Book Title: Nabhakraj Charitram
Author(s): Merutungsuri, 
Publisher: Dosabhai and Karamchand Lalchand

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Page 27
________________ ना. च. |२३| . निश्चित्येत्यवदद् भ्रातः !, पातकात् श्वभ्रपातुकात् । न किं बिभेषि यद्देव-- द्रव्यभोगमपच्छासे १ ॥ ५३ ॥ भावार्थ - एम निश्चय करीने नाना भाइने कथं के-बन्धु ! नरकादि भयंकर गतिमां पाडनार पापथी शुं तुं डरतो मथी ? के जेथी देवद्रव्यना पण उपभोगनी इच्छा करे छे. ॥ ५३ ॥ देवद्रव्येण यत्सौख्यं यत्सौख्यं परदारतः । अनन्तानन्तदुःखाय, तत्सौख्यं जायते ध्रुवम् ॥ ५४ ॥ भावार्थ – जे मनुष्य देवद्रव्यना उपभोग बड़े तेपज परखी सेवन द्वारा जे मननुं मानी लील सुख मेळवे छे, ते सुख निःशंक अनंतानंत दुःख प्राप्त करावनार थाय छे. ॥ ५४ ॥ जैन सिद्धान्तमां पण कधुं छे. के -- " apra विणासे, रिसिघाए पवयणस्स उड्डाहे । संजयच उत्थभंगे, मूलग्गी बोहिलाभस्स " ॥ ५५ ॥ भावार्थ -- चैत्यना द्रव्यनो विनाश करवाथी, ऋषिनो घात करवाथी, शास्त्र विरुद्ध प्ररूपणा करवाथी, तेमज संयतिना चतुर्थव्रतनो भंग करवाथी, सम्यक्त्वना मूलमाज अग्नि पडे छे; अर्थात् सम्यक्त्व नाश पामे छे. ॥ ५५ ॥

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