Book Title: Tattvartha Sutra Part 02 Sthanakvasi
Author(s): Ghasilal Maharaj
Publisher: A B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti

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Page 815
________________ दीपिका-नियुक्ति टीका अ.८.४९ मनःपवज्ञानस्य वैविध्यनिरूपणम् ७९९ अनुदीर्णानाम् उपशमेंनाऽअधिज्ञान समुत्पद्यते, इति प्रज्ञापनायां ३३ पदेतु-क्षायोपशमिकावधिज्ञानस्या-ऽवस्थिता-ऽनवस्थितभेदद्वयमपि अवधिक-मुक्तम् ॥४८॥ मूलम्-मणपज्जवनाणे दुविहे, उज्जुमईविउलमईय ॥४९॥ छाया-मनापर्यवज्ञान द्विविधम् ऋजुमति-विपुलमति च ॥४९॥ तत्वार्थदीपिका-पूर्व तावत्-अवधिज्ञान सविस्तरं प्ररूपितम् सम्प्रति-मन: पयंत्रज्ञान द्वैविध्येन प्ररूपयितुमाह-'मणपज्जवनाणे दुविहे' इत्यादि मनः पर्यवज्ञानम् पूर्वोक्तस्वरूपं द्विविधं भवति, तद्यथा- ऋजुमतिः दिपुलमतिश्च तत्र ईर्ष्यादीनां ज्ञानप्रतिबन्धकीभूतानां मनोगताना मन्तरायाणां सम्यग्दर्शनेन सति क्षये वोपशमे सर्वेर्षा मनसो परस्परं भेद प्रतिभासामावेन परमनोगतोऽप्यों येन ज्ञायते तज्ज्ञानं मनः पर्यवज्ञानपदेन व्यपदिश्यते । मनःशब्देनाऽत्र मनोगतोऽर्थों प्रज्ञापना सूत्र के ३३ वें पद में क्षायोपशमिक ज्ञान के अवस्थित और अनवस्थित भेद कहे हैं ॥४८॥ 'मणपज्जवनाणे दुविहे' इत्यादि । सूत्रार्थ-मनःपर्यवज्ञान दो प्रकार का है-ऋजुमति और विपुलमति ॥४९॥ ____ तस्वार्थदीपिका-पहले अवधिज्ञान का विस्तार सहित निरूपण किया गया, अब मनःपर्यवज्ञान के दो भेदों की प्ररूपणा करते हैं मन:पर्यवज्ञान का स्वरूप पहले कहा जा चुका है। उसके दो भेद हैं-ऋजुमति और विपुलमति। मनःपर्यवज्ञानावरण एवं वीर्यान्तराय कर्म के क्षयोपशम से परकीय मनोगत भावों पर्यायों को प्रत्यक्ष जानने बाला ज्ञान मनःपर्यव या मन:पर्ययज्ञान कहलाता है। यहां 'मन' शब्द પ્રજ્ઞા પના સૂત્રના ૩૩ માં પદમાં ક્ષાપશમિક જ્ઞાનના અવસ્થિત અને અનવસ્થિત ભેદ કહ્યા છે કે ૪૮ છે 'मणपज्जवनाणे दुविहे' त्यात સવાથ-મન:પર્યવજ્ઞાન કેટલા પ્રકારના છે અને જજુમતિ અને વિપુલમતિ.૪૯ તત્વાર્થદીપિકા-પહેલા અવધિજ્ઞાનનું સવિસ્તર નિરૂપણ કરવામાં આવ્યું હવે મન પર્યવજ્ઞાનના બે ભેદોની પ્રરૂપણ કરીએ છીએ. મન:પર્યવજ્ઞાનનું સ્વરૂપ પહેલાં કહેવાઈ ગયું છે તેના બે ભેદ છે. ઋજુમતિ અને વિપુલમતિ, મન:પર્યવજ્ઞાનાવરણ અને વીર્યાન્તરાય કર્મના ક્ષપશમથી પરકીય મને ગત ભાવે પર્યાને પ્રત્યક્ષ જાણનાર જ્ઞાન મનઃપર્યવ અથવા મન:પર્યવજ્ઞાન કહેવાય છે. અહીં “મન” શબ્દથી મનોગત પર્યાય श्री तत्वार्थ सूत्र : २

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