Book Title: Agam 18 Upang 07 Jambudveep Pragnapti Sutra Stahanakvasi
Author(s): Madhukarmuni, Chhaganlal Shastri, Shobhachad Bharilla
Publisher: Agam Prakashan Samiti
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________________ 390] [जम्बूद्वीपप्राप्तिसूत्र [204] भगवन् ! ज्योतिष्क देवों के इन्द्र, ज्योतिष्क देवों के राजा चन्द्र के कितनी अग्रमहिषियों-प्रधान देवियाँ बतलाई गई हैं ? गौतम ! चार अग्रमहिषियाँ बतलाई गई हैं--१. चन्द्रप्रभा, 2. ज्योत्स्नाभा, 3. अचिमाली तथा 4. प्रभंकरा। __ उनमें से एक-एक अग्रमहिषी का चार-चार हजार देवी-परिवार बतलाया गया है। एक-एक अग्रमहिषी अन्य सहस्र देवियों की विकुर्वणा करने में समर्थ होती है / यों विकुर्वणा द्वारा सोलह हजार देवियाँ निष्पन्न होती हैं / वह ज्योतिष्कराज चन्द्र का अन्तःपुर है। भगवन् ! क्या ज्योतिष्केन्द्र, ज्योतिष्कराज चन्द्र चन्द्रावतंसक विमान में चन्द्रा राजधानी में सुधर्मा सभा में अपने अन्तःपुर के साथ—देवियों के साथ नाट्य, गीत, वाद्य आदि का आनन्द लेता हुप्रा दिव्य भोग भोगने में समर्थ होता है ? गौतम ! ऐसा नहीं होता-ज्योतिष्केन्द्र चन्द्र सुधर्मा सभा में अपने अन्तःपुर के साथ दिव्य भोग नहीं भोगता। भगवन् ! वह दिव्य भोग क्यों-किस कारण नहीं भोगता? गौतम ! ज्योतिष्केन्द्र, ज्योतिष्कराज चन्द्र के चन्द्रावतंसक विमान में चन्द्रा राजधानी में सुधर्मा सभा में माणवक नामक चैत्यस्तंभ है। उस पर वज्रमय-हीरक-निमित गोलाकार सम्पुटरूप पात्रों में बहुत सी जिन-सक्थियाँ-जिनेन्द्रों की अस्थियाँ स्थापित हैं। वे चन्द्र तथा अन्य बहुत से देवों एवं देवियों के लिए अर्चनीय-पूजनीय तथा पर्युपासनीय हैं / इसलिए उनके प्रति बहुमान के कारण आशातना के भय से अपने चार हजार सामानिक देवों से संपरिक्त चन्द्र सुधर्मा सभा में अपने अन्त:पूर के साथ दिव्य भोग नहीं भोगता। वह वहाँ केवल अपनी परिवार-ऋद्धि-यह मेरा अन्तःपुर है, परिचर है, मैं इनका स्वामी हूं--यों अपने वैभव तथा प्रभुत्व की सुखानुभूति कर सकता है, मैथुनसेवन नहीं करता। - सब ग्रहों आदि' की 1. विजया, 2. वैजयन्ती, 3. जयन्ती तथा 4. अपराजिता नामक चारचार अग्रमहिषियाँ हैं / यो 176 ग्रहों की इन्हीं नामों की अग्रमहिषियाँ हैं / गाथाएँ-ग्रह 1. अङ्गारक, 2. विकालक, 3. लोहिताङ्क, 4. शनैश्चर, 5. प्राधुनिक, 6. प्राधुनिक, ७.कण, 8. कणक, 6. कणकणक, 10. कणवितानक, 11. कणसन्तानक, 12. सोम, 13. सहित, 14. आश्वासन, 15. कार्योपग, 16. कुर्बुरक, 17. अजकरक, 18. दुन्दुभक, 16. शंख, 20. शंखनाभ, 21. शंखवर्णाभ-यों भावकेतु पर्यन्त ग्रहों का उच्चारण करना चाहिए। उन सबकी अग्रमाहिषियाँ उपर्युक्त नामों की हैं। 1. यहाँ नक्षत्रों एवं तारों का भी ग्रहण है। 2. 22. कंस, 23. कंसनाभ, 24. कंसवर्णाभ, 25. नील, 26. नीलावभास, 27. रुप्पी, 28. रुध्यवभास, 29. भस्म, 30. भस्मराशि, 31. तिल, 32. तिलपुष्पवर्ण, 33, दक, 34. दकवर्ण, 35. काय, 36. वन्ध्य, 37. इन्द्राग्नि, 38. धूमकेतु, 39. हरि, 40. पिङ्गलक, 41. बुध, 42. शुक्र, 43. वृहस्पति, 44. राहु, Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org