Book Title: Kalpantarvcahya
Author(s): Pradyumnasuri
Publisher: Sharadaben Chimanbhai Educational Research Centre
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१६ ]
मेघकुमारकथा
पुव्वाणुभूय-दुक्खं सरसु तुमं जं कहामि मेह- मुणी ! | इओ भवाओ तइए सहस्स जूहाहिवो दित्तो ॥ १७३ ॥ उत्तम लक्खण- जुत्तो वेयड्ढे हत्थिरायछतो । जाओ हु सुमेरुपहो सेओ भीओ दवग्गीओ ।। १७४ ॥ गिम्हे हत्थ - सहस्सं मुत्तुं तिसिओ य पंकिल - सरंमि । झत्ति पविट्ठो सलिलं पत्तं नो कद्दमे खुत्तो ।। १७५ ।। विद्धो य सत्तु-करिणा पिट्ठीए तिक्ख- दंत- घाएहिं । तव्वेयणं सहित्ता सत्त-दिणं मरिय पुण जाओ ।। १७६ ।।
मेरुप्पह-नाम- हत्थी विंझ - गिरिंमि य दवानलं दछु । जाई - सरणं जायं वासाइ-मज्झ-पंतिंमि ॥। १७७ ।। जोयण- मित्तं मंडलमवसोहित्ता सुहेण चिट्ठा । सत्तसयहत्थि - जुत्तो दवानलं दठ्ठे भय-भीओ ।। १७८ ॥
मुत्तुं पुरिसागारं पविसइ जा मंडलंमि ता पासे । सत्ते बहुवि वि य संकोचिय- तणू य तो चिट्ठइ ॥ १७६ ॥
गत्तं कंडूइत्ता पायं जा मुंचइ तहिं ससयं । पेसित्ता य पविट्ठ तहेव ठिओ ति पाएणं ।। १८० ॥
पाणाइणुकंपाए मणुयाउं बंधि ं तुमं जाओ । तं वयणं सोऊण मेहो संवेगमावण्णो ॥ १८१ ॥
मुत्तुं लोयण- जुगलं संघट्टंतु य साहुणो देहं । नो कुप्पे ताणुवरिं अभिग्गहो इत्थ मे होउ ।। १८२ ॥
एवं खित्तो मग्गे जिणेण वीरेण मेहमुणि-वसभो । काऊण य उग्ग-तवं पत्तो विजये विमाणंमि ।। १८३ ॥
[ कल्पान्तर्वाच्यः
इइ मेघ - कहा .....
अथ पुण से विभावे लोगच्छेरय-भूए अणंताहिं उस्सप्पिणीहिं ओसप्पिणीहिं विइक्कंताहिं समुप्पज्जइ नामगुत्तस्स वा कम्मस्स अक्खीणस्स अवेइअस्स अणिज्जिण्णस्स उदएणं जं णं अरिहंता वा चक्कवट्टी वा बलदेवा वा वासुदेवा वा अंतकुलेसु वा पंतकुलेसु वा तुच्छकुलेसु वा दरिद्दकुलेसु वा किविकुले वा भिक्खाग कुलेसु वा माहणकुलेसु वा आयाइंसु वा आयाइंति

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