Book Title: Anekant 1993 Book 46 Ank 01 to 04
Author(s): Padmachandra Shastri
Publisher: Veer Seva Mandir Trust

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Page 42
________________ प्राचीन भारत की प्रसिद्ध नगरी-च्छित्र हष के बाद की स्थिति : स्वरूप अहिच्छत्रा का विनाश निर्धारित किया जाता है। हर्ष की मत्यू के ५० वर्ष बाद का इम क्षेत्र का इति- कन्नौज के विरुद्ध १०१६ को चढ़ाई में महमद उस नगर हास अवशिष्ट उत्तर भारत के लिए विषमना का था। को बढने में पूर्व रामगंगा को पार कर गया था; अत: इम चन्द कवि के पृथ्वीराज रामो के अनमार यह कहा जाना जिले से गजरा होगा, किन्तु उसकी चढाइयो के प्रमग में है कि लगभग ७१४ ई० मे उस समय के प्रधान शासक अहिच्छत्रा का कही नामोल्लेख नही है, इसमें यह प्रतीत रामा परमार ने राजदूत वश की ३६ राजकीय जातियो होता है कि वह कभी भी इस स्थान पर नही आया था। को भूमि भेट की थी, इसमें से एक के हर जाति थी; जिसे इसका कारण यह था कि उस समय यह पूरी तरह से उसने कठेर दिया था। यदि इस परम्परा को सही मान आशिक रूप से उजड चुकी थी। लिया जाय तो यह कठेर शब्द का पहला प्रयोग है, जिसके अहिच्छता का कवि वाग्भट : नाम से रुहेलखण्ड (प्राचीन उत्तरी पचाल); जिममे बरेली वाग्भट कवि ने पन्द्रह मगो मे "नेमिनिर्वाण काव्यम" जिला भी सम्मिलित है, पूरे मध्यकाल मे जाना गया । लिखा था। इम ग्रन्थ का रचनाकाल ई० मन १०७५___ आठवी शताब्दी क दूमरे चतुर्थ भाग मे अहिच्छत्रा ११२५ माना जाता है। इसमे १५ सगों मे तीर्थकर विषय कन्नौज के यशोवर्मन के अधिपत्य में आ गया। नेमिनाथ गजीवनवृत्त अकित किया गया है। वाग्भट इसके अनन्तर कुछ दशको के लिए कन्नोज के ही राजा नाम के कई विद्वान हुए है। "अष्टाग हृदय" नामक आयुध के अधिकार मे आया। नवी शताब्दी के पूर्वार्द आयुर्वेद ग्रन्थ के रचयिता एक वाट हो चुके है, पर मे सम्भवतः नागभट्ट द्वितीय के कन्नौज पर अधिकार व र इनका कोई काव्य ग्रन्थ उपलब्ध नहीं है। नेमिनिर्वाण लेने पर गुर्जर प्रतीहारो की उदीयमान शक्ति के हाथ में काव्य की जैन सिद्धान भान पारा की हस्तलिखित प्रति आया। कुछ लोग इस रजा का नाम विग्रह कहते है। में; जिसका लेखनकाल वि० स० १७२७ पौष कृष्णा जिसके सिक्के अहिच्छत्र से प्राप्त हुए हैं। इसी स्थान से अष्टमी शुक्रवार है, निम्नालखित प्रगस्ति श्लोक उपलब्ध जो आदिवर ह के मिक्के प्राप्त हा है वे निश्चित रूप से होता हैभोज (लगभग ८३६-८८५ ई०) से सम्बन्धित है जो कि अहिच्छत्र कुलोत्पन्न: प्राग्वाट कुल शालिन । कन्नौज के गुर्जर प्रतीहारो मे मबपे बडा था। दसवी के अन्त तक अहिच्छत्रा का क्षेत्र उन के आधिपत्य मे रहा। छाहडस्य सुतं चक्रे प्रबन्ध वाग्भट कवि.॥ यह ज्ञात नही कि यह एक "भक्ति" के रूप मे उनके सीधे यह प्रशस्ति पद्य श्रवणबेलगोल के स्व०प० जिनदास प्रशासन मे था अथवा अपने किसी अन्य अधीन राजा का शास्त्री के पुस्तकालय वाली नेमिनिर्वाण काव्य की प्रति इसने प्रशासन सौपा हुआ था। मे भी प्राप्य है। दसवी तथा ग्यारहवी सदी का अहिच्छया क्षेत्र :- प्रशस्ति पद्य से अवगत होता है कि वाग्भट प्रथम दसवी सदी के कन्नौज के राजकवि राजशेखर ने पचाल प्राग्वाट पोरवाल (परवार) कुल के थे और इनके पिता के कवियो की श्रेष्ठता का वर्णन किया है । उसके अनुसार का नाम छाहर था। इनका जन्म अहिच्छवपुर में हुआ पांचाल नाट्यकला मे निपुण थे और उन्होने रगमच का था। महामहोपाध्याय ओझा जी के अनुमार नागौर का काम किया था। पचाली इस क्षेत्र की बोली थी। पुराना नाम नागपुर या अहिच्छत्रपुर" है। नाया धम्मपंचाली नारी की भद्रता की दूर-दूर तक प्रतिष्ठा थी। कहानो मे भी अहिच्छत्र का निर्देश आया" है। डाक्टर मनष्य इस क्षेत्र के निवासियो के परिधान की जगदीश चन्द्र जैन ने अहिच्छा को अवस्थिति रामनगर जी का अनकरण करते थे। ११वी शताब्दी के प्रारम्भ ही मानी है"। अधिकांश विद्वान नेमिनिर्वाण काप के सोशलबनी ने पचाल को नौ बड़े बड़े राज्यो के अन्तर्गत रचयिता वाग्भट का जन्म स्थान आधुनिक रामनगर परिगणित किया है। महमद गजनवी क धावे के परिणाम (जिला बरेली) को ही मानते है"।

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