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मोक्षशास्त्र
लित हुए लोकव्यवहारको निक्षेप कहते है । ] ज्ञेय पदार्थ अखण्ड है; तथापि उसे जानने पर ज्ञेय पदार्थ के जो भेद ( अंश, पहलू ) किये जाते हैं उसे निक्षेप कहते हैं । और उस अंशको जाननेवाले ज्ञानको नय कहते हैं । निक्षेप नयका विषय है, और नय निक्षेपका विषयी ( विषय करनेवाला) है |
( ३ ) निक्षेपके भेदोंकी व्याख्या
नाम निक्षेप - गुण, जाति या क्रियाकी, अपेक्षा किये बिना किसीका यथेच्छ नाम रख लेना सो नाम निक्षेप है । जैसे किसीका नाम 'जिनदत्त' रखा; किंतु वह जिनदेवके द्वारा दिया हुआ नही है, तथापि लोकव्यवहार ( पहचानने ) के लिये उसका 'जिनदत्त' नाम रखा गया है । एकमात्र वस्तु की पहिचानके लिये उसकी जो संज्ञा रख ली जाती है उसे नाम निक्षेप कहते है ।
स्थापना निक्षेप - किसी अनुपस्थित ( अविद्यमान ) वस्तुका किसी दूसरी उपस्थित वस्तु संबंध या मनोभावनाको जोड़कर आरोप कर देना कि 'यह वही है' सो ऐसी भावनाको स्थापना कहा जाता है । जहाँ ऐसा आरोप होता है वहां जीवोके ऐसी मनोभावना होने लगती है कि 'यह वही है' ।
स्थापना दो प्रकारकी होती है— तदाकार और अतदाकार | जिस पदार्थका जैसा श्राकार हो वैसा आकार उसकी स्थापनामें करना सो 'तदाकार स्थापना' है । और चाहे जैसा आकार कर लेना सो 'अतदाकार स्थापना' है । सदृशताको स्थापना निक्षेपका कारण नही मान लेना चाहिये, उसका कारण तो केवल मनोभावना ही है । जनसमुदायकी यह मानसिक भावना जहाँ होती है वहाँ स्थापना निक्षेप समझना चाहिये । वीतरागप्रतिमाको देखकर बहुतसे जीवोंके भगवान और उनकी वीतरागता की मनोभावना होती है, इसलिये वह स्थापना निक्षेप है ।
* नाम निक्षेप और स्थापना निक्षेपमें यह अन्तर है कि नाम निक्षेपमें पूज्यअपूज्यका व्यवहार नही होता, और स्थापना निक्षेपमें यह व्यवहार होता है ।