Book Title: Agam 18 Upang 07 Jambudveep Pragnapti Sutra Stahanakvasi
Author(s): Madhukarmuni, Chhaganlal Shastri, Shobhachad Bharilla
Publisher: Agam Prakashan Samiti

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Page 341
________________ 280 [जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्र तए तं तानो रुप्रगमझवत्थव्वाश्रो चत्तारि दिसाकुमारीपो महत्तरानो जेणेव भयवं तिस्थयरे तित्थयरमाया य तेणेव उवागच्छन्ति 2 ता भगवं तित्थयरं करयलसंपुडेणं गिण्हन्ति तित्थयरमायरं च बाहाहि गिण्हन्ति 2 त्ता जेणेव दाहिणिल्ले कयलीहरए जेणेव चाउसालए जेणेव सोहासणे तेणेव उवागच्छन्ति 2 ता भगवं तित्थयरं तित्थयरमायरं च सोहासणे णिसीयाति 2 त्ता सयपागसहस्सपागेहि तिल्लेहि अभंगेंति 2 ता सुरभिणा गन्धवट्टएणं उन्वटेंति 2 ता भगवं तित्थयरं करयलपुडेण तित्थयरमायरं च बाहासु गिण्हन्ति 2 ता जेणेव पुरथिमिल्ले कयलीहरए, जेणेव चउसालए जेणेन सोहासणे, तेणेव उवागच्छन्ति, उवागच्छित्ता भगवं तित्थयरं तित्थयरमायरं च सोहासणे णिसीप्राति 2 त्ता तिहिं उदएहि मज्जाति, तं जहा-गन्धोदएणं 1, पुष्फोदएणं 2 सुद्धोदएणं मज्जावित्ता सव्वालंकारविभसिकं करेंति 2 ता भगवं तित्थयरं करयलपडेणं तित्थयरमायरं च बाहाहिं गिण्हन्ति 2 त्ता जेणेव उत्तरिल्ले कयलीहरए जेणेव चउसालए जेणेव सोहासणे तेणेव उवागच्छन्ति 2 ता भगवं तित्थयरं तित्थयरमायरं च सीहासणे जिसीप्राविति 2 त्ता प्राभिप्रोगे देवे सद्दाविन्ति 2 ता एवं क्यासी-खिप्पामेव भो देवाणुप्पिया! चुल्लहिमवन्तानो वासहरपन्वयानो गोसीसचंदणकट्ठाई साहरह। तए णं ते प्राभिप्रोगा देवा ताहि रुप्रगमज्भवत्थन्वाहि चहि दिसाकुमारी-महत्तरिवाहि एवं वुत्ता समाणा हट्टतुट्ठा जाव' विणएणं बयणं पडिच्छन्ति 2 ता खिय्यामेव चुल्ल हिमवन्तामो वासहरपव्ययानो सरसाइं गोसीसचन्दणकट्ठाई साहरन्ति / तए णं तानो मज्झिमरुप्रगवत्थव्वानो चत्तारि दिसाकुमारीमहत्तरित्रानो सरगं करेन्ति 2 ता अणि घडेति, अणि घडित्ता सरएणं अरणि महिति 2 ता अग्गि पाति 2 ता अग्गि संधुक्खंति 2 ता गोसीसचन्दणकट्ठे पविखवन्ति 2 ता अग्गि उज्जालंति 2 ता समिहाकद्राइं पक्खिविन्ति 2 त्ता अग्गिहोमं करेंति 2 ता भतिकम्मं करेंति २त्ता रक्खापोट्टलिअं बंधन्ति, बन्धेत्ता पाणामणिरयण-भत्तिचित्ते दुविहे पाहाणवट्टगे गहाय भगवनो तित्थयरस्स कण्णमूलंमि टिट्टिप्राविन्ति भवउ भयवं पव्वयाउए 2 / तए णं तानो रुपगमज्झवत्थव्वाश्रो चत्तारि दिसाकुमारीमहत्तरियानो भयवं तित्थयरं करयलपुडेणं तित्थयरमायरं च बाहाहि गिण्हन्ति, गिण्हित्ता जेणेव भगवनो तित्थयरस्स जम्मणभवणे तेणेव उवागच्छन्ति 2 त्ता तित्थयरमायरं संयणिज्जंसि णिसीप्राविति, णिसीश्रावित्ता भयवं तित्थयरं माउए पासे ठवेंति, ठवित्ता प्रागायमाणीग्रो परिगायमाणीग्रो चिट्ठन्तीति / [147] उस काल, उस समय पूर्व दिग्वर्ती रुचककूट-निवासिनी आठ महतरिका दिक्कुमारिकाएँ अपने-अपने कटों पर सुखोपभोग करती हुई विहार करती हैं / उनके नाम इस प्रकार हैं 1. नन्दोत्तरा, 2. नन्दा, 3. आनन्दा, 4. नन्दिवर्धना, 5. विजया, 6. वैजयन्ती, 7. जयन्ती तथा 8. अपराजिता / 1. देखें सूत्र संख्या 44 Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org

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