Book Title: Siddhantasarasangrah
Author(s): Narendrasen  Maharaj, Jindas Parshwanath Phadkule
Publisher: Jain Sanskruti Samrakshak Sangh Solapur

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Page 15
________________ (८) होता है। मरणभय छोडकर, मनको शान्तिमें रखकर कान्दी, किल्बिषी आदिक पांच अशुभ भावनाओंको छोडकर सम्यग्दर्शन, ज्ञान, चारित्र, तप और वीर्यादिकोंकी भावना करनी चाहिये जिससे वह साधु शुभगतिको प्राप्त होता है। इस प्रकार वर्णन कर ग्रन्थकारने अन्तमें सज्जनदुर्जनका वर्णन कर ग्रन्थरचनाके विषयमें अपनी लघुता प्रगट की है। ३. ग्रन्थकारको आचार्यपरंपरा, काल व रचना। ग्रन्थकारने इस ग्रन्थके अन्त में जो प्रशस्तिपद्य दिये हैं उनके प्रारंभके दो श्लोकोंमें लाडबागड संघकी उत्पत्तिका उन्होंने इस प्रकार उल्लेख किया है। श्रीवर्धमान जिनेश्वरके इन्द्रभूत्यादि ग्यारह गणधरोंमेंसे मेदार्य नामके दसवे गणधर थे । वे जिस देशमें थे वहां की भूमि उनके प्रभावसे स्वर्गतुल्य हुई थी तथा वहां के लोग हार केयूरादि भूषणोंसे समृद्धभूषित होनेसे वे झाट ( लाट ) हुए और उनसे बागडोंकी उत्पत्ति हुई जिससे यह संघ लाडबागड ( ? ) नामसे प्रसिद्ध हुआ। ___ लाडबागड संघकी उत्पत्तिके विषयमें 'धर्मरत्नाकर' श्रावकाचारके रचयिता श्रीजयसेनाचार्यकाभी यही अभिप्राय है। श्रीजयसेनाचार्यने धर्मरत्नाकरके अन्तमें जो प्रशस्ति लिखी है उसके भजन्वादीन्द्रमानं ' 'यत्रास्पदं विदधती' — उत्पत्तिस्तपसां' ये तीन श्लोक नरेन्द्रसेनाचार्यकी प्रशस्तिमें भी पाये जाते हैं । धर्मरत्नाकरकी प्रशस्तिमें धर्मसेन, शान्तिषेण, गोपसेन और भावसेन, ऐसे आचार्यों के क्रमसे नाम दिये हैं। जयसेनाचार्य भावसेनाचार्यके शिष्य थे। जयसेनाचार्यने अपने पूर्ववर्ती आचार्योंका उल्लेख करके धर्मरत्नाकरकी प्रशस्ति-समाप्ति की है। इस प्रशस्तिके आगे नरेन्द्रसेनाचार्यने अपने पूर्ववर्ती ब्रह्मसेन, वीरसेन तथा गुणसेन इन तीन और आचार्योंका उल्लेख किया है। प्रस्तुत ग्रन्थकर्ता नरेन्द्रसेन गणसेन आचार्यके शिष्य हए हैं। किया है। अतिपकता गुणसेन आचार्यके नरेन्द्रसेनके समान गुणसेन, उदयसेन और जयसेन ऐसे अन्य तीन शिष्य थे। प्रथम गुणसेनके पट्टपर ये द्वितीय गुणसेन आरूढ होकर आचार्यपद भूषित करने लगे । इस प्रकार नरेन्द्रसेनाचार्यकी प्रशस्ति है। श्रीजयसेनविरचित धर्मरत्नाकरका समय । जिन्होंने धर्मरत्नाकरकी रचना की वे जयसेनाचार्य नरेन्द्रसेनाचार्यके पूर्ववर्ती हैं। उन्होंने अपना ग्रन्थ ' सबलीकरहाटक' नामक ग्राममें वि. सं. १०५५ में रचकर पूर्ण किया है। इसका खुलासा आगेके श्लोकमें उन्होंने किया है । बाणेन्द्रियव्योमसोममिते संवत्सरे शुभे । ग्रन्थोऽयं सिद्धतां यातः सबलीकरहाटके ।। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org

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