Book Title: Dharmratna Prakaranam
Author(s): Punyavijay
Publisher: Sarabhai Manilal Nawab Ahmedabad

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Page 247
________________ धर्मरत्नकरणम् ।१०६॥ परहितार्थकारी गुणः २० तदर्शने च सहसा, सा पर्षद् भृशमुपागमत् क्षोभम् । तो कुमरो तं करिणं, बप्पुकारेइ धीरविउं ॥१८२॥ अविहस्तो निजहस्तं, हस्ती सङ्कोच्य तदनु शान्तमनाः । काउं पयाहिणं सपरिसस्स मुरुणो तओ नमइ ॥१८३॥ अथ यतिपतिना जगदे, मतङ्गजोऽसावहो महायक्ष ! । भीमं अणुसरिय इहं, तमागओ करिवरो होउं ॥१८४॥ कालीभवनाद्भवता, पूर्वमसौ क्षितिपतनय आनिन्ये । इहयं नियपडिपुत्तयकणगरहनरिंदरक्खाए ॥१८५॥ संप्रति निजनगरं प्रति, नेतुं भीमं भृशं त्वमुत्सहसे । तं आयण्णिय करिवररूवं सो झत्ति संहरइ ॥१८६॥ भास्वदलङ्कृतियुक्तं, प्रत्यक्षं यक्षरूपमाधाय । पभणइ नाणमहोदहि !, मुर्णिद ! एवं चिय इमं ति ॥१८७॥ विज्ञाप्यं किन्त्वेतत् , पूर्व कक्षीकृतेऽपि सम्यक्त्वे । मह मणभवणे लग्गा, कुलिंगिसंसग्गओ अग्गी ॥१८८॥ तेनाशु दारुदाहं, साऽदाहि विशुद्धदर्शनसमृद्धिः। तो हद्धी अप्पिद्धीवणेसु जक्खो अहं जाओ ॥१८९॥ तस्मात् प्रसद्य भगवन्नारोपय मम विशुद्धसम्यक्त्वम् । कणगरहरक्खसाइहि, भणियमम्हंपि इय होउ ॥१९॥ अथ गुरुगा सम्यक्त्वं, दत्तं नृपयक्षराक्षसादीनाम् । कुमरो कुलिंगिसंगाइयारमालोयए गुरुणो ॥१९॥ अतिनिर्मलसम्यक्त्वो, भीमो मुनिपुङ्गवं नमस्कृत्य । कणगरहरायभवणे, रक्खसमाईहिं सह पत्तो ॥१९२।। कनकरथोऽपि नरेन्द्रः, प्रभूतसामन्तमन्त्रिपरिकलितः। नमिउं भणेइ कुमरं, सव्वमिणं तुह पसाउ त्ति ॥१९३॥ यज्जीव्यते यदेतद्, राज्यं प्राज्यं यदेष पुरलोकः । जं एयस्स अतुच्छा, लच्छी किर जं च सम्मत्तं ॥१९॥ तदयं लोकस्तव नाथ 1, किङ्करः समुचिते ततः कार्ये । तह वावारेयव्यो, जह होइ भिसं अणुग्गहिओ ॥१९५॥ तत्र मीमकुमारकथा। ॥१०६॥ Jain Educat For Private & Personal Use Only mww.jainelibrary.org

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