Book Title: Indian Antiquary Vol 17
Author(s): John Faithfull Fleet, Richard Carnac Temple
Publisher: Swati Publications

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Page 214
________________ 200 THE INDIAN ANTIQUARY. [JULY, 1888. 9 हप्रवृतदिग्दन्तिविभ्रमगुणसमूहः स्फटिककपुरपिण्डपण्डरयशश्चन्दनचर्चितासमुन्नतगग10 गलक्ष्मिपयोधरोसंगः श्रीजयभहस्तस्यत्मज प्रतिहतसकलजगद्व्यापिशेषाधिकारविइंनितसंत11 तातमोहस्विरधिकगुरुस्नेहसंपत्कविमलदिशोसितजिवलोकः परमबोधसमानुगतो विपुलगु12 रनृपन्मवप्रदिपतोमुपगतः समधिगतपंचमहाशब्दमहाराजाधिराजश्रीमहहः कुशली सर्वा13 ने]व राष्ट्रपतिविषयपतिमामकूटायुक्तकानियुक्तकाधिकमहत्तरादीसमाज्ञापयति अस्तु वो विदि14 तं यथा मंया मातापित्रोरात्मनश्चैवामुष्मिकपुण्ययशोभिवृद्धये कन्यकुब्ज15 वास्तव्यतचातुर्वियसामान्यकौसिकस्यगोत्रच्छन्दोगसब्रह्मचारि16 भहमहिधरस्तस्य भहगोविन्द बलिवरुवैश्वदेवाग्निहोत्रपञ्चमहायज्ञादिकृ. Second Plate. 17 बोत्सर्पपर्य तय उम्बराहाराइलिश अन्त:पातितथउम्बरामामोस्याघटनस्थनानि 18 पुर्वत उपिलथणमम दक्षिणत इषिमाम पश्चिमतः संकियपम उतरत जरवद्रप्रम 19 एवमयं स्वचतुराघटनविशुद्धो प्रामः सोद्रंग[] सपरिकर सधान्यहिरन्यादेवः] 20 सोत्पचमानविष्टिक[] समस्तराजकियनमप्रवेश्यमचन्द्रर्कर्णवक्षितिसरित्पर्वतसमानकालीन[:] पु. 21 बपौत्रान्ववक्रमोपभोग्य] पुर्वपत्तदेवनायवर्जनभ्यन्तरसिद्धया शकनृपकालातीतसंव[च्छ) 22 रशतचतुष्टये पंचदशाधिके येष्ठ[]मावास्वसूर्यपहे उदकातिसर्गेण प्रतिपादितं यतोस्योचित. 23 यप्रायस्थित्या कृषतः कर्ष यतो झुंजतो भोजयतः प्रतिदिनतो वा न व्यासेधः प्रवर्तितष्य[:] तथागा24 मिभिरपि नृपतिभिरस्मरश्यैरन्यैर्व (r]सामान्यभूमिशनफलमवेत्य बिन्दू गोलान्यनित्य[]म्यैश्ववणि तृ. 25 मामलमजलबिन्दुचलच जीवितमाकलव्य स्वायनिर्विशेषोयमस्मदायोनुमन्तव्यः पालवि. 26 तव्यश्च तथा चोक्त बहुभिर्वसधा भुक्ता राजभिः सगरादिभिः [0] यस्य यस्य या भूमिस्तस्य तस्य साफ27 लं [1] यश्चाज्ञनतिमिराकृतमतिराछियाशाछियमानमनुमोदेता वा स पञ्चभिर्महापातकैरुपपातकैश्च 28 संयुक्तः स्यादिति [0] उक्तं च भगवता वेदव्याशेन व्याशेन ।। षष्टिं वर्षसहस्राणि स्वर्गे तिष्ठति भूमिदः [1] आ 29 च्छेत्ता चानुमन्ता च तान्येव नरके वसेत् [1] यानीह दत्तानि पुरातनानि दानानि धर्मार्थायसस्करा30 मि [0] निर्भुक्तमाल्यप्रतिमानि तानि को नाम साधुः पुनरावदीत [1] स्ववत्ता परवत्ता वा यत्नवक्ष न31 राधिपः 0] महीं महीमतां श्रेष्ठ दानाच्छ्यानुपालनं [1] लिखितंश्चैतत्पादानुजीविदामोदरसते32 न रेवादितन स्वहस्तोवं मम श्रीवितरागसूनो श्रीप्रसन्तरागस्य [1] BEMARKS. (2) L. 7. Nistriansa-vilerama means with I add no translation, as the grant is so very reference to the lion'the pitiless similar to those Ilâo and Umêtâ. paw,' not the pitiless jump.' The only alterations in my former transla. In the preamble of the grant I propose te tion of the Varnsdoali which I think necessary, read Oniyuktakárdhikamahattará dint and to are: translate the last two words by the kanbis (1) L. 1. Sakalao must be construed with the elders and so forth. The insertion of t rajanticara and be translated by | at the end of °diant, ie. °adint, is caused by 'full.' the following sa and is archaic. L. 9, road प्रवृत्त कर पाण्डुर'.-L. 10, read राघाट; सोपरिकर हिरण्या'.-L. 90, read "कीयानाread लक्ष्मी रोत्सं° भटस्तस्यात्मजः-L.11, road, 'ततमो- मप्रवेश्य आ; मार्का-L.21, road पूर्व संवत्स'.-L. 29, वृत्तिर; द्वासित जीव; समनुगतो.-L. 12, read, नृपाव; read ज्यैष्ठामावास्यायां; सूर्य प्रतिपादितः.-L. 28, rend °या. -प्रदीपता-L. 13, rend'युक्तकनियुक्तकाधिक'.-L. 15, -L.24, rand°श्वर्याणि.-L. 25, दायो looks like द्वायो.rand"तचातुषि, कौशिकसगोत्र'.-L. 16, read महीधर ; गो- | L.27, read यश्चाज्ञान; मोदेत.-L. 38, read भ्यासेन.विन्दाय यज्ञादिकि-L. 17. The first sign in altogether | L. 29, read तान्येव ; यशस्क -L. 30, road यत्नाबक्ष. mishapen and looks nearly like a modern यो; त्स- L. 31, read राधिपत चेत'.-L. 32, रेवादितेन in probar पैणार्थ; 'घाटनस्थानानि.-Ninालिश in doubtkul. L. 18, | bly meant for रेवादित्येन; road श्रीवीत; मूनोः श्रीप्रशान्त. road पूर्वत: मामो मामः पाम उत्तरतो; पाम.-L. 10,1

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