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जैन-धर्म
[१६] सेवा, स्वाध्याय, देवपूजा आदि धर्म-कार्यों में ही व्यतीत कर धन कमाने (अर्थ पुरुषार्थ) की ओर ध्यान नहीं देता, तो यह निश्चित है कि वह तथा उसके आश्रित अन्य कुटुम्बीजन एक न एक दिन संकट में फँस जायगे और फिर निराकुल होकर वह धर्म कार्य भी न कर सकेगा। (हां, यदि घर में पर्याप्त धन हो तो अवश्य संतोष के साथ अपना सारा समय धर्म व आत्मोन्नति में लगा देना चाहिये, न कि तृष्णा के कुचक्र में फंसे रह कर असंतोष और अशान्तिपूर्वक अपने जीवन को हायर पूर्ण बनाकर बर्बाद करना चाहिये।) जो मनुष्य केवल धन कमाने में ही रात दिन एड़ी से चोटी तक पसीना बहाता रहता है और धर्म कर्म को भूल जाता व उस धन का भी उचित रूप से स्वयं भोग नहीं करता तथा न दूसरों की सहायता व परोपकार करता है वह भोजन की परोसी हुई थाली को ठुकरा कर लंघन करने वाले मनुष्य के समान ही मूर्खता करता है, और केवल क्लेश का पात्र होता है। आखिर वह धन कमाता किस लिए है ? ऐसे ही जो मनुष्य केवल धन कमाने और खाने, पीने, मौज उड़ाने में ही मस्त होकर आत्मोन्नति के लिए धर्म साधन करना, व मोक्ष पुरुषार्थ की ओर लक्ष्य रखना नहीं चाहता या भ्रमवश उन्हें भूल जाता है तो निःसंदेह वह पशु से भी बदतर अपने जीवन को मनुष्यत्व व कर्त्तव्यहीन बनाकर बर्बाद करता हुआ कौए को उड़ाने के लिये क्रीमती रत्न को फेंक देने की मूर्खता करता है।
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