Book Title: Nandanvan Kalpataru 2009 10 SrNo 23
Author(s): Kirtitrai
Publisher: Jain Granth Prakashan Samiti

View full book text
Previous | Next

Page 15
________________ श्रीजिनेश्वप्रार्थनम् मुनिकल्याणकीर्तिविजयः । (रागः यमनकल्याणः) जय जय जगदानन्द ! जिनेश्वर ! जय जय भुवनविबोधदिनेश्वर ! मम शरणं तव चरणयुगं जिन ! मम ध्यानं तव वदनमवृजिन ! । मम ध्येयं तव रूपं सार्व ! मम धेयं तव वचनमगर्व ! ॥१॥ वर्षतु मयि तव कुणावृष्टिः सततं भवतु समतापुष्टिः । प्रवहतु हृदि मे शुद्धा दृष्टि: द्रुतं विनश्यतु ममताकृष्टि: ॥२॥ त्वदीयभार्गानुसरणकामो वर्तेऽहं परमवगुणधाम । कदा भविष्याम्यात्मारामः निजरूपैकपरिज्ञाकामः ॥३॥ वेदान्त्यभिमतमायां मोक्तुं साङ्ख्यसम्मतां प्रकृतिं त्यक्तुम् । बौद्धवासनां संपरिहर्तुम् उत्कोऽस्मि स्वगृहं प्रतिगन्तुम् ॥४॥ निजगृहमेव मे निलयो भवतु । विश्वे यद्यपि प्रलयो भवतु त्वयि मम मनसो विलयो भवतु सत्कल्याणं श्रेयो भवतु ॥५॥ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org

Loading...

Page Navigation
1 ... 13 14 15 16 17 18 19 20 21 22 23 24 25 26 27 28 29 30 31 32 33 34 35 36 37 38 39 40 41 42 43 44 45 46 47 48 49 50 51 52 53 54 55 56 57 58 59 60 61 62 63 64 65 66 67 68 69 70 71 72 73 74 75 76 77 78 79 80 81 82 83 84 85 86 87 88 89 90 91 92 93 94 95 96 97 98 99 100 101 102 103 104 105 106 107 108 109 110 111 112 113 114 115 116 117 118 119 120 121 122 123 124 125 126