एवं असंखे ज्जेहि समयेहि आगता पविट्ठा कण्णविलेमु पोग्गला गेण्हति त्ति, एवं अणणुयोगो भवति । इमो अणुयोगत्थो15 पढमसमयादारब्भ पतिसमयं पविसमाणेमु असंखेजइमे समए जे पविट्ठा ते गैरणमागच्छंति, ते य सदादिविप्रणाणजणग त्ति कातुं, अतो तेसिं गहणमुपदिढे । सो य असंखेजइसमयो किंपमाणे असंखेज्जए भवति ? उच्यते-जहण्णेणं आवलियाए असंखेजइभागभेत्तेमु समयेमु गतेमुं ति, उक्कोसेणं [जे० २०२ द्वि० ] संखेजामु आवलियामु आणापाणुकालपुहत्ते वा, उभयधा वि अविरुद्धं ॥ गतो पडिबोधकदिद्वंतो । इदागिं औवागदिटुंतो ५६. [१] से किं तं मल्लगदिटुंतेणं ? मल्लगदिटुंतेणं से जहाणामए केई पुरिसे आवाग20 सीसाओ मलगं गहाय तत्थेगं उदगविपक्खिवेज्जा से णटे, अण्णे पक्खित्ते से वि णद्वे, एवं पक्खिप्पमाणेसु पक्खिप्पमाणेसु होही से उदगाबेंदू जे णं तं मल्लगं रावेहिति, होही से उदगबिंदू जे णं तंसि मल्लगंसि ठाहिति, होही" से उदगावेदू जे" णं तं मल्लगं भैरेहिति, होही से उदगावेदू जेणं तं मल्लगं पवाहेहिति, एवाम पक्खिप्पमाणे हे पक्खिप्पमाणेहि अणंतेहि पोग्गले हे जाहे तं वंजणं पूरितं होति ताहे हैं" ति करेति णो" चेव १ गहत्थमा जे० ॥ २ 'आवागदिटुंतो' इति मल्लकदृष्टान्तस्य नामान्तरम् ॥ ३ तेणं जहा को दिढतो? से जहा सं० ॥ ४ केयि शु० ॥ ५ अण्णे वि प खं० विना ॥ ६ माणे पक्खिप्पमाणे होही डे० ॥ ७-९-११ होहिति सं० शु० । होहिह ल० डे० ॥ ८ रावेहिइ सं० ल• शु० । रवेदिइ जे० ॥ १० मल्लगे खं० सं० ॥ १२-१४ जो णं खं० । जणं हारिवृत्तौ ॥ १३ भरेहिति इत्यनन्तरं विशेषावश्यकमहाभाष्यमलधारीयटीकायां १४८ पत्रे नन्दीपाठोद्धरणे होही से उदगबिंदू जे णं तंसि मल्लगंसिन द्वाहिहिति इत्यधिक 'न ठाहिहितिसूत्रमुपलभ्यते, नोपलभ्यते इदं सूत्रं सर्वास्वपि सूत्रप्रतिपु ॥ १५ एवमेव ख० । एमेव शु०॥ १६ 'मेव पक्खिप्पमाणेहिं अणंतेहिं पोग्ग ल० विआमलवृत्ती १४८ पत्र नन्दीसूत्रपाठोद्धरणे । 'मेव पक्खिप्पमाणेहिं पोग्ग खं० । मेव पक्खिप्पमाणेहिं पक्खिप्पमाणेहिं पोग्ग सं० ॥ १७ 'हो' ति खं० ॥ १८ ण उण जाखं० ॥ Page #74 -------------------------------------------------------------------------- ________________ मल्लगदिट्ठनो] सिरिदेववायगविरइयं गंदीमुत्तं । णं जाणति के वेसे सद्दाइ ?, तओ ईहं पविसति तओ जाणइ अमुगे एस संदाइ ?, तओ अवायं पविसइ तओ से उवगयं हवइ, तओ णं धारणं पविसइ तओ णं धारेइ संखेज्जं वा कालं असंखेज्जं वा कालं । [२] से जहाणाभए केई पुरिसे अव्वत्तं सदं सुणेज्जा तेणं सद्दे ति उग्गहिए, णो चेव णं जाणइ के वेस सद्दे त्ति, तओ ईहं अणुपविसइ ततो जाणति अमुगे एस सद्दे, ततो 5 णं अवायं पविसइ ततो से उवगयं हवति, ततो धारणं पविसइ तओ णं धारेइ संखेज्जं वा कालं असंखेज्ज वा कालं। एवं अव्वत्तं रूवं, अव्वत्तं गंध, अव्वत्तं रसं, अव्वत्तं फासं पडिसंवेदेज्जा। [३] से जहाणामए केई पुरिसे अवत्तं सुमिणं पंडिसंवेदेज्जा, तेणं सुमिणे त्ति उग्गहिएँ ण पुण जाणति के वेस सुमिणे ति, तओ ईहं पविसइ तओ जाणति अमुगे 10 एम सुमिणे त्ति, ततो अवायं पविसइ ततो से उवगयं हवइ, ततो धारणं पंविसइ तओ णं धारेइ संखेज्जं वा कालं असंखेज्जं वा कालं । से तं मल्लगदिटुंतेणं । १ के वि एस मो० मु० ॥ २ सद्दे त्ति ख० । सद्द त्ति सं० ॥ ३ तओ उवयाणं गच्छति, तओ से उवग्गहो हवइ ख० ॥ ४ गच्छति सं० सं० शु० ल० ॥ ५ संखेजकालं असंखेजकालं ल० ॥ ६ केयि शु० ॥ ७ सुणेह तेणं डे. ल.॥ ८ सद्द त्ति खं० शु० । सद्दी त्ति जे० डे० ल• मो० ॥ ९ सद्दाइ, तो ईहं पविसइ सर्वासु सूत्रप्रतिषु हारि. मलय० वृत्त्योश्च ॥ १० गच्छति खं० सं० शु० ल० ॥ ११ पडिवज्जेति संखेज खं० सं०॥ १२ →-एतचिह्नमध्यवत्तिसूत्रस्थाने जे० मो. मु. प्रतिषु रूप-गन्ध-रस-मशविषयाणि चत्वारि सूत्राण्युपलभ्यन्ते । तानि चेमानि से जहानामए केई पुरिसे अश्वत्तं रूवं पासिजा, तेणं रूवे त्ति उग्गहिए, नो चेव णं जाणइ के वेस रुवे त्ति, तओ ईहं पविसइ तओ जाणइ अमुगे पल रूवे ति, तओ अवायं पविसइ तओ से उवगयं हवइ, तो धारणं पविसइ तओ णं धारेइ संखिज्जं वा कालं असंखिज्जं वा कालं । से जहानामए केई पुरिसे अव्वत्तं गंधं अग्घाइजा, तेणं गंधे ति उग्गहिए, नो चेव णं जाणइ के वेस गंधे त्ति. तओ ईहं पविसइ तओ जाणइ अमुगे पस गंधे तो अवायं पविसइ तओ से उवगयं हवइ, तो धारणं पविसइ तओ णं धारेइ संखिजं वा कालं असंखिज्जं वा कालं । से जहानामए केई पुरिसे अव्वत्तं रसं आसाइजा, तेणं रसे त्ति उग्गहिए, नो चेव णं जाणइ के वेस रसे त्ति, तओ ईहे पविसइ तओ जाणइ अमुगे एस रसे, तओ अवायं पविसइ तओ से उवगयं हवा, तो धारणं पविसइ तओ गं धारेइ संखिज्ज वा कालं असंखिज वा कालं । से जहानामए केई पूरिसे अश्वत्तं फासं पडिसंवेइज्जा, तेणं फासे नि उम्गहिए, नो चेव णं जाणइ के वेस . फासे ति, तओ ईहं पविसइ तओ जाणइ अमुगे एस फासे, तओ अवायं पविसइ तओ से उवगयं हवइ, तो धारणं पविसेइ तभी णं धारेइ संखिज्जं वा कालं असंखिज्जं या कालं ॥ १३ केयि शु० ॥ १४ पासिजा मो० ल० शु० ॥ १५ सुमिणो त्ति डे० ल० । सुविणो त्ति मलयगिरिटीकायाम् ॥ १६ ५ नो चेव णं जा मो० मु० ॥ १७ के वि मुंडे० ल० ॥ १८ गच्छति ख० सं० शु० ल० ॥ १९ पडिवजति सं० सं०॥ Page #75 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जिगदासगणिमहत्तर विरइयाए चुण्णीए संजयं [ सु० ५६ ५६. [१] तत्थ आवागसीसगं ति [आ] रागडाणमेत्र, अढ़वा आपागद्वाणस्स आसणं समंता परिपेरंतं, अहवा आपागमुत्तारयाण जं ठाणं तं आपागसीसयं भण्णति । 'अनंतेहिं' ति प्रथमसमयादारभ्य प्रतिसमयं अनंता विशंतीत्यतो अनंता । 'जाहे तं वंजणं पूरितं भवति' त्ति, एत्थ वंजणग्गहणेण सहाइपुग्गलदव्या दव्विंदियं वा उभयसंबंधो वा घेतं, तिधाविण विरोधो । वंजणं पूरियं ति कहं ? उच्यते - जदा पुग्गलदव्वा वंजणं तदा पूरियं ति पभूता ते 5 पोलदव्या जाता, स्वं प्रमाणमागता सविसयपडिवोधसमत्था जाता इत्यर्थः १ | जदा पुंण दव्वंदियं वंजणं तदा पूरियं ति कहूं ? उच्यते- जा तेहिं पोग्गलेहिं तं दविदियं कृतं भरितं वावितं तदा पूरियं ति भण्णति २ | जदा तु उभयसंबंधो वंजणं तया पूरियं ति कहं ? उच्यते-दव्विंदियस्स पुग्गला अंगीभावमागता, पुग्गला य दव्विंदिए अनुषक्ताः, एस उभयभावो, एतम्मि उभयभावे पुग्गलेहिं इंदियं पूरितं, इंदिएण त्रि सविसयपडिवोधकष्पमाणा पुग्गला गहिता, एवं उभयसामत्थतो विष्णाणभावो भवतीत्यर्थः ३ । 'हुं ति करे' त्ति वंजणे पूरिते तं अत्थं गेण्हड़ 10 त्ति वृत्तं भवति । एस एकसमयिओ अत्यावस्गहो । तं पुण किपगारं गेण्हति ? उच्यते- 'नो चेत्र णं जाणति के वि एस सद्दादी' तक्काले सामण्णमणिदेसं, सदादिविसेसं ण जागइ त्ति वृत्तं भवति । किंच - सरूत्र - णाम- जोति-गुण-किरियाविपविमुहं अनाख्येयं गृह्णातीत्यर्थः । एत्थ पडिवोधकालातो [ जे० २०३ प्र० ] पुत्रं वंजणोग्गहो से भवति । एसा एवं वंजणोग्गहस्स परूत्रणा कता । वंजगोग्गहस्स परतो 'हुं ति करेति ' त्ति एतम्मि पडिवोधकाले एगसमइयो अत्थावग्गहो से भवति, ततो से कमेण ईहा- वाय-धारणाओ त्ति । एत्थ पडिवोह-मलगदितेहिं वंजणो15 ग्गहस्स अत्थोग्गहस्स य भिण्णकालता फुडं दंसिता । पर आह- साधु मे पडिवोध - मलगदितेहिं वंजण - ऽत्थावग्गहाण भेदो दंसितो, जागरओ पुण सदाइअत्थे पडुप्पण्णे णः वंजणोग्गहो लक्खिज्जति, जतो पुण्यामेव सहाइअत्थविष्णाणमुप्पज्जते, भणितं च सुचे 'से जहाणामये केयि पुरिसे' त्यादि । अहवा इमस्स सुत्तस्स इमो संबंधो पर आह-यदुक्तं भवता सरूव-नाम-जोति-गुण-क्रियाविकल्पविमुखं अनाख्येयं गृह्णातीत्येतद् विरुध्यते, कुतः ? यतः सूत्रेऽभिहितं - से जहाणामतेत्यादि । अहवा इमो संबंधो-प्रसुप्तप्रतिबोधक-मलग दिहं तेहिं वंजण- ऽत्थावग्गहाण भेदो 20 दंसितो, इह पुण सुत्ते मल्लगदितेणेव वंजण-स्थावग्गहाण भेदो दंसिज्जति ४० [२] ' से जहाणामते 'त्यादि । सुत्तुच्चारणसत्रणाणंतरमेव पर आह- एत्थ सुत्ते वंजण-त्थावग्गहाण लक्खिजंति, जतो 'अव्वत्तं सद्दं सुणेइ' त्ति भणितं, सहमेत्तेऽवधारिते पढमतो अत्राय एव लक्खिज्जति त्ति । आयरिय आह-ण तुम सुत्ताभिप्पायं जाणसि, णणु अव्वत्तसहसवणातो अत्थावग्गहग्गहणं कर्त, जतो अव्वत्तमणिदेसं सामण्णं विकप्परहियं ति भण्णति, तस्स य पुत्रं वंजणावग्गहेण भवितव्त्रं, जैतो एतग्गाहिणो सोता दिइंदियम्स अत्थोग्गहो वंजणोग्गह मंतरेण 25 भवांत त्ति नियमेसो, सो य कालमुहुमतणतो उप्पलसतपत्तछेज्जदिततो ण लक्खिज्जति । चोदक आह-जति एवं तो जं सुत्ते भणितं “तेणं सदे ति आग्गहिते" तं कहं ? उच्यते - इहतं " तेगं सदे ति ओग्गहिते "त्ति वक्खासूत्रकारोऽभिधत्ते इति करणनिदेसातो सव्चविसेसविमुहं शब्दमात्रमुक्तं [ जे० २०३ द्वि० ] भवति, णो चेत्र णं जाति के वेस सदे ? त्ति, ण तु शब्दोऽयमित्येवं बुध्यते, कम्हा ? उच्यते- एकसमयत्तातो अत्थावग्गहस्स, किंच पणतोय पण्णवगो संववहाराभिप्रायतो “ तेणं सदे त्ति ओग्गहिते " त्ति ब्रूते, ण दोसो । जति वा “सदोऽय " 30 मिति बुद्धी भवे तो अवातो चेव भवे, तच्च न, कहं ? उच्यते-णो जतो अत्थावग्गहसमयमेते काले “स" इति १ पुण उवगरणिदियं मलय नन्दिवृत्तौ चूर्णिपाठोद्धरणे ॥ २ आफुण्णं भरितं आ० । “आभृतं " इति हारि० वृत्तौ ॥ ३ अभिषक्ताः इत्यर्थः, तदा पूरियं ति भण्णइ इति मलय नन्दिवृत्तौ चूर्णिपाठोद्धरणे ॥ ४ पतारं आ० ॥ ५ जाति-किरिया जे० ॥ ६ जतो पत्तग्गाद्दिणो जे० दा० ॥ Page #76 -------------------------------------------------------------------------- ________________ मल्लगदिटुंतो] सिरिदेववायगविरइयं गंदीसुत्तं । विसेसणाणमत्थि, अह तम्मि वि समए सद्दोऽयमिति बुद्धी हवेज तो फुडं अवाय एव भवेज्ज, णो य तकाले अवातो इच्छिज्जति, जतो अत्थपरिच्छेदो असंखेजसमयकालिओ भवइ त्ति । अण्णे पुण आयरिया एतं मुत्तं→ विसेसत्यावग्गहे भणंति-'अब्बत्तं सदं सुणेज' ति एस+विसेसत्यावग्गहो, 'तेण सद्दे ति उग्गहिते' ति, एतं मुत्तखंडं सामण्णसदत्थावग्गहदंसगं, कहं ? उच्यते-जतो भण्णति “णो चेव णं जाणति के वि एस सद्दे "त्ति संख-संग-णालि-करयलादिको त्ति, एसो वि अविरुद्धो मुत्तत्थो । 'ततो' अत्थावग्गहसमयागंतरं पढमसमयादिमु 'ईहं अणुपविसति' 5 'ईहं' ति केइ संसयं मण्णते, ते ण भवति, संसयस्स अण्णाणभावत्तगतो, मतिणाणंसो य ईह त्ति । आह-को पुण संसयेहाण विसेसो ? उच्यते-इह जं थाणु-पुरिसादिअत्थेर्मु पेहितं चित्तं तदत्थपडिवोहत्तेण पडिहतं मुत्त इव चेतो संसयो भण्णति, तं च अण्णाणं, जं पुण हेतूववत्ति-साधणेहिं सब्भूतमत्थस्स विसेसधम्माभिमुहालोयणं तस्सेवऽत्थस्स अधम्मविमुहं असम्मोहमविफलमत्थपरिच्छेदकं चित्तं जं तं ईहा भण्णति । अणु त्ति-अवग्गहातो पच्छाभावे असंखेजसमइयं परिमाणतो ईहोवयोगं अविच्छेयत्तणतो अंतमुहुँत्तकालं ईहति, ततो विसिट्ठमतिनाणखयोवसमभाव- 10 त्तणतो अंतमुहुत्तकालब्भंतर एव जाणति 'अमुते एस सद्दे' संख-संगादिए ति। दुरवबोधत्तणतो पुण अत्थस्स अविसिट्ठमइण्णाणखयोवसमत्तणतो वा ईहोवयोगअंतमुहुत्तचुतो अणवगतत्थो पुणो वि अण्णं अंतमुहत्तं ईहति, [जे० २०४ प्र०] [एवं] ईहोवयोगाविच्छेदसंताणतो बहुए वि अंतमुहुत्ते ईहेज्जा, ण दोसो । ततो ईहाणंतरं अवातो। सो य सद्दाइअत्थपड्डुप्पण्णस्स जे परधम्मा तेसु विमुहस्स सधम्मे य अवधारयतो 'ण एस संगसदो, णिद्ध-मधुरगंभीरत्तणतो संखसदोऽय'मित्येवमवगतत्थो [जहण्णतो] असंखेजसमयितो उक्कोसतो णियमा एगंतमुहुत्तिओ जो 15 अवबोधो अत्थपरिच्छेदो सो अवातो भवति । ततो अवायाणंतरं धारणं पविसइ त्ति । सा य धारणा जहण्णतो असंखेन्जसमते अविच्चुतीए तमत्थं धरेति, उक्कोसतो अंतमुहुत्तं, अणुवयोगतो पुण तमत्थं विस्मृतं पुणो वि संभरइ त्ति धारणा । एवं सा संखेज्जवासाउयाणं मुहुत्त-दिवसादिकालसंखाए संखेनं कालं भवेज, असंखेजवासाउयाणं पुण असंखज्जं कालं। एवं चक्खिदिए वि रूवं भाणितव्वं, वंजणोग्गहवजं । घाण-रस-फासिदिएसु वि जहा सोइंदिते तहा सव्वं 20 माणितव्वं । 'संवेदेज' ति एते सदादिइंदियत्थे पडुप्पण्णे इंदियं स्वं स्वं इंदियत्यं आयखयोवसममणुरूवं सुभममुभं वा वेदेति । अहवा फरिसिंदयवज्जं सेसिदिएहिं पत्तमिदियत्थं प्रायसो इटमणिटं वा स्वं आत्मानुगतं वेदनं वेदते, न शरीरेण अनुपलक्ष वा वेदयतीत्यर्थः । फासिंदियमत्थं पुण स्त्रं अनुगतं शरीरानुगतं च दुहा वि फुडं वेदइ ति संवेदेज त्ति अतो भणितं । एवं मणसो वि मुविणे सदादिविसएमु अवग्गहादयो णेया, अण्णत्थ वा इंदियवावारअभावे मणेमाणस्स 25 त्ति । इह सुत्तेण निदरिसणं मणे [३] से जहाणामतेत्यादि मुत्तं । कंठं । सुविणो मे दिट्टो त्ति सुविणदिढं अव्बत्तं सुमरइ । तच्च प्रतियोधप्रथमसमये सुविणमिति संभरतो अत्थावग्गहो, तस्य प्रथमावस्थायां व्यञ्जनावग्रहः, परतो ईहादि । सेसं पूर्ववत् । जग्गतो अणिदियत्थवावारे वि मणसो जुञ्जते वंजणावग्गहो, उवयोगम्स असंखेजसमयत्तणयो, [जे० २०४ द्वि०] उवयोगद्धाए य प्रतिसमयमगोदव्वग्गहणतो, मणोदवाणं च वंजणववदेसतो समए य असंखेजतिमे मनसो नियमा- 30 १→ एतच्चिहान्तर्वती पाठः जे. नास्ति ॥ २ 'पणस्सऽत्था आ० दा० ॥ ३ णादिकर आ. दा० ॥ ४ सु पविढे चित्तं आ० ॥ ५ वेदेज त्ति । एते सहाई चक्खुइंदियवज्ज सेसिंदिपहिं आ० दा० ॥ ६ 'नुपलंभ वा आ० दा०॥ ७ तस्य पूर्वमवस्था' जे. दा० ॥ Jain Education Intemational Page #77 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ४२ जिणदासगणिमहत्तरविरइयाए चुण्णीए संजुयं [सु० ५७-५८ गा० ७०-७५ र्थग्रहणं भवेत् । तस्य च प्रथमसमयार्थप्रतिवोधकालेऽर्थावग्रहः, तस्य पूर्वमसंख्येयसमयेषु व्यञ्जनावग्रहः । शेषमीहादि पूर्ववत् । सीसो पुच्छति-उम्गहादीणं उ कमातिक्कमे एगतरअभावे वा किं सदादिवत्थुपरिच्छेदो ण भवति ? आचार्याह-आम, ण भवति, अत एव च क्रमे नियमः, जम्हा णो अगहितं ईहति तम्हा पुव्वं उग्गहो, जम्हा य अणीहितं णो अवगच्छति ईहाणंतरं तम्हा अवायो, जम्हा य अणावातं ण धारिजति वत्थु अवायाणंतरं तम्हा 5 धारणा । जम्हा य एस क्रमनियमो तम्हा सयो आभिणिवोधियनाणावगमो नियमा एवं भवति, अत एव च कारणा सव्वे अवग्गहादयो मतिनाणभेदा भवंतीत्यर्थः॥ __ ५७. तं समासओ चउविहं पण्णत्तं, तं जहा-देव्वओ खेत्तओ कालओ भावओ। तत्थ दव्वओ णं आभिणिबोहियणाणी आएसेणं सव्वदव्वाइं जाणति ण पासति १ । खेत्तओ णं आभिणिबोहियणाणी आएसेणं सव्वं खेत्तं जाणइ ण पासइ २ । कालओ णं 10 आभिणिबोहियणाणी आएसेणं सव्वं कालं जाणइ न पासइ ३ । भावओ णं आभिणिबोहियणाणी आएसेणं सव्वे भावे जाणइ ण पासइ ४ । ५७. तं समासतो चतुम्विहेत्यादि सुत्तं । 'तं च मतिनाणं खयोवसमरूवतो एगविहं पि होतुं णेयभेदत्तणतो नाणाभेदा दव्वादिया से भवंति । 'दबतो णं' ति दबतो वत्तव्वे 'ण' ति वयणालंकारे, देसीवयणतो वा 'णं' अहवा, अपादानान्ते पञ्चमी विभक्तिः, तत्थ पायतवयणसेलीतो दन्यतो णं एवं आभिनिबोधियनाणी लभति15 'आदेसेण'मित्यादि, इहाऽऽदेसो नाम-प्रकारो । सो य सामण्णतो विसेसतो य । तत्थ दव्बजातिसामण्णादेसेणं सबदवाणि धम्मत्थिकायादियाणि जाणति, विसेसदव्वे वि जहा धम्मत्यिकाये धम्मत्थिकायस्स देसे धम्मत्थिकायस्स पदेसेत्यादि केयी जाणति, सव्वे ण याणति, जहा मुहुमपरिणता अंविसतत्था अप्पण्णवणादिया य। 'ण पस्सइ' ति सव्वे सामण्ण-विसेसादेसहिते धम्म दिए, चक्म्वु-अचक्खुदंसणेण रूब-सदाइते केयिं पासति त्ति वत्तव्वं । अहवाऽऽदेसो-मुत्तं, तस्सादेसतो सचदव्वे ज रीत्यादि । चोदक आह-जति मुत्तं कहं मतिनाणं ? ति, उच्यते20 सुतोवलद्धमत्थेमु अणुसरतो तब्भावणवुद्धिसामत्थतो [जे० २०५ प्र०] सुतोवयोगणिरवेक्खा वि मती पवत्तइ त्ति ण सुत्तादेसो विरुज्झते १। खेत्तं पि सामण्ण-विसेसादेसतो । तत्थ सामण्णतो खेत्तमागासं, तं गं सव्वग १ दवओ ४ । दवओ ल० ॥ २ तत्थ इति पदं खं० सं० डे० ल० नास्ति, जे. शु० मो० मु. विआमलवृत्तौ नन्ाद्धरणे २३० पत्रे पुनर्वतते ॥ ३-४-५-६ अत्र द्रव्य-क्षेत्र काल भावविषयकेषु चतुष्वपि सूत्रांशेषु जाति पासति इति पाठो जाणति ण पासति इति पाठभेदेन सह भगवत्यां अष्टमशतकद्वितीयो द्देशके ३५६-२ पत्र वर्तते । अत्राभयदेवसूरेष्टीका-“दव्वओ गं' ति द्रव्यमाश्रित्य आभिनिबोधिकविषयद्रव्यं वाऽऽश्रित्य यद् आभिनिबोधिकज्ञानं तत्र 'आएसेणं' ति आदेशः-प्रकारः सामान्य-विशेषरूपः तत्र च 'आदेशेन' ओघतो द्रव्यमात्रतया, न तु तद्गतसबविशेषापेक्षयेति भावः, अथवा 'आदेशेन' श्रुतपरिकर्मिततया 'सर्वद्रव्याणि' धर्मास्तिकायादीनि 'जानाति' अवाय-धारणापेक्षयाऽववुध्यते, ज्ञानस्यावाय-धारणारूपत्वात् , 'पासई' त्ति पश्यति अवग्रहहापेक्षयाऽववुध्यते, अवग्रहहयोर्दशनत्वात् । ..............'खेत्तओ' ति क्षेत्रमाश्रित्य आभिनिवोधिकज्ञानविषय क्षेत्र वाऽऽश्रित्य यद् आभिनिबोधिक ज्ञानं तत्र 'आदेसेणं' ति ओघतः श्रुतपरि कर्मणया वा 'सव्वं खेत्त' ति लोका-ऽलोकरूपम् । एवं कालतो भावतश्चेति ।...............इदं च सूत्रं नन्द्यां इहैव च वाचनान्तरे 'न पासई' त्ति पाठान्तरेणाधीतम् । एवं च नन्दिटोकाकृता [हरिभद्रमूरिणा] व्याख्यातम्-"आदेशः-प्रकारः, स च सामान्यतो विशेषतश्च । तत्र द्रव्यजातिसामान्यादेशेन 'सर्वद्रव्याणि धर्मास्तिकायादीनि जानाति, विशेषतोऽपि यथा धर्मास्तिकायो धर्मास्तिकायस्य देश इत्यादि, 'न पश्यति' सर्वान् धर्मास्तिकायादीन् , शब्दादींस्तु योग्यदेशावस्थितान् पश्यत्यपीति ।” ३५८ पत्रे ॥ ७ अवि सतत्था उप्पण्णवणादिया आ० दा० । अविशदार्था अप्रज्ञापनादिका इत्यर्थः ॥ ८'सेसा दसविहे धम्मादिए आ० दा० ॥ Page #78 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आभिणिबोहियणाणस्स दवाइभेयाइ ] सिरिदेववायगविरइयं णंदीसुत्तं । तममुत्तं अवगाहलकखणं सव्वं जाणति । विसेसतो वि लोगा-ऽलोगुड्ढ-ऽह-तिरियादिविसेसखेत्ते जाणति, ण जाणइ य केयी, क्षेत्रं न पश्यत्येव २। काले वि आदेसो सामण्ण-विसेसतो। तत्थ सामण्णतो इमं भण्णति, ण य दरिसणतो, णिच्चमणिचं वा मुत्तममुत्तं वा कलासमूहं सन्नदवाणि वा कलेइ ति कलणं वा कालो, तमेवंविहं सामण्णतो सन्चकालं जाणति। विसेसादेसो-समया-ऽऽवलिगादि उम्सप्पिणीमादि वा विसेसकाले केयि जाणति, ण जाणति केयिं, कालं ण पश्यत्येव ३। भाव इति भवनं भूतिर्वा भावः, एवं सबभावे भावजातिमेत्तसामण्णतो जाणति । विसेसादेसतो 5 जीवा-जीवभावे । तत्थ नाण-कसायादिया जीवे, अजीवे वण्णय जवादिए अणेगहा वीसस-पयोगपरिणते, एत्थ मतिगाणविसयत्थे जे ते जाणति, सेण याणति, सधभावे ण पासह त्ति, मतिणाणस्स असवण्णेयविसयत्तणयो । ५८. उग्गह ईहावाओ य धारणा एव होंति चत्तारि। आभिणिबोहियणाणस्स मेयवत्थू समासेणं ॥ ७० ॥ अत्थाणं उग्गहणं तु उग्गहो, तह वियालणं इहं। ववसायं तु अवार्य, धरणं पुण धारणं विति ॥ ७१ ॥ उग्गह एक समयं, ईहा-ऽवाया मुहत्तमद्धं तु । कालमसंखं संखं च धारणा होति णायव्वा ॥७२॥ पुढे सुणेति सदं, रूवं पुण पासती अपुढे तु। गंधं रसं च फासं च बद्ध-पुढे वियागरे ॥ ७३ ॥ भासासमसेढीओ सदं जं सुणइ मीसँयं सुणइ । वीसेढी पुण सदं सुणेति णियमा पराघाए । ७४ ॥ ईहा अपोह वोमंसा मग्गणा य गवेसणा। सण्णा सती मती पण्णा सव्वं आभिणिवोहियं ॥ ७५॥ से' तं आभिणिबोहियणाणपरोक्खं । 20 १ईह अवाओ सं० शु० ल० मो० ॥२ अत्थाणं उग्गहणम्मि उग्गहो तह वियालणे ईहा। ववसायम्मि अवाओ, धरणं पुण धारणं विति ॥ मो० दे० ल. मु. । हरिभद्रयादैः मलयगिरिपादैश्वायमेव पाठमेदः निर्दिष्टो व्याख्यातश्चापि वत्तते ॥ ३त्तमंतं तु हरिभद्रपूरि-मलयगिरिवृत्त्योः निर्दिष्टोऽयं पाठभेदः ॥ ४ मीसियं डे० मो० मु० ॥ ५ खं० सं० शु० मो० प्रतिषु से तं आभिणिबोहियनाणपरोक्खं इति एकमेव निगमनवाक्यम् , जे० डे० ल० मु० प्रतिषु पुन: से तं आभिणिबोहियणाणपरोक्खं, से तं मतिणाणं इति निगमनवाक्यद्वयं दृश्यते । किञ्च हरिभद्रमूरि-मलयगिरिवृत्त्योः प्रथमं निगमनवाक्यं व्याख्यातमस्ति, चूर्णिकृता द्वितीयं निगमनवाक्यं व्याख्यातं वर्तते इति वृति कृतामेकतरदेव निगमनवाक्यमाभमतम् । अपि च चूर्णिकृता चूर्णी- “से कि त मतिणाणं ?" ति एस आदीए जा पुच्छा तस्स सव्वहा सरूवे वणिते इमं परिसमत्तिसगं णिगमणवाक्यम् --" से तं मतिणाणं ति" इत्यादि (पत्रं ४४ पं० ४] यन्निगमनवाक्यव्याख्यानावसरे निष्टङ्कितमस्ति तत्रैतत् किल चिन्त्यमस्ति यत्-चूर्णावपि से किं तं आभिणिबोधिकेत्यादि सुत्तं [ सुत्तं ४५ पत्रं ३२ ] इति आदिवाक्यमुपक्षिप्तं वर्तते तत् किमिति चूणों निगमनवाक्यव्याख्यानावसरे " से किं तं मतिणाणं' ति एस आदीए जा पुच्छा" इत्यादि चूर्णिकृता निरदेशि ? इत्यत्रार्थे तद्विद एव प्रमाणमिति ॥ Jain Education Intemational Page #79 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ४४ जिणदासगणिमहत्तरविरइयाए चुण्णीए संजुयं [सु० ५९-६५ गा० ७६ ५८. उग्गह ईहा० गाहा । अत्थाणं० गाहा । उग्गह एकं० गाहा । पुढे सुणेइ० गाहा । भासासम० गाहा। ईहा० गाहा। एताओ गाहाओ जहा पेढियाए [आव० नि० गा०२-६ तथा गा० १२] तहा भाणितव्या इति ॥७०॥७१।७२।७३।७४।७५।। "से किं तं मतिणाणं?" [सुत्तं ४५] ति एस आदीए जा पुच्छा तस्स सनहा सरूवे वणिते इमं परिसमत्ति5 दंसगं णिगमणवाक्यम्-"से तं मतिणाणं" ति। अहवा सीसो पुच्छति-जो एस वणियसरूवेण ठितोणाणविसेसो सो किंवत्तव्यो ? आचार्य आह-'से' इति निद्देसे, 'त' ति पुच्चपण्हामरिसणे, तं एतद् ‘मतिणाणं' ति स्वनामाख्यानमित्यर्थः । अहवा 'से' त्ति अस्य व्यञ्जनलोपे कृते एतं मतिणाणं ति भवति, एतावद् मतिज्ञानमित्यर्थः ॥ इदाणिं सव्वचरण-करणक्रियाधारं जधुदिढे कमप्पत्तं सुतणाणं भग्णति ५९. से किं तं सुयणाणपरोक्वं ? सुयणाणपरोक्वं चोईसविहं पण्णत्तं, तं जहा10 अक्खरसुतं १ अणक्खरसुतं २ सण्णिसुयं ३ असण्णिसुयं ४ सम्मसुयं ५ मिच्छसुयं ६ सादीयं ७ अणादीयं ८ सपज्जसियं ९ अपज्जवसियं १० गमियं ११ अगमियं १२ अंगपविढे १३ अणंगपविढे १४ । ५९. से किं [जे० २०४ द्वि० ] तं सुतनाणेत्यादि । तं च सुतावरणखयोवसमत्तणतो एगविहं पि तं अक्खरादिभावे पडुच्च जाव अंगबाहिरं ति चोद्दसविधं भण्णति । तत्थ अक्खरं तिविहं-नाणक्खरं अभिलावक्खरं 15 वण्णक्खरं च । तत्थ नाणक्खरं "क्षर संचरणे" न क्षरतीत्यक्षरम् , न प्रच्यवते अनुपयोगेऽपीत्यर्थः, आतभावत्तणतो, तं च णाणं अविसेसतो चेतनेत्यर्थः । आह-एवं सन्चमविसेसतो णाणमक्खरं कम्हा सुतं अक्खरमिति भण्णति ? उच्यते-रूढिविसेसतो १। अभिलाववण्णा अक्खरं भणिता, पङ्कजवत्, एवं ताव अभिलावहेतुग्गहणतो सुतविण्णाणस्स अक्खरता भणिता २। इदाणिं वण्णक्खरं-वणिज्जति अणेणाभिहेतो अत्थो इति वणो, स चार्थस्य, कुडये चित्रवर्णकवत् , अहवा द्रव्ये गुणविशेषवर्णकवत् । वर्ण्यते-अभिलप्यतेऽनेनेति वर्णाक्षरम् ३॥ एत्य मुत्तं20 ६०. से किं तं अक्खरसुतं ? अक्खरसुतं तिविहं पण्णत्तं, तं जहा-सण्णक्खरं १ वंजणक्खरं २ लद्धिअक्खरं ।। ६०. से किं तं अक्खरसुतं इत्यादि। अक्खरसदं मुगतो भासतो वा अक्खरसुतं । तत्थऽक्खरलंभो अभिलावो वा दव्वसुतं, खयोवसमलद्धी भावमुतं । तच्च वर्णाक्षरं त्रिविधं सण्णक्खरादि । तत्थ ६१. से किं तं सण्णक्खरं ? सण्णक्खरं अक्खरस्स संठाणा-ऽऽगिती। से तं सण्णक्खरं । ६१. 'सण्णक्खरं' अक्रवरागारविसेसो । सो य ब्रह्मादिलिविविधाणो अणेगविधो आगारो। तेसु आ(अ)कारादिआगारेसु जम्हा अकारे अकारसण्णा एव भवति, एवं सेसेसु वि, तम्हा ते सण्णक्खरा भणिता, जहा वर्ल्ड घडागारं दद्रु ठकारसण्णा उप्पज्जतीत्यर्थः १ ॥ १चउद्दस मो० ॥ २ अक्खरं ति दुविहं-नाणक्वरं अभिलाववण्णक्खरं च । तत्थ नाणं "क्षर जे० ॥ ३ लावणा अक्खरं आ•॥४'ती सण्णक्खरं । से तं खं० सं० हे. ल. शु० ॥ 25 For Private & Personal use only Page #80 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ४५ अक्खरा-ऽगक्खराइ सुयणाणं ] सिरिदेववायगविरइयं गंदीसुत्तं । ६२. से किं तं वंजणक्खरं ? वंजणक्खरं अक्खरस्स वंजणाभिलीवो। से तं वंजणक्वरं । ६२. व्यक्तीकरणं वंजणं, व्यज्यते अनेनार्थ इति वा व्यञ्जनम् , यथा प्रदीपेन घटः, व्यञ्जनं च तदक्षरं चेति व्यञ्जनाक्षरम् , तच्चेह सर्वमेव भाष्यमाणं अकारादि हकारान्तम् ,अर्थाभिव्यञ्जकत्वाच्छब्दस्य । तमेवं अक्खरं अत्थाभिव्यंजकं वंजणक्खरं भवति, जहा घटः पटः इत्यादि २॥ ६३. से किं तं लद्धिअक्खरं ? लद्धिअक्खरं अक्खरलद्धियस्स लद्धिअक्खरं समुप्पज्जइ, । तं जहा-सोइंदियलद्धिअक्खरं १ चक्खिदियलद्धिअक्खरं २ घाणेदियलद्धिअक्खरं ३ रसणिदियलद्धिअक्खरं ४ फासेंदियलद्धिअक्खरं ५ णोइंदियलद्धिअक्खरं ६ । से तं लद्धिअक्खरं । से तं अक्खरसुयं । ६३. 'लद्धक्खरं' ति अक्खरलद्वी जस्सऽस्थि तस्स इंदिय-मणोभयविण्णागतो इह जो अक्खरलाभो उप्पजति तं लद्धिअक्खरं । तं च पंचविहं सोइंदियादि । जहा सोइंदियलद्विओ सदं सोतुं संख इति अक्खरदुयलाभो 10 भ[जे० २०६ प्र०] वति, एवं सव्वत्थ लद्धिअक्खरं भाणितव्वं ३ । इह सण्णा-पंजणक्खरे दो वि दवसुतं गहितं, मुतविण्णाणकारगत्तातो, लद्धक्खरं भावसुतं, लद्वीए विष्णाणमयत्तणतो भयणा वा १॥ इदाणिं अणक्खरसुतं६४. से किं तं अणक्खरसुयं ? अणक्खरसुयं अणेगविहं पण्णत्तं, तं जहा ऊससियं णीससियं णिच्छूटं खासियं च छीयं च। णिसिघियमणुसारं अणक्खरं छेलियादीयं ॥ ७६ ॥ से तं अणक्खरसुयं २। ६४. अणक्खरसदसवणतो करतो [? वा] अणक्खरमुतं भवति । तं च अणेगविहं इमंऊससितं० गाहा । पूर्ववत् कंठा [आव० नि० गा० २०] ॥७६।। २ । इदाणि सण्णिमसण्णिसुतं ६५. से किं तं सण्णिसुतं ? सण्णिसुतं तिविहं पण्णत्तं, तं जहा-कालिओवएसेणं १ हेऊवएसेणं २ दिट्ठिवादोवदेसेणं ३ । ६५. सण्णिस्स मुतं सण्णिसुतं । असण्णिस्स सुतं असष्णिमुतं । तत्र संज्ञाऽस्याऽस्तीति संज्ञी । सो य सण्णी तिविहो-'कालिओवदेसेण' इत्यादि । चोदक आह-जइ सण्णासंबंधयो सण्णी तो सव्वे जीवा सण्णी, जतो एगिदियाण वि दस आहारादिसण्णातो पढिज्जंति ? आचार्याह-इहोहसण्णा थोवत्तणतो णाधिक्रियते, जहा णो कॅरिसावगेण धणवं भवइ त्ति, सेसाहारादिसण्णाओ वि भूयिष्ठतरा वि णाधिक्रियते, अणिद्वत्तणतो, जहेह हुंडसंठितो ण मुत्तित्तणतो रूबवं भण्णति । एते अधिकतसण्णाए अणुवणयदिटुंता । इमे उवणयदिटुंता-जहा बहुधणो 25 धणवं, पसत्थणिबत्ति-देहमुत्तित्तणतो य रूववं भण्णति, तहेव महती सुभा य संज्ञाऽधिक्रियते । सा य संज्ञानं संज्ञामनोविज्ञानम् , तत्सम्बन्धात् सन्नीत्यर्थः ॥ उक्तः प्रसङ्गः । प्रकृतमुच्यते १ लावो वंजणक्खरं । से तं खं० सं० ल० शु० ॥ २ अस्मिन् सूत्रे सर्वत्र लद्धियक्खरं इति सं० शु० मो० ॥ ३ णतो कारणतो वा आ० दा० । अनक्षरशब्दभ्रवणतः 'कुर्वतो वा' भाषत इत्यर्थः ॥ ४ कार्षापणेन ॥ 20 Jain Education Intemational Page #81 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जिणदासगणिमहत्तरविरइयाए चुण्णीए संजुयं [ सु० ६६-६८ ६६. से किं तं कालिओवएसेणं ? कालिओवएसेणं जस्से णं अत्थि ईहा अंपोहो मग्गणा गवसणा चिंता वीमंसा से णं सैण्णि त्ति लभइ, जस्स णं णत्थि ईहा अपोहो मग्गणा गवेसणां चिंता वीमंसा से णं असण्णीति लव्भइ । से तं कालिओवएसेणं १। ६६. 'कालितोवदेसेणं' ति इहाऽऽदिपदलोवो दट्टयो, तरसुचरणे 'दीहकालितोवदेसेणं' ति वत्तव्वं । दीहं5 आयतं, कालितोत्ति विसेसणं । कस्स ? उच्यते-उवदेसस्स, जहा निणनवणे मुहुत्तकालितोदीहकालितो वा पूयामंडवो कतो तहा दीहकालितोवदेसेणं ति भाणितब्बो । उवदिसणमुवदेसो, उपदेसो त्ति वा आदेसो त्ति वा पण्णवण तिवा परूवण त्ति वा एगट्ठा । दीहकालिओ उवदेसो दीहकालिओवदेसो, तेण दीहकालितोवदेसेणं जस्स सण्णा भवति सो आदिपदलोवातो कालिओवदेसेणं सणीत्यर्थः । अहवा कालियं-आयारादि मुत्तं तदुवदेसेणं सण्णी भण्णति । सो य इमेरिसो-जो य अतीतकाले मुदीहे वि [जे० २०६ द्वि० ] इदं तदिति कृतमणुभूतं वा सुमरति, वट्टमाणे य इंदिय10 णोइंदिएणं वा अण्णतरं सदाइअत्थमुवलद्धं अण्णत-चइरेगधम्मेहिं ईहइ ति ईहा । तस्सेव परधम्मपरिचागे सधम्माणु गतावधारणे य 'अबोहो' त्ति अबातो। विसेसधम्मण्णेसणा मग्गणा, जहा मधुर-गंभीरत्तणतो एस संखसह इति। वीसस-प्पयोगुन्भवणिचमणिचं चेत्यादि गवेसणा । जो यऽणागते य चिंतयति 'कहं वा तं तत्थ कातन्वं ?' इति अण्णोण्णालंबणाणुगतं चित्तं चिता। आत-पर-इह-परत्थयहिता-ऽहितविमरिसो वीमंसा। अहवा 'किमेयं?' ति ईहा। णिच्छयावधारितो अत्थो अबोधो । अभिलसियत्थस्स मणो-वयण-काएहिं जायणा मग्गणा । अभिलसितत्थे चेव 15 अपडुप्पज्जमाणे गवेसणा । अणेगहा संकप्पकरण चिंता । द्वन्द्वमर्थपु वीमंसा, जहा णिच्चमणिच्च हितमहितं धुरं कृशं थोवं बहुं इत्यादि । अहया संकप्पतो चेव विविधा आमरिसणा वीमंसा । अहवा 'अवोहो' त्ति अवातो। सेसा ईहाएगठिया । जस्सेवं अण्णयरविकप्पेण मणोदव्वमणुगतं चित्तं धावति एस कालिओवदेसेण सण्णि त्ति । सो य अणंते मणोजोगे खंधे घेत्तुं मणेति, एतलद्धिसंपण्णो मणविण्णाणावरणखयोवसमजुत्तत्तणतो य जहा चक्खुमतो पदीवादिप्पगासेण फुडा रूवोवलद्धी भवति तहा मणखयोवसमलद्धिमतो मणोदव्वपगासेण मणोछ?हिं इंदिएहिं 20 फुडमत्थं उबलभतीत्यर्थः । कालितोवदेससण्णीविवक्खे असण्णी, जहेह अविसुद्धचक्खुमतो मंदमंदप्पगोंसे रूबोवलद्धी अमुद्धा एवं सम्मुच्छिमपंचेंदियअसण्णिस्स, उकोसखयोवसमे वि अप्पमणोदव्वग्गहणसामत्थे मंदपरिणामत्तणतो य असण्णिणो अविसुद्धमप्पा य अर्थोपलब्धीत्यर्थः । ततो वि अविसुद्धा चतुरिंदियाणं, ततो तेइंदियाणं, ततो वि अविमुद्धा बेइंदियाणं अत्थुवलद्धी । जस्स य जइ इंदिया स तहा तेसु अवग्गहादिसु पवत्तते । विगलिंदियाण वि आदेसंतरतो मणोदव्य[ जे० २०७ प्र० ]ग्गहणं असुद्धमप्पत्तणतो य भाणितव्वं । सो य मणो तेसिं अमणो चेव 25 दट्टयो, असुद्धत्तणतो, असीलबद् अॅज्ञानवद्वा । तयो बेइंदियेहितो वि समीवातो अन्यत्ततरं विण्णाणं एगिदियाण, जहा मत्त-मुच्छिय-विसभावितस्स य तहा एगिदियाण सव्वधा मणाभावे विण्णाणं सबजहण्णं । कालितोवदेससणिणो एते सम्मुच्छिमादयो सव्वे असण्णी भवतीत्यर्थः १॥ इदाणि ६७. से किं तं हेऊवएसेणं ? हेऊवएसेणं जैस्स णं अस्थि अभिसंधारणपुब्बिया १ स्सऽत्थि खं० सं० ल• शु० ॥ २ अवोहो जे० मो० मु० ॥ ३ सण्णीति जे० मो० मु० ॥ ४ स्स णत्थि खं० सं० शु० ल० ॥ ५ अवोहो जे० मो० मु० ॥ ६ ण्णी ल' खं० सं० डे० ल० शु० ॥ ७ आत्म-परेह-परवजहिता-ऽहितविमर्ष इत्यर्थः । ८ हुप्पण्णमाणे दा० । 'दुश्चमाणे आ० ॥९°त्तं वा वत्तति एस जे० आ० दा० । धावति इति पाठस्तु मो० चूादर्शगतो ज्ञेयः ।। १० 'महेतुत्तणतो आ० दा० ॥ ११ गासा रूवो आ०॥ १२ अधनवद्वा आ० ॥ १३ जस्सऽथि खं० सं० ल• शु०॥ Jain Education Intemational Page #82 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सण्णि-असण्णिसुयणाणं ] सिरिदेववायगविरइयं णंदीमुत्तं । ४७ करणसत्ती से णं संण्णीति लब्भइ, जस्स णं णत्थि अभिसंधारणपुब्विया करणसत्ती से णं असण्णि ति लभइ । से तं हेऊवएसेणं २। ६७. 'हेतवदेसेणं' ति हेतुः कारणं निमित्तमित्यनान्तरम् , 'उपदेसेणं' ति पूर्ववत् । हेतूतो सँण्णा भवति ति जेण तेण सो हेतुउपदेसेण सण्णी भवति । 'जस्स' ति जीवरस, 'ण' वाक्यालंकारे देसीवयणो वा आत्मस्वरूपमदर्शनवचनोपन्यासे वा, अव्यक्तेन विज्ञानेन अभिसन्धार्य पूर्व ततः विज्ञानस्यैव 'करणशक्तिः' करणं-क्रिया 5 शक्तिः-सामर्थ्य, अथवा करणे शक्तिः करणशक्तिः, अथवा करण एव शक्तिः करणशक्तिः। तच्च अभिसंधारणं संचिंत्य संचिंत्य इटेमु विसयवत्यूमु आहारादिमु प्रवर्त्तते, अणिहेमु य णियत्तंते । एवं सदेहपरिपालणहेतो पवतंति । ते य पायं पडुप्पण्णकाले, ण तीता-ऽणागतकालावलंबिणो भवंति, उस्सण्णमेवं, केयिं तु तीता-ऽणागतकालावलंविणो वि भवंति, ते पुण ण दीहकालाणुसारिणो। किंच-तेमु वि आगतो मुहमो संताणचोदको अविस्सरगहेतू दट्टयो । एवं ते विकलेंदिया सम्मुच्छिमपंचेंदिया या(य) हेतुवायसण्णी भणिता, ते पडुच्च असण्णी जे णिचेट्ठा 10 इट्ठाऽणिविसय[अ]विणियट्टवावारा मत्त-मुच्छिय-विसोवयुत्तादिसारिच्छचेतणहिता पुढवादिएगिदिया इत्यर्थः २॥ इदाणि ६८. से किं तं दिहिवाओवएसेणं ? दिट्ठिवाओवएसेणं सण्णिसुयस्स खओवसमेणं सण्णी लब्भति, असण्णिसुयस्स खओवसमेणं असण्णी लब्भति । से तं दिट्ठिवाओवएसेणं ३ । से तं सण्णिसुतं ३ । से तं असण्णिसुतं । 15 ६८. दिदिवाओवदेसेणं ति दृष्टि:-दर्शनम् , वदनं वादः, उपदेशनमुपदेश इति, अनेन दृष्टिवादोपदेशेन संजीत्यभिधीयते । सो य सम्मदिट्ठी सण्णी, तस्स सम्मदिद्विणो सण्णिरस जं सुतं तं सण्णिसुतं, तेण सण्णिमुतखयोवसमभावेण जुत्तत्तणतो दिहिवातसप्णी लब्भति । अहवा दिठिवायसणि त्ति मिच्छत्तस्स [जे० २०७ द्वि० ] सुतावरणस्स य खयोवसमेणं कतेणं सण्णिमुतस्स लंभो भवति, एवं सो दिठिवातसण्णी लब्भति, तस्स सुतं दिष्टिवातसण्णिमुतमित्यर्थः । तं वयोवसमियभावत्थं समदिदि सणि पडुच्च मिच्छट्ठिी असण्णी भणितो । सो य मिच्छ- 20 त्तस्मुदयतो अस्सण्णी भवति, तस्स सुतं असण्णिसुतं । तं च सुतअण्णाणावरणखयोवसमेणं लब्भति, एवं दिद्विवातअसण्णीत्यर्थः, तस्स मुतं दिहिवातअसण्णिमुतं । एवं दिद्विवाते सण्णि-असण्णिमु सुतखयोवसमभावो(वा) सुतं घेतव्वं इति । पर आह-खयोवसमभावद्वित(तो) सण्णित्तणतो लक्खिजति खाइगभावहितो केवली किण्ण सण्णि ? ति, उच्यतेअतीतभावसरणनणतो पडुप्पण्णभावाण य बुज्झणतो अगागतभावचिंतगतो य सण्णि ति, तं तहा जिणे अणुसरणं पत्थि, जेग सो सबदा सव्वधा सव्वत्थ सजभावे जाणतीत्यर्थः, तम्हा केली णोसण्णीणोअसण्णी भवति । 25 पुनरप्याह परः-इह मिच्छादिद्विगो वि केपिं हिता-ऽहितनाणवाबारखण्णासंजुत्ता दीति किं ते असण्णिणो भणिता ? उच्यते-तस्स जा सग्गा सा जतो कुच्छिता, जहेह कुच्छित यणमवयणं कुच्छितसीलमसीलं वा, तहा तम्स सण्या कुच्छितत्तपतो असंज्ञैव दहव्वा, अण्णं च तस्स मिच्छत्तपरिग्गहातो नाणमनाणमेव दट्टव्वं । भणितं च १ सण्णि तिल डे० शु० । सण्णी ल° ख० सं० जे० ॥ २ असण्णी ल° ख० सं० डे० ल• शु० ॥ ३ हेतुवाओवदेसेणं' आ० दा० ॥ ४ सण्णी भवति आ० दा० ॥ ५ एवं तेसि विकलेंदियाणं सम्मुच्छिमपंचेंदियाण या हेतुवायसण्णा भणिता आ० दा० ॥ ६-७ चादोव खं० । वातोव सं० ॥ ८ 'स्सुययतो जे० ॥ ९ भावमुतं आ० दा० ॥ Jain Education Intemational Page #83 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ४८ जिणदासगणिमहत्तरविरइयाए चुण्णीए संजुयं [सु०६९-७० "सदसदविसेसणातो०" [विशेषा० गा० ११५] गाहा । कंठा । एवं पि ते असण्णी । आह-एगिदियाणं ओहसणी चेव अतो ते असण्णी चेव, तेहिंतो बेइंदियाइ जाव सम्मुच्छिमपंचेंदी एते विसिट्टतरसण्णाए हेतुवायसण्णी भणिता, कालितोवदेसं पुण पडुच्च ते वि असण्णी, विण्णाणअविसिद्वत्तणतो, दिट्ठिवातोवदेसं पुण पडुच्च कालि कोपदेसा वि असण्णी अविसिद्वत्तणतो चेव, अतो णज्जति दिहिवातसण्णी सव्वुत्तमो, सुत्ते य उँवरि ठवितो, जुत्त5 मेतं, कालिय-हेतुसण्णीणं पुण उकमकरणं कम्हा ? उच्यते-सव्वत्थ सुने सण्णिग्गहणं जं कतं तं कालितोवदेस सण्णिस्स, अतः सर्वत्र तत्संव्यवहारैज्ञापनार्थ आदौ कालि जे० २०८ प्र० ]कग्रहणं कृतमित्यर्थः। किंच-सण्णिअसण्णीणं समनस्का-ऽमनस्का इति क्रमश्च दर्शितो भवति, अत्र विकलेन्द्रिया अमनस्का इति अल्पमनोद्रव्यग्रहणसामयम् , प्रतिविद्यते पुनर्मनस्तेपाम् । यस्मादुक्तम्कृमि-कीट-पतङ्गाद्याः समनस्का जङ्गमाश्चतुर्भेदाः । अमनस्काः पञ्चविधा पृथिवीकायादयो जीवाः ॥१॥ ] इति ॥ भणितं सण्णि-असण्णिमुतं ३।४। इदाणिं सम्म-मिच्छामुतं । तत्थ सुत्तं - ६९. [१] से किं तं सम्मसुतं ? सम्मसुतं जं इमं अरहंतेहिं भगवंतेहिं उप्पण्णणाणदंसणधरेहिं तेलोकंचहित-महिय-पूइएहिं तीय-पंचुप्पण्ण-मणागयजाणएहिं सव्वण्णूहि सव्व दरिसीहिं पणीयं दुवालसंगं गणिपिडगं, तं जहा-आयारो १ सूयगडो २ ठाणं ३ समवाओ 15 ४ विवाहपण्णत्ती ५ णायाधम्मकहाओ ६ उवासगदसाओ ७ अंतगडदसाओ ८ अणुत्तरोववाइयदसाओ ९ पण्हावागरणाई १० विवागसुतं ११ दिट्ठिवाओ १२ । [२] इच्चेयं दुवालसंगं गणिपिडगं चोइंसपुव्विस्स सम्मसुतं, अभिण्णदसपुव्विस्स सम्मसुतं, तेण परं भिण्णेसु भयणा । से तं सम्मसुतं ५। ___६९. [१] से किं तं सम्मसुतेत्यादि । 'ज' इति अणिहिटस्स गहणं, 'इम' ति पञ्चक्खभावे । वंदण20 नमसण-पूयणादि अरहंतीति अरहंता, अरिणो वा हंता अरिहंता । तेसिं गुणसंपदाए विसेसणं-'भगवंतेहिं' धम्म जस-अत्थ-लच्छी-पयत्त-विभवा एते छ प्पदत्था भगसण्णा, ते जेसिं अत्थि ते भगवंतो। केवलनाण-दसणाण आवरणक्खते केवलणाण-दसणा उप्पज्जति, ते य जुगवमुप्पण्णे सव्यमणागतद्धं जधुप्पण्णसरूवे णिरावरणे सव्वदव्वगुण-पज्जव-विसेस-सामणविसए वि जुगवपवत्ते णाण-दंसणधरे ते तेहिं नाग-दंसणेहिं तीयद्धाए सबदव्य-गुण भावे जाणंति, तहा पडुप्पण्णे आणागते य जाणंति, तिकालजे दब-भावे य पडुप्पण्णे काले जाणंतीत्यर्थः । हिंशब्दो 25 सर्ववचनेषु करणार्थे बहुवचनप्रतिपादकः । तेलोकं ति-तिणि लोगा तेलोकं, ते य ऊर्ध्वा-ऽधस्तिर्यक् , अत्र तन्निवासिग्रहणम् । भवनवासिनो अहेलोगनिवासी, वणयर-जोति-तिरियंच-मणुस्सा तिरियलोकनिवासी, ऊर्ध्व वैमानिका। १°ण्णा, तदप्पत्तातो ते असण्णी आ० दा० ॥ २ एतेसिं दूरतरसण्णीए हेतुवा आ० ॥ ३ अवरिं जे० ॥ ४रख्यापनार्थ आ० ॥ ५ तत्थ सम्मसुतं आ० दा० ॥ ६ निरिक्षित-महित-पृहहिं सर्वासु सूत्रप्रतिषु हरिभद्रमलयगिरिसूरिवृत्त्योश्च । चूर्णिकृत्सम्मतः सूत्रपाठी नोपलभ्यते कुत्राप्यादर्श । केवलं अनुयोगद्वारेषूपलभ्यते चूर्णिकृत्सम्मतः सूत्रपाठः [पत्रं ३७-१] ॥ ७ पदुप्प मो० मु० ॥ ८ दंसीहि सं० ॥ ९ चउदस ल० ॥ १० णे में खं• सं० डे. ल. ॥ ११ ण्णणिविसर जे.॥ Page #84 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सम्म-मिच्छसुयणाणं] सिरिदेववायगविरइयं णंदीमुत्तं । ४९ एवं पायोत्या अहेलोइयग्रामसंभवाद वाच्यम् । 'चहितं' ति चाहितं प्रेक्षितं निरीक्षितं दृष्टमित्यनान्तरम् , त्रैलोक्येन [जे० २०८ द्वि० ] चहिता-मनोरथदृष्टिदृष्टा, अथवा गोशीपचन्दनादिना चर्चिता । त्रैलोक्यस्य मनोहिता महिता, अथवा महिमाकरणेन महिता, सा च महिमा महाजनसमुदयेन गीत-नृत्य-नाटकाद्यनेकप्रेक्षणकरणविधानैः । अणलिय-मणवज-सन्भूतत्थ-विसारयवयणेहिं थुता पूइया । अथवा अन्योन्यविषयप्रसिद्वा ह्ये ते एकार्थवचना । 'पणीतं' ति रिलततिसढपवादिमते अभूतत्थरूवे बजेऊण इमं जहत्थं दुवालसंगं पणीतं, जह णवणीतं 5 दहियातो, भूतत्थेण व जुत्तं प्रकरिसेण णीतं प्रणीतं । 'दुवालसंग' इत्यादि कंठं। इहंगगतं आयारादि, अणंगगतं च आवस्सगादि । एतं सव्यं दयहितगयमतेग सामिणा असंबद्धं पंचत्थिकाया इव णिचं सम्ममुतं भण्णति । अहवा एतं चेव दुवालसंगादि सामिणा संवद्धं भयणिजं सम्ममुतं मिच्छ मुतं वा उच्यते-सम्मदिहिस्स सम्ममुतं, मिच्छदिटिम्स मिच्छमुतं । इमं चेव मुनपरिमाणतो णियमिजति [२] जो चोदसपुची तस्स सामादियादि बिंदुसारपजवसाणं सव्वं नियमा सम्ममुतं, ततो ओमत्थगप- 10 रिहाणीए जाव अभिण्णदसपुबी एताण वि सामाइयादि सव्वं सम्ममुतं सम्मगुगत्तणतो चेव भवति । मिच्छट्ठिी पुण मिच्छणुभावत्तणतो अभिन्नदसपुग्वे ण पावति, दिलुतो जहा अभन्यो अभवाणुभावत्तणतो ण सिज्झतीत्यर्थः । 'तेण परं' ति अभिण्णदसपूव्वेस्तिो हेटा ओमत्थगपरिहाणीए जाव सामादितं तार सब्वे मुतहाणा सामिसम्मगुणतणतो सम्मसुतं भवति, ते चेव सुतद्वाणा सामिमिच्छगुणत्तगतो मिच्छमुतं भवति ५ ॥ इदाणि मिच्छमुतं ७०. [११ से किं तं मिच्छसुतं ? मिच्छसुतं जं इमं अण्णाणिएहि मिच्छद्दिट्ठिएहिं 15 सच्छंदबुद्धि-मतिवियप्पियं, तं जहा-भारहं रामायणं हंभीमासुरक्खं कोडल्लयं संगभदियाओ खोडेंमुहं कप्पासियं नौमसुहुमं कैंणगसत्तरी वइसेसियं बुद्धवयणं "वेसितं कॅविलं लोगायतं सद्वितंतं माढरं पुराणं वागरणं णाडगादी,अहवा बावत्तरिकलाओ चत्तारि य वेदा संगोवंगा। १या। कहतं चेव सम्मसुर्य मिच्छसुयं वा? उच्यते आ० दा० । वा । कहं ? उच्यते जे०॥ २-३ मिच्छासुयं डे. ल. मो० मु० ॥ ४ इत आरभ्य चत्तारि य वेदा लंगोवंगापर्यन्त सूत्रमिदं समग्रमपि अनुयोगद्वारेषु वर्तते [सू० ४१] ।। ५ मिच्छहिट्ठीहि जे. मो. मु. विना ॥ ६ विगप्पि जे० मो० मु० ॥ ७ हंभीमासुरुक्खं खं० डे• शु० । दंभीमासुरुक्खं मो० । भीमासुरुक्खं जे० मु० । “भंभीयमासुरुक्खे माढर कोडिल्लदंडनीतिसु ।” अस्य व्यवहारभाष्यगाथार्धस्य मलयगिरिकृता व्याख्या-“भम्भ्याम् आसुवृक्षे माढरे नीतिशास्त्र कौटिल्यप्रणीतासु च दण्डनीतिषु ये कुशला इति गम्यते ।" [व्यवहार० भाग ३ पत्र १३२], अत्र प्राचीनासु व्यवहारभाष्यप्रतिषु “हंभीयमासुरक्खं” इति पाठो वत्तते । “आभीयमासुरक्खं भारह-रामायणादिउवएसा । तुच्छा असाहणीया सुयअण्णाणं ति णं बेति ॥३०३ ॥ [ संस्कृतच्छाया-] आभीतमासुरक्षं भारत-रामायणाद्युपदेशाः । तुच्छा असाधनीयाः श्रुताज्ञानमिति इदं त्रुवन्ति ॥ ३०३ ॥ [ भाषार्थः-] चौरशास्त्र तथा हिंसाशास्त्र, भारत, रामायण आदिके परमार्थशून्य अत एव अनादरणीय उपदेशोंको मिथ्याश्रुतज्ञान कहते हैं।" [ गोमटसार-जीवकाण्ड पत्र ११७] । 'निघण्टे निगमे पुराणे इतिहासे वेदे व्याकरणे निरुक्ते शिक्षायां छन्दस्त्रिन्यां यज्ञकल्पे ज्योतिषे सांख्ये योगे क्रियाकल्पे वैशिके वैशेषिके अर्थविद्यायां वार्हस्पत्ये आम्भिर्ये आसुर्ये मृगपक्षिरते हेतुविद्यायाम्" इत्यादि [ललितविस्तरे परि० १२. ३३ पद्यानन्तरम् . पत्र १०८] ॥ ८ कोडिल्लयं मो. मु० ॥ ९ सयम डे० ल० । सहम शु० । सगडम मु० । अनुयोगद्वारेषु संगहियाओ सतभद्दियाओ इत्येते नामान्तरे अपि प्रत्यन्तरेषु दृश्यते ॥ १० घोडमुहं शु० । खं० सं० प्रत्योरेतनामव नास्ति । अनुयोगद्वारेपु पुनः घोडगमुहं, घोडयनुहं, घोडयसहं, घोडयसुयं इति नामान्तराण्यपि प्रत्यन्तरेषु दृश्यन्ते ॥ ११ नागसुटुमं जे० मु० अनु० ॥ १२ कणगसत्तरी नामानन्तरं रयणावली इत्यधिकं नाम शु० ॥ १३ बतिसे शु० ॥ १४ तेसिअं खं० सं० जे० डे० मो• 1 तेरासिकं मु० ॥ १५ काविलियं डे. ल. मो. मु० । कापिलं अनु० ॥ १६ णागायतं सं० ॥ १७ पोराणं डे० ॥ १८ वागरणं इति नामानन्तरं भागवतं पायंजली पुस्सदेवयं लेहं गणियं इत्यधिकः पाठः जे० डे. मु०, नायं पाठोऽनुयोगद्वारेष्वपि ॥ Jain Education Intemational Page #85 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ५० जिणदासगणिमहत्तरविरइयाए चुण्णीए संजुयं [सु० ७१-७२ [२] इच्चेताइं सम्मदिहिस्स सम्मत्तपरिग्गहियाई सम्मसुयं । इच्चेयाई मिच्छद्दिहिस्स मिच्छत्तपरिग्गहियाई मिच्छंसुतं । [३] अहवा मिच्छद्दिहिस्स वि एयाई चेव सम्मसुयं, कम्हा? सम्मत्तहेउत्तणओ, जम्हा ते मिच्छद्दिविणो तेहिं चेव समएहिं चोइया समाणा केइ सपक्खदिट्ठीओ वति । से तं 5 मिच्छेसुयं ६। ७०. [१] से किं तं मिच्छसुतं इत्यादि । अण्णाणं इतेहिं [जे० २०९ प्र०] अण्णाणितेहिं । अण्णाणं-अबोधो विवरीयत्थवोधो वा तेण इतो-अणुगतेत्यर्थः । मिच्छादिटिं इतेहिं मिच्छादिट्टितेहिं, मिच्छ त्ति-अनृतं, दिहि त्तिदरिसणं, मिच्छादिद्विणा अणुगतेहिं ति भणितं भवति । स-इत्यात्मनिर्देशः, छन्दः-अभिप्रायः, तत्थमतत्थेण वा अत्थस्स जो वोहो स बुद्धिः-अवग्रहमात्रम् , उत्तरत्र ईहादिविकप्या सव्वे मती । अहवा नाणावरणखयोवसमभावो 10 बुद्धी, सो चेव जदा मणोदवणुसारतो पवत्तइ तदा मती भण्णति । एवं आत्माभिप्रायवुद्धि-मतिभिः यच्छ्रतं विविधकल्पनाविकल्पितमिति रचितं, तच्च भारधादि जाव चत्तारि य वेदा संगोवंगा, सव्वेते लोगसिद्धा, लोगतो चेवेतेसिं सरूवं जाणितव्वं । एतं सव्वं मिच्छभावहितं ति कातुं मिच्छमुतं भाणितव्वं । एतम्मि सम्म-मिच्छमुतविकप्पे चतुरो विकप्पा भाणितव्या इमेण विधिणा [२] सम्ममुतं सम्मदिद्विणो सम्ममुतं चेव १, सम्ममुतं मिच्छदिद्विणो मिच्छमुतं २, मिच्छसुतं सम्मदिहिणो 15 सम्मसुतं ३, मिच्छमुतं मिच्छदिद्विणो मिच्छमुतं चेव ४ । 'इच्चेताई सम्मदिहिस्स सम्मत्तपरिग्गहिताई सम्ममुतं' एत्थ मुत्ते पढम-तइयविकप्पा दट्ठव्वा । 'इच्चेयाई ति सम्म-मिच्छसुताई, अहवा मिच्छसुताई चे सेसं कंठं। 'मिच्छदिहिस्स' इच्चादिसुत्ते वितिय-चतुत्थविकप्पा दट्टव्वा । तत्थ पढमविकप्पे सम्मसुतं सम्मत्तगुणेण सम्म परिणामयतो सम्मसुतं चेव भवति १ वितियविकप्पे वि जहा खंडसंजुतं खीरं पित्तजरोदयतो ण सम्मं भवइ तहा मिच्छत्तुदयतो सम्मसुते मिच्छाभिणिवेसतो मिच्छसुतं भवति २ ततियविकप्पे तिफलादिमणिर्ट पि उवउत्तं उवका20 रकारित्तणतो सम्म भवति तहा मिच्छसुते मिच्छभावोवलंभातो सम्ममुते दढतरभावुप्पायकरणतणतो तं से सम्मसुतं भवति ३ चरिमविकप्पे मिच्छसुतं, तं चेव मिच्छाभिणिवेसतो मिच्छसुतं चेव भवति ४।। [३] तस्स वा मिच्छहिट्ठिणो तं चेव मिच्छमुतं सम्मसुतं भवति । कम्हा एवं भण्गति ? उच्यते-परिणामविसेसतो, जम्हा ते मिच्छदिद्विणो 'तेहिं [जे० २०९ द्वि०] चेव' पुवावरविरुद्धेहिं मिच्छमुतभणितेहिं 'चोदिता' भणिता 'समाणा' इति सन्तः, चोदणाणंतरं आत्मैकालावस्थायां सन्त इत्यर्थः। पुव्वं जं सासणं पडिवण्णो "तं से 25 सपक्खो, तम्मि जा दिट्ठी तं 'वति' परिचयंति, छड्डेति त्ति वुत्तं भवति । जम्हा एवं तम्हा तं पुन्वमिच्छमुतं सम्ममुतं से भवति । पर आह-तत्तावगमसँभावसामण्णे सम्मत्त-सुताणं को पतिविसेसो जेण भण्णति 'सम्मत्तपरिग्गहिताई सम्मसुतं' ? उच्यते-जहा णाण-दसणाणं अवबोधसामण्णे भेदो तहा सम्म-सुताणं पि भविस्सति । १ एयाणि चेव सम्म सर्वासु सूत्रप्रतिषु । वृत्तिकोरयमेव सूत्रपाठः सम्मतोऽस्ति ॥ २ एयाई मिच्छ सर्वामु सूत्रप्रतिषु । वृत्तिकृतोरयमेव सूत्रपाठः सम्मतः ॥३च्छद्दिविपरि° खं० ॥ ४ मिच्छासुयं हे. मो. मु० । अपि च-सम्यक्श्रुत-मिथ्याश्रुतविवेचकोऽय सूत्रांशः सर्वासु सूत्रप्रतिषु वृत्त्योरपि च क्रमव्यत्यासेन वर्त्तते ॥ ५ एयाई चेव इति खं० सं० जे० डे० ल• शु० नास्ति । श्रीहरिभद्राचार्यैरपि नास्त्ययं पाठः स्वीकृतः ॥ ६ ट्ठिया तेहिं डे० ल• विना ॥ ७ ससमएहिं जे० ॥ ८ चयंति जे० मो० । श्रीमलयगिरिपादरे तत्पाठानुसारेणैव व्याख्यातमस्ति ॥ ९ मिच्छासुयं डे• मो० मु० ॥ १० तत्थ मातत्थेण वा अत्थस्स आ• दा० ॥ १६ त्मकलावस्थायाः स आ• ॥१२ तस्सेस पक्खो जे० ॥ १३ सम्भाव आ. दा.॥ Jain Education Intemational Page #86 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सादि-सपजवसियादिमुयणाणं] सिरिदेववायगविरइयं गंदीसुतं । कई ? उच्यते-जहा विसेसाणं बोधमवात-धारणे नाणं, अवग्रहेहाबोधे च दंसणं तहा इमं । तत्ते जा रुती तं सम्मत्तं, तत्थेव जं रोचक तं सुतं । एवं मिच्छत्तपरिग्गहे वि वत्तव्यं ६ ॥ इदाणिं सादि-सपज्जवसाणे ७१. से किं तं सादीयं सपज्जवसियं ? अणादीयं अपज्जवसियं च ? इच्चेयं दुवालसंगं गणिपिडगं विउच्छित्तिणयट्ठयाए सादीयं सपज्जवसियं, अविउच्छित्तिणयट्ठयाए अणादीयं अपज्जवसियं। ७१. से किं तं सादीयं इत्यादि । इह पजातद्वितो वोच्छित्तिणतो, तस्स मतेणं दुवालसंग पि सादि सपज्जवसाणं । कहं ? जहा णरगादिभवमवेकवातो जीवो व्य । दबहितो पुण अन्धोच्छित्तिणतो, तस्स मयेणं दुवालसंगं पि 'अणादि अपज्जवसाणं च' त्रिकालवत्थायी, जहा पंचत्थिकाय च । एसेवऽत्यो दव्वादिचतुकं पड़च्च चिंतिजति । तत्थ ७२. तं समासओ चउन्विहं पण्णत्तं, तं जहा-दवओ खेत्तओ कालओ भावओ । 10 तत्थ दवओणं सम्मसुयं एगं पुरिसं पडुच्च मादीयं सपज्जवलियं, बहवे पुरिसे पडुच्च अणादीयं अपज्जवसियं १ । खेतओ णं पंच भरहाई पंच एखयाइं पडुच्च सादीयं सपज्जवसियं, पंच महाविदेहाइं पडुच्च अणादीयं अपज्जवसियं २। कालओ णं ओसप्पिणिं उस्सप्पिणिं च पडुच्च सादीयं सपज्जवसियं, णोउस्सप्पिणि णोओसप्पिणिं च पडुच्च अणादीयं अपज्जवसियं ३ | भावओ णं जे जया जिणपण्णता भावा आघविज्जति पण्णविज्जंति परूविज्जंति : दंसिज्जंति णिदंसिज्जति उवदंसिज्जति ते" तहा पडुच्च सादीयं सपज्जवसियं, खाओवसमियं पुण भावं पडुच्च अणादीयं अपज्जवसियं ४ । ७२. दबतो सम्मसुतं एगपुरिसे सादि जं पढमताए पद्धति; सपज्जवसाणं देवलोगगमणातो, गेलण्णतो वा णटे, पमादेण वा, केवलणाणुप्पत्तितो वा, मिच्छादसणगमणतो वा सपज्जवसाणं, अहवा एगपुरिसस्सेव सादिसपज्जवसाणतणतो। दव्यतो चेव बहवे पुरिसे पडुच्च अणादि अपजवसाणं, अण्णोण्णहितसंताणाविच्छेयत्तणतो, 20 मणुयत्तणं व जहा । खेत्ततो भरहेरवएसु तित्थगर-धम्म-संघातियाग उप्पाद-बोच्छेदत्तणतो सादि सपज्जवसाणं, महाविदेहेसु अवुच्छेदत्तणतो [अणादि अपज्जवसाणं] । कालतो ओसप्पिणीए [जे० २१० प्र०] तिमु, उस्सप्पिणीए दोसु साधतं, णोओसप्पिणिणोउस्सप्पिणिततियं महाविदेहकालपलिभागं पड्डुच्च तिमु वि कालेमु अवद्वितत्तणतो अणादि अपज्जवसाणं । इदाणि भावतः-'जे' इति अणिहिट्ठस्स णिदेसो । 'जदा' इति काले पुचण्हे अवरण्हे वा, दिया रातो वा पुचि जिणेहिं पण्णत्ता भात्रा, पच्छा त एव गौतमादिभिः 'आघविजंती त्यादि, 25 १ साणं अबोधिवातकरणे णाणं आ० मो० ॥ २ इञ्चेइयं मो० मु० ॥ ३ वुच्छि मो. मु० ॥ ४ अच्छि मो० मु० ॥ ५ तत्थ इति पदं खं० सं० डे० ल• शु० नास्ति ॥ ६ एराव सं० शु० ॥ ७ पंच विदेहाई ल. ॥ ८ णं उस्सपिर्णि ओसप्पिणिं च जे. मो. मु० । नायं पाठश्चणि-वृत्तिकृतां सम्मतः ॥ ९ णोओसप्पिणि णोउस्लप्पिणि च ल । हारिवृत्ती एतदनुसारेणैव व्याख्यातमस्ति ॥ १० ते तया भावे पहुच जे० डे० मो० । ते भावे पहुच्च ल० । चूर्णिकृता ते तदा पढच्च इति पाठान्तरनिर्देशेन सह ते तहा पदुच्च इति पाठ आदतोऽस्ति । वृत्तियां पुनः ते तया पहुच्च इत्येव पाठोऽशोकृतोऽस्ति । Jain Education Intemational Page #87 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ५२ जिणदासगणिमहत्तरविरइयाए चुण्णीए संजयं [सु०७३-७४ 'आघविजंति' आख्यायन्ते सामण्णतो [विसेसतो] विसेससामण्णतो वा, पण्णविजंति भेदाभेदेहि, तेसिं भेदभभेदाणं सरूवमक्खाणं परूवणा, दंसिर्जति उवमामेत्तेण जहा गो तहा गवय इति, णिदसणं हेतु-दिटुंतेहिं, उवदंसणा उवणयोवसंधारेहिं सव्वणएहि वा । अहवा एगहिता एते । 'ते' इति पण्णवणिज्जाण णिद्देसो । 'तहा' इति पण्णवर्ग पण्णवणिज्जे वा पडुच्च सादि सपज्जवसाणं भवति । तत्थ पण्णवगं पडुच्च उवयोगतो सरविसेसतो पयत्तयो आसण5 विसेसतो य सादि सपज्जवसाणं । पण्णवणिज्जे पडुच्च गतीतो ठाणतो दुपदेसादिभेदतो तहेगपदेसादिमवगाहतो एगसमयादिमवत्थाणतो वण्णादिपजवे य आसज सादि सपज्जवसाणं । पाढंतरं वा "ते तदा पडुच्च" 'तया' इति कालं अनाद्यपर्यवसितम् । भावतः श्रुतज्ञानं क्षायोपशमिके भावे नित्यं वर्तते स्वामित्वसम्बन्ध इति । ७३. अहवा भवसिद्धीयस्स सुयं साईयं सपज्जवसियं, अभवसिद्धीयस्स सुयं अणादीयं अपज्जवसिय । 10 ७३. अहवा सादि सपज्जवसाणं सपडिपक्खपदेमु भंगचतुक्के पढमभंगे सम्मसहितमुतभावो चिंतेयव्यो, अणेगविहं वा खयोवसमभावं पडुच्च दवादिउवयोगं वा पडुच्च पढमभंगो भवति । वितियभंगो मुण्णो, अहवा अभयाणं अणागतद्धसंजोगेण मुतभावो भाणितव्यो। चरिम-ततियभंगेसु अविसिट्टमुतभावो अभव-भव्वे पडुच्च जोएतव्यो। अभवसिद्धीयस्स इत्यादि सुतसिद्धं । इह चरिम-ततियभंगेसु अणादिसुतभावो दिट्ठो मुताधि कारतो, इधरा मतिभावो वि दट्टव्वो, मति-सुताण अण्णोण्णाणुगतत्तणतो । सो य अणादिणाणभावो जहण्णो 15 अजहण्ण[जे० २१० द्वि०]मणुकोसो वा हवेज, उक्कोसो ण भवति, कम्हा ? जम्हा उक्कोसनाणभावो केवलिणो भवति ।। तस्स य मुत्ते इमं पमाणं पढिज्जति ७४. सव्वागासपदेसग्गं सव्वागासपदेसेहिं अणंतगुणियं पज्जवैग्गक्खरं णिप्फज्जइ । ७४. सव्वागासपदेस इत्यादि सूत्रं । सबमिति-अपरिसेससव्वग्गं अधिकिच्चेवं भण्णति, सव्वं आकासं सव्वाकासं, सव्वागासस्स पदेसा सव्वागासपदेसा, जं एतेसिं अग्गं-जं परिमाणं ति वुत्तं भवति, एतं सव्वागासप्प20 देसरासियग्गं अणंतेण रासिणा अण्णण गुणितं ताहे जं रासिपमाणं लब्भति तं सबपज्जवाण अग्गं भवति । पज्जाया णाम-एक्केकस्साऽऽगासपदेसस्स जावंतो अगरुलहुयादी पज्जवा ते पण्णाए सव्वे संपिंडिता, तेसिं संपिंडिताणं जं अग्गं एतप्पमाणं अक्खरं लब्भति । [अक्ख र पडलं] इह अक्खरं ति दुविहं-णाणं अकारादिदव्वसुतक्खरं च। तत्थ नाणमक्खरं ति अविसेसतो सबनाणमक्खरं, 25 जम्हा तं जीवातो उप्पण्णं अणण्णभावत्तणतो णो क्खरति त्ति, इह पुण सव्वपज्जायतुल्लत्तणतो केवलणाणं घेत्तव्यं, जम्हा केवलं सबदव्वपज्जायविण्णत्तिसमत्थं भवति । तं च केवलं णेये पवत्तइ, तस्स वि परिमाणं इभेणं चेव विधिणा भाणितव्–'सव्वागासपदेसगं' इत्यादि पूर्ववत् । ते य सव्वदचपज्जाया समासतो तीसं इमेण विधिणा-गुरू लहू गुरुलहू अगुरुलहू एते चतुरो, पंच वण्णा, दो गंधा, पंच रसा, अट्ठ फासा, अणित्थत्थसंठाणसहिता छ संठाणा, एते मुत्तदव्वे सव्वे संभवंति । अमुत्तदव्वेसु अगुरुलहू चेव एक्को पज्जायो संभवइ । १ "आपविजंति' त्ति प्राकृतशेल्या आख्यायन्ते, सामान्य-विशेषाभ्यां कथ्यन्त इत्यर्थः” इति हारि०नन्दिवृत्तौ । “अग्धविनंति' त्ति प्राकृतत्वाद् आण्यायन्ते, सामान्यरूपतया विशेषरूपतया वा कथ्यन्ते इत्यर्थः" इति मलय नन्दिवृत्तौ ॥ २ सायि सप खं० । साई सप ल० ॥३ पजवक्खरं जे. मो. मु. विआमलवृत्तौ २६८ पत्रे नन्दिसूत्रपाठोद्धरणे । नाय पाठश्चूणि-वृत्तिकृतां सम्मतः ॥ Jain Education Interational Page #88 -------------------------------------------------------------------------- ________________ पजवम्गक्खरं अक्खरपडलं च ] सिरिदेववायगविरइयं णंदीमुत्तं । ५३ एत्थ य एकेके भेदे अणंता भेदा संभवंति । किंच मुत्तदव्वेमु णतविसेसतो अणियोगधरा अट्ठावीसं मूलपजाए भणंति । कहं ? उच्यते-ते चेव तीसं सव्यगुरु-लहुपजाएहि विहूणा । जतो भणितं निच्छयतो सबगुरुं सबलहुं वा ण विजते दव्वं । ववहारतो तु जुज्जति बादरखंधेमु णऽण्णेमु ॥ १॥ [ कपभा. गा. ६५ ] णिच्छयणयमतेण सव्वधा गुरुं लहुँ वा नत्थि दव्वं । जदि हवे ज तो तस्स पडमाणस्स ण विरोधो केणइ 5 हवेज्ज, सबलहुस्स वा उप्पयमाणस्य, जतो य णिच्चपडणं उप्पयणं वा ण विज्जति तम्हा जे० २११ प्र०] सव्वधा गुरुं लहुँ वा दव्यं नत्थि । ववहारणयादेसेणं पुण दो वि अस्थि, जहा-सबगुरु कोडिसिला वजं वा, सब्बलहुं च धूम-उलुगपत्तादी । एवं ववहारणयादेसतो वादरपरिणामपरिणतेसु खंधेमु गुरुभावो लहुभावो य भवति । 'णऽण्णेमु' ति ण मुहुमपरिणामेमु त्ति वुत्तं भवति । के पुण सुहुमपरिणता दव्या ? के वा वादरपरिणता ? उच्यते-परमाणुनो आरद्धं एगुत्तरवढितेमु ठाणेसु 10 जाव सुहुमो अणंतपदेसिओ खंयो, एतेमु ठाणेमु मुहुमपरिणता दवा लभंति, एतेसिं च अगरुलहुपज्जाया भवति । वादरो पुण परमाणूतो आरभ जाव असंखेजपदेसितो खंघो ताव ण लब्भति, परतो वादरपरिणामो खंधो लब्भति, सो य जहण्णो वि अणंतपदेसिओ नियमा भवति, तातो एगुजरवड्ड्यिा अणंता अणंतढाणावडिया वादरा खंधा। ते य ओराल-विउवा-ऽऽहार-तेयवग्गगामु भनंति, णियमा य ते गुरुलहुज्जाई भवंति । सीसो पुच्छति-जे रूविगुरुलहू दव्या अगुरुलहू य तेसिं के थोवा ६ वा ? उच्यते-योगागि गुरुलहुदवाणि, तेहिंतो 15 रूबीअगरुलहुयदव्या अणंतगुणा । कहं पुण ते अणंतगुणा भवंति . उच्यते-थूराणं अणंतपदेसिताणं खंधाणं सटाणे अणंतातो वग्गणातो, मुहुमाणं पि अणंतातो वग्गणातो, शूरवग्गगठाणेहितो उपरि भासादिवग्गगट्ठाणेमु एकेके अणंतातो वग्गणातो, हेटतो वि शूरवग्गगटाणाणं परमागणं एका वग्गणा, एवं जाब दसपदेसियाणं संखेजपदेसियाणं संखेजातो वाणातो, असंखेजपदेसिताणं असंखेजाओ वग्गणाओ, एतेणं कारणेणं गुरुलहुदव्वेहितो रूबीअगरुलहुदव्याणि अणंतगुणाणि भवंति । आदेसंतरेण वा वादरठाणेमु वि मुहुमपरिणामो अविरुद्धो ति 20 माणितव्यो । उक्तं च गुरुलहुदव्वेहितो अगरुलहूपज्जया अणंतगुणा । उभयपडिसेहिता पुण अणंतकप्पा [जे० २११ द्वि०] बहुविकप्पा ॥२॥ [ कल्पभा. गा. ६७ ] गुरुलहुपज्जायजुत्ता जे दव्वा तेसिं चेव जे गुरुलहुपज्जाया तेहितो रूविमारुलहुयदव्याण जे अगरुलहुयपज्जाया ते आधारअगंतगुणत्तगतो अगंतगुणा एव भवंतीत्यर्थः । 'उभयपडिसेधिता णाम' अगरुयलहुया । 25 'पुण' विसेसणे । किं विसेसेति ? उच्यते-अरूविदव्याधारा इत्यर्थः। अहवा 'उभयपडिसेधिता णाम' बादरसुहुमभाववज्जिता जे दव्या, अरूविण इत्यर्थः । तेमु 'अणंतकप्पा णाम' अणंतपकारा । कहं ? उच्यते-आकासत्थिकाए देस-पदेसपरिकप्पणाए, एवं धम्मादिमु वि । 'बहुविकप्प' त्ति तेसिं अणंतकप्पाणं एकेको अणंतप्रकारो। कहं पुण ? उच्यते-जम्हा एकेके आगासप्पदेसे अणंता अगरुलहुयपज्जाया भवंति तम्हा ते बहुविकप्प त्ति । ते य सधण्णुवयणतो सद्धेया इति ॥ १ पजाया भवति आ• दा० ॥ २ अस्या गाथाया एतदुत्तरार्द्धमेव कल्पभाष्ये वर्तते ॥ ३ अविरूविण जे० । अवरूविण दा० ॥ ४ णाम' पक्केका अणंत आ० दा० ॥ 30 Page #89 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ५४ जिणदासगणिमहत्तरविरइयाए चुण्णीए संजुयं [सु० ७५ रूवि-अरूविदव्वाण य पन्जायअप्पवहुत्तं इमं भण्णति-रूविदव्वाणं जे य अगरुलहुपजाया ते पण्णाछेदेण पिंडिता, एतेहिंतो एकस्स चेव अमुत्तदव्वस्स जे अगरुयलहुपज्जाया ते अणंतगुणा भवतीत्यर्थः । एत्य सीसो भणति-कवतितेहिं पुण भागेहिं मुत्तदव्याणं पिंडितपज्जाएहितो अमुत्तदवाणं अगुरुलहुपजाया अणंतगुणा भवंति ? उच्यते-नास्त्यत्र परिमाणं, बहुधा वि अणंतएणं गुणिजमाणे अमुत्तदन्चपजाएमु णस्थि परिमाणं ।। 5 एवंगते परिमाणार्थे इमं भण्णति केण हवेज निरोधो अगरुलहपज्जयाण तु अमुत्ते ?। ___ अचंतमसंजोगो जहितं पुण तधिवक्खस्स ।। ३॥ [कल्पभा. गा. ६९] जतो अमुत्तदव्याणं बहुहा वि अणंतएण गुणिज्जमाणे पैजायणं ण भवति । ततो 'केनेति' केनान्येन प्रकारेण 'हवेज' ति भवे 'णिरोहो णाम' परिमाणं ? परिच्छेदेत्यर्थः, किं मुत्तदव्वस्तिो अमुत्तदवाणं अगरुयल10 हुपज्जायपरिमाणं भविस्सति ? त्ति, नेत्युच्यते, 'अचंतमसंजोगं बंत' अतीव अयुजमाणो जम्हा संजोगी। [जे० २१२ प्र० ] 'जहियं ति यत्र । 'पुण' विसेसणे। किं विसेसयति ? रूविदव्वे । तदित्यनेन अमुत्तदव्यपक वो, तस्स विवकायो-मुत्तदव्यपगारो, तेमु पजायथोक्त्तणतो अमुत्तदव्वेमु य पजायाग अतीपबहुयत्तणतो, अतो मुत्तदवहितो अमुत्तदयपज्जायाण परिमाणकरणसंजोगो एगंतेणेव ण जुजते, ण घटतेत्यर्थः ।। एवं तु अणंतेहिं अगरुलपज्जएहिं संजुत्तं । होति अमुत्तं दव्वं अरूविकायाण तु चतुण्डं ॥ ४ ॥ [कल्पभा. गा. ७०] 'एवमिति' यथेदमुक्तं । सेसं कंठं । णरि 'अरूविकाताण तु चतुण्डं ति धम्मा-ऽधन्मा-ऽऽगास-जीवाणं ति एतेसिं चतुण्ह वि नियमा पत्तेयं अणंता अगरुयलहुयपज्जाया भवंति । कह ? उच्यते-जम्हा एतेसिं एकेको पदेसो अणंतेहिं अगरुयलहुयपज्जाएहिं संजुत्तो तम्हा धम्मा-ऽधम्मेगजीवस्स य असंखेजपदेसत्तणतो असंखेजमणंता पत्तेयं भवंति । आगासपदेसअपरिमाणतणतो पुण तस्स नत्थि परिमाणं, तहा वि संघवहारतो अगंता उक्ता इत्यर्थः॥ 20 एवं ताव ज्ञेयमनंतमुक्तम् । अथेदानीं तत् केवलज्ञानं यथाऽनन्तं तथेदमुच्यते उवलद्धी० गाहा । [कल्पभा. गा. ७१ ] सव्वे रूविदव्या-ऽरूविदयाण य जावतिया गुरुलहुपजाता सव्वे अरूविदवाण य जे अगरुलहुपज्जाया एते सव्वे जुगवं जाणति पासति य जतो, एवमणतं केवलनाणमक्खरं ति समसंगमभिहितम् । इदाणिं 'अकारादिदव्वमुतमक्खरं' ति जति अविसेसतो णाणमक्खरमुक्तं णेयं वा तहा वि रूढिवसतो जहा 25 पंकयं तहा सरक्खरं वंजणक्खरं वण्णक्खरं वा भण्णति । तत्थ 'सरक्ख सक्खरं अक्वरं सरंति-गच्छंति सरंति वा इत्यतो सरकखरं अकारादि, बंजणम्स वा फुडमभिधाणं सरति, ण वा सरक्खरमंतरेण अत्यो संभरिजा ति सरकवरं । ककारादि वंजणक्खरा, व्यज्यते तेनार्थ इति प्रदीपेन घटादिवद् व्यंजनाक्षरम् । तेहिं चेव सर-वंजणक्खरहिं जदा अत्थो वणिजति अभिलप्यते वा तदा ते वण्णकावरं भण्णंति । इह एकेकस्स अकारादिहकारांतमक्खरस्स स-परपज्जायभेदा इमे-अकारस्स य पजाया जहा दीह-इस्त्र-प्लुतात्रयः, तत्थ दीहो [जे० २१२ द्वि०] उदात्ता-ऽनुदात्त-स्व30 रितभेदः, एवं इस्व-प्लुतावपि, पुनरप्येकैको सानुनासिको निरनुनासिकश्च, इत्येवं अष्टादशभेदः । एवं सेसक्खराण वि जहासंभवं भेदा भावितव्या । अहवा सरविसेमतो एकेकमक्रवरस्स अणंता सपज्जया । एत्थ अकारस्स १ पज्जायगं जे० दा० ॥ २ अपुजमाणो आ० ॥ ३ 'तसरक्खरस्स आ० दा० ॥ ४ तस्त्रिभेदः, जे० दा० ॥ Jain Education Intemational Page #90 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अक्खरपडलं ] सिरिदेववायगविरइयं गंदीसुत्तं । अकारजातीसामण्णतो सपजाया अट्ठारस, सेसा परपज्जाया, एवं संखेज्जा पन्जाया । अहवा अकारादिसरा ककारादिवंजणा केवला अण्णसहिता वा जं अभिलावं लभे स तस्स सपजायो, सेसा तस्स परपजाया, ते य सव्वे वि अणंता । जतो मुते भणितं-"अणंता गमा अणता पन्जया" । [सू० ८५ तः ९४ आदि ] भणितं च पण्णवणिजा० गाहा [कल्पभा. गा. ९६४] । अक्खरलंभेण० गाहा [विशेषा. गा. १४३] । अणभिलप्पाण अभिलप्पा अणंतभागो, तेसि पि अणंतभागो मुतनिवद्धो इति । अहवा अकारादिअक्खराण पजाया सम्बदन्च- 5 पन्जायरासिप्पमाणमेत्ता भवंति । कहं ? उच्यते-जे अभिलावतो संजुत्ता-संजुत्तेहिं अक्सरेहिं उदत्ता-ऽणुदत्तेहि य सरेहिं जावतिए अभिलावे अभिलप्पे य लभति ते सव्वे तस्स सपजया, सेसा सव्वे तस्सेव परपज्जया। आकासं मोत्तुं सव्यम्स सपज्ज एहिलो परपज्जया अणंतगुणा । आकासस्स सपज्जएहिंतो परपज्जया अणंतभागे । पर आह-कहं तस्सेव परपज्जया य? णणु विरुद्धं, उच्यते-सबक्खराण घडाइवत्थुणो वा दुविहा पज्जया चिंतिजंतिसंवद्धा असंवद्धा य । तत्थ अकारस्स अकारपजया अकारभावत्तणतो अत्थित्तेण संबद्धा, घडागारावस्थायां 10 घटपर्यायवत् ; ते चेव णत्थित्तेणं असंबद्धा, नस्थित्तस्स अभावत्तगतो, जहा घटाकारावस्थायां मृत्पर्यायवत् । अकारे इकारादिपर्याया णत्थित्तेण संवद्धा, अकारे णत्थित्तभावत्तणतो, जहा मृदयस्थायां पिंडाकारपर्यायवत् ते चेव अत्थित्तेण असंवद्धा, अत्थित्तअभावत्तणतो, घटाघवस्थायां पटपर्यायवत् । एवं अक्खरेसु घडाइपजाया वि चिंतणिज्जा, घडादिमु य अका(? क्व)रपज्जाया, इच्चेवं एक्कमकावरं सवपज्जायमं ॥ [जे० २१३ प्र०] ___ एवं सर्वात्मकाः सर्वपर्यायाः, अतो भण्णति-सव्वागासपदेसग्गं अणंतगुणितं पजवग्गं अक्खरं निप्फज्जति ॥ 15 एवं नाणक्खरं अकारादिअक्खरं णेयअक्खरं च तिण्णि वि अणंताऽभिहिता। एत्थ नाणक्खरं जं तं जीवस्स संसारत्थस्स ण कताइ ण भवति ति । जतो भणितं - ___७५. सव्वजीवाणं पि य णं अक्खरस्स अणंतभागो णिचुग्घाडियओ, जति पुण सो वि आवरिज्जा तेणं जीवो अजीवत्तं पावेज्जा। सुट्ठ वि मेहसमुदए होति पभा चंद-सूराणं । 20 से तं साँदीयं सपज्जवसियं । से तं अणादीतं अपज्जवसितं ७।८।९।१०। ७५. सव्यजीवाणं पि य णं इत्यादि मुत्तं । सधजीवग्गहणे वि सति 'अवि' पदत्थसंभावणे, किं संभावयति ? इम-सिद्धे मोत्तुं, चसदतो य भवत्थकेवली मोत्तुं । 'ण'कारो वाक्यालंकारे । अक्खरं ति-नाणं, तस्स अणं १ रेसु णस्थित्तभावत्तणतो घडाइपज्जाया आ० दा० । रेसु घडेसु घड इव पज्जाया मो० ॥ २ जायमयं । एवं आ० दा० । ज्जायम । एवं सर्वत्रकाः सर्व मो० ॥ ३ द्वादशारनय चक्रवृत्ती इदं सूत्रमित्यं वर्तते-सव्वजीवाणं पिय णं अक्खरस्स अणंततमो भागो णिच्चुग्धाडितओ। तं पि जदि आवरिजिज तेण जीवा अजीवतं पावे | सुटठु वि मेहसमुदये होइ पभा चंद-सूराणं ॥१॥ अत्रैव च नयचक्रप्रत्यन्तरे अणंतभागो इति जीवो अजीवतं इति च पाठभेदोऽप्युपलभ्यते ॥ ४ "डिओ सं० चूणि च विना ॥ ५ अत्र चूर्णिकृता चूर्णी जति पुण सो वि वरिजेज इत्यादि गाथैवोल्लिखिताऽस्ति, नयचकोद्धरणेऽपि पाठभेदेन गाथैव दृश्यते, अस्मत्स्वीकृतसूत्रप्रतिषु ये विविधाः पाठभेदा वत्तंन्ते, यच्च पाठस्य स्वरूपमीक्ष्यते, एतत्सर्वविचारणेन सम्भाव्यते यदत्र सूत्र गार्थव भ्रष्टता प्राप्ताऽस्ति । वृत्तिकृतोराचाययोः पुनरत्र किं गा गाथा वा मान्याऽस्ति ! इति न सम्यगवगम्यते, तथापि वृत्तिस्वरूपावलोकनेन गाथैव तेषां सम्मतेति सम्भाव्यते ॥ ६ सो वि वरिज्जेजा सं० शु० । सो वाऽऽवरिज्जेज खं० ॥ ७ तेणं जे• मो• मु० ॥ ८ अजीवतं ल. ॥९ पावेज खं० ॥ १० सादि सपं सं० शु० । सआदि सप खं० ॥ Jain Education Intemational Page #91 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जिणदासगगिमहत्तरविरइयाए चुण्णीए संजुयं [सु० ७६-८१ तभागो निचुग्याडियतो, सो केवलस्स न संभवति, केवलम्स अविभागसंपुण्णत्तणतो य; ओधीए वि ण संभवति, अणंतभागस्स अभावत्तणतो, अवधेः असंख्येयप्रकृतिसंभवादित्यर्थः; मणपज बनाणे वि रिजु-विपुलदुभेदसंभवतो अणंतभागो ण भवति, किंच अवधि-मणपजवाणं णिचुग्घाडअभावत्तणतो इह अणधिकारोः परिसिढे मति-मुते त्ति 'अक्खरस्स अणंतभागो निचुम्याडिययो' अधिकतमुतस्स वा अक्वरस्स अणंतभागी निचुग्याडियतो। जत्थ 5 सुतं तत्थ मतिणाणं पि घेत्तव्यं । 'णिच' ति सञ्चकालं । 'उग्याडिततो' त्ति णाऽऽवरिजति । सो य अणंतभागो पुढवादिएगिदियाण वि पंचण्हें निचुम्याडो, अह वा सवजहण्णो अगंतभागो निचुग्याडो पुढविकाइए, चैतन्यमात्रमात्मनः । तं च उक्कोसथीणिद्विसहितनाण-दंसणावरणोदए वि णो आवरिजति । · जति पुण सो वि बरिजेज तेण जीवो अजीवयं पावे । मुटु वि मेहसउदए होति पहा चंद-सूराणं ॥१॥ [कल्पभाष्ये गा. ७४] 10 जम्हा सो णाऽऽवरिज्जति तम्हा जीवो जीवत्तं ण परिचयति । सो य कम्हा णाऽऽवशिजति? उच्यते-दव्य समावसरूवत्तणतो। इह दिटुंतो जहा-मुट्ठ वि मेहच्छादिए णभे चंद-सूरप्पहा मेहपडले भेत्तुं दब्वे ओभासति, तहा अणंतेहिं णाण-दंसणावरणकम्मपुजलेहि एक्केको आतप्पदेसो आवेढियपरिवदितो ते कम्मावरणपडले भेत्तुं नाणस्स अणंतभागो उब्बरति, [जे० २१३ द्वि०] ततो य से अन्चत्तं नाणमक्खरं सबजहण्यं भरति । ततो पुढविकाइतेहितो आउकातियाण अणंतभागेण विमुद्धतरं नाणमक्खरं, एवं कमेणं तेउ-वाउ-वण सति-वेइंदिय-तेइंदिय-चतुरिं15 दिय-असण्णिपंचेंदिय-मणिपंचेंदियाण य विमुद्धतरं भवतीत्यर्थः। ७।८।९।१०॥ भणितं सादि सपज्जवसितं अणादि अपज्जवसितं च । एत्थेव प्रसंगतो अक्खरपडलं भणितं । एवं बहुवत्तव्वं अक्खरपडलं समासतोऽभिहितं । वित्थरतो से अत्थं जिण-चोदसपुचिया कहए ॥१॥ [॥ अक्ख र पडलं सम्मत्तं ॥] इदाथि गमिया-ऽगमियं20 ७६. से किं तं गमियं ? गमियं दिविवाओ । अगमियं कालितं सुयं। से तं गमियं । से तं अगमियं ११ । १२ । ७६. गमबहुलत्तणतो गमियं । तस्स लक्षणं-आदि-मञ्झ-ऽवसाणे वा किंचिविसेसजुत्तं मुत्तं दुगादिसतग्गसो तमेव पढिजमाणं गमियं भण्णति, तं च एवंविहमुस्सणं विहिबातो। अण्णोण्यकालराभिधाणद्वितं जं पढिजति तं अगमियं, वे प्रायसो आयारादि कालियमुतं ११ । १२ ।। 25 उक्तं गमिया-ऽगमियं । इदाणि अंगा-ऽपंग-पविटं तं च गमिया-ऽगमियं चेव समासतो अंगा-ऽणंगपविर्ट भण्णति । कहं ? उच्यते-सवमुतस्स तभावंतगतत्तणतो । ७७. अहवा तं समासओ दुविहं पण्णत्तं, तं जहा-अंगपविटै अंगेबाहिरं च । ७७. अहवा अरिहंतमग्गोबदिट्टाणुसारि सुतं जं तं समासतो दुविहं इत्यादि मुत्तं । १पडलं आ० दा. १॥ २ एत्थं बहु आ० दा० ॥ ३ अहवा इति खं० सं० ल. शु० नास्ति ॥ ४ 'टुं च अंग जे० ॥ ५ अणंगपविडं च ख• सं० डे० ल• शु० ॥ Jain Education Intemational Page #92 -------------------------------------------------------------------------- ________________ गमियाऽगमियंगबाहिरुक्कालियाइसुयणाणं] सिरिदेववायगविरइयं गंदीसुत्तं । पायदुर्ग जंघोरू गातदुगद्धं तु दो य बाहृयो । गीवा सिरं च पुरिसो बारसअंगो मुतविसिट्ठो ॥ १॥ इच्चेतस्स सुतपुरिसस्स जं मुतं भावभागट्टितं तं अंगपविलु भण्णति । जं पुण एतस्सेव मुतपुरिसस्स बहरेगहितं तं अंगबाहिरं ति भण्णति । अहवा गणहरकतमंगगतं जं कत थेरेहिं वाहिरं तं च । णियतं वंगपविष्ट अणियत मुत बाहिरं भणितं ॥१॥ 5 15 ७८. से किं तं अंगवाहिरं ? अंगंवाहिरं दुविहं पण्णत्तं, तं जहा-आवस्मगं च आवस्सगवइरित्तं च । ७९. से किं तं आवस्सगं ? आवस्सगं छविहं पण्णनं, तं जहा-सामायियं १ चउवीसत्थो २ वंदणयं ३ पडिकमणं ४ काउस्सग्गो ५ पञ्चक्खाणं ६ । से तं आवस्सयं। 10 ७८-७९. से किं तं अंगबाहिरमित्यादि । कंठं ॥ ८०. से किं तं आवस्मयवइरित्तं ? आवस्सयवइरित्तं दुविहं पण्णनं, तं जहा-कालियं च उक्कालियं च । ८०. आवस्तगवतिरित्तं दुविहं-कालियं उकालियं च । तत्थ 'कालियं जं दिण-रातीगं पढमचरिमपोरिसीमु पढिजति । जं पुण कालवेलवजं पढि जति तं उकालियं ॥ तत्थ ८१. से किं तं उकालियं ? उक्कालियं अणेगविहं पण्णत्तं, तं जहा-दसवेयालियं १ कप्पियाकप्पियं २ चुल्लकप्पसुतं ३ महाकप्पसुतं ४ ओवाइयं ५ रायपसेणियं ६ जीवाभिगमो ७ पण्णवणा ८ महापण्णवणा ९ पमायप्पमादं १० नंदी ११ अणुओगदाराई १२ देविंदत्थओ १३ तंदुलवेयालियं १४ चंदावेज्झयं १५ सूरपण्णत्ती १६ पोरिसिमंडलं १७ मंडलप्पवेमो १८ विज्जाचरणविणिच्छओ १९ गणिविज्जा २० झाणविभत्ती २१ मरणविभत्ती २२ आयवि- 20 सोही २३ वीयरायसुतं २४ संलेहण सुतं २५ विहारकप्पो २६ चरणविही २७ आउरपञ्चक्खाणं २८ महापचक्खाणं २९ । से तं उकालियं । ८१. उक्कालियं अणेगविहं दसवेयालियादि । कप्पमकप्पं च जत्थ मुते वणि जति तं कप्पियाकप्पियं २। कप्पं जत्थ मुते वणितं तं कप्पसुतं, अणेगविहचरणकप्पणाकप्पयं [जे० २१४ प्र० ] च कप्पमुतं । तं दुविहं-चुलं महंतं च । चुलं ति-लहुतरं अवित्थरत्थं अप्पगं च चुल्लकप्पसुतं ३। महत्थं महागंथं च महा- 25 १-२ अणंगपविट्ठ खं• सं डे० ल० शु० ॥ ३ वंदणं ख० सं० डे० ल० शु० ॥ ४ काओसग्गो खं० ॥ ५ "ओवाइयंति प्राकृतत्वाद् वर्णलोपे औपपातिकम्" इति पाक्षिकसूत्रवृत्तौ । उववाइयं शु० मु० ॥ ६ रायपसेणीयं खं० । रायपसेणइयं डे. ल. शु० ॥ ७°क्खाणं २९ एवमाइ । से तं जे० मो० मु० । एवमाइ इति सूत्रपदं चूर्णि-वृत्तिद्भिर्नास्ति व्याख्यातम् । अपि च जेसू• प्रतौ अत्रार्थे "टीकायामिदं न दृश्यते” इति टिप्पनकमपि वर्तते ॥ Jain Education Intemational Page #93 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जिणदासगणिमहत्तरविरइयाए चुण्णीए संजुयं [सु० ८२ कप्पसुतं ४ । एमेव [पण्णवणा] पण्णवणत्थो सवित्थरो ८ । अण्णे य सवित्थरत्था जत्थ भणिता सा महापण्णवणा ९ । मज्जादियो पंचविहो पमातो, तेसु चेव आभोगपुब्बिया उवरती अप्पमातो, एते जत्थ सवित्थरत्था दंसिजंति तमज्झयणं पमादप्पमादं १० । सूरचरितं पण्णविजते जत्थ सा सूरपण्णत्ती १६ । पुरिसो त्ति-संकू पुरिससरीरं वा, ततो पुरिसातो निप्फण्णा पोरिसी, एवं सन्चस्स वत्थुणो जदा स्वप्रमाणा च्छाया भवति तदा 5 पोरिसी भवति, एतं पोरिसिप्रमाणं उत्तरायणस्स अंते दक्षिणायणस्स य आदीए एक दिणं भवति, अतो परं अट्ठ एकसट्ठिभागा अंगुलस्स दक्षिणायणे वड्डंति, उत्तरायणे य इस्संति, एवं मंडले मंडले अण्णोण्णा पोरिसी जत्थ अज्झयणे दंसिज्जति तमज्झयणं पोरिसिमंडलं १७ । चंदम्स मरम्स य दाहिणुत्तरेमु मंडलेसु जहा मंडलातो मंडले पवेसो तहा वणिजति जत्थऽज्झयणे तमज्झयणं मंडलप्पवेसो १८ । विज त्ति-नाणं, चरणं-चारित्तं, विविधो विसिट्टो वा णिच्छयो-सम्भावो स्वरूपमित्यर्थः, फलं वा निच्छयो, तं जत्थऽज्झयणे वणिज्जति तमज्झयणं विजा10 चरणविणिच्छयो १९ । सवाल-वडढाउलो गच्छो गणो, सो जस्स अस्थि सो गणी. विज त्ति-जाणं, तं च जोइसनिमित्तगतं णातुं पसत्थेमु इमे कज्जे करेति, तं जहा-पव्यावणा १ सामाइयारोवणं २ उवट्ठावणा ३ सुतस्स उद्देस-समुद्देसा-ऽणुण्णातो ४ गणारोवणं ५ दिसाणुण्णा ६ खेत्तेमु य णिग्गम-पवेसा ७, एमाइया कज्जा जेसु तिहिकरण-णक्खत्त-मुहुत्त-जोगेसु य जे जत्थ करणिजा [जे० २१४ द्वि०] ते जत्थऽज्झयणे वणिजंति तमज्झयणं गणिविजा २० । थिरमज्झवसाणं झाणं, विभयणं विभत्ती, सभेदं झाणं जत्थ वणिज्जति अज्झयणे तमज्झयणं 15 झाणविभत्ती २१ । मरणं-पाणपरिचागो, विभयणं-विभत्ती, पसत्थमपसत्थाणि सभेदाणि मरणाणि जत्थ वणिजंति अज्झयणे तमज्झयणं मरणविभत्ती २२ । आत त्ति-आत्मा, तस्स विसोही तवेण चरणगुणेहिं य आलोयणाविहाणेण य जहा भवति तहा जत्थ अज्झयणे वणिज्जति तमज्झयणं आतविसोही २३ । सरागो वीतरागो य एतेसिं जत्थ सरूवकहणा, विसेसतो वीतरागस्स, तमज्झयणं वीतरागसुतं २४ । वाघातो निव्वापातो वा भत्तसंलेहो कसायादिभावसंलेहो य जो जहा कातव्यो तहा वणिजते जत्थऽज्झयणे तमज्झयणं संलेहणासुतं 20 २५ । विहरणं विहारो, तस्स कप्पो-विधि त्ति वुत्तं भवति, सो जिणकप्पे थेरकप्पे वा, जिगकप्पे पडिम-अहालंद परिहारिया य ददुव्वा, एतेसिं सवित्थरो विधी जत्थ अज्झयणे [वणिजति] तमज्झयणं विहारकप्पो २६ । चरणं-चारित्तं, तस्स विही चरणविही, सभेदो चरणविही वणिजति जत्थ अज्झयणे तमज्झयणं चरणविही २७ । आउरो-गिलाणो, तं किरियातीतं णातुं गीतत्था पञ्चक्खाति, दिणे दिणे दव्वहासं करेंता अंते य सबदव्यदात णताए भत्ते वेरग्गं जणेता भत्ते नित्तण्हस्स भवचरिमपञ्चक्रवाणं कारेंति, एतं जत्थऽज्झयणे सवित्थरं वणिजइ 25 तमज्झयणं आउरपञ्चक्खाणं २८ । थेरकप्पेणं जिणकप्पेण वा विहरित्ता अंते थेरकप्पिया वारस वासे संलेहं करेत्ता, जिणकप्पिया पुण विहारेणेव [जे० २१५ प्र० ] संलीढा तहा वि जहाजुत्तं संलेहं करेत्ता निव्याघातं सचेट्ठा चेव भवचरिमं पच्चक्खंति, एतं सवित्थरं जत्थऽज्झयणे वणिज्जति तमज्झयणं महापच्चक्खाणं २९ । एते अज्झयणा जहाभिधाणत्था भणिया ।। उक्तं उक्कालियं । इदाणिं कालियं30 ८२. से किं तं कालियं ? कालियं अणेगविहं पण्णत्तं, तं जहा-उत्तरज्झयणाई १ दसाओ २ कप्पो ३ ववहारो ४ णिसीहं ५ महाणिसीहं ६ इसिभासियाइं ७ जंबुद्दीवपण्णत्ती १ “जीवादीनां प्रज्ञापन प्रक्षापना" इति हारिवृत्तौ ॥ २ कालियं अणंगपविहँ ? कालियं अणंगपविहं अणेग खं. सं० शु० । नायं पाठश्चूर्णि-वृत्तिकृतां सम्मतोऽस्ति ॥ Jain Education Intemational Education Interational Page #94 -------------------------------------------------------------------------- ________________ कालियमुयं ] सिरिदेववायगविरइयं णंदीमुत्तं । .८ दीवसागरपण्णत्ती ९ चंदपण्णत्ती १० खुड्डियाविमाणपविभत्ती ११ महल्लियाविमाणपविभत्ती १२ अंगचूलिया १३ वैग्गचूलिया १४ विवाहचूलिया १५ अरुणोववाए १६ गरुलोववाए १७ धरणोववाए १८ वेसमणोववाए १९ देविदोववाए २० वेलंधरोववाए २१ उट्ठाणसुयं २२ समुट्ठाणसुयं २३ नागपरियाणियाओ २४ निरयावलियाओ २५ कप्पवडिसियाओ २६ पुफियाओ २७ पुष्फचूलियाओ २८ वण्हीदसाओ २९ । ८२. से किं तं कालियं इत्यादि मुत्तं । जं इमस्स निसीहम्स मुत्तत्थेहिं वित्थिण्णतरं तं महाणिसीहं ६ । सोहम्मादिमु जे विमणा ते आवलितेतरहिते प्रतिविभागेण विभयइ जमझयणं तं विमाणपविभत्ती भण्णति । ते य दो अज्झयणा-तत्येगं मुत्तत्थेहिं संखित्ततरं खुडं ति ११, वितियं मुत्तत्थेहिं वित्थिण्णतरं महलं ति १२ । अंगस्स चूलिता जहा-आयारस्स पंच चूलातो, दिहिवातस्स वा चूला १३ । वग्गो ति विवखावसातो अन्झयणादिसमूहो वग्गो, जहा अंतकडदसाणं अट्ठ वग्ना, अणुत्तरोववातियदसागं तिण्णि वग्गा, तेसिं चूला 10 वग्गचूला १४ । वियाहो भगवती, तीए चूला वियाहचूला, पुषभणितो अभणिओ य समासतो चूलाए अर्थों भण्यतेत्यर्थः १५ । अरुणे णामं देवे तस्समयनिबद्धे अज्झयणे, जाहे तं अज्झयण उवउत्ते समाणे अणगारे परियट्रेति ताहे से अरुणे देवे समयनिवद्धत्तणतो चलितासणे जेणेव से समणे तेणेव आगच्छित्ता ओवयति, ताहे समणस्स परतो अंतद्धिते कतंजली उवउत्ते मुणेमाणे चिति. समत्ते य भणति-मुभासितं. वरेह वरं ति. इहलोगगिप्पिवासे से समणे पडिभणति-ण मे वरेण अट्ठो त्ति, ताहे से पदाहिणं करेत्ता णमंसित्ता य पडिगच्छति १६ । एवं गमले 15 १वंग खं० सं० ल० शु० ॥ २ वियाह शु० ल० ॥ ३ उववापपदान्तानि सूत्रनामानि अस्मदाहतास्वष्टासु सूत्रप्रतिषु चूादशेषु हारिवृत्तौ मलयगिरिवृत्तौ पाक्षिकसूत्रयशोदेवीयवृत्तौ च क्रमव्यत्यासेन न्यूनाधिकभावेन च वर्तन्ते । तथाहिअरुणोववाए वरुणोवधाए गरुलोववाए धरणोववाए वेसमणोववार वेलंधरोववार देविंदोववाए उट्ठाण जेसू० मोसू० मुसू० । अरुणोववाए वरुणोववाए गरुलोववाए धरणोववाए वेलंघरोववाए देविदोववाए वेसमणोववाए उट्ठाण डे० । अरुणोववाए. वरुणोववाए गरुलोववाए वेलंधरोववाए देविंदोववाए वेसमणोववाए उट्ठाण सं० शु० । अरुणोववाए वरुणोववाए गरुलोववाए वेलंधरोववाए देविदोववाए उट्ठाण खं० । अरुणोववाए वेलंधरोववाए देविंदोववाए वेसमणोववाए उट्ठाण ल। अथ च-अरुणोववाए इति सूत्रनामव्याख्यानानन्तरं हरिभद्रवृत्तौ “एवं वरुणोववादादिमु वि भाणियव्य" इति, मलयगिरिवृत्तौ च "एवं गरुडोपपातादिष्वपि भावना कार्या” इति, पाक्षिकसूत्रवृत्तौ च "एवं वरुणोपपात-गरुडोपपातवैश्रमणोपपात-वेलन्धरोपपात-देवेन्द्रोपपातेष्वपि वाच्यम्" इति निर्दिष्टं दृश्यते । चूादशेषु पुनः पाठभेदत्रयं दृश्यते-१ श्रीसागरानन्दसूरिमुद्रिते चूयादर्श [पत्र ४९] "एवं गरुले वरुणे वेसमणे सक्क-देविंदे वेलंधरे यत्ति" इति, २ श्रीविजयदानसुरिसम्पादित मुद्रितचूादर्श [पत्र ९०-१] "एवं वरुणे गरुले धरणे वेसमणे वेलंधरे सके-देविंदे य त्ति" इति, ३ अस्माभिराइते शुद्धतमे जेसलमेरुसत्के तालपत्रीयप्राचीनतमचूादर्श च "एवं गरुले धरणे वेसमणे सके-देविंदे वेलंधरे य त्ति" इति च । श्रीसागरानन्दसूरीयो वाचनाभेद आदर्शान्तरेषु प्राप्यते, श्रीदानसूरीयो वाचनाभेदस्तु नोपलभ्यते कस्मिंश्चिदप्यादर्श इत्यतः सम्भाव्यते-श्रीमद्भिर्दानसूरिभिः मुद्रितसूत्रादर्श-चूया दर्शान्तर-हारि०वृत्ति-पाक्षिकवृत्त्याद्यवलोकनेन पाठगलनसम्भावनया सूत्रनामप्रक्षेपः क्रमभेदश्चापि विहितोऽस्तीति । अस्माभिस्तु जेसलमेरीयचूर्णिप्रत्यनुसारेण सूत्रपाठो मूले स्थापितोऽस्तीति॥४ परियावणियाओ जे० सं० डे० शु०। 'परियावलियाओ खं० मो० ल. ॥ ५ याओ कप्पियाओ कप्पडि सर्वामु सूत्रप्रतिषु । श्रीमता चर्णिकृता कपिपयाओ इति नाम आदृतं नास्ति । किञ्च-सर्वास्वपि नन्दिसूत्रप्रतिषु एतन्नाम दृश्यते, श्रीहरिभद्रसूरि-मलयगिरिवृत्त्योः पाक्षिकसूत्रटीकायां चापि एतन्नामव्याख्यानं वर्तते । तथाहि-"कप्पियाओ' त्ति सौधर्मादिकल्पगतवक्तव्यतागोचरा ग्रन्थपद्धतयः कल्पिका उच्यन्ते ।" नन्दीहारिवृत्तिः । एतत्समानव व्याख्या मलयगिरिवृत्तौ पाक्षिकटीकायां च वत्तते ॥ ६ वहीदसाओ इति नाम्नः प्राक् वण्हीयाओ इत्यधिकं नाम शु० । नेदं नाम चूर्णि-वृत्त्यादिषु व्याख्यातं निर्दिष्ट वाऽस्ति ॥ ७ पवं गरुले वरुणे वेसमणे सकेदेविदे वेलंधरे य त्ति आ० मो० । एवं वरुणे गरुले धरणे वेसमणे वेलंधरे सके-देविदे य त्ति दा० ॥ Jain Education Intemational Page #95 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ६० जिणदासगणिमहत्तरविरइयाए चुण्णीए संजुयं [सु०८३-८५ १७ धरणे १८ वेसमणे १९ सक्के-देवेंदे २० वेलंधरे २१ य त्ति । 'उट्ठाणसुतं' ति अज्झयणं सिंगणाइयकज्जे जस्स णं गामस्स वा जाव रायहाणीए वा एगकुलस्स वा समणे आमुरुत्ते रुढे उवउत्ते तं उठाणसुते त्ति अज्झयणं परियति एकं दो तिणि वा वारे ताहे से गामे वा जाव रायधाणी वा कुलं वा उठेति, उव्वसइ ति वुत्तं भवति २२ । से चेव समणे [जे० २१५ द्वि०] तस्स गामस्स वा जाव रायधाणीए वा तुढे समाणे पसण्णे पसण्णलेस्से 5 सुहासणत्थे उवउत्ते समुट्ठाणमुतं परियट्टेइ एकं दो तिणि वा वारे ताहे से गामे वा जाव रायहाणी वा आवासेति । समुवट्ठाणमुये त्ति वत्तव्वे वगारलोवातो समुट्टाणसुये त्ति भणितं । अप्पणा पुव्बुढ़ियं पि कतसंकप्पस्स आवासेति २३ । 'णागपरियाणिय' त्ति अज्झयणे णाग त्ति-नागकुमारे, तेमु समयनिवद्धं अज्झयणं, तं जदा समणे उपयुत्ते परियट्रेति तया अकतसंकप्पस्स वि ते णागकुमारा तत्थत्था चेव परियाणंति, वंदंति णमंसंति भत्तिवह्यमाणं च करेंति, सिंगणाइयकज्जेमु य वरया भवतीत्यर्थः २४ । निरयावलियासु आवलियपविठूतरे य निरया तग्गामिणो 10 य णर-तिरिया पसंगतो वण्णिजंति २५ । सोहम्मीसाणकप्पेमु जे कप्पविमाणा ते कप्पवडेंसया ते वण्णिता, तेसु य देवीओ जा जेण तवोविसेसेण उववण्णा ता वण्णिता, ताओ य कप्पवडेंसिया भणिया २६ । संजमभावविगसितो पुप्फितो, संजमभावविचुतोऽवपुष्फितो, अगारभावं परिद्ववेत्ता पन्चजाभावेण विगसितो पच्छा सीयइ जो, तस्स इहभवे परभवे य विलंबणा दंसिज्जइ जत्थ ता पुफिया २७ । एसेवऽत्थो सविसेसो पुप्फचूलाए दंसिज्जति २८ । अंधगवण्हिणो जे कुले ते अंधगसदलोवातो वहिणो भणिया, तेसिं चरियं गती सिज्झणा य 15 जत्थ भणिता ता वहिदसातो । दस त्ति-अवस्था अज्झयणा वा २९ ॥ .८३. एवमाईयाई चउरासीतीपइण्णगसहस्साई भंगवतो अरहओ उसहस्स आइतित्थयरस्स, तहा संखेज्जाणि पइण्णगसहस्साणि मज्झिमगाणं जिणवराणं, चोदस पइण्णगसहस्साणि भगवओ वद्धमाणसामिस्स । अहवा जस्म जत्तिया सिस्सा उप्पत्तियाए वेणतियाए कम्मयाए पारिणामियाए चउविहाए बुद्धीए उववेया तस्स तत्तियाइं पइण्णगसहस्साई, पत्तेय20 बुद्धा वि तत्तिया चेव । से तं कालियं । से तं आवस्सयवइरितं । से तं अणंगपविढं । ८३. भगवो उसभस्स चउरासीतिसमणसाहम्सीतो होत्था, पइण्णगज्झयणा वि सव्वे कालिय-उक्कालिया चतुरासीतिसहस्सा। कहं ? जतो ते चतुरासीति समणसहस्सा अरहंतमग्गउवदिढे जं सुतमणुसरित्ता किंचि णिजूहंते ते सव्वे पइणग्गा, अहवा मुतमणुम्सरतो अप्पणो वयणकोसल्लेग जे धम्मदेसणादिसु भासते तं सव्वं पइण्णगं, जम्हा अणंतगमपजयं मुत्तं दिढें । तं च वयणं नियमा अण्णतरगमाणुपाती भवति तम्हा तं [जे० २१६ प्र०] 25 पइण्णगं । एवं चतुरासीती पइण्णगसहस्सा भवतीत्यर्थः । एतेण विधिणा मज्झिमतित्थगराणं संखेजा पइण्णगस हस्सा। समणस्स वि भगवतो जम्हा चोदस समणसाहस्सीतो उकोसिया समणसंपदा तम्हा चोदस पइण्णगज्झय १ 'याति सं० ॥ २ भगवभो अरहओ सिरिउसहसामिस्स, मज्झिमगाणं जिणाणं संखेजाणि पइण्णगसहस्साणि, चोद्दस सं० डे० । भगवओ अरहओ उसहस्स समणाणं, मज्झिमगाणं इत्यादि शु० । भगवओ उसहरिसि(सिरि स्स समणस्स, मज्झिमगाणं इत्यादि खं० ल• । त्रयाणामप्येषां पाठभेदानां मज्झिमगाणं इत्याद्युत्तरांशेन समानत्वेऽपि नैकतरोऽपि पाठो वृत्तिकृतोः सम्मतः । वृत्तिकृद्भयां तु मूले आइत एव पाठो गृहीतोऽस्ति । चूर्णिकृता पुनः सं० डे० पाठानुसारेण व्याख्यातमस्तीति सम्भाव्यते ॥ ३ सिरिउसहसामिस्स आइ सं० । अत्र चूर्णिकृता उसहस्स इति, हरिभद्रसूरिणा सिरिउसहस्स इति मलयगिरिणा च सिरिउसहसामिस्स इति पाठोऽङ्गीकृतोऽस्ति ॥ ४ सीसा खं० सं० चूणि विना ॥ Jain Education Intemational Jain Education Intermational Page #96 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अंगपविट्ठसुयणाणं आयारे य] सिरिदेववायगविरइयं गंदीयुत्तं । णसहस्सा भवंति । अहवा 'जत्तिया सिस्सा' इत्यादि मुत्तं । इह मुत्ते अपरिमाणा पइण्णगा पइण्णगसामिअपरिमाणतणतो, किंच इह मुत्ते पत्तेयबुद्धप्पणीतं पइण्णगं भाणितव्वं । कम्हा? जम्हा पइण्णगपरिमाणेण चेव पत्तेयबुद्धपरिमाणं कीरइ त्ति भणितं 'पत्तेयबुद्धा वेत्तिया चेत्र' नि । चोदक आह-णणु पत्तेयबुद्धा सिस्सभावो य विरुज्झते ? आचार्याह-तित्थगरपणीयसामणपडिवन्नत्तणतो तस्सीसा भवतीत्यर्थः।। भणितं कालितमुतं अंगवाहिरं च । इदाणिं अंगपविढं ८४. से किं तं अंगपविढं ? अंगपविट्ठ दुवालसविहं पण्णत्तं, तं जहा-आयारो १ सूर्यगडो २ ठाणं ३ समवाओ ४ वियाहपण्णत्ती ५ णायाधम्मकहाओ ६ उवासगदसाओ७ अंतगडदमाओ ८ अणुत्तरोववाइयदसाओ ९ पण्हावागरणाई १० विवागसुतं ११ दिट्ठिवाओ १२ । ८४. से किं तं अंगपविष्टं इत्यादि सूत्रम् ॥ ८५. से कि तं आयारे ? आयारेणं समणागं णिग्गंथाणं आयार-गोयर-विणय-वेणइय- 10 सिक्खा-भासा-अभासा-चरण-करण-जाया-माया-वित्तीओ आघविज्जंति । से समासओ पंचविहे पण्णत्ते, तं जहा–णाणायारे १ दंसणायारे २ चरित्तायारे ३ तवायारे ४ वीरियायारे ५। आयारे णं परित्ता वायणा, संखेज्जा अणुओगदारा, संखेज्जा वेढा, संखेज्जा सिलोगा, संखेज्जाओ णिज्जुत्तीओ, संखेज्जाओ पडिवत्तीओ । से णं अंगठ्ठयाए पढमे अंगे, दो सुयक्वंधा, पणुवीसं अज्झयणा, पंचासोती उद्देसणकाला, पंचासीती समुद्देसणकाला, अट्ठा- 15 रः पयसहस्साइं पदग्गेणं, संखेज्जा अक्खरा, अणंता गमा, अणंता पज्जवा, परित्ता तसा, अणंता थावरा । सासत-कड-णिवद्ध-णिकाइया जिणपण्णता भावा आघविज्जति पण्णविज्जंति परूविज्जति दंसिज्जति णिदंसिज्जति उवदंसिज्जति । से एवंआया, एवं नाया, एवं विण्णाया, एवं चरण-करणपरूवणा आघविज्जइ । से तं आयारे १ । ८५. [से किं तं आयारे इत्यादि मुत्तं] । आयरणं आयारो । गोयरो-भिक्वागहणविधाणं । विणयो- 20 णाणासियो तिविहो वावण्णविधाणो वा । वेणइया-सीसा, तेसि जहा आसेवणसिक्खा। भासा-सच्चा असच्चामोसा य । अभासा-मोसा सच्चामोसा य । चरणं-"वतसमिति०" गाहा [ ] । करणं-"पिंडस्स जा १ इह तिन्थे अपरिमाणा इति पाठो मलयगिरिमूयुद्धतचूण्युद्धरणे ॥ २ सूयगडं सं० ॥ ३ विवाह खं० विना ॥ ४ वाइणा ल० ॥ ५ चूर्णा संखेजाओ पडिवत्तीओ, संखेज्जाओ णिज्जुत्तीओ, इति पाठो व्यत्यासेन व्याख्यातोऽस्ति । ६-७ सीई ल. ॥८'स्लातिं शु० । 'स्साणि मो० मु० ॥ ९ चूर्णिकृता एवंआया इति पाठो न गृहीतो न च व्याख्यातोऽस्ति, किन्तु श्रीहरिभद्रसूरिणा श्रीमलयगिरिणा च एष पाठो गृहीतोऽस्ति, साम्प्रतं च प्राप्तामु सस्विपि नन्दीसूत्रमूलप्रतिषु एष पाठो दृश्यते । समवायाङ्गसूत्रवृत्तावभय देवमूरिभिः एवंआया इति पाठो नन्दीसूत्रत्वेनाऽऽदतो व्याख्यातश्चापि दृश्यते । तैरेव च तत्र स्पष्ट निदिष्टं यद्-असौ पाठी न समवायाङ्गसूत्रप्रतिपु वत्तत इति । एतचदं सूचयति यत-चूर्णिकारप्राप्तप्रतिभ्यो भिन्ना एव नन्दीसूत्रप्रनयो हरिभद्रादीनां समक्षमासन् , तथाऽभयदेवसूरिप्राप्तामु समवायाङ्गसूत्रप्रनिपु एष पाठो नासीत् । सम्प्रति प्राप्यमाणामु च समवा. याङ्गसूत्रस्य कतिपयामु प्रतिषु दृश्यमान एप पाठोऽभयदेवसूरिनिक्षिप्त-व्याख्यातपाठानुरोधनवाऽऽयात इति सम्भाव्यते ॥ १० वणया आ खं० ल० ॥ ११ आचारे ल• ॥ Jain Education Interational Page #97 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जिणदासगणिमहत्तरविरइयाए चुण्णीए संजुयं [सु० ८६-८७ विसोही." गाहा [व्यव. भा. उ. १ गा. २८९] । जाय त्ति-संजमजत्ता, तस्स साहणत्थं आहारोमात त्ति-मात्राजुत्तो घेत्तयो । वर्तनं वृत्ती । एतं सवं आयारे 'आपविजाति आख्यायते । मृत्तमत्थम्स य पदाणं वायणार अणंता ण भवति, आदि-अंतोवलंभत्तणतो । अडवा ओसप्पिणि-उस्मप्पिणिकालं वा पड़च्च परित्ता, तीता-ऽणागत सम्बद्धं च पडुच्च अणंता। उवकमादि णामादिणिक्खेवकरणं च अणियोगदारा, ते आयारे संखेज्जा, तेसिं पण्णव5 गवयणगोयरत्तणतो। वेढो-छंदजाती। 'पडिवत्तीओ' ति व्यादिपदत्यभुवगमो पडिमा-ऽभिग्गहविसेसा य पडिवत्तीओ, ते समासतो मुत्तपडिवद्धा संखेजा । तिविहा जेण निखवमादिनिजुती तेण संखेजा। णव बंभचेरा पिंडेसणा सेजा इरिया भासज्जाया बत्थेसणा पासणा [जे० २१६ द्वि० ओग्गहपडिमा सनसत्तिकया भावणा विमोत्ती, एते एवं णिसीहवजा पणुवीसं अज्झयणा । पंचासीती उद्देमणकाला। कई ? उच्यते-अंगम्स सुतकावं धस्स अज्झयणस्स उद्देसगम्स, एते चउरो वि एको उद्देसणकालो। एवं सत्यपरिणाए सत्त उद्देसणकाला, लोग10 विजयस्स छ, सीतोसणिज्जस्स चतुरो, समत्तम्स चतुरो, लोगसारस्स छ, धुयस्स पंच, महापरिणाए सत्त, विमो हाततणरस अट्ट, उपधाणमुतस्स चतुरो, पिंडेसणाए एकारस, सेजाए तिष्णि, इरियाए तिण्णि, भास जाताए दो, वत्थेसणाए दो, पातेसः ।ए दो, उग्गहपडिमाए दो, सत्तिकयाणं सत, भावणाए एको, विनोत्तीए एको, एते सव्वे पंचासीति । चोदक आह-जदि दो मुतखंबा पणुवीसं अज्झयणा य अट्ठारस पदमहस्सा पदग्गेणं भवंति तो जं भणितं "णववंभचेरमइओ अट्ठारसपदसहस्सितो वेदो।" आचा० नि० गा० ११ ति एतं विरुज्झति?। आचार्य नाह–णणु 15 एत्थ वि भणितं 'सपंचचूलो अट्ठारसपदसास्सितो वेदो' त्ति, इह सुत्तालावयपदेहि सहितो वह वहुतरो य वक्त व्येत्यर्थः । अहवा दो मुतखंधा पणुवीसं अज्झयणा य, एतं आयारग्गसहितस्त आयारस्त पमाणं भणितं । अट्ठारस पदसहस्सा पण पढममतसंधस्स णवंभचेरमइयम्स पमाणं । विचित्तत्यवदा य मुत्ता, गुरूपदेयतो मिं अस्थो भागितव्यो । अश्वरस्यणाए संज्जा अश्वरा। अभिधाणाभिधेयवसतो गमा भवंति, ते य अणंता इमेण विधिणा-सुतं मे आउसं तेणं भगवता, तं मुतं मे आउसं, तर्हि मुतं मे आ०, आ मुतं मे आ०, तं मुतं मया आ०, 20 तदा सुतं मदा आ०, तहिं मुतं मदा आ०, एवमादिगमेहि भण्गमाणं अगंतगमं । अश्वरपजएहि अत्थपन्जएहिं य अणतं । परित्ता तया, अगंता ण भवंति । अणता थावरा वणकइसहिता। सासत त्ति पंचस्थिकाइयाइया । कड त्ति-कित्तिमा, पयोगतो वीससापरिणामतो [जे० २१७ प्र०वा जहा अब्भा अन्भरुकवादी । एते सव्वे आयारे सुत्तेण निवद्वा । निजुत्ति-संगहणि-हेन्दाहरणादिएहिं य णिकाइया। किंच एते अण्गे य 'जिगपण्णत्ता' जिणप्पणीया भावा 'आपविजंति जाव उवदंसिर्जति एतेसिं पदाणं पूर्ववद् व्याख्या । एवंविहमायारं अहिन्जिन से 25 पु मे ‘एवं' ति जहा आयारे निवद्वा परूविता य तहा सम्बदन्य-भाषाणं गाता भवति । विविधे त्ति-अणेगधा जागमाणो विण्णाता भवति । अण्ापावादुहितो वा विसिट्टतरे विसिट्टयरं वा जागमाणो विण्याता भवति । सेसं निगमणमुत्तं कंठं । से तं आयारे १॥ ___ ८६. से कि तं सूयगडे ? सूयगडे णं लोए सूइज्जइ, अलोए सूइज्जइ, लोया-ऽलोए सूइज्जइ, जीवा सूइज्जंति, अजीवा सूइज्जंति, जीवा-ऽजीवा सूइज्जंति, ससमए सूइज्जइ, 30 परसमए सूइज्जइ, ससमय-परसमए सूइज्जइ । सूयगडे णं आसीतस्स किरियावादिसयस्स, चउरासीईए अकिरियवादीणं, सत्तट्ठीए अण्णाणियवादीणं, बत्तीसाए वेणइयवादीणं, तिण्हं १ज्जति खं० सं० ल० ॥२°ज्जति डे. शु० ॥ ३ असीयस्स खं० सं० विना ॥ ४ सीए ख० ॥ ५ यावा सं० शु० मो. मु०॥ Jain Education Interational Page #98 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सूयगडे ठाणे य] सिरिदेववायगविरइयं णंदीमुत्तं । तेसट्ठाणं पावादुयसयाणं वूहं किच्चा ससमए ठाविज्जइ । सूयगडे णं परित्ता वायणा, संखेज्जा अणुओगदारा, संखेज्जा वेढा, संखेज्जा सिलोगा, संखेज्जाओ णिज्जुत्तीओ, संखेज्जाओ पडिवत्तीओ। से णं अंगट्ठयाए बिईए अंगे, दो सुयक्वंधा, तेवीमं अज्झयणा, तेत्तीसं उद्देसणकाला, तेत्तीसं समुद्देमणकाला, छत्तीसं पदसहस्साणि पयग्गेणं, संखेज्जा अक्खरा, अणंता गमा, अणंता पज्जवा, परित्ता तसा, अणंता थावरा, सासय-कड-णिबद्ध-णिकाइया 5 जिणपण्णत्ता भावा आघविज्जति पण्णविज्जंति परूविज्जति दंसिज्जति णिदंसिज्जति उवदंसिज्जति । से एवंआया, एवं णाया, एवं विण्णाया, एवं चरण-करणपरूवणा आघविज्जइ । से तं सूयगडे २। ८६. से किं तं मयगडेत्यादि मुतं । 'सूइज्जइ'त्ति जधा णट्ठा सई तंतुणा सूइज्जइ, उवलब्भतेत्यर्थः। अहवा जहा सूयी पडं सूतेइ तहा सूयगडे जीवादिपदत्था सूइज्जति । 'वृहं किच्च त्ति प्रतिव्यूह, तेण प्रतिव्यहेन ते 10 परप्पवादी णिप्पट-पसिणे कातुं ससमयस्स सम्भावे द्वाविज्जति । उदेसयपरिमाणं नातुं उदेसणकाला जाणेजा। सेसं कंठं । से तं सूयगडे २ ॥ ८७. से किं तं ठाणे ? ठाणे णं जीवा विज्जंति, अजीवा गविज्जंति, जीवा-ऽजीवा गविज्जति, - लोए विज्जइ, अलोए ठाविज्जइ, लोया-ऽलोए विज्जइ, ससमए ठाविज्जइ, परसमए ठाविज्जइ, ससमय-परसमए ठाविज्जइ । ठाणे णं टंका कूडा सेला 15 सिहरिणो पब्भारा कुंडाई गुहाओ आगरा दहा णदीओ आघविज्जति । ठाणे णं एंगाइयाए एगुत्तरियाए वुड्डीए दसट्ठाणगविवड्डियाणं भावाणं परवणया आघविज्जति । ठाणे णं परित्ता वायणा, संखेज्जा अणुओगदारा, संखेज्जा वेढा, संखेज्जा सिलोगा, संखेज्जाओ निज्जत्तीओ, संखेज्जाओ संगहणीओ, संखेज्जाओ पडिवत्तीओ। से णं अंगठ्ठयाए तइए अंगे, एगे सुयक्खंधे, दस अज्झयणा, एकवीसं उद्देसणकाला, एकवीसं समुद्देसणकाला, बावत्तरिं 20 पदसहस्साई पयग्गेणं, संखेज्जा अक्खरा, अणंता गमा, अणंता पज्जया, परित्ता तसा, अणंता थावरा, सासत-कड-णिवद्ध-णिकाइया जिणपण्णत्ता भावा आघविज्जति पण्णविज्जति १ तेवहाणं खं० सं० जे० डे० ल० । हारि वृत्तौ समवायाङ्गसूत्रादिषु च तेसहाणं इति पाठो वर्तते ॥ २ पासंडिय सयाणं जे० डे. मो० मु० । श्रीमलयगिरिभिरयमेव पाठ आदतोऽस्ति । ३ बिदिए शु० । बिईए ल० ॥ ४ जंति खं० शु. ल. डे० ॥ ५ → +- एतच्चितमध्यवर्ती पाठः जे. मो. मु. प्रतिषु ससमय-परसमप ठाविजइ इति पाठानन्तरं वर्तते ॥ ६ ठाणे णं इति खं० सं० ल. शु० नास्ति ॥ ७ एगाइयाणं एगुत्तरियाणं दसठाण सं० डे० ल. शु०॥ ८वणा जे. मो० ॥९जंति ख हे० शु० ॥१० जे० डे० विनाऽन्यत्र सिलोगा, संखेजाओ संगणीओ | से णं खं० सं० ल• शु० समवायाङ्गसूत्रे च । सिलोगा, संखेजाओ निज्जुत्तीओ, संखेजाओ पडिवत्तीओ। से णं मो• मु० ॥११ ख० सं० ल० शु० प्रतिषु अणंता गमा अणंता पजवा इति नास्ति ॥ Jain Education Intemational Page #99 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जिणदासगणिमहत्तरविरइयाए चुण्णीए संजुयं [सु० ८८-९० परूविज्जति दंसिज्जति णिदंसिज्जति उवदंसिज्जति । से एवंआया, एवं णाया, एवं विण्णाया, एवं चरण-करणपरूवंणा आघविज्जइ । से तं ठाणे ३ । ८७. से किं तं ठाणेत्यादि मुत्तं । 'ठाविज्जति' त्ति स्वरूपतः स्थाप्यंते, प्रज्ञाप्यतेत्यर्थः । छिणं तडं टंकं । कूडं ति-जहा वेतहस्सोवरि णव सिद्धायतणाझ्या कूडा । हिमवंतादिया सेला । सिहरेण सिहरी, जहा 5 वेतड्ढो । जं कूडं उवरिं अंवग्वुजयं तं पदभारं, जं वा पचयस्स उपरिभागे हत्यिकुंभागिई कुडुहं निग्गयं तं पब्भारं । गंगादिया कुंडा । तिमिसादिया गुहा । रुप्प-मुवण्ण-रतणादिया आगरा। पोंडरीयादिया दधा । गंगासिंधुमादियाओ णदीओ । सेसं कंठं । से तं ठाणे ३ ॥ ८८. से किं तं समवाए ? समवाए णं जीवा समासिज्जंति, अजीवा समासिज्जंति, जीवा-जीवा समासिज्जति, लोए समासिज्जति, अलोए समासिज्जति, लोया-ऽलोए 10 समासिज्जति, ससमए समासिज्जति, परसमए समासिज्जति, ससमय-परसमए समासि ज्जति । समवाए णं एगाइयाणं एगुत्तरियाणं ठाणगसयविवड्डियाणं भावाणं परूवणा आघविज्जति । दुवालसंगस्स य गणिपिडगस्स पल्लवग्गे समासिज्जति । समाए णं परित्ता वायणा, संखेज्जा अणुओगदारा, संखेज्जा वेढा, संखेज्जा सिलोगा, संखेज्जाओ णिज्जुत्तीओ, संखेज्जाओ पडिवत्तीओ, संखेज्जाओ संगहणीओ। से णं अंगठ्ठयाए चउत्थे 15 अंगे, एगे सुयक्खंधे, एगे अज्झयणे, एगे उद्देसणकाले, एगे समुद्देमणकाले, एगे चोयाले पदसयसहस्से पदग्गेणं, संखेज्जा अवखरा, अणंता गमा, अणंता पज्जवा, परित्ता तसा, अर्णता थावरा, सामत-कड-णिवद्ध-णिकाइया जिणपण्णत्ता भावा आघविज्जति पण्णविज्जति परूविज्जंति दंसिज्जति णिदंसिज्जति उवदंसिज्जांत । से एवंआया, एवं णाया, एवं विण्णाया, एवं चरण-करणपरूवणी आघविज्जति । से तं समवाए ४ । 20 ८८. से किं तं समवाए इत्यादि । समवाए निक्खेवो चतुम्बिहो । दव्वे सचित्तादिदव्यसमवातो, भाव समवातो इमं चेव अंगं । अहवा जत्थ वा एगत्थ ओदइयाइ बहू भावा सण्यिावादियसंजोगा या भावसमवातो। भावसमवाए वा इमं णिरुत्तं-जीवा 'समासिज्जति' समं आसइजति । समं ति-ण क्सिमं, जहावत्थितं अनूनातिरिक्तं इत्यर्थः । आसइज्जति-आश्रीयंते, बुद्धया ज्ञानेन गृह्यतेत्यर्थः । अहवा समास ति-इहमग्गेऽभिहित- जे० २१७ द्वि० सव्वपदत्थाण समासतो विमरिसो त्ति । सेसं कंठं। उक्तः समवायः ४॥ १ वणया खं० सं० ल० शु० ॥ २ जति खं० सं० डे. ल. ॥ ३ दहा इत्यर्थः ॥ ४ 'लसविहस्स मो० डे० ॥ ५ पजवग्गे सं० । पल्लवग्गे इत्यस्यार्थः----"तथा द्वादशाङ्गस्य च गणिपिटकस्य 'पल्लवग्गे' ति पर्यवपरिमाणं अभिधेयादितद्धमसंख्यानम् , यथा “परित्ता तसा" इत्यादि । पर्यवशब्दस्य च 'पट्टव' त्ति निर्देशः प्राकृतत्वात् , पर्यः पल्यङ्क इत्यादिवदिति । अथवा पल्लवा इव पल्लवा:-अवयवास्तत्परिमाणम् ।" इति समवायाङ्गसूत्रवृत्तिः ११३-२ पत्रे ॥ ६ वायरस णं जे० डे. मो० ॥ ७ जेसं० डे.. विनाऽन्यत्र-सिलोगा, संखेन्जाओ संगहणीओ। से णं खं० सं० ल• शु.। सिलोगा, संखेज्जाओ निजुत्तीओ, संखेजाओ पडिवत्तीओ। से णं मो० मु० ॥ ८'णया ल• ॥ ९ज्जति खं० सं० ॥ Jain Education Intemational Page #100 -------------------------------------------------------------------------- ________________ समवाए वियाहे गायाधम्मकहाओ य] सिरिदेववायगविरइयं णंदीसुत्तं । ___ ८९. से किं तं वियाहे ? वियाहे णं जीवा वियाहिज्जति, अजीवा वियाहिज्जंति, जीवा-ऽजीवा वियाहिज्जंति, लोए वियाहिज्जति, अलोए वियाहिज्जति, लोया-ऽलोए वियाहिज्जति, ससमए वियाहिज्जति, परसमए वियाहिज्जति, ससमय-परसमए वियाहिज्जति । वियाहे णं परित्ता वायणा, संखेज्जा अणुओगदारा, संखेज्जा वेढा, संखेज्जा सिलोगा, संखेज्जाओ णिज्जुत्तीओ, संखेज्जाओ मंगहणीओ, खेज्जाओ पडिवत्तीओ। 5 से णं अंगट्ठयाए पंचमे अंगे, एगे सुयक्वंधे, एगे मातिरेगे अज्झयणमते, दम उद्देमगसहस्माइं, दस समुद्देमगसहस्माई, छत्तीस वागरणसहस्माइं, दो लक्खा अट्ठासीति पयसहस्साई पयग्गेणं, संखेज्जा अक्खरा, अणंता गमा, अणंता पज्जवा, परित्ता तसा, अगंता थावरा, सासत-कड-णिवद्ध-णिकाइया जिणपण्णत्ता भावा आघविज्जति पण्णविज्जति परूविज्जति दंसिज्जति णिदंसिज्जति उवदंसिज्जति । से एवंआया, एवं णाया, एवं विण्णाया, 10 एवं चरणकरणपरूवणा आघविज्जइ । से तं वियाहे ५ । ८९. से किं तं वियाहेत्यादि । 'वियाहे' त्ति व्याख्या, इह जीवादयो व्याख्यायंते। इह सतं चेव अन्झयणसणं । गोतमादिएहिं पुढे अपुढे वा जो पण्डो तव्वागरणं [च] । सेसं कंठं । से तं वियाहे ५ ॥ ९०. से किं तं णायाधम्मकहाओ ? णायाधम्मकहासु णं णायाणं णगराई उज्जाणाई चेयाई वणसंडाई समोसरणाइं रायाणो अम्मा-पियरो धम्मकहाओ धम्नायरिया इहलोग-पर- 15 लोगिया रिद्धिविसेसा भोगपरिचागा पैवज्जाओ परियागा सुयपरिग्गहा तवोवहाणाई मंलेहणाओ भत्तपञ्चक्खाणाई पाओवगमणाई देवलोगगमणाई सुकुलपञ्चायाईओ पुणबोहिलामा अंतकिरियाओ य आघविज्जति । दस धम्मकहाणं वग्गा । तत्थ णं एगमेगाए धम्मकहाए पंच पंच अक्खाइयासयाई, एगमेगाए अक्खाइयाए पंच पंच उवक्खाइयासयाई, एगमेगाए उवक्खाइयाए पंच पंच अक्खाइओवक्खाइयासयाई, एवमेव सपुव्वावरेणं अद्भुट्ठाओ कहाण- 20 गकोडीओ भवंति ति मक्खायं । णायाधम्मकहाणं परित्ता वायणा, संखेज्जा अणुयोगदारा, १-२ विवाहे जे० मो० मु० ॥ ३ विवाहस्सणं जे० डे० मो० मु० ॥ ४ डे० विनाऽन्यत्र-सिलोगा, संखेजाओ संगहणीओ | से णं खं० सं० ल• शु० । सिलोगा, संखेजाओ निन्जुत्तीगो, संखेजाओ पडिवत्तीओ। से ण जे. मो० ॥ ५ स्लाई, चउरासीई पयसहस्साई पयग्गेणं, इति समवायाङ्गसूत्र पाठः । अत्राभयदेवीया टीका-"चतुरशीतिः पदसहस्राणि पदाग्रणेति, समवायापेक्षया द्विगुणताया इहानाश्रयणात् , अन्यथा द्व लक्षे अष्टाशीतिः सहस्राणि च भवन्तीति ।" इति ११६-१ पत्रे । तथतदर्थ समर्थकः 'विवाहपण्णत्तीए णं भगवतीए चउरासीइं पदसहस्सा पदग्गेणे” इति समवायाङ्गे ८४ स्थानके सूत्रपाठोऽपि वत्तते ॥ ६ वणया ल०॥ ७ जंति सं० सं० ल० ॥ ८ विवाहे ख० सं० बिना ॥ ९ चेतियाति वणसंडार्ति शु०॥ १० 'पियरो धम्मायरिया धम्मकहाओ इह-पारलोइया इढिविसेसा जे० मो. मु.। 'धम्मायरिया धम्मकहाओ इहलोइय-परलोइयइड्ढीविसेसा" इति समवाया) ॥ ११ पन्ध जापरियागा खं० सं० डे० ल• शु० । “पधजाओ मुयपरिम्गहा तयोवहाणाई परियागा संलेहणाओ" इति समवायाङ्गे ॥ १२ वग्गा पण्णत्ता । तत्थ सं० ॥' Jain Education Intemational Page #101 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जिणदासगणिमहत्तरविरइयाए चुण्णीए संजुयं [ सु० .१-२ संखेज्जा वेढा, संखेज्जा सिलोगा, संखेज्जाओ णिज्जुत्तीओ, संखेज्जाओ संगहणीओ, संखेज्जाओ पडिवत्तीओ । से णं अंगठ्ठयाए छठे अंगे, दो सुयक्खंधा, एगूणवीसं णातज्झयणा, एगुणवीसं उद्देसणकाला, एगणवीसं समुद्देसणकाला, संखेज्जाइं पयसहस्साई पयग्गेणं, संखेज्जा अक्खरा, अणंता गमा, अणंता पज्जवा, परित्ता तसा, अणंता थावरा, सासत-कड-णिबद्ध-णिकाइया जिणपण्णत्ता भावा आघविज्जति पण्णविज्जति परूविज्जति दंसिज्जति णिदंसिज्जति उवदंसिज्जति । से एवंआया, एवं णाया, एवं विण्णाया, एवं चरण-करणपरूवणा आघविज्जति । से तं णायाधम्मकहाओ ६ ।। ९०. से किं तं णायाधम्मकहेत्यादि गुत्तं । एकूणवीसं णातज्झयणा, णाय त्ति-आहरणा, दिलुतियो वाणजति जेहऽत्थो ते णाता, एते पढममुतखंधे । अहिंसादिलक्खणस्स धम्मस्स कहा धम्मकहा, धम्मियाओ 10 वा कहाओ धम्मकहाओ, अक्खाणग त्ति वुत्तं भवति, एते वितियमुतखंधे । पढम-वितियमुतखंधे भणिताणं णाता-धम्मकहाणं णगरादिया भण्णंति । वितिये मुतक्खंधे दस धम्मकहाणं वग्गा । वग्गो ति-समूहो, तबिसेसणविसिहा दस अज्झयणा चेव ते दट्ठन्वा । एगृणवीसं णाता, दस य धम्मकहाओ । तत्थ णातेमु आदिमा दस णाता चेव, ण तेमु अक्वादियादिसंभवो । सेसा णव णाता, तेमु एकेके णाते चत्तालीसं चत्तालीसं अक्खा इयाओ भवंति, तत्थ वि एकेकाए अक्खाइयाए पंच पंच उवक्खाइयासताइं भवंति, तेमु वि एक्कक्काए उवक्खा15 इयाए पंच पंच अक्सा ओवक्रवाइयसताई भवंति, एवं एते णव कोडीओ। एताओ धम्मकहासु सोहेतब्ब त्तिकातं एकोणवीसाए णाताणं दसण्ह य धम्मकहाणं विसेसो कजति-दस णाता देस णव य धम्मकहातो दसहि परोप्परं मुद्धा । एवं विसेसे कते सेसा णव णाता, ते णव चत्तालीसाए गुणिता जाता तिण्णि सता सट्टा अक्खाइयाणं, एते अक्खाइयपंचसतेहिंतो सोधिता, तत्थ सेसं चत्तालं सतं, तं उवक्खाइयपंचसतेहिं गुणितं जाता उवक्खाइताणं सत्तर सहस्सा, ते पंचहि अक्खाइतोवक्खाइयसतेहिं गुणिता एवं जाता अछुट्टातो अक्खाइयकोडीतो । 'पदग्गेणं' ति 20 उवसग्गपदं णिवातपदं णामियपदं अक्रवातपदं मिस्सपदं च, एते पदे अहिकिच्च पंचल जे० २१८ प्र० कख छावत्तरि च सहस्सा पदग्गेणं भवंति, अहवा सुत्तालावयपदग्गेण संखेज्जाई पदसहस्साई भवंति । अहवा छाहत्तराहियसहस्सपंचलक्खा वि संखेज्जपदसहस्सेहिं ण विरुज्झंति । सेसं कंठं । से तं णाताधम्मकहाओ ६॥ ९१. से किं तं उवासगदसाओ ? उवासगदसासु णं समणोवासगाणं णगराइं उज्जाणाई चेइयाई वैणसंडाइं समोसरणाइं रायाणो अम्मा-पियरो धम्मकहाओ धम्मायरिया 25 इहलोग-परलोइया रिद्धिविसेसा भोगपरिचार्यों परियागा सुयपरिग्गहा तवोवहाणाई सीलबय-गुण-वेरमण-पच्चक्खाण-पोसहोववासपडिवज्जणया पडिमाओ उवसग्गा संलेहणाओ १ डे. मो. मु. विनाऽन्यत्र-सिलोगा, संखेजाओ संगहणीओ। से णं खं० सं० ल० शु० । सिलोगा, संखेजाओ निज्जत्तीओ, संखेजाओ पडिवत्तीओ। से णं जे० ॥२ वीसं अज्झयणा खं० जे० डे० ल० मो० शु० समवायाङ्ग च । चूर्णिकृता मलयगिरिणा च मूले स्वीकृत एव पाठो व्याख्यातोऽस्ति ॥ ३-४ पगूणतीसं ल० ॥ ५संखेजा पयसहस्सा, जे. मो० ॥६ पयसयसह समवाया) ॥७ 'वणया खं० सं० ल• शु० ॥ ८ जंति खं० सं० डे० शु० ल० ॥९ दस य धम्म जे. ॥१० चेतियातिं शु०॥ ११ वणसंडाई खं० सं० शु० नास्ति ॥१२ "पियरोधम्मायरिया धम्मकहाओ जे० मो. मु.॥ १३ इहलोइय-परलोइया इढिवि जे. मो. मु० ॥ १४ या पध्वजाओ परि' जे० डे. ल. शु० ॥ Jain Education Intemational Page #102 -------------------------------------------------------------------------- ________________ उवासगदसामओ अंतगडदसाओ य] सिरिदेववायगविरइयं णंदीसुत्तं । ६७ भत्तपञ्चक्खाणाई पाओवगमणाई देवलोगगमणाई सुकुलपञ्चायाईओ पुणबोहिलाभा अंतकिरियाओ य आघविज्जति । उवासगदमासु णं परित्ता वायणा, संखेज्जा अणुयोगदारा, संखेज्जा वेढा, संखेज्जा सिलोगा, संखेज्जाओ णिज्जुत्तीओ, संखेज्जाओ संगहणीओ, संखेज्जाओ पडिवत्तीओ। से णं अंगठ्ठयाए मत्तमे अंगे, एगे सुयक्खंधे, दस अज्झयणा, दस उद्देसणकाला, दस समुद्देसणकाला, संखेज्जाइं पदसहस्साइं पयग्गेणं । संखेज्जा 5 अक्खरा, अणंता गमा, अणंता पज्जवा, परित्ता तमा, अणंता थावरा, सासय-कड-णिबद्धणिकाइया जिणपण्णत्ता भावा आघविज्जंति पण्णविज्जंति परूविज्जंति दंसिज्जंति णिदंसिज्जति उवदंसिज्जंति । से एवंआया, एवं णाया, एवं विण्णाया, एवं चरण-करणपख्वंणा आधविज्जति । से तं उवासगदसाओ ७।। ९१. से किं तं उवासगदसातो इत्यादि सुत्तं । उवासक ति-सावता । तेसिं अणुव्वत-गुण-सीलव्यतोव- 10 देसणा दसमु अज्झयणेसु अक्खात त्ति उवासगदसा भगिता। तामु सुत्तपदग्गं एकारस लावा बावण्णं च सहस्सा पदग्गेणं । सुत्तालावयपदेहिं संखेजाणि वा पदसहस्साई पदग्गेणं । सेसं कंठं । से तं उवासगदसाओ ७ ॥ ९२. से किं तं अंतगडदसाओ ? अंतगडदसासु णं अंतगडाणं णगराइं उज्जाणाइं चेतियाई वणमंडाइं समोसरणाइं रायाणो अम्मा-पियंरो धम्मकहाओ धम्मायरिया इहेलोग-परलोगिया रिद्धिविसेसा भोगपरिचागा पैवज्जाओ परियागा सुतपरिग्गहा तवोवहाणाइं संलेहणाओ 15 भत्तपच्चक्खाणाइं पाओवगमणाई - देवलोगगमणाई सुकुलपञ्चायाईओ, पुणवोहिलामा अंतकिरियाओ य आघविजंति । अंतगडदेसासु णं परित्ता वायणा, संखेज्जा अणुयोगदारा, संखेज्जा वेढा, संखेज्जा सिलोगा, संखेज्जाओ णिज्जुत्तीओ, संखेज्जाओ संगहणीओ, संखेज्जाओ पडिवत्तीओ। से णं अंगठ्ठयाए अट्ठमे अंगे, एंगे सुयक्खंधे, अट्ठ १ संखेजाओ संगहणीओ जे. मो० नास्ति ॥ २ संखेजाओ पडिवत्तीओ खं० डे. ल. शु० नास्ति ॥ ३ संखेजा पदसहस्सा जे० मो० मु०॥ ४ पदसयसहस्साइं समवायाङ्ग ॥ ५ वणया ल०॥६ जति खं० सं० डे० ल०॥ ७ अक्खाइज्जति त्ति आ० दा० ॥ ८ वणसंडाई इति खं० सं० डे० ल० शु० नास्ति ॥ ९ पियरो धम्मायरिया धम्मकहाओ जे. ल. मो. मु.॥ १० लोइय-पारलोइया इढिवि मो० । लोइय-परलोइया इड्ढिविजे० मु० ॥११ भोगपरिभोगा खं० ल• शु०॥ १२ पवजा परियागा सुत खं० । पव्वज्जा सुत ल०॥ १३ →-एतचिह्नमध्यवर्ती पाठः मो० मु. नास्ति ॥ १४ दसाणं जे० सं० ॥ १५ संखेज्जाओ संगहणीओ इति जे. मो. मु. नास्ति ॥ १६ संखेज्जाओ पडिवत्तीओ इति खं० सं० ल• शु० नास्ति ॥ १७ पगे सुयक्खंधे, दस अज्झयणा, सत्त वग्गा, दस उद्देसणकाला, दस समुद्देसणकाला, संखेज्जाई पदसितसहस्साई पयग्गण समवायाङ्गसूत्रे पाठः । अत्राभयदेवीया टोका ___ "नवरं 'दस अज्झयण' त्ति प्रथमवर्गापेक्षयैव घटन्ते, नन्द्यां तथैव व्याख्यातत्वात् । यच्चह पठ्यते 'सत्त वग्ग' त्ति तत् प्रथमवर्गादन्यवर्गापेक्षया, यतोऽत्र सर्वेऽप्यष्ट वर्गाः, नन्द्यामपि तथापठितत्वात् । तवृत्तिश्चयम् –'अट्ठ वग्य' त्ति अत्र वर्गः समूहः, स चान्तकृतानामध्यरनानां वा । सर्वाणि चकवर्गगतानि युगपदुद्दिश्यन्ते ततो भणितं 'अट्ठ उद्दसणकाला' इत्यादि " । इह च दश उद्देशनकाला अभिधीयन्ते इति नास्याभिप्रायमवगच्छामः। तथा संख्यातानि पदशतसहस्राणि पदाणेति, तानि च किल त्रयोविंशतिलक्षाणि चत्वारि च सहस्राणीति ।" १२१-२ पत्रे ॥ Jain Education Intemational Page #103 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ६८ जिणदासगणिमहत्तरविरझ्याप चुण्णीए संज्यं सु०.९३-९४ वग्गा, अट्ठ उद्देसणकाला, अट्ठ समुद्देसणकाला, संखेज्जाइं पयसहस्साई पदग्गेणं, संखेज्जा अक्खरा, अणंता गमा, अणंता पज्जवा, परित्ता तसा, अणंता थावरा, सासत-कड-णिबद्धणिकाइया जिणपण्णता भावा आघविज्जंति पण्णविज्जंति परूविज्जंति दंसिज्जंति णिदंसिज्जति उवदंसिज्जंति । से एवंआया, एवं णाया, एवं विण्णाया, एवं चरण-करणपरूवणा 5 आघविज्जति । से तं अंतगडदसाओ ८। ९२. से किं तं अंतगडदसातो इत्यादि मुत्तं । अंतकडदस नि-कम्मणो संसारस्स वा अंतो कडो जेहिं ते अंतकडा, ते य तित्थकरादी, दस ति-पढमवग्गे दस अज्झयण त्ति तस्सवखतो अंतकडदस त्ति । अहवा दस त्ति-अवस्था, तदंते जा अवस्था सा वणिजति त्ति अतो अंतकडदसा । सरीरा-ऽऽयुदसाण वा दसण्डं अंतकडो त्ति अंतकडदसा । णवरं 'अंतकडकिरियाओ' त्ति अस्य व्याख्या-अंतकडाणं किरिया अंतकडकिरिया, वहणं ता 10 अंतकडकिरियाओ त्ति भणिता । किरिय नि-क्रिया, चर्या इत्यर्थः । अहवा किरिय त्ति-कर्मक्षपणक्रिया, सा य सेलेसिअवत्थाए । अहवा किरिय त्ति-सहुमकिरियज्झाणं । अहवा घातिकम्मेसु अंतकडेमु किरिय त्ति-कम्मबंधो, सो य इरियावहितो त्ति भणितं होति । एतं च आघविज्जति । वग्गो त्ति-समूहो, सो य अंतकडाणं अज्झयणाण वा । सव्वे अज्झयया जुगवं उदिसंति । तामु मुत्तपदग्गं तेवीसं लक्खा चतुरो य सहस्सा पदग्गेणं । संखेजाणि वा पदसहम्साणि सुत्तालावगपदग्गेणं । सेसं कंठं । से तं अंतगडदसा ८ ॥ 15 ९३. से किं तं अणुत्तरोववाइयदसाओ ? अणुत्तरोववाइयदसासु णं अणुत्तरोववाइयाणं णगराइं उज्जाणाई चेइयाइं व॑णसंडाइं समोसरणाइं रायाणो अम्मा-पियरो धम्मकहाओ धम्मा. यरिया इहलोग-परलोगिया रिद्धिविसेसा भोगपरिचागा पव्वज्जपरियागा सुतपरिग्गहा तवोवहाणाई पडिमाओ उवसग्गा संलेहणाओ भत्तपञ्चक्खाणाइं पाओवगमणाई अणुत्तरोववाइयत्ते उदवत्ती सुकुलपञ्चायादीओ पुणवोहिलाभा अंतकिरियाओ य आघविज्जंति । 20 अणुत्तरोववाइयदसासु णं परित्ता वायणा, संखेज्जा अणुयोगदारा, संखेज्जा वेढा, संखेज्जा सिलोगा, संखेज्जाओ णिज्जुत्तीओ, संखेज्जाओ संगहणीओ, संखेज्जाओ पडिवत्तीओ। से णं अंगठ्ठयाए णवमे अंगे, एंगे सुयक्वंधे, तिण्णि वग्गा, तिण्णि उद्देसणकाला, तिण्णि समुद्देसणकाला, संखेज्जाइं पयसहस्साई पयग्गेणं, संखेज्जा अक्खरा, अणंता गमा, अणंता पज्जवा, परित्ता तसा, अणंता थावरा, सासय-कड-णिबद्ध-णिकाइया जिणपण्णत्ता भावा १वणया खं० ल० ॥ २ 'विज्जति सं० सं० डे० ल• शु०॥ ३ तत्साक्ष्यत इत्यर्थः ॥ ४ वणसंडाई इति मो. मु. एव वत्तते ॥ ५ धम्मायरिया धम्मकहाओ मो. मु० ॥ ६ लोइय-परलोइया जे० मो• मु० ॥ ७ अणुत्तरोववत्ती शु० । अणुत्तरोववाय त्ति खं० सं० ॥ ८ दसाणं सं० जे० मो० ॥ ९ वाइणा ल०॥ १० संखेज्जाओ णिज्जुत्तीओ इति ल. नास्ति ॥ ११ संखेजाओ संगहणीओ जे० मो० नास्ति ॥ १२ संखेज्जामओ पडिवत्तीओ खं० सं० ल० शु० नास्ति ॥ १३ पगे सुयखंधे, इस अज्झयणा, तिण्णि वग्गा, दस उद्देसणकाला, दस समुद्देसणकाला, संखेज्जाई पयसयसहस्साई पयग्गेणं प० इति समवाया)। अत्राभयदेवपादाः-"इह अध्ययनसमूहो वगः, वर्गे दशाध्ययनानि, वर्गश्च युगपदेवोद्दिश्यते इत्यतस्त्रय एवोद्देशनकाला भवन्ति, एवमेव च नन्दावभिधीयन्ते, इह तु दृश्यन्ते दशेति, अत्राभिप्रायो न ज्ञायत इति ।" १२३-२ पत्र ॥ Jain Education Interational Page #104 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अगुत्तरोववाइयदसाओ पण्हावागरणाइंच ] सिरिदेववायगविरइयं गंदीसुत्तं । आघविज्जति पण्णविज्जंति परूविज्जंति देसिज्जंति णिदंसिज्जति उवदंसिज्जंति । से एवंआया, एवं णाया, एवं विण्णाया, एवं चरण-करणपरूवेणा आघविज्जइ । से तं अणुत्तरोववाइयदमाओ९। २३. से किं तं अणुत्तरोववातियदसा इत्यादि मुत्तं । णत्थि जम्मुत्तरं सो अणुत्तरो, उबवजणमुत्रवातो उप्पत्तीत्यर्थः, अणुत्तरो उववाता जस्स सो अणुत्तरांववाइओ, तेसिं बहुवयणातो [जे० २१८ द्वि०] अणुत्तरोव- 5 वाइय त्ति, वग्गे वग्गे य दसऽज्झयण त्ति अतो अणुत्तरांस्वातियदसा भणिता। संसारे मुभभावं पड़च्च अणुत्तरः, अहवा गतिचतुकं पइच अणुत्तरः, अहवा देवगतीए चेत्र अणुत्तरः । अणुत्तरदेवेमु जेसिं उबवातो तेसि णगरादिया कहि जंति । इह वग्गो ति-समूहो, सो य अज्झयणाणं, बग्गे वग्गे दस अध्ययना इत्यर्थः । तेसिं पदग्गं छातालीसं लक्खा अट्ठ य सहस्सा, संखेजाणि वा पदसहरसाणि । सेसं कंठं । से तं अणुत्तरोववाइयदसा ९॥ __९४. से किं तं पण्हावागरणाई ? पण्हावागरणेसु णं अठुत्तरं पसिणसयं, अछुत्तरं 10 अपसिणसयं, अछुत्तरं पसिणा-पसिणसंयं, अण्णे वि विविधा दिव्वा विज्जातिसया नाग-सुवण्णेहि य माद्धं दिव्या संवाया आघविज्जति । पण्हावागरणाणं परित्ता वायणा, संखेज्जा अणुओगदारा, संखेज्जा वेढा, संखेज्जा सिलोगा, संखेज्जाओ णिज्जुतीओ, संखेज्जाओ संगहणीओ, संखेज्जाओ पडिवत्तीओ । से णं अंगठ्ठयाए दसमे अंगे, एगे सुयक्खंधे, पणयालीसं अज्झयणा, पणयालीसं उद्देसणकाला, पणयालीसं समुद्देसण- 15 काला, संखेज्जाइं पदसहस्साई पदग्गेणं, संखेज्जा अक्खरा, अगंता गमा, अणंता पज्जवा, परित्ता तसा, अणंता थावरा, सासत-कड-णिबद्ध-णिकाइया जिणपण्णत्ता भावा आघविज्जति पण्णविज्जति परूविज्जति दंसिज्जंति णिदंसिज्जति उवदंसिज्जति । से एवंआया, एवं णाया, एवं विण्णाया, एवं चरण-करणपरूवणा आघविज्जइ । से तं पण्हावागरणाई १०। १४. से किं तं पाहावागरणाइं इत्यादि मुत्तं । पम्हो त्ति-पुच्छा, पडिययणं वागरणं, प्रत्युत्तर- 20 मित्यर्थः । तम्हि पाहावागरणे अंगे पंचासवदाराइदा व्याख्येयाः परप्पयादिणो य । शुष्ट-वाहुपसिणादियाणं च पसिणाणं अलुत्तरं सतं । किंच-जे विज्ज-मंता विधीए जविजमाणा अच्छिता चेव मुभाउभं कहयंति तारिसाणं अपसिणाणं अटुत्तरं सतं । अंगुट्ठादिपसिणभावं अपलिणभावं च वाकरति तारिसागं पसिणा-ऽपसिगविजाणं अठ्ठत्तरं सतं । अहवा अणंतरा जे कहेंति ते पसिणा, परंपरे पसिणापसिणा, तं पुण विज्जाकहितं कहेंतस्स परंपरं १'वणया ल. ॥ २ 'विज्जति ख० सं० डे. ल. शु० ॥ ३ सयं, तं जहा-अंगुहपसिणाई बाहुपसिणाई अदागपसिणाई, अण्णे वि जे. हे. ल. मो. मु. । नाय पाठश्चर्णि-वृत्तिकृद्भिगृहीतो व्याख्यातो वा विद्यते ॥ ४ वि विचित्ता दिव्वा सर्वामु सूत्रप्रतिषु । हारि० वृत्ती एप एव पाठो व्याख्यातोऽस्ति । मलयगिरिपादाः पुनः चूर्णिकारमनुसृताः सन्ति ॥ ५ दिव्या शु० सं० एव वर्तते ॥ ६ दिव्या संधाणा संघणंति इति चूर्णिकृनिर्दिष्टः पाठभेदः, दिव्याः सन्धानाः सन्धनन्ति इत्यर्थः ॥ ७ संखेज्जाओ संगहणोओ इति जे० मो० नास्ति ॥ ८ संखेज्जाओ पडिवत्तीओ खं० सं० ल• शु० समवायाङ्ग च नास्ति ॥ ९ 'विज्जति खं० सं० डे० ल• शु० ॥ Page #105 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जिणदासगणिमहत्तरविरइयाए चुण्णीए संजुयं [ सु० ९५-१०१ भवति । अण्णे य विविधा विजातिसता कहिज्जति । किंच णागा मुवण्णा अण्णे य भवणवासिणो ते विज-मंतागरिसिता आगता साहुणा सह संवदंति-जल्पं करेंति । पाढंतरं वा "दिव्या संधाणा संधणंति" तदुन्मुखा भवंति, वरदाश्च गर्जितादि वा कुर्वति । दसममंगस्स पदग्गं वागउतिं लकवा सोलस य सहस्सा पदग्गेणं, संखेजाणि वा पदसहस्साणि । सेसं कंठं । से तं पण्हावागरणाई १० ।। 5 ९५. से किं तं विवागसुतं ? विवागसुते णं सुकड-दुक्कडाणं कम्माणं फल-विवागा आघविज्जति । तत्थ णं दस दुहविवागा, दस सुहविवागा। से कि तं दुहविवागा ? दुहविवागेसु णं दुहविवागाणं णगराइं उज्जाणाई वणसंडाई चेइयाई समोसरणाइं रायाणो अम्मा-पियरो धम्मकहाओ धम्मायरिया ईहलोइय-परलोइया 'रिद्धिविसेसा निरयगमणाई दुहपरंपगओ संसारभवपवंचा दुकुलपञ्चायाईओ दुलहबोहियत्तं 10 आघविज्जति । से तं दुहविवागा। से किं तं सुहविवागा ? सुहविवागेसु णं सुहविवागाणं णगराइं उज्जाणाई वणसंडाई चेइयाइं समोसरणाई रायाणो अम्मा-पियरो धमकहाओ धम्मायरिया इहलोइअ-परलोइया रिद्धिविसेमा भोगपरिचागा पव्वजाओ परियागा सुतपरिग्गहा तवोवहाणाई संलेहणाओ भत्तपञ्चक्खाणाइं पाओवगमणाई देवलोगगमणाई सुहपरंपराओ सुकुलपञ्चायादीओ पुणवो15 हिलाभा अंतकिरियाओ य आघविज्जति । विवागसुते णं परित्ता वायणा, संखेज्जा अणुयोगदारा, संखेज्जा वेढा, संखेज्जा मिलोगा, संखेज्जाओ णिज्जुत्तीओ, संखेज्जाओ संगहणीओ, संखेज्जाओ पडिवत्तीओ। से णं अंगठ्ठयाए एकारसमे अंगे, दो सुयक्वंधा, वीसं अज्झयणा, वीसं उद्देसणकाला, वीस समुद्देसणकाला, संखेज्जाइं पदसहस्साई पदग्गेणं, संखेज्जा अक्खरा, अणंता गमा, अणंता 20 पज्जवा, परित्ता तसा, अणंता थावरा, सासय-कड-णिवद्ध-णिकाइया जिणपण्णत्ता भावा आघविज्जति पण्णविज्जंति परूविज्जति दंसिज्जंति णिदंसिज्जति उवदंसिज्जंति । से एवंआया, एवं णाया, एवं विण्णाया, एवं चरण-करणपरूवणा आघविज्जति । से तं विवागसुतं ११ । १५. से किं तं विवागसुतं इत्यादि । विविधो पाकः विपचनं वा विपाकः, कर्मणां मुभममुभो वा १ विवागे आधविज्जइ जे० मो० मु० ॥ २ से किं तं दुहविवागा इति खं० शु० नास्ति । समवाया” प्रश्नवाक्यं वत्तते ॥ ३ धम्मायरिया धम्मकहाओ सं० जे० डे. ल. मो. मु० ॥ ४ इहलोग-परलोगिया सं० ॥ ५ इढि मो० मु० ॥६गमणं ख० ॥ ७ भवपलंधा सं० ल० समवायाङ्गे च ।। ८ से तं दुविवागा। से किं तं सुहविवागा? इति खं० शु० नास्ति । समवायादेब वर्तते ॥ ९ धम्मायरिया धम्मकहाओ खं० डे० ॥ १० इहलोग-पारलोगिया इविविसेसा जे. मो. मु. ॥१: ज्जा परि खं० ॥ १२ विवागसुयस्त णं जे० मो० मु० । विवागेसु णं शु० ॥ १३ पदसतसह समवाया ॥ १४ 'विज्जति खे० सं० डे. ल. शु० ॥ Jain Education Intemational Page #106 -------------------------------------------------------------------------- ________________ विवागसुयं दिट्ठिवाओ य परिकम्मे सुत्ताई च ] सिरिदेववायगविरइयं गंदीसुत्तं । जम्मि सुत्ते विपाको कहिज्जति तं विपाकसुतं । विपाकसुतस्स मुत्तपदग्गं एगा पदकोडी चुलसीतिं च लक्खा बत्तीसं च सहस्सा पदग्गेणं, संखेज्जाणि वा पदसहस्साइं पदग्गेणं [जे० २१९ प्र०] । सेसं कंठं । से तं विवागसुतं ११॥ ९६. से किं तं दिट्ठिवाए ? दिट्ठिवाए णं सब्वभावपरूवणा आघविज्जति । से समा. सओ पंचविहे पण्णत्ते, तं जहा-परिकम्मे १ मुत्ताइं २ पुवगए ३ अणुओगे ४ चूलिया ५। 5 १६. से किं तं दिट्टिवाते त्ति । दृष्टिदर्शनम् , वदनं वादः, दृष्टीनां वादो दृष्टिवादः, तत्र वा दृष्टीनां पातः दृष्टिपातः, सभेदभिण्णाओ सव्वणतदिट्ठीओ तत्थ वदंति पतंति व त्ति अतो दिडिवातो । सो य पंचभेदोपरिकम्मादि ॥ _९७. से किं तं परिकम्मे ? परिकम्मे सत्तविहे पण्णत्ते, तं जहा-सिद्धसेणियापरिकम्मे १ मणुस्ससेणियापरिकम्मे २ पुट्ठसेणियापरिकम्मे ३ ओगाढसेणियापरिकम्मे ४ उपसंपज्जण- 10 सेणियापरिकम्मे ५ विप्पंजहणसेणियापरिकम्मे ६ चुतअचुतसेणियापरिकम्मे ७। ___ ९८. से किं तं सिद्धसेणियापरिकम्मे ? सिद्धसेणियापरिकम्मे चोदसविहे पण्णत्ते, तं जहा-माउगापयाइं १ एगट्ठियपयाइं २ अट्ठापयाई ३ पाढो ४ आमासपयाइं ५ केउभूयं ६ रासिबद्धं ७ एगगुणं ८ दुगुणं ९ तिगुणं १० केउभूयपडिग्गहो ११ संसारपंडिग्गहो १२ नंदावत्तं १३ सिद्धावत्तं १४ । से तं सिद्धसेणियापरिकम्मे १ । ___ ९९. से किं तं मणुस्ससेणियापरिकम्मे ? मणुस्ससेणियापरिकम्मे चोदसविहे पण्णत्ते, तं जहा-माउगापयाइं १ एगट्ठियपयाई २ अट्ठापयाइं ३ पाढो ४ आमासपयाइं ५ केउभूयं ६ रासिबद्धं ७ एगगुणं ८ दुगुणं ९ तिगुणं १० केउभूयपडिग्गहो ११ संसारपेंडिग्गहो १२ गंदावत्तं १३ मणुस्सावत्तं १४ । से तं मणुस्ससेणियापरिकम्मे २। ____ १००. से किं तं पुट्ठसेणियापरिकम्मे ? पुट्ठसेणियापरिकम्मे एकारसविहे पण्णत्ते, तं 20 जहा-पाढो १ आमासपैयाइं २ केउभूयं ३ रासिबद्धं ४ एगगुणं ५ दुगुणं ६ तिगुणं ७ केउभूयपडिग्गहो ८ संसारपंडिग्गहो ९ णंदावत्तं १० पुट्ठावत्तं ११ । से तं पुट्ठसेणियापरिकम्मे ३। १०१. से किं तं ओगाढसेणियापरिकम्मे ? ओगाढसेणियापरिकम्मे एक्कारसविहे १ विज्जति ख० सं० डे. ल. ॥ २ परिकम्म जे० मो० मु. विना ॥ ३ सुयाई ख० ॥ ४ ओगाहणसे समवाया ॥ ५ विजहणसे खं० सं० ल• शु० । विप्पजहसे समवायाङ्ग ॥ ६ चुयअचुयल• शु० । चुयाचुर्य डे० ॥ ७ अट्ठप सं० ॥ ८-९ परिग्गहो ल• ॥ १० सिद्धादढ सं० । सिद्धबद्धं समवाया ॥ ११ परिग्गहो जे० ॥ १२ स्सादी सं• । मणुस्सबद्धं समवाया ॥ १३ पयाई एवमादि। से तं पुट्ठ सं० सं० । पयाई २ इचाइ । से तं पुढे ल• ॥ १४ परिग्गहो जे.॥ 15 Jain Education Intemational Page #107 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जिणदासगणिमहत्तरविरइयाए चुण्णीए संजुयं । [ मु० १०२-६ पण्णत्ते, तं जहा-पाढो १ आमासपयाइं २ केभूयं ३ रासिवद्धं ४ एगगुणं ५ दुगुणं ६ तिगुणं ७ केउभूयपडिग्गहो ८ संसाग्पडिग्गहो ९ णंदावनं १० ओगाढावत्तं ११ । से तं ओगाढसेणियापरिकम्मे ४ । १०२. से किं तं उवसंपज्जणसेणियापरिकम्मे ? उवसंपज्जणसेणियापरिकम्मे एकार5 सविहे पण्णत्ते, तं जहा-पाटो १ आमासपयाइं २ केउभूयं ३ गसिवद्धं ४ एगगुणं ५ दुगुणं ६ तिगुणं ७ केउभूयपडिग्गहो ८ संसारपडिग्गहो ९ गंदावत्तं १० उवसंपज्जणावत् ११ । से तं उपमंपज्जणसेणियापरिकम्मे ५। । १०३. से किं तं विप्पंजहणसेणियापरिकम्मे ? विप्पंजहणसेणियापरिकम्मे एगारमविहे पण्णते, तं जहा-पाटो १ आमासपयाइं २ केउभूयं ३ गसिबद्धं ४ एगगुणं ५ दुगुणं ६ 10 तिगुणं ७ केउभूयपडिग्गहो ८ संसारपडिग्गहो ९ णंदावत्तं १० विप्पजहणावत्तं ११ । से तं विप्पजहणसेणियापरिकम्मे ६ । ___१०४. से किं तं चुयमचुयसेणियापरिकम्मे ? चुयमचुयसेणियापरिकम्मे एगारसविहे पण्णत्ते, तं जहा-पाढो १ आमासपयाइं २ केउभूयं ३ गसिबद्धं ४ एगगुणं ५ दुगुणं ६ तिगुणं ७ केउभूयपडिग्गहो ८ संसारपडिग्गहो ९ णंदावत्तं १० चुयमच्यावतं ११ । से तं 15 चुंयमच्यसेणियापरिकम्मे ७ । ९७-१०४. तत्थ परिकम्मे ति जोगकरणं, जहा गणितस्स सोलस परिकम्मा, तग्गहिनपुत्नत्थो मेसगणितम्स जोग्गो भवति । एवं गहितपरिकम्ममुत्तत्यो सेमयुत्तादिदिटिमातमुतस्स जोग्गो भवति । तं च परिकम्ममुतं सिद्धसेणियापरिकम्मादिमूलभेदयो सत्तविहं. उत्तरभेदतो तेसीतिविहं मानुयपदादी । तं च सव्यं समूलु त्तरभेदं मुत्तत्थतो वोच्छिण्णं, जहागतसंप्रदात वा वच्चं ॥ किंच20 १०५. [ इच्चेइयाइं सत्त परिकम्माई, छ मसमइयाई, सत्त आजीवियाई,] छ चउक्कणइयाई, सत्त तेरासियाई । से तं परिकम्मे १ । १०५. एतेसिं सत्ताह परिकम्मागं छ आदिमा परिकम्मा ससमइका, स्वसिद्धांतप्रज्ञापना एवेत्यर्थः । आजीविकापासंडत्था गोसालपत्तिता, तेरि सिद्धंतमतेण चुता-ऽचुतसहिता सत्त परिकम्मा पण्णविजंति । इदागि परिकम्मे णतचिंता-णेगमो दुविहो-संगहितो असंगहितो य, संगहितो संगई पविठो, असंगहितो बबहारं, तम्हा १ केभूयं ३ इच्चादि । से तं ओगाढ ख० सं० डे. ल. ॥२ परिग्गहो जे०॥ ३ पाढो १ इञ्चादि । से तं उव खं० सं० डे. ल. ॥ ४-५ चिजहण ख० सं० ल० शु० ॥ ६ पाढो १ इच्चादि । से तं विजण खं० सं० डे० ल० ॥ ७-८चुयभचुय जे. डे० ल० ॥ ९ पाढाइ । से तं चुय खं० सं० डे० ल० ॥ १०चुय अचुय डे० ल० । चुयाचुय जे० ॥ ११ एतत् चतुरस्रकोष्टकान्तति सूत्र सूत्रप्रतिपु न वत्तते । चूर्णि-वृत्तिद्भिः पुनराहतं दृश्यत इति समवायाङ्गसूत्रात् सूत्रांशोऽयमत्रोइतोऽस्ति ॥ १२ याई नइयाई। से तं सं० ॥ Jain Education Intemational Jain Education Intermational Page #108 -------------------------------------------------------------------------- ________________ दिद्रिवाओ परिकम्मे सुत्ताइं च ] सिरिदेववायगविरइयं णंदीमुत्तं । ७३ संगहो ववहारो रिजुमुतो सदाइया य एको, एवं चतुरो गया । एतेहिं चतुर्हि गएहिं छ ससमइकाई परिकम्माई चिंतिजति त्ति अतो भणितं-'छ चतुकणइयाई ति । ते चेव आजीविका तेरासिया भणिता । कम्हा ? उच्यतेजम्हा ते सर्व जगं त्र्यात्मकं इच्छंति, जहा-जीवो अजीवो जीवाजीवश्च, लोए अलोए लोयालोए, संते असंते संतासंते एवमादि । यचिंताए वि ते तिविहं णयमिच्छति.तं जहा-दवटितो पज्जवटितो उभयदितो. अतो [ जे० २१९ द्वि० ] भणियं-'सत्त तेरासियाई' ति सत्त परिकम्माई तेरासियपासंडत्या तिविधाए णयचिंताए । चिंतयंतीत्यर्थः १॥ १०६. से किं तं सुत्ताइं? सुत्ताई बावीसं पण्णत्ताई, तं जहा-उज्जुसुतं १ परिणयापरिणयं २ बहभंगियं ३ विजयचरियं ४ अणंतरं ५ परंपरं ६ मामाणं ७ संजहं ८ संभिण्णं ९ आयच्चायं १० सोवत्थिप्पण्णं ११ णंदावत्तं १२ बहुलं १३ पुट्ठापुढे १४ वेयावचं १५ एवंभूयं १६ भूयावत्तं १७ वत्तमाणुप्पयं १८ समभिरूढं १९ सव्वओभई २० पण्णासं २१ दुप्परिग्गहं २२ । 10 १ सुत्ताई बावीसाई पण्णत्ताई, तं जहा खं० सं० । सुत्ताई अट्ठासीति भवंतीति मक्खायाई, तं जहा सम० ॥ . २ द्वाविंशतिसूत्रनाम्नां नन्दिसूत्रप्रत्यन्तरेषु पाठभेदोऽधउल्लिखितकोष्ठकाद् ज्ञातव्यःखं० प्रतिः सं० प्रतिः जे० प्रतिः डे० प्रतिः ल० प्रतिः मो० प्रतिः शु० प्रतिः १ उज्जुसुतं २ परिणयापरिणय ३ बहुभंगियं बहुभंगीयं बहुभंगीयं ४पिवियश्चिय विज्झायव्वावियं विजयचरिय विजयविधत्तं विजयविधत्तं विजयचरिय वियच्चवियत्त तरं ६ परं ७ समाणं मासाणं समाणसं समाणसं सामाण समाएसं ८ सहं संजूहं संजूह जूह जूह संजूह ९ भिणं सभिण्णं सभिग १० आयच्चाई आयच्चायं आहच्चार्य आहव्वयं आहब्वयं आहव्वायं आहब्वायं ११ सावढिपत्तं सोवस्थिप्पणं सोमस्थिप्पन्न सोवस्थियवत्तं सोमच्छिप्पन्न सोवत्थिों घंटं सोवत्थिप्पन १२ गंदावतं मंदावतं १३ बहुलं १४ पुढापुढे पुच्छापुच्छं १५ वेयावञ्च वियावत्तं वियावत्तं बियावतं वियावत्तं १६ एवंभूयं १७ भूयावत दूयावत्तं यावत्तं दुयावत्त वत्तमाणय वत्तमाणप्पयं वत्तमाणुष्पत्तं वत्तमाणुप्पत्तं वत्तमाणपयं वत्तमा गुप्पत्तं १९ समभिरूढं २. सबओभई २१ पण्णासं २२ दुपरिग्गह दुष्पडिग्गहं दुप्पडिग्गह परिग्गहं दुष्पडिरगह अत्र शून्येन पाठमेदाभायो ज्ञातव्यः, न तु पाठाभाव इति ॥ मासाणं ... . . . . . . . . . . . . .... दुयावतं दुयावत्तं दुयात . Jain Education Interational i Page #109 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ७४ जिणदासगणिमहत्तरविरइयाए चुण्णीए संजुयं [सु० १०७ गा० ७७-७९ इंचेयाइं बावीसं सुत्ताई छिण्णच्छेयणइयाइं ससमयसुत्तपरिखाडीए सुत्ताइं १, इँच्चेयाई बावीसं सुत्ताई अच्छिण्णच्छेयणइयाई आजीवियसुत्तपरिवाडीए सुंताई २, इच्चेयाइं बावीसं सुत्ताइं तिगणइयाइं तेरासियसुत्तपरिवाडीए सुताइं ३, इच्चेयाइं बावीसं सुत्ताइं चउक्कणइयाई ससमयसुत्तपरिवाडीए सुताई ४, एवामेव सपुवावरेणं अट्ठासीति सुत्ताइं भवंतीति मक्खायं । 5 से तं सुत्ताई । १०६. 'मुत्ताई' ति उज्जुमुताइयाइं वावीस मुत्ताई । ताणि य मुत्ताइं सन्नदव्याण सन्नपज्जवाण सव्वणताण . सबभंगविकप्पाण य दंसगाणि, सव्वस्स य पुरगतमुतस्स अत्थस्स य सूयग त्ति, अतो ते सूयणत्तातो मुत्ता भणिता जहाभिधाणत्थाते। ते य इदाणिं सुत्त-ऽस्थतो वोच्छिण्णा, जहागतसंप्रदायतो वा बच्चा। ते चेव बावीसं मुत्ता विभागतो अट्ठासीति सुत्ता भवंति इमेण विधिणा-बावीस मुत्ता छिण्णच्छेदणताभिप्पायतो। कहं छिण्णच्छेदणतो त्ति भण्णति ? 10 उच्यते-जो णयो मुत्तं छिण्णं छेदेण इच्छति, जहा-"धम्मो मंगलमुक्कट" ति सिलोगो [दशवै. अ. १ गा. १] । एस सिलोगो मुत्त-ऽत्थतो पत्तेयं छेदेण ठितो, णो वितियादिसिलोगे अवेक्वइत्ति वुत्तं भवति । छिप्यो छेदो जस्स स भवति छिण्णच्छेदः, प्रत्येकं कल्पितपर्यतेत्यर्थः । एते एवं दावीसं ससमतमुत्तपरिवाडीए सुत्ता ठिता । एते चेत्र बावीस अच्छिण्णच्छेदणताभिप्पायतोआजीवियसुत्तपरिवाडीए ठिता।अच्छिण्णच्छेदणतो जहा-एसेव दुमपुफियपढमसिलोगो अस्थतो बितियाइसिलोगे अवेक्खमाणो, वितियादिया य पढमं अच्छिण्णच्छेदणताभिप्पाययो भवति । एवं पि वावीसं 15 सुत्ता अक्खररयणविभागट्ठिता वि अत्थयो अण्णोण्णमवेक्खमाणा अच्छिण्णच्छेदणयहित ति भण्णंति । णयचिंताए वि बादीसं चेव मुत्ता, 'तेरासियाणं तिकणइयाई' ति त्रिकनयाभिमायतो चिंत्यंतेत्यर्थः। तहा ससमये वि णयचिंताए बावीसं चेव मुत्ता चउक्कणइया । एवं चतुरो [ जे० २२० प्र० ] वावीसातो अट्ठासीति मुत्ता भवंति । से तं मुत्ताई २ ॥ १०७. से किं तं पुबगते ? पुव्वगते चोदसविहे पण्णत्ने, तं जहा-उप्पादपुब्बं १ 20 अग्गेणीयं २ वीरियं ३ अस्थिणत्थिप्पवातं ४ नाणप्पवातं ५ सञ्चप्पवादं ६ आयप्पवादं ७ कम्मप्पवादं ८ पञ्चक्खाणं ९ विजणुप्पवादं १० अझं ११ पाणायु १२ किरियाविसालं १३ लोगबिंदुसारं १४ । उप्पायस्स णं पुवस्स दस वत्थू चत्तारि चुल्लयवत्थू पण्णत्ता १। अंग्गेणीयस्स णं पुवस्स चोद्दस वत्थू दुवालस चेल्लबत्थू पण्णत्ता २ । वीरियस्स णं पुवस्स अट्ठ वत्थू अट्ठ चुल्लवत्थू पण्णता ३ । अत्थिणत्थिप्पवायस्स णं पुवस्स अट्ठारस १-३-५-७ इवेश्याई मो. मु. ॥२-४-६-८ सुत्ताई इति पदं खं० सं०. एव वर्तते. नान्यत्र, समपायाङ्गेऽपि नास्ति । ९ भवंति इञ्चमक्खायं ल. ॥ १० अग्गेणियं खं० ।। ११ खाणपवाद सं० सं० विना ।। १२ विजाणु जे० त० मो० मु०॥ १३ पाणाउं जे० । पाणाउ डे० ल. मो. शु० ॥ १४ अस्मिन् सूत्रे उप्पायस्स णं पुवस्स, अग्गेणीयस्स णं पुव्वस्स, पीरियस्स णं पुवस्स इत्यादिकेषु चतुर्दशस्वपि पूर्वनामस्थानेषु उप्पायपुवस्स णं, अग्गेणीयपुम्वस्त णं, वीरियपुव्वस्त णं इत्यादिः पाठभेदो मो• मु. दृश्यते ॥ १५ चूलवत्थू शु० । चूलियावत्थू जे० डे० मो. मु० ॥ १६ अग्गेणइयस्स डे० ल० ॥ १७ चूलवत्थू ल० शु० । चूलिभावत्थ् जे० डे० मो० मु० ॥ १८ चूलव शु० । चूलिभाव जे० डे. मो. मु० ॥ Jain Education Intemational Page #110 -------------------------------------------------------------------------- ________________ दिविवाओ पुब्वगयमुयं च ] सिरिदेवयायगविरइयं गंदीमुत्तं । वत्थू दस चुल्लवत्थू पण्णत्ता ४ । णाणप्पवादस्स णं पुबस्स बारस वत्थू पण्णत्ता ५। सच्चप्पवायस्स णं पुवस्स दोण्णि वत्थू पण्णत्ता ६ । आयप्पवायस्स णं पुवस्स सोलस वत्थू पण्णत्ता ७ । कम्मप्पवायस्स णं पुवस्स तीसं वत्थू पण्णता ८। पच्चक्खाणस्स णं पुवस्स वीसं वत्थू पण्णत्ता ९ । विज्जणुप्पवादस्म णं पुरस्म पणरस वत्थू पण्णत्ता १० । अवंझस्स णं पुव्वस्स बारस वत्थू पण्णत्ता ११ । पाणायस्स णं पुवस्स तेरस वत्थू पण्णत्ता १२ । 5 किरियाविसालस्स णं पुवस्स तीसं वत्थू पण्णत्ता १३ । लोगबिंदुसारस्स णं पुवस्स पणुवीसं वत्थू पण्णत्ता १४ । दस १ चोदस २ अट्ठ ३ ऽट्ठारसेव ४ बारस ५ दुवे ६ य वत्धणि । सोलस ७ तीसा ८ वीसा ९, पण्णरस १० अणुप्पवायम्मि ॥ ७७॥ बारस एक्कारसमे ११, बारसमे तेरसेव वत्थूणि १२ । 10 तीसा पुण तेरसमे १३, चोदसमे पण्णवीसा उ १४ ॥ ७८॥ चत्तारि १ दुवालस २ अट्ठ ३ चेव दस ४ चेव चुल्लवत्थूणि। आइल्लाण चउण्हं, सेसाणं चुल्लया णत्थि ॥ ७९ ॥ से तं पुबगते ३॥ १०७. से किंतं पुव्वगतं ? ति, उच्यते-जम्हा तित्थकरो तित्थपवत्तणकाले गणधराण सव्वसुताधारत्तणतो 15 पुव्वं पुवगतमुतत्थं भासति तम्हा पुन्च त्ति भणिता, गणधरा पुण मुत्तरयणं करेन्ता आयाराइकमेण रयंति ट्ठवेति य । अण्णायरियमतेषं पुण पुन्चगतमुत्तत्थो पुव्वं अरहता भासितो, गणहरेहि वि पुचगतसुतं चेव पुव्वं रइतं पछा आयाराइ । एवमुक्ते चोदक आह-णणु पुवावरविरुद्धं, कम्हा ? जम्हा आयानिजुत्तीए भणितं-"सव्वेसिं आयारो०"गाहा आचाराङ्गनि. गा. ८ |आचार्याऽऽह-सत्यमुक्तम् , किंतु साठवणा, इमं पुण अक्खररयण पडुच्च भणितं, पुव्वं पुन्ना कता इत्यर्थः। ते य उप्पायपुवादिया चोदस पुब्बा पण्णत्ता । पढम उप्पायपुव्वं ति, तत्थ सव्वदव्वाणं 20 पजवाग य उप्पायभावसंगीकाउं पण्णवणा कता, तस्स पदपरिमाणं एका पदकोडी १ । वितियं अग्गेणीयं, तत्थ वि सम्बदन्वाण पजवाण य सव्यजीवविसेसाण य अग्गं-परिमाणं वणिजइ त्ति अग्गेणीतं, तस्स पदपरिमाणं छण्णउतिं पदसतसहस्सा २ । ततियं वीरियप्पवायं, तत्थ वि अजीवाणं जीवाण य सकम्भेतराण वीरियं प्रवदति त्ति वीरियप्पवादं, तस्स वि सत्तरि पदसतसहस्सा ३ । चउत्थं अथिणत्थिप्पवादं, ज लोये जहा अस्थि जहा वा णत्थि, अहवा सितवादाभिप्पादतो नदेवास्ति नास्तीत्येवं प्रदतीति अस्थिपत्थिप्पवादं भणितं, तं पि पदपरि- 25 माणतो सहि पदसतसहस्साणि ४ । पंचमं णाणप्पवादं ति, तम्मि मतिणाणाइपंचकस्स समभेदं प्रख्वणा जम्हा कता तम्हा णाणप्पा, ताम्म पदपारमा एका पकोडी एगपणा ५ । छठं सचप्पवादं, सच्च-संजमो सब । चूरवधू । दूलियावत्थू जे० डे. मो. मु. ॥ २ विज्ञाणु जे. ल. मु. ॥ ३ पाणायुस्स सं० । पाणाउस्स जे. डे. ल. मो० मु० ॥ ४ चूलव मो० शु० सम० ।। ५ चूलिया सं० विना ॥ ६ स्याद्वादाभिप्रायतः ।। Jain Education Intemational Page #111 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ७६ जिणदासगगिमहत्तरविरइयाए चुण्णीए संजुयं [सु० ०० - १० वयणं वा, तं सच्चं जत्थ सभेदं सपडिवक्खं च वणिजति तं सच्चप्पवादं, तस्स पदपरिमाणं एगा पदकोडी छप्पदाधिया ६ । सत्तमं आयप्पवातं, आय त्ति-आत्मा, [जे० २२० द्वि० ] सो णेगहा जत्थ णयदरिसणेहिं वण्णिज्जति तं आयप्पवादं, तस्स वि पदपरिमाणं छब्बीसं पदकोडीओ ७ । अट्ठमं कम्मप्पवादं, णाणावरणाइयं अट्ठविधं कम्मं पगति-हिति-अणुभाग-प्पदेसादिएहिं भेदेहिं अग्णेहि य उत्तरुत्तरभेदेहि जत्थ वणिज्जति तं कम्मप्प5 वादं, तस्स वि पदपरिमाणं एगा पदकोडी असीति च पदसहस्साणि भवंति ८। णवमं पञ्चक्खाणं, तम्मि सबपञ्चक्खाणसरुवं वणिजति ति अतो पच्चक्खाणप्पवादं, "तस्स य पदपरिमाणं चतुरासीति पदसतसहस्साणि भवंति ९ । दसमं विजणुप्पवातं, तत्थ य अणेगे विजातिसया वण्णिता, तस्स पदपरिमाणं एगा पदकोडी दस य पदसतसहस्त्राणि १० । एगादसमं अवंझं ति, वंझं णाम-णिप्फलं, ण वंझमवंझं, सफलेत्यर्थः, सव्वे णाण-तव-संजमजोगा सफला वणिजंति, अप्पसत्था य पमाहादिया सब्वे अमुभफला वण्णिता, अतो अवंझं, 10 तस्स वि पदपरिमाणंछ व्वीसं पदकोडीओ ११। वारसमं पाणायं, तत्थ आय-पाणविधाणं सव्वं सभेदं 3 पाणा वण्णिता, तस्स पदपरिमाणं एगा पदकोडी छप्पण्णं च पदसतसहस्सा १२। तेरसमं किरियाविसालं, तत्थ कायकिरियादियाओ विसाल त्ति-सभेदा, संजमकिरियाओ ये छंदकिरियविहाणा य, तस्स वि पदपरिमाणं णव कोडीयो १३ । चोदसमं लोगबिंदुसारं, तं च इमम्मि लोए सुतलोए वा बिंदुमिव अक्वरस्स [सारं-] सव्वुत्तमं सन्चकवरसण्णिवातपढितत्तणतो लोगविंदुसारं, तस्स पदपरिमाणं अड्ढतेरस पदकोडीओ १४ । ३॥ 15 इदाणिं अणिओगो ति १०८. से किं तं अणुओगे ? अणुओगे दुविहे पण्णत्ते, तं जहा-मूलपढमाणुआगे य गंडियाणुओगे य। १०८. अनुयोग इत्येतद् अनुरूपो योगः अनुयोग इति । एवं सर्व एव सूत्रार्थों वाच्यः । इह जन्म-भवपर्याय-शिष्यादियोगविवक्षातोऽनुयोगो वाच्यः । स च द्विविधः-मूलपढमाणुयोगो गंडिकाविशिष्टश्च ।। तत्थ20 १०९. से किं तं मूलपढमाणुओगे ? मूलपढमाणुओगे णं अरहंताणं भगवंताणं पुन्व भवा देवलोगगमणाई आउंचवणाइं जम्मणाणि य अभिसेया रायवरसिरीओ पबज्जाओ, तवा य उग्गा, केवलनाणुप्पयाओ तित्थपवत्तणाणि य सीसा गणा गणधरा य अज्जा य पवत्तिणीओ य, संघस्स चउव्विहस्स जं च परिमाणं, जिण-मणपज्जव-ओहिणाणि-समत्तसुय णाणिणो य वादी य अणुत्तरगती य उत्तरवेउब्विणो य मुणिणो जत्तिया, जत्तिया सिद्धा, 25 सिद्धिपहो जह य देसिओ, जच्चिरं च कालं पादोवगओ, जो जहिं जत्तियाई भत्ताइं छेयइत्ता अंतगडो मुणिवरुत्तमो तमरओघविप्पमुक्को मुक्खसुहमणुत्तरं च पत्तो, एते अन्ने य एवमादी भावा मूलपढमाणुओगे कहिया । से तं मूलपढमाणुओगे।। १ छत्तीसं जे० ॥ २ य बंधकिरिय जे० विना ॥ ३ देवगम डे० ल• शु० मो० मु० ॥ ४ आयं खं० ॥ ५ उत्तरवेउविणा य मुणिणो इति सं० सम० नास्ति ।। ६ छेइत्ता जे० डे. ल. मो० मु० ॥ ७ रयुध सं० ॥८'सुहंब अणुत्तरं पत्तो सं० ल० ॥ ९ पचमन्ने जे० मु० ॥ Jain Education Intemational Jain Education Intermational Page #112 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अणुओगसुयं मूलपढमाणुओगो गंडियाणुओगो य ] सिरिदेववायगविरइयं णंदीमुत्तं । १०९. 'मूलपढमाणुयोगो' त्ति, इह मूलभावस्तु-तीर्थकरः, तस्य प्रथम-पूर्वभवादि, अहवा [जे० २२१ प्र० ] मूल एव प्रथमः मूलपहमाणुयोगो । एत्थ तित्थगरस्स अतीनभवभावा वट्टमाणभवे य जम्मादिया भावा कहि जति । अहवा मूलस्स जे पढमा भावा ते मूलपढमाणुयोगो भण्णति । एत्थ तित्थकरस्स जे भावा प्रसूतास्ते परियायसुत-सिस्साइया भाणितव्वा ॥ ११०. से किं तं गंडियाणुओगे? गंडियाणुओगेणं कुलगरगंडियाओ तित्थगरगंडियाओ 5 चकवट्टिगंडियाओ दसारंगंडियाओ बलदेवगंडियाओ वासुदेवगंडियाओ गणधरगंडियाओ भद्दबाहुगंडियाओ तवोकम्मगंडियाओ हरिवंसगंडियाओ ओमप्पिणिगंडियाओ उस्सप्पिणिगंडियाओ चित्तंतरगंडियाओ अमर-णर-तिरिय-निश्यगइगमणविविहपरियट्टणेसु एवमाइयाओ गंडियाओ आघविज्जति । से तं गंडियाणुओगे । से तं अणुओगे ४ ।। ११०. गंडियाणुओगो त्ति इक्खुमादिपर्वगंडिकावत् एकाहिकारत्तणतो गंडियाणुओगो भणितो। ता य 10 कुलकरादियाओ, विमलबाहगादिकुलकराणं "पुन्वभव जम्म णाम प्पमाण" गाहा [ आव. नि. गा. १४९ ] एवमादि जं किंचि कुलकरस्स बत्तव्यं तं सव्वं कुलकरगंडियाए भणितं । एवं तित्थकरादिगंडियामु वि। 'चित्तंतरगंडिय' त्ति चित्रा इति-अनेकार्था, अंतरे इति-उसभ-अजियंतरे ता दिवा, गंडिका इति-खंडं, अतो चित्तरगंडिका भणिता । तासि पेरूवणे पुवायरिएहिं इमा विधी दिवाआदिच्चजसादीणं उसभस्स पयोपदे णरवतीणं । सगरमुताण सुबुद्धी इणमो संख परिकहेति ॥१॥ 15 चौदस लक्खा सिद्धा णिवईणेक्को य होति सबढे । एवेकेकटाणे पुरिसजुगा होतऽसंखेजा ॥२॥ पुणरवि चोइस लक्खा सिद्धा निवतीण दोण्णि सबढे । दुगठाणे वि असंवा पुरिसजुगा होति णातव्या ॥३॥ जाव य लक्खा चोदस सिद्धा पण्णास होति सबढे । पण्णासटाणे वि तु पुरिसजुगा होतऽसंखेज्जा ॥४॥ ऐगुत्तरा तु लक्खा संबढे णेय जाय पण्णासा । एक्के कुत्तरठाणे पुरिसजुगा होतऽसंखेजा ॥५॥१।। विवरीयं सचढे चोदस लक्खाई निब्बुनो एगो । स चेव य परिवाडी पागासा जाब सिद्धीए ॥६॥२। तेण पर दुलरवादी दो दो ठाणा य समग वचंति । सिवगति-सपढेहिं इणमो तासि विही होइ ।।७।। दो लक्खा सिद्धीर दो लक्खा णरवतीण सबढे । एवं तिलक्ख चतु पंच जाव लक्खा असंखेजा ॥८॥३। सिवगति-सचट्टेहिं चित्तंतरगंडिया ततो चउरो । एगादेगुत्तरिया एगादिविउत्तरा वितिया ॥९॥ ततिएगादितिउत्तर तिगमादिविउत्तरा चतुत्थेवं। जि०२२१ द्वि०पडमाए सिद्धेको दोणि य सचट्ठसिद्धम्मि।।१०।। तत्तो तिण्णि णरिंदा सिद्धा चत्तारि होति सबढे । इय जाव असंखेजा सिवगति-सबट्ठसिद्धेहिं १ ॥११॥ 25 ताहे विउत्तराए सिद्धक्को तिणि होति सबढे । एवं पंच य सत्त य जाव असंखेज दो वि त्ति २ ॥१२॥ एग चतु सत्त दसगं जाव असंखेज होति दो वित्ति । सिवगति-सबढेहिं तिउत्तराए तु तव्वा ३ ॥१३॥ १परूवणा पुवायरिपहि इमा दिट्ठा आ. दा. ॥ २ एगुत्तरा उ ठाणा सबढे चेव जाव पण्णासा । पक्केकंतरठाणे दा० ॥ ३ सम्वट्ठाणे य आ० ॥ ४ तेसिं हारि वृत्तौ ॥ ५ दोणि त्ति दा० ॥ ६ रा पत्थ णेयव्वा आ० । 'राए मुणेयव्वा दा.॥ Page #113 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जिणदासगणिमहत्तरविग्इयाए चुण्णीए संजुयं [सु० १११-१२ ताहे-तियगादिविउत्तराए अउणनीसं न तियग ठावेतुं । पहमे णस्थि तु खेयो सेसेमु ईमो भवे खेवो ॥१४॥ दुग पण णवगं तेरस सत्तरस दुवीस छ च अटेव । वारस चोइस तह अट्टवीस छब्बीस पणुवीसा ॥१५॥ एकारस तेवीसा सीताला सतरि सत्तमत्तरि या । इग दुग सत्तासीती एगत्तरिमेव वावट्ठी ॥१६॥ अउणत्तरि चउनीसा छाताल सतं तहेव छब्बीसा । एते रासीखेवा तिगअंतंता जहाकमसो ॥१७॥ सिवगति-सट्टेहिं दो दो ठाण दिसामुक्त णेया । नार उगतीमटाणे उणतीसं पुण छवीसाए ॥१८॥ विसमुत्तरा य पढमा एवमसंख विसतरा णेया । सत्य धि अंतिल्लं अण्णाए आदिमं ठाणं ॥१९॥ गतं ॥ अउणत्तीसं वारा ठावेतुं पत्थि पढमए खेदो । सेसे अडतीसाए सवत्थ दुगादियो खेवो ॥२०॥ सिवगति पढमादीए वितियाए तह व होति सट्टे । इय एगंतरिताई सिक्गति-सव्वट्ठठाणाई ॥२१॥ एवमसंखेजाओ चित्तंतरगंडियाओ तब्धा । जाव जितसत्तुराया अजितांजणपिता समुप्पण्णो ४ ॥२२॥ 10 एवं गाहाहिं चित्तंतरगंडिया समत्ता । इमा एतासि ठवणा | सिद्धा लकवा १४१४ १४ १४:१४ | १४ १४ १४.१४ १४|१४ | सबढे लकवा | १ २ ३ ४ ५ ६ ७ ८ ९ १० | ५० एवं जाव असंखेजा पुरिसजुगा सिद्धा । अतो परं | सिद्धा लक्खा १ २ ३ ४ ५ ६ ७ ८ ९ १० | ५० | 15 | सबढे लक्खा | १४ १४, १४ १४ | १४ १४ | १४ १४ | १४ | १४ १४ एवं पि असंखेज्जा पुरिसजुगा सिद्धा । एते वि लक्खा| सिद्धा लक्खा ! २ ३ ४ ५ ६ ७ ८ ९ १० ११ १२| | सबढे लक्खा २ ३ ४ ५ ६ ७ ८ ९ १० ११ १२ एवं जाव असंखेजा आवलिया दुगादिएगुत्तरा दो [ जे० २२२ प्र० ] वि गच्छंति ।। 20 | सिद्धा१ | ३ ५, ७ ९ ११ १३ १५ १७ १९| | सबढे २ ४६ ८ १० | १२ १४ १६ १८ २० एवं असंखेजा । एगादेगुत्तरा पढमा चित्तंतरगंडिया णेया ॥ | सिद्धा १.५ ९ १३ १७ २१ २५ २९ ३३ ३७ ४१ | सबढे ३ ७ / ११ १५ १९ : २३ २७ ३१ | ३५। ३९। ४३ | 25 एवं असंखेजा । एनादिविउत्तरा वितिका चित्तंतरगंडिया ॥ १ मे भवे खेवा आ॥२ चित्रान्तर गण्डिका-तद्यन्त्रकदम्बकविशेषजिज्ञामुभिद्रष्टव्या अस्मत्सम्पादितनन्दिसूत्रहारिभद्रीवृत्त्यनन्तरमुद्रितदुर्गपदव्याख्यायाः १६७ तमे पत्रे टिप्पणी ॥ Jain Education Intemational Jain Education international Page #114 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ___10 दिट्ठिवाओ चूलियाओ य] सिरिदेववायगविरड्यं गंदीसुत्तं । | सिद्धा १७ १३ १९ २५ ३१ ३७४३ ४९ ५५ | सबढे ४ १० | १६ २२ २८३४|४० ४६ ५२५८ एवं जाव असंखेजा । एगादितिउत्तरा ततिया चित्तंतरगंडिया । | सिवगति ३ ८ | १६ २५ ११ | १७ | २९ १४/५० ८० ५.७४ ७२ ४९ २९ सबढे | ५ |१२ २० ९ १५ ३१ २८ २६ ७३ ४ ९० ६५ २७ १०३ सबढे २९ ३४ ४२ ५१ ३७ ४३ ५५ ४० ७६ १०६ ३१ १०० ९८ ७५ ५५ सिवगति ३१ ३८ ४६ ३५ ४१ ५७ ५४ ५२ ९९ ३० ११६ ९१ ५३ १२९ । सेसं गाहाणुसारेण तव्वं जाव असंखेज्जा ४ ॥ १११. से किं तं चूलियाओ? चूलियाओ आइल्लाणं चउण्हं पुब्वाणं चूलिया, अवसेसा पुवा अचूलिया । से तं चूलियाओ ५ । १११. 'चूल' ति सिहरं । दिठिवाते जे परिकम्म-मुत्त-पुन्च-अणुयोगे यण भणितं तं चूलासु भणितं । ताओ य चूलाओ आदिल्लपुव्वाण चतुण्डं जे चूलवत्थू भणिता ते चेव सव्वुवरि दृविता पढि जंति य, अतो ते सुयपचयचूला इव चूला । तेसिं जहक्क मेण संखा चतु बारस अट्ठ दस य भवंति ५॥ ११२. दिट्ठिवायस्स णं परित्ता वायणा, संखेज्जा अणुओगदारा, संखेज्जा वेढा, संखेज्जा सिलोगा, संखेज्जाओ पडिवत्तीओ, संखेज्जाओ णिज्जुत्तीओ, संखेज्जाओ 15 संगहणीओ । से णं अंगठ्ठयाए दुवालसमे अंगे, एगे सुयक्खंधे, चोइस पुब्बा, संखेज्जा वत्थू, संखेज्जा चुल्लवत्थू, संखेज्जा पाहुडा, संखेज्जा पाहुडपाहुडा, संखेज्जाओ पाहुडियाओ, संखेज्जाओ पाहुडपाहुडियाओ, संखेज्जाइं पैदसहस्साई पदग्गेणं, संखेज्जा अक्खरा, अणंता गमा, अणंता पज्जवा, परित्ता तसा, अणंता थावरा, सासत-कड-णिबद्ध-णिकाइया जिणपण्णत्ता भावा आघविज्जति पण्णविज्जति परूविज्जति दंसिज्जंति णिदंसिज्जति उव- 20 दंसिज्जति । से एवंआया, एवंणाया, एसंविण्णाया, एवं चरण-करणपरूवणा आघविज्जति । से तं दिद्विवाए १२ । ११२. संखेजा वत्थू पणुचीसुत्तरा दा सत 'संखेजा चूलपत्थु' ति चतुत्तीसं ॥ १-२ चूलिया ख० स० ल• शु० ॥ ३ चूलिया, सेसाई पुव्वाई अचूलियाई, से तं जे० मो० मु० ॥४ चूलिया खं• सं० ल. शु० ॥ ५दिद्विवाए थे सं० सं• ल• शु०॥ ६ अंगठ्ठाप ख• शु० ॥ ७ बारसमे जे० मो० मु० ॥८ पुवाई जे. मो. मु.॥९चूलवत्थू ख० सं० सम. विना ॥ १० पदसतसह सम• ॥ ११ 'विजंति सं० जे० ॥ Page #115 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ८० जिगदासगणिमहत्तरविरइयाए चुण्णीए संजुयं [मु० ११३-१: ८० ११३. इच्चेइयम्मि दुवालमंगे गणिपिडगे अणंता भावा अणंता अभावा अणंता हेऊ अणंता अहेऊ अणंता कारणा अणंता अकारणा अणंता जीवा अणंता अजीवा अणंता भवसिद्धिया अणंता अभवसिद्धिया अणंता सिद्धा अणंता असिद्धा पण्णत्ता । संगहणिगाहा भावमभावा हेउमहेऊ कारणमकारणा चेव । जीवाऽजीवा भवियमभविया सिद्धा असिद्धा य ॥ ८॥ ११३. अणता भाव त्ति भवनं भूति भावः, ते य जीवा-ऽजीवात्मका अणंता प्रतिवद्धा। 'अणंता अभाव' त्ति अभवन अभावः अभूतिर्वा । नहा जीयो अनीपत्तेण अभावो, अजीवा य जीवत्तेण, घडो पडत्तेण, पडो य घडत्तेण, एमादि अणंता अभावा प्रतिवद्धा । अहवा जे जहा जावइया भावा तेसिं पडिपक्वतो तावइया चेव अणंता अभावा भवंति । 'अणता हेनु' ति पंच-दसावयवर्वयणेमु पक्खधम्मत्तं सपक्वसत्तं अभिलसितमत्थसाधकं 10 वयणं हेतू भण्णति, अहवा सधजुत्ति जुत्तं वगणं हेतू भण्णति, अहवा सव्वे निणवयणपहा हेतू , प्रतिपातकत्तणतो, णिदोसहेतुवयणं व, सुत्तस्स य अणंत जे०.२२२ द्वि० गमत्तगतो, एवं अणंता हेतू । भणितपडिवक्खतो य अणंता चेव अहेतू । 'अगंता कारण' त्ति क जसाधयं कारणं ति, ते य पयोग-वीससातो अणंता भाणितव्या । जंच जस्स असाधकं तं तस्स अकारणं, जहा चक-दंडादयो पडस्स, एवं अणंता अकारणा । 'अगंता जीवा' इत्यादि कंठं॥ ११४. ईचेइयं दुवालसंग गणिपिडगं तीए काले अणंता जीवा आणाए विराहेत्ता 15 चाउरतं संसारकतारं अणुपरियट्टिसु । इचेइयं दुवालसंगं गणिपिडगं पडुप्पण्णकाले परित्ता जीवा आणाए विराहेत्ता चाउरंतं संसारकंतारं अणुपरियटुंति । इचेइयं दुवालसंगं गणिपिडगं अणागते काले अणंता जीवा आणाए विराहेत्ता चाउरंतं संसारकंतारं अणुपरियट्टिस्संति । ११४. इच्चेयं दुवालसंगं गणिपिडगं तीते काले अणंता जीवा आगाए विराहेत्ता इत्यादि । 'दुवालसंग गणिपिडगं' ति तिविहं पण्णत्तं-मुत्ततो अत्थतो तदुभयतो य । एमेव आणा तिविहा-सुत्ताणा अत्थाणा १ इच्यम्मि खं० ॥ २ कारणा जीवा । अजीव भवियऽभविया, तत्तो सिद्धा खं० ल० शु० ॥ ३ पञ्चावयव-दशावयवज्ञानार्थमत्रोल्लिख्यमानो दशकालिकसूत्रनियुक्ति-चूर्णि-वृद्धविवरण-वृत्त्यादिगतो प्रन्थसन्दर्भोऽवधारणीयः-“पइण्णा-हेउ-दिटुंतोवसंहारणिगमणेहिं वा णिरूविजति आगमवयणं पंचहि, दसहिं वा ।" तथा "पतिण्या पढमो अवयवो १ पतिण्यासुद्धी २ हेऊ ३ हे उसुद्धी दिटुंतो ५ दिटुंतविसुद्धी ६ उवसंहारो ७ उपसंहारविमुद्धी ८ णिगमणं ९ णिगमणविमुद्धी दसमो १० ।" इति [ “कत्थति पंचावयवं" इति दशवकालिकसूत्रनियुक्तिगाथा २३ अगस्त्यसिंहचूर्णी पत्र २० ] । “कदाइ आगम-हेउ-दिहतोवसंधार-णिगमणावसाणेण पंचावयवेण कहिजइ, कदाइ पुण दसावयवेण ।' तथा-"इदाणि दसावयवाणं परूवणं काहाभि, तं०-पतिण्या पढमो अवयवो १ पइण्णाविसुद्धी बितियो २ एवं हेऊ तइओ अवयवो ३ हेउविसुद्धी चउत्थो अवयवो ४ दिटुंतो पंचमो अवयवो ५ दिटुंतविसुद्धी छट्ठो ६ उपसंहारो सत्तमो ७ उवसंहारविसुद्धी अट्टमो ८ णिगमणं णवमो ९ णिगमणविसुद्धी दसमो १० ।" इति वृद्ध विवरणे पत्र ३८-३९ । “पञ्चावयवाश्च प्रतिज्ञादयः, यथोक्तम्-'प्रतिज्ञा-हेतूदाहरणोपनय-निगमनानीत्यवयवाः" [न्यायद० १-१-३२ ] दशवकालिकहरिभद्रवृत्तिः पत्र ३३ । तथा-" ते उ पइन्न १ विभत्ती २ हेउ ३ विभत्ती ४ विवक्ख ५ पडिसेहो ६ । दिढतो . आसंका ८ तप्पडिसेहो ९ निगमणं १० च ॥ १३७॥" दशवकालिकनियुक्तिः । अस्या व्याख्यार्थ हारिभद्री वृत्तिरवलोकनीया । एषलेखेषु दशावयवद्वैविध्यमपि न विस्मरणीयम् ॥ ४ वयणे सपक्खधम्मत्त-सपक्खत्त-अभिलसितसज्झसाधकं आ• ॥ ५ पादकत्तणतो आ० दा० ॥ ६ इञ्चेयं खं० शु० । एवमप्रेऽपि सर्वत्र ज्ञेयम् ॥ Page #116 -------------------------------------------------------------------------- ________________ मुयणागविरागा-राहणाण फलाई ] सिरिदेववायगविरइयं दायुनं । तदुभयआणा य एवं एगडिता तहा वि अभिधाणतो विसेसो कजात-यदा आज्ञाप्यते एभिः तदा आज्ञा भवति, तंतुपटव्यपदेशवत् । आनाप्यते यया हितोपदेशत्वेन सा आज्ञा इति । इदाणिं एतेसिं विराहणा चिंतिज्जति-जं मुत्ततो दुवालसंगं गणिपिंडगं तं अस्थतो अभिनिवेसेण अण्णहा पणतो ताए अत्थाणाए मुत्तं विराहेत्ता तीते काले अणंता जीवा संसारं भमितपुया, गोठामाहिलबन् । अहवा जं अत्यतो दुवालसंगं गणिपिडगं तं मुत्ततो अभिणिवेसेण अण्णहा पहंतो ताए मुत्ताणाए अत्थं विराहेत्ता तीते काले अणंता जीवा संसारं भमितपुवा 5 जमालियन् । अहवा आणं ति-पंचविहायारायरणमालम्म गुरुगो हिनावदेसवयणं आणा, तमण्णधा आयरंतेण गणिपिडगं विराधितं भवनि, एवं तीए काले अणंता जीया संसार भमितपुधा, एसो अकवरसमा अत्यो । इमो अणक्खरसमो-आणाए विराधेत्ता इति जहा छायाए भुजित्ता गना, णो च्छायाए करणभूयाए भुंजित्ता, किंतु च्छायायां भुक्त्वा गतेति, एवं आज्ञायां विराधनं कृत्वा । सा य आगा इमा-'इच्चेयं दुवालसंगं गणिपिडगं आणाए विराहेत्ता'। सेसं पूर्ववत् । पड़प्पण्ण-अणागतेमु वि मुत्तेलु एवं चेव वत्तव्यं, णवरं पड़प्पण्णे काले परित्ता जीवा 10 इति, अणंता असंखज्जा य [जे० २२३ प्र०] ण भवति, सण्णिमणुयाणं संखेजत्तणतो ॥ ११५. इन्चेइयं दुवालसंगं गणिपिडगं अतीतकाले अणंता जीवा आणाए आराहेत्ता चाउरंतं संसारकंतारं वितिवइंसु । इच्चेइयं दुवालसंगं गणिपिडगं पडुप्पण्णकाले परित्ता जीवा आणाए आराहेत्ता चाउरंतं संसारकंतारं वितिवेयंति । इच्चेइयं दुवालसंगं गणिपिडगं अणागए काले अणंता जीवा आणाए आराहेत्ता चाउरंतं संसारकंतारं वितिर्वतिस्संति । ... ११५. तिमु वि आराधणमुत्तेसु एवं चेव वत्तव्यं ।। __ ११६. इच्चेइयं दुवालसंगं गणिपिडगं ण कयाइ णाऽऽसी ण कयाइ ण भवति ण कयाइ ण भविस्सति, भुवि च भवति य भविस्सति य, धुवे णिअएँ सासते अक्खए अव्वए अवट्ठिए णिच्चे । से जहाांमए पंचत्थिकाए ण कयाति णाऽऽसी ण कयाति गंत्थि ण कयाइ म भविस्सति, भुविं च भवति य भविस्सति य, धुवा णीया सासता अक्खया अव्वया 20 अवट्ठिया णिचा, एवामेव दुवालसंग गणिपिडगे ण कयाइ णाऽऽसी ण कयाइ णत्थि ण कयाइ ण भविस्सति, भुवि च भवति य भविस्मति य, धुवे णिए सासते अक्खए अव्वए अवट्ठिए णिच्चे ! ११६. ण कताइ णाऽऽसीत्यादि । त्रिकाले नास्तित्वभावप्रतिषेधकं सूत्रम् । 'भुवि च' इत्यादि त्रिकाले अस्तिखभावप्रतिपादकं सूत्रम् । त्रिकालभावित्तणतो चेव अचलभाववाद् ध्रुवं मेर्वादिवत् । धुवत्तणतो चेव जीवादि- 25 १पए एग दा० ॥ २ तंतुभिः पट व्यय, देवदत्तवत् आ० दा० ॥ ३ तीए काले जे. मु० ॥ ४-५-६ बीदव जे. मो० । बीतीव शु० ॥ ७णीते खं० ल• शु० ॥ ८ ‘णामे खं० ॥ ९ काया खं० डे. ल. शु० ॥ १० ण भवंति ण कयाइ ण भविस्संति, भुवि च भवंति च भविस्तंति य, धुवा णीया सासता अक्खया अव्वया अवडिया णिचा, . ल. शु० ॥ ११ णीते सं० ल• शु० ॥ Page #117 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जिणदासगणिमहत्तरविरझ्याए चुण्णीए संजुयं [मु० ११७-११८ : .-८५ णवपदत्येसु नियुक्तं नियतं जहा लोकवचनं पंचास्तिकायेष्विव । णियतत्तणतो चेव 'सासतं' शश्वद् भवतीतिशाश्वतम् , पतिसमया-ऽऽवलिक-मुहूर्त-दिनादिष्विव कालः । सासतत्तणतो चेव वायणादिसु 'अक्खयं' नास्य क्षयो अक्षयम् , गंगा-सिंधुपबाहेष्वपि पोंडरीकहदवत् । अक्खयत्तणतो चेव 'अव्वयं' नास्य ब्ययो अव्ययम् , मानुषोत्तराद् वहिसमुद्रवत् । अन्नयत्ततो चेव स्वप्रमाणे अवहितं जंबूद्वीपादिवत् । अवद्वितत्तगतो चेव सबहा चिंतिजमाणं 'निच्चं' आकाशवद् 5 अविनाशीत्यर्थः। अहवा एते धुवादिया एगडिता । चोदक आह-इञ्चेयं दुवालसंगं धुवादिपदपरूवितं किमाणागेझं दिटुंततो वा सझं ? आचार्याऽऽह-जम्हा जिणा अगण्णहावादिणो तम्हा तेसिं वयणं सव्वं आणाते चेव गझं, कहिचि दिटुंततो वि गझं । इह दुवालसंगस्स धुवादिपरूवितत्थस्स साधको इमो दिलुतो-'से जहानामते'त्यादि कंठं ॥ ११७. से समासतो चउबिहे पण्णत्ते, तं जहा-दबओ खेत्तओ कालओ भावओ। तत्थ दव्वओ णं सुयणाणी उवउत्ते सव्वदव्वाइं जाणइ पासइ । खेतओणं सुयणाणी उवउत्ते 10 सव्वं खेत्तं जाणइ पासइ । कालओ णं सुयणाणी उवउत्ते सव्वं कालं जाणइ पासइ । भावओ णं सुयणाणी उवउत्ते सव्वे भावे जाणइ पासइ। ११७. तं च दुवालसंगसुतं चतुन्विहं दव्वादि । अभिण्णदसपुब्बादियाण जाव सुतनाणकेवली ते पडुच्च भणितं । दव्वतो णं सुतनाणी मुतनाणेणोवयुत्तो सुत्तविण्णत्तीए सबदबादि जागति पासति य । गणु पासइ त्ति विरोहो? उच्यते-जम्हा अदिशाण वि मेरुमादियाण मुतणाणपासणताए आगारमालिहइ, ण यादिदें लिखड, 15 पण्णवणाए य भणिता सुतणाणपासणत त्ति, ण विरोधो । आरतो पुण जे सुतनाणी ते सव्वदचनाण-पासणतामु भइता। सा य भयणा मतिविसेसतो जाणितव्वा । एवं खेत्त-काल-भावेमु वि [जे० २२३ द्वि०] भाणितन्या। सुतनाणदंसणत्थं भण्णति११८. अक्खर १ सण्णी २ सम्म ३ सादीयं ४ खलु सपज्जवसियं ५ च । गमियं ६ अंगपविढे ७ सत्त वि एए सपडिवक्खा ॥ ८१॥ [आव०नि० गा० १९] आगमसत्थग्गहणं जं बुद्धिगुणेहिं अहिं दिटुं । विति सुयणाणलंभं तं पुवविसारया धीरा ॥२॥ सुस्सूसइ १ पडिपुच्छइ २ सुणेइ ३ गिण्हइ ४ य ईहए ५ यावि । तत्तो अपोहए ६ वा धारेइ ७ करेइ वा सम्म ८॥३॥ मूयं १ हुंकारं २ वा बाढक्कार ३ पडिपुच्छ ४ वीमंसा ५ । तत्तो पसंगपारायणं ६ च परिणिट्ठ ७ सत्तमए ॥ ८४॥ ... १ जिणा णण्णहा आ० ॥ २ तत्थ इति खं० डे० ल. शु० विआनन्द्युद्धरणे ३०० पत्र नास्ति ॥ ३-५-७-९ ण पाला हाटोपा.॥४-६-८ सव्व० ख० विआनन्द्युद्धरणे ३०० पत्रे ॥१० अढहि वि दिढ जे. ल. ॥ ११ आवि खं० । वा वि जे. ल. ॥ १२ या खं० ॥ Jain Education Intemational Page #118 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सुयणाणलाभ-सवण-वक्याणविहिमाइ] सिरिदेववायगविरइयं गंदीसुत्त । सुत्तत्थो खलु पढमो, बीओ णिज्जुत्तिमीसिओ भणिओ। तइओ य णिखसेसो, एस विही होइ अगुओगे ॥ ८५॥ [आव० नि० गा० २१-२४ ] से तं अंगपविट्ठ । से तं सुयणाणं । से नं परोक्खणाणं । ॥से नं णंदी सम्मत्ता ॥ ११८. अक्वर० गाहा । एसा चोइसविहमुतभावपरूवणा कता ॥ ८१॥ एत्थं आयारादिगणधरागमपणीतस्स पत्तेगबुद्धभासितस्स वा तहाकालाणुभावतो बल-बुद्धि-मेधा-ऽऽयुहाणिं जाणिऊण जे य मुतभावा आयरिएहि निज्जूढा तेसु गहणविही दंसिज्जइ आगम० गाहा ।।८२॥ इमे ते अट्ठ बुद्धिगुणासुस्सूसति० गाहा ॥८३॥ विणेतस्स अत्थसवणे इमा विहीमूयं हुंकार० गाहा ॥८४॥ गुरुणो अणुयोगकहणे इमा विहीसुत्तत्थो खलु० गाहा ॥८५|| जंण भणितमृणं वा अतिरित्तं वा वि अहव विवरीतं । तं सम्मऽणुयोगधरा कहेंतु कातुं मम खंतिं ॥१॥ णि रेगमत्तण हसदा जि या पमपतिसंखगजट्रिताकला। कमद्विता धीमतचिंतियक्खरा, फुडं कहेयंतऽभिधाण कत्तुणो ॥ छ । शंकराज्ञो पंचसु वर्षशतेषु व्यतिक्रांतेषु अष्टनवतेषु नंद्यध्ययनचूर्णी समाप्ता इति ॥छ॥ छ । ग्रन्थानम् १५००।। १'गणधरपणीतस्स आ• दा० ॥ २ णिरेणगामेत्तमहासहाजिता पस्यती संखजगहिता अ॥ ३ सकराजतो पंचसु वर्षशतेषु नन्धध्ययन आ० ॥ Page #119 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Jain Education Intemational Page #120 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रथमं परिशिष्टम् नन्दीसूत्रान्तर्गतानां सूत्रगाथानामकारादिवर्णक्रमेण अनुक्रमणिका गाथा सूत्राङ्क गाथाक गाथा सूत्राङ्क गाथाङ्क गाथा सूत्राङ्क गाथाङ्ग अक्खर सण्गी सम्म ११८ ८१ ओही भवपञ्चतियो २८ ५२ जेसि इमो अणुओगो ५ ३२ [आव. नि. गा. १९] कम्मरयजलोहविणि- २ ७ णाणम्मि दंसणम्मि य ५ २८ अड्ढभरहप्पहाणे ५ ३७ कालियसयअणुओग- ५ ३४ णाणवररयणदिप्पंत- २ १७ अणुमाणहे उदिदंत काले चउण्ह वुड्ढी २३ ५० णिमित्ते अत्थसत्थे य ४६ ६२ [ आव. नि. गा. ९४८] [आव. नि. गा. ३६] [ आव. नि. गा. ९४४] अस्थमहत्थक्खाणि ५ केवलगाणेणऽत्ये ४१ ५५ गियमूसियकणयसिला- २ १३ अत्थाणं उग्गहणं ५८ ७१ [आव नि. गा. ७८] णेरतियदेवतित्थंकरा पत्र-२० टि०८ [आव. नि. गा. ३] खमए अमच्चपुत्ते ४६६८ [टीकाद्वयसम्मता गाथा, अभए सेटूि कुमारे ४६ [आव. नि गा. ९५.] आव. नि. गा. ६६] [आव. नि. गा. ९४९] खीरमिव जहा हंसा पत्र-१२ टि०५ णेवइपहसासगयं पत्र-७ टि०६ अयलपुरा गिक्खंते [चूर्णि-टीकाद्वयानाहता गाथा] [टीकाद्वयसम्मता गाथा] अह सञ्चदव्वपरिणाम- ४१ गुणभवणगहण ! सुय- २ ६ तत्तो य भूयदिन्नं [आव. नि. गा. ७७] पत्र-१० टि०७ गुणरयणुजलकडयं अंगुलमावलियाणं २३४ पत्र-५ टि०१० [चूर्णि-टीकाद्वयानादृता गाथा ] [चूर्णि-टीकाद्वयानादृता गाथा ] [आव. नि. गा. ३२] तत्तो हिमवंतमहंत- ५ ३३ गोविंदाणं पि णमो पत्र-१० टि०७ आगमसत्थग्गहणं ११८ तवनियमसच्चसंजम- पत्र-११ टि०११ [आव. नि. गा. २१] [चूर्णि-टीकाद्वयानादृता गाथा] [चूर्णि-टीकाद्वयानादृता गाथा ] ईहा अपोह वीमंसा ५८ चत्तारि दुवालस अ- १०७ ७९ तवसंजममयलंछग! २ ९ [आव. नि. गा. १२] चलणाहण आमंडे ४६ ६९ तवियवरकणगचंपय- [ आव. नि. गा. ९५१] ५ उग्गह ईहाऽवाओ ३६ ५८ जच्चजणधाउसम- ५ ३० तिसमुदखायकित्ति [आव. नि. गा. २] ५ २६ उग्गह एकं समयं ५८ ७ जयइ जगजीवजोणी- १ १ दस चोइस अट्ठष्ट्ठा- १०७ ७७ जयइ सुयाणं पभवो नगर रह चक्क पउमे [आव. नि. गा. ४] पत्र-५ टि०१० उप्पत्तिया वेणइया ४६ जसभदं तुंगियं वंदे ५ २३ [चूर्णि-टीकाद्वयानादृता गाथा ] [ आव. नि. गा. ९३८] जावतिया तिसमया- २३ । न य कथइ निम्माओ पत्र-१२ टि०५ उवओगदिदुसारा ४६ ६४ [आव. नि. गा. ३.] . [चूर्णि-टीकाद्वयानाहता गाथा] [आव. नि. गा. ९४६] जा होइ पगइमहुरा पत्र-१२ टि०५ पढमेत्थ इंदभूती ४ २० ऊससियं नीससियं ६४ ७६ [चूर्णि-टीकाद्वयानादृता गाथा ] परतित्थियगहपह[आव. नि. गा. २०] जीवदयासुंदरकंद- २ १४ पुढे सुणेति सदं ५८ ७३ एलावंच्चसगोतं ५ २४ जे अण्णे भगवंते ५ ४२ [आव. नि. गा. ५] Jain Education Intemational Page #121 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ८६ गाथा अमिय [ आव. नि. गा. ९३९] बारस एक्कारसमे भगं करगं झरगं भधिवेलापरि भई सवजगुजो भई सीलपडागूभरणत्रणसमत्था [ आव. नि. गा. ९४३] भरहम्मि अद्धमासो सूत्राङ्क गाथाङ्क ४६ ५७ १०७ ५ २ १ २ ४६ २३ [ आव. नि. गा. ३४ ] भरह सिल पणिय रुक्खे ४६ [ आव. नि. गा. ९४० ] भरह सिल मिंट कुक्कुड ४६ [ आव. नि. गा. ९४१ ] भावमभावा हे उमभासासमसेढीओ [ आव. नि. गा. ६] भूयहि ययप्पगन्भे ११३ ५८ जवाणं पुण [ आव. नि. गा. ७६ ] ५ ३२ ७८ २७ ११ ३ ४ ६१ ४८ ५८ ५९ ८० ७४ ३८ ५३ नन्दी सूत्रगाथाना मकारादिक्रमेणानुक्रमणिका सूत्राङ्क ४६ गाथा महुसिन्ध मुद्दियंके [ आव नि. गा. ९४२ ] मंडि मोरि संप ४ ५ ११८ सम्म सवरद बहुअगणिजीवा [ आव. नि. गा. ३१] संखेजम्मि उकाले [ आव. नि. गा. ३५] मूयं हुंकारं वा [ आव. नि. गा. २३] वायगवंसो वंदामि अज्जधम्मं [ चूर्णि टीकाद्वयानादृता गाथा ] वंदामि अजरक्खिय पत्र ८ टि०१० [ चूर्णि टीकाद्वयानादृता गाथा ] वंदे उसमें अनियं fararaपवरमुणिवर पत्र -५ [ १६ गाथाप्रथमचरणपाठभेदः ] विणयमयपवरमुणिवरविमलमध २ ३ २ २३ For Private गाथाङ्क ६० ५ २९ पत्र ८ टि०१० २१ ३५ ८४ २३ ३ १८ टि०८ Personal Use Only १६ १९ १२ ४५ ४९ गाथा संजमतवतुंबारसंवरवर जलपगलियउज्झसावगजणमहुयरिपरिसीया साडी दीहं च [ आव. नि. गा. ९४५] सुकुमालको मलतले सुतःथो खलु पठमो [ आव. नि. गा. २४ ] मुणिचाण मुस्सूसइ पडिपुच्छ [ आव. नि. गा. २२ ] मुहम्मं अग्गिवेसाणं सुमो य होइ कालो सूत्राङ्क २ २ २ ४६ [ आव. नि. गा. ३७] सेलघण कुडग चालगि ५ ११८ ५ ११८ [ आव. नि. गा. १३६] हत्थम्मि मुद्दत्तंतो [ आव. नि. गा. ३३] हारियगोत्तं साइं हेरएि करिसए [ आव. नि. गा. ९४७ ] ५ २३ ६ २३ ५ ४६ गाथाडू. ५ १५ ८ ६३ ४१ ८५. ३९ ८३ २२ ५१ ४३ ४७ २५. ६५. Page #122 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ७८ " ३ 6 W । द्वितीयं परिशिष्टम् नन्दीमत्रचूर्ण्यन्तर्गतानामुद्धरणानामकारादिवर्णक्रमेण अनुक्रमणिका गाथादि पत्रा गाथादि पत्राक गाथादि पत्रात अउगत्तरि चउवीसा एवमसंखेम्जाओ जह जुगत्रुप्पत्तीय वि २९ अउगत्तीसं वारा एवं तु अणंतेहिं [विशेषगवती गा. २१९] अक्वरलं भेण समा [कल्पभाज्य गा. ७.] जह पासतु तह पासतु [विशेषावश्यक गा. १४३] एवं बहुवत्तञ्च [विशेषणवती गा. १९२] अण्णे ण चेव वीमुं [नन्दीचूर्णी] जं केवलाई सादी[विशेषणवती गा. १५४] कस्स व णाणुमतमिणं ३० [विशेषगवती गा. १९३] अश भोजने [विशेषणवती गा. २४६] जाव य लक्खा चोदस [पाणि. धातु. १५२४] किंचिम्मत्तग्गाही जुगवमजाणतो वि हु अशू व्याप्ती [कल्पभाष्य गा. ३६९ ] [विशेषणवती गा. २१६] [पाणि. धातु. १२६५] कृमिकीटपतङ्गाद्याः ४८ णववंभचेरमइओ अह ण वि एतं तो मुग [आचाराङ्ग नि गा. ११] [विशेषगवती गा. २०३] केण हवेज निरोधो ५४ गुद प्रेरणे अह देसणाणदसण [कल्लभाष्य गा. ६९] [पाणि धातु. १२८३] . [विशेषणवती गा. १५.] केयी भणंति जुगवं २८ ततिएगादि तिउत्तर आदिचजसादीणं [विशेषणवती गा. १५३] तत्तो तिण्णि णरिंदा इहराऽऽयीणिहणत्तं केवलमेगं सुद्ध तह य असवण्गुत्तं [विशेषणवती गा. १९४] [विशेषावश्यक गा. ८४] [विशेषणपती गा. १९५] इहाऽधोलौकिका ग्रामा गगहरकतमंगगतं ताहे बिउत्तराए तिथं भंते ! तित्थं? उवउत्तरसेमेव य २९ गमणपगवत्तेगो [विशेषणवती गा. २.६] [भगवती श. २० उ. ८ सू. ६८२] उवयोगो एगतरो ३० गुणदोसविसे सगू तियगादिबिउत्तराए [विशेषणवती गा २३२] [कल्पभाष्य गा. ३६५] तुल्ले उभयावरणउवलही अगुरुलह गुरुलहुदबेहितो [विशेषणवती गा. २१७] [कल्पभाष्य गा. ७१] [कल्पभाप्य गा. ६७] तेण पर दुलक्खादी उस्सेहपमाणतो मिणे देहं चोदस लक्खा सिद्धा ७७ दितस्स लभंतस्स व [बृहत्सद्ग्रहणी गा. ३३५] जति पुण सो वि वरिजेन [विशेषणवती गा. २०५] एकारस तेवीसा [कल्पभाष्य गा. ७४] दुग पण णवगं तेरस एग चतु सन दसगं जह किर खीणावरणे देसण्णाणोवरमे एगुनरा तु लक्खा ७७ [विशेपणवती गा. १५५] [विशेषणपती गा. १५६] २१ 22 १४ २६ .०६ । ० Jain Education Intemational Page #123 -------------------------------------------------------------------------- ________________ नन्दीमूत्रचूर्णिगतानामुद्धरणानामकारादिक्रमः पत्रा गाथादि पत्राङ्क ७७ वतसमिति पत्रा ६१ २९ गाथादि दो लक्खा सिद्धीए धम्मो मंगलमुटुं [ दशवे. अ. १ गा. १] नागम्मि दंसम्मिय [विशेषणवती गा. २२९] निच्च्यतो सवगुरु [कल्पभाष्य गा. ६५] पगनीमुद्धमजाणिय [कल्पभाष्य गा. ३६७] पण्गवणिज्जा भावा [कल्पभाष्य गा. ९६४] पायदुर्ग जंघोरू খাবি ७० पुगरवि चोइस लकवा ७१ पुचभव जम्म णाग [आवश्यकनि. गा. १४९] भगिनं पिय पण्णनी [विशेपणवती गा. २२०] ५३ भगति जहोहियागी [विशेषणवती गा. १७८ ] भगति ण एस गिलमो [विशेषणवती गा. २१८] भग्गनि भिषणमुहुनो [विशेषणवती गा. २०२] भंभा मकुंद मद्दल ३० विवरीयं सञ्चद्वे विसमुत्तग य पढमा सततं ण देइ लभइ [विशेषणवती गा. २०४] सदसदविसेस गानो [विशेषावश्यक गा. ११५ सचे सना ण हतच्या [आचाराङ्ग श्रु. १. अ. ४, उ. २ सू. ३] सञ्चेसिं आयागे [ आचाराङ्ग नि गा. 4] सिवगति पढमादीए सिवगति-सञ्चदेहि चिसिवगति-सबटेहिं दो पासंतो वि ] जागह [विशेषणवती गा. २१५] पिंडग्स जा विसोही [व्यवहारभाध्य उ. १ गा २८१] २९ रुपं पत्तेयबुद्धा [आरश्यकनि. गा. ११३९] ६१ रूविस्सय [ तत्त्वा. अ. १ सू. २८] १११ पत्र पनि तृतीयं परिशिष्टम् नन्दीमत्रचूर्णिगतानि पाठान्तर-मतान्तरनिदर्शकानि स्थानानि पत्र पंक्ति ७५-१७ अहवा २२-२२, ३२-३ अहवा पाहो ८-११ पाढंतरं इमं ९-२५, २४-२१ पाढंतरं १७-१३ अण्णायरियमतेण अण्णे अण्णे पुण अण्णे पुण आयरिया अण्णे भणंति १२-२ ४१-२ २-१४ ८-११,५२-६,७०-२ Jain Education Intemational Page #124 -------------------------------------------------------------------------- ________________ चतुर्थ परिशिष्टम् नन्दीमत्र- नर्ण्यन्तर्गतानां ग्रन्थ-ग्रन्थकार-स्थविर-नृप-श्रेष्ठि-नगर-पर्वतादीना मकारादिवर्णक्रमेणानुक्रर्माणका | अस्मिन् परिशिष्टे * एताद परिणकायुतानि नामानि नन्दीमत्रमन्टगतानि यानि. ० एताइन्ययुतानि नामानि उदग्णस्थाननाम्माभिनिर्दिशनि जयानि. पाणि च नामानि चूर्णि-टिप्पगिसत्कानि ज्ञेयानि विपनाम किम! पत्रम् विशेषनाम किम् ? पत्रम् विशेषनाम किम् ? पत्रम * अकंपित [निग्रन्थ-गणधर ७ अरणुत्तरोववाइयदसा [जेनागम] ६९ अंगविज्ञा जैनागम] टि. अगम्यसिंह [निग्रन्थ -स्थविर ] ८०टि० *अगुत्तरोववाहयदसाओ .. ४८,६१, *अंतगडदसाओ .. १८.६१.६७ *अग्गिभूति [निग्रन्थ-गणध. ६८,७० अंतगडदसातो . ६८ *अग्गिवस [गोत्र] ___ *अधिथिप्पवात जनपूर्वागम] ७४ अंधगवण्ह। [राजा] ६० अग्गिवस ७ अथिथि पवाद , ७५ *आउम्पच्चकग्वाण [जैनागम] ५५ *अग्ग य जनपूर्वागम] ७४टि० ०अनुयोगटार जिनागम] ४८fc. आउरपञ्चक्वाण , ५८ *अग्गीय ४९टि० आचाराङ्ग , २.२टिक अग्गेणीय ७५ *अभय राजपुन ३४ आचाराङ्गनियुक्ति , ६२.७५ अजितजिण [तीर्थकर ] ___ अभयदेव [निर्ग्रन्थ-आचार्य २३टि० आजीविक दर्शन ] ७२.७३.७४ *अजिय ४२टि०,६५टि०, *आजीविय , ७२,७४ अजिय ६७टि०.६८टि० आतविसोही [जेनागर] ५८ अन्ज [गोत्र] *अभिणंदण [तीर्थकर ] ६ आदिच्चजस [राज ७७ *अजणागहत्थि [निर्ग्रन्थ-स्थविर] *अमरगइगमण ०आभीयमासुरुक्ख [ शास्त्र ४९टि० अजगागहन्थि गंडियाओ [दृष्टिवादप्रविभाग] ७७ आम्भिय ४९टि० अजधम्म ८टि० *अयलभाता [निर्ग्रन्थ-गणधर ] आयप्पवान [जैनांगम ७६ *अजमंगू *अर [ तीर्थकर] *आयप्पवाद अजक्विय अरुण [देव] *आयविसोही [जैनागम अजवइर ८टि *अरुणोववाए [जनागम] ५९ *आयार. *अजसमुद्द अविद्या [शास्त्र] १९टि आयार *अजाणंदिल [जनपूर्वागम ! ७४,७५ ७५.८३ अन्झार्णदिल ८टि० अवंझ ७६ आयारनिम्जुती .. ७ *अणंतह [तीर्थकर ] अंगचूलिता [जनागम] *अणुओगदाराई [ जैनागम] *अंगचूलिया ५९ आर्यजीतवर [निर्ग्रन्थ-स्थविर ] ८टिक ८टि. CV VO2 *अवंझ जनपूल Jain Education Intemational Jain Education Intermational Page #125 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ९० विशेषनाम ० आर्यमङ्गु ● आर्य समुद्र किम् ? [निर्मन्थ-स्थविर ] ८टि० ८टि० "" • आवश्यकदीपिका [जैनागम ] ११टि० • आवश्यक नियुक्ति ० आवश्यकवृत्ति ० आवस्सग * आवरसग *आमुरुक्ख ● आसुर्य २,२६,४६, ४७,५१ ० आवश्यक नियुक्ति [ जैनागम ] २० टि०, २७टि०, ३३टि० ३४टि० ४९ ५७ ४९ टि० ४९ टि० उद्वाणसुत * उत्तरज्झयणाई * उप्पाद्पुव्व उप्पायपुञ्च एगूरुग एखद-य ● आसुवृक्ष 19 इतिहास * इसि भासियाई [ जैनागम ] * इंदभूति * उडाण सुय उलूक *उववाइय *उवासगदसाओ 15 15 "" [ शास्त्र ] उवासगदसाओ *उसभ ह् उसभ * उस्सप्पिगिगंडियाओ 27 17 [ निर्मन्थ- गणधर ] [जैनागम ] नन्दीसूत्र - तच्चूर्णि टिप्पणीगतानां ग्रन्थ-ग्रन्थकार- स्थविर-नृपादिनाम्नामनुक्रमः विशेषनाम 64 " [जैन पूर्वागम ] 33 35 [ तीर्थंकर ] पत्रम् 22 " [ दर्शन ] [जैनागम ] ५७टि० ४८,६१, ६६,६७ ६७ ६,६० ७,६०,७७ ४९ टि० ४९ टि० ५८ [ दृष्टिवादप्रविभाग ] [ अन्तरद्वीप ] [ क्षेत्र ] ७ ५९ ६० ५८ ७४ ७५ ४ ७७ * एरचय * एलावच एलावच * एलावच्छ • ऐलापत्य * ओवाइय * कच्चायण कच्चायण * कणगसत्तरि * कप्प *ओसप्पिगिगंडियाओ कप्पसुत * कप्पासिय स्कप्पियाओ *कप्पियाकप्पिय कप्पियाकपिय *कम्मप्पगडि * कम्मप्यवाद कम्मप्पवाद करकंडु करिसावण ० कल्पभाष्य * *कप्पवडिसियाओ कप्पवडेंसिया कविल *कविल *काविल *काविलिय २२ २२,५१ * कातव किम् ? [ क्षेत्र ] [ गोत्र ] 99 [ जैनागम ] 27 [ दृष्टिवादप्रविभाग ] [ गोत्र ] For Private " 37 [ शास्त्र ] [ जैनागम ] " "" 27 [शास्त्र ] [ जैनागम ] 23 37 [ ऋषि ] [ शास्त्र ] 39 पत्रम् ५१ "" [ गोत्र ] ७ ८ ७टি० ८टि० ५७ " [जैनशास्त्र ] [जैन पूर्वागम ] ७४,७५ ७६ [ निग्रन्थ- प्रत्येकबुद्ध] २६ [ नाणकविशेष ] ४५ [ जैनागम ] १२, १३. ७७ ७ ७ ४९ ५८ ५९ ६० ५७ ४९ ५९टि० Personal Use Only ५७ ५७ ९ ५३,५४, ५५,५६ २६ ४९ ४९ टि० ४९ टि० ७ विशेषनाम किम् ? कासव [ गोत्र ] ७,८ * किरियाविसाल [ जैन पूर्वागम ] ७४,७५ किरियाविसाल [जनपूर्वागम ] ७६ कुलगरगंडिया [दृष्टिवादप्रविभाग ] ७७ *कुलगर गंडियाओ *कुंथु *कोडलय *कोडिल्लय [ तीर्थकर ] [ शास्त्र ] "" * गगिविज्जा गणिविज्जा [ शास्त्र ] [ गोत्र ] ०को डिलदंडणी *कोसिय कोसिय * क्रियाकल्प [ शास्त्र ] * खंदिलायरिय [निर्ग्रन्थ-स्थविर ] खंदिलायरिय " 25 ८ ४९टि० ९ ९ ५९ ४९ * खुडियाविमाणपविभत्ति [जैनागम ] ५९ खुड्डियाविमाणपविभत्ति *खोडमुह । *घोडमुह ४९ टि० *धरगंडियाओ [दृष्टिवादप्रविभाग ] ७७ *गणिय [ शास्त्र ] ४९ टि० [ जैनागम ] [ शास्त्र ] 37 पत्रम् ७७ ४९ ४९टि० ४९ टि० ८.७८० ७ "" गोट्ठा माहिल [ निर्मन्थनिहव ] गोतम गोतम ० गोमटसार ५७ ५८ " गरुल ५९ [देव] [ जैनागम ] ५९ * गरुलोववाए गंगा [ नदी ] ६४,८२ गंडिकाणुओग [ दृष्टिवादप्रविभाग ] ७६ * गंडियाणुओग ७६,७७ गंडाणुओग ७७ ८१ [ निर्मन्थ- गणधर ] २६,६५ [ गोत्र ] [ जैनशास्त्र ] ४९ टि० ७ Page #126 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जंबु ९ नन्दीमूत्र-तच्चर्णि-टिप्पणीगतानां ग्रन्थ-ग्रन्थकार स्थविर-नृपादिनाम्नामनुक्रमः ९१ विशेषनाम किम् ? पत्रम् विशेषनाम किम् ? पत्रम् विशेषनाम . किम् ? पत्रम् *गायम [गोत्र] ७ छन्दस्विनी [शास्त्र] ४९टि० *णायाधम्मकहाओ [ जैनागम ] ४८,६१, गोविंद (निग्रन्थ-स्थविर ] १०टि० जनाली निग्रन्थनिहब ] ८१ गोसाल [आजीवकदर्शनप्रणेना ] ७२ जसभ६ [निग्रन्थ-स्थपिर ] ७ णायाधम्मकहाओ, ६६ गौतम [निन्ध-गणधर] ५१ जसभद *णासिकमुंदरी-नंद [Uष्टिदम्पती] ३४ *घोडमुह [ शास्त्र] ४९टि० गिसीह [जनागम ] ५८ *खोडमुह ४९ *जंबू ७ णेमी तीर्थकर ] ७ *चक्रवट्टिगंडियाओ दृष्टिवादविभाग ७७ * जंबुद्दीव [द्वीप] १८.२४ ०त वार्थाधिगमसूत्र [जैनशास्त्र] १५ चरग [श्रमणविशेष] ३,४ जंबुद्दीव *तवोकम्मगडियाओ [दृष्टिवादप्रविभाग] ७७ * चरणविही [जैनागम] ५७ *बुद्दीवपण्णत्ति [जैनागम] *तंदुलवेयालिय [जैनागम] ५७ चरणविहीं , जंबूद्वीप [द्वीप] तावस [श्रमणविशेष] ४ *चंदपणात्ति जिणदासगणि- [नन्दिचूर्णिकार] ८३ शियिाको दृशिवाद*चंदावे झय महत्तर प्रविभाग] [अमात्य] *चाणक अमाया ३४ जितसत्तु [राजा] ७८ ७७ *तिरियगइगमणगंडियाओ , चित्तरगंडिया [ दृष्टिवादप्रविभाग] ७७ जीवधर [निर्ग्रन्थ-स्थमिर] ८ *तुंगिय ) [गोत्र] ७ [जनागम] *जीवाभिगम *चुल्लकप्पसुत [जैनागम] ५७ तुंगियायण चुल्लकप्पमुत , ५७ जेसलमेरु (नगर ] ३५टि०,५९टि० वग्यावच्च ) चुल्लहिमवंत [गिरि] २२ ज्योतिष शास्त्र] ४९टि० *तेरासिय [दर्शन] ७२,७४ चूर्णि [नन्दीसूत्रचूर्णि] १टि०,७टि०, *झागविभत्ति [जैनागम] ५७ तेरासिय , ७३,७४ १०टि०,११टि०,१७टि०, झाणविभत्ति ५८ *तेरासियतेसिय [ शास्त्र] ४९टि० २७टि०,३३टि०,३४टि०, *ठाग ,, ४८,६१,६३ *थूलभद्द [निग्रन्थ-स्थविर] ७ ३५टि०,४०टि०.४३टि०. मी [तीर्थकर] ५५टि०,५९टि०,६१टि० । णमोकार [जैनागम] ०दशवकालिक [जैनागम] ७४ ०चूर्णिकृत- [जिनदासगणि- ४टि०, रगडगमग- [दृष्टिवाद ० दशकालिक ८०टि० 'कार महत्तर ] ५टि०,७टि०, गंडियाओ प्रविभाग] ७७ ० , चूर्णि , ८०टि० ८टि०, ११टि०, १२टि०, दिसेण [निग्रन्थ ] ० , नियुक्ति ८०टि. १५टि०.१६टि०,२०टि०, गंदी जैनागम] १ ० , वृद्धविवरण .. ८०टि० २३टि०,३१टि०,३३टि०, *णाइलकुलवंस [निर्ग्रन्थवंश ] १० दशाश्रुतस्कन्ध ३४टि०,४८टि०,५१टि०, णाग [देव ] ७० *दसवेयालिय ५२टि०,५७टि०,५८टि०, *गागजग [निग्रन्थ-स्थविर १०,११ दसा ५९टि०,६०टि०.६१टि०, णागजुग - १० *दसाओ ५८ ६६टि०,६७टि०,६९टि०, णागपरियाणिया [जैनागम] ६० *दसारंगडियाओ [ दृष्टिवादप्रविभाग] ७७ ७२टि० णाणपवाद [जैनपूर्वागम] ०दानमृरि [निग्रन्थ-आचार्य ] ५९टि० ८टि. ७५ ०दानमा Jain Education Intemational Page #127 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ९२ नन्दीसूत्र-तच्चर्णि-टिप्पणीगतानां ग्रन्थ-प्रन्थकार-स्थविर-नृपादिनाम्नामनुक्रमः पत्रम् EO विशेषनाम किम् ? पत्रम् विशेषनाम किम् ? पत्रम् विशेषनाम किम् ? *दिद्विवाअ [ जैनपूर्वागमसमूह ] ४८,६१, निगम पुष्फला [जैनागम] ७१,७९ *निरयगइगमण *पुष्कचूलियाओ , दिद्विवात , ७१,७२.७९ गंडियाओ [ दृष्टिवादप्रविभाग] ७७ *पुष्पदंत तीर्थकर] *दीवसागरपण्णत्ति [ जैनागम] ५९।। निरयावलिया [जनागम] ६० पुफिया [जैनागम] ६० दुमपुफिय ७४ _*निग्यावलियाओ ५९ *पुफियाओ दुस्सगणि) [निग्रन्थ-स्थविर ] ११,१२ निरुक्त [शान्त्र] ४९टि० *पुराण [ शास्त्र] दृसगणि ___ निर्घण्ट ___. ४९टिं० पुराण 2 दि० *दृसगणि निसीह [जैनागम] ५९ *पुस्सदेवय दृष्टिवाद) (जनपूर्वागमसमूह] ७१ *पञ्चकवाण [जनपूर्वागम ] ७१,७५ पेडिया [जैनागम- १८,२६. दृष्टिपात पच्चक्खाण ७६ आवश्यकपीठिका ] ३१.४४ देववायग [नन्दीसूत्रकार] १३ *पञ्चवरखा गप्पवाद , ७४टि० *पोरिसिमंडल [जैनागम] ५७ *देविंदत्था [जैनागम] ५७ पप्णत्ति [जैनागम] २९ पोरिसिमंडल समडल .. *देविंदोववाए ५९ पण्णवणा .. २९.५८,८२ पोंडरीय [द्रह] ६४ द्वादशारनय- [जैनशास्त्र] ५०टि० *पण्णवणा ५७ वलदेवगंडियाओ [ दृष्टिवादप्रविभाग] ७७ चक्रवृत्ति *पण्हावागरणाई , ४८,६१.६९ बलिस्सह [निग्रन्थ-स्थविर ] *धणदत्त [श्रष्टी] पण्हावागरणाई , ६९,७० *बहुल *धम्म [ तीर्थकर ] *पभव [निग्रन्थ-स्थविर] ७ बहुल धरण [देव] पभव *बहुलसस्यिय *धरणोववाए [जैनागम ५९ *पभास [निग्रन्थ-गणधर ] ७ (बलिम्सह) नन्दिवृत्ति ,, ३४टि०,३५टि० *पमादप्पमाद [जैनागम] | *वभदीवग [निग्रन्थशाखा] नन्दी-सूत्र ,, २३टि०,३२टि०, पमादप्पमाद बंभीबग ३८टि०,४२टि०, *पाइण्ण [गोत्र] ७ वार्हस्पत्य शास्त्र] ४९टिक ६१टि०,६७टि०, ०पाक्षिकसूत्रटीका [जनागम] ५९टि० बिंदुसार [जैनपूर्वागम] ३२.४९ ६८टि०,८२टि. ० , वृत्ति .. ५७टि० ०वहासङ्ग्रहणी [जैनशान] २४ ०नयचक्र [शास्त्र] ५०टि० *पागाउं-उ-यु [जनपूर्वागम] ७४टि० ब्रह्मी [लिपि] ४४ [जना म] ५७ ७५टि० भगवती [जैनागम] २३टि०,२६ *नागपरियाणियाओ , ५९ __ *पाणाय ७४,७५ भगवती ३० *नागपरियावणियाओ , ५९टि. पाणायु भद्दगुत्त [निर्ग्रन्थ-स्थविर] ८टि० *नागपरियावलियाओ.. ५९टि. ०पाणिनीयधानुपाठ शास्त्र] १४.१७ *भद्दवाइगंडियाओ[ दृष्टिवादप्रविभाग] ७७ *नागमुहुम [शास्त्र] १९टि. ___ *पायंजली ४९टि० *भद्दबाहु [निग्रन्थ-स्थविर ७ * नाणप्पवात [जनपूर्वागम] ७४ पायीणग्गि [गोत्र] भद्दबाहु *नाममुहुम शास्त्र] ४९ *पास [ तीर्थकर ] ७ भम्भी शास्त्र] ४९टि० 292 v नंदी Jain Education Intemational Page #128 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 43 नन्दीमूत्र-तचर्णि-टिप्पगीगतानां ग्रन्थ-ग्रन्थकार-स्थविर-नृपादिनानामनुक्रमः . . [क्षेत्र] विशेषनाम किम ! पत्रम् विशेषनाम किम् ? पत्रम् *भरह [ क्षेत्र] १८.५१ *महागिसीह [जैनागम] ५८ २२.५१ महाणिसीह ५९ *भागवत शास्त्र] ४९टि० महापञ्चक्खाण , भारध महापच्चक्खाण *भारह *महापण्णवणा भूतदिण्ण [निर्ग्रन्थ-स्थविर] १०,११ महापण्णवणा * भूयदिण्ण *महाविदेह भूयदिन्न १०टि० महाविदेह मधुग (नगरी] ९ *महावीर [नीर्थकर] १टि०.२ *मरणविभत्ति [जैनागम] महावीर मरणविभत्ति ___ *मंडलप्पवेस [जैनागम] ७ मलयगिरि [ निग्रन्थ-आचार्य ] ३टिल, मंडलप्पवेस टि०७टि०८टि०, *मंडिय निग्रन्ध-गणधर] १०टि०,१७टि०, मंदर [गिरि] २०टि०,२३टि०. *माहर (गोत्र] ७ २७टि०.३२टि०, माहर ३३टि०,३४टि०, _[शास्त्र] ४९ ३५टि०,३७टिल माधुरा वायणा [ जनागमवाचना] ९ ४३.टि०,४८टि०, मानुपोत्तर [गिरि ] ५०टि०,६०टि, *मुणिमुञ्चय [तीर्थकर ] ७ ६३टि०,६६टि०, *मूलपढमाणुओग [ दृष्टिवादप्रविभाग] ७६ ६७टि० मूलपढमाणुयोग , ७६,७७ मलयगिरिवृत्ति [ नन्दीसूत्रटीका ] ३टि०, मृगपक्षिरुत [शास्त्र] ४९टि० ३६टि०,३९टि०, *मेतज-यन्न [निग्रन्थ-गणधर ] ७,७टि० १.टि.५२ टि० मेस [गिरि ] ४,८१,८२ ५८टि०,५९टि० *मोरियपुत्त [निग्रन्थ-गणधर] ७ *मल्लि ७ व्यजकल्प [शास्त्र] ४९टि० *महल्लियाविमाणपविभत्ती [ जैनागम ] ५९ योग , ४९टि० महल्लियाविमागपविभत्ती .. ५९ रतणप्पभा [नरक] २४,२९ *महाकप्पसुत ५७ *रयगप्पभा , २३ *महागिरि [निग्रन्थ-स्थविर] ७ रयणावली [शास्त्र] ४९टि० महागिरि *रामायण , ४९ विशेषनाम किम् ? पत्रम् *रायपसेणिय-सेणीय-सेणइय [जैनागम ] ५७,५७टि० रिसभ [ तीर्थकर] २,२६ *रुयग [गिरि] रुयग २४ ग्वइणक्खत्त [ निग्रन्थ-स्थविर] ९ रेवतिवायग [ शास्त्र ४९टि लोगबिंदुसार [जैनपूर्वागम ७४,७५,७६ *लोगायत) [शास्त्र] ४९,४९टि० जागायत लोहिच्च-लोभिच्च [ निम्रन्थ-स्थविर ] ११ *लोहिच्च , ११ *वइसेसिय-वति० [शास्त्र] ४९,४९टि० *वग्गचूलिया-वंग० [जैनागम] ५९, ५९टि० *वग्धावच्च ) [गोत्र ] *तुंगिय । *वच्छ वच्छ वहिदसातो [जैनागम] वहीदसाओ , ५९ *वण्हीयाओ ५ ९टि० *वद्धमाग+सामी [ तीर्थकर ] ७.६० वरुणोववाए [जैनागम] ५९टि० *ववहार ५८ *वाउभूति [निग्रन्थ-गणधर ] ७ *वागरण [शास्त्र] ४९ *वायगवंस [निर्ग्रन्यवंश] वायगवंस *वायभूह [निग्रन्थ-गणधर ) ७टि० वासिद्ध [गोत्र] GG Jain Education Intemational Jain Education intermational Page #129 -------------------------------------------------------------------------- ________________ नन्दीसूत्र-तचर्णि-टिप्पणीगतानां ग्रन्थ-ग्रन्थकार-स्थविर-नृपादिनाम्नामनुक्रमः २' ४९टिक वेद वेद वेलंधरे विशेषनाम किम् ? पत्रम् ०वासिष्ठ गोत्र] ८टिक *वासुदेवगंडियाओ[दृष्टिवादप्रविभाग] ७७ *वासुपुज [तीर्थकर ] ६ विजगुप्पवात [जैनपूर्वागम] ७६ *विजणुप्पवाद , ७४,७५ *विजाचरणविणिच्छअ [ जैनागम] ५७ विजाचरगविगिच्छ्य ५८ *विनागुप्पवाद [जैनपूर्वागम ] ७४टि०, ७५टि० *वितत्त [निर्ग्रन्थ-गणधर ] *विमल [तीर्थकर ] विमलवाहग [कुलकर ] *वियाह [जैनागम] वियाहचूला विवागसुत *विवागसुय , ४८,६१,७० *विवाह ६५टि० *विवाह वूलिया-वियाह ,,५९.५९टि० विशेषगवती [ जनशास्त्र] २८,२९,३० विशेषावश्यक [जैनागम] २३टि०, ८२टि० विशेषावश्यक- ), ३२टि० महाभा यमलधा- ३८टि०,४२टि० रीयटीका-वृत्ति ) ५२टि० विसेसावस्सग ३२ *विहारकप्प विहारकप्प वीतरागमुत *वीवरायमुत *यार [तीर्थकर] *वीरेय जैनपूर्वागध] ७४.७५ वीरियप्पवाय ७५ संडिछ विशेषनाम किम् ? पत्रम् विशेषनाम किम् ? पत्रम् वृत्तिकृत-कर्तृ निन्दी-११टि०.१२टि०, *सद्रितंत [शास्त्र] टीकाकारौ-१५टि०,१६टि०, सहपाहुड [ जनशास्त्र श्रीहरिभद्र- २३टि०,३०टि०. *समवाअ [जैनागम] ४८,६१,६४ मलयगिर्या- ३१टि०,३३टिक, समवाय चाया ] ५०टि०,५२ टि०, समवायाङ्ग । ,६३टि०.६५टि०. ५७टि०,५८टि०, ६६टि०,६७टि०, ६०टि०,६७टि०. ६८टि०.६९टि०, ६९टि०.७२टि० ७०टि ०.७१टि०. वेत [गिरि] ६४ ७२टि०,७४टि० *वेद [शास्त्र] ४९ ०समवायागमूत्रवृत्ति , ७४टि० *सनुट्ठाणसुय समुट्ठाणनुय [देव] *ससि [ तीर्थकर ] ६ *वेलंधरोक्वाए जिनागम ] *संडिल्ल [निग्रन्थ-स्थविर ] वेसमगे देव ] *वेसमगोववार [जैनागम *संती [ तीर्थकर ] *वेसियं ) [शास्त्र] ४९ *संभव *तेसियं ४९टि० *संभूय [निग्रन्थ-स्थविर ] *तेरासियं) ४५टि० संभूय वैशिक ४९टि० *संलेहणास्त [जैनागम] ५७ वैशेषिक ४९टि० *साई [निग्रन्थ-स्थविर ] ८ ०व्यवहारभाष्य [जनागम] ४९टि०,६१ सागरानन्दसूरिनिग्रन्थ-आचाय] २९टि० व्याकरा शास्त्र] ४९टि० साती [निग्रन्थ-स्थविर ] शकराज [राजा] ८३ *सामन्ज शाण्डिन्य [निग्रन्थ-स्थविर] ८टि० सामज शिक्षा [शास्त्र] ४९टि० सामादिय [जैनागम] ३२,४९ सक [श्रमणविशेष] ४ ०सांख्य [ शास्त्र] ४९टि० *सगभदियाओ-सयभ०- [शास्त्र] ४९, *सिजंस [तीर्थकर] ६ संगभ०-सदभ०-सगडम० ४९टि० सिंधु [नदी] ६४,८२ सगर चक्रवर्ती] ७७ [तीर्थकर ] ६ *सच्चप्पवाद [जनपूर्वागम] ७४,७५ *सीह [निग्रन्थ-स्थविर ] सच्चप्पवाद , ७५ सीहवायक , 3000 wvv 22 १८ ५८ *सीपल Jain Education Intemational Jain Education Intermational Page #130 -------------------------------------------------------------------------- ________________ पत्रम् *मुपास सुवुद्धि सुवण्ण नन्दीमत्र-तन्वर्णि-टिप्पणीगतानां ग्रन्थ-ग्रन्थकार-स्थविर नृपादिनाम्नामनुक्रमः विशेषनाम किम् ? पत्रम् - विशेषनाम किम् ? पत्रम् विशेषनाम किम् ? सुद्रित [निग्रन्ध-स्थविर ] ८ सेजंभव [निर्ग्रन्थ-स्थविर ] ७ *हारिय [गोत्र] मुपडिबद्ध [देवविशेष] हारिय [तीर्थकर ०हारि०वृत्ति [हरिभद्रसूरिकृत- ३टि०, * सुप्पभ हरिभद्रमूरि [निग्रन्थ-आचार्य ] ३टि०, नन्दीसूत्रवृत्ति ] ५टि०,९टि०, [अमात्य] ४टि०,७टि०,८टि०, ३६टि०,३९टि०, *सुमति [ तीर्थकर ] १०,टि०,२०टि०, [देव ] २३टि०,२७टि०, ४०टि०,५२टि०, *मुहन्थि [निग्रन्ध-स्थविर ] ७ ३२टि०.३७टि ५९टि. मुहस्थि ४२टि०,४३टि०, हिमवन्तस्थविरावली [ जनशास्त्र] ८टि. * मुहम्म [निग्रन्थ-गणधर ] ७ ४८टि०,५०टि०, हिमवंत [गिरि] १०,६४ मुहम्म-धम्म ७,७टि० ६०टि०,८०टि मुहती [निग्रन्थ-स्थविर ] ८ट० *हग्विंसगंडियाओ [दृष्टिवादप्रविभाग] ७७ विमांडियाओ दृष्टिवादप्रविभाग] ७७ *हिमवंत+खमासमण । [निग्रन्थ-स्थविर] १० सूयगड [जैनागम] ४८,६१, *हंभीमासुरक्ख-रुक्ख ) [शास्त्र] ४९, ४९टि० हिमवंत+खमासमग १० * सूरपण्यत्ति *भीमानुरुक्ख ४९टि० ' ० हेतुविद्या शास्त्र] ४९टि. सूरपण्गत्ति भंभीयमासुरुक्ख ४९टि० । *सेजंभव [निग्रन्थ-स्थविर ] ७ ०हंभीयमासुरुक्ख ४९टि० हेमवत क्षेत्र] २२ GGom Jain Education Intemational Page #131 -------------------------------------------------------------------------- ________________ पञ्चमं परिशिष्टम् नन्दीमत्र-तचूर्ण्यन्नर्गतानां विषय-व्युत्पत्त्यादिद्योतकानां शब्दानालकारादिवर्णक्रमेणानुक्रमणिका [अस्मिन् परिशिष्टे *एतादृक्पुष्पिकाचिह्नाङ्किताः शब्दाः नन्दीमलसूत्रान्तः मूत्रकृता स्वयं व्याख्याना ज्ञेयाः. +ताक्चतुष्किकाचिहाविनाः शब्दाः चणिकता ग्रन्थसन्दर्भ स्वयं प्रयोजिता ज्ञेयाः, दोश्च शब्दाः सूत्रान्तर्गत । व्याख्याता अवबोयाः ।। शब्द पत्र-पंक्ति - कारण ८०-१३ आकरिय [णस्थियवादी] ४-९ अक्व [* अशू व्याप्तौ" णाणप्पणताए अत्थे असइ त्ति इश्चवं जीवो अक्खो, णाणभावेण वावेति ति भणितं भवति । अहवा “अश भोजने" इच्चतस्स वा सव्यत्थे असइ ति अक्खो, पालयति भुक्त चेत्यर्थः ।] १४-१५,१६ अक्खर [णाणं] ५५-२३ अखंड [ अविराधित, निरतिचार ] ३-१७ अगमिय [अण्णोण्णक्खराभिधाणट्टितं जं पढिजति तं अगमिय] ५६-२४ ।। अग्ग [परिमाण] ५२-१९। ७५-२२ अग्गेणीत ७५-२२ अचरमसमयभवत्थकेवलणाण २५-२८ अचरिम २५-२७ अनोगिभवत्थकेवलणाण २५-१६ अजोगी [ सव्वजोगनिरुद्धो, सइलेसभावहितो ] : २५-१६ अज [ आय आद्यं वा] ८-९ पत्र-पंक्ति पत्र-पंक्ति +अणियोग ७६-१५ अभिलावत्रम्वर १४-१७ अणाणुगामिक १७-२१ अरहंत १८-२० अणुकढण १७-२ अन्लान जलने दाम्य १६-२२ अगुत्तर ६९-४ अवगाह अणुनरोववाइय अवग्रह अगसिद्ध अवधि . १३-२३,२४ अणंतर अवयण [कुन्छितवयणं] ४७-२७ अण्णलिंगसिद्ध अवलंबणता ३५-२६ अण्णाण अन्यहि अण्णाणित [अण्णाणं इन अवात ३६-२३.४१-१६ अण्णाणित] अवाय ३४-२० अतिन्थ २६-१३ *अवाय ४३-११ अनिन्थकरसिद्ध २६-१७ अवि ५५-२२ अतिथिसिद्ध २६-१५ अवो [परधम्मपरिचागे अत्थ सधम्माणुगतावधारणे य अन्थिगस्थिप्पवाद ७५-२५ 'अबोहो' ति अवातो] ४६-११,१६ अत्थोग्गह ३५-१३,१४,१५ ।। अवंझ ७६--८,९ अनुयोग [ अनुरूपो योगः असण्णिसुत ४५-२१ अनुयोगः] ७६-१८ असील [ कुच्छितसीलं] ४७-२७ अपजत्तय २२-१९ अमुतनिस्सित ३२-२६ अभाव ८०-७ अंगपविद्ध अभिनिबोध १३-१८ अंगवाहिर ५७--४,५ Jain Education Intemational Page #132 -------------------------------------------------------------------------- ________________ नन्दीसूत्र-तञ्चयॆन्तर्गतानां विषय-व्युत्पत्त्यादिद्योतकानां शब्दानामनुक्रमः । ९७ पत्र-पंक्ति शब्द पत्र-पंक्ति उववात उवासंग अंगुलपुहन अंतकड अंतकइदसा अंगनमोधिण् गाण ६८-७ ६८-८,९ ६७-१० ६७-११ उवासगदसा उस्सण्ण . आ आउहणता एक्कसिद्ध शन्द पत्र-पंक्ति इंदिय १४-२८ इंदियपञ्चकग्व १४-२९ इंदियपजत्ति २२-१५ ईहा [१ ज पुण हेतूव पत्ति- ३४-२०: साधणेदि मभनमन्थस्य ४१-० : दिममधम्माभिमुहालोयणं ४६-१०. तम्मेऽवस्म अधम्मदिनुह १३ असम्मोहमविरलमयपरिच्छेदक चिनं जं न ईहा (पत्र :१), २ अतीतकाले गुदीहे वि इदं तदिति कृतमणुभतं वा ममरति, वमाणे य इंदिय-णोइदिएण या अगतरं सद्दाइअत्यमुवलद्धं अण्णतबहरेगधम्महि ईहा ति ईहा (पत्र १६), 'किमेय?' नि ईहा (पत्र आर आगिहाना ओमन्थग ओसण्ण २५-२० २२-२४ आउरपच्चरवाण आपत्रिजइ [ आख्यायते] ६२--२ आगा-ज्ञा आणापागुप जत्ति २२-१५ आणुगामिय १५-२७ आतविसोही आना ५८-१६ आदेस १-प्रकारः, २-मुत्त) ४२-१५,१५. आमिणिनोधिक १३-१८.५९, *इहा ४३-१० उद १६-२२ ५६-५ ६-१५ २२-२४ आभोयगना ३६-१० आय १३-२६ आययवान आयार ६१-२० आल [अधिकयोगयुक्तः] ४-३ आवागमीसग आवागमीसगति ४०-१,२ आपागट्टाणमेव, अवा आपागडाणा आम समंता परिपेरंनं, अहवा आपगमुत्तारियाण जंठाणं तं आपागसीसयं भण्णति] आसइज्जति [आश्रीयन्ते] ६४-२३ आहारपजत्ति २२-१३ उक्का [ दीविया ] उकालिय * अगह उम्घाडितत [उदघाटितक] उजल उजमई उढाणसुत उम्पायव उवउजत उवदेस [ व्यदिसणमुरदेसो, उपदेसो त्ति वा आदेसो त्ति वा पण्णवण त्ति वा परूवग ति वा एगट्ठा] उबदसणा उवधारणता उपरिमखुड्डागपतर [कित्तिम] ६२-२१ कष्णिया [बाहिर पत्ता ४-२ +कपहुइ २२-२० ५८-२० कप्पवईसिया ६०-११ कप्पमुत ५७-२४ कम्पिया ५५टि०५ कम्पियाम्पिय ५७-२३ ३-२३ कम्म-पवाद ७६-४ +कयार [देश्य. सं. कचबर] ३-१७ करणशक्ति कम्पिका ५५टि०५ कहण १२-१ कंत कारण ८०-१२ कालिओवएससणी ४६-१७,२० कालिय १ ६-८:५७-१४ किरिया ६८--१०,११,१२ किरियाबिसाल ७६-११,१२ २४-५ ४६-६ इड्प्पित्त इथिलिंगसिद्ध चु० १३ २२-२१ २७-८ ५२-२ ३५-२५ २४-१८ Jain Education Intemational Page #133 -------------------------------------------------------------------------- ________________ नन्दीसूत्र-तच्चय॑न्तर्गतानां विषय-व्युत्पयादिद्योतकानां शब्दानामनुक्रमः । शब्द पत्र-पंक्ति शब्द पत्र-पंक्ति कुच्छी [ दो हत्या (द्विहस्त- १९-१५ प्रमाणम्)] कुवलय [ १ कुच्छितो उवलो ९-१३ कुवलयो; सो य कण्हकायो, २ णीलुप्पलं, ३ रयणविसेसो] ६४-४ कोट्ठ ३७-११ शब्द पत्र-पंक्ति जाया [संजमजत्ता] ६२-१ जीत [ सुन] जीव १-२० जीवभाव २८-८ जोई [मल्लगादिठितो जलंतो १६-२३ अगणी] जोणि १-१७ कूड चित्र खाणी खुड खुडागपतर ११-२० ५९-८ २४-८ झाण झाणविभत्ती ५८-१४ ५८-१५ चरण ५८-८,२२ चरणविही ५८-२२ चरिम २५-२६ चहित (दे०) [मनोरथदृष्टिदृष्ट ] ४९-१ चित्त [चितिजइ जेण तं चित्तं] ५-१९ चित्तंतरगंडिका ७७-१३ ७७-१३ चिंता [जो यऽणागते य ३६-१३; चितयति 'कहं वा त ४६-१३, तत्थ कातव्वं ? इति १५ अण्णोण्णालंबणाणुगतं चित्तं चिता, २ अणेगहा संकप्पकरणं चिंता (पत्र -४६)] चुडली [ अग्गे पज्जलिता १६-२२ तणपिंडी] ५७-२५ चुल्लकप्पसुत ५७-२५ चूला ७९-११ चोदक ३८-६,७ चोदित ५०-२३ टंक ६४-४ ठवणा ३७-९ णं गण ५८-१० गणिविज्जा ५८-१४ गद्दिय(दे०) [ख्यात] ११टि०११ गब्भ [पोमकेसरा] ११-३ गमिय ५६-२३ गवेसणा [१ वीससप्पयोगु-३६-१२, न्भवणिश्चमणिचं चेत्यादि ४६-१२, गवेसणा, २ अभिलसितत्थे चेव अपडप्पजमाणे जायणा गवेसणा (पत्र ४६)] गंडिका ७७-१३ गाढ ५-१५ गिहिलिंगसिद्ध २७-४ गुण *गुणपञ्चतिअ-इय २०-१३, २३-१४ *गुणपडिवण्ण १५-१८ गुरु [गृणाति शास्त्रमिति गुरुः] २-२ ६१-२० छदुमत्थ २४-३ ५०-८ ४२-१३,१४, ४७-४,५, ५५-२३ गंदिघोस ३-५ णंदी १-२,८ णाग ६०-७ णागपरियाणिय ६०-७ णाण-नाण १३-११,१२,१३, २०-९ णाणप्पवाद णाय ६६-८ णिच्च ५६-५ णिचं ४-१० णोइंदिय ३५-१६ णोइंदियत्थावग्गह ३५-१९ णोइंदियपच्चक्ख १५-११ जग [१ खेत्तलोगो १-१७,२-१,३ (पत्र १), २ सव्वसण्णिलोगो, ३ सत्त-प्राणी (पत्र २)] जतपडागा [संजयपताका] ३-५ जमलट्ठित १७-३ जयति १-१७२-२० गोयर जलोह घोस ३५-२१ जसवंस ९-६ तर २५-१ Jain Education Intemational Page #134 -------------------------------------------------------------------------- ________________ नन्दीसूत्र-तच्चय॑न्तर्गतानां विषय-व्युत्पत्त्यादिद्योतकानां शब्दानामनुक्रमः । ९९ शब्द +तवोमता-तपोमयाः तित्थ तित्थकरसिद्ध तित्थसिद्ध तिरियलोगमझ तिसमयाहारग तूरसंघात तेलोक पत्र-पंक्ति ३-९ २६-११,१२ २६-१६ २६-१० २४-१० ४८-२५ थिर ४-२ दरित दश्चमण दञ्चिदिय दस-सा दसा दंसग दंसिजति दिद्विवाओवदेस दिदिवातअसणी दिद्विवातसगी दुआधरिस दृष्टिपात दृष्टिवाद ३५-१७ १४-२८ ६८-७,८ ६०-१५ २०-१० ५२-२ पावयणी शब्द पत्र-पंक्ति शब्द पत्र-पंक्ति पमादप्पमाद ५८-२,३ पइण्णग ६०-२३,२४ परंपरसिद्धकेवलणाणं २६-२:२७-२२ पउर ६-११ परिकड्ढिय पगभ ११-६ परिकम्म ७२-१६ पच्चक्ख १४-१७:३१-८ परिघोलग १७-२३ पच्चक्वागापवाद __ ७६-६ पग्वुिड ४-५,२० पच्चाउट्टण+ता ३६-२३ परोक्खगाण ३१-५ पजत्तय २२-१८ पल्लव ६४ टि०५ पजत्ती २२-११ पसत्थ झवसाण १८-२१ पज्जय १३-२५ पसिण ६९-२४ पजव १३-२४ पसिणापसिण ६९-२४ पजात १३-२६ पंक पडिवत्ती ६२-५ पागायु ७६-१० पडिवाती १९-१४ पारियल्ल ३-९ पढमसमयसजोगिभवत्थ १२-५ केवलणाण २५-१८ पासओ अंतगय १६-१० पढमसमयअजोगिभवत्थ पासणता २४-३ केवलणाण २५-२२ पासतो पणगजीव १८-३ पुष्फचूला ६०-१३ पणीत ४९-५ पुष्फिया ६०-१३ पगोल्लण १६-२३ पुरतो १६-२३ पण्णत्त १३-१३,१४,१५,१६,१७ पुरतो अंतगय १६-९,११:१७-५ पण्णवग ३८-७,८ ७५-१६ पण्णवणा ५८-१ पूड्य ४९-४ पण्णविजंति ५२-१ १७-२२ पण्णा १३-१४.१६ पोरिसिमंडल ५८-७ पण्ह ६९-२० पोरिसी ५८-४ ३७-१० प्रज्ञापना ५८ टि०१ पत्तेयवुद्ध २६-२३ पत्तेयबुद्धसिद्ध २६-२८ +फड्डग १७-१२ पदीव १६-२३ पब्भार ६४-५ बंधु २-९ पभव २-२१ वुद्धबोधित २६-२८ ४७-२० ४७-१९ ७१-७ पुच परंत धम्मकहा धरणा धारणा ६६-९,१० ३७-७ ३४-२१:३७-९; ४१-१८ ४३-११ पतिवा *धारगा नाण नागस्वर निरियावलिया २०-९ ४४-१५ ६०-९ Jain Education Intemational Page #135 -------------------------------------------------------------------------- ________________ बुद्धी म भद्रम् भाव नन्दीसूत्र-तचूर्ण्यन्तर्गतानां विषय-व्युत्पत्त्यादिद्योतकानां शब्दानामनुक्रमः . शब्द पत्र-पक्कि शन्द पत्र-पंक्ति शब्द पत्र-पंक्ति वुद्धबोधितसिद्ध २७-१ मरण ५८-१५ वग्गचुला बुद्धि ५०-९,१० मरणविभनी ५८-१६ वड्ढ्तु ३६-२४ महत्थ ११-२०,२१ वड्डी १८-२० महल ५९-८ वण ५-२१ भगवंत ४८-२१ महाकप्पसुन ५७-२५ वण्णस्वर ४४-१८ महात्मा २-२३ वहिदसाओ ६०-१५ भवन्थकेवलणाग २५-११ महापनकखाण वमंति ५०-२५ भवपञ्चनि महापाणवणा -५८-१ चय ८-५ महित १९-२,३ वर ५-१६:६-१८ भावमण ३५--१८ मंडलप्पवेस वंजण ३५-२१ भाविदिय १४--२९ मंता *वंजणक्खर । भासापजत्ति २२-२६ माता वंजगवर ४५-४ माधुरा वायमा बंजणोग्गह-णावग्गह ३५--४,५,६,७ मिच्छा ५०-७ वंस ९-५ मगणा [१ विसे मत्थस्स २६-११: ५०-७ मिच्छादिद्वित वागरण अण्णय-इरेगधम्मसमा-४६-११,१४ ६९-२० लोयणं मगाणा भण्णति (पत्र-३०)। मुद्दिया वातगा-यगा विमेसचम्मण्णेसणा मरगणा, २ अ मूलपढमाणुयोग ७७-२,३ वायक-ग ९-२,११ भिलसियस्थम मणोवयणकाएहिं मेधा ३६-१ विटलतराग २३-६,९,११:२४-२९, जायगा मगणा (पत्र ४६)] मग्गओ अंतगय १६-१०,१४:१७-६ ३-२३ विक्कम २-१६ मांगतो १७-१ रखति ६-११ विजणुप्पवात ७६-७ मझगत-य 10 रुयग [अप्पदेसो रुयगो, २४-९ विजा ५८-८,१० तिरियलोगमज्स] विजाचरणविणिच्छय ५८-१० मणपति २२-१७ रूढ विन्जुत ६-१४ मणपजयगाणं नाणं १३-२६,२८ विगिच्छय ५८-९ मणपन्जव १३-२७ लद्भिअक्वर विण्णाण ३६-२५ मणपज्जव+नाण १३-२५,२८ लेस्सा वितिमिरतराग २३-७,९,११ मणपज्जाय+जाण १३-२७ लोगबिंदुसार ७६-१४ २५-४,५ २४-२ १३-१३ मति ५०-९,१० वक्खाण ११-२२ विपाक ७०-२३ मतिअण्णाण ३२-९,१० वक्वाणकण ११-२२ विपाकसुत ७१-१ मतिगाण ३२-९,१० नम्ग ५९-१०:६६-११; विपुलमती २२-२६ मनःपर्यय १३-२५ ६८-१२:६९-८ विभत्ती ५८-१४,१५ रय मणित विधि Jain Education Intemational Page #136 -------------------------------------------------------------------------- ________________ नन्दीसूत्र-तच्चूय॑न्तर्गतानां विषय-व्युत्पत्यादियोतकानां शब्दानामनुक्रमः । पत्र-पक्ति शब्द पत्र-पति पत्र-पंक्ति १३-२२ शब्द विमाणपविभत्ती वियाण वियाह वियाहचूला विरायने विविध विसाल विमुद्धतराग शब्द सजग सचबहुअगगिजीव सवतो संकिलिङ्क १८-५ . १७-११,१२ १९-५ १-१८.१९ श्रुतम् ६५--१२ ___ सइंसभाव सच्चप्पवाद समोगिभवत्थंकवणाण ७६-१२ सजोगी ७६-१ संज्ञा ४७-५ +संताणचोदक +संधर संलह गागत संकः [धन, *सण्यास ४४-४ विहार ४५-२१,२६ संख्य ४५-२५.२६ सिद्ध केवलणाम २८-८ सुत सुतगिन्सित ७४-७ ३२-१०,११ सण्गक्खर विहारकप्प ५८...२१ सम्गित वीतरागमन ५८--१८ सगी-संजी वीमंसा [१ णियः विवादि. ३६-१३ सनत [सं. स्वत: एहि दल-भावति विरि सती ४६-१३. सतंबुद्ध वी मंसा भणति ( पत्र ३६), १५,१६ राभाव २ आत-पर-इह-परस्थयहिला सम ऽहिनविमरिसो वीमनः पत्र समता ४६), अवा संकप्पतो समाण चेर विविधा आमरि सणा वोमंसा (पत्र ४६)।] सनुढाणसुम चारिय-पवाद समंता ६३-१० सम्मत्त ६२-२ सयंवुद्धसिद्ध ४-१९ सरीरपज्जती ६२--५ सललित वेणइय ६१-२१ सलिंगसिद्ध व्यञ्जन सवण व्यञ्जनाक्षर सवणता ६४-२२ सुयअण्माण सुयणाण ५०-२४ मुसवण ६-६ मुस्सव ग १७-१२ सम्पत्ती १२-२,३ वृत्ती वेला वेद २६-२३ २२-१४ हायमाण-हस्समाण २-१५ हेदिमखुड्डागपतर २४-१९ १२-२ हेतृवदेसअसगी-हेतुवाय४७.१०.११ ३५-२६ हेतृवदेससगी-हेतुवायस ४७-४,१० Jain Education Intemational Page #137 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अशुद्धम् शुद्धम् 'भावो १५ पसत्धेसु पसत्थेसु ५-६-११ ९ स्स परिपरंतेहिं परिपेरंतेहिं सर्वासु सूत्रप्रतिषु हारि० मलय० ॥ १० बाउजल चितिजइ चूर्णिसमन्वितस्य नन्दिसूत्रस्य शुद्धिपत्रकम् पृष्ठम् पक्तिः अशुद्धम् शुद्धम् पृष्ठम् पक्तिः 'भावो(? जीवो) . १ १२ भणति भणति । १७ २७ २११ १७ २८ तवो तवो, नियमो नियमो, वा उजल १९ चिनिनइ प्रचुरः प्रचुरः, उसभ. उसभं० तुंगियायणे 'तुंगियायणे' २८ अष्टाविंश सप्तविंश ९ २२ 'प्पेहाभा 'स्पेहाऽभा 'खमासणे 'खमासमणे भूतादण्ण भूयदिण 'भावणा भासणा धारेव्य धारेव्वं । अहिंसा २१ १० पूर्वाद्ध निम्नप्रकारेण ज्ञेयम् - गमण १ परावत्तरगो लाभो ३ भेदा य ४ बहुपरराव ता ५। २२ १० १४ १४ च. १४ १८ सभेदं २३ २१ सभेदं। १२ १२-१३ ओहिनाणं डे०ले. ॥१४ १० 'साओ 'सा उ तेयाभासं तेया-भासं ४र्थी टिप्पणी निरुपयोगिनी । 'गम्भकति गन्भवति 'वासासाउ वासाउ 'शते 'सते मज्झगयं ? से सा(दो पासय समंता त्तिसव्या मज्झगय! मज्झगयं से सापासय(दो पासे य) 'हितं [वा] । से मंता त्ति मधा 'स' स पेरंतहि पेरंतेहि २५ ५ चूर्णिकृता वृ चूणिवर्णना वर्णना उवरि जाव उवरि जाव लस्स लस्स अं सत्तरज्जूओ सत्तरज्जुओ भणितं भणितं । 'राग-ति 'रागं ति 'णाण च ‘णाणं च । से तंकि से कि तं भवति भवति, 'हिता "द्विता अं अण्णोण्ण' अण्णो (? पण का पर्यव *दिया, अजीवा 'दिया। अजी[वभा]वा अणुरतण अणु-रतण सिद्धऽधि सिद्धाधि श्रुतं 'स्स परिपेरंतहि परिपेरंतेहि जोइट्टाणं एवमेव ओहिणाणं ओहिणाणं 'पर्यब जोइट्टाणं एवमेव ओहिणाणं ओहिणा १२ अगणि अगणि Jain Education Interational Page #138 -------------------------------------------------------------------------- ________________ शुद्धिपत्रकम् । पृष्ठम् पक्तिः अशुद्धम् शुद्धम् चिता ४७ ११ २० चिता जोगे "विसय[अवि समद्दिर्ड्सि सामध्यम् , तस्त्रिमेदः, वंग पृष्टम् पक्तिः अशुद्धम् शुद्धम् ३१ २० एवं लक्खणा-ऽभिधा एवंलक्खणाऽभिधा तः ३२ १५ सच्चेव 'बृत्ती 'वृत्ती 'वृत्ता 'वृत्ता णोइंदियावाए। णोइंदियावाए ६ । ३८ १९ मल्लगदिटुंतेणं! मल्लगदिट्ठते ? मल्लगदिट्टतेणं मलगदिटुंते णं सद्दाइ !, सद्दाइ, सद्दे त्ति, सई ? ति, १० सुमिणे सुमिणे ? सहा त्ति सद्दो त्ति सद्दाइ, सद्दाइ, ४. १४ 'बोहग ४३ १. उग्गहो, उग्गह, भाणितब्बा माणितमा देविदो विमणा शु० । पइणग्गा 'जोग्गे "विसयवि सम्मदिदि सामथ्र्यम् तस्त्रिभेदः, वंग देविदों विमाणा शु० हारिवृत्तौ च । पइण्णगा यत् 'वूहं किच' आहरणा सुहुम' भवतीति शा 'टिप्पणी यत 'बोह ६८ ८२ ११ १ 'वूह' किच्च आहरणा, सहुम भवतीतिशा 'टेपणि لم . Page #139 -------------------------------------------------------------------------- ________________ PRAKRIT TCXT SERIES PUBLISHED WORKS. 1. ANGAVIJJA. - Denay Quarto size.. Tages - +4+372.. I'rice Rs. 21/ Angavijja is published for the first time by the Prakrit Text Society. It is critically edited by Muni Shri Punyavijayaji, with Engli Introduction by Dr. Motichandra and Hindi Introduction by Dr. V. S. Agarwal. Arigaviji is an ancient Prakrit Text relating to prognostication on the basis of bodily signs. The work is of unknown: authorship but was considered to be of high antiquity and great sanctity baring been delivered by Mahavis himsell. its internal evidence points to its having been finally compiled at the end of the Kushan period, about 4th Century A. I). It is nichts important docuinent firsti, ior the bistory of Ir.kiit language and secondly, for the cultural history of India. It contain: budiods of lists of all descriptions, for example, seats in ture, utensil. container, Towers. Lee, D l rames, food and drinks, bed steads, conveyouces textiles ornament, jewellery, coins, birds, ananals, arrows, weapons, Lats, god, goddesses, et PRAKRITA-PANGALANI. Fart I. Donny Detero size.. Page - 700.. l'rice - Rs. 10 Präkritapaingalan. is a text on Irakrit wid Apabhrama Metres. It is critically edited with three Sanskrit commentaries on the basis of the two earlier editions and further available manuscript material by Lr. Bholashankar Vya, a distinguished member of the Hindi Department of the banaras Hind: University. He has also added Hindi translation with philological notes and glossary of Brakrit and Apabliransa words. 3. CAUPPANNAMAL TURISACARIYAM. - Denny Giarto size.. Pages - 8 + 8 +34. Irice RS Lauppannamaläpurisacarivan: is a gieat biographical work by Acharya Silānka of the li Cintury A. D. It is critically edited by Pt. Anvitial Mohanlal, Research scholar of Prakrit Text Socie Its Introduction is written by Dr. K. L. Bruhu. It gives the lives oí 51 great nen levered by the Jains, viz. 24 Tirthankaras, 12 Chakravartins, Baladevas and 9 Väsudevas. 1. PRAKRITAPAINGALAN Part II -Demy Octal size.. Pages 16+10+592 1:. I rice K.. 15 The Part I of this work ou lakrit metres is published as the Second Volume of the Prakrit Text Scries. Part II contains the editor's comprehensive Introduction dealing with the problems of the Prakrita Paingalari together with a critical and comparative study of the metres that form the subject inatter, as well as, the exact nature of ti:e language of the original text, and also a literary assessment of the portion which the author intended to serve as illustrations to the Matrika and Varnika metres dealt with by him. 3. AKHYINAKAMAMIKOS.1. - Denny Quarto size.. Pages S +16 +20 + 422.. Frice Rs. 21/ Akhyānakamaņikcsa is critically egited for the first time by Muni Shri Punyarijayaji. It is written by Nen.ichandra and is commented upon by Imradeva of the 12th Century A. D. This book is a mine of historical and legendary stories in Prakrit and Apabhranića. 6. PALMACARIA Part 1. - Demy Quarto size.. Pages 8 + 10 +376..Rs. 18/ This is the carliest Frakrit version of the story of Rana It was written in about the third Century A. D. by Vimali. The work is printed with Hindi translation. It is crited by Yuni Shri Punya vijayaji and translated by I'rof. S. M. vora, M. A, Jainadur Nts Introduction is written by Dr. V. M. Kulkarni. Jain Education Intemational Page #140 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Jan Education Interational Lor-Private Personalise www.meluracy.org