Book Title: Nandanvan Kalpataru 2009 10 SrNo 23
Author(s): Kirtitrai
Publisher: Jain Granth Prakashan Samiti
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गलज्जलिका:
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पा. अभिराजराजेन्द्र-मिश्र
(१)
नियमय खमनोहयम् सत्वरं पथि विद्रवन्तं नियमय स्वमनोहयम् पातयिष्यति पृष्ठतो, नंक्ष्यति सख्खे ! चरणद्वयम् ॥१॥
यावदशुभं नैव घटते, सुभगमश्वारोहणम्
किन्तु दुर्घटितेऽखिलं ननु जायते सङ्कटमयम् ॥२॥ क्व नु कशा, क्व नु कशाघातः, क्च नु गतिः, क्च नु धावनम् ? क्य नु चते हेषारवाः, क्च नु हयसुखं मण्डलमयम् ?? ॥३॥
धावक्षसि चङ्क्रमणजव्यतिकराणां का कथा ?
सागरोऽपि विभाति परिखा, प्रांशुगिरिरपि गोमयम् ॥४॥ द्रुतं धावति मनस्तुरगे स्वात्मवारणशङ्कया परिहरन्ति नवग्रहा अपि गमनपथमुल्बणभयम् ॥५॥
रतिरथाश्वाश्चाऽपि निपतत्फेनसंहतिसकुलाः
चकितचकितैौचनैः पश्यन्त्यही मानसहयम् ॥६॥ मनोहयपृष्ठाधिरूढो मानवोऽपि महामदः इन्द्रमप्यतियाति कृपणं गरुडमप्यश्चितरयम् ॥७॥
मनस्तुरगारोहिणामृषिभिर्न दृष्टं मङ्गलम्
जागरैर्वीता निशा दिनमपि न तेषां निर्भयम् ॥८॥
आरुरोह मनोहयं नहुषोऽपि पुण्यचौस्सकृत् ANTARA शचीशुचिपातिव्रताऽब्धौ मज्जितं तच्चिन्मयम् ॥॥
जनकजां कृष्णामवाप्तुं मनस्तुरगारोहिणौ को न रावणकीचकौ पृच्छति समृद्धिमनामयम् ॥१०॥
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