Book Title: Agam 07 Ang 07 Upashakdashang Sutra
Author(s): Ghisulal Pitaliya
Publisher: Akhil Bharatiya Sadhumargi Jain Sanskruti Rakshak Sangh

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Page 36
________________ आनन्द अमलीपासमा अतिधार - - तयाणंसरं ष णं पोसहोषवासस्स समणोषासपणं पंच अइयारा जाणियच्या, ण समायरियब्वा, तं जहा-अप्पडिलेदिय-दुप्पडिस्लेहिय-सिज्जासंधार, अप्पमज्जियलुगणमाजिय-विजांभारे, महिला दुप्पडिलेहिय-उच्चार-पासव भूमी अप्प. मज्जिय-दुप्पमज्जिय-उच्चारपासवणभूमी, पांसहोचवासस्स सम्म अणणुपालणया। ___ अर्थ-पौषधोपवास नामक ग्यारहवें व्रत के पांच अतिचार जानने योग्य हैं आमरण योग्य नहीं हैं १ अप्रत्युपेक्षित-दुष्प्रत्युपेक्षित शय्या-संस्तारक--बिछौने, ओढ़ने तथा आसनादि को प्रतिलेखना नहीं करना, तमा ध्यानपूर्वक प्रतिलेखन न कर बेगार टालना। २ अप्रमामित-दुष्प्रमाजिस शय्या-संस्तारक--बिछौने आदि की विधिवत् प्रमाना महीं करना और उपेक्षापूर्वक प्रमार्जना करना। ३ अप्रत्युपेक्षित-दुष्प्रत्युपेक्षित उच्चार-प्रवण भूमि-माल-मूत्र आदि परठने के स्थान की प्रतिलेखना नहीं करना अथवा अविधि से उपेक्षा पूर्वक करना । ४ अप्रमाजित-दुष्प्रमाणित उच्चार-प्रस्रवण भूमि-मल-मूत्र परठने से पूर्व उस भूमि को नहीं पूंजना अथवा पूर्ण विधि से पूरा स्थान नहीं पूंजमा। ५ पौषधोपवास का सम्यक् अप्रपालन-पोषध का विधिपूर्वक पालन नहीं करना । इसमें घोष सारे बोषों का समावेश विवेधन-१ पौषध - "पुष्टि धर्मस्प दधातीति पौषधः"-धर्म को पुष्ट करने वाली किया विशेष। २ उववास- उपवास--"यामाष्टकम् अमोमनम् उपवास स विज्ञयः। उपायप्तस्य दोषेभ्यः, सम्यावासो गुणः सह उपवासास वितयः सर्व भोगविजितः' -सूर्योदय से अगले सूर्योदय तक के लिए थाहार का प्रतिषेध उपवास है । पापों व दोषों से दूर रह कर सम्यग् गुणों एवं धर्म के समीप रहना, सभी भोगों का वर्जन करना उपवास है। प्रात्मा के समीप वास करना उपवास है। ३ सिज्जाघय्या-पौषध करने का स्थान । ४ संथार-संस्तार--दर्भादि को पय्या (बिछोना) जिस पर सोया जाय। नयाणंतरं च णं अतिहिसंविभागस्स समणोपासपणं पंच अइयारा जाणिपन्या ण समायरियव्वा तं जहा-सचित्तनिक्खेवणया, सचित्तपिहणपा, काला. एक्कमे, परववदेसे, मछरिया।

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