Book Title: Sramana 2011 10
Author(s): Sundarshanlal Jain, Ashokkumar Singh
Publisher: Parshvanath Vidhyashram Varanasi

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Page 25
________________ १८ : श्रमण, वर्ष ६२, अंक ४ / अक्टूबर-दिसम्बर २०११ विद्यानन्द ने तत्त्वार्थश्लोकवार्तिक में क्रिया को द्रव्य की वह परिस्पन्दात्मक पर्याय माना है जो देशान्तर प्राप्ति में हेतु होती है तथा वह गति, भ्रमण आदि भेदों से युक्त होती है।५७ अब प्रश्न यह है कि क्रिया अथवा गति में तो निमित्त कारण धर्मास्तिकाय द्रव्य है, फिर काल भी उसमें निमित्त कैसे हुआ? यहाँ समझना यह है कि धर्मास्तिकाय जहाँ पदार्थों/द्रव्यों की सर्वविध गति में सीधा निमित्त कारण है वहाँ काल द्रव्य उस गति/ क्रिया की निरन्तरता या अवधि का ज्ञान कराता एवं उसमें निमित्त भी होता है। यदि काल/समय न हो तो क्रिया की अवधारणा घटित नहीं हो सकती। व्याकरण दर्शन में जहाँ 'अमूर्तक्रियापरिच्छेदहेतुः काल'५८ कहा गया है वहाँ जैनदर्शन में क्रिया की निष्पत्ति में भी काल को हेतु कहा जाता है। परत्व-अपरत्व शब्दों का प्रयोग काल के सन्दर्भ में ज्येष्ठ-कनिष्ठ, नया-पुराना आदि अर्थों में अथवा पूर्वभावी पश्चाद्भावी के अर्थ में होता है। काल को स्वीकार किए बिना परत्व-अपरत्व बोध होना कठिन है। इस प्रकार वर्तना को प्रथम समयाश्रित, परिणाम को द्वितीयादि समयाश्रित अपरिस्पन्दात्मक पर्याय तथा क्रिया को बहसमयाश्रित परिस्पन्दात्मक गति, चेष्टा आदि कहा जा सकता है। परत्व-अपरत्व के स्वरूप में कोई विवाद नहीं है। वर्तनालक्षण काल परमार्थ काल है तथा परिणामादि लक्षण काल व्यवहार काल है।५९ काल का स्वरूप : जैन दर्शन में काल अमूर्त है तथा वर्ण, गन्ध, रस और स्पर्श से रहित मान्य है। वह अगुरुलघु गुण युक्त होता है। उसका प्रमुख लक्षण वर्तना है। यह अप्रदेशी किंवा एक प्रदेशी होता है। जैन ग्रन्थों के अनुसार प्रत्येक आकाश प्रदेश पर एक पृथक् कालाणु की सत्ता है। लोकाकाश असंख्यात प्रदेशी है, उसके प्रत्येक प्रदेश पर रत्नों की राशि की भांति काल द्रव्य के एक-एक कालाणु अवस्थित हैं।६१ ये भी आकाश प्रदेशों की भाँति असंख्यात हैं, किन्तु व्यवहार नय से अनन्त पर्यायों की वर्तना में निमित्त होने से यह काल अनन्त भी कहा जाता है।६२ इन कालाणुओं में स्निग्ध एवं रुक्ष गुण का अभाव होने से इनका प्रदेश प्रचय अथवा संचय नहीं बन पाता है। इसीलिए काल द्रव्य का कायत्व अथवा अस्तिकायत्व मान्य नहीं है।६३ ये कालाणु निरंश एवं निष्क्रिय होते हैं। काल अनन्त समयस्वरूप होता है। तत्त्वार्थसूत्र में 'सोऽनन्तसमयः'६४ सूत्र के द्वारा इसका स्पष्ट उल्लेख हुआ है। 'समय' काल की सूक्ष्मतम इकाई है, जिसे एक सेकण्ड का भी असंख्यातवाँ भाग कहा जा सकता

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