Book Title: Agam 14 Jivajivabhigama Uvangsutt 03 Moolam
Author(s): Dipratnasagar, Deepratnasagar
Publisher: Agam Shrut Prakashan

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Page 45
________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir ||१५|-2 जीवाजीवामिगय - ३/ने-२/११४ (११४) लेसा दिट्ठी नाणे जोगुवओगे तहा समुग्धाए तत्तोय खुप्पिवासा विउव्वणा वेवणा य भए ||१२|1-4 (११५) उववाओ पुरिसाणं ओवम्मं वेयणाए दुवाहए ठिइ उव्वट्टण पुढवी उववाओ सब्बजीवाणं ||१३|1-5 (११६) एयाओ संगहणि गाहाओ।९५/-94 तच्चाए पडिवत्तिए नेरहअस्स वीओ उद्देसओ समतो. -: "ने इप"-उद्देस ओ-त इ ओ :(११७) इमीसे णं मंते रवणप्पभाए पुढवीए नेरइया केरिसयं पोग्गलपरिणामं पचणुभयमाणा विहरंति गोयमा अणिटुं जाव अमणामं एवं जाव अहेसत्तमाए एवं-वेदणा-लेस्स-खुहापिवासा-वाहि-उस्सास-अनुताय - कोह-पान-पाया लोह - आहारसण्णा-भयसण्णा-मेहुणसण्णापरिणहसपणा-पोग्गल-परिणामाई] १९६-११-95-1 (११८) एस्थ किर अतिवयंती नरवसभा केसवा जलचराय रायाणो मंडवलिया जे य महारंभकोडुंबी |१४||-1 (१९९) भिन्नमुहुत्तो नरएसु तिरियमणुएस होति चत्तारि देवेसु अद्धमासो उक्कोस विउच्यणा भणिया (१२०) जे पोग्गला अणिट्ठा नियमा सो तेसि होई आहारो संठाणं तु अणिटुं नियमा हुंडं तु नायव्वं ||१६||-3 {१२१) असुभा विउव्वणा खलु नेरइयाणं तु होइ सव्वेसिं वेउब्धियं सरीरं असंघयण हुँइसंठाणं .||१७|-4 (१२२) अस्साओउववण्णो अस्साओ चेव चयइ निरयभवं सन्यपुढवीसुजीवो सब्बेसु ठिइविसेसेसुं ||१८||-5 (१२३) उववाएण व सायं नेरइओ देवकम्पणा वावि अज्झवसाणनिमित्तं अहवा कम्माणुभावेणं ॥१९॥-6 (१२४) नेरइयाणुप्पाओ उक्कोसं पंचजोयणसयाई दुक्खेणभिट्याणं वेयणसयसंपगाढाणं ॥२०॥1-7 (१२५) अच्छिनिमीलियमेत्तं नस्थि सुहं दुक्खमेव अनुबद्धं नरए नेरइयाणं अहोनिसंपच्चमाणाणं (१२६) तेयाकम्मसरीरा सुहुमसरीराय जे अपञ्जत्ता जीवेणं मुक्कमेत्ता वचंति सहस्ससो भेयं ||२२||-9 (१२७) अतिसीतं अतिउण्हं अतितिण्हा अतिखुहा अतिभयं वा निरए नेरइयाणं दुक्खसयाई अविस्सामं ॥२३11-10 (१२८) एथ य भित्रमुहुत्तो पोग्गल असुहा य होइ अस्साओ उववाओ उप्पाओ अछि सरीरा उ बोद्धव्वा ॥२४||-11 (१२१) सेतं नेरइया ।१६-95 .तसाए पडिवतिए तइयो उदेसो समतो. -: "ति रिख जो णि य"-उदेस ओ प ट मो :(१३०) से किं तं तिरिक्खजोणिया तिरिक्खजोणिया पंचविधा पन्नता तं जहा-एगिंदियति ||२१||-8 For Private And Personal Use Only

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