Book Title: Nandanvan Kalpataru 2006 00 SrNo 17
Author(s): Kirtitrai
Publisher: Jain Granth Prakashan Samiti

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Page 24
________________ - F (४) विलापः कुतोऽयम् ? सदाऽर्थोष्मणा योषितो हन्त भुक्ताः सुताशीलमङ्गे विलापः कुतोऽयम् ? ॥१॥ रेषामकीतौ रुचिर्जन्मसिद्धा निजाऽकीर्तिहेतोः प्रलापः कुतोऽयम् ॥२॥ सतां शातने नैव लज्जा तवाऽभूत् निजोत्सादने तर्हि तापः कुतोऽयम् ॥३॥ प्रयुक्तं नयज्ञैः शठे शाठ्यमेव मुधा दीयते भूरि शाप: कुतोऽयम् ॥४॥ श्रियाऽपीप्सितस्सन्ततं लम्पटानाम् त्वदीयानुभावो दुरापः कुतोऽयम् ॥५॥ कियच्चित्रमाभाति पुत्रे तवोक्तम् कुले धीमतां दैव ! पापः कुतोऽयम् ॥६॥ मलोच्छालनं पुण्यराशौ परेषाम् स्वपापेषु कर्णोपजापः कुतोऽयम् ॥७॥ न जानाति को विक्रमन्तेऽबलासु त्वयि प्रोत्थिते शम्भुचापः कुतोऽयम् ॥८॥ व्यतीतेऽखिले जीवनेऽकृत्यलिप्ते . प्रयाणक्षणे तेऽनुतापः कुतोऽयम् ॥९॥ - १३ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org

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