Book Title: Samraicch Kaha Part 1
Author(s): Haribhadrasuri, Rameshchandra Jain
Publisher: Bharatiya Gyanpith

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Page 415
________________ पंचमो भयो] ३५७ अगधरिणि व्व उउच्छ्पिरिगया चित्ताणुकूलाणुरत्तनिउणसहियणमज्झगया लहुइय रत्तकमलसोहहिं कुम्मुन्नएहि, घणसरल कोमलंगुलिविहूसिएहि अल क्खिज्जमा सिराजालमणहरेहि निम्मलन हमऊहोहपडिबद्धपरिमंडलेह लद्धहिययपवेसेणं पिव युव्वसेवासंपत् यणोवाय उरेगंज वियराएणं पडिव्वन्नहि चलेह, चलणाणुरूवाहिं चैव पसन्नसुकुमालाहि अकयकुंकुमरायपिंजराहि जंधियाहिं, मयणजमलतोणीरकरणिल्लेणं पयामथोरेणं च निरंतरेणं च ऊरुजुयलेणं, उत्तत्तकणयनिम्मिएणे व्व पीवरेणं घडिमविमलमणिमेहला हरणेणं अगंगभवणेणं पिव विरिणेण नियंबबबेणं, सयलतेलोक्कल । यण्णसलिलनिवाणेणं पिव सहावगंभीरेणं नाहिमंडलेणं, कुसुम उहचावलेहाविन्भमाए तणुमज्झपसाहणाए रोमराईए, जोन्वणरहणासोवाणभूयतिव लिसणाहेणं मज्झेणं, ईसानडिएण लायण्णाइसयलंपडेणं पिव सहसमल गएहिं परिणाहुन्भिज्जतएहि अपओहरेहि पओहरेहि, सुपइट्टियाहि बाहुलयाहि, सलावण्यपयोधरा, अनङ्गगृहीणीव ऋतुलक्ष्मीपरिगता, चित्तानुकूलानुरखतसखीजनमध्यगता, लघुकृतरक्तकमलशोभाभ्यां कर्मोन्नताभ्यां घनसरलकोमलाङ्ग लिविभूषिताभ्यां अलक्ष्यमाणशिराजालमनोहराभ्यां निर्मल नखमयूखौघप्रतिबद्धपरिवेश मण्डलाभ्या मलब्ध हृदवप्रवेशेनेव पूर्वंसेवासंपादनोपायचतुरेण यावकरागेण प्रतिपन्नाभ्यां चरणाभ्याम्, चरणानुरूपाभ्यामेव प्रसन्नसुकुमालाभ्यामकृतकुंकुनरागपिञ्जराभ्यां जङ्घाभ्याम्, मदनयमलतूणीर ( करणिल्लेणं) संदृशेण ( पयाम ) अनुपूर्व - स्थूलेन च निरन्तरेण च उरुयुगलेन, उत्तप्तकनक निर्मितेनेव पीवरेण घटितविमलमणिमेखलाभरणेन अनङ्गभवनेनेव विस्तीर्णेन नितम्बबिम्बेन, सकलत्रैलोक्यलावण्यसलिलनिपानेनेव स्वभावगम्भीरेण नाभिमण्डलेन कुसुमायुधचापलेखाविभ्रमया तनुमध्यप्रसाधनया रोमराज्या, यौवनारोहणसोपान - भूतत्रिवलिसनाथेन मध्येन, ईश (नडिएण) व्याकुलितेन लावण्यातिशयलम्पटेनेव मदनेन सदा समालिङ्गिताभ्यां परिणाहोद्भिद्यमानाभ्यामपयोधराभ्यां पयोधराभ्याम् सुप्रतिष्ठिताभ्यां बाहुलता धारण करने वाली समुद्रीतटी के समान थी तथा ऋतु लक्ष्मी से युक्त कामदेव की पत्नी (रति) के समान थी । उसके दोनों चरणों ने लाल कमल की शोभा को लघु ( तिरस्कृत) कर दिया था। दोनों चरण कछुए के समान उठे हुए थे, घनी, सरल (सीधी ) और कोमल अंगुलियों से विभूषित थे । न दिखाई पड़ने वाली नसों से मनोहर थे । स्वच्छ नाखूनों की किरणों के समूह से उसका परिवेश मण्डल (परिधि ) बँधा हुआ था, पहले ही सेवा करने के उपाय में चतुर महावर हृदय में प्रवेश न हो पाने से ही मानो लिपट गया था। दोनों ही चरणों के अनुरूप, प्रसन्न तथा सुकुमार और केसर के रंग से पीली-पीली उसकी जंघाएँ थीं । कामदेव के तरकश युगल के समान सुविभक्त और निरन्तर स्थूल उसका उरुयुगल था । तपाये हुए सोने से निर्मित, स्थूल तथा स्वच्छ मणियों से युक्त करधनी जिसमें धारण की हुई थी, ऐसे कामदेव के भवन के समान विस्तीर्ण कमर का पिछला उभरा हुआ भाग ( नितम्ब ) था । समस्त तीनों लोकों के सौन्दर्य रूपी जल का पान करने से ही मानो, स्वभावतः गम्भीर नाभिप्रदेश था । शरीर के मध्य भाग में कामदेव के धनुष की रेखा के समान विभ्रम वाली रोम पंक्ति सुशोभित थी । यौवन पर आरोहण करने के लिए सीढ़ियों के समान त्रिवली से युक्त उसका मध्यभाग था। ईश्वर से व्याकुलित हुआ कामदेव सौन्दर्य की अतिशयता का लोभी होने के कारण ही मानो जिसे सदा आलिंगन करता हो, ऐसे विस्तृत और चूचुक निकले हुए उसके दोनों स्तन थे । दोनों भुजारूप लताएं सुप्रतिष्ठित थीं । अशोक के कोमल १. पयाम मणुपुत्रं (देशी 2-6), २. कणयमयनिक, 3 रोमराइयाए - ख । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org

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