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त्रैवर्णिकाचार |
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स्थूल हिंसा, स्थूल झूठ, स्थूल चोरी, स्थूल कुशील सेवन और स्थूल परिग्रह, इन पांच पापके त्याग करनेको अणुव्रत कहते हैं ।। ७३॥
भाव - हिंसा |
स्वयमेवात्मनाऽऽत्मानं हिनस्त्यात्मा कषायवान ।
पूर्व प्राण्यन्तराणां तु पश्चात्स्याद्वा न वा वधः ॥ ७४ ॥
यह आत्मा जब कषाययुक्त होता है तब प्रथम स्वयं अपने द्वारा अपना ही घात कर लेता है । पश्चात् अन्य प्राणियोंकी हिंसा हो या न हो ।
भावार्थ—क्रोधादि कषायों के उत्पन्न होनेको हिंसा कहते है । जब यह आत्मा क्रोध करता है तब अपनेही स्वरूपका घात कर लेता है । ऐसी अवस्थामें बाह्य प्राणोंका व्यपरोपण-घात हो या न हो, किन्तु भाव-हिंसा तो हो ही जाती है। इसलिए कषायाका त्याग करना उचित है ॥ ७४ ॥ बाह्य स्थूल हिंसाका त्याग ।
सङ्कल्पात्कृतकारितमननाद्योगत्रयस्य चरसत्वान् ।
न हिनस्ति यत्तदाहुः स्थूलवधाद्विरमणं निपुणाः ॥ ७५ ॥
संकल्प - पूर्वक मन, वचन, काय, और कृत, कारित, अनुमोदनासे त्रस जीवोंके नहीं मारनेको निपुण पुरुष स्थूल अहिंसाणुव्रत कहते हैं ।। ७५ ।।
अहिंसाणुव्रत के पांच अतीचार ।
छेदनबन्धनपीडनमतिभारारोपणं व्यतीचाराः ।
आहारवारणाऽपि च स्थूलवधाद्व्युपरतेः पञ्च ॥ ७६ ॥
'द्विपद अथवा चतुष्पद जीवोंके नाक कान छेदना, उन्हें रस्सी वगैरह से बांधना, उन्हें चाबुक वगैरह से पीटना, उनपर उनकी शक्तिसे अधिक बोझ लादना, और उन्हें खानेको रोटी, पानी, घास वगैरह न देना, ये अहिंसाणुव्रतके पांच अतीचार हैं। अहिंसाणुव्रत पालन करनेवालेको इन पांच अतीचारोंका भी त्याग करना चाहिए ॥ ७६ ॥
सत्याशुव्रतका स्वरूप ।
स्थूलमलीकं न वदति न परान्नादयति सत्यमपि विपदे । यत्तद्वदन्ति सन्तः स्थूलमृषावादवैरमणम् ॥ ७७ ॥
स्थूल - मोटी झुंठ न बोलना और न दूसरोंसे बुलवाना, तथा जिसके बोलनेसे किसीके ऊपर विपत्ति आ जावे ऐसी सत्य भी नहीं बोलना, इसे सज्जन पुरुष सत्याणुव्रत कहते हैं ॥ ७७ ॥ सत्याणुत्रतक पांच अतीचार !
परिवाद रहो भ्याख्यापैशुन्यं कूटलेख करणं च ।
न्यासापहारिताsपि च व्यतिक्रमाः पञ्च सत्यस्य ॥ ७८ ॥
'मिथ्या उपदेश देना, किसीके गुप्त रहस्यको प्रकट करना, चुगली अथवा निन्दा करना, झूठी बातें लिखना, और “किसीका धरोहर हरना, ये पांच सत्याणुव्रत के अतीचार हैं । सत्याशुवतीको इनका त्याग करना चाहिए ॥ ७८ ॥