Book Title: Vijaychand Kevali Charitra
Author(s): Chandraprabh Mahattar
Publisher: Jain Dharm Prasarak Sabha

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Page 34
________________ // 15 // पूजा. अष्टप्राणवश् देवि देवोजह तुमए अऊ वासनवणंमि / आगंतवमवस्सं कुवियप्पो नेव कायद्यो॥३५॥ || अदत रयण। कयसिंगारा समंत रायलोयैपरियरिया। करिणीखंधारूढा समागया रायनवणं मि॥३६॥|||| नरवरॅकयसंमाणा दोहग्गं देवि सेसमहिलाणं। सोहग्गं गहिऊण संजाया सा महादेवी // 3 // जश् इछियसुकं संतुझा देशठियं दाणं / रुहा पुण साजेसिं ताणं च विणिग्गरं कुण // 30 // अह अन्नदिणे पुछा तीए परिवाश्या श्मा देवी / वतुह संपन्नों मणोरहाइठिया जेलं // 3 // जयवश्तं नचिजए तुह पयजत्ताण जं न संजवर्शतहविहु नयवश्थजवि हिययंदोलायएं मम॥ जह जीवश्मह जीवंतियाश्श्रह मरश्मह मरंतीए।जाजाणिजश्नेहोमहवरिंनरवरिंदस्स॥४॥ ॐ जय एवं ता गिन्हसुनासं मह मूलियाए एयाए।जेण तुमं गयजीवा लकीयसि जीवमाणावि॥४॥ बीयाश्मूलियाए नासं दाऊण तुहे करिस्सामि। देहं पुणन्नवं चिय मा नीयसुमन पासला // 43 // 8 एवंति पनणिकणं गहिलं देवीए मूलियावलयं।साविध समप्पिऊणं संपत्ता निययगणं मि॥ * अह सा नरवपासे सुत्ता गहिऊण उसही नासं। ता दिशा निच्चिका नरवश्णा विगयजीवव॥४५॥ - एत्तो आकंदरे उडलिङ क्षेत्ति राश्णो जवणे।देवी मया मयत्तिय धाहाव नरवश्लोर्ड // 46 // नरवश्याएसेणं मिलिया बहुमंतविडाकुसला या तहवियें सा परिचत्ता मइत्ति दळूण निच्चि॥७॥ // 15 // 1 अहियं / 2 राउलेण / 3 करणि / नरव। 5 दे। 6 पवाइएन सा महादेवी / 7 संपत्ता / - संपडा। ए दोलावए / 10 तो। 11 खरिकऊसि / 12 तह / 13 अकंदर। १४ात्ति।१५ तेहिंवि। Jun Gun Aaradhak To DIAC.Gunratnasuri M.S.

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