Book Title: Vyavahar Sutram Part 06
Author(s): Munichandrasuri
Publisher: Omkarsuri Gyanmandir Surat

View full book text
Previous | Next

Page 439
________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashpagarsuri Gyanmandir श्री व्यवहारसूत्रम् दशम उद्देशकः १६९० (B) गणसोभी खलु वादी, उद्देसे सो उ पढमए भणितो । धम्मकहि निमित्ती वा, विज्जातिसएण वा जुत्तो ॥ ४५५५॥ गणं वादप्रदानतः शोभयतीत्येवंशीलो गणशोभी खलु वादी । स च वादेन यथा गणं |. शोभयति तथा प्रथमे उद्देशके भणितः। न केवलं वादी गणशोभी, किन्तु धर्मकथी, | तथाहि- धर्मकथां यथोक्तस्वरूपामाक्षेपतः कथयन् जनयति गणस्य महतीं शोभाम्। तथा | निमित्ती अतीतादिनिमित्तं कथयन् विद्यातिशयेन वा युक्तो गणशोभी, महतोऽपि सङ्घप्रयोजनस्य विद्याप्रभावतः साधनात् ॥ ४५५५॥ सूत्रम्- चत्तारि पुरिसजाया पन्नत्ता । तं जहा-गणसोहीकरे नाम एगे नो माणकरे | सूत्र ७-८ १ एगे माणकरे नो गणसोहीकरे २, एगे गणसोहीकरे वि माणकरे वि ३ एगे नो ४५५४-४५५८ गणसोहिकरे नो माणकरे ४। ॥ ८॥ गणशोभाअत्र भाष्यम् करादिः एवं गणसोहिकरा, चउरो पुरिसा हवंति विनेया । |१६९० (B) किह पुण गणस्स सोहिं, करेज सो? कारणेमेहिं ॥ ४५५६॥ गाथा For Private And Personal

Loading...

Page Navigation
1 ... 437 438 439 440 441 442 443 444 445 446 447 448 449 450 451 452 453 454 455 456 457 458 459 460 461 462 463 464 465 466 467 468 469 470 471 472 473 474 475 476 477 478 479 480 481 482 483 484 485 486 487 488 489 490 491 492 493 494 495 496 497 498 499 500 501 502 503 504 505 506 507 508 509 510 511 512