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SARGA
णाणुज्जीवो जोवो जैन विद्या संस्थान श्रीमहावीरजी
जैनविद्या
महावीर जयन्ती 2591
अमितगति विशेषांक
जैनविद्या संस्थान
(INSTITUTE OF JAINOLOGY) दिगम्बर जैन अतिशय क्षेत्र श्रीमहावीरजी
राजस्थान
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जैनविद्या
जैनविद्या संस्थान, श्रीमहावीरजी द्वारा प्रकाशित श्रद्ध वार्षिक
शोध-पत्रिका
सम्पादक मण्डल
डॉ. कमलचन्द सोगारणी श्री ताराचन्द्र जैन
श्री नवीनकुमार बज
डॉ. कैलाशचन्द जैन
श्री ज्ञानचन्द्र बिल्टीवाला
अप्रैल, 1993
प्रबन्ध सम्पादक
श्री
पाटनी
कपूरचन्द मन्त्री, प्रबन्धकारिणी कमेटी
दिगम्बर जैन अतिशय क्षेत्र श्रीमहावीरजी
मुद्रक :
मदरलैण्ड प्रिंटिंग प्रेस
जयपुर
सम्पादक
श्री ज्ञानचन्द्र विन्दूका
डॉ. गोपीचन्द पाटनी
सहायक सम्पादक पं. भँवरलाल पोल्याका
प्रकाशक
जैनविद्या संस्थान प्रबन्धकारिणी कमेटी
दिगम्बर जैन अतिशय क्षेत्र श्रीमहावीरजी
वार्षिक मूल्य :
40.00
75.00
सामान्यतः
पुस्तकालय हेतु
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क्र.सं.
विषय
प्रारम्भिक
सम्पादकीय
1. बहुश्रुत विद्वान प्राचार्य श्रमितगति
2. ज्ञानं सदर्चनीयम्
विषय-सूची
3. श्रमितगति श्रावकाचार में श्रावक की जीवनचर्या
4. ज्ञानेन हीनः पशुरेव शुद्धः
5. अमितगति श्रावकाचार में पदस्थ ध्यान और शरीर के शक्तिकेन्द्र
6. ज्ञानं त्रिलोके सकले
7. अमितगति श्रावकाचार में सर्वज्ञसिद्धि
8. ज्ञानेन पुसां सकलार्थसिद्धि
9. आचार्य श्रमितगति की
सर्वोपयोगी रचनाभावनाद्वात्रिंशतिका - सामायिक पाठ
10. समभाव - प्रतिक्रियारहित जीवन
11. भावनाद्वात्रिंशतिका : शान्तरस का निर्भर
12. ज्ञानं विना प्रवृत्तिर्न हिते
13. मिथ्यात्वखण्डन
धर्मपरीक्षा की आधारभूमि
लेखक का नाम
डॉ. गुलाबचन्द जैन
श्राचार्य श्रमितगति
डॉ. रमेशचन्द्र जैन
श्राचार्य श्रमितगति
डॉ. सोहनलाल देवत
प्राचार्य प्रमितगति
श्री राजवीरसिंह शेखावत
श्राचार्य श्रमितगति
पं. नाथूराम डोंगरीय जैन
ब्र. कु. कौशल जी
डॉ. कु. प्राराधना जैन
प्राचार्य श्रमितगति
डॉ. पुष्पलता जैन
पृ.सं.
1
12
13
222222
20
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46
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14. आचार्य अमितगति और हरिषेण की धर्मपरीक्षा
15. पंचसंग्रह - कर्ममीमांसा का अपूर्व ग्रन्थ
16. आचार्य श्रमितगति की प्रासंगिकता - पर्यावरणीय परिप्रेक्ष्य में
17. हरिवंशपुराण
डॉ. भागचन्द भास्कर
डॉ. श्रीरंजन सूरिदेव
श्रीमती शकुन्तला जैन
महाकवि धवल
अनु. - भंवरलाल पोल्याका
53
65
71
75
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'आरम्भिक
'जनविद्या' का प्राचार्य अमितगति विशेषांक पाठकों के समक्ष सहर्ष प्रस्तुत है। जैन साहित्य अपनी विशालता और विविधता के लिए लोक-विख्यात है। विभिन्न युग के जैन प्राचार्यों ने इसके साहित्य को समृद्ध किया है ।
प्रस्तुत अंक में आचार्य अमितगति के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर प्रकाश डाला गया है । अमितगति सामयिक पाठ तो जन-जन में व्याप्त है। इस अंक में विद्वान लेखकों द्वारा विभिन्न दृष्टियों से विचार प्रस्तुत किए गए हैं । जिन विद्वानों ने अपनी रचनाएं भेजकर इस अंक के प्रकाशन में योगदान दिया है, हम उनके आभारी हैं। पत्रिका के सम्पादक, सहयोगीसम्पादक एवं सम्पादक-मण्डल धन्यवादाह हैं।
कपूरचन्द पाटनी
मन्त्री प्रबन्धकारिणी कमेटी दिगम्बर जैन अतिशय क्षेत्र, श्रीमहावीरजी
नरेशकुमार सेठी
अध्यक्ष
प्रबन्धकारिणी कमेटी दिगम्बर जैन अतिशय क्षेत्र, श्रीमहावीरजी
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सम्पादकीय
जैनविद्या संस्थान श्रीमहावीरजी की शोध-पत्रिका 'जनविद्या' का यह तेरहवां अंक 'प्राचार्य समितपति-विशेषांक' पाठकों व अध्ययनकर्ताओं के समक्ष प्रस्तुत करते हुए हमें अत्यन्त हर्ष है। इसके पूर्व-1. स्वयंभू विशेषांक, 2. व 3. पुष्पदन्त विशेषांक (खण्ड 1-2), 4. महाकवि धनपाल विशेषांक, 5-6. वीर विशेषांक, 7. मुनि नयनन्दि विशेषांक, 8. कनकामर विशेषांक, 9. योगीन्दु विशेषांक, 10-11. प्राचार्य कुन्दकुन्द विशेषांक, 12. पूज्यपाद विशेषांक, ये बारह अंक प्रकाशित हो चुके हैं। प्रारम्भिक 9 अंकों में अपभ्रंश भाषा के ग्रन्थों व साहित्य का विवेचन किया गया है । इस तेरहवें अंक में प्राचार्य अमितगति के बारे में प्रकाश डाला गया है । जैन साहित्य में अमितगति नाम के दो प्राचार्यों का उल्लेख मिलता है। यद्यपि अमितगति द्वितीय ही इनमें अधिक प्रसिद्ध हैं और बहुश्रुत विद्वान माने . जाते हैं जिन्होंने काव्य, न्याय, व्याकरण, आचार आदि विषयों पर अनेक ग्रन्थों की रचना की है, यथा-सुभाषितरत्नसंदोह, धर्मपरीक्षा, उपासकाचार-श्रावकाचार, आराधना, भावनाद्वात्रिंशतिका, पंच-संग्रह (संस्कृत), पंच-संग्रह (प्राकृत), सामायिक पाठ आदि । ये माथुर संघ के प्राचार्य थे, इनकी गुरु-परम्परा में आचार्य देवसेन थे जिनके शिष्य अमितगति प्रथम और अमितमति प्रथम के शिष्य माधवसेन तथा उनके शिष्य प्रस्तुत अंक के नायक अमितगति द्वितीय थे। आचार्यों को ही तीर्थंकर महावीर की प्राचार्य-परम्परा में सारस्वताचार्य स्वीकृत किया है।
सारस्वताचार्य उन्हें कहते हैं जिन्होंने धर्म-दर्शन, आचार-शास्त्र, न्याय-शास्त्र, काव्य तथा पुराण प्रभृति विषयक ग्रन्थों की रचना करने के साथ-साथ अनेक महत्वपूर्ण मान्य ग्रन्थों की टीकायें भाष्य एवं कृतियां भी रची हैं। इसके विपरीत श्रुतघराचार्य युग-संस्थापक एवं युगान्तकारी प्राचार्य हुए हैं जिन्होंने श्रुतज्ञान के क्षीण होने पर नष्ट होती हुई श्रुत-परम्परा को मूर्तरूप देने का मौलिक कार्य किया है । श्रुतघराचार्य अंगों या पूर्वो के एकदेश ज्ञाता थे । इन प्राचार्यों में गुणधर, धरसेन, पुष्पदन्त, भूतबलि, आर्यमंक्षु, नागहस्ति, यतिवृषभ, कुन्दकुन्द, शिवार्य, कार्तिकेय, उमास्वामी आदि की विशेषतौर पर गणना की जाती है । श्रुतघराचार्यों ने दृष्टिप्रवाद सम्बन्धी रचनायें करके विशेषकर कर्म-साहित्य, सिद्धान्त-साहित्य व अध्यात्मवाद को 'श्रुतघराचार्यों द्वारा रचित साहित्य का आधार लेते हुए' विभिन्न विषयक वाङमय की रचना की है। अतः यह स्वीकार करने में कोई आपत्ति नहीं है कि सारस्वताचार्यों द्वारा रचित साहित्य की पृष्ठभूमि अधिक विशाल और विस्तृत है। सारस्वताचार्यों में सर्वप्रमुख स्वामी समन्तभद्राचार्य का स्थान स्वीकार किया जाता है । इन्हीं प्राचार्यों में सिद्धसेन, पूज्यपाद-देवनन्दि, जोइन्दु, विमलसूरि, आर्यनन्दि, मानतुंग, रविषेण, अकलंक,
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वीरसेन, जिनसेन द्वितीय, विद्यानन्द, देवसेन, अमितगति प्रथम, अमितगति द्वितीय, अमृतचन्द्रसूरि, नेमिचन्द्र सिद्धान्तचक्रवर्ती आदि की गणना की जाती है ।
प्रस्तुत अंक के विभिन्न लेखों के अध्ययन व अवलोकन से यह स्पष्ट हो जाता है कि सम्बन्धित सभी लेखक/विद्वानों की लेखनी में काफी बल है और उन्होंने आचार्य अमितगति द्वितीय के व्यक्तित्व व कृतित्व के भिन्न-भिन्न बिन्दुओं पर अकथनीय परिश्रम कर अच्छा प्रकाश डाला है जो सब मिलकर उन प्राचार्यों के बारे में एक संग्रहणीय इतिहास-परिचय बन जाता है । अतः इन सभी रचनाकारों-लेखकों के प्रति उनके अमूल्य सहयोग के लिए हम अत्यन्त आभारी हैं एवं आशा करते हैं कि भविष्य में भी इसी प्रकार हमें उनका सहयोग प्राप्त होता रहेगा।
इस अंक के सम्पादन व प्रकाशन में सहयोगी कार्यकर्ता धन्यवादाह हैं। मुद्रण हेतु मदरलैण्ड प्रिंटिंग प्रेस के प्रति भी धन्यवाद ज्ञापित है।
डॉ. गोपीचन्द पाटनी
सम्पादक
ज्ञानचन्द्र खिन्दूका
सम्पादक
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जैनविद्या-13 ]
अप्रेल-1993
[ 1
बहुश्रुत विद्वान् आचार्य अमितगति
-डॉ. गुलाबचन्द जैन
व्यक्तित्व
___ जिनका नाम अमित (अप्रमाण) गति (ज्ञान) अर्थात् अप्रमाण ज्ञान का द्योतक है ऐसे बहुश्रुत विद्वान् के विषय में कुछ कहना सूर्य को दीपक दिखाने जैसा है। कुछ पृष्ठों में उनके व्यक्तित्व को समेट लेना मात्र अपने मन को सन्तोष देना है। जिस समय वे इस धराधाम पर अवतरित हुए उस समय मालवा की राजधानी उज्जयनी में राजा मुंज राज करते थे।
इनकी रचनाओं में उद्धृत कारिकाओं के आधार पर पण्डित श्री विश्वेश्वरनाथ रेउ ने इनको वाक्पति-राजा मुञ्ज की सभा के रत्न के रूप में स्वीकार किया है। आप प्रथित-यश सारस्वताचार्य थे। आपका विविध विषयों पर पूर्ण अधिकार था । इसी कारण आपने काव्य, न्याय, व्याकरण, माचार प्रभृति विषयों पर काफी ग्रन्थ लिखे हैं ।
समय
आपकी रचनाओं के आधार पर विद्वानों ने प्रापको 11वीं शती का विद्वान माना है । आपके द्वारा रचित सुभाषित-रत्न-संदोह के आधार पर, जो कि राजा मुज के राज्यकाल 993 ई. में रचा गया था और धर्म-परीक्षा 1013 ई. में रची गयी थी, संस्कृत पंचसंग्रह 1016 ई. में रचा गया था इसी कारण आपका समय 11वीं शताब्दी माना गया है।
गुरुपरम्परा
प्राचार्य अमितगति माथुर संघ के प्राचार्य थे । इनकी गुरुपरम्परा में देवसेन के शिष्य अमितगति प्रथम और अमितगति प्रथम के शिष्य माधबसेम तथा उनके शिष्य अमितगति द्वितीय थे । इनके शिष्य नेमिषेण थे ।
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2 ]
[ जैनविद्या-13
रचना
आपके बहुश्रुत होने के कारण ही आपने अनेक ग्रन्थों की रचना की। सुभाषितरत्न-संदोह, धर्मपरीक्षा, पंचसंग्रह (संस्कृत), अमितगति श्रावकाचार, भावनाद्वात्रिंशतिका, सामायिक पाठ, आराधना (भगवती आराधना संस्कृत श्लोक) तत्वभावना, जम्बूद्वीप प्रज्ञप्ति, चन्द्रप्रज्ञप्ति, अढाई द्वीप प्रज्ञप्ति, व्याख्याप्रज्ञप्ति इत्यादि आपकी कृतियां हैं।
उक्त कृतियों में जो विशेषरूप से प्रसिद्ध हैं तथा उपलब्ध हैं उनका सक्षिप्त परिचय निम्न प्रकार दिया गया है। कतिपय रचनाओं का संक्षिप्त परिचय
1. अमितगति श्रावकाचार-इस श्रावकाचार का दूसरा नाम उपासकाचार भी है। वर्तमान में जितने श्रावकाचार उपलब्ध हैं उनमें यह श्रावकाचार विशद, सुगम और विस्तृत है। इसमें 1352 पद्य और 15 अध्याय हैं। ग्रन्थ के अन्त में गुरुपरम्परा भी दी गयी है किन्तु रचनाकाल नहीं दिया गया है। रचना में श्रावक के आचार-सम्बन्धी सभी विषयों का खुलासा वर्णन किया गया है। जैसे- सम्यग्दर्शन, इसके विपरीत मिथ्यादर्शन, सप्ततत्त्व, अष्टमूलगुण, बारहव्रत और उनके पांच-पांच अतिचार, षट्झावश्यक-दान, पूजा, उपवास आदि का सुविस्तृत वर्णन के अतिरिक्त ध्यान, ध्याता, ध्येय और ध्यान के फल का विवेचन भी अत्यन्त सुन्दर ढंग से किया गया है जो 114 पद्यों में समाहित है ।
सर्वप्रथम निन्दा करनेवालों तथा दोष लगानेवालों की परवाह न कर अपनी रचना के कार्य को करते रहने की प्रतिज्ञा करते हैं
क्षद्रस्वभावाः कृतिमस्तदोषां निसर्गतो सद्यपि दूषयते । तथापि कुर्वति महानुभावस्त्याज्या न युकामयतो हि शाटी ॥
नीच पुरुष निर्दोष कार्यों में भी दोषारोपण करते हैं क्योंकि नीचों की प्रकृति छिद्रान्वेषी होती है किन्तु सत्पुरुष अपने कार्य को नहीं छोड़ते क्योंकि यूकाओं के भय से साड़ी नहीं त्यागी जाती । अर्थात् क्षुद्रपुरुषों के डर से सत्पुरुष अपना कार्य नहीं त्यागते ।
मनुष्य भव की प्रधानता में प्राचार्य कहते हैं
नरेषु चक्री त्रिदशेषु वनी मृगेषु सिंहः प्रशमो व्रतेषु ।
मतो महीभृत्सु सुवर्णशैलो भवेषु मानुषभवः प्रधानम् ।। भाव यह है कि जैसे-मनुष्यों में चक्रवर्ती, देवों में इन्द्र, मृगों में सिंह, व्रतों मैं प्रशमभाव और पर्वतों में सुमेरुपर्वत प्रधान है, वैसे ही भवों में मनुष्य भव प्रधान अर्थात् उत्कृष्ट है।
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जैन विद्या - 13 ]
इसी प्रकार धर्म से हीन जीवन की निस्सारता बताई है -
अन्नेन गात्र नयनेन वक्त्रं नयेन राज्यं लवणेन भोज्यम् । धर्मेण हीनं बत जीवितव्यं न राजते चन्द्रमसा निशीथम् ॥
अर्थात् जिस प्रकार अन्न के बिना शरीर शोभा नहीं पाता, नेत्रों के बिना मुख शोभा नहीं पाता, नीति के बिना राज्य की शोभा नहीं होती, नमक के बिना भोजन अच्छा नहीं लगता और चन्द्रमा के बिना रात्रि शोभा नहीं देती उसी प्रकार धर्म के बिना जीवन शोभा नहीं पाता ।
सम्यक्त्व के सराग और वीतराग ऐसे दो भेदों को एक ही श्लोक में निम्न प्रकार दर्शाया है
संवेगप्रशमास्तिक्यकारुण्यव्यक्तलक्षणम् । सराग पटुभिर्ज्ञेयमूपेक्षा लक्षणं परम् ॥
[ 3
अर्थात् संवेग, ( धर्म के अनुराग ) प्रशम ( कषायों की मन्दता), आस्तिक्य ( प्राप्त, आगम और उसमें वरिणत पदार्थों में यथार्थ बुद्धि), करुणा ( दयाभाव ) - ये चारों भाव जिसमें पाये जायें वह सराग सम्यग्दर्शन है और संसार देह - भोगों से उपेक्षा करना वीतराग सम्यक्त्व है ।
आचार्य ने सम्यक्त्व की उपयोगिता निम्न प्रकार बताई है -
दर्शनबंधोर्न परो बंधुदर्शनलाभान्न परोलामः 1 दर्शन मित्रान्न परं मित्रं दर्शनसोख्यान्न परं सौख्यम् ॥
सम्यग्दर्शनरूपी बन्धु से श्रेष्ठ कोई बन्धु नहीं है, सम्यग्दर्शन के लाभ के सिवा अन्य कोई लाभ नहीं है, दर्शन के सिवा कोई मित्र नहीं है और दर्शन के सिवा कोई सुख नहीं है ।
इस सम्यग्दर्शन की श्रद्धा के विषयभूत सप्ततत्त्वों का विवेचन प्राचार्य ने विस्तार से किया है । इसी प्रकरण में प्रमाण और नय की विवक्षा से अन्यमतावलम्बियों के द्वारा मानी हुई तत्त्व व्यवस्था का भी खण्डन किया है । जीव की सत्ता न माननेवाले चार्वाक को अनेक दृष्टान्तों द्वारा जीव को सनातन सिद्ध करके समझाया है । प्रत्येक जीव अपने सुखदुःख की प्रतीति स्वयं करता है, यदि समान रूप से समान पंचभूतों द्वारा जीव की सत्ता सिद्ध होती है तो पृथक्-पृथक् जीव अपने सुख दुःख का भान कैसे करें ?
ग्रहं दुःखी सुखी चाहमित्येषः प्रत्यय: स्फुटम् । प्राणिनां जायतेऽध्यक्षो निर्बाधो नात्मना बिना ॥
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4 1
[ जैनविद्या- 13
मैं सुखी हूँ, मैं दुःखी हूँ ऐसी प्रतीति प्रत्येक जीव के पृथक्-पृथक् प्रत्यक्ष देखी जाती है । यह प्रतीति निर्बाध रूप से आत्मा के बिना नहीं देखी जा सकती ।
इसी प्रकार सांख्य के अद्वैत मत का तथा अकर्तापन का खण्डन किया है। नैयायिक के आत्मा और ज्ञान के समवाय सम्बन्ध का खण्डन करते हुए बताया है कि यदि श्रात्मा और ज्ञान पृथक् पृथक् रहते हैं तो अर्थ क्रियाकारिता नहीं बन सकती । इसी प्रकार शून्यमत क्षणिकबौद्धमत आदि सभी विपरीताभिनिवेश के माननेवालों का सयुक्तिक खण्डन कर जैन सिद्धान्त की तत्त्व व्यवस्था को सही सिद्ध किया है । अपौरुषेय श्रागम का खण्डन और सर्वज्ञ की सिद्धि प्राचार्य अमितगति ने अपने श्रावकाचार में अनेक युक्तियों से की है। यह विषय अन्य श्रावकाचारों से विशेष देखने को मिलता है ।
मिथ्यात्व को सदोष तथा सम्यक्त्व को निर्दोष सिद्ध करने में प्राचार्य ने काफी ऊहापोह किया है । अन्यमत जो कर्म को स्वीकार नहीं करता उसे अनेक युक्तियों से ( कर्म - सिद्धान्त को ) सत्य सिद्ध किया है । संसारी जीवों में रागद्वेष, मद-मत्सर, शोक, क्रोध, लोभ, भय, काम, मोह इत्यादि जीव के कर्म के बिना नहीं होते। जो इनको जीव में ही होने रूप स्वाभाविक मानें तो इनका नाश कर मोक्ष में कैसे जावें । इसके अतिरिक्त संसार में उनकी तरतमता भी देखने को मिलती है । यह जीव में नैमित्तिक है, यह प्राचार्य ने सिद्ध कर जैनदर्शन की विशेषता सिद्ध की है ।
इस प्रकार प्राचार्य ने श्रावकाचार की सभी विधाओं को विस्तार से बतलाया है। जैसे - सप्तव्यसनों का निराकरण, अष्ट मूलगुरण, पांच अणुव्रत, तीन गुरणव्रत, चार शिक्षाव्रत, सल्लेखना इन सब के अतिचारों का वर्णन भी विस्तार से किया है । भोग- भूमि का वर्णन इस श्रावकाचार की विशेषता है। ध्यान, ध्याता, ध्येय और ध्यान का फल अन्य श्रावकाचारों में नहीं मिलता, यह इसी की विशेषता है | श्रावक की ग्यारह प्रतिमाओं का वर्णन भी विशेष रूप से समझाया गया है ।
इस प्रकार अनेक विशेषताओं वाला अन्य श्रावकाचारों में निराला ही यह श्रावकाचार है ।
2. धर्मपरीक्षा - श्राचार्य देव ने यह एक अद्भुत व्यंग्यात्मक रचना रची है । इसमें जगत् में व्याप्त मिथ्या एवं अस्वाभाविक मान्यताओं, अन्धविश्वासों तथा धर्म के विषय में मानी हुई असम्भव कल्पनाओं पर आधारित प्रमानवीय विचारधारानों को व्यंग्यात्मक ढंग से कथानकों का आश्रय लेकर खण्डित किया है। इस रचना में अविश्वसनीय, अबुद्धिसंगत, पौरारिणक प्राख्यानों का खण्डन, आक्रामक शैली का सहारा न लेकर सुझावात्मक शैली से किया है ।
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जनविद्या-13 ]
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प्राचार्य अमितगति के पूर्व की दो कृतियां और मिलती हैं। एक जयरामकृत धूर्ताख्यान और हरिषेण की धर्मपरीक्षा। इनमें कुछ कथानक प्रायः समान से हैं, जैसे-हाथीकमण्डलु की उपकथा तथा विच्छिन्न सिर की उपकथा इत्यादि । इनके अतिरिक्त यत्र तत्र सम नरूप से पौराणिक कथाएं दृष्टिगोचर होती हैं, जैसे-इन्द्र और अहिल्या की कथा, अग्नि-भक्षण करती हुई यमपत्नी की कथा और ब्रह्मा तिलोत्तमा की उपकथा । किन्तु इनकी पुष्टि में साधारण अप्रामाणिक कथाएं समानरूप से नहीं पाई जातीं। इतना होने पर भी अमितगति की धर्मपरीक्षा और हरिषेण की धर्मपरीक्षा दोनों ही रुचिकर मौर शिक्षाप्रद, भारतीय साहित्य के सुन्दर नमूने हैं।
हरिषेण की धर्मपरीक्षा का पद्य निम्न प्रकार है
अपुत्रस्य गतिर्नास्ति स्वर्गो नैव च नैव च । तस्मात् पुत्रमुखं दृष्टा पश्चात् भवति भिक्षुकः ॥
माचार्य अमितगति का पद्य निम्न प्रकार है
अपुत्रस्य गतिर्नास्ति स्वर्गों न च तपो यतः । ततः पुत्रमुखं दृष्ट्वा श्रेयसे क्रियते तपः ॥
हरिषेण कृत--
नष्टे मृते प्रवजिते क्लीवे च पतिते पतौ । पंचस्वापत्सु नारीणां पतिरन्यों विधीयते ॥
ममितगति
पत्यौ प्रवजिते क्लीवे प्रगष्टे पतिते मृते । पंचस्वापत्सु नारीणां पतिरन्यो विधीयते ॥
इस प्रकार हरिषेण कृत धर्मपरीक्षा और अमितगति कृत धर्मपरीक्षा में अनेक स्थानों पर साम्य है।
प्राचार्यदेव ने प्रस्तुत ग्रन्थ धर्मपरीक्षा में अनेक दृष्टान्त देकर मिथ्यादृष्टि पवनवेग और सम्यग्दृष्टि मनोबेग इन दो मित्रों के माध्यम से लोक में प्रसिद्ध धार्मिक क्षेत्र की झूठी मान्यताओं पर कुठाराघात किया है। और पवनधेग के मिथ्यात्व को दूर करने का प्रयत्न किया है सबसे प्रथम मधु-बिन्दव की कथा से प्रारम्भ करके संसार के सुख और दुःख का माप बतलाया है। संसार का सुख एक मधु की बून्द की समान और दुःख चतुर्गति परिभ्रमण
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6 1
[ जैनविद्या-13
तथा निगोद है । किन्तु संसारी अज्ञानी प्राणी उस मधु की एक बून्द को लेना चाहता है और चारों गतियों के दुःख तथा निगोद के दुःखों को भी नहीं गिनता। तात्पर्य यह है कि संसार के दुःख पर्वत के बराबर और सुख सरसों के दाने के बराबर हैं
दु.ख मेरुपमं सौख्यं संसारे सर्षपयोपमम् । यतस्ततः सदा कार्यः संसार त्यजनोद्यमः ।।
सांसारिक जन विषयों से प्राप्त हुए दुःख को सुख कहते हैं जैसे कि बुझे हुए दीपक को लोग बढ़ा हुआ कहते हैं।
दुःखं वैषयिकमूढा भाषन्ते सुखसंज्ञया । विध्यातो दीपकः किं न नन्दितो भण्यते जनः ।।
आचार्य द्वारा निबद्ध चार मूों की कथा, रक्त पुरुष की कथा, द्वेषी पुरुष की कथा . इस प्रकार अनेक कथा-प्रसंगों के आश्रय से तत्व समझाने की कोशिश मनोवेग विद्याधर ने अपने मित्र पवनवेग को सम्यग्दृष्टि बनाने के लिए की है ।
मिथ्यामान्यताओं के स्थान पर सच्ची मान्यताओं को समझाने का प्रयत्न किया गया है जैसे जैनेतर साहित्य में पांडवों की माता कुन्ती के चार पुत्रों की उत्पत्ति के विषय में झूठी मान्यता को हटाकर सच्ची मान्यता रूप बताना प्राचार्य की विवेक बुद्धि का नमूना है । जैनेतर पुराणों में कर्ण की उत्पत्ति सूर्य से, युधिष्ठिर की उत्पत्ति धर्म से, भीम की उत्पत्ति यम से और अर्जुन की उत्पत्ति इन्द्र से तथा धृतराष्ट्र की पत्नी गांधारी के पनसफल में एक सौ पुत्रों की उत्पत्ति का होना माना गया है। इस प्रकार अनेक मिथ्या बातों का पोषण अन्य मतावलम्बियों के पुराणों में उद्धृत है, उसे मनोवेग विद्याधर के माध्यम से प्राचार्य ने खण्डित किया है। वेदों का अपौरुषेयपना. चार्वाक का पंचभतों के द्वारा जीव उत्पत्ति होना आदि सभी का खण्डन किया है। कहाँ तक गिनाया जाय धर्मपरीक्षा में मिथ्या देवी देवताओं, ऋषि-महर्षियों की काल्पनिक उत्पत्ति का खण्डन कर और सम्यक् उपदेश देकर मिथ्यात्व का खण्डन किया है।
3. सुभाषित-रत्न-संदोह-प्राचार्य अमितगति की 'सुभाषित-रत्न-संदोह' नाम की रचना अद्वितीय है। यद्यपि भारतीय संस्कृत वाङमय में सुभाषितों की रचनाएं कम नहीं हैं, किन्तु जैसी रचना आचार्यश्री की है वैसी बहुत कम है। आत्मानुशासन के कर्ता आचार्य गुणभद्र ने भी अपनी रचना में सुभाषित लिखे हैं किन्तु जो साहित्यिक छटा, छन्दों का वैविध्य, प्रालंकारिकता और विषय-चयन की सूझ-बूझ प्रस्तुत रचना में है, वैसी अन्यत्र नहीं। इस रचना में प्राचार्य ने बत्तीस प्रकरण रचे हैं, यथा सांसारिक विषय, क्रोध, माया, लोभ की निन्दा, ज्ञान,
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जैनविद्या-13 ]
[
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चारित्र, जाति, जरा, मृत्यु, नित्यता, देव, जठर, दुर्जन, सज्जन, दान, मद्यनिषेध, मांसनिषेध, मधुनिषेध, कामनिषेध, वेश्यासंगनिषेध, द्यूतनिषेध, प्राप्त, गुरु और धर्म का स्वरूप, शोक, शौच, श्रावकधर्म और तप का निरूपण इत्यादि का वर्णन अपनी प्रसिद्ध रचना सुभाषित-रत्न-संदोह में प्रसाद-गुण-युक्त विविध छन्दों द्वारा की है। इसी से रचयिता की वर्णन शैली, कल्पनाशक्ति, कवित्व-शक्ति, संस्कृत भाषा का परिज्ञान और उस पर असाधारण अधिकार आदि का परिचय प्राप्त होता है । प्रस्तुत ग्रन्थ के कतिपय उद्धरण निम्न प्रकार हैं
ज्ञान के द्वारा जो सुख मिलता है वह माता-पिता, बन्धुजन, स्त्री, पुत्र इत्यादि से नहीं मिल सकता। इसी को ज्ञान-निरूपण-त्रिंशत में निम्न प्रकार दिखाया है
माता पिता बन्धुजनः कलत्रं पुत्रः सुहृद् भूमिपतिश्च तुष्टः । न तत्सुखकर्तुमलं नराणां ज्ञानं यदेव स्थितमस्तदोषम् ॥
___ चारित्रवान व्यक्ति को पूर्णिमा के चन्द्रमा के समान निर्मल एवं निर्दोष बताकर उसे सच्चा सम्यग्दृष्टि, ज्ञानी एवं गुणज्ञ बताया है -
विनिर्मलं पार्वणं चन्द्रकान्तं यस्यास्ति चारित्रमसौ गुणज्ञः । मानी कुलीनो जगतोऽभिगम्यः कृतार्थजन्मा महनीयबुद्धिः ॥
.
प्राचार्य मृत्यु के विषय में कहते हैं कि जिस प्रकार सारे गीले पदार्थ एक दिन सूख जाते हैं, सब नदियां समुद्र में चली जाती हैं, सारे खिले हुए पुष्प म्लान हो जाते हैं, संसार के सभी पदार्थ बिजली की भांति चंचल हैं, उसी प्रकार सांसारिक सभी प्राणी एक दिन मृत्यु के मुख में चले जाते हैं
सर्व शुष्यति सार्द्रमति निखिला पायोनिधि निम्नगा सर्व म्लायति पुष्पमत्र मरुतो झम्पेव सर्व चलं । सर्व नश्यति कृत्रिमं च सकलं यद्वयंप क्षीयते, सर्वस्तद्वदुपैति मृत्युवदनं देही भवंस्तत्त्वतः ॥
प्राचार्य दुर्जन के विषय में अपने विचार प्रकट करते हुए कहते हैं कि दुर्जन सज्जनों के उपदेशों का उल्लंघन करता है, दो जिह्वात्रों से युक्त कृष्ण सर्प की भांति क्रोधित होकर दुष्ट वचन बोलता है, लाल नेत्रों से युक्त होकर सज्जनों को भयभीत करता है, जैसे सर्प कुटिल गतिवाला होता है वैसे यह भी कुटिलता लिये रहता है, सदा सर्प की भांति छिद्र ही देखता है, ऐसे दुर्जनरूपी सर्प को कोन वश में कर सकता है ?
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[ जैनविद्या-13
य: साधूदितमन्त्रगोचरमतिक्रान्तो द्विजिह्वाननः । कुद्धो रक्तविलोचनो सिततमो मुंचत्यवाच्यं विषम् । रौद्रो दृष्टिविषो विभीषितजनो रन्ध्रावलोकोद्यतः, कस्तं दुर्जनपन्नगं कुटिलगं शक्नोति का वशं ॥
इस प्रकार से सुभाषित-रत्न-संदोह के सभी प्रकरण उत्तमोत्तम सुभाषितों से भरे हुए हैं । शौचनिरूपण के एक काव्य में प्राचार्यश्री कहते हैं जो स्नान से पवित्रता मानते हैं वे आकाश में शतदल कमल उत्पन्न होना मानते हैं। मलिन शरीर की शुद्धि जल से होना असम्भव है
मेरूपमान मधुपव्रज सेवितान्तं, चेज्जायते वियति कंजमनन्त पत्रं । कायस्य जातु जलतो मलपूरितस्य शुद्धिस्तदा भवति निन्द्य मलोद्भवस्य ।
इस प्रकार सभी प्रकरण उत्तमोत्तम छन्दों के द्वारा सुमाषितों से परिपूर्ण हैं । .
4. पंचसंग्रह - प्राचार्य अमितगति द्वारा रचित 'पंचसंग्रह' प्राकृत पंचसंग्रह की संस्कृत छाया समझा जा सकता है किन्तु अनेक स्थलों में वैषम्य होने से उसे एक स्वतन्त्र रचना कहना असंगत नहीं है। जैसे प्राकृत गाथा का विषय दो से अधिक संस्कृत पद्यों में समाहित करना संस्कृत पंचसंग्रह की विशेषता है। संस्कृत पंचसंग्रह में 1375 छन्द हैं। जिस प्रकार प्राकृत पंचसंग्रह में कई स्थानों पर गद्य भी लिखे गये हैं उसी प्रकार संस्कृत पंचसंग्रह में भी कई पद्यों के साथ गद्य भी लिखा गया है किन्तु रूपान्तर होने पर भी कई दृष्टियों से वैशिष्टय है। प्राचार्य अमितगति की रचना सरल एवं मधुर है। कई स्थानों पर अन्य ग्रन्थों का सहारा भी लिया गया है, जैसे तत्त्वार्थवार्तिक ।
प्रस्तुत पंचसंग्रह में करणानुयोग विषयक पांच विषयों का संग्रह किया गया है यथा1. जीवसमास, 2. प्रकृतिस्तव, 3. कर्मबन्धस्तव, 4. शतक और 5. सप्तति ।
1. जीवसमास प्ररूपणा में गोम्मटसार एवं द्रव्यसंग्रह के अनुसार 14 जीवसमास गिनागे
गये हैं
एकेन्द्रियेषु चत्वारः समासा विकलेषु षट् । पंचन्द्रियेषु चत्वारो भवन्त्येते चतुर्दशः ॥
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जनविद्या-13 ]
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१
2. दूसरे परिच्छेद में कर्मों की प्रकृतियों का विस्तार से विवेचन किया गया है
क्रोधो मानो जिनर्माया लोभः प्रत्येकमोरिताः । तत्रानंतानुबंध्यादि विकल्पेन चतुर्विधाः ॥
3. तीसरे परिच्छेद में कर्मप्रकृतियों के बन्ध, उदय, उदीरणा आदि का विस्तार से
विवेचन किया गया है
परस्परं प्रदेशाच्या प्रवेशो जीवकर्मणोः । एकत्वकारफो बंधो रुक्म कांचनयोरिव ॥ ग्रहणं कर्मयोग्यानां पुद्गलानां प्रतिक्षणं । सकषायस्य जीवस्य बंधोऽनेकविधः स्थितः ॥
4 शतक नामक परिच्छेद में विंशति प्ररूपणाओं की रचना मय यन्त्रों के दिखाई गई है
यथा
संत्येकाक्षेषु चत्वारि जीवानां विकलेषु षट् । पंचेन्द्रियेषु चत्वारि स्थानानीति चतुर्दश । तिर्यग्गतावशेषाणि द्वे संजिस्थे गतित्रये । जीवस्थानानि ज्ञेयानि सत्येवं मार्गणास्वपि ।।
5. सप्तति नामक अन्तिम परिच्छेद में बन्ध और स्वामित्ववाले गुणस्थानों के प्रति बन्ध
कहकर अन्य गति आदि मार्गणा के बन्ध स्वामित्व को कहा गया है । इसके मंगलाचरण और प्रतिज्ञा के विषय का श्लोक निम्न प्रकार है
नत्वा जिनेश्वरं वोरं बंधस्वामित्वसूदनम् । वक्ष्याम्योपविशेषाभ्यां बंधस्वामित्वसंभवम् ॥
इस प्रकार पंचसंग्रह में गुणस्थान, जीवसमास और मार्गणास्थान की अंग संदृष्टि एवं प्रकृति, स्थिति, अनुभाग और प्रदेशबन्ध की संरचना की गई है।
3. भावना द्वात्रिंशतिका-32 पद्यों का यह छोटा सा प्रकरण है । इसमें सांसारिक पदार्थों से उदासीनता का अनुभव कराके आत्मशुद्धि की ओर ले जाने की भावना व्यक्त की गई है। प्रात्मशुद्धि हेतु यह उत्तम काव्य है जिसके पढ़ने से पवित्र और उच्च भावनाओं का संचार होता है। सर्वप्रथम मैत्री प्रादि भावनाओं को प्रकट किया है
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10 ]
[ जैनविद्या-13
सत्वेषु मैत्री गुणिषु प्रमोदं क्लिष्टेषु जीवेषु कृपापरत्वं । माध्यस्थ्यभावं विपरीतवृत्तौ सदा ममात्मा विदधातु देव ।।
अर्थात् प्राणीमात्र में मित्रता की भावना, गुणीजनों में प्रमोद भावना, दीन-दुःखियों के प्रति कृपा-भाव और जो हमारे से विपरीत विचारधारा रखते हों उनके प्रति माध्यस्थ्य भाव रखनेरूप हमारे भाव हों। इसी प्रकार अन्य पद्यों में कवि ने अपने आराध्य देव की स्तुति में उसकी वीतरागी, हितोपदेशी और सर्वज्ञ के रूप में प्राराधना की है । साधक के अपने आराध्यदेव को दर्शनज्ञान-स्वभाव-बाला बताया है
यो दर्शन-ज्ञान-सुखस्वभावः समस्तसंसारविकारबाह्यः । समाधिगम्यः परमात्मसंज्ञः स देवदेवो हृदये ममास्ताम् ॥
कवि ने अपने आराध्य देव को मुक्तिमार्ग का प्रतिपादक और जन्म-मृत्यु के दुःखों से अतीत बताया है
विमुक्तिमार्गप्रतिपादको यो, यो जन्ममृत्युव्यसनाधतीतः । त्रिलोकलोको विकलो कलंकः स देवदेवो हृदये ममास्तां ॥
जिस देव ने अपनी गोद में समस्त शरीरधारियों को ले रखा है अर्थात् उसके ज्ञान में समस्त लोक है फिर भी वह वीतरागी है
क्रोडीकृताऽशेषशरीरिवर्गा, रागादयो यस्य न सन्ति दोषाः । निरिन्द्रियो ज्ञानमयो नपाय: स देवदेवो हृदये ममास्ताम् ॥
___ इस प्रकार समस्त 32 पद्य जिनेन्द्र की स्तुति में लिखकर उनको अपने हृदय में बसाने की भावना की है।
6. पाराधना-यह रचना शिवार्य कृत प्राकृत आराधना का संस्कृत रूपान्तर है। इस ग्रन्थ में दर्शन, ज्ञान, चारित्र और तप इन चार आराधनाओं का विवेचन है । इस संस्कृत आराधना में जैनधर्म के प्रायः सभी प्रमेय लिये गए हैं। प्रशस्ति में आचार्य देवसेन से लेकर प्राचार्य अमितगति तक की गुरुपरम्परा को भी दिखाया गया है ।
पं. कैलाशचन्द जी शास्त्री द्वारा शिवार्य की प्राकृत आराधना की हिन्दी टीका जीवराज ग्रन्थमाला से प्रकाशित हो चुकी है किन्तु उसमें संस्कृत रूपान्तर नहीं है ।
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जनविद्या-13 ]
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आचार्य द्वारा रचित उक्त रचनाओं के अतिरिक्त लघु एवं वृहद् सामायिक पाठ, जम्बूद्वीपप्रज्ञप्ति, सार्द्धद्वयद्वीप प्रज्ञप्ति, चन्द्रप्रज्ञप्ति, सूर्यप्रज्ञप्ति, व्याख्याप्रज्ञप्ति इनके ही द्वारा रचित मानी जाती हैं।
___ सामायिक पाठ में 120 पद्य हैं । इसमें सामायिक का स्वरूप, करने की विधि और. उसका महत्व प्रतिपादित किया गया है। शेष ग्रन्थ अभी उपलब्ध नहीं हैं।
इस प्रकार आचार्य अमितगति का व्यक्तित्व एवं कृतित्व संक्षिप्त रूप से वर्णन किया गया।
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12 ]
[ जैनविद्या- 13
ज्ञानं सदर्चनीयम्
1
चौरादिदयावतनूजभूपरहार्य मच्यं सकलेऽपि लोके धनं परेषां नयनैरदृश्यं ज्ञानं नरा धन्यतमा वहन्ति ॥ 1861.
विनश्वरं पापसमृद्धिदक्षं विपाकदुःखं बुधनिन्दनीयम् । तदन्यथाभूतगुणेन तुल्यं ज्ञानेन राज्यं न कदाचिदस्ति ।।187 ॥
पूज्यं स्वदेशे भवतीह राज्यं ज्ञानं त्रिलोकेऽपि सदर्चनीयम् । ज्ञानं विवेकाय मदाय राज्यं ततो न ते तुल्यगुणे भवेताम् ||188 ।। - सुभाषितरत्न संदोह
-धन को तो चोर चुरा सकता है, पुत्रादि बांट सकते हैं, राजा हर सकते हैं, पड़ोसी देखकर डाह करते हैं किन्तु ज्ञानरूपी धन ही ऐसा धन है जिसे न कोई चुरा सकता है, न बाँट सकता है, न हर सकता है। जिनके पास यह ज्ञानरूपी धन है, वे ही धन्य हैं । 186 ।
- राज्य भी ज्ञान की समानता नहीं कर सकता क्योंकि राज्य विनश्वर है, एक दिन श्रवश्य नष्ट हो जाता है किन्तु ज्ञान अविनाशी है। राज्य पाप को बढ़ानेवाला है किन्तु ज्ञान से पाप का नाश होता है। राज्य का फल अन्त में दुःख ही है किन्तु ज्ञान का फल मोक्ष सुख है । पण्डितजन राज्य की निन्दा करते हैं किन्तु ज्ञान की प्रशंसा करते हैं । इस प्रकार राज्य ज्ञान की कभी भी बराबरी नहीं कर सकता । 187 ।
इस संसार में राज्य या राजा की पूजा केवल अपने राज्य में ही होती है और वह भी तभी तक जब तक राज्य रहता है किन्तु ज्ञान की पूजा तीन लोक में और सर्वदा होती है । ज्ञान हित-अहित हेय उपादेय आदि का बिबेक कराता है किन्तु है । 188 ।
राज्य मद पैदा करता
- प्र. पं. बालचन्द्र सिद्धांतशास्त्री
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जनविद्या-13 ]
अप्रेल-1993
[ 13
अमितगति श्रावकाचार में श्रावक की जीवनचर्या
म. रमेशचन्द्र जैन
प्राचार्य अमितगति द्वारा रचित श्रावकाचार अथवा उपासकाचार श्रावकाचारसाहित्य का एक महत्वपूर्ण ग्रन्थ है। इसमें श्रावक की जीवनचर्या कैसी हो, इस पर बहुत अच्छा प्रकाश डाला गया है ।
प्रत्येक श्रावक प्रातः उठकर पंचपरमेष्ठी को नमस्कार कर उनके गुणों का चिन्तन करता है । श्रावकाचार के प्रारम्भ में आचार्य प्रमितगति ने पंचपरमेष्ठी का जो स्मरण किया है, वह हृदयहारी है। अनन्तर सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यग्चारित्र की स्थिरता को भावना कर सरस्वती से बुद्धि का विस्तार करने की प्रार्थना की गई है। यहां सरस्वती माता के समान प्रतिष्ठित है
मातेव या शास्ति हितानि पुंसो रजः दधति सुखानि । समस्तशास्त्रार्थविचारदक्षा सरस्वती सा तमुतां मति मे ॥ 1.7 ॥
जो अज्ञानरूप रज को दूर करतीहुई सुखों को धारण कराती है तथा माता के समान हितों की शिक्षा देती है, समस्त शास्त्रों का अर्थ विचार करने में प्रवीण बह सरस्वती मेरी बुद्धि का विस्तार करे।
___गुरु शास्त्र-समुद्र के पारगामी और गुणों से गरिष्ठ होते हैं (1.8) । ऐसे गुरु की प्रशंसाकर काव्यकारों के अनुरूप दुर्जनों की निन्दा और सज्जनों की प्रशंसा की है (1.10) । दुर्जनों के भय से सज्जनों को उसी प्रकार अच्छे कार्यो का परित्याग नहीं करना चाहिए जिस
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14 ]
[ जनविद्या-13
प्रकार चीलर (यूका) के भय से साड़ी का परित्याग नहीं किया जाता है। मनुष्यभव पापकर्म के उपशम के फलस्वरूप प्राप्त होता है। जिस प्रकार मनुष्यों में चकवर्ती, देवों में इन्द्र, मृगों में सिंह, व्रतों में प्रशमभाव तथा पर्वतों में सुमेरु प्रधान है, उसी प्रकार भवों में मनुष्यभव प्रधान है (1.12) । जैसे शम बिना नीति, विनय बिना विद्या, शौच (निर्लोभता) बिना कीर्ति तथा तप बिना पूजा नहीं होती उसी प्रकार मनुष्यपने के बिना जीव के हितरूप धर्म की सिद्धि नहीं होती है (1.15)। जैसे अन्न से हीन शरीर, नयन से हीन मुख, नीति से हीन राज्य, लवण से हीन भोजन, चन्द्रमा से विहीन रात्रि सुशोभित नहीं होती है, उसी प्रकार धर्म से हीन जीवन अच्छा नहीं लगता है (1.16)। अतः प्रत्येक व्यक्ति को धर्म का आचरण करना चाहिए। धर्म क्या है ? इसके विषय में विवेक रखना चाहिए। जहाँ जीवों के समूह का हनन होता है, मद्यपान किया जाता है, परस्त्री सेवन किया जाता है, अनर्थ का मूल-मांस ग्रहण किया जाता है, वहाँ धर्म का अंश भी नहीं है (1.33)। यदि हिंसादिक धर्म है तो लौकिक प्राचार में कोई भी पापी नहीं है (1.38)।
धर्म की वृद्धि करनेवाले मनुष्य को सबसे पहले मिथ्यात्व का त्याग करना चाहिए। जसे जीवन और मरण एक-दूसरे के विरोधी हैं उसी प्रकार मिथ्यात्व और धर्म का विरोध है (2.1)। मिथ्यात्व सात (2.5) प्रकार का है-1. एकान्त, 2. संशय, 3. विनय, 4. गृहीत, 5. विपरीत, 6 निसर्ग और 7. मूढदृष्टि । यह मिथ्यात्व दर्शन-मोहनीय के उदय से होता है। जिस प्रकार ऊसर भूमि में धान्य की उत्पत्ति नहीं होती है उसी प्रकार मिथ्यात्व से वासित जीवों में व्रतों का अंकुर नहीं फूटता है (2.22)। मिथ्यादृष्टि सात प्रकार के होते हैंतीन तो वे जो सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र में से किसी एक को नहीं मानते हैं, तीन वे जो इनमें से किन्हीं दो को नहीं मानते हैं और एक वे जो इन तीनों को नहीं मानते हैं । इस तरह सात प्रकार के (2.26) मिथ्यादृष्टि होते हैं । जिसने सम्यक्त्व को ग्रहण किया उसी का जीवन सफल है।
सम्यग्दर्शन को धारण करनेवाले पुरुष को जीवादिक पदार्थों का श्रद्धान होना चाहिए (3.1)। सम्यक्त्वी जीव को समस्त एकान्त मतों का परित्याग करना चाहिए। व्रत धारण करनेवाले श्रावक को सर्वप्रथम मद्य, मांस, मधु, नवनीत, रात्रिभोजन तथा पांच उदुम्बर फलों का परित्याग करना चाहिए । अन्यत्र इन सबके त्याग को मूलगुणों में समाविष्ट किया है, किन्तु अमितगति श्रावकाचार में इनका मूलगुण नाम से कथन नहीं किया है। मद्यादिक से विरक्त पुरुष को पाँच अणुव्रत, तीन गुणव्रत और चार शिक्षाव्रत-इन बारह व्रतों का पालन अवश्य करना चाहिए । पाँच अणुव्रत ये हैं
अणुवत
___ 1. अहिंसाणुव्रत-दो इन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय, पंचेन्द्रिय सैनी, असैनी, इनके पर्याप्त तथा अपर्याप्त की अपेक्षा भेद करने पर दश प्रकार के त्रसों की जो रक्षा करता है
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जनविद्या-13 ]
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तथा एकेन्द्रिय बादर तथा सूक्ष्म के पर्याप्त तथा अपर्याप्त की अपेक्षा दो भेद, इस प्रकार चार प्रकार के स्थावर के हित की जो इच्छा करता है, वह विरताविरत श्रावक है (6.16)।
हिंसा के दो भेद हैं—एक प्रारम्भी हिंसा और दूसरी अनारम्भी हिंसा । जो गृहत्यागी मुनि हैं वे दोनों प्रकार की हिंसा नहीं करते, किन्तु जो गृही है वह अनारम्भी हिंसा तो छोड़ देता है, किन्तु प्रारम्भी हिंसा नहीं छोड़ सकता (6.6-7) ।
रत्नकरण्ड श्रावकाचार में मन, वचन, काय और कृत, कारित, अनुमोदना रूप विकल्पों द्वारा नौ प्रकार से जीवों की हिंसा न करने को अहिंसाणुव्रत बतलाया है । प्राचार्य अमितगति ने कहा है कि जो श्रावक घर छोड़ चुके हैं, वे नौ प्रकार से हिंसा का पालन कर सकते हैं, किन्तु जो घर में रहते हैं, वे अनुमत हिंसा से नहीं बच सकते, अत: गृहवासी श्रावक छह प्रकार से हिंसा का त्याग करता है
त्रिविधा द्विविधन मता विरतिहिंसादितो गृहस्थानाम् । त्रिविधा त्रिविधेन मता गृहचारकतो निवृत्तानाम् ।। 6.19 ।।
2. सत्याणवत-जिनका चित्त धर्म में रत है वे काम, क्रोध, क्रीड़ा, प्रमाद, लोभ, मोह तथा द्वेष इन भावों से असत्य वचन नहीं बोलते हैं (6.46)। असत्य चार प्रकार का होता है-1. असदुद्भावन, 2. भूतनिह्नव, 3. विपरीत और 4. निन्छ । निन्द्य के तीन भेद हैंसावध, अप्रिय और गह। यह वर्गीकरण पुरुषार्थसिद्ध्युपाय के आधार पर किया गया है। पुरुषार्थसिद्ध्युपाय में भी असत्य के चार भेद किए गए हैं-1. विद्यमान वस्तु का निषेध करना । जैसे देवदत्त के घर में रहते हुए यह कहना कि देवदत्त यहाँ नहीं है । 2. अविद्यमान वस्तु को विद्यमान बतलाना दूसरा असत्य है, जैसे घट के नहीं होते हुए भी यह कहना कि घट है । 3. कुछ का कुछ कह देना तीसरा असत्य है, जैसे बैल को घोड़ा बतलाना । 4. चौथे असत्य के तीन भेद हैं-गर्हित, सावन और अप्रिय । किसी की चुगली करना, हँसी करना, किसी से कठोर बातें कहना, बकवाद करना आदि गहित है। मारो, काटो, इसके घर में आग लगा दो, लूट लो इत्यादि वचनों को सावद्य कहते हैं। जो वचन वैर, शौक, कलह, खेद और सन्ताप करनेवाला हो, वह अप्रिय है।
3: प्रचौर्याणुव्रत खेत, ग्राम, वन, गली, घर, खल और घोष में पड़े हुए, भूले हुए अथवा रखेहुए परद्रव्य को ग्रहण नहीं करना चाहिए। धर्म की आकांक्षा करनेवाले को बिना दी हुई वस्तु अग्नि समान मानकर तृणमात्र भी ग्रहण नहीं करना चाहिए (6.59-60) । जो जिसका धन हरता है, वह उसका प्राण ही हरता है, क्योंकि जीवों की स्थिरता करनेवाला धन बाह्य प्राण है
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[ जनविद्या-13
यो यस्य हरति वित्तं स तस्य जीवस्य जीवितं हरति । पाश्वासकर बाह्य जीवानां जीवितं वित्तम् ॥ 6.61 ।।
इसी बात को अमृतचन्द्रसूरि ने पुरुषार्थसिद्ध्युपाय में भी कहा है
अर्थानाम य एते प्राणा एते बहिश्चराः पुंसाम् ।
हरति स तस्य प्राणान् यो यस्य जनो हरत्यर्थान् ।। 103 ।। 4. ब्रह्मचर्याणवत-विद्वान् व्यक्ति परस्त्री को अपनी बहिन, माता और पुत्री के समान मानते हैं । अतः कामाग्नि से तप्त व्यक्तियों को भी उच्छिष्ट के समान परनारी का सेवन नहीं करना चाहिए (6.64-65) ।
5. परिग्रहपरिमाणाणुव्रत-सन्तोषी व्यक्ति को वास्तु, क्षेत्र, धन, धान्य, दासी, दास, चतुष्पद तथा भाण्ड इनका परिमाण करना चाहिए (6.73)। लोक में समस्त प्रारम्भ चूंकि परिग्रह के निमित्त से होते हैं, अतः जो व्यक्ति परिग्रह-परिमाण करता है, वह समस्त आरम्भ. को घटाता है (6.75)।
गुणवत और शिक्षाव्रत
प्राचार्य अमितगति ने गुणव्रत के अन्तर्गत दिग्व्रत, देशव्रत और अनर्थदण्डविरति का तथा शिक्षाव्रत में सामायिक, प्रोषधोपवास, भोगोपभोगपरिमाण तथा अतिथिसंविभाग व्रत का कथन किया है ।
सल्लेखना-तत्वमति, दुनिवारबुद्धि, धीर मरण के आगमन को जानकर, मरण,का प्रागमन होने पर बान्धववर्ग से पूछकर सल्लेखना करता है (6.98)। काय और कषाय के भली प्रकार कृश करने को सल्लेखना कहते हैं ।
उपर्युक्त व्रतों के प्रतिचारों का निरूपण भी अमितगति ने किया है।
शल्य परित्याग-बाणों की पंक्ति के समान दुःख देनेवाली शल्य कही जाती है। इसके तीन भेद हैं-1. माया, 2. मिथ्या और 3. निदान (7.18)। निदान के दो भेद हैं1. प्रशस्त निदान और 2. अप्रशस्त निदान । प्रशस्त निदान दो प्रकार का होता है-1. मुक्तिनिमित्त, 2. संसारनिमित्त (7.20)।
___ एकादश प्रतिमा-श्रावक की आचार-विधि के भेद-स्वरूप ग्यारह प्रतिमा कही गई हैं--1. दर्शन प्रतिमा, 2. व्रत प्रतिमा, 3. सामायिक प्रतिमा, 4. प्रोषध प्रतिमा, 5. सचित्त - त्याग प्रतिमा, 6. दिवामैथुनत्याग प्रतिमा, 7. ब्रह्मचर्य प्रतिमा, 8. प्रारम्मत्याग प्रतिमा, 9. परिग्रहत्याग प्रतिमा, 10. अनुमतित्याग प्रतिमा और 11. उद्दिष्टत्याग प्रतिमा ।
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जनविद्या-13 ]
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छह प्रावश्यक - सामायिक, स्तवन, वन्दना, प्रतिक्रमण, प्रत्याख्यान और कायोत्सर्ग ये छः आवश्यक हैं (8.29)। इनमें से प्रत्येक के साथ द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव, नाम और स्थापना शब्द लगाना चाहिए (8.30) । जैसे- द्रव्य सामायिक, क्षेत्र सामायिक, काल सामा. यिक, भाव सामायिक, नाम सामायिक और स्थापना सामायिक । इसी प्रकार स्तवन आदि के साथ द्रव्यादि की योजना की जाती है ।
सामायिक-जीवन-मरण, योग-वियोग, प्रिय-अप्रिय, शत्रु-मित्र तथा सुख-दुःख में समताभाव धारण करना सामायिक है (8.31)।
स्तवन-अनन्त गुणों के पात्र जिनेन्द्र भगवान् के गुणों का स्तोत्र तथा नाम की निरुक्ति करना स्तवन है (8.32)।
बन्दना - कर्मरूपी वन को जलानेवाले पंच परमेष्ठियों को मन, वचन तथा काय की शुद्धता से नमस्कार करना वन्दना है (8.33)।
प्रतिक्रमण - द्रव्य, क्षेत्र, काल तथा भाव से लगे दोषों के समूह का शोधना, निन्दा, गर्हादि क्रिया प्रतिक्रमण है (8.34)।
प्रत्याख्यान-अयोग्य नाम, स्थापना, द्रव्य, क्षेत्र, काल और भाव का आगामी पाप के निषेध के लिए मन, वचन, काय से त्याग करना प्रत्याख्यान है (8.35)।
कायोत्सर्ग-यथाकाल आकुलता-रहित होकर समस्त आवश्यक क्रियाओं के समय शरीर के प्रति ममत्व-त्याग कायोत्सर्ग है (8.36) ।
इन सबका विस्तृत निरूपण अमितगति श्रावकाचार के अष्टम परिच्छेद में है ।
. चतुर्विध धर्म दान, पूजा, शील और उपवास-यह चार प्रकार का श्रावकों का धर्म है (9.1)। दान चार प्रकार का होता है-अभय, अन्न, औषध और ज्ञान । जिस प्रकार समस्त आधार के कारण आकाश से कोई बड़ा नहीं है उसी प्रकार अभयदान से बड़ा अन्य कोई दान नहीं है (9.87)।
जो व्यक्ति अन्न प्रदान करता है वह शम, दम, दया, धर्म, संयम, विनय, नय, तप, यश और वचन की दक्षता प्रदान करता है (9.92)।
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[ जनविद्या-13
जिससे विवेक की उत्पत्ति होती है, जिससे संयम का पालन होता है, जिससे धर्म प्रकाशित किया जाता है, जिससे मोह का नाश होता है, जिससे मन का नियमन होता है, जिससे राग छेदा जाता है तथा जिससे पाप नाश किया जाता है उस शास्त्र को भव्य जीवों को देना चाहिए (9.103-104) । चूंकि शास्त्र के बिना विवेक नहीं होता, विवेक के बिना तप नहीं होता अतः तप करने के लिए शास्त्र देना योग्य है (9.105) ।
जिनपूजा-नव केवललब्धि, अष्ट प्रातिहार्य आदि गुणों से भूषित अर्हन्त भगवान् की द्रव्य और भाव से पूजा करनी चाहिए। वचन और शरीर का संकोच द्रव्यपूजा कही जाती है। मन के संकोच को भावपूजा कहते हैं (12.12) अथवा गन्ध, पुष्प, नैवेद्य, दीप, धूप तथा अक्षतों से अर्हन्त भगवान् की पूजा करना द्रव्यपूजा है। जिनराज के गुणों का अनुराग से बारम्बार चिन्तन करना भावपूजा है (12.13-14)। जो व्यक्ति दोनों प्रकार से जिनराज की पूजा करता है उसके लिए दोनों लोकों में उत्तम वस्तु दुर्लभ नहीं है (12.15)। जो व्यक्ति मन, वचन, और काय से पंच परमेष्ठी की अर्चना करते हैं उनके विघ्न शीघ्र ही नष्ट हो जाते हैं (12.34)।
शील-संसाररूपी वैरी से भयभीत पुरुष का गुरु की साक्षीपूर्वक ग्रहण किए हुए समस्त व्रतों की रक्षा करना शील है (12.42)। समस्त वस्त्राभूषणों से रहित भी पुरुष सुशोभित होता है, किन्तु शील से रहित पुरुष सुशोभित नहीं होता है (12.45)। शील भङ्ग के कारण जुआ, वेश्यासेवन, परदारागमन तथा शिकार का परित्याग करना चाहिए । भोजन करते समय मौन धारण करना चाहिए । मौन की प्रशंसा में कहा गया है
सागारोऽपि जनो येन प्राप्यते यतिसंयमम् । मौनस्य तस्य शक्यते केन वर्णयितुं गुणाः ॥
जिस मौनव्रत से गृहस्थ भी यति के संयम को पा लेता है, उस मौनगुण का वर्णन करने में कौन समर्थ है ?
वाणी मनोरमा तस्य शास्त्रसन्दर्भगभिता । प्रादेया जायते येन क्रियते मौनमुज्ज्वलम् ।।
जो पुरुष उज्ज्वल मौन धारण करता है उसकी वाणी मनोरम भोर शास्त्र के सन्दर्भ से गभित होती है।
निर्मलं केवलज्ञानं लोकालोकावलोकनम् । लीलया लभ्यते येन कि तेनान्यन्न कांक्षितम् ।।
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जैन विद्या- 13 1
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लोकालोक को दिखलानेवाला निर्मल केवलज्ञान जिस मौन से लीलामात्र में प्राप्त होता है, उससे अन्य कांक्षित वस्तु क्यों नहीं पाई जा सकती ?
श्रावक को विनय, प्रायश्चित्त, वैयावृत्य, स्वाध्याय व्युत्सर्ग और ध्यान करना चाहिए । बारह प्रकार की अनुप्रेक्षाओं का चिन्तन करना चाहिए। इन सबका विशद विवेचन अमितगति श्रावकाचार में किया गया है। जो श्रावक इनका निरन्तर पालन कर अपनी जीवनचर्या को शुद्ध बनाता है वह अवश्य ही मुनिपद धारणकर मोक्ष का अधिकारी बनता है ।
संकल्पात्कृतकारितमननाद्योगत्रयस्य चरसत्वान् 1
न हिनास्ति यत्तदाहुः स्थूलवधाद्विरमणं निपुणाः 11 53 2. पुरुषार्थसिद्ध्युपाय, 92-98 ।
1.
- रत्नकरंड श्रावकाचार
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20 ]
[ जैनविद्या-13
ज्ञानेन हीनः पशुरेव शुद्धः
ज्ञान तृतीय पुरुषस्य नेत्र समस्ततत्त्वार्थविलोकदक्षम् । तेजोऽनपेक्षं विगतान्तरायं प्रवृत्तिमत्सर्वजगत्त्रयेऽपि ।1941
निःशेषलोकव्यवहारदक्षो ज्ञानेन मयों महनीयकोतिः । मेव्यः सतां सतमसेन हीनो विमुक्तिकृत्यं प्रति बद्धचित्तः ।1951
धर्मार्थकामव्यवहारशून्यो विनष्टनिःशेषविचारबुद्धिः। रात्रिदिवं भक्षणसक्तचित्तो ज्ञानेन होनः पशुरेव शुद्धः ।1961
- सुभाषितरत्नसंदोह
- ज्ञान मनुष्य का तीसरा नेत्र है जो समस्त तत्त्वों और पदार्थों को देखने में समर्थ है। उसे किसी अन्य प्रकाश की अपेक्षा नहीं है और वह बिना किसी प्रकार की रुकावट के तीनों लोकों में सर्वत्र गतिशील है। 194।
-ज्ञान के द्वारा मनुष्य समस्त लोक-व्यवहार में प्रवीण हो जाता है। उसका यश विश्व में फैल जाता है। सज्जन भी उसकी सेवा करते हैं। वे उसके पास ज्ञानार्जन के लिए आते । हैं । वह अज्ञानरूपी अन्धकार से रहित होता है तथा मुक्तिरूपी कार्य को सम्पादन करने में अपने चित्त को दृढ़तापूर्वक लगाता है ।1951
-किन्तु जो ज्ञान से शून्य होता है वह कोरा पशु ही होता है क्योंकि जैसे पशु धर्म, अर्थ
और काम पुरुषार्थ सम्बन्धी व्यवहारों को नहीं जानता वैसे ही वह भी उनसे अनभिज्ञ रहता है। उनके विषय में यथेच्छ प्रवृत्ति करता है । पशु के समान ही उसकी समस्त विचारशील बुद्धि नष्ट हो जाती है । वह रात-दिन पशु की तरह ही खाने पीने में लगा रहता है । उसे भक्ष्य-अभक्ष्य का विवेक नहीं रहता। 196 ।
-अनु. पं. बालचन्द्र सिद्धांतशास्त्री
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जनविद्या-13 ]
अप्रेल-1993
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अमितगति श्रावकाचार में पदस्थ ध्यान और शरीर के शक्तिकेन्द्र
-डॉ. सोहनलाल देवोत
आज कौन यह नहीं जानता कि एंगिल विशेष से कान्वेक्स लेन्स पर सूर्य की किरणों को एकत्र कर लिया जाए तो देखते-देखते अग्नि प्रकट हो जाती है। भाप को एक नली में एकत्र कर लिया जाए तो रेल का शक्तिशाली इंजन द्रुतगति से दौड़ने लगता है। बन्दूक की नली में थोड़ी सी बारूद अवरुद्ध कर लेने पर शीशे की गोली निशाने को प्रार-पार कर लेती है। एकत्रीकरण के ऐसे चमत्कार हम आये दिन देखते रहते हैं ।
मानव शरीर भी एक ऐसा विलक्षण यन्त्र है जिसमें जीवन-निर्वाह-क्रम का सहजरूप में होना ही नहीं वरन् यदि पूर्वाचार्यों द्वारा प्रणीत विधि-कर्म को क्रम से प्रयत्नपूर्वक अपनाया जाए तो उसमें सन्निहित उन प्रसुप्त ऊर्जा-केन्द्रों को जगाया जा सकता है । आज के वैज्ञानिक उपकरणों द्वारा प्रकृति की शक्तियों को नियन्त्रित कर उनसे आश्चर्यजनक कार्य लिये जा रहे हैं। यदि मानव के शरीरगत उन अदृश्य मर्मस्थल शक्तिकेन्द्रों को मन्त्रों या वर्णमन्त्रों के द्वारा उभारा या गुदगुदाया जाए तो उससे उद्दीप्त ऊर्जा से भी वे ही काम लिये जा सकते हैं जिन्हें बहुमूल्य वैज्ञानिक उपकरणों के माध्यम से किया जा
शरीर के शक्तिकेन्द्रों को जगाने में आलम्बन रूप 'पदस्थ ध्यान' के बीजमन्त्रों पर प्रकाश डालने से पूर्व 'पदस्थ ध्यान' तथा शरीर के शक्ति-केन्द्र की अवधारणा को भी समझ लेना विषय के साथ न्यायसंगत होगा ।
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[ जैन विद्या- 13
शरीर के भीतरी एवं बाह्य अंग- उपांगों पर पवित्र मन्त्रों, अक्षर रूप पदों का अवलम्बन लेकर ध्याता द्वारा यथाविधि की जानेवाली क्रिया को अन्क नयों के जानकार सिद्धान्तवेत्ता योगीश्वरों ने 'पदस्थ ध्यान' कहा है । अर्थात् वीतराग सर्वज्ञ ध्येय-रूप किंवा प्रलम्बन रूप जिन पवित्र मन्त्रों के अक्षर-रूप पद, वर्ण, बीजाक्षर तथा पीण्डाक्षर आदि की विधिवत् वा विशिष्ट प्रक्रिया के अपनाने को पूर्वाचार्यों ने 'पदस्थ ध्यान' कहा है । पदों या वर्णों के आलम्बन-रूप शरीर के विभिन्न अपेक्षित अंग- उपांगों पर ध्यानक्रिया का निर्देश प्राप्त होता है । उन शरीर के अवयवों किंवा अग-उपांगों के सम्बन्ध में मेरी ऐसी मान्यता है कि वे समस्त चौवन प्रमुख सुसुप्त शक्तिकेन्द्र हैं जिन्हें पूर्वाचार्यों द्वारा निर्देशित अक्षर या पदों के आलम्बन-रूप बीजमन्त्रों के द्वारा जागृत किया जाता है । अंग उपांगों पर मन्त्रों के ध्यान से एक रासायनिक प्रक्रिया होती है, जिससे वहाँ के शक्तिकेन्द्र. जागृत होकर सक्रिय हो जाते हैं । इस प्रकार क्रम-क्रम से शरीर के समस्त प्रसुप्त शक्तिकेन्द्रों को अपेक्षित मन्त्रों द्वारा, वर्गों द्वारा जागृत किया जाता है ।
22]
आत्मस्वरूप की उपलब्धि हेतु उन प्रसुप्त ऊर्जा केन्द्रों को जागृत करने के लिए पूर्वाचार्यों ने 'पदस्थ ध्यान' सोपान के अन्तर्गत अनेक बीजमन्त्रों का अनेकानेक ग्रन्थों में उल्लेख किया है । यहाँ विषय के सन्दर्भ में अमितगति प्राचार्य द्वारा प्रणीत श्रावकाचार में उपलब्ध बीजमन्त्रों पर संक्षिप्त विचार करेंगे ।
अमितगति श्रावकाचार में पदस्थ ध्यान को ध्यानेवाले साधक मनीषी को पंच-नमस्कार आदि जितने भी परमेष्ठी वाचक मन्त्र पद हैं उन्हें निश्चय से चिन्तन वा ध्यान करने का निर्देश दिया है। पंच परमेष्ठी वाचक मन्त्रों या बीजमन्त्रों का विशाल भण्डार है । उस विशाल भण्डार में से अमितगति श्राचार्य ने सर्व सामान्य के उपयोगार्थं कुछ प्रमुख मन्त्र पदों का अपने द्वारा प्रणीत श्रावकाचार में निम्न प्रकार उल्लेख किया है
अन्य आचार्यों की तरह श्रमितगति आचार्य ने भी समस्त मन्त्रों के सार रूप 'अहं' पद को पापों के नाश हेतु ध्याता को ध्याने का निर्देश दिया है। इसी क्रम में अहं मन्त्र के ॐ ह्रीं बीजमन्त्रों के अवगुंठन के द्वारा निर्मित किन्तु शरीर के किस केन्द्र पर इस मन्त्र राज का ध्यान किया जाए, इस सम्बन्ध में उनका कोई निर्देश प्राप्त नहीं होता । "ॐ ह्रीं श्रीं नमः " मन्त्र ध्यान के सम्बन्ध में अमितगति ने बताया है कि आठ पत्रवाले कमल "ॐ ह्रीं श्रीं" मन्त्र का ध्यान करना चाहिए, यह मन्त्र सर्व पापों का नाश करनेवाला, समस्त ज्ञान साम्राज्य देने में कुशल, निरुपम सुख देनेवाला और समस्त मन्त्रों में चूड़ामणि समान है। 7
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जैनविद्या-13 ]
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अमितगति प्राचार्य ने 'अ सि प्रा उ सा' अक्षर रूप मन्त्र का मध्य कर्णिका युक्त चार पत्रवाले कमल पर प्रयत्नपूर्वक गुरुप्रसाद से नाभि-कमल, हृदय-कमल, मुखकमल, ललाट तथा मस्तक पर ध्यान करनेवाले ध्याता के समस्त कर्मों का उन्मूल बताया है।
इस प्रकार प्राचार्य ने 'पदस्थ ध्यान' क्रमों द्वारा शरीरगत विकारी तत्वों का शमन कर आत्मशक्ति के केन्द्रों को जागृत करने का एक वैज्ञानिक मार्ग प्रशस्त किया है । साधक प्राप्य शक्ति द्वारा स्व-पर-कल्याण कर स्वर्ग किंवा मोक्ष का सुख प्राप्त कर सकता है अथवा प्राप्त शक्ति का उपयोग जनत्रास में कर नरकादि के दुःखों को भी प्राप्त कर सकता है। इसका सम्यक् उपयोग कर जन जन का कल्याण किया जा सकता है । ॐ शांति ! शांति !! शांति !!!........
पदान्यालंब्य पुण्यानि योगिभिर्यविधीयते । तत्पदस्थं मतं ध्यानं विविधनयपारगः ॥ - ज्ञानार्णव, सर्ग 38, श्लो. 1 । विस्तृत अध्ययन के लिए देखें यही सर्ग-38 ।
2.
डॉ. सोहनलाल देवोत, 'जैन-मन्त्र-विद्या : एक अध्ययन', शोध-प्रबन्ध, पृ. 181, मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय, उदयपुर सन् 1989 ।
3. वही पृष्ठ 181-199 ।
4. यानि पंचनमस्कारपदादीनि मनीषिणा ।
पदस्थं ध्यातुकामेन तानि ध्येयानि तत्त्वतः ।। - अमितगति श्रावकाचार, 15.31।
5. मरुत्सखशिखो वर्षो, भूतांतः शशिशेखरः ।
प्राद्य लब्ध्वादिको ज्ञात्वा ध्यातुः पापं निषूदते ॥ -अमितगति श्रावकाचार, 15.32 ।
6. ॐ ह्रीं कार द्वयान्तस्थो हैं कारो रेफभूषितः ।
ध्यातव्योऽष्टदले पद्मे कल्मषक्षपणक्षमः ।। -अमितगति श्रावकाचार, 15.41 ।
7. सकलज्ञानसाम्राज्यदानदक्षं च्युतोपमम् ।
समस्तमन्त्ररत्नानां, चूडारत्न सुखावहम् ॥ "ॐ ह्रीं अहं नमः" भट्टारक सकलकीर्ति, तत्वार्थसारदीपक, श्लो. 106, नमस्कार स्वाध्याय पृ. 96, प्रकाशक जैन साहित्य मण्डल, बम्बई ।
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24 )
[ जनविद्या-13
ज्ञानं त्रिलोके सकले....
सर्वेऽपि लोके विधयो हितार्था ज्ञानादृते नैव भवन्ति जातु । अनात्मनीयं परिहर्तुकामास्तदथिनो ज्ञानमतः श्रयन्ति ।।921
शक्यो विजेतुं न मनःकरीन्द्रो गन्तुं प्रवृत्त: प्रविहाय मार्गम् । ज्ञानांकुशेनात्र विना मनुष्यविनांकुशं मत्तमहाकरीव ।।93।
क्षेत्रे प्रकाशं नियतं करोति रविदिनेऽस्त पुनरेव रात्रौ । ज्ञानं त्रिलोके सकले प्रकाशं करोति नाच्छादनमस्ति किंचित् ।। 99।
-सुभाषितरत्नसंदोह
-इस संसार में जितने भी विधि-विधान हैं वे सब ज्ञान के बिना कभी भी कल्याणकारी नहीं होते अर्थात समझ-बूझकर करने पर ही वे सब व्यवहार हितकारी होते हैं । इसीलिए अपने अहित से बचने के इच्छुक और हित के अभिलाषी पुरुष ज्ञान का ही सहारा लेते हैं । 1921
-जैसे मदोन्मत्त हाथी अंकुश के बिना वश में नहीं होता वैसे ही मनरूपी मदमत्त हाथी जब सुमार्ग को छोड़कर कुमार्ग में जाने लगता है तो मनुष्य ज्ञानरूपी अंकुश के बिना उसे वश में नहीं कर सकते । अर्थात् मनुष्यों का मन मदमस्त हाथी के समान उच्छृखल है । जब वह कुमार्ग में जाता है तो उसे ज्ञान के बल से ही रोका जा सकता है, दूसरा कोई उपाय नहीं है ।1931
-सूर्य तो केवल दिन में ही अपने नियत क्षेत्र में नियत/परिमित प्रकाश ही करता है । रात्रि में अस्त को प्राप्त होता है। मेघों के आच्छादन से उसका प्रकाश रुक जाता है परन्तु ज्ञान का प्रकाश सम्पूर्ण तीन लोक में और अलोक में भी तथा भूत-भविष्यत्-वर्तमान तीनों कालों में सदा-सर्वदा, दिन-रात बिना रोक-टोक होता है । इसलिए ज्ञान का प्रकाश सूर्य के प्रकाश से भी अधिक है ।1991
-अनु. पं. बालचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री
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जैनविद्या - 13 ]
अप्रेल 1993
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अमितगति-श्रावकाचार में सर्वज्ञसिद्धि
- श्री राजवीरसिंह शेखावत
से
क्योंकि ज्ञान किसी न किसी माध्यम या होता है उस साधन का ग्राह्य विषय विषय का वह ग्राहक नहीं होता है ग्रहण नहीं कर पाने के कारण
साधन के होने पर उसकी कोई सीमा
साधारणतः हमारे ज्ञान की सीमा होती है, साधन से होता है और ज्ञान जिस किसी भी साधन नियत होता है । ग्राह्य विषय के अतिरिक्त किसी अन्य तथा एक साधन के द्वारा दूसरे साधन के ग्राह्य विषय का ही हमारे ज्ञान की सीमा होती है, जैसे चक्षु द्वारा रूप का ज्ञान होता है, रूप के अतिरिक्त शब्दादि विषयों का नहीं । प्रश्न होता है कि क्या ज्ञान 'सीमा होने का अर्थ उसका किसी साधन से होना है ? क्या ज्ञान बिना साधन के भी सम्भव है ? यदि है तो उसका स्वरूप क्या है और नहीं तो क्यों नहीं ? क्या ज्ञान बिना नहीं ? इस सन्दर्भ में साधारण अनुभव के विपरीत जैनों का मत है कि ज्ञान आत्मा को बिना किसी साधन के ही होता है, क्योंकि ज्ञान आत्मा का गुण है । और आत्मा का स्वभाव जानने का है । 2 आत्मा को बिना साधन के सूक्ष्म, दूरस्थ, प्रकृष्ट, अतीत और भविष्यत् कालिक विषयों का ज्ञान होता है " किन्तु कर्मों के आवरण के आ जाने से आत्मा के ज्ञान में न्यूनता आ जाती है और जब आत्मा के समस्त आवरणों का नाश हो जाता है तब निरावरण ज्ञान अर्थात् केवल ज्ञान उत्पन्न होता है जो अनन्त और अतीन्द्रिय होता है । जो ज्ञान प्रदेशरहित परमाणु अथवा कालाणु को, प्रदेशसहित जीव, पुद्गल, धर्म, अधर्म और प्रकाशको मूर्ति और अमूर्तिक को, जो नष्ट हो चुकी और जो अभी उत्पन्न न हुई हो उन पर्यायों को जानता है उसे प्रतीन्द्रिय ज्ञान कहते हैं । प्रतीन्द्रिय ज्ञानी सर्वज्ञ होता है । यहाँ प्रश्न होता है कि सर्वज्ञ के अस्तित्व का आधार क्या है ? अर्थात् सर्वज्ञ की सिद्धि कैसे सम्भव है ? इस समस्या का समाधान करने के लिए प्रमितगति श्रावकाचार में पूर्व पक्ष को रखते
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26
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[ जैनविद्या-13
हए सर्वज्ञ की सिद्धि की गई है । आचार्य ने पहले मीमांसकों द्वारा उठाई गई उन तीन शंकाओं को रखा है जिनके आधार पर सर्वज्ञ के अस्तित्व को नकारा जा सकता है। वे शंकाएं इस प्रकार हैं -
प्रथम - सभी जीव अल्पज्ञ और रागयुक्त हैं, तब जिसमें अल्पज्ञता और रागपना हो
वह सर्वज्ञ कैसे हो सकता है।
द्वितीय-प्रभाव प्रमाण द्वारा किसी विषय के अस्तित्व के निषेध की सिद्धि होती
है । अतः अभाव द्वारा सर्वज्ञ का निषेध सिद्ध होता है ।
तृतीय सर्वज्ञ के अस्तित्व को सिद्ध करनेवाला कोई साधक प्रमाण नहीं . अर्थात्
साधक प्रमाण का अभाव है अतः सर्वज्ञ का अस्तित्व नहीं है ।
इन तीनों शंकाओं का निवारण करते हुए प्राचार्य में सर्वज्ञ की सिद्धि की है जो इस प्रकार है
प्रथम, अल्पज्ञता एवं रागपना के द्वारा सर्वज्ञ का निषेध युक्ति-युक्त नहीं, क्योंकि सब पदार्थों को विषय करनेवाले ज्ञान के बिना सभी पुरुषों में सब कुछ जाननेवाले ज्ञान का निषेध नहीं किया जा सकता । अर्थात् जिस व्यक्ति ने तीनों कालों के समस्त व्यक्तियों को जान लिया है कि उनमें कोई व्यक्ति सब कुछ जाननेवाला नहीं है, वही व्यक्ति सर्वज्ञ का निषेध कर सकता है अन्य नहीं ।' किन्तु ऐसा कोई व्यक्ति नहीं है और यदि है तब वह ही सर्वत्र है । अतः इस युक्ति से सर्वज्ञ का निषेध न होकर सिद्धि ही होती है।
द्वितीय, अभाव प्रमाण द्वारा सर्वज्ञ का निषेध भी युक्ति-संगत नहीं है, क्योंकि अतीन्द्रिय सर्वज्ञ के विषय में प्रभाव प्रमाण की प्रवृत्ति सम्भव नहीं है । जिस व्यक्ति को निषेध किए जानेवाले विषय का और उसके आधार का ज्ञान हो वही व्यक्ति अभाव प्रमाण द्वारा उस विषय के वहाँ न मिलने पर उसका निषेध कर सकता है जैसे कोई व्यक्ति किसी विशेष स्थान पर घट विशेष को देखता है और फिर किसी दूसरे काल में उसी स्थान पर वही घट न हो तब वह व्यक्ति उस घट का निवेध कर सकता है किन्तु सर्वज्ञ का इस प्रकार निषेध सम्भव नहीं, क्योंकि घट की तरह व्यक्ति में पाया जानेवाला सर्व-ज्ञायक ज्ञान इन्द्रिग्रगोचर नहीं है।
तृतीय, यह कहना भी युक्त नहीं है कि सर्वज्ञ का कोई साधक प्रमाण नहीं, क्योंकि सर्वज्ञ का साधक अनुमान प्रमाण है जो इस प्रकार है-सन्तों द्वारा सर्वदा ज्ञात सर्वज्ञ है, क्योंकि उसके विषय में सुनिश्चित बाधक प्रमाण का अभाव है जैसे कि सुख आदि स्वसंवेदन गोचर होने से निर्बाध सिद्ध हैं 110
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जनविद्या-13 ]
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चतुर्थ, मीमांसकों की तीनों शंकाओं का निराकरण एवं सर्वज्ञसिद्धि के पश्चात् प्राचार्य ने ज्ञान की तारतम्यता के आधार पर सर्वज्ञ की सिद्धि की है। सभी व्यक्तियों के ज्ञान में तारतम्य है। एक व्यक्ति का ज्ञान अन्य से अधिक है। दूसरे का पहले व्यक्ति से अधिक है और तीसरे का दूसरे से अधिक है। इस प्रकार कोई व्यक्ति ऐसा है जिसका ज्ञान सबसे अधिक है । जो पूर्ण ज्ञान का धारक है । इस प्रकार जिस व्यक्ति में ज्ञान की अन्तिम अवस्था है जो पूर्ण ज्ञान है, वही सर्वज्ञ है ।
किन्तु यहाँ प्रश्न होता है कि उपर्युक्त सर्वज्ञसिद्धि से सामान्यरूप से सर्वज्ञ की सिद्धि की गई है जिससे यह सिद्ध नहीं होता है कि केवल जिनदेव ही सर्वज्ञ है, कपिल, बुद्ध आदि नहीं। इस समस्या का समाधान करते हुए आचार्य का कहना है कि जिनदेव के अतिरिक्त सभी व्यक्तियों में राग-द्वेष है और जिनमें राग-द्वेष है वे सर्वज्ञ नहीं हो सकते हैं। जिनदेव ही सच्चे वीतरागी हैं, अत: वे ही एकमात्र सर्वज्ञ हैं।
- संसारी व्यक्तियों द्वारा मान्य देवों- ब्रह्मा, विष्णु, महेश्वर आदि में राग, द्वेष, क्रोध, मोह, अहंकार आदि दोष पाये जाते हैं और जिनमें ये दोष हों वह सर्वज्ञ नहीं हो सकता,12 जैसे कि सामान्य व्यक्ति ।
परम ब्रह्म को माननेवालों का मत है कि एक परम ब्रह्म है और इस जगत के जीव उसके अवयव हैं। वह परम ब्रह्म सब दोषों से रहित है ।13 यहाँ प्रश्न होता है कि जब किसी अवयवी के अवयव दोषों से युक्त हैं तब अवयवी दोषों से रहित कैसे हो सकता है ? अर्थात् ब्रह्म के अवयव रूप संसारी जीव राग-द्वेष से युक्त हैं तब वह अवयवीरूप ब्रह्म रागद्वेष से रहित कैसे हो सकता है ? अर्थात् वह वीतरागी नहीं है ।14 अतः वह सर्वज्ञ नहीं।
न्याय-वैशेषिक आदि ईश्वरवादियों का मत है कि ईश्वर जगत का कर्ता है तथा जो जगत का कर्ता है वह विश्वदर्शी होता है। ईश्वरवादियों की युक्ति है कि यह समस्त जगत किसी बुद्धिमान पुरुष से निमित्त है, क्योंकि वह कार्य है और जो जो कार्य है वे किसी न किसी बुद्धिमान के द्वारा बनाए हुए हैं, जैसे-घट । अर्थात् जिस प्रकार कुम्भकार के बिना घट नहीं बन सकता उसी प्रकार जगत के पदार्थ, पर्वत, शरीर आदि ईश्वर के बिना उत्पन्न नहीं हो सकते । प्राचार्य ने इसका खण्डन करते हुए कहा है15 कि जिस प्रकार कर्तव्य हेतु से ईश्वर का कर्तापना और सर्वज्ञता सिद्ध होता है उसी प्रकार वह शरीरवाला भी सिद्ध होता है, क्योंकि कुम्भकार शरीरवाला है और आपने कुम्भकार के दृष्टान्त के द्वारा ईश्वर को जगत का कर्ता सिद्ध किया है। किन्तु इस युक्ति एवं दृष्टान्त से ईश्वर को जगत का कर्ता भी नहीं माना जा सकता, क्योंकि उपर्युक्त तर्क से ईश्वर सशरीरी सिद्ध होता है और यदि ईश्वर सशरीर है तब कुम्भकार की तरह उसको भी प्रत्यक्ष होना चाहिए। किन्तु ईश्वर का
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[ जैनविद्या-13
कुम्भकार की तरह सब को प्रत्यक्ष नहीं होता है। दूसरा यदि सशरीर ईश्वर को माना जाए तब वह सब पदार्थों को उत्पन्न कैसे कर सकता है, क्योंकि सशरीरी द्वारा सब पदार्थों की उत्पत्ति सम्भव नहीं, जैसे कुम्भकार सब पदार्थों को उत्पन्न नहीं कर सकता है । इस प्रकार न तो ईश्वर का अस्तित्व सिद्ध होता हैं और न ही उसका कर्तापना। तब ईश्वर को सर्वज्ञ कहना अर्थहीन है।
बुद्ध भी सर्वज्ञ नहीं,16 क्योंकि उसके द्वारा मानी गई तत्व-व्यवस्था को देखने पर भली-भांति ज्ञात होता है कि परम्परा में विरुद्ध अर्थ का प्रतिपादन होता है और विरुद्ध अर्थ के प्रतिपादन होने के कारण वे सर्वज्ञ कैसे हो सकते हैं ? आचार्य प्रश्न करते हैं कि आपने शून्यत्व को माना है तब यह बतलायें कि सर्व-शून्यता की सिद्धि किस प्रमाण से कहते हैं ? अथवा बिना किसी प्रमाण के ही स्वीकार करते हैं ? यदि किसी प्रमाण से सर्व-शून्यता की सिद्धि करते हैं तब तो सर्व-शून्यता का खण्डन हो जाता है, क्योंकि आपने प्रमाण को स्वीकार कर लिया है। दूसरी ओर यदि बिना प्रमाण के ही सर्व-शून्यता को स्वीकार कर रहे हैं तब तो सभी लोगों का मनचाहा तत्व सिद्ध हो जायेगा और सर्व-शून्यता का निषेध हो जायेगा। दूसरा सर्वथा क्षणिकवाद माना जाये तब वह सब व्यवहार असम्भव हो जायेगा।
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कपिल के सर्वज्ञता का निराकरण करते हुए आचार्य का कहना है कि जो ज्ञान को जड़ प्रकृति का धर्म मानता है और पुरुष को निर्गुण, निष्क्रिय तथा प्रयोजनरहित मानता है वह सर्वज्ञ कैसे हो सकता है, क्योंकि ज्ञान चेतन आत्मा का धर्म है और पुरुष गुणवान तथा सक्रिय है।
उपर्युक्त तर्कों से यह सिद्ध होता है कि वीतरागी के अतिरिक्त कोई सर्वज्ञ नहीं।
1. भारतीय दार्शनिक समस्याएं, पृ. 2, 9, 10 ।
2. अष्टसहस्री, पृ. 50।
3. मीमांसा श्लोकवार्तिक, पृ. 142 ।
4. अपदेसं सपदेस मुत्तममुत्तं च पूज्जयमजादं ।
पलयं गदं च जाणदि तं पाणमदिदियं भरिणदं ॥41॥ -प्रवचन सार
5. परे वदन्ति सर्वतो वीतरागो न विद्यते ।
किचिज्जत्वादशेषाणां सर्वदा रागत्त्वतः ॥ -अमितगति श्रावकाचार 4.48
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जैनविद्या-13 ]
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6. तदयुक्तः वचस्तेषां ज्ञानं सर्वार्थगोचरम् ।
न विना शक्यते कतुं सर्वेषु ज्ञानवारणम् ॥ -वही 4 49 7. समस्ताः पुरुषाः येन कालत्रितयत्तिनः ।
निश्चिताः स नरः शक्तः सर्वज्ञस्य निषेधने ॥ -वही 4.50
8. न चाभावप्रमारणेन शक्यते स निषेधितुम् ।
सर्वज्ञऽतीन्द्रियं तस्य प्रवृत्तिविगमत्वतः ॥
-वही 4.51
9. प्रमाणाभावतस्तस्य न च युक्तं निषेधनम् ।
अनुमानप्रमाणं हि साधकं तस्य विधते ॥ -वही 4.52 10. वीतरागोऽस्ति सर्वज्ञः प्रमाणाबाधितत्त्वतः ।
सर्वदा विदितः सद्भिः सुखादिकमिवध्र वम् ।। -वही 4.53 11. वीतरागश्व सर्वज्ञो जिनएवावशिष्यते ।
अपरेषामशेषाणां रागद्वेषादि दृष्टितः ॥ -वही 4.70
12. न विरागा न सर्वज्ञा ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः ।
रागद्वेषमदक्रोधलोभमोहादियोगतः ॥
-वही 4.71
13. परमः पुरुषो नित्य: सर्वदोषेरपाकृतः ।
तस्यतेऽवयवाः सर्वे रागद्वेषादिभाजिनः ॥ -वही 4.75
14. नैवाधिरोचते भाषा विचारोद्यतचेतसाम् ।
रागत्वेऽवयवानां हि नीरागोऽवयवी कुतः ॥ -वही 4.76
15. यो ज्ञात्वा प्राकृतं धर्म भाषतेऽसौ निरर्थकः ।
निर्गुणो निष्क्रियो मूढ सर्वज्ञ कपिलः कथम् ॥ -वही 4.91
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[ जनविद्या-13
ज्ञानेन पुंसां सकलार्थसिद्धि:.......
शौचक्षमासत्यतपोदमाद्या गुणाः समस्ताः क्षणतश्चलन्ति । ज्ञानेन होनस्य नरस्य लोके वात्याहता वा तरवोऽपि मूलात् । 2041
।
शानेन पुंसां सकलार्थसिद्धिर्ज्ञानवृते काचन नार्थसिद्धिः । मानस्य मत्वेति गुणान् कदाचिन्जानं न मुञ्चन्ति महानुभावा. । 2021
गन्तुं समुल्लङध्य भवाटवीं यो ज्ञानं विना मुक्तिपुरी समिच्छेत् । सोऽन्धोऽन्धकारेषु विलाध्य दुर्ग वनं पुरं प्राप्तुमना विचक्षुः । 2011
-सुभाषितरत्नसंदोह
--जिस प्रकार प्रांधी के वेग से वृक्ष मूल से उखड़कर गिर पड़ते हैं उसी प्रकार जो पुरुष ज्ञान
से हीन होते हैं, अज्ञानमय जीवन जीते हैं, (प्रसंग आने पर) उनके शुचिता-पवित्रता-क्षमासत्य-तप-संयम आदि समस्त गुण क्षणमात्र में नष्ट हो जाते हैं। परन्तु ज्ञानी कितना भी संकट आने पर भी अपने गुणों से च्युत नहीं होते, दृढ़प्रतिज्ञ होकर गुणों का पालन करते हैं 12041
-इस संसार में समस्त पुरुषों को ज्ञान से ही समस्त प्रयोजनों की सिद्धि होती है। ज्ञान के बिना केवल क्रियाकांड से किंचित् मात्र भी इष्टसिद्धि नहीं होती। इस प्रकार ज्ञान का महत्त्व जानकर अपना हित चाहनेवाले संत-पुरुष ज्ञान को कभी भी छोड़ते नहीं। सदैव ज्ञान के उपार्जन में लगे रहते हैं । 2021
-जो पुरुष ज्ञान के बिना इस संसाररूपी पृथ्वी को पार करके मुक्तिपुरी को जाना चाहता है वह आँखों से हीन अन्धा पुरुष गहन अन्धकार में गहनवन को पार करके नगर को जाना चाहता है। अर्थात् जैसे अन्धे मनुष्य का रात्रि के घोर अन्धकार में गहन वन को पार करके नगर में पहुंचना सम्भव नहीं है वैसे ही ज्ञान के बिना संसाररूप गहनवन को पार करके मोक्ष प्राप्त करना सम्भव नहीं है ।2011
-अनु. पं. बालचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री
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जैन विद्या-13 ]
अप्रैल-1993
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आचार्यश्री अमितगति की
सर्वोपयोगी रचना भावना-द्वात्रिंशतिका-सामायिक पाठ
पं. नाथूराम डोंगरीय जैन
सिद्धान्तबर्मन प्ररमपूज्य प्राचार्यश्री अमितजति ने धर्म-प्रभावना बहुआयामी अनेक मन्त्रों की अब से करीब एक हजार वर्ष पूर्व (वि. सं. 1050 से 1078 के बीच) रचना कर साहित्य, समाज एवं धर्म की ब्रहुमूल्य मेवा की श्री। उन्होंने सुभाषितरत्नसंदोह, धर्मपरीक्षा, उबासकाचार, तत्त्वभावना, अाराधना, पंचसंग्रह, जम्बूद्वीप-प्रज्ञप्ति, चन्द्रप्राप्ति, क्याख्याप्रज्ञप्ति, बार्द्धद्वयद्वीपप्रज्ञप्ति, भावना-द्वात्रिंशतिका आदि रचनाओं द्वारा मानव-समाज को अनुपम निधियाँ प्रदान की हैं जो अाज स्वाध्याय द्वारा जैनधर्म एवं सिद्धान्त का मर्म समझो में अमोघ साधन बनी हुई हैं। इन ब्रहुमूल्य रचनाओं ने प्राचार्दाश्नी की ज्ञान-गरिमा का सहज ही आभास हो जाता है।
यद्यपि आको सभी रजनाएँ जानवर्धक होने में महत्वपूर्ण हैं तापि भावनाद्वात्रिंशतिका लवुकाय होने पर भी सूत्ररूप में एक ऐसी रचना है जो न केवल मुनिवृन्द को प्रत्युत मानवमात्र को प्रात्मशुद्धि हेतु कण्ठस्थ कर प्रतिदिन और प्रतिक्षण पाठ कर अपने भावों में पवित्रता का संचार एवं आत्मा को स्वस्थ बनाए रखने का भी प्रमुख साधन बन गया है। इसमें निश्चय और व्यवहार की समन्वित भावना से अपनी अपरिमित भगवद्भक्ति तथा प्रात्मानुभूत उद्गारों को आत्मविभोर होकर बड़ी तत्परता के साथ अभिव्यक्त किया गया है। इसका पाठ करते समय आत्मा में विशुद्ध भावों की उद्भूति के साथ ही वीतराग भावों का संचार भी स्वय होने लगता है-यदि पाठ मन लगाकर, एकाग्र होकर किया जावे । फलस्वरूप इससे अलौकिक पूर्वबद्ध पापकर्मों का क्षय होने से मोक्षमार्ग भी प्रशस्त होता है ।
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[ जैनविद्या-13
प्रस्तुत रचना में प्राचार्यश्री ने शुद्ध हृदय से निःसंकोच होकर अपने पूर्वकृत् अपराधों पर पश्चात्ताप करते हुए जिनेन्द्रदेव के अपरिमित गुणों के प्रति अपनी श्रद्धा-समन्वित भक्ति को उंडेल कर रख दिया है। यही कारण है जो इसका पाठ श्रावक और मुनिवृन्द भी भक्ति-भाव से करते हुए आज भी कृतार्थ होते हैं । इस रचना का महत्त्व और उपयोगिता इससे स्वयं सिद्ध हो जाती है। समाज में इसे सामायिक पाठ भी कहा जाता है ।
रचना का प्रारम्भ प्राचार्यश्री ने व्यवहार नय का आश्रय लेकर किया है। सर्वप्रथम उन्होंने विश्व के समस्त प्राणियों के प्रति मैत्रीभाव, गुणीजनों के प्रति प्रमोद व दुःखी जीवों के प्रति करुणाभाव बनाए रखकर विपरीत वृत्ति रखनेवाले कुमार्गगामियों के प्रति तथा अपने प्रति भी अकारण द्वेष रखनेवालों के प्रति मध्यस्थ बने रहने की जिनेन्द्रदेव से विनम्र प्रार्थना की है। तत्पश्चात् अपनी आत्मा को अनंतशक्त्यात्मक अनुभव करते हुए शरीर के बन्धन से उसी प्रकार मुक्त हो जाने की सुदृढ़ भावना को अभिव्यक्त किया है जिस प्रकार म्यान से तलवार को खींचकर बाहर कर दिया जाता है। फिर सुख दुःख में, शत्रु-मित्र में, संयोगवियोग में, राग-द्वेष, हर्ष-विषादादि भावों से दूर रहकर साम्य भावी बने रहने की अपनी प्रबल इच्छा प्रकट की है। साथ ही पवित्र मन से इस' उत्कट भावना को भी व्यक्त किया है कि हे भगवन् ! आपके चरण-कमल मेरे हृदयस्थल में सदा के लिए बैठ जावे अथवा कीलित होकर रह जावें ताकि वे तमनाशक दीपक की भांति प्रकाशमान रहकर मोहांधकार में पड़ने से मुझे निरन्तर बचाए रहें और सन्मार्ग का दर्शन कराते रहें।
- इसके पश्चात् उन्होंने कषायभावों द्वारा प्राणियों के प्रति किए गए कदाचार की क्षमायाचना की है। लिखते हैं- यदि मैंने पूर्व में किसी प्राणी का प्रमादवश प्राणापहरण किया हो या चित्त भी दुःखाया हो तो वह मिथ्या हो तथा चारित्रशुद्धि हेतु अन्य पूर्वकृत सभी अपराध भी मिथ्या हों। इसी प्रकार मनवचनकायकृत समस्त पापों की निन्दा, गरहा और आलोचना करते हुए अपने व्रतों और शीलों में भी अतिक्रम, व्यतिक्रम, अतीचार और अनाचारों द्वारा जो दोष लगाए हों उनके लिए भी हे जिनेन्द्र ! पश्चात्ताप करता हुआ मैं क्षमा चाहते हुए उनके मिथ्या होने की भावना भाता हूँ।
___ आचार्यश्री ने फिर जिनवाणी माता (सरस्वती) की स्तुति करते हुए प्रार्थना की है कि हे देवी ! यदि प्रमादवश मुझ से अक्षर, पद, मात्रादि से विहीन कुछ कहा गया हो तो क्षमा प्रदान कर मुझे केवलज्ञान-लक्ष्मी की प्राप्ति करावें तथा तेरे प्रसाद से मुझे बोधि और समाधि भी प्राप्त हो ताकि मैं अपने इच्छित लक्ष्य को प्राप्त करने में समर्थ हो सकू।
इस प्रकार अपनी इन पवित्र भावनाओं एवं उद्गारों की अभिव्यक्ति के पश्चात् उन्होंने भाव-विभोर होकर अत्यन्त विनम्रतापूर्वक जिनेन्द्रदेव के अपरिमित, अनिर्वचनीय गुणों एवं महिमा का अत्यन्त प्रभावोत्पादक शब्दों में स्तवन प्रारम्भ किया है। जिनका स्मरण
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तथा स्तवन आत्मशांति प्राप्त करने एवं कर्मों की निर्जरा करने हेतु सुरेन्द्र, नरेन्द्र, मुनीन्द्र ( गणधरादि ) अत्यन्त श्रद्धा और भक्ति के साथ किया करते हैं तथा वेद, पुराणादि शास्त्रों में भी जिनका गौरवमयी यशोगान प्रमुखता के साथ बारम्बार किया गया है। जो देवों के मी देव हैं, अपने दर्शन, ज्ञान, सुख-स्वभाव से समृद्ध हैं, समाधिगम्य हैं एवं समस्त विकारों से रहित होने से परमात्म संज्ञा को धारण करते हैं । वे जगत् के प्रकाशक हैं, जन्म, जरा और मृत्यु से रहित हैं तथा योगि- ज्ञान-गम्य हैं । मुक्ति मार्ग का सार्वधर्म के रूप में प्रतिपादन करने से वे त्रिलोकीनाथ हैं - जिन्होंने, राग, द्वेष, मोहादि विकारों से रहित होकर भी तीनों लोकों के समस्त प्राणियों को बिना किसी भेदभाव के परम कारुण्य भाव से मुक्तिमार्ग का प्रतिपादन कर (सम्पूर्ण दुःखों से त्राण पाने हेतु) मानो अपनी गोद में ही बिठा लिया है ।
वे भगवान् इन्द्रिय ज्ञान जो परोक्ष कहलाता है— से रहित हैं, किन्तु अतीन्द्रिय आत्मोत्थ प्रत्यक्ष निरावरण ज्ञान 'संसार के समस्त पदार्थों एवं उनकी गतिविधियों की बिना प्रयास किये जानकारी रखने के कारण सर्वव्यापक हैं । वे विकार - विनाशक और कर्मकलंकरहित होकर शुद्ध हैं, बुद्ध हैं, निरंजन और निर्विकार हैं । वे अपने ज्ञान के द्वारा विश्वव्यापी होकर भी आत्म-स्वरूप में स्थित हैं । वे शांत एवं शिव-स्वरूप हैं । फिर अतुल्य एवं अनन्त गुण विशिष्ट हैं । ऐसे हे वीतराग जिनेन्द्र देव ! मेरे हृदय में आकर विराजो |
देव ! आपका ध्यान करने से प्राणियों के सभी प्रकार के प्रांतरिक विकार दूर हो जाते हैं और उनसे कर्म -कालिमा वैसे ही दूर रहती है जैसे कि सूर्य से अन्धकार | आप स्वयं भी कर्ममलों से रहित, नित्य और द्रव्य-दृष्टि से एक होकर भी अपने अनन्त गुणों एवं पर्यायों की दृष्टि से अनेक भी हैं । हे भगवन् ! आपमें विश्वव्यापी समस्त पदार्थों का प्रकाशक अनन्त ज्ञान विद्यमान है जिसकी सूर्य भी तुलना करने में असमर्थ है । आपके ज्ञान में अपनीअपनी सत्ता को लिये हुए समस्त पदार्थ पृथक्-पृथक् स्वयं ही स्पष्टतया झलकते रहते हैं ।
प्रभो ! आपने दुर्जेय कामविकार के साथ ही, दुरभिमान, मूर्छा, विषाद, निद्रा, चिन्ता, भय, शोकादि समस्त दोषों को इस प्रकार ध्वस्त कर दिया है जिस प्रकार दावानल वन-वृक्षों को जलाकर भस्म कर देती है । हे देव ! आपके इन्हीं सब सद्गुणों एवं महिमा से प्राकृष्ट होकर मैंने आपकी शरण ली है ।
इस प्रकार भगवज्जिनेन्द्र के गुणों का स्मरण, स्तवन एवं अभ्यर्थना करते हुए प्राचार्यश्री ने निश्चय का प्रालंबन लेकर अपनी आत्मा एवं उसके कर्तव्य के प्रति अपना ध्यान प्राकृष्ट किया है । वे स्वयं को सम्बोधित करते हुए लिखते हैं कि वास्तविक दृष्टि से सर्वगुणसम्पन्न कारण-परमात्मा के रूप में अपनी आत्मा ही सम्यक् समाधि का साधन है अतः श्रात्ममिन पाषाणशिलाएँ, चटाइयाँ, भूमियाँ, संधारा अथवा लोकपूजा, संघसंगति आदि समस्त बाह्य पदार्थों की वासना से मुक्त होकर उन्होंने श्रात्मलीन हो जाने की प्रांतरिक भावना को
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व्यक्त किया है । चूंकि समस्त बाह्य पदार्थ आत्मा से भिन्न हैं और इनके संयोग से ही प्रात्मा मोह में पड़कर अनेक प्रकार के रागद्वेष करता हुआ दुःखों का पात्र बना रहता है, अतः बाह्य पदार्थों के संयोग का मन, वचन, काय से परित्याग कर तथा संयोगजन्य सम्पूर्ण संकल्प-विकल्पों से दूर रह अपनी सर्वविविक्त आत्मा को देखते हुए परमात्म तत्त्व में लीन हो जाने का उन्होंने अपना दृढ़ संकल्प व्यक्त किया है।
आचार्यश्री ने वास्तविक दृष्टि से अपनी आत्मा को ही ज्ञान, दर्शन, सुखादि अनन्तगुण-सम्पन्न होने से उसे ही आश्रय योग्य मानते हुए प्रात्मभिन्न संसार के समस्त पदार्थों में प्रात्मबुद्धि का परित्याग करते हुए एवं उनके सुखाभासी संयोग को भी अस्थिर जानते हुए उनके प्रति अनास्था का भाव प्रकट किया है। वे कहते हैं कि जब एकीमाव को प्राप्त यह शरीर भी अपना नहीं है तब पुत्र, मित्र, कलत्रादि अपने कैसे हो सकते हैं ? इस अन्यत्व भावना के साथ एकत्व भावना को भाते हुए उन्होंने आत्मलीन हो जाने का संकल्प बारम्बार अभिव्यक्त किया है । आत्मशुद्धि हेतु आत्मा को ही रुचिपूर्वक लक्ष्य बनाकर मनन-चिन्तन करने की उनकी ये पवित्र भावनाएं ही हमें भी इस ओर ध्यान देने हेतु प्रेरणास्पद बनी हुई हैं।
अन्त में प्राचार्यश्री ने जैनदर्शन के प्राण प्रात्म-स्वातन्त्र्य की घोषणा करते हुए अकर्तावाद की पुष्टि की है। लिखते हैं-आत्मा द्वारा पूर्व में किये गए कर्मों का फल सुख या दुःख के रूप में स्वयं ही प्राप्त होता रहता है यदि अपने कर्मों का फल कोई अन्य (ईश्वर या देवी-देवता आदि) देवे तो अपने द्वारा किया गया कर्म निरर्थक हो जायेगा। तात्पर्य यह कि निश्चय दृष्टि से अपने द्वारा अजित कर्मों के सिवाय अन्य कोई किंचित् भी अपना उपकार या अपकार करनेवाला नहीं है । अतः "स्वर्ग-मोक्षदाता कोई परमात्मा या ईश्वरादि है" ऐसा काल्पनिक बुद्धिजन्य भ्रम का परित्याग कर आत्मकल्याण करने का सत्पुरुषार्थ करना ही श्रेयस्कर है। लोक में ईश्वर या अन्य किसी देवी-देवता की जो परकर्तृत्व-सम्बन्धी मान्यता है वह भ्रमपूर्ण होने से किसी के भरोसे केवल निमित्ताधीन प्रात्मकल्याण हो जाने की वासना का परित्याग कर मानव को अपना पुरुषार्थ करने के लिए प्रेरित करनेवाला आचार्यश्री का यह शुभ सन्देश है, जो सचमुच ही हमारे ध्यान देने योग्य है ।
रचना के सर्वान्त में आचार्यश्री ने वीतराग परमात्मा के ध्यान से वीतरागता को आत्मसात् कर परमात्मा बन मुक्तिश्री का लाभ प्राप्त करलेने का सन्देश प्रदान कर रचना को समाप्त किया है।
यदि निष्कर्ष निकाला जावे तो यही निकलता है कि प्राचार्यश्री अमितगति ने जिनस्तवन एवं धर्मध्यानमयी शुभोपयोग द्वारा शुद्धोपयोगी बनने की अपनी प्रांतरिक उत्कट भावना को इस रचना द्वारा अभिव्यक्त किया है। अशुभ भाव एवं भावनाओं के साथ पापक्रियाओं का परित्याग कर शुभभावपूर्वक व्रत, शील, संयमादि-रूप शुभाचरण करते हुए शुद्धोपयोगी
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बनकर प्रात्मा को परमात्मा बना लेना ही जिनशासन का सारभूत उपदेश है । यद्यपि जिनस्तधन या भक्ति करने में शुभराग का अंश होने से साधक को अपरिमित एवं सातिशय पुण्य का संचय भी होता है, किन्तु इसके द्वारा शुभकर्मों का संवर और बद्धकर्मों की निर्जरा होने से भक्त का कर्मभार बहुत ही कम हो जाता है और भावों में वीतरागता का जो संचार होता है उससे उसका मोक्षमार्ग भी प्रशस्त होने लगता है ।
अनेक सज्जन निश्चयकांत का पक्ष ग्रहण कर यह मानते और प्रचार करते भी देखे जाते हैं कि जैनशासन में वंद्य-वंदक या पूज्य-पूजक भाव ही नहीं है। सम्भवतः वे इसलिए जिन दर्शन-वंदन, स्तवनादि रूप आचरण को केवल बन्ध का ही कारण मानते हैं एवं स्वयं रागी, द्वेषी व दुःखी रहते हुए भी प्रात्मा को शुद्ध, बुद्ध, निरंजन, निर्विकार सर्वथा मान सन्तुष्ट हैं। उन्हें भी प्राचार्यश्री की यह रचना अपना भ्रम-निवारण करने में उपयोगी सिद्ध हो सकती है यदि वे अपनी भ्रांतियों से मुक्त होना चाहें। परम आध्यात्मिक सन्त श्रीमद्भगवत् कुन्दकुन्द स्वामी ने अरहन्त-भक्ति को सम्यक्त्व कहा है । उनके शब्द हैं -
प्ररहन्ते सुहभत्ती सम्मत्तं दंसणेण सुविसुद्धं । सोलं विषयविरागो गाणं पुणकेरिसं भणियं ।।40॥ शीलपाहुड़
इस गाथा का अर्थ करते हुए पं. प्रवर जयचन्दजी लिखते हैं-"अरहन्त में शुभ भक्ति का होना सम्यक्त्व है । वह कैसा है, सम्यग्दर्शन (श्रद्धा) से विशुद्ध है-तत्त्वार्थों का निश्चयव्यवहार रूप श्रद्धान और बाह्य जिनमुद्रा नग्न दिगम्बर रूप का धारण तथा उसका श्रद्धान ऐसा दर्शन से विशुद्ध अतीचाररहित निर्मल है, ऐसा तो अरहन्त-भक्तिरूप सम्यक्त्व है । विषयों से विरक्त होना शील है और ज्ञान भी यही है, तथा इससे भिन्न ज्ञान कैसा कहा है ? सम्यक्त्वशील बिना तो ज्ञान मिथ्यारूप अज्ञान है ।"
' एकीभाव स्तोत्र में वादिराज मुनिराज ने जिनेन्द्र-मक्ति को कर्मबन्धन को समाप्त करनेवाली कह कर अन्य समस्त दुःखों को दूर करनेवाली दर्शाया है परम श्रद्धास्पद मानतुंग स्वामी ने भक्तामर स्तवन में जिन-स्तवन को जन्म-जन्मान्तर के पापों का नाश करनेवाला प्रतिपादित किया है-त्वत्संस्तवेन भवसंतति सनिबद्धं, पापं क्षणात् क्षयमुपैति शरीरभाजाम् आदि ।7। आगे उन्होंने 10वें श्लोक में भगवान् की गुणगान द्वारा उपासना करनेवालों को भगवान् ही बन जाने की सुदृढ़ श्रद्धा को भी अभिव्यक्त किया है। अन्य आचार्यों ने भी भगवद्भक्ति को प्रात्मकल्याण का सरल और अमोघ साधन मान शत मुख से प्रशंसा की है। साधु के मूलगुणों के अन्तर्गत षड् आवश्यकों में भी प्रतिदिन वन्दना और स्तुति करने का विधान किया गया है। प्राचार्य समन्तभद्र ने तो प्रायः जिन-भक्तिपरक ग्रन्थों की ही रचना की है।
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भावना द्वात्रिंशतिका में भी इसी तथ्य को उजागर कर प्राचार्यश्री अमितगति कृतार्थ हुए हैं । यहाँ यह उल्लेखनीय है कि सम्यग्दृष्टि भगवद्भक्ति वीतराग बनकर कर्मोच्छेद करने के पवित्र उद्देश्य से ही करता है, पुण्यबन्ध के उद्देश्य से नहीं। भले ही भक्ति-भावों में शुभराग के अंशों द्वारा सातिशय पुण्य का स्वयं ही संचय भी होता है । जैसे किसान अनाजप्राप्ति के उद्देश्य से बीज बोता है, किन्तु भूसे की प्राप्ति उसे प्रासंगिक रूप में स्वयं होती है । अतः पुण्य-संचय के भय से भगवद्भक्ति से विरत हो जाना और उससे अशुभ कर्मों के संवर तथा बद्ध कर्मों की निर्जरा द्वारा होनेवाले लाभ से वंचित हो जाना बुद्धिमत्ता नहीं है।
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समभावप्रतिक्रियारहित जीवन
-अ.कु. कौशल जी
__ जो प्रतिक्रिया-रहित जीवन जीता है वही स्वाधीन है, स्वतन्त्र है । वही जीवन्मुक्त या वीतरागी कहलाता है । प्रतिक्रिया-विहीन अवस्था का नाम ही सामायिक, समभाव चारित्र वा धर्म है अथवा मोह और क्षोभ से रहित प्रात्म-परिणाम का नाम समभाव, चारित्र वा धर्म है। किन्तु जिन जीवों को तनिक से बहिरंग वा अन्तरंग निमित्त आते ही अनुराग-द्वेषराग रूप प्रतिक्रिया होती है, वे सुख-दुःख, क्षोभ-भयमय परतन्त्र जीवन व्यतीत करते हैं । जीवन में प्राकृतिक-मानवीय-तियंच व देवकृत अथवा कर्मोदय-जनित निमित्त पाते ही रहते हैं, इनमें प्रतिक्रिया-रहित स्वाधीन जीवन जीना ही सामायिक-साधना का उद्देश्य है । उस समभाव में जीव किसी भी अवस्था में, किसी भी क्षेत्र में स्थित हो सकता है। क्योंकि यह प्रात्मा का निजी व स्वाभावाविक परिणाम है। स्वभाव स्व-प्राश्रित होता है और विभाष पर-प्राश्रित । जितने भी वभाविक भाव हैं वे सब निमित्ताश्रित हैं। उन निमित्त व परावलम्बन से उपयोग को हटाते ही स्वभाव उदय हो जाता है। ऐसे उस समभाव को जागृत करने के लिए प्राचार्य अमितगति जी ने सामायिक पाठ में चार प्रमुख बातें कही हैं
मैत्रीभाव - प्रथम अवस्था में साधक द्वेषभाव का त्याग करें। कलुष परिणाम भावों का विष है जिसमें तनाव है, विकर्षण है । तनिक से भी कलुष परिणाम से सामायिक में प्रवेश असम्भव है। वह भाव संसार व मुक्ति दोनों मार्ग का बाधकतत्त्व है। द्वेष भाव को जीतने के लिए गुणग्राही दृष्टि होनी अपेक्षित है जिससे प्रेम का उदय होगा। इसी प्रेम के
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भिन्न-भिन्न पात्रों के अनुसार भिन्न नाम हो जाते हैं. यथा - मैत्री, प्रमोद, कारुण्य का
माध्यस्थ ।
सत्त्वेषु मैत्री गुरिणषु प्रमोद, क्लिष्टषु जीवेषु कृपापरत्वम् ।। माध्यस्थभाव विसरीतवृत्तौ सदा ममात्मा विदधातु देवः ।।
जागरूकता एवं प्रात्मालोचन-सामायिक का दूसरा सूत्र है - जागरूकता,. अपने भावों व मन-वचन-काय की क्रियाओं के प्रति पूर्ण जागरूकता होना । जीव मरे या जीये इससे पापबंध नहीं होता, किन्तु जो व्यक्ति प्रमादी या प्रयत्नाचारी है उसकी प्रवृत्ति से जीव ना मरने पर भी कर्मबन्ध होता है । कर्मबन्ध का कारण जीव-हिंसा नहीं, अयत्नाचार . या प्रमाद है । इसलिए, प्रमाद व मूछी का परित्याग हो तदुपरान्त आत्मनिरीक्षण से चित्त के प्रत्येक कोने में छुपे विकारी तत्वों को पहिचानें और गुरु के समक्ष विवेचन करें। रोम को छुपाने व दबाने से स्वास्थ्य प्राप्त नहीं होता। भीतर के विजातीय तत्वों को विवेक व जागरूकता से निकाल फेंकें जिससे आत्मा का कायाकल्प हो । दोष होना मानवीय दुर्बलता है, किन्तु उसको छिपाना अपराध हैं। दोष के प्रति ग्लानि का भाव' दोष-शुद्धि का सशक्त उपाय है । दोष करके भी दोष के प्रति ग्लानि का अहसास न होना बड़ा अपराध है. जिसको प्राचार्य जी ने अत्यन्त मार्मिक परिभाषा में गूंथा है--
क्षति मनः शुद्धि विधेरतिक्रमं व्यतिक्रम शीलव्रते-विलंघनम् । प्रभोऽतिचारं विषयेषु वर्तनं, वदन्त्यनाचारमिहातिसक्तताम् ।
संयम-व्रत आदि के प्रति मन की शुद्धि न रहना वह अतिक्रम है । व्रत की सुरक्षा के लिए ग्रहण किये उपनियमों में शिथिलता होना व्यतिक्रम है । विषयों में प्रवृत्त होना अतीचार है । किन्तु विषय-निवृत्ति के प्रति आकांक्षा न रहना, अथवा व्रत के प्रति बहुमान का अभाव हीना अनाचार है । तात्पर्य-व्रत टूट जामे के पश्चात् भी जब तक व्रत में स्थित होने की भावना व प्रयास है, तब तक वह वृत्ति प्रतीचार कहलाती है अनाचार नहीं। क्योंकि उसमें सुधार की सम्भावना है, पूर्ण जागरूकता है। यद्यपि पूर्व संस्कारवश स्खलित हो जाता है तो भी उस संस्कार की गुलामी छोड़ने की आकांक्षा है। यह आकांक्षा भावात्मक चारित्र है जो उसे विषय-निवृत्ति के लिए शक्ति प्रदान करती है । गिरकर उठने की कामना रखनेवाला अवश्य ही उठ जाता है । जब संयम में उपस्थापन की भावना जन्म लेती है तब वह अनाचार कहा जाता है । इस नियम के अनुसार बड़े से बड़ा दोष भी अतीचार हो सकता है तथा छोटे से छोटा दोष भी अनाचार की कोटि में आ जाता है।
उत्तरदायी कौन ?-आदमी की सामान्य मामसिक प्रवृत्ति है कि वह कषाय-दुःखबम्धनादि का कारण दूसरों को ठहराकर स्वयं को दोषमुक्त अथवा स्वच्छ सिद्ध करता है ।
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उसमें विभिन्न परिस्थिति, व्यक्ति अथवा कर्मोदि को अनिष्ट का कारण कहकर अपनी कमजोरी को दूसरों पर थोप देता है । सब अच्छी क्रियाएं व फल अपनी झोली में बटोर लेता है | जैसे - " अमुक व्यक्ति ने मुझे क्रोध दिला दिया' अथवा 'विकट परिस्थिति के कारण मैंने "झूठ बोला' आदि 1 दूसरे रूप से 'अगर मैं न होता तो यह बच्चा बड़ा आदमी न बनता ' -आदि । यहाँ आचार्यश्री ने स्पष्ट उद्घोष किया है कि प्रत्येक जीव अपने कृतकर्म का ही फल भोगता है—
स्वयं कृतं कर्मे यदात्मना पुरा, फलं तदोयँ लभते शुभाशुभम् १ परेण दत्तं यदि लभ्यते स्फुटं स्वयं कृतं कर्म निरर्थकं तदा
निजाजितं कर्म विहाय देहिनो, न कोऽपि कस्यापि ददाति किंचन । विचारयन्नेवमनन्यमानस, परो ददाति इति विमुच्य शेमुषीम् ॥
एक के कर्म का फल दूसरा आत्मदोष निवृत्ति का उपाय खोजो विधाता हो ।
नहीं भोग सकता । अतः परदोषारोपण वृत्ति को छोड़ अपनी छुपी शक्ति को जागृत करो। तुम स्वयं प्रपने
श्रात्मशरण्य - चौथा अन्य प्रमुख तथ्य है कि प्राचार्यश्री ने किसी भगवान या परमात्मा की शरण लेने की प्रेरणा नहीं दी । व्यक्ति स्वयं परमात्मा है । स्वयं की शरण लो, पर की शरण पराधीनता है, दुःख है, बन्धन है । वह पारिणामिक भावरूप परमतत्त्व जन्म-मरण से रहित, बन्धन और मुक्ति के विकल्प से मुक्त, विकाररहित, ध्रुव है, सहजज्ञानमात्र है । वह इन्द्रिय-ज्ञान का विषय नहीं है । वह तो अनुभवगम्य है । जो एक है, साश्वतं है, निर्मल है, वह स्वयं तू है ।
वास्तव में तो वह तत्त्व प्रवाच्य है । फिर भी जिसको ऋषियों ने 'नेति नेति' कहा है वह चैतन्य तत्त्व बाह्य पदार्थों से सर्वथा भिन्न है | स्त्री-पुत्रादि सम्बन्धी तो सर्वथा भिन्न हैं ही, वह तो शरीर व रागादि भावों से सर्वथा पृथक् है । विचारों न मैं किसी का हूँ, न कोई दूसरा मेरा है | किंचित् मात्र भी बाह्य पदार्थ मेरा नहीं है । जितने भी पदार्थाश्रित प्रिय अप्रियता के भाव हैं वे सब उस परमतस्व में नहीं हैं । त्रिविधि विकारोभावों से भिन्न सर्व विकल्पों को त्यागकर उस चैतन्यरूप परमतत्त्व में लीन हो जाओ। वही परमतत्त्व है, परमात्मा है । ऐसे सहज समाधि की प्रेरणा दी है । कहा है
सर्व निराकृत्य विकल्पजालं, संसार कान्तार निपात हेतुम् । विविक्तमात्मानमवेक्ष्यमाणो, निलोयसे त्वं परमात्मतत्त्वे ॥
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... ज्ञाता-दृष्टा की इस साधना में न किसी संघ की न किसी क्षेत्र-काल वा आसनादि की अपेक्षा है । ये सब साधन भी विकल्प हैं। जब जहाँ हैं वहीं चैतन्यभाव में स्थिर हो जागो । ऐसी प्रेरणा दी है। वह सहज-आनन्दरूप अवस्था अभी इसी क्षण तुम्हें हो सकती है । जागो और देखो-आनन्द में लीन हो जाओ।
मात्मानमात्मन्यवलोकमानस्त्वं दर्शनज्ञानमयो विशुद्धः । एकाग्रचित्तः खलु यत्र-तत्र स्थितोऽपि साधुर्लभते समाधिम् ॥
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भावना-द्वात्रिंशतिका-शान्तरस का निर्झर
-डॉ. कु. पाराधना जैन 'स्वतन्त्र'
काव्यशास्त्रियों ने रसात्मक वाक्य को काव्य कहा है । किसी रचना को पढ़कर हृदय में जो एक विशेष भाव की जागृति होकर आनन्दानुभूति होती है वह रस है । रसों की संख्या नौ है-1. शृगार, 2. हास्य, 3. करुण, 4. रौद्र, 5. वीर, 6. भयानक, 7. वीभत्स, 8. अद्भुत और 9. शान्त । इनमें रसराज अर्थात् प्रमुखतम रस कोनसा है इस सम्बन्ध में काव्यशास्त्रियों में मतभेद है । कुछ शृंगार को रसों का राजा मानते हैं तो कुछ शान्त को । शान्त रस समभाव को जागृत करनेवाला होने से योगीगण स्वभावतः इसे ही प्रमुखता प्रदान करते हैं जबकि भोगी इससे ठीक विपरीत आचरण करते हैं ।
जब मानव समस्त बाह्य जगत से नाता तोड़ प्रात्मोन्मुख होता है तब आत्मा में समत्व जागृत होता है । तब उसके लिए कंचन-काच, महल-मसान, धनी-निर्धन आदि में कोई भेद नहीं होता। जितनी मात्रा में विरक्तभाव होता है उतनी मात्रा में समत्व जागृत होकर मात्मा में शान्त रस की निष्पत्ति होती है। सच्चे साधु ऐसे ही समत्व के साधक, शांत एवं भद्रपरिणामी होते हैं जिन्हें देखकर मानव का मस्तक स्वतः ही श्रद्धा से उनके आगे नत हो जाता है।
शान्तिपथ के पथिक आचार्य अमितगति ने अपनी वीतरागी साधना और प्रखर प्रतिभा का सदुपयोग करते हुए मोक्षमार्ग के प्ररूपक शास्त्रों/साहित्य का सर्जन किया है जो सहृदय के हृदय को शांत रस से सराबोर कर देते हैं। प्राचार्यश्री की एक ऐसी ही कृति है-भावना द्वात्रिंशतिका । बत्तीस श्लोकों की यह लघु कृति एक ऐसा प्रकाश स्तम्भ है जिसके आलोक
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में हम अपने बहुल सुविधाभोगी जीवन में सात्त्विक, तात्त्विक एवं आध्यात्मिक जीवनमूल्य खोज सकते हैं। तत्वचिंतन के द्वार खोलकर, सही दिशा में सही पुरुषार्थ करके साम्यभाव द्वारा आत्मानन्द में डुबकी लगाकर सुख शांति का अनुभव कर सकते हैं ।
___ आचार्यश्री अमितगति ने 'भावना द्वात्रिंशतिका' में प्रात्मविशद्धि के विभिन्न साधनों जैसे समता भाव, प्रायश्चित इत्यादि संसार के निस्सार एवं दु:खमय स्वरूप, संसार परिभ्रमण के कारण और निवारण के उपाय, संसार-भीरुता, वैराग्य, तत्त्वज्ञान आदि विभावों, यम, नियम, ध्यान, धारणा, सर्वभूतदया, प्रभृति अनुभावों, निर्वेद, स्मृति, शौच आदि व्यभिचारीभावों का मानसपटल पर अंकित करनेवाला चित्रण किया है जिससे सहृदय स्थित 'शम भाव' जागृत हो जाता है और वह शान्तरस के सागर में निमग्न हो आनन्दानुभूति करता है ।
कृति के प्रथम पद्य में कवि की 'सर्वजनहिताय एवं स्वान्त सुखाय' की भावना परिलक्षित हो रही है जो समत्व एवं शमत्व से युक्त शान्तरस की अनुभूति कराने में पूर्ण समर्थ है
सत्त्वेषु मैत्री गुणिषु प्रमोदं क्लिष्टेषु जीवेषु कृपापरत्वम् । माध्यस्थभावं विपरीतवृत्तौ सदाममात्मा विदधातु देव ।। 12 ॥
साम्यभाव आत्मशुद्धि का एक साधन है । इष्ट-वियोग और अनिष्ट-सयोग की विषम परिस्थिति में सन्तुलित बने रहने/विचलित न होने पर समभाव की प्राप्ति होती है। समभाव में 'शम भाव' उबुद्ध होता है । सहृदय शान्ति-सुधा का पान करने लगता है
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सुखे दु:खे वैरिणि बन्धुवर्गे योगे वियोगे भुवने वने वा । निराकृताशेष ममत्वबुद्धः समं मनो मेऽस्तु सदापिनाथ ॥ 3 ॥
स्वकृत अनुचित कार्यों पर पश्चात्ताप करना भी आत्मशुद्धि का एक प्रमुख साधन है । इससे पापों की विशुद्धि होती है, अात्मा में निर्मलता बढ़ती है और सामाजिक अनिर्वचनीय आनन्द का अनुभव करता है ।
विनिन्दनालोचनगर्हग रहं मनोवचः कायकषायनिर्मितम् । निहन्मि पापं भवदुःखकारणं भिषविषं मन्त्रगुणैरिवाखिलम् ॥7॥
अतिक्रमं यद्विरमतेर्व्यतिक्रमं जिनातिचारं सुचरित्रकर्मणः । व्यधामनाचारमरिण प्रमादतः प्रतिक्रमं तस्य करोमि शुद्धये ॥ 8 ॥
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क्षति मनः शुद्धिविधेरतिक्रमं व्यतिक्रमं शीलवृतेविलवनम् । प्रमोऽतिचारं विषयेणुवर्तनं वदन्त्यनाचारमिहातिसक्ताम् ॥१॥
पदर्थमात्रापदवाक्यहीनं मया प्रमादाद्यदि किंचनोक्तम् । तन्मेक्षमित्वा विदधातु देवी सरस्वती केवलबोधलब्धिम् ॥ 10 ॥
बोधिसमाधिः परिणामशुद्धिः स्वात्मोपलब्धि शिवसौख्यसिद्धिः। चिन्तामणि चिन्तितवस्तुदाने त्वां वंद्यमानस्य ममास्तु देवि ॥ 11 ॥
पर-पदार्थों के प्रति अनासक्ति का भाव जागरित कर मुक्ति की ओर उन्मुख करनेवाले निम्न पद्य में शान्तरस की व्यंजना दर्शनीय है
न सन्ति बाह्या मम केचनार्या भवामि तेषां न कदाचनाहम् । इत्थं विनिश्चित्य विमुच्य बाह्य स्वस्थ सदा त्वं भव भवमुक्त्यै ।।
तत्त्वज्ञान से प्रात्मस्वरूप के बोध तथा संसार की असारता एवं दुःखमयता की प्रतीति होती है तब ममता का प्रभाव और सुसमता के आविर्भाव से चित्तवृत्तियां शान्त हो जाती हैं तथा वह महनीय आनन्दमय लोकों का स्पर्श करने लगता है
प्रात्मानमात्मन्यवलोक्यमनस्त्वं दर्शनज्ञानमयो विशुद्धः । एकाग्रचित्तः खलु यत्र तत्र स्थितोऽपि साधुर्लभते समाधिम् ॥25॥
एकः सदा शाश्वतिको ममात्मा विनिर्मलः साधिगम स्वभावः । बहिर्भवाः सन्त्यपरे समस्ता न शाश्वताः कर्मभवाः स्वकीया. ॥26॥
यस्यास्ति नैक्यं वपुषापि साधं तस्यास्ति किं पुत्रकलत्रमित्रः । पृथक्कृते चर्मणि रोमकूपाः कुतो हि तिष्ठन्ति शरीर मध्ये ॥ 27 ।।
पाठक सहृदय को दुःख के कारण तथा कष्टदायी दुःखों से मुक्ति के मार्ग का अवबोध होता है, उस समय विराग आदि अनुभावों से 'शम भाव' उद्बुद्ध हो कर सहृदय को शान्तरस का प्रास्वादन करा देता है
संयोगतो दुःखमनेक भेदं यतोऽश्नुते जन्मवने शरीरी । ततस्त्रिधाऽसौ परिवर्जनीयो यियासुना निर्वृत्तिमात्मनीनाम् ।। 28 ।।
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| जैन विद्या- 13
सर्वनिराकृत्य विकल्पजालं संसारकान्तारनिपात हेतुम् 1 विक्तमात्मानमवेक्ष्यमारणो निलीयसे त्वं परमात्मतत्त्वे ।। 29
जब सामाजिक को यह बोध हो जाता है कि उसे स्व-कर्मानुसार फल मिलता है और उसे वह फल भोगना ही पड़ता है तब उसका समता भाव जागरित होता है । 'पर मुझे कर्मफल देता है' ऐसी अन्य पर कर्तृत्व की बुद्धि नष्ट होती है । स्वकृत कर्मफल को शान्ति समभावपूर्वक भोगने की प्रेरणा मिलती है और वह असीम सुख शान्ति के सागर में हिलोरे लेने लगता है—
स्वयं कृतं कर्म यदात्मना पुराफलं तदीयं लभते शुभाशुभम् । परेण दत्तं यदि लभ्यते स्फुटं स्वयं कृतं कर्म निरर्थकं तदा ।। 30 ।।
निजाजितं कर्मविहाय देहिनो न कोऽपि कस्यापि ददाति किंचन् । विचारयन्नेवमनन्यमानसः परो ददातीति विमुच्च शेमुषीम् ॥ 32 ।।
भगवान के गुणों का स्तवन भी उद्विग्न चित्त को शान्त करने में सहायक कारण है—
विमुक्तिमार्गप्रतिपादको यो यो जन्ममृत्युव्यसनाद्यतीतः । त्रिलोकलोकी विकलोऽकलङ्कः स देवदेवो हृदये ममास्ताम् ।। 15 ।।
क्रोडीकृताशेषशरीरिवर्गा रागादयो यस्य न सन्ति दोषाः । निरिन्द्रियो ज्ञानमयोऽनपायः स देवदेवो हृदये
ममास्ताम् ।। 16 ।।
यो व्यापको विश्वजनीनवृत्तेः सिद्धो विबुद्धो घुतकर्मबन्धः । ध्यातो धुनीते सकलं विकारं स देवदेवो हृदये ममास्ताम् ॥ 17 ॥
न स्पृश्यते कर्मकलङ्क दोषैयों ध्वान्तसंधैरिव तिग्मरश्मिः । निरञ्जनं नित्यमनेकमेकं तं देवमाप्तं शरणं प्रपद्ये ॥ 18 ॥
उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि सुख-शांति के आराधक एवं उपासक प्राचार्य अमितगति ने 'भावना -द्वात्रिंशतिका' में रसानुभूति के द्वारा सामाजिक को कर्त्तव्याकर्त्तव्य के उपदेश से हृदयंगम कराया है तथा संसार की प्रसारता और दुःखमयता और मोक्ष की सारभूतता एवं सुखमयता की ओर ध्यान आकृष्ट कर मोक्ष की ओर उन्मुख करने का सफल प्रयास किया
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जैनविद्या-13 ]
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है। कृति में रसभाव-भरित शब्दयोजना काव्य के 'सद्यः पर निवृत्तये' प्रयोजन को सिद्ध करती है । प्रस्तुत कृति शान्तरस के पिपासुत्रों के लिए 'सुधा-संजीवनी' के समान ग्राह्य है।
सारांश रूप में कहा जा सकता है कि 'भावना-द्वात्रिंशतिका' शान्तरस का शीतल जल से परिपूर्ण एक ऐसा निर्भर है जिसमें अवगाहन करने पर सहृदय की चंचल चित्तवृत्तियां शान्त हो जाती हैं । परिणामस्वरूप एक अनिर्वचनीय आनन्द का अनुभव करते हैं । जिस मानन्द का अनुभव योगीगण ध्यान और योग के माध्यम से करते हैं उस प्रकार का अनुभव सहृदय पाठक शान्तरस से अनुप्राणित इस काव्य से सहज ही प्राप्त कर सकते हैं ।
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। जैन विद्या-13
ज्ञान विना प्रवृत्तिर्न हिते
ज्ञान विना नास्त्यहितानि वृत्तिस्ततः प्रवृत्तिन हिते जनानाम् । ततो न पूर्वाजितकर्मनाशस्ततो न सौख्यं लभतेभ्यभीष्टम् ।1981
शक्यो वशीकर्तुं मिभोप्रतिमत्तः सिंहः फणीन्द्रः कुपितो नरेन्द्रः । . झानेन होनो न पुनः कथंचिदित्यस्य दूरेण भवन्ति सन्तः ।2061
प्रास्ता महाबोधबलेन साध्यो मोक्षो विबाधामलसौख्ययुक्तः । धर्मार्थकामा अपि नो भवन्ति ज्ञान विना तेन तदचनीयम् ।1911
- सुभाषितरत्नसंदोह
-- ज्ञान के बिना मनुष्य की अहितरूप पाप-क्रियाओं से निवृत्ति नहीं होती और आत्महित कार्यों में प्रवृत्ति नहीं होती। हित-कार्य में प्रवृत्ति न होने से पूर्वसंचित कर्मों का नाश भी नहीं हो सकती । संसार दुःख का नाश हुए बिना सब जीवों का अन्तिम अभीष्ट-शाश्वत् सुख भी उनको प्राप्त नहीं हो सकता 11981
-मदोन्मत्त हाथी को अंकुश की सहायता से वश में ला सकते हैं, कुपित सिंह, सर्प या राजा
को भी किसी प्रकार शान्त कर सकते हैं। परन्तु ज्ञान-विवेक से हीन पुरुष को सुमार्ग पर लाना कठिन है। इसलिए सन्त ज्ञान से कभी दूर नहीं रहते, ज्ञान के उपार्जन से कभी अपना मुंह नहीं मोड़ते ।2061
-महाबोध (केवलज्ञान) के बल से ही प्राप्त होनेवाले बाधारहित व कर्ममलरहित शाश्वतसुख के भण्डार मोक्ष की बात जाने दो, ज्ञान के बिना तो धर्म, अर्थ और काम पुरुषार्थ भी नहीं हो सकते । अतः ज्ञान पूज्य है ।191।
-अनु. पं. बालचन्द्र सिद्धांतशास्त्री
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जनविद्या-43]
अप्रेल-1993
मिथ्यात्व खण्डन 'धर्मपरीक्षा' की आधारभूमि
-डॉ. पुष्पलता जैन
"धर्मपरीक्षा' एक व्यंग्य-प्रधान काव्य है जिसमें प्राचार्यों ने एकान्तवादी कथाओं और विचारों का खण्डन जैन सिद्धान्त के परिप्रेक्ष्य में बड़े ही सुन्दर ढंग से किया है। उन्होंने अनेकांतवादी अहिंसक परम्परा पर खड़े होकर चादी के रूप में इतनी सुन्दर अहम् भूमिका निभाई है कि पाठक को कहीं भी सम्प्रदायवाद नजर नहीं आता बल्कि तवसमेत कमियाँ प्रतिवादी के सिद्धान्तों में देखकर वह आश्वस्त हो जाता है यह सोचकर कि कवि भारतीय संस्कृति का पोषक है।
अनेक प्राचार्यों ने 'धर्मपरीक्षा के नाम से विविध ग्रन्थ लिखे हैं। उनमें प्राचीनतम 'धर्मपरीक्षा' है प्राचार्य जयराम की जो आज अनुपलब्ध है। इसके बाद हरिषेण की धम्मपरिकबा (वि. सं. 1044), अमितगति की धर्मपरीक्षा (वि. सं. 1070), वृत्तविलास की धर्मपरीक्षा (ई. 1160), सौभाग्यसार की धर्मपरीक्षा (सं. 1557), पद्मसागरगणि की धर्मपरीक्षा (वि. सं. 1675) आदि भगभग 15 और धर्मपरीक्षा नाम के काव्य प्रन्थ मिलते हैं। इनमें सर्वाधिक विश्रुत ग्रन्थ है अमितमति की धर्मपरीक्षा जो कवि की कुशल प्रतिभा का प्रतिफल है।
ये सारी धर्मपरीक्षाएं मध्यकाल की देन हैं। हम जानते हैं, लगभग 10वीं शताब्दी तक वैदिक आख्यानों का अच्छा खासा विकास हो चुका था । प्राकृत कथाएं भी उसी परिमाण में जैनदर्शन को स्पष्ट करने की पृष्ठभूमि में तैयार कर ली गई थीं। इस समय तक वादविवाद की शैली भी विकसित हो चुकी थी और उसमें जैनाचार्यों ने अपना एक महत्वपूर्ण स्थान
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[ जैनविद्या-13
बना लिया था। मध्ययुग का साहित्य परीक्षा-प्रधान बन चुका था। बौद्धाचार्यों ने जिस तरह से पालम्बन परीक्षा, त्रिकाल परीक्षा, प्रमाण परीक्षा जैसे ग्रन्थ लिखे वहीं जैनाचार्यों ने प्राप्तपरीक्षा, सत्यशासन-परीक्षा जैसे दार्शनिक ग्रन्थों का निर्माण किया। धर्मपरीक्षा भी ऐसी ही निर्माण विधा में अनुस्यूत है जिसमें आचार्य अमितगति ने वेदों की अपौरुषेयता, सृष्टिकर्तृत्व, जातिवाद जैसे अनेक दार्शनिक मतों का खण्डन किया वहीं अविश्वसनीय कथानों की भी अपनी कल्पित कथाओं के आधार पर तीखी आलोचना की। हम अपने इस लेख में इन दोनों ही तत्वों की संक्षेप में मीमांसा प्रस्तुत करने का प्रयत्न करेंगे ।
मियकीय कथानों का खण्डन-धर्मपरीक्षा में मूलरूप से मिथकीय कथाओं का खण्डन किया गया है। इसमें मनोवेग जैन धर्मावलंबी राजकुमार है और पवनवेग उसका अभिन्न मित्र है जो अन्य धर्म को मानता है । पवनवेग की एकान्त मान्यताओं को खण्डित कर उसे सत्पथ की ओर लाने के लिए मनोवेग पटना की ओर प्रस्थान करता है जहाँ उसका शास्त्रार्थ होता है। यहां दस मूढ़ों की कथाएं दी गई हैं- रक्त मूढ़, द्विष्ट मूढ़, मनो मूढ़, व्युदग्राही मूढ़, पित्तदूषित मूढ़, आम्र मूढ़, क्षीर मूढ़ , अगुरु मूढ़, चंदनत्यागी मूढ़ और अन्य चार मूर्ख । इन कथाओं के साथ ही यहां कुछ पाख्यान आये हैं जिसका सप्रामाणिक उल्लेख कर उन्हें अविश्वसनीय ठहराया गया है ।
इनके अतिरिक्त धर्मपरीक्षा में बलि-बन्धन कथा (अकम्पनाचार्य मुनि कथा). मार्जार कथा, शिश्नछेदन कथा, खर सिरच्छेदन कथा, जल-शिला और वानर नृत्य कथा, कमण्डलु और गज कथा, अगस्त्य मुनि कथा, वृहतकुमारिका कथा, मयऋषि कोपीन कथा और मन्दोदरी पाराशर ऋषि और योजनगंधा कथा, उद्दालक और चन्द्रमति कथा, कर्णोत्पत्ति कथा, पांडव कथा, शृगाल कथा, राक्षस और वानर वंशोत्पत्ति कथा, कविट्ठ खादन कथा, रावणदसिर कथा, दधिमुख और जरासंध कथा जैसी अनेक पौराणिक कथाओं की तथ्यसंगत समीक्षा की गई है और उनके पीछे प्रच्छन्न मिथ्यात्व का खण्डन उनसे मिलती-जुलती कल्पित कथाओं की रचना करके किया गया है । यहीं कवि ने जैन परम्परा की रामकथा भी प्रस्तुत की है। इस प्रस्तुति में जैन परम्परा की यथार्थवादिता, उदारता और प्रगतिशीलता जैसे तत्त्व उजागर हो जाते हैं जो आज की पीढ़ी के लिए विश्वसनीय बन जाते हैं। इन विशेषताओं ने एक ओर जहाँ मिथ्यात्व-पोषण को समूल नष्ट किया है वहीं रत्नत्रय की त्रिवेणी को भी प्रवाहित किया है जिसमें अवगाहन कर सर्वसाधारण प्राणी भी निर्वाण प्राप्त कर सकता है ।
आख्यानों की काल्पनिकता स्पष्ट करने की दृष्टि से मनोवेग उसी रूप में कुछ अपनी ओर से मनगढन्त कथाएं प्रस्तुत करता है । उदाहरणतः - कमंडलु और गज कथा के सन्दर्भ में कहता है कि उसने भिंडी के पेड़ पर कमंडलु रखा जिसमें हाथी ने प्रवेश किया। लोग इस घटना को असम्भव मानते हैं। तब मनोवेग कहता है कि पुराणों में क्या यह नहीं लिखा है
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जनविद्या-13 ]
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कि बाण के सूक्ष्म छिद्र से अर्जुन पृथ्वी को भेदकर दस करोड़ सेनासहित शेषनाग और सप्तर्षियों को खींच ले आया । यदि ये सही हो सकता है तो हमारी बात सही क्यों नहीं हो सकती ? इसी प्रकार के पौराणिक आख्यानों को निजधरी कथाओं के माध्यम से निरस्त करने का प्रयत्न किया है । इसी के साथ ही अन्य पौराणिक कथाओं की सयुक्तिक समीक्षा भी की गयी है, इसके लिए अमितगति की धर्मपरीक्षा के निम्नस्थल विशेषरूप से द्रष्टव्य हैं13. 90-102, 15.56-66, 16.92-100 ।
धर्म की परिधि के अन्तर्गत दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्थान है । कथानों की सर्जना दर्शन को समझाने के लिए ही की जाती है। इसीलिए दर्शन और कथा के सूत्र परस्पर सघनता से जुड़े हुए रहते हैं। अमितगति ने धर्म की परीक्षा और उसकी समीक्षा करने के लिए जिस प्रकार कथाओं को हाथ में लिया उसी प्रकार उनके तुरन्त बाद ही वे दर्शन पर व्याख्यान करने लगते हैं। उनकी यह व्याख्या मिथ्यात्व के खण्डन और सम्यक्त्व के मण्डनपूर्वक होती है । इस तथ्य को हम निम्नांकित शीर्षकों में झांक कर देख 'सकते हैं ।
। धर्म और संसार-प्राचार्य अमितगति ने धर्म की परीक्षा के दौरान भौतिकवादी वृत्ति से विमुख होकर धर्म की ओर उन्मुख होने के लिए संसारियों को प्रेरित किया । इसी पृष्ठभूमि में उन्होंने संसार के स्वरूप की मीमांसा की जिसे हम विशेषरूप से पांचवें-छठे परिच्छेद में देख सकते हैं। यहां उन्होंने कहा कि संसाररूपी वन में आत्मा के सिवाय दूसरा कोई भी अपना नहीं है। आत्मा के अतिरिक्त सभी परिजन स्वार्थी और मोही होते हैं । इस क्षणभंगुर संसार में स्वार्थ देखकर ही व्यक्ति की सेवा करते हैं। ऐसे संसारी प्राणियों पर वे हंसते हैं जो पुत्र. मित्र आदि के लिए तरह-तरह के पाप करते हैं पर उनका फल वे अकेले ही भोगते हैं । वस्तुतः इन्द्रिय-विषयों का उपभोग महादुःखदायी होता है इसलिए प्राचार्य इस महादुःख से मुक्त होकर शाश्वत सुख को प्राप्त करने के लिए धर्म की आराधना करने का उपदेश देते हैं । उनकी दृष्टि में धर्म वही है जो अक्षण्णरूप से प्राणी को सुख देनेवाला हो। ऐसे साधकों के मन में प्रात्मा और देह में भिन्नता बैठ जाती है, क्रोधादि विकारभाव दूर हो जाते हैं, क्षमा, मार्दव आदि भाव जाग्रत हो जाते हैं, पंच महाव्रतों के पालन करने से उनका चित्त निर्मल हो जाता है । प्राचार्य के अनुसार विनयी पुरुषों के ही पवित्र धर्म हो सकता है ।
धर्म और संसार के इसी स्वरूप के परिप्रेक्ष्य में समूचा धर्मपरीक्षा ग्रन्थ खड़ा हुआ है। जितनी भी कथाएं इस ग्रन्थ में समाहित की गयी हैं वे सब किसी न किसी पक्ष को उद्घाटित करती हैं। उनके इस उद्घाटन में जैनेन्द्र-धर्म का स्वरूप दर्पण-वत् बिल्कुल स्पष्ट है और इसीलिए वे कहते हैं कि जो लोग मिथ्यात्व-मार्ग में आपादमग्न अपने मित्र को सन्मार्ग पर नहीं लाते वे उसे भयंकर कुए में डालते हैं । मिथ्यात्व के समान दूसरा कोई अन्धकार नहीं
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[ जनविद्या-13
है। इस अन्धकार से मुक्त होने के लिए धर्म की ज्योति प्राप्त करना अत्यन्त आवश्यक है (द्वितीय परिच्छेद)।
सृष्टि कर्तृत्व खण्डन-सृष्टि-कर्तृत्व को जैनाचार्यों ने जोरदार खण्डन का विषय बनाया । जैनदर्शन और न्याय के प्रकाण्ड चिन्तकों ने अपने हर ग्रन्थ में किसी न किसी रूप में इस सिद्धान्त की मीमांसा की है और कहा है कि यदि कोई सृष्टि का कर्ता-धर्ता है तो वह राग के बिना यह कार्य नहीं कर सकता और तब उस स्थिति में, राग के सद्भाव में कोई न ईश्वर हो सकता है और न सर्वज्ञ ।
सृष्टि-कर्तृत्व के खण्डन के साथ ही हम प्राप्त के स्वरूप की भी चर्चा कर सकते हैं । अमितगति ने 12वें अध्याय में प्राप्त के स्वरूप की अच्छी मीमांसा की है । उन्होंने क्षुधा, तृषा, भय, द्वेष, राग, मोह, मद, रोग, चिन्ता, जन्म, जरा, मृत्यु, विषाद, विस्मय, रति, स्वेद, खेद, निद्रा ये अठारह दोष दुःख के कारण माने हैं और इन अठारह दोषों से मुक्त व्यक्ति ही प्राप्त हो सकता है। और इनसे निर्मुक्त प्राप्त के स्वरूप को प्रस्थापित किया है । वह स्वरूप है -निर्दोष परमविशुद्ध केवलज्ञानी वीतराग परमात्मा ।
प्राचार्य अमितगति ने कहा है कि हिंसा को धर्म का कारण कैसे माना जाए ? याज्ञिकी हिंसा को हिंसा नहीं माने और बलि द्वारा मारे गये जीवों को स्वर्ग में पहुंचाने की बात कहें-यह कहां तक ठीक है ? जिस स्वर्ग जैसी उत्तम गति को संसारी जीव धर्माचरण, नियम और ध्यान आदि कठिन तपस्याओं द्वारा प्राप्त करते हैं वह हिंसा के माध्यम से कैसे प्राप्त किया जा सकता है ? हिंसक साधनों से अहिंसक साध्य की प्राप्ति कैसे हो सकती है (16.6.22)?
जातिवाद का खण्डन-जैनधर्म अहिंसा और समता का पुजारी रहा है। सदाचार उसकी आधारशिला है। प्रारम्भ से ही उसने स्वयंकृत कर्मों को ऊँच-नीच की आधारशिला स्वीकार की है। उसके अनुसार किसी जाति विशेष में उत्पन्न व्यक्ति बिना सदाचरण के ऊँचा नहीं माना जा सकता। प्राचार्य जिनसेन के शब्दों का अनुगमन करते हुए अमितगति ने कहा कि ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र, ये चारों एक मनुष्य जाति का समूह है, प्राचार के आधार पर भले ही इनका विभाजन कर दिया जाय । वस्तुतः जिस जाति में संयम, नियम, शील, तप, दान, जितेन्द्रियता और दयादि तत्व विद्यमान हों उसी जाति को पूजनीय माना जाता है । शील-संयम आदि का पालन करनेवाले तथाकथित नीच जाति में उत्पन्न लोग भी स्वर्ग में जाते हैं और इन व्रतों से रहित कुलीन भी नरक में पहुंच जाते हैं इसीलिए जातिवाद मात्र एक अहं है, आचरण की ही पूजा होनी चाहिए । (16.23-33)।
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स्नान से पवित्रता-प्राप्ति का खण्डन-जैनधर्म भावों की पवित्रता पर अधिक जोर देता है, शारीरिक कृत्यों पर उतना नहीं । सामान्यजन गगा-स्नान आदि को पवित्रता की प्राप्ति का संकेतक मानते हैं, यह एक आश्चर्य की बात है । जल से शारीरिक मल दूर हो सकता है पर शरीर के अन्दर रहनेवाले शुक्र, शोणित, मांस, आदि विकृत तत्व तथा मन में उत्पन्न हुए क्रोधादि विकार भाव कैसे दूर हो सकते हैं ? संसारी जीव जो पाप मिथ्यात्व, असंयम और अज्ञान से उपाजित करते हैं वे सम्यक्त्व, संयम और ज्ञान के बिना कैसे दूर हो सकते हैं ? जो जल शरीर को भी शुद्ध करने में असमर्थ है वह जीव के भावों और पापों को कैसे शुद्ध कर सकता है ? यदि गंगा-स्नान को शुद्धि का कारण माना जाए तो उसमें रहनेवाली मछलियां अथवा अन्य जीव तो फिर सीधे स्वर्ग प्राप्त करेंगे । जैनधर्म का यह एक ऐसा प्रगतिशील तत्व है जिसे उत्तरकालीन बौद्ध प्राचार्यों और सन्तों ने पूरी तरह अपनाया है (16.34-39)।
प्रात्मा को अस्तित्व-हीनता का खण्डन-जैनदर्शन प्रात्मा को मूलतः अजर, अमर और परम विशुद्ध मानता है । प्राचार्य अमितगति ने अपनी धर्मपरीक्षा में प्रात्मा के इसी स्वरूप को स्पष्ट किया है और कर्मवाद की प्रस्थापना की है। उन्होंने भूतवादियों का खण्डन करते हुए कहा है कि जड़ से चेतन की उत्पत्ति कैसे हो सकती है ? चित्त-चेतन ज्ञानात्मक होता है और उसका पूर्वज्ञान उत्तरवर्ती ज्ञान का कारण बनता है। ऐसी स्थिति में आधार के बिना प्राधेय का अपलाप कैसे किया जा सकता है ? आत्मा आधार है और ज्ञान प्राधेय है। शरीर और आत्मा को अभिन्न भी नहीं माना जा सकता। शरीर जड़ है, रूपी है पर चेतन अरूपी है जो ज्ञान-चक्षु से प्रतीत होता है। जड़-रूप नेत्रों से चेतन को नहीं देखा जा सकता। जड़ अलग है और चेतन अलग है । आत्मा की मूलविशुद्धि तभी होती है जब परकर्मों का जो आवरण चढ़ जाता है उसे ध्यान, तप आदि सम्यक् साधनों से दूर कर दिया जाता है। इसी सन्दर्भ में प्राचार्य ने बौद्ध धर्म की सर्व-शून्यता, अनात्मवाद तथा क्षणिकवाद का खण्डन किया है जिसे विस्तार से धर्मपरीक्षा में देखा जा सकता है (16.40-77)।
इनके अतिरिक्त हम प्राचार्य द्वारा वर्णित रात्रि-भोजन के दुष्परिणामों का भी उल्लेख कर सकते हैं। जैसा हम जानते हैं मूलाचार में "तेसिं चव वदाणां रक्खहठं रादिभोयणविरत्ती” (5-98) से स्पष्ट किया गया है कि पंचव्रतों की रक्षा के लिए रात्रि-भोजन-विरमण का पालन किया जाना आवश्यक है। यही परम्परा भगवती आराधना (6.185-86, 1207), सूत्रकृतांग (वैतालीय अध्ययन), दशवकालिक, चारित्रप्रामृत (21) आदि ग्रन्थों में । भी मिलती है। बाद में समन्तभद्र ने इसे रात्रि-भुक्तिवत नामक छठी प्रतिमा के रूप में स्थान दिया। अमितगति ने इसे बारह व्रतों के अतिरिक्त श्रावकों के लिए एक नियम के रूप में स्वीकार किया और रात्रि-भोजन के कारण होनेवाली बीमारियों की विस्तार से चर्चा
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की। उन्होंने अहिंसा के साथ ही स्वास्थ्य के आधार पर भी रात्रि-भोजन से विरत रहने की पेशकश की।
___ इस प्रकार आचार्य अमितगति की धर्मपरीक्षा व्यंग्यप्रधान काव्यों में अपना एक विशिष्ट स्थान रखती है । इसमें पाख्यानों के साथ ही जनदर्शन को भी बड़े ही मनोरंजक ढंग से प्रस्तुत किया है । शैली की दृष्टि से इसे एक नया प्रयोग कहा जा सकता है । धूर्ताख्यान की परम्परा में धर्मपरीक्षा को जोड़कर यदि हम देखें तो हम इसका सही मूल्यांकन कर सकते हैं।
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जनविद्या-13 ]
अप्रेल-1993
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आचार्य अमितगति और हरिषेण की
__-- धर्मपरीक्षा एक तुलनात्मक अध्ययन
डॉ. भागचन्द जैन 'भास्कर'
प्राचार्य अमितगति माथुरसंघ के प्रसिद्ध जैनाचार्य थे जिनकी रचनाधर्मिता का उद्देश्य समाज में सत्प्रवृत्तियों को जागृत करना रहा है । संस्कृत पर उनका असाधारण अधिकार था, जैन दर्शन के वे कुशल अध्येता थे और काव्य-सिद्धान्तों के मर्मज्ञ । सुभाषितरत्नसंदोह, श्रावकाचार, पंचसंग्रह, आराधना भगवती, भावना-द्वात्रिंशतिका, सामायिक पाठ और धर्मपरीक्षा जैसे आकर्षक ग्रन्थ उनकी ही लेखनी से प्रसूत हुए हैं । इन ग्रन्थों में धर्मपरीक्षा हमारा अभिधेय है।
उद्देश्य-धर्मपरीक्षा का उद्देश्य मिथ्यात्व से आपूरित कथानों का सयुक्तिक खंडन रहा है । उसने हरिभद्रसूरि को घूर्ताख्यान की परम्परा को बखूबी आगे बढ़ाया है। इसमें मनोवेग अपने अभिन्न मित्र पवनवेग से इसी प्रकार की कल्पित कथाओं का सहारा लेकर पौराणिक आख्यानों पर आक्षेप करता है । यही परम्परा दार्शनिक क्षेत्र में मिथ्यात्वखण्डन के रूप में दिखाई देती है।
प्राकृत कथा-साहित्य का समय लगभग चतुर्थ शताब्दी से प्रारम्भ हो जाता है। इसी समय पौराणिक शैली भी प्रचलित हुई जिसमें अतीत कथाओं के साथ ही नवोदित प्रवृत्तियों और परिस्थितियों के अनुरूप उनमें परिवर्तन और परिवर्धन किया गया ।
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जैनविद्या-133
अतिशयोक्ति शैली का भी भरपूर उपयोग हुआ और इतिहास तत्व पीछे रह मया। इसी पृष्ठभूमि में पुराणों की रचना हुई जिनमें आख्यानों की अतिरंजित शैली ने अविश्वसनीयता को और गहरा बना दिया । धूर्ताख्यान और धर्मपरीक्षा में इन्हीं पाख्यानों पर करारा व्यंग्य विनोदात्मक ढंग से किया गया है ।
ग्रन्थकार-हरिषेण नाम के लगभग सात कवि हुए हैं जिनमें धम्मपरिक्खा के रचयिता हरिषेण मेवाड़ में स्थित चित्रकूट (चित्तौड़) के निवासी थे। बाद में वे व्यापार निमित्त अचलपुर पहुंच गये जहां उन्होंने वि.सं. 1044 में धम्मपरिक्खा की रचना की। इसके 26 वर्ष बाद अमितगति (द्वितीय) की धर्मपरीक्षा वि.सं. 1070 में पूर्ण हुई । अमितगति मालवा के निवासी रहे हैं। पं. विश्वेश्वरनाथ ने उनको वाक्पतिराज मुंज की सभा के एक रत्न के रूप में प्रतिष्ठित किया है । 'सुभाषितरत्नसंदोह' ग्रन्थ की समाप्ति मुंज के ही राजकाल में वि.सं. 1050 में हुई। इन दोनों ग्रन्थों के अतिरिक्त कवि के निम्न ग्रन्थ भी उपलब्ध हैंउपासकाचार, पंचसंग्रह, आराधना, भावना-द्वात्रिंशतिका, चन्द्रप्रज्ञप्ति, सार्द्धद्वयद्वीपप्रज्ञप्ति और व्याख्या प्रज्ञप्ति।
हरिषेण की 'धम्मपरिक्खा' अपभ्रंश शैली में ग्यारह सन्धियों में पूर्ण हुई । इसमें कुल 238 कडवक हैं जो भिन्न-भिन्न अपभ्रंश शैली में लिखे गये हैं। मेवाड़ और मालवा में कोई विशेष दूरी नहीं है। दोनों समकालीन भी हैं। हरिषेण की धम्मपरिक्खा अमितगति की धर्मपरीक्षा से पहले लिखी गई। अतः अधिक सम्भावना यह है कि अमितगति के सामने हरिषेण की धम्मपरिक्खा रही होगी। हरिषेण की धम्मपरिक्खा विवरणात्मक अधिक है जबकि अमितगति एक कुशल कवि के रूप में प्रालंकारिक शैली में प्रत्येक तत्त्व का वर्णन करते हैं। हरिषेण ने सप्तम सन्धि में लोक-स्वरूप को तथा अष्टम सन्धि में जैन परम्परागत रामकथा को कुछ विस्तार से लिखा है। जबकि अमितगति ने कुछेक श्लोकों में ही उसे निपटा दिया है। हरिषेण ने अन्तिम सन्धि में रात्रिभोजन-कथा का विस्तार किया है पर अमितगति उसको सिद्धान्त रूप में उल्लिखित कर आगे बढ़ गये हैं । इसी तरह अमितगति ने जैनसिद्धान्त, नीतिशास्त्र, प्रकृत्ति-चित्रण आदि को जिस आकर्षक और कथात्मक ढंग से प्रस्तुत किया है वह हरिषेण नहीं कर सके। हरिषेण का सन्धि-विभाजन अमितमति के अध्यायविभाजन से अधिक युक्तिसंगत है। इन विशेषताओं और विभिन्नताओं के बावजूद लगता है हरिषेण की धम्मपरिक्खा अमितगति की धर्मपरीक्षा का आधारभूत ग्रन्थ रहा है ।
विषयगत तुलना-अमितगति की धर्मपरीक्षा और हरिषेण की धम्मपरिक्खा के तुलनात्मक अध्ययन से भी यह स्पष्ट हो जाता है कि अमितगति ने हरिषेण की धम्मपरिक्खा को सामने रखकर अपनी काव्य-प्रतिमा से उसे भलीभांति संवारा और मात्र दो माह में इतने बड़े काव्य-ग्रन्थ की रचना कर दी (धर्मपरीक्षा 20.90)। इन दोनों ग्रन्थों की विषयगत तुलना से भी यह तथ्य पुष्ट होता है
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जनविद्या-13
[
35
प्रथम परिच्छेद
1.3
विषय
धर्मपरीक्षा धम्मपरिक्खा
(अमितगति) ___(हरिषेण) पूर्ववर्ती कवियों का उल्लेख 1.1-16 जम्बूद्वीप वर्णन
1.17-20 विजयाधपर्वत वर्णन
1.21.27 वैजयन्ती नगरी वर्णन
1.28-31 राजा जितशत्रुवर्णन
1.32-36 1.5 जितशत्रु की पत्नी वायुवेगा और 1.37-47 1.6-7 पुत्र मनोवेम मनोवेग का मित्र पवनवेग, प्रिया- 1.48-55 1.8,विजयापुरी पुरी का राजपुत्र, उसका जैन मन्दिर दर्शनार्थ गमव जंगल में मुनिदर्शन,
1.56-57 1.9 अवन्ति देश का बर्णव उज्जयिनी वर्णन
1.38-66 1.10-11 जैन मुनि से प्रश्न
1.67-70 1.12
द्वितीय परिच्छेद संसार-वर्णन, मधुविन्दु दृष्टान्त
2.1.21
धर्म का प्रभाव
2.22-89
1.13-14 कया में अन्तर 1.12 विस्तार कम है 1.16
मुनि से प्रश्न और उसका उत्तरे
2.90-95
तृतीय परिच्छेद
मनोवेम-पवनवेम के बीच संवादे, मित्रता की विशेषताएं पाटलिपुत्र की विशेषताएं
1.11
3.1-26 3.27-43
1.18-20 कौतुक प्रदर्शन 2.1-3
3.44-68
दोनों कुमारों का रूपवर्णन, काव्यात्मक तत्व अधिक है शास्त्रार्थ विप्रगण का एकत्र होना पौर उनसे बाद
3.69-95
2.4-6
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56 ।
[ जनविद्या-13
विषय
धर्मपरीक्षा (अमितगति)
धम्मपरिक्खा (हरिषेण)
चतुर्थ परिच्छेद
4.1-39
षोडश मुक्कि न्याय का विश्लेषण दस मूढों की कथा रक्तमूढ कथा (1)
2.7-8 2.9
4.40-46 4.47-95
2.10-16
पंचम परिच्छेद . यहां नारी के स्वभाव का वर्णन- 5.1-76 2.10-16 विस्तार है जिसे हरिषेण ने छोड़
यहां नारी स्वभाव का दिया है, कुछ विषय-चतुर्थ परिच्छेद वर्णन नहीं तथा धर्ममें भी हैं अतः परिच्छेद का समापन परीक्षा जैसा बीच में उचित नहीं है।
ही सन्धि विच्छेद
नहीं। संसार का विस्तृत चित्रण और : 5.77-97 2.16-17 द्विष्टमूढ कथा (2)
संसार का संक्षिप्त
चित्रण है।
षष्ठ परिच्छेद
6.1-95
2.18-23
मनोमूढ कथा (3), यहां भी संसार का चित्रण है, नारी और कामुकता का भी
सप्तम परिच्छेद
2.24
3.1
व्युद्ग्राही मूढ-कथा (4) पित्त दूषितमूढ-कथा (5) आम्रमूढ-कथा (6) क्षीरमूढ-कथा (7)
7.1-19 7.20-28 7.29-62 7.63-96
3.2-3
3.4-6
अष्टम परिच्छेद
8.1-9
3.7
अगुरु मूढ-कथा (8) धन की महिमा
8.10-21
3.8 विस्तार नहीं
8.22-49
3.9-10
चन्दन का खेत काटना, बैचेन और दुःखी होना धन्दनत्यागी मूर्ख की कथा (9) चार मूों की कथा (10)
3.11
8.50-91 8.92-95
3.12-13
Page #67
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जनविद्या-13 ]
[ 57
धम्मपरिक्खा (हरिषेण) 3.14
नवम परिच्छेद
विषय
धर्मपरीक्षा
(अमितगति) प्रथम मूर्खकथा-मूषक द्वारा प्रांख 9.1-20 का जलाया जाना द्वितीय मूर्खकथा-दोनों पत्नियों ने 9.21-43 दोनों पैर तोड़ दिये तृतीय मूर्खकथा-अपनी सम्पत्ति 9.44-49 चोरों में लुटा देना चतुर्थ मूर्खकथा-गल्लस्फोट 9.50-95
3.15
3.16
3.17-19
दशम परिच्छेद
10.1-20-40
3.20-21
मनोवेग का प्रश्न और विष्णु पर प्रश्नचिह्न ब्राह्मणों का निरुत्तर हो जाना विष्णुकथा मार्जार बेचने जाना और मार्जार के गुण-दोषों को बताना
10.41-51 10.52-65
3.22 4.1-2
10.66-100
4.3-6
4.7-8 यहाँ गंगा का प्रसंग विस्तार से है।
4.10-12
4.13-16
एकादशम परिच्छेद मण्डप कौशिक कथा, यहां 11.1-8-25
गंगा का प्रसंग मात्र एक श्लोक में है विष्णु की कामुकता और कृष्ण 11.26-28
का सुन्दररूप ब्रह्मा और तिलोत्तमा का 11.29-47 प्रेमसम्बन्ध ब्रह्मा ने महादेव को शाप दिया 11.48-58 ब्रह्मा के रीछनी से जांबव नामक 11.59-65 पुत्र, इन्द्र ने भी गौतम ऋषि की पत्नी का उपभोग किया। यमराज और अग्नि ने छाया 11.66-82 का उपभोग किया
4.17
4.18
4.19
Page #68
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________________
58 ]
[ जनविद्या-13
विषय
धर्मपरीक्षा (अमितगति) 11.82-93
धम्मपरिक्खा (हरिषेण) 4.20
यमराज द्वारा छाया और अग्नि का उदरस्थ किया जाना अग्निदेव का छिप जाना
11.94-95
4.21
द्वादशम परिच्छेद
4.22
4.23
5.1
अग्निदेव और यमराज के देवत्व 12.1-15 का प्रश्न प्राप्त का स्वरूप-वीतरागता 12.16-26 देवों में ऋद्धि का होना 12.27-29 शिश्नच्छेदनकथा
12.30-33 स्वर शिरश्छेदन-कथा
12.34-52 शिला और वानरनृत्य-कथा 12.53-76 कमण्डलु में हाथी का प्रवेश और 12.77-97 उस पर आश्चर्य करना। यहाँ बीच में ही परिच्छेद परिवर्तन हो
5.2-6 5.7 5.8-9 5.10-11
गया
त्रयोदश परिच्छेद विप्रगण द्वारा आश्चर्य व्यक्त, 13.1-6 5.12
युधिष्ठिर द्वारा रसातल से दस 13.7-17 5.13 करोड़ सेना और शेषनाग सहित सप्तर्षियों को ले आना अगस्त्य और ब्रह्मा की सृष्टिकथा 13.18-36 5.14-15 ब्रह्मा-विष्णु आदि की कथानों 13.37-53 5.16-17 पर प्रश्न अन्य पौराणिक कथाओं का 13.54-110 5.18-20 भी उल्लेख और जिनेन्द्र- लोक स्वरूप का यहाँ अन्य पौराणिक गुणों की विशेषता
वर्णन-अमितगति कथाओं का कोई ने बिल्कुल छोड़ उल्लेख नहीं है दिया है
6.1-18 लोक-स्वरूप का
वर्णन है
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जनविद्या-13 ]
[ 59
विषय
धम्मपरिक्खा (हरिषेण)
चतुर्दश परिच्छेद
7.1-4
7.5-8
धर्मपरीक्षा
(अमितगति) मनोवेग से पटना वादशाला में 14.1-32 पहुंच कर अपने को वृहत्कुमारिका का पुत्र बताया और विस्तार से उसका कथन है माँ का पुनर्विवाह और पुराणों 14.33-54 द्वारा उसका समर्थन भागीरथी से भागीरथ और 14.55-61 गांधारी से सौ पुत्रों की उत्पत्तिकथा बारह वर्ष तक गर्भ में रहना 14.62-67 यमकन्या ने भी सात हजार वर्ष 16.68-80 तक गर्भ रखा पाराशर और योजनगंध-कथा 14.81-91 उद्दालक और चन्द्रमुखी कथा 14.92-101
7.9
7.10
7.11-13
7.14-15
7.16-17
पंचदश परिच्छेद समापन
15.1-15
7.18 यहाँ समापन अधिक युक्तिसंगत है। 8.1
15.16-21
15.22-31
8.2
15.32-41.
8.3
15.2-55
8.4-5
कर्णकथा पाण्डु-चित्रांगद में संवाद कर्ण-कुन्ती का विवाह पाण्डवों का मोक्ष-गमन व्यास का गंगा-स्नान, यहाँ पुराणों की समीक्षा जैन-दृष्टिकोण से की गई है। बौद्ध-भिक्षुत्रों को शृगाल द्वारा उठा लिए जानेवाली कथा का उल्लेख
15.56-66
8.6 हरिषेण ने इसे छोड़ दिया हैं । 8.7-9
15.67-94
Page #70
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________________
60 ]
षोडश परिच्छेद
विषय
रामचन्द्र का लंका प्रवेश और उसकी समीक्षा
अमितगति ने इसे बिल्कुल छोड़ दिया है ।
समीक्षात्मक समापन तथा
विट्ठखादन कथा और उसकी
समीक्षा
दधिमुख और जरासंघ कथा
और उसकी समीक्षा यहाँ यह वर्णन नहीं है ।
वैदिक पुराणों की समीक्षा तथा बलि और रावरण का
प्रसंग
धर्म का महत्व
सप्तदशम् परिच्छेद इस परिच्छेद में वेदों की
धर्मपरीक्षा
(अमितगति)
15.95-98
16.1-21
16.22-57
16.58-84
16.85-93
16.94-100
16.101-104
अपौरुषेयता, जातिवाद, स्नानवाद, भूतत्ववाद, अकर्मवाद, सृष्टिकर्तृत्व श्रादि का खण्डन है और आत्मा का अस्तित्व, कर्मवाद आदि की
सिद्धि है ।
17.1-100
प्रष्टादशम् परिच्छेद चौदह कुलकरों में ऋषभदेव का 18.1-84
वर्णन
[ जैनविद्या- 13
धम्मपरिवखा
(हरिषेण)
8.10-11
यहाँ समीक्षा अधिक विस्तृत है।
8.12-22 यहाँ
विद्याधर, राक्षस
और वानरवंश की उत्पत्तिकथा वरिणत
है ।
9. 1-5 यहाँ
समीक्षा विस्तृत है ।
9.6-10
9 13 देवशास्त्र
गुरु का वर्णन
9 14-17
15.18-25 यहाँ धर्म का महत्व विस्तार से किया है ।
हरिषेण ने इसे छोड़ दिया है ।
10.1-10
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जनविद्या-13 ]
.. [61
विषय
धर्मपरीक्षा (अमितगति) 18.85-100
धम्मपरिक्खा (हरिषेण) 10.11-12
पवनवेग का जैनधर्म की ओर झुकाव
19.1-11
10.13
उन्नीसवां परिच्छेद मुनिचन्द्र के पास पहुंचकर
मनोवेग द्वारा पवनवेग को व्रत देने का निवेदन श्रावक - व्रतों का वर्णन
19.12-101
10.14-15 -11.1-2 मेवाड़ और उज्जयिनी का
वर्णन 11.3-10 निशि भोजन कथा
बीसवां परिच्छेद
20.1-22
निशि भोजन कथा तो नहीं है पर उसके दुष्परिणाम अवश्य दिए हैं पाहारदान, प्रोषधोपवास प्रादि का वर्णन तथा व्यसन-त्याग ग्यारह प्रतिमाओं का वर्णन
20.23-52 11.11-21
माहारदान कथा 20.53-63 11.22 पंचणमो
कार मन्त्र, जप, फल
मादि का वर्णन,
अभयदान आदि कथाएँ 20.64-80 20.81-90 11.23.27
सम्यग्दर्शन आदि का वर्णन पवनय का जैनधर्म में दीक्षित होना धर्मपरीक्षा का उद्देश्य और प्रशस्ति भाग
इन दोनों धर्मपरीक्षाओं की तुलना करने पर यह सहजता-पूर्वक समझ में आ जाता है कि अमितगति मे विषय-सामग्री हरिषेण से ली और उसे अपनी प्रतिभा से विस्तार देकर दो माह में ही अपनी 'धर्मपरीक्षा' को समाप्त कर दिया (20-90)। शैली भी दोनों की समान है। मनोवेम कल्पित कथाएं बनाकर सामान्यजन के समक्ष प्रस्तुत करता है और जब वे उन कथाओं पर विश्वास नहीं करते तो तुरन्त लगभग वैसी ही कथाएं पुराणों से
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62 ]
[ जैनविद्या-13
निकाल कर उपस्थित कर देता है । हरिषेण का सन्धि विभाजन अमितगति के परिच्छेदविभाजन से अधिक वैज्ञानिक है ।
भाव, भाषा की दृष्टि से तुलना
दोनों धर्मपरीक्षाओं की भाव-भाषा की दृष्टि से भी तुलना की जा सकती है जहाँ उन्होंने पारम्परिक शैली को अपनाया है । उदाहरणतः -
धर्मपरीक्षा
धम्मपरिक्खा
11.19
2.3
3.61
1. यत् त्वां धमिवं त्यक्त्वा तंत्र भद्र चिर स्थित 2. जातःतामो द्विधा नूनमित्थं भावन्त काश्चन 3. तं जगाद खेचरांगजस्ततो भद्रनिर्धनशरीरभूरहे 4. 5. चौदीव स्वार्थन्निष्ठा बहिज्वालेव तापिका
3.85
2.5
8.44-45
2.11
5.59
2.15
5.82-85
2.16
8.22.34
3.9
साधारणतः यह नियम रहा है कि पूर्वपक्ष प्रस्तुत करते समय मूल उद्धरण उपस्थित किए जाने चाहिए। हरिषेण ने तथोक्तभर कहकर उस परम्परा का पालन किया है, पर अमितगति ने अपनी इच्छानुसार परिवर्तितरूप में ग्रन्थ के मूलरूप में समाहित कर दिया है । उदाहरणार्थ
1. हरिषेण की धम्मपरिक्खा (4.1) में 'तथाचोक्तम्' कहकर 'मत्स्य-कूर्मो
वराहश्च' श्लोक उद्धृत किया है जिसे अमितगति ने 'व्यापिनं निष्कलं ध्येयं जरामरण सूदनम्' पद्य रच दिया है (10.58-59)।
2. हरिषेण की धम्मपरिक्खा (5.7) में 'अपुत्रस्य गतिर्नास्ति' को अमितगति ने थोड़ा सा परिवर्तन कर इस प्रकार लिखा है -
अपुत्रस्य गतिर्नास्ति स्वर्गो न तपसो यतः । ततः पुत्रमुखं दृष्टवा श्रेयसे क्रियतो तपः ।।118॥
3. हरिषेण के 'नष्टे मृते प्रव्रजिते' (धम्मपरिक्खा 4.7) को अमितगति ने इस
प्रकार लिखा है
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जैनविद्या-13 1
[ 63
पत्यौ प्रवजिते क्लीबे प्रनष्टे पतिते मृते । पंचस्वायत्सु नारीणां पतिरन्यो विधीयते ।।। 1.12।।
4. हरिषेण की धम्मपरिक्खा (5.9) में 'अश्रद्धेयं न वक्तव्यम्' के स्थान पर
अमितगति ने लिखा
तथा वानरसंगोतं त्वयादशि वने विभो । तरन्ती सलिले दृष्टा सा शिलापि मणा तथा ॥ प्रश्रद्धेयं न वक्तव्यं प्रत्यक्षमपि वीक्षितं । जानानः पण्डितैनं वृत्तान्त नपमन्त्रिणोः ॥12.72-73॥
5. हरिषेण की धम्मपरिक्खा (7.5) में उद्धृत् 'अद्भिर्वाचापि दत्ता या' को
अमितगति ने अपनी धर्मपरीक्षा (14.38) में कुछ परिवर्तन के साथ इस प्रकार लिखा है
एकदा परिणीतापि विपन्ने दैवयोगतः । भर्तयक्षतयोनिः स्त्री पुन: संस्कारमर्हति ॥
6. हरिषेण की धम्मपरिक्खा (7.6) में 'अष्टौ वर्षाण्युदीक्षते' को अमितगति ने धर्मपरीक्षा (14.39) में लिखा है
प्रतीक्षेतःष्ट वर्षारिण प्रसूता वनिता सती । अप्रसूतात्र चत्वारि प्रोषिते सति भर्तरि ।
7. हरिषेण की धम्मपरिक्खा (7.8) में उद्धृत 'पुराण मानवो धर्मः' को
अमितगति ने धर्मपरीक्षा (14.49) में वैसा का वैसा ही ले लिया है।
- 8. हरिषेण की धम्मपरिक्खा (7.8) में उद्धृत 'मानवं व्यासवासिष्ठ' को
अमितगति ने (14.50 में) 'मनुव्यासवाष्ठिनां' लिखकर स्मृत किया है।
१ हरिषेण की धम्मपरिक्खा (8.6) में उद्धृत 'गतानुगतिको लोको' को
अमितगति ने 'दृष्ट्वानुसारिभिर्लोकः' (15.69) के रूप में लिखा है ।
निष्कर्ष
इस विवेचन से इतना तो स्पष्ट है कि अमितमति की धर्मपरीक्षा का कोई अाधारभूत प्राकृत अथवा अपभ्रंश में लिखा ग्रन्थ अवश्य होना चाहिए। अन्यथा दो माह में इतना बड़ा
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64 ]
[ जनविद्या-13
ग्रन्थ कैसे बन सकता था ? चौहार (7.63), संकरार मठ (8.10) जैसे शब्द किसी प्राकृत ग्रन्थ से ही गृहीत हो सकते हैं । इसी तरह योषा की व्युत्पत्ति जष-जोष से खोजने की भी क्या अावश्यकता थी
यतो जोषयति क्षिप्र विश्वं योषा ततो मता। विदधाति यतः क्रोधं भामिनी भव्यते ततः ॥ चतश्छादयते दोषस्ततः स्त्री कम्यते बुधैः । विलीयते यतश्चितमेतस्यां विलयाततः ॥
अमितगति की धर्मपरीक्षा जिस प्रकार दो माह में तैयार हो गई थी उसी प्रकार उनके संस्कृत 'आराधना' और संस्कृत 'पंचसंग्रह' ग्रन्थ भी लगभग चार-चार माह में ही रच लिये गये थे जो क्रमशः शिवार्य की प्राकृत 'भगवती आराधना' और प्राकृत 'पंचसंग्रह' के संस्कृत संक्षिप्त अनुवादमात्र हैं। यह उनके संस्कृत भाषा पर असाधारण अधिकार का फल था और आशुकवि होने का प्रमाण भी। हरिषेण ने 'धम्मपरिक्खा' के प्रारम्भ में जयराम की प्राकृत 'धम्मपरिक्ख' का स्मरण किया है। अभी तक यह ग्रन्थ उपलब्ध नहीं हो सका। फिर भी यह अनुमान लगाया जा सकता है कि अमितगति ने शायद इस ग्रन्थ को भी आधार बनाया हो। इसके समर्थन में यह कहा जा सकता है कि अमितगति ने धर्मपरीक्षा में हट्ट (3 6), जेमति (5.39), ग्रहिल (13.23), कत्रार (15.23), जैसे प्राकृत शब्दों को समाहित किया है जबकि हरिषेण ने ऐसे स्थलों में क्रमशः 1.17, 2.24 (गइ मुंजइ), 2.18, 514, 8.1 कडवकों में इन शब्दों का उपयोग नहीं किया है ।
इससे यह लगता है कि अमितगति के समय जयराम की 'धम्मपरिक्खा' और कदाचित् हरिषेण की भी 'धम्मपरिक्खा' रही होनी चाहिए। अमितगति ने जिस नगरी को प्रियापुरी (1.48) और संगालो कहा है, हरिषेण ने उन्हें क्रमश: विजयापुरी (1.8) तथा मंगालों (2.7) शब्द दिये हैं । हरिषेण ने जयराम का उल्लेख बहुत स्पष्ट शब्दों में कर दिया है जबकि अमितगति ने ऐसा कोई उल्लेख नहीं किया। अतः जब तक जयराम की प्राकृत 'धम्मपरिक्खा' उपलब्ध नहीं होती तब तक यह अनुमान मात्र माना जा सकता है कि अमितगति और हरिषेण दोनों ने उसे अपना आधार बनाया है। पर चूंकि हरिषेण की अपभ्रंश 'धम्मपरिक्खा' उपलब्ध है अतः यह अनुमान लगाना अनुचित नहीं होगा कि अमितगति के समक्ष यह ग्रन्थ भी रहा होगा। पूर्वोक्त परिच्छेदगत विभाजित विषय-सामग्री की तुलना से भी यह स्पष्ट हो जाता है कि अमितगति ने हरिषेण के विषय को विस्तार-मात्र दिया है।
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जैनविद्या - 13 ]
प्रेल 1993
[ 65
पंचसंग्रहकर्ममीमांसा का अपूर्व ग्रन्थ
- डॉ. श्रीरंजन सूरिबेव
श्रीमाथुराणामनधद्युतीनां सङ्घोऽभववृत्तविभूषिताम् । हारो मणीनामिव तापहारी सूत्रानुसारी शशिरश्मिशुभ्रः ॥ माधवसेनगरणी गरणनीयः शुद्धतमोऽजनि तत्र जनीयः । सूर्यासि सत्त्ववतीव शशाङ्कः, श्रीमति सिन्धुपताकलङ्कः ॥ शिष्यस्तस्य महात्मनोऽमितगतिर्मोक्षार्थीनामग्रणी - रेतच्छास्त्र शेष कर्म समितिप्रख्यापनायाकृतं ।
O
जैन वाङमय में, दसवी - ग्यारहवीं शती के मध्यवर्ती श्रमितगति नाम के दो प्राचार्यों का उल्लेख हुआ है । इनका इतिवृत प्रमितगति प्रथम और श्रमितगति द्वितीय नाम से उपलब्ध होता है । इनमें 'पंचसंग्रह' नामक कर्ममीमांसा - ग्रन्थ के कर्त्ता श्रमितगति को माथुर संघ के प्राचार्य माधवसेन का शिष्य बताया गया है । इस सन्दर्भ में 'पंचसंग्रह' के बालचन्द कस्तूरचन्द गांधी, धाराशिव एवं राजूभाई भ्र. वीरचन्द दोशी, धाराशिव द्वारा सोलापुर से वीर. संवत् 2457 के भाद्रपद में प्रकाशित संस्करण की ग्रन्थकार प्रशस्ति द्रष्टव्य है
अर्थात् चारित्र से शोभित, निर्मल कीति के धारक, हार में गूंथी हुई मणियों के समान तापहारी, सूत्रानुसार चलनेवाले, चन्द्रकान्ति के समान उज्ज्वल माथुरों का एक संघ हुम्रा है । उसमें माधवसेनगरणी नाम के प्राचार्य हुए जो चारित्र से अत्यन्त शुद्ध थे और प्रसंख्य तारों के बीच रहनेवाले तथा श्रीसम्पन्न समुद्र में निष्कलंक प्रतिभासित होनेवाले चन्द्रमा के समान थे ।
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66 ]
[ जनविद्या-13
इन्हीं महात्मा के शिष्य अमितगति हुए, जो मोक्षार्थियों में अग्रणी थे। इन्होंने ही अशेष कर्मसमूह के स्वरूप-निरूपण के लिए इस शास्त्र, अर्थात् 'पंचसंग्रह' ग्रन्थ को बनाया ।
दिगम्बर-आम्नाय में 'पंचसंग्रह' नाम के कई ग्रन्थ उपलब्ध होते हैं । 'जनेन्द्रसिद्धान्तकोश' के अनुसार दिगम्बरों का 'प्राकृत-पंचसंग्रह' सबसे प्राचीन है। श्वेताम्बर साहित्य में भी स्वोपज्ञवृत्ति-सहित 'प्राकृत-पंचसंग्रह' का उल्लेख प्राप्त होता है। इस पर 'मलयागिरि' नाम की संस्कृत-टीका भी मिलती है। पुनः दिगम्बर-साहित्य में 'संस्कृत पंचसंग्रह' के कतिपय संस्करणों की चर्चा हुई है । इनमें एक संस्करण तो श्रीपालसुत श्रीउट्टा (विक्रम की सत्रहवीं शती) द्वारा प्रस्तुत हुआ है और अन्य एक संस्करण के प्रस्तोता सुमतिकीत्ति भट्टारक (ईसा की सोलहवीं शती) है । 'प्राकृत-पंचसंग्रह' की तो प्राकृत में ही चूणिका-शैली में वृत्ति भी लिखी गई है। स्पष्ट है कि कर्मसिद्धान्त का प्रतिपादक यह 'पंचसंग्रह' जैनाचार्यों द्वारा सम्यक् अनुशीलित तथा जैनमियों द्वारा अतिशय पूजित एक अपूर्व दर्शन-ग्रन्थ है । आचार्य अमितगति ने 'संस्कृत-पंचसंग्रह' के माध्यम से लोकोपयोगी कर्ममीमांसा प्रस्तुत कर व्यापक विद्वत्प्रियता और विपुल जन-समादर प्रायत्त किया था, इसमें सन्देह नहीं ।
__ जैन विद्वानों का मत है कि प्राचार्य नेमिचन्द सिद्धान्तचक्रवर्ती (दसवीं-ग्यारहवीं शती) द्वारा प्रणीत 'प्राकृत-गोम्मटसार' अमितगति के 'संस्कृत पंचसंग्रह' का पर्याय ग्रन्थ है । 'गोम्मटसार' द्वारा जिस कर्मकाण्ड का प्रतिपादन किया गया था, 'पंचसंग्रह' में उसी कर्मसिद्धान्त का समानान्तर विकास प्रस्तुत हुआ है। इसीलिए कहा जाता है कि 'गोम्मटसार' में कर्मसिद्धान्त का जो वर्णन है, वही 'पंचसंग्रह' में है। केवल वर्णन-शैली की भिन्नता है। यह वर्णनशैली सातिशय सरल है । 'गोम्मटसार' में गणित प्रसंग जहाँ जटिल हो मया है, वहीं यह जटिलता 'पंचसंग्रह' में बहुत स्वल्प मात्रा में है । 'गोम्मटसार' में विद्वानों . को जहाँ अत्यधिक बौद्धिक व्यायाम की आकुलता से गुजरना पड़ता है, वहाँ इसमें उन्हें सुगमता का आनन्द मिलता है। जिस प्रकार 'राजवात्तिक' और 'श्लोकवात्तिक' ग्रन्थों के विषय में प्रवेश के लिए पहले 'सर्वार्थसिद्धि' का अध्ययन अपेक्षित है, उसी प्रकार 'गोम्मटसार' में प्रवेश के लिए पहले 'पंचसंग्रह' का अनुशीलन अनिवार्य है ।
प्रस्तुत 'पंचसंग्रह' का मूल श्लोकात्मक या पद्यात्मक है। ये श्लोक विविध छन्दों में प्रारचित हैं। कुछ श्लोकों के नीचे कहीं-कहीं गद्यात्मक विवृत्ति भी है जो किसी परवर्ती वृत्तिकार की रचना मानी जाती है। इस ग्रन्थ के विषय कुल छह परिच्छेदों में उपन्यस्त हुए हैं। प्रथम परिच्छेद (के कुल 354 श्लोकों) में बन्धक, अर्थात् कर्म का बन्धकरनेवाले अशुद्ध संसारी जीव की विवेचना विशुद्ध रूप से की गई है । द्वितीय परिच्छेद (कुल 48 श्लोक) में बध्यमान, अर्थात् कर्मबन्ध के योग्य एक सौ अड़तालीस प्रकृतियों का वर्णन है । तृतीय परिच्छेद (कुल 106 श्लोक) कर्म-बन्ध, कर्मोदय और कर्मसत्ता के क्रमिक उच्छेद का सविस्तार वर्णन करता है। चतुर्थ परिच्छेद (कुल 375 श्लोक) में कर्मबन्ध के कारणों को विस्तार से
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वणित किया गया है । पंचम परिच्छेद के (कुल 484) श्लोकों में कर्मबन्ध के भेदों का वर्णन है और षष्ठ परिच्छेद (कुल 90 श्लोक) में बताया गया है कि गुणस्थानों की मार्गणा में कितनी प्रकृतियों का बन्ध होता है और कितनी का नहीं। इस प्रकार यह पंचसंग्रह कर्ममीमांसा के सांगोपांग विवेचन की दृष्टि से विश्वसनीय, प्रामाणिक एव स्वत:पूर्ण ग्रन्थ है। ग्रन्थान्त की पुष्पिका के अनुसार इस कर्मनाशक ग्रन्थ की रचना शक-संवत् 1073 में मसूतिकापुर (मसूतीपुरी) में हुई । पुष्पिका इस प्रकार है
त्रिसप्तत्यधिकेऽब्दानां सहस्त्र शकविद्विषः । मसूतिकापुरे जातमिदं शास्त्रं मनोरमम् ॥
इस पुस्तक की 'पंचसंग्रह' संज्ञा की अन्वर्थता ग्रन्थकर्ता अतिगति ने इस प्रकार बताई है
बन्धकं बध्यमानं यो बन्धेशं बन्धकारणम् । भाषते बन्धभेदं च तं स्तुवे पंचसंग्रहम् ॥12॥
अर्थात् बन्धक, बध्यमान, बन्धेश (बन्ध के स्वामी), बन्धकारण और बन्धभेद- इन पाँच बातों के संग्रह को 'पंचसंग्रह' कहते हैं । इस 'पंचसंग्रह' का जिन्होंने प्रवचन किया है, उन जिनेन्द्र की मैं स्तुति करता हूँ।
ग्रन्थकार ने 'बन्धक' की विशद विवेचना के क्रम में निष्कर्ष उपस्थापित करते हुए कहा है कि जीव का औदयिक भाव ही बन्धक है। जीव के पाँच स्वभावों-प्रौदयिक, क्षायिक, औपशमिक, क्षायोपशमिक और पारिणामिक, में अन्यतम या प्रथम प्रौदयिक भाव कर्मबन्ध उत्पन्न करते हैं । अतः मनुष्य के लिए आवश्यक है कि वह प्रौदयिक, क्षायिक, औपशमिक और क्षायोपशमिक भावों से रहित द्रव्य की स्वाभाविक, अनादि, पारिणामिक अर्थात् शुद्ध जीवत्व की स्थिति में पहुंचने का प्रयास करे, क्योंकि यह स्थिति उमयात्मक है। इसमें न बन्ध का कारण होता है, न ही मोक्ष का । मूल श्लोक इस प्रकार है
बन्धमौदयिका मोक्षं क्षायिकाः शामिकाश्च ते। उभयं कुर्वते मिश्रा नोभयं पारिणामिका 11-14॥
प्राचार्य अमितगति ने बध्यमान या कर्मबन्ध के योग्य एक सौ अड़तालीस प्रकृतियों का वर्णन इस प्रकार किया है
ज्ञानदृष्ट्यावृती वेद्यं मोहनीयायुषी मताः । नामगोवान्तरायाश्च मूलप्रकृतयोऽष्टधा ॥
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एताः पंचनव द्वे स्युष्टाविशतिरुत्तराः ।। चतस्रो नवतिस्त्रयग्रा द्वे पंच च यथाक्रमम् ॥23॥
अर्थात् ज्ञानावरण, दर्शनावरण, वेदनीय, मोहनीय, आयु, नाम, गोत्र और अन्तरायये आठ मूल कर्मप्रकृतियां हैं। इनमें ज्ञानावरण के पांच, दर्शनावरण के नौ, वेदनीय के दो, मोहनीय के अट्ठाईस, आयु के चार, नाम के तिरानवे, गोत्र के दो और अन्तराय के पाँच भेद हैं । इस प्रकार आठ मूल कर्म-प्रवृतियों के कुल एक सौ अड़तालीस भेद हैं । ये कर्म-प्रकृतियाँ यदि ज्ञान की सीमा में आ जाती हैं तो वीतराग पुरुष उन्हें ध्यानाग्नि या ज्ञानाग्नि में जला देते हैं । गीता में भी भगवान् कृष्ण ने अर्जुन से यही बात कही है
ययेषांसि समृद्धोऽग्निर्भस्मसात्कुरुतेऽर्जुन ।
ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मासात्कुरते तथा ॥3:37॥ बुधजन ज्ञानाग्नि से दग्ध कर्मवाले को ही तो पण्डित कहते हैं
ज्ञानाग्निदग्धकर्माणं तमाहुः पण्डितं बुधाः ।।गीता 4 19॥ भगवान् महावीर ने भी ध्यानाग्नि से प्रकृति को दग्ध कर दिया था
यो ज्ञात्वा प्रकृतीदेवो दग्धवान् ध्यानवह्निना। तं प्रणम्य महावीरं क्रियते प्रकृतिस्तवः ॥1
बन्धेश का तात्पर्य बन्धोदय-सत्ता का विच्छेद है । अमितगति ने इस सन्दर्भ में कहा है कि जीव के कर्मप्रदेशों का फिर कभी बन्ध न होने योग्य बन्ध ही बन्धेश या बन्ध का स्वामी है । इसे वीतराग देवों ने 'क्षय' कहा है
जीवकर्मप्रदेशानां विश्लेषो यःपरस्परम् । अपनर्भविकोऽवाधि स क्षयः क्षीणकल्मषैः ॥3:10।।
बन्धोदयसत्ता के क्षय का जो नित्य-प्रति विचार करता है, वह कर्मों का नाश करके, अमित ज्ञान का धारक होते हुए ज्ञानात्मक शुद्ध अथवा पारिणामिक आत्मदशा या गीता के अनुसार ब्राह्मी स्थिति में पहुंच जाता है
बन्धोदयोदोरणसत्क्षयाणा विचारणां यो विदधाति नित्यम् । विविक्तमात्मानमपास्तकर्मा । नानात्मकं सोऽमितगत्युपैति ।।3.106।।
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आचार्य अमितगति ने ज्ञान और दर्शन के अवरोधक प्रदोष, विघ्न, मात्सर्य, निरव पासादन इत्यादि भावों को बन्ध या आस्रव का कारण माना है और बन्धहेतु की अनन्तता की ओर संकेत करते हुए उसके नौ स्वरूपों का निर्देश किया है । जैसे-सादि, अनादि, ध्रुव, अध्र व, स्थान, मुजाकार, अल्पतर, मवस्थित और स्वामित्व ।
कर्मप्रकृति के बन्ध के रुकने और फिर उसके शुरू हो जाने को सादि बन्ध कहते हैं (जैसे-सादि मिथ्यादृष्टि) । गुणस्थान श्रेणी का परिवर्तन न होने पर जो अनादिकाल से सतत बन्ध होता है, वह अनादिबन्ध है। अभव्य के बन्धन को ध्रुव कहते हैं और अध्र व बन्ध वह है, जो बन्ध के अभाव की स्थिति में आकर पुनः बंधने लगे। कर्मबन्ध की स्थान-मर्यादा को स्थानबन्ध कहते हैं । प्रारम्भ में तो कम बन्ध हो, किन्तु आगे चलकर उसमें बाहुल्य आ जाय तो उसे भुजाकार बन्ध कहते हैं और इसके विपरीत पहले अधिक और बाद में कम होनेवाले बन्ध को अल्पतर कहते हैं। जो सदा एक समान बना रहे, उसे अवस्थित बन्ध कहते हैं और कर्म के कर्तृत्व-बोध को स्वामित्व-बन्ध । ये बन्ध के नौ लक्षण हैं (4.101-105)।
इस सन्दर्भ में निष्कर्षरूप में अमितगति ने कहा है कि वैचारिक दृष्टि से बन्ध के बहुत-बहुत सूक्ष्म भेद हैं । इन्हें जो भव्य खेदरहित या शान्त चित्त से समझता और अपनाता है वह कर्म-बन्धन से छूटकर अपरिमित ज्ञान का धारक होता है और कष्टों तथा बाधामों से रहित इष्ट सिद्ध-पद को प्राप्त करता है -
बन्धविचारं बहुतम मेद, यो हृदि धत्ते विगलितखेदम् । याति स भव्यो व्यपगत कष्टां सिद्धिमबन्धोऽमितगतिरिष्टाम् ।। (4:374)
अमितगति ने दृष्टिवादांग के समुद्र से बन्धभेद का उद्धार करके उसका विस्तारपूर्वक वर्णन किया है । दृष्टिवाद का ही विशिष्ट अर्थ कर्मप्रवाद है ।
बन्ध (कर्म पुद्गलों का जीव-प्रदेशों के साथ नीरक्षीर न्याय से मिलना), उदय (कर्मपरिणाम) और सत्ता (प्रात्मबद्ध कर्मों का अस्तित्व) बन्ध के ये प्रमुख तीन भेद हैं । विद्वान् ग्रन्थकर्ता अमितगति ने इन तीनों भेदों और इनके उपभेदों का गुणस्थानों के प्रभाव परिप्रेक्ष्य में बड़ी विशदता से वर्णन किया है और निष्कर्षरूप में कहा है कि दृष्टिवाद के आधार पर रचित यह ग्रन्थ बन्धोदयसत्ता के प्रतिपादन में सर्वथा समर्थ है। जो इस शास्त्र को समझकर पभ्यास करता है, वह कर्मतत्व को अच्छी तरह से हृदयंगम कर लेता है । कर्मबन्ध, गुणस्थान, जीवसमास, मार्गणा और स्थान को परस्पर जोड़कर उसे समझने के लिए जो तत्पर रहता है, वह
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मोक्षमार्ग पर आरूढ होकर उत्कृष्ट तप द्वारा कर्म-समूह का नाश करता है और 'अमितगति' अर्थात् अनन्तज्ञान का धारक बनकर मोक्षस्थान का अधिकारी होता है
बन्धं पाकं कर्मणां सत्वमेतद्वक्तुं शक्तं दृष्टिवादप्रणीतम् । शास्त्र ज्ञात्वाऽभ्यस्यते येन नित्यं सम्यक् तेन ज्ञायते कर्मतत्त्वम् ॥ . कर्मबन्धगुण-जीवमार्गणास्थानयोजनपरायणोऽस्ति यः । सत्तपोदलित कर्मसंहतिः सोऽस्तु तेऽस्तिगति: शिवास्पदम् ।। (5.483-84)
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पंचसंग्रह के द्वितीय परिच्छेद का मंगलश्लोक ।
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आचार्य अमितगति की प्रासंगिकता:
पर्यावरणीय परिप्रेक्ष्य में
-श्रीमती शकुन्तला जैन
वर्तमान में विश्व के सामने पर्यावरण शुद्धि का प्रश्न सर्वाधिक रूप से चचित है। हाल ही में विश्व के प्रमुख ही नहीं प्रायः सब ही राष्ट्रों का एक वृहद सम्मेलन रिया में होकर चुका है जिसमें विश्व के विभिन्न नेतानों ने अपने-अपने विचार व्यक्त किये हैं।
__ शब्द-शास्त्र की दृष्टि से 'पर्यावरण' एक यौगिक शब्द है जो 'परि' और 'प्रावरण' इन दो शब्दों के योग से बना है, जिसका अर्थ है हमारे चारों ओर का आवरण । अर्थात् हम अपना जीवन यापन करते हुए जिन सजीव और निर्जीव वस्तुओं के सम्पर्क में प्राते हैं वे ही हमारे लिए आवरण हैं और उनकी शूद्धि और प्रशद्धि पर हमारे जीवन का उत्थान और पतन, स्वास्थ्य और अस्वास्थ्य, सुख और दुःख, हानि और लाभ आदि निर्भर करते हैं । स्वभावतः हमारे प्राचीन ऋषियों, मनीषियों और चिन्तकों ने बहुत प्राचीनकाल से ही इस पर विचार करना प्रारम्भ कर दिया था। जैनाचार्य भी इस विषय में पीछे नहीं रहे। उन्होंने मानव की अपनी व्यक्तिगत एवं सामाजिक विवशताओं को ध्यान में रखते हुए इस दृष्टि से भी विचार किया कि वह अपने जीवन को इस प्रकार ढाले कि विश्व का पर्यावरण कम से कम दूषित एव अधिक से अधिक शुद्ध एवं निरापद बना रहे । गृहस्थों के लिए उन्होंने जो बारह व्रतों के पालन का विधान किया है उनमें अनर्थदण्ड नामक व्रत का उद्देश्य यही है । वाचक मुख्य प्राचार्य कुन्दकुन्द, उमास्वामी, समन्तभद्र आदि महान प्राचार्यों में आचार्य अमितगति ने भी अपने श्रावकाचार के षष्ठ परिच्छेद गत श्लोक 80-841 तक में
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इस विषय पर अपना चिन्तन प्रस्तुत किया है जो आज भी प्रासंगिक है । मुख्यरूप से जो कुछ उन्होंने इस व्रत के सम्बन्ध में बताया है उसका शाब्दिक भाव हम यहाँ प्रस्तुत कर
अनर्थदण्ड का शाब्दिक भाव यह है कि बिना प्रयोजन ऐसे कार्य न करें जिससे हमें दण्ड का भागी होना पड़े। यहाँ दण्ड का अर्थ पाप तो है ही किन्तु सामाजिक और न्यायिक दण्ड भी इसमें सम्मिलित है।
बहुधा ऐसा होता है कि मनुष्य स्वयं तो कोई दुष्कर्म नहीं करता किन्तु दूसरों को उल्टे-सीधे उपदेश देता रहता है उन्हें कुमार्ग की ओर चलने हेतु प्रेरित करता है, फलस्वरूप वे लोग कभी-कभी तो जबरदस्त हिंसा कर बैठते हैं। आज भारत में जो स्थान-स्थान पर हिंसा का नग्न ताण्डव हो रहा है, सारा पर्यावरण हिंसक कार्यों से दूषित हो रहा है उसके पीछे मूलकारण आज के मानव का तथाकथित प्राचार भी है। ऐसे लोग स्वयं तो दण्ड पाने से ही बचे रहते हैं किन्तु उसका फल दूसरे निरीह प्राणियों को भोगना पड़ता है । कुछ लोग व्यर्थ ही शृंखलाबद्ध रूप से दूसरों के अहित करने का मन ही मन चिन्तन करते रहते हैं । इससे यद्यपि दूसरों का अहित तो सम्भवतः नहीं होता किन्तु ऐसे व्यक्तियों का मानसिक पर्यावरण निश्चित रूप से दूषित होता है।
कभी-कभी कुछ लोगों की ऐसी आदत होती है कि वे ठाले बैठे कोई न कोई गलत कार्य करते रहते हैं। कोई जमीन पर बैठे-बैठे जमीन खोदने लगता है, कोई यदि पानी के किनारे बैठा हो तो. हाथों से पानी उछालता रहता है, कोई बैठे-बैठे कंकर फेंका करता है। किसी के हाथ में यदि कोई कागज आ जाये तो बत्तियां सी ही बनाया करता है या उन्हें फाड़ता रहता है, पेड़ के नीचे हो तो पेड़ की टहनियों व पत्तों को तोड़-तोड़ कर फेंकता रहता है इससे कई बार बड़ी दुर्घटनायें घटित हो जाती हैं । कभी कंकर दूसरे की आँख में चला जाता है, कभी पानी का जानवर काट लेता है, कभी महत्वपूर्ण कागजों को फाड़ने लग जाता है, कभी गांवों में जो भीषण अग्निकांड होते हैं उनमें सैकड़ों झोपड़ियां जल जाती हैं उसके पीछे मानव की एक छोटी सी लापरवाही है यथा पीने के बाद बीडी या सिगरेट बिना बुझाये फेंक देना ।
पर्यावरण की अशुद्धता के पीछे जैसा कि मैंने ऊपर लिखा है मानव के बहुत से ऐसे कार्य हैं जिन्हें न जानते हुए भी वह अपने प्रमादवश देश, राष्ट्र और समाज का तथा कभीकभी अपना स्वयं का भी बड़ा अहित कर बैठता है । प्रायः हम समझते हैं कि ट्रक इत्यादि में क्षमता से अधिक भार लादना, बसों, रेलों आदि में उनकी क्षमता से अधिक सवारियां बैठाना/बैठना, टेम्पो, स्कूटर आदि पर भी दो के स्थान पर तीन-चार कभी-कभी तो पांच आदमियों का लद जाना ये सब कार्य ऐसी दुर्घटनाओं को जन्म देते हैं जिनमें करोड़ों का आर्थिक
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नुकसान तो होता ही है सैंकड़ों प्राणियों को भी अपने जीवन से हाथ धोना पड़ता है । कभीकभी हम बिजली बिना कारण ही जलती छोड़ देते हैं और कमरा बन्द करके चले जाते हैं, शार्ट-सर्किट से आग लगने की जो दुर्घटनायें घटती हैं उसके पीछे प्रायः यही कारण होता है।
कुछ लोग नल में पानी आ गया या नहीं यह बात मालूम करने के लिए भी समय से पूर्व नल खुला छोड़ देते हैं और प्रायः यह उनकी आदत हो जाती है। कभी-कभी उन्हें ध्यान ही नहीं रहता कि नल बन्द करें और उसे जैसे का तैसा छोड़कर घूमने, सिनेमा देखने, जीमने आदि स्थानों पर चले जाते हैं। परिणाम यह होता है कि जो पानी हमारी और हमारे परिवार की प्यास बुझाने व अन्य आवश्यकताओं की पूर्ति में काम आता वह नाली में बह जाता है किसी के उपयोग में नहीं आता और हमारा कमरा भी पानी से भर जाता है ।
यह तो रोज ही होता है कि लोग फल इत्यादि खाकर उसके छिलके सड़क पर यूं ही फेंक देते हैं और लोग उनसे फिसल कर अपने हाथ-पांव तुड़वा बैठते हैं। कभी-कभी तो ऐसे 'लोगों में हम स्वयं अथवा हमारे निकट सम्बन्धी भी होते हैं ।
ध्वनि-प्रदूषण भी आजकल एक समस्या बन गयी है। घर-घर में रेडियो, टीवी आदि हो गये हैं जिन्हें हम ऊंची आवाज से बजाकर अपनी और पड़ोसियों की मींद हराम करते हैं। हमारी ऐसी हरकतों का परिणाम छात्रों का भुगतना पड़ता है जो अपनी परीक्षा की तैयारी में लगे होते हैं। धार्मिक स्थानों में भी ध्वनि विस्तारक यन्त्रों का उपयोग इस प्रकार किया जाता है कि जिनका किसी को कोई लाभ नहीं होता। हम समझते ही नहीं कि इस प्रकार के उपयोग करके हम कितने लोगों का दिल दुखाते हैं और फलस्वरूप कितनी हिंसा होती है।
बड़े-बड़े कल-कारखाने और वाहन शहरों में और शहरों के आस-पास कितना जहरीला धुआँ उगलते हैं कि लोगों का स्वस्थ रहना भी एक समस्या बन गया है। अस्पतालों और डाक्टरों के यहाँ जो लोगों की भीड़ नजर आती है उसके पीछे के कारणों में यह भी एक बहुत बड़ा कारण है ।
हम लोग आवश्यकताओं से अधिक संग्रह करके भी समाज में विषमताओं को जन्म देते हैं। जहाँ हमारा काम चार साड़ियों से चल सकता है, वहां हम बक्से के बक्से साड़ियों से भर देते हैं। घर में एक टी. वी. से काम चल सकता है किन्तु एक ही घर में चार-चार टी. वी. हैं, आदि ।
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कहां तक गिनायें, हम बहुत से ऐसे कार्य जाने-अनजाने में कर देते हैं जिनसे हमारा स्वयं का लाभ नहीं के बराबर होता है किन्तु उससे देश, समाज, घर और व्यक्ति के चारों ओर एक ऐसे वातावरण का निर्माण हो जाता है जो विषमता और अशान्ति को जन्म देकर प्रापसी कलह और वैमनस्य को बढ़ाता है ।
1 . इस प्रकार आज से हजारों वर्ष पूर्व हमारे प्राचार्यों द्वारा कही गयी बातें आज के परिप्रेक्ष्य में भी उतनी ही प्रासंगिक हैं जितनी कि वे उस समय थीं।
1. योऽनय पंचविषं परिहरति विवृत्शुद्धधर्ममतिः ।
सोऽनर्थदंडविरति गुणवतं नयति परिपूत्तिम् ॥800 पंचाना दुष्टाध्यानं पापोपदेशनाशक्तिः । हिंसोपकारि दानं प्रमादचरणं श्रुतिर्दष्टा ॥81।। मंडलविडालकुक्कुटमपूरशुकसारिकादयो जीवाः । । हितकाममा बाहाः सर्वे पापोपकारपराः ॥82।। लोहं लाक्षा नीली कुसुंभ मदनं विषं शरणः शस्त्रम् । संधानकं च पुष्पं सर्व करूणापरहेंयम् ॥83॥ नीली सूरसकंदो दिवसहितयोषिते च दधिमथिते । विद्धं पुष्पितमन्नं कालिंग द्रोणपुष्पिका त्याज्या ।।84।।
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हरिवंशपुराण
–महाकवि धवल अनु.-भंवरलाल पोल्याका
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उपोद्धात
विप्रकुलोत्पन्न किन्तु जैनधर्म में दृढ़ श्रद्धानी पिता सूर तथा माता केसुल्ला के लाडले, विक्रम की ग्यारहवीं शताब्दी के आसपास जन्मे महाकवि धवल अपभ्रंश साहित्याकाश के एक ऐसे नक्षत्र हैं जिनका पूर्ण प्रकाश अभी भी साहित्य धरातल तक पहुंचना शेष है। जो थोड़ी बहुत टिमटिमाहट अव तक पहुंच पाई है उससे ही यह असंदिग्धरूप से सिद्ध हो जाता है कि वे स्वयंभू, पुप्फयंत, धनवाल, वीरु आदि अपभ्रंश भाषा के रचनाकारों से किसी भी दृष्टि से कम महत्वशाली नहीं हैं। उन द्वारा निबद्ध अब तक ज्ञात एकमात्र महाकाव्य हरिवंशपुराण इस विधा की एक आदर्श रचना है ।
___ भाषाविद्, काव्यमर्मज्ञ एवं दार्शनिक मनीषी तथा चिन्तक हमारे इस कथन की सत्यता की परीक्षा कर सकें एतदर्थ उक्त पुराण के थोड़े से प्रारम्भिक अंश एवं उनका हिन्दी अनुवाद प्रस्तुत करने का प्रयास किया है। इससे पाठकों को ज्ञात होगा कि कवि की भाषा कितनी प्राञ्जल तथा प्रवाहयुक्त है, उसमें अलंकार, मुहावरे तथा लोकोक्तियां किस प्रकार स्वाभाविक रूप से प्रयुक्त होकर काव्य को अलंकृत तथा सुशोभित करते हैं । रचनाकार ने रचना का प्रारम्भ ही हरिवंश को कमल की उपमा के साथ किया है।
'जूववसेण ण वत्थु चइज्जहि' की तुलना राजस्थानी भाषा में प्रचलित लोकोक्ति 'जुवां के साटै घाघरो कौने फेंक्यो जाय' से की जा सकती है। प्राचार्य अमितगति ने भी अपने श्रावकाचार में लिखा है, 'तथापि कुर्वति महानुभावास्त्याज्या न यूकाभयतो हि शाटी' जुएं के भय से साड़ी नहीं त्यागी जाती (1.10)। 'पिसुण चउक्का' जैसे शब्दों की तुलना हिन्दी में प्रचलित 'चाण्डाल चौकड़ी' जैसे शब्दों से सहज ही की जा सकती है। काव्य में पग-पग पर ऐसे स्थल हैं जिनका अध्ययन और मनन भाषाशास्त्रियों के लिए रुचिकर एवं
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लाभकर सिद्ध हो सकता है। चाहते हुए भी स्थानाभाव से हम अभी उनका संकेत तथा परिचय देने में असमर्थ हैं।
अनुवाद करने की प्रेरणा मुझे आदरणीय श्री ज्ञानचन्द्र जी खिन्दूका, पूर्व संयोजक, जनविद्या संस्थान तथा माननीय डॉ. कमलचन्द जी सोगाणी, संयोजक, जनविद्या संस्थान से प्राप्त हुई, एतदर्थ मैं इनका आभारी हूँ।
निवेदक भंवरलाल पोल्याका
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हरिवंशपुराण
लोयाण दोहणालं.
मिहलोकण्हकेसरसुसोहं । महपुरिस तिसदिलं,
हरिवंससरोरुहं जयउ ॥ हरिपण्डुसुप्राणकहा,
चउमुहवासेहि भासिया जह या । तह विरयमि लोयपिया,
जेण ण गासेइ दंसरणं पउरं ॥2॥ विसमीसियं वरवीरं,
जह सा चारित्तखंडिया पारी। डज्झउ दंसरण .महणं
मिच्छत्तकरं वि यं कव्वं ॥3॥ जह गोत्तमेण भरिणयं,
सेरिणयरायेण पुच्छियं जह या।। जह जिणसेरणेण कयं,
तह विरयमि किपि उद्देसं ॥4॥ अप्पा किं भरणमि हरी,
कप्पयरो सायरो व्व सुरसेलो । णं रणं प्रप्पपसंसा,
परिरिंगदा गरहिया लोए ॥5॥ अप्पारणं जेरण थुवं,
बुद्धिविहीरणेण गिदियं तेरण । । पुक्कारइ ण इव जरणो,
पहायरोपायडो तह वि ॥6॥ जो जोडइ विणि पयासु,
विसुद्धा जिणवरेहि जह भणिया ।। पाहं तेरणवि सरिसो,
भवियायरण वछलो तह वि ॥7॥ सुव्वउ भवियाणंद,
पिसुरणचउक्का प्रभव्वजरणसूलं । धण्णय धवलेण कयं,
हरिवंस सुसोहणं कव्वं ॥8॥ प्रत्थसारउ दोसपरिमुक्कु, प्रायाणह णिप्पाइयउ धवलु कव्वु कुंडलु मणोहरु । इहु कसियउ सवियक्खरण हि
करहु करण जरण गुरण महायर ॥9॥ जिरगणाहउ कुसुमंजलि देविणु णिभूसणा मुणिवर पणवेप्पिणु । पवर चरिय हरिवंसकवित्तो
अप्पउ पयडिउ सूरह पुत्तो ॥100 जयउ भुवणि जिणसासणु। पावपणासणु चउगइगमणणिवारउ। तिहुवरणहियकारउ दोसणिवारउ
भवियहमोक्खहं सारउ ॥11॥ एहु जिणवरवयणु सरसेहिं अवगाहिवि प्राणियउ प्रागमिल्लजल कि पिघवलेण। जगपियहु कण्णंजुलिहि
पावडाहु णासइ प्रकालेण ॥
मात्रा-जोतियसें देवें वंदिउ भावें मुक्कउ दोस असेसे पावें ।
सो जिणु कलुसपावखयकारउ तुम्हहं दुरियइ हरइ भडारउ ॥12॥
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जैनविद्या - 13 ]
हरिवंशपुराण
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तीन लोकरूपी जिसकी दीर्घनाल (मृणाल) है, नेमिनाथ, बलभद्र तथा कृष्णरूपी केसर ( पराग ) से जो सुशोभित है, तिरेसठ महापुरुष ( शलाका पुरुष) जिसके पत्ते हैं ऐसा हरिवंशरूपी कमल जयवन्त हो । कृष्ण और पाण्डवों की कथा को चतुर्मुख और व्यास ने जिस प्रकार कहा और जिसके द्वारा प्रवर दर्शन ( सम्यग्दर्शन) नष्ट नहीं होता ऐसी उस लोकप्रिय कथा की मैं रचना करता हूँ । परमवीर किन्तु मूर्ख और चारित्र से खण्डित नारी की तरह सम्यग्दर्शन को नष्ट करनेवाले मिथ्यादृष्टियों द्वारा रचित काव्य को भी छोड़ दो। जो श्रेणिक राजा द्वारा जैसा पूछा गया, गौतम ( गणधर ) द्वारा जैसा कहा गया और (आचार्य) • जिनसेन द्वारा जैसा वरिणत किया गया उस कथानक की मैं भी थोड़ी सी वैसी ही रचना करता हूँ। मैं ऐसा क्यों कहूं कि मानो यह हरिवंशपुराण अलंकारों और श्रेष्ठ रसों का सागर ही है ? क्या संसार में आत्मप्रशंसा और परनिंदा गर्हित नहीं हैं ? जिस बुद्धिविहीन द्वारा अपनी स्तुति की गई वह उसके द्वारा स्वयं निंदित ही किया गया । ( क्या) शक्ति के प्रदर्शन को भी लोग इस ही प्रकार नहीं पुकारते हैं । जिनवरों द्वारा जैसा कथन किया गया है उसको बिना प्रयास ही जो विशुद्धरूप में (जैसा का तैसा) जोड़ दे ( रच दे) मैं उसका जैसा तथा भव्यजनों का स्नेही भी नहीं हूँ धवल' द्वारा रचित भव्यजनों का आनन्दस्वरूप तथा चाण्डाल चौकड़ी अभव्य लोगों के लिए सूलरूप यह सुशोभन हरिवंशकाव्य घन्य करनेवाला है, इसे सुनिए ! यह सारगर्भित अर्थवाला है, दोष से परिमुक्त है, संयम को निपजानेवाला है, धवल है, काव्यों में कुण्डलरूप (श्रेष्ठ) है, मनोहर है । विचक्षरण लोग अवश्य ही इसे कसें, (इसका) परीक्षण करें, महान् गुणीजन इसे सुनें । जिननाथ को पुष्पाञ्जलि अर्पित करके, निराभूषण ( दिगम्बर) मुनियों को प्रणाम करके यादवों का प्रवर चरित्र जिसमें प्रकट किया गया है ऐसा हरिवंशकाव्य मैं सूर का पुत्र (धवल) आपको समर्पित करता हूँ ।
।
इस लोक में पापों को नष्ट करनेवाला, चारों गतियों के भ्रमरण का निवारण करनेवाला, तीनों लोकों में हितकारी, दोषों का निवारण करनेवाला मव्यजनों के मोक्ष का सार जिसमें है ऐसा जिनशासन जयवंत हो ।
मात्रा - जिनवचनरूपी समुद्र में डुबकी लगाकर घवल के द्वारा यह थोड़ा सा जल लाया गया है इसे लोग कानरूपी अंजुली से पीवें, यह अकाल में ही ( समय से पूर्व ही ) पापों नष्ट कर देता है ।
जलन
जो भावपूर्वक ज्योतिषदेवों से वंदित है, सम्पूर्ण पापदोषों से रहित है, वह कलुषित पापों का क्षय करनेवाला जिनेन्द्र भट्टारक आपके पापों का हरण करे ।।12।।
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80 ]
[ जनविद्या-13
वीर जिणिदु रणविवि तह रिणम्मलु, पविवि उसहु प्रजिउ तह संभउ, परणविवि सुमइ गविवि पउमप्पह, पुप्फयंतु सीयलजिणु पणविवि, वासुपुज्ज पुणु विमल भडारउ, संति कुथु अरु मल्लि जिणेसर रणमि सहरणेमि पासु भवरणासु,
वहइ तित्थु जसुतरणउ समुज्जलु । पुणु अहिणंदणु सुजिणु अणुभउ । रगविवि सुपासु तहय चंदप्पहु । भावें पुणु सेयंसु रगमंसिवि । गविवि प्रणंतु धम्मु गुणसारउ । मुणिसुव्वउ गवेवि परमेसरु । वढ्ढमाणु पुणु पावपणासणु ।
घत्ता-ए चउवीस जिरणवर, बहुलक्खरणधर, सुरवर रणमिय णवेवि ।
मई प्राढत्त महाकह, जण रिणसुणहु इह, प्रइ विचलु भाउ करेवि ॥1॥
प्रणिहि खितहि जे जिण केविय, जे होसहि जे हुयइ जिसइ, पुण तह सिद्धायरिय णवेप्पिण, साहम्मियहं सुदिढचारित्तह, चितम किंपि धम्मुजसु जेण वि, प्रथिरु विढिवि धरणेण किं किज्जइ, ठाउ कुटुंबु सरीक प्रसारउ, भुक्खइ तिसइ रिगच्च पीडिज्जइ, जररक्खसि झिज्जंतउ सीसइ, कइहिमि दिवहयम्मि फिट्टीसइ,
भावें विवि भडारा ते विय । पुणु पुणु भावें णविवि प्रसेसइ । अज्जियाहं पणवाउ करेप्पिणु । इच्छाकार करिवि सुचरित्तहं । वढ्ढइ मुच्चइ पावमलेरण वि । णासइ अहवसइ ण मरिज्जइ । रोय सोय बहुदुक्खहं गारउ । घम्में तप्पइ सीयइं भिज्जइ । भंति पाहि फिटेंतउ दीसइ । अंत कयंत वयरिण पइसीसइ ।
पत्ता-जो रवि मरइ, रण छिज्जइ रवि पीडिज्जइ, प्रक्खउ भुवरिण भीर वि।
करमि सुयरण संभावउ, क्खल संतावउ, हउ कव्यमउ सरीर वि ॥2॥
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जनविद्या-13 ]
[ 81
जिनका समुज्ज्वल निर्मल तीर्थ प्रवहमान है (वर्तमान है) उन वीर जिनेन्द्र को नमस्कार करके; ऋषभ, अजित तथा संभव जिन को नमन करके; फिर अद्वितीय जिनोत्तम अभिनन्दन को व सुमतिनाथ को प्रणाम करके, पद्मप्रभ को नमन करके; सुपार्श्वनाथ तथा चन्द्रप्रभ को नमन करके; पुष्पदन्त और शीतलजिन को प्रणाम करके, फिर भट्टारक (परमपूज्य) वासुपूज्य, विमलनाथ, गुणियों में श्रेष्ठ अनन्तनाथ और धर्मनाथ; शान्तिनाथ, कुंथुनाथ
और मल्लिनाथ जिनेश्वर को और परमेश्वर मुनिसुव्रतनाथ को नमस्कार कर; संसार का नाश करनेवाले नमिनाथ, सहनेमि (नेमिनाथ), पार्श्वनाथ फिर पापों का नाश करनेवाले वर्षमान ।
__घता-इन अनेक लक्षणों से युक्त, इन्द्रों द्वारा नमित चौबीस जिनवरों को नमस्कार किया जाकर मेरे द्वारा महाकथा (महापुराण) प्रारम्भ की गई है, लोग इसे अत्यन्त अविचल भाव करके सुनें ॥1॥
1.2
अन्य क्षेत्रों में जितने भी परमपूज्य तीर्थकर हैं उन सबको भावपूर्वक नमस्कार करके, प्रागे जो जिनेश्वर होंगे, जो हो चुके उन सबको बारम्बार भावसहित नमन करके,
और फिर सिद्ध और प्राचार्यों को नमन करके, उपाध्याय और साधुनों को प्रणाम करके, फिर जिनभाषित श्रुत को नमन करके, आर्यिकाओं को नमस्कार करके, दृढ़ चारित्रशाली व सच्चरित्र सामियों को इच्छाकार करके मैं विचार करता हूँ कि कमाया हुआ धन अस्थिर है, नाश करनेवाला है, और पापों का घर है, इसके द्वारा ऐसा क्या किया जाए जिससे धर्म का यश भी बढ़, पापमल से भी छुटकारा हो और न मर। जाय अर्थात् मैं अमर हो जाऊं। घर, कुटुम्ब और शरीर प्रसार है, रोग, शोक, बहुत से दुःखों के घर हैं, भूख-प्यास द्वारा नित्य पीड़ित किया जाता है। धूप में तपता है; शीत में भीजता है। जरा (वृद्धावस्था) रूपी राक्षसी क्षीण करती हुई कहती है-इसमें भ्रांति नहीं है, नष्ट होता हुआ दिखता है। कुछ ही दिनों में नष्ट हो जायेगा, अन्त में यमराज के मुंह में प्रवेश कर जायेगा।
घत्ता-जोन मरता है, न छीजता है, न पीड़ित किया जाता है, समस्त लोक से भयभीत भी नहीं है, जो सुजनों को समभावी और दुष्टों को संतापित करनेवाला है, मैं ऐसे काव्यरूपी शरीर की रचना क
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82 ]
जनविद्या-13
1.3
कवि चक्कवइ पुग्वि गुणवंतउ, पुणु सम्मत्तहं धम्मसुरंगउ, देवणंदि बहुगुरगजसभूसिउ, वज्जसूउ सुपसिद्धउ मुरिणवरु, मुणि महसेणु सुलोयणु जेण वि, जिणसेरणे हरिवंस पवित्त वि, दिणयरसेणे चरिउ अणंगहु, अंब्बसेणु जें अमियाराहणु, जिरण चन्दप्पहचरिउ महोहरु, अण्ण मि कियइं माइंरुहपुत्तइ, सोहणंदिगुरुवें अणुपेहा, सिद्धसेणु जे गए प्रागउ, रामरणंदि जे विविह पहारणा, असगु महाकइ जे सुमरगोहरु, कित्तिय कहमि सुकइ गुणप्रायर सरणकुमार जें विरयउ मरणहरु, तह वक्खइ जिण रक्खिउ सावउ, सालिहददु कि कइ जीय उददउ, इक्कहि जिणसासणि उच्छलियउ, पउमुचरिउ जे भुवरिण पयासिउ, हउं जडु तो विकिपिन भासमि
धीरसे हुंतउ रण्यवंतउ । जेरण पमाणगंथ किउ चंगउ । जे वायारणु जिणिदु पयासिउ । जेरण पमाणु गंथु किउ सुंदरु । पउमचरिउ मुरिण रविसेरणेण वि । जडिल मुरणी गवरंगचरित्त वि । पउमसेरण प्रायरिय पसंगहु । विरइय दोसविवज्जिय सोहण । पावरहिउ धरणयत्तु ससुंदरु । विण्हसेरण रिसहेण चरित्तई । गरदेवे रणवकांतु सुरणेहा । भवियविगोउ पयासिउ बंगउ । जिणसासरिण बहु रइय कहा । वीरजिरिंगदु चरिउ कि उ सुंदर । गेय कव्व जिह विरइय सुंदरु । कइ गोविंद पवरु सेयवरु । जें जय धवलु भवणिविक्खाइउ । लोयइ चहुमुहं दोणु पसिद्धउ । सेदु महाकइ जसु णिम्मलियउ । साधुणरहि गरवरहि पसंसिउ । महियलि जे पियवुद्धि पयासमि ।
घता-सहसकिरणु रइवेबि गयरिण,
रिणय सत्ते मरिणदावउ जइवि,
चडेवि तिमिर असेस परणासइ। सुथोचउरु वि उज्जोउ पयासइ ॥31॥
T
चरिउ दु बुद्ध वहुप्रकहजुत्त वि, धीरउ चित्त करिवि तोवि रयमि, खलमंडल भासंत्तरण गज्जहि,
भवरिण पसिद्धउ गंथु बहुत्तु वि। विरुउ विडवि जिम भल्लि म पावमि। जूववसेरण रण वत्यु चइहिं ।
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जनविद्या-13 ]
[ 83
1.3
पूर्वकाल में कवि चक्रवर्ती, गुणवान्, नयवन्त, धीरसेन हुए जिनके द्वारा सम्यक्त्वियों के लिए धर्म से रंजित सुन्दर प्रमाणग्रन्थ रचा गया। बहुत गुणी और यशस्वी देवनंदि हुए जिन्होंने जैनेन्द्र व्याकरण प्रकट किया। सुप्रसिद्ध मुनिवर वज्रसूर्य (सूरि) हुए जिनके द्वारा सुन्दर प्रमाण ग्रन्थ बनाया गया। मुनि महसेण (महासेन द्वारा सुलोचना, मुनि रविषेण द्वारा पद्मचरित, जिनसेन द्वारा पवित्र हरिवंश, जटिल मुनि द्वारा नवरंग-चरित्र, दिनकरसेन द्वारा अनंग-चरित्र, पद्मसेन प्राचार्य द्वारा पार्श्वनाथ-चरित्र की, अंब्बसेन द्वारा दोषरहित सुशोभन अमृताराधना की रचना की गई । मनोहर, पापरहित और सुन्दर चन्द्रप्रभ जिन का चरित्र धनदत्त ने, कुमार (माइं=उमासे, रुह-उत्पन्न, पुत्तइ पुत्र द्वारा अर्थात् कार्तिकेय या कुमार द्वारा) और विष्णुसेनाचार्य ने अन्य भी चरित्र ग्रन्थ बनाये, सिंहनंदी गुरु द्वारा अनुप्रेक्षा, नरदेव द्वारा अलौकिक नवकार (मन्त्र), और जिनसिद्धसेन द्वारा भूतकाल में गेय, सुन्दर भविकविनोद प्रकाशित किया गया, रामनन्दी जिन्होंने जिनशासन में अनेक प्रकार के प्रमुख कथानकों की रचना की, जिन महाकवि असग ने सुमनोहारी तथा सुन्दर वीरजिनेन्द्र-चरित्र रचा, सुकवि गुणाकर के लिए मैं कितना (क्या) कहूं जिन्होंने सुन्दर गेय काव्य की रचना की, प्रवर श्वेताम्बर कवि गोविन्द ने मनोहर सनत्कुमार (ग्रन्थ) रचा, तथा जिनके द्वारा सम्पूर्ण वाङमय की रक्षा की गई और जिनका धवल यश भुवन (लोक) में विख्यात है ऐसे कवि शालिभद्र ने जीवउद्योत् की रचना की, लोक में प्रसिद्ध चतुर्मुख और द्रोण जिन्होंने अकेले ही जिनशासन की प्रमावना की ऐसे निर्मल यशवाले महाकवि सेदु, जिन्होंने मुनिवरों और नरवरों द्वारा प्रशंसित पद्मचरित को लोक में प्रकाशित किया । मैं जड़ हूँ तो भी किञ्चित् कहता हूँ, महीतल पर निजबुद्धि को प्रकट करता हूँ।
• घत्ता-हजारों किरणोंवाला सूर्य निश्चय ही आकाश पर चढ़कर सम्पूर्ण अंधेरे का नाश करता है और मणि अपनी शक्ति के अनुसार अंधेरे का नाश करती है (इसलिए) यद्यपि अत्यल्प बुद्धि हो तो भी उद्योत करने का प्रयत्न करता है ।।3।।
1.4
___ इस संसार में प्राचीन चरित्र तो हैं, बहुत सी कथानों से संयुक्त भी हैं, प्रसिद्ध ग्रन्थ भी बहुत हैं तो भी धीर चित्त करके मैं यह रचना कर रहा हूं जिससे कि विरोधी धूर्त की बर्थी मैं नहीं पाऊँ (अर्थात् विरोधी लोग मुझ पर आक्रमण नहीं कर सकें) । मूर्ख लोग बोलते
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84 ]
| जनविद्या-13
मासहि किंपि दोसु जइ बहुगुणु, सइ दिक्खिवि सोहीसहि सज्जणु । वडमूलु हरिवंस महातरु, बहु साहेहिं पुण्णफलु सुंदरु । पुण्ण पवित्तु प्रदोसु सुणिम्मलु, रिट्ठरणेमिचरिएण . जसुज्जलु । उज्जोइयउ महाकइ चंदें, गुणरिणलए बहुबुद्धि समुद्दे । मझ पमाणु किपि जारणंति ण, . हर्ड मि पयासमि भत्तिवसेण रण।
पत्ता-खरघर विडव दलेविणु कंम्महि लेविण जपहु करि दंसंति वि ।
कवणु गव्वु बलहीणमि वुद्धिविहीणमि तिण कुरंग वि जंति वि ॥4॥
15
मूल कहिउ इहु वोरजिर्णदें, जंबूसामि विठ्ठरिसएण वि, गोवद्धणु तह भद्दुवाहु मुणि, पुणु जयतहयसंगासिद्धत्थवि, विजयहु बुद्धिल गंगादेवहु, जसपालहु पंडुहु धुवसेणहु, जयमद्दहु तह पुणु जसमद्दहु, पुणु कमेण बहुगय सुहयाणहु, जिरणसेरणे पुणु यहु उज्जोयउ, एमहि हउ भवियरणहं पयासमि, वालु वुद्ध विहियई सुहेण वि
पुणु गोत्तमसुप्रधम्म मुरिंग । रादिमित्त अपराजियएण वि । तह विसाहु वुद्धिलु खत्तिउ पुणि । धीरसेरण होइवि अइसत्यु वि । धम्मसेरण रणक्खत्तमुरिगदहु । कंसायरियहु तह वसुभद्दहु । आउ सत्थुएहु वि लोहज्जहु । एहु सत्थु प्रायउ जिरणसेरगहु । अम्बसेण रिसए महु ढोयउ । पयडउ अत्थु असेसु वि दरिसमि । मुक्खु वि थिउ सु विवुज्झइ जेग वि ।
घत्ता-इहु जिणवयणु परायउ, कमकमि प्रायउ, प्रागउ पुरणपवित्त वि ।
रिणसुणहु पावपणासण, भवियह वहुगुणु. अविचलु धरिवि सुचित्तु वि ॥5॥
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जैनविद्या - 12 ]
[ 8s
हुए गरजते हैं, जुनों के कारण वस्त्र का त्याग नहीं किया जाता। यदि बहुत से गुण हों तो भी थोड़े से दोषों का बखान करेंगे । सज्जन वही देखकर शोभा करेंगे । हरिवंश ऐसा महान् वृक्ष है जिसकी जड़ें गहरी हैं और जिसकी बहुत सी शाखाओं में सुन्दर पुण्यफल लगे हुए हैं । वह पुण्य से पवित्र है, दोषरहित है और निर्मलतम है, प्ररिष्टनेमि के चरित्र के कारण जिसका यश उज्ज्वल है, गुणों की खान बुद्धि के सागर महाकविरूपी चन्द्रमानों से जो उद्योतित है । इनमें मैं तो परमाणु के समान हूँ, कुछ भी नहीं जानता, न भक्ति के वश होकर रचना कर रहा हूं ।
धत्ता - राजा दुष्ट ( चालाक ) का दलन करने के लिए और काम लेने के लिए उन्हें धमकाता है और मारता भी है । बलहीन और बुद्धिविहीन हरिण भी चलते-चलते घास पर मुँह तो मार ही लेता है इसमें गर्व की क्या बात है । अथवा जैसे किसान अपने पेड़ों पर नुकसान पहुँचानेवाले कमजोर प्रौर बुद्धिविहीन पशुओं को छोटी सी लकड़ी हाथ में लेकर बकता हुआ उन्हें मारता है फिर भी वे भागते हुए घास तो खा ही लेते हैं वैसे ही बल और बुद्धि से हीन मैं प्रज्ञानी धूर्तों द्वारा धमकाये और तोड़े जाने पर भी उनसे दूर रहते हुए यह छोटी सी रचना कर रहा हूं इसमें गर्व की क्या बात है ? ॥4॥
1.5
इसका मूल कथन तो वीर जिनेन्द्र ने किया है । फिर श्रुतघर मुनीन्द्र गौतम, सुधर्म स्वामी, जंबू स्वामी, विष्णु सेन, नंदिमित्र, अपराजित गोवर्धन तथा मुनि भद्रबाहु फिर विशाख, प्रोष्ठिल', क्षत्रिय, फिर जयसेन के साथ बहुश्रुत सिद्धार्थ, धीरसेन हुए । विजय बुद्धिल, गंगसेन, धर्मसेन हुए, मुनीन्द्र नक्षत्र, जयपाल, पण्डु, धवसेन और कस ये प्राचार्य तथा वसुभद्र, जयभद्र, फिर यशोभद्र, लोहाचार्य, फिर बहुत काल के पश्चात् श्रुत की हानि होते-होते यह शास्त्र जिनसेन को प्राप्त हुआ, फिर जिनसेन ने इसे उद्योतित किया । अम्बसेन ऋषि ने मुझे द्योतित किया । इसी प्रकार मैं भव्यजनों के लिए इसे प्रकट कर रहा हूँ । प्रकटित का पूर्ण अर्थ भी बताता हूँ जिससे बालबुद्धि भी सुगमता से जान ले और मूर्ख भी स्थिर होकर अच्छी तरह बूझ लें (समझ लें ) ।
घत्ता - यह प्रिय तथा पूर्णरूप से पवित्र क्रम, क्रम से पहले से चला आ रहा है । भव्यजन, पापों का नाश करने वाले और प्रत्यन्त गुणशाली स्थिर और स्वस्थ चित्त से
इसे
1.
इस कवक की तीसरी पंक्ति में 'बुद्धिलु' जो नाम आया है उसके स्थान पर जिनसेन के हरिवंशपुराण एवं पूजा आदि में 'प्रोष्ठिल' नाम लिखा है ||15||
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86 1
[ जनविद्या-13
16
मई विप्पहु सूरहु वंदणेण, केसुल्लउ वरि संभवहुएण । जिरणवरहु चलण अणुरत्तएरण, णिग्गंथहं रिसिइहभत्तएण । कुतित्थ कुधम्म विरत्तएण, रणामुज्जलु पयडु वहंतएण । हरिवंसु सयलु सुालय पएहि, मई विरयउ सुटु सुहावएहि । सिरि अंबसेरण गुरवेण जेम, वक्खाणि किउ अणकमेण तेरण । सज्जण मुरणेवि बहुगुण भरणंति, दुज्जरण पच्चेलिउ दोसु लिति । इह दुट्ठहं खलह सहाउ कोवि, लाएवि दोसु णिद्दोसहो वि । जे खाहि पियहि घणु विवंति, अप्पउ सम्मत्ता खल भरणंति । जे विढविवि संचहि अत्थ के वि, तित्थाउर वुच्चहि खलहि ते वि। वक्खाणहि जाणंत ते पहंति, वायंतरि हया ते भरगति । जे विविह सत्थण मुरणंति के वि, पसुमुक्खब खल पभणंति ते वि । सहहि महत्थ जे खंति परा,
ते वुहि खर्लाह असक्क गरा । जे परिहउ रणासहि पउरुसेरण,
कर चंडा वुच्चहि खलहि तेरण । जे माय विसल्लहि रिणय पउ वि, तउ दुक्करु छुट्टइ अण्णु को वि । घत्ता-जो उवहसिउ ण तेरण हि वि अंसकरेहि वि सो हउं भवरिण रण देक्खमि ।
पाउ खलह तहु देविणु रिसिय णवेप्पिणु जरणणि सुरणहु कह अक्खमि ॥6॥
1.7
प्रत्थ पुवु तुम्हहि भाविज्जहु, भवियहं मणवयकाय विसुद्धहं, तउ सुझाउ भवह बहु सोहणु, मछररहिउ सुहिं जो भावें, जिणसंठाण ट्ठियउ तिहलोयहं पवर जेम हरिवंसु पइट्ठउ, जुज्झ तह या णिव्वाण गमरण पुणु,
गंथु अपुटव कहमि णिसुरिणज्जहु । हियकरु सुद्ध जिरणागम लुद्धहं । सो अंधारयण्णाण परणासणु । पढइ पढावइ मुच्चइ पावें । वंसुप्पत्ति जेम रणरणाहउ । तहय जेम वसुएवं सिट्ठउ । अक्खमि भव्व सुणहु धरि रिणय मणु।
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जैनविद्या - 13 1
1.6
[87
विप्र सूर के पुत्र, श्रेष्ठ केसुला से संभूत, जिनवर के चरणों में अनुरक्त, निर्बंध ऋषियों के भक्त, कुतीर्थ और कुधर्म से विरक्त, जिसका उज्ज्वल नाम प्रत्यक्ष प्रवाहित हो रहा है, ऐसे मेरे द्वारा सुन्दर / श्रेष्ठ, ललित पदों / सीढ़ियों से युक्त, सकल / जल से भरे हुए, सुहावने / सहज ही मैंने इस हरिवंशरूपी ग्रन्थ / तालाब की रचना की है / का निर्माण किया है जैसा कि श्री बसेन गुरु द्वारा उसका बखान / व्याख्यान किया गया है ।
सज्जन ज्ञान प्राप्तकर बहुत गुण गाते हैं इसके विपरीत दुर्जन दोष ही ग्रहण करते हैं । यह दुष्टों और दुर्जनों का मानो स्वभाव ही है जो निर्दोषों पर भी दोषारोपण करते हैं ।
जो खाते हैं, पीते हैं, धन उड़ाते हैं वे दुष्ट अपने ग्रापको सम्यग्दृष्टि कहते हैं ।
जो आर्थोपार्जन करके उसका संचय भी करते हैं दुष्ट उनको तीर्थंकर कहते हैं । वाणी के द्वारा जो कहते हैं अथवा जो अनेक शास्त्रों की भी रचना करते हैं, दुष्ट जानवर की भांति उन्हीं का प्रवचन करते हैं । जो महान क्षमाशील हैं दुष्ट उनको अशक्त कहते हैं । जो पुरुषार्थ द्वारा क्रोध का नाश करते हैं वे दुष्टों द्वारा क्रूरस्वभावी कहे जाते हैं । जो माता विसल्याने पद ही छोड़ दिया तो अन्य कुछ भी छोड़ देना क्या दुष्कर है ?
घत्ता- जो उपहास करने योग्य है वह ज्ञान का प्रकाश करनेवाला भी होता है ऐसा तो दुनिया में मैंने नहीं देखा । उन दुष्टों को लात मारकर और ऋषियों को नमस्कार कर हे ! मैं यह कथा कहता हूँ, तुम सुनो |16||
1.7
पहले उद्देश्य तुम्हारे मन भावे, हितकार शुद्ध जिनागम के लोभी, विशुद्ध मन-वचन" काय से भव्यजनों के लिए यह मैं अपूर्व ग्रन्थ कर रहा हूँ, वह सुना जाए। तप और शुद्ध ध्यान वही सुन्दर ( अच्छा ) होता है जो संसार के अज्ञानरूपी अन्धकार का नाश करनेवाला होता है । जो ( इस ग्रन्थ को ) मत्सररहित भाव से सुनते हैं, पढ़ते हैं, पढ़ाते हैं उनके पाप नष्ट हो जाते हैं (वे पापों से मुक्त हो जाते हैं)। तीन लोक में जितने जिनमन्दिर हैं, जिस प्रकार नरनाथ के वंश की उत्पत्ति हुई, जैसे श्रेष्ठ हरिवंश प्रतिष्ठापित हुआ तथा जिस तरह वसुदेव द्वारा निर्मित हुप्रा, युद्ध और निर्वाणगमन हुआ वह मैं (सब) कहता हूँ, भव्यजन मन लगाकर सुनें ।
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88 ]
[ जैनविद्या-13
घत्ता एहु मगहु अहियारिहि अइविस्थारिहिं तह विहीउ णिसुणिज्जहु ।
तहं पछइ पुणि थिरु कहमि गिरंतर तिविहु चरिउ भावेज्जहु ॥7॥
उप्पण्णउ जिम वढ्ढमाणु जिणु,
गउ पुणु रायगिह जिरणेदहो, खेत्तहं कालहं तहय णिरुप्पिण. खत्तियाउ तह पुणु गुणुकित्तण, मुरिणसव्वळ (सुव्वउ) उप्पण्णउं पुणु जिम दस सुअ हुन विहिरिबहु धरिणिहि जिम अप्परणउं भवंतर दु इय पव्वय गउ अंधयविहि हु, जं सोहाग्ग कील वसुएवहो, . सोमहि विजयसेरण तिय जुयलहो,
गरणहर संख तहय संगहं पुणु । सो रिणय गणहर पुव्व मुणिदहो । कुलयर तह उप्पणउं सह जिणु । तह हरिवंसहु कहमि पवत्तणु । जिम जिणु दाखवियं रुयंतु वसुहो । णाणुप्पत्ति रिसय सुपरिट्ठहु । विहिय पुत्तहं सुणिवि गिरंतर । रजु जेम रयणायर विजय हु । जं णिमित्त देसंतर गमरणहो । लाहु दमण जिम किउ वणहथिलहो ।
घत्ता-सम लाहु जिम अंगारोहिउ गहि वैरिहि जिम चंउरिउ ।
जिम गंधव्वसेरण तिय परिणिय वरतिय विद्धकुमार चरित्तु णिय ॥8॥
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जनविद्या-13 ]
[
89
घत्ता- यह मगध अधिकारियों द्वारा अत्यन्त विस्तार को प्राप्त हुआ, वह भी शास्त्रानुसार सुनो। इसके पश्चात् मैं स्थिर होकर लगातार कहता हूँ, तीन प्रकार का चरित्र भावपूर्वक सुनो।
1.8
जिस प्रकार वर्धमान जिन उत्पन्न हुए, उनके गणधरों की संख्या तथा संघ की संख्या, फिर जिनेन्द्र का राजगृही आना, उनके अपने गणघरों, पूर्वियों (पूर्वांगधारियों) मुनीन्द्रों के क्षेत्र
और काल का निरूपण, कुलकरों तथा जिनेन्द्र के साथ उत्पन्न क्षत्रियों का गुणकीर्तन और हरिवंश के प्रवर्तन का कथन करता हूं।
जिस प्रकार मुनिसुव्रतनाथ तीर्थंकर उत्पन्न हुए और दुःखी (रो-रोकर जीवन व्यतीत करनेवाला) राजा वसु हुआ वह प्रदर्शित करता हूँ। फिर जिस प्रकार विण्णी राजा के दस पुत्र हुए और मुनि सुप्रतिष्ठित को ज्ञान की उत्पत्ति हुई, जिस प्रकार अपने पुत्रों के पृथ्वी पर निरन्तर भवांतरों को सुनकर अन्धकविण्णि राजा ने इस प्रकार शास्त्रोक्त विधि से प्रव्रज्या ग्रहण की जिस प्रकार वसुदेव की सुन्दर कीड़ाएं, जिस प्रकार देशान्तर जाने का कारण, वहाँ सोमा और विजयसेना इन दो स्त्रियों की प्राप्ति, जिस प्रकार वन में हाथी का दमन किया।
घता-जिस प्रकार श्यामा को प्राप्त किया, जिस प्रकार अंगारक बैरी द्वारा हरण कर आकाश में ले गया, जिस प्रकार गंधर्वसेना के साथ विवाह हुआ, कुमार के जीवन का वृत्तान्त ले जाया गया (आगे वहां से) जानो ।।8।।
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जैनविद्या संस्थान, श्रीमहावीरजी महावीर पुरस्कार
दिगम्बर जैन अतिशय क्षेत्र, श्रोमहावीरजी ( राजस्थान) की प्रबन्धकारिणी कमेटी के निणयानुसार जैन साहित्य सृजन एवं लेखन को प्रोत्साहन देने के लिए रु. 11001/- (ग्यारह हजार एक) का पुरस्कार प्रतिवर्ष देने की योजना
योजना के नियम
1. जैनधर्म, दर्शन, इतिहास, संस्कृति सम्बन्धी किसी विषय पर किसी निश्चित अवधि में लिखी गई सृजनात्मक कृति पर 'महावीर पुरस्कार' दिया जायेगा । अन्य संस्थाओं द्वारा पहले से पुरस्कृत कृति पर यह पुरस्कार नहीं दिया जायेगा ।
पुरस्कार हेतु प्रकाशित / प्रकाशित दोनों प्रकार की कृतियाँ प्रस्तुत की जा सकती हैं । यदि कृति प्रकाशित हो तो यह पुरस्कार की घोषणा की तिथि के 3 वर्ष पूर्व तक ही प्रकाशित होनी चाहिए ।
पुरस्कार हेतु मूल्यांकन के लिए कृति की चार प्रतियां जैनविद्या संस्थान समिति को प्रेषित करनी होगी । स्वामित्व संस्थान का होगा ।
अप्रकाशित कृति की प्रतियां स्पष्ट टंकरण की हुई अथवा यदि हस्तलिखित हों तो वे स्पष्ट और सुवाच्य होनी चाहिए ।
पुरस्कार के लिए प्रेषित कृतियों का मूल्यांकन विशिष्ट विद्वानों / निर्णायकों के द्वारा कराया जायेगा, जिनका मनोनय जैनविद्या संस्थान समिति द्वारा होगा। इन विद्वानों/ निर्णायकों की सम्मति के आधार पर सर्वश्रेष्ठ कृति का चयन जैनविद्या संस्थान समिति द्वारा किया जायेगा ।
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लेखक / प्रकाशक को संयोजक,
पुरस्कारार्थ प्राप्त प्रतियों पर
सर्वश्रेष्ठ कृति पर लेखक को ग्यारह हजार एक रुपये का 'महावीर पुरस्कार' प्रशस्तिपत्र के साथ प्रदान किया जायेगा । एक से अधिक लेखक होने पर पुरस्कार की राशि उनमें समान रूप से वितरित कर दी जायेगी ।
7, महावीर पुरस्कार के लिए चयनित अप्रकाशित कृति का प्रकाशन संस्थान के द्वारा कराया जा सकता है जिसके लिए आवश्यक शर्तें लेखक से तय की जायेंगी ।
8. महावीर पुरस्कार के लिए घोषित अप्रकाशित कृति को लेखक द्वारा प्रकाशित करने / करवाने पर पुस्तक में पुरस्कार का आवश्यक उल्लेख साभार होना चाहिए ।
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यदि किसी वर्ष कोई भी कृति समिति द्वारा पुरस्कार योग्य नहीं पाई गई तो उस वर्ष का पुरस्कार निरस्त ( रद्द ) कर दिया जायेगा ।
10. उपरोक्त नियमों में आवश्यक परिवर्तन / परिवर्द्धन संशोधन करने का पूर्ण अधिकार संस्थान / प्रबन्धकारिणी कमेटी को होगा ।
सयोजक कार्यालय :
दिगम्बर जैन नसियां भट्टारकजी सवाई रामसिंह रोड, जयपुर-302004
डॉ. कमलचन्द सोगाणी
संयोजक जैनविद्या संस्थान समिति श्रीमहावीरजी
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________________ 20-1 हमारे उपलब्ध प्रकाशन 1-3. राजस्थान के जैन शास्त्र भण्डारों की ग्रन्थ-सूची तृतीय, चतुर्थ एवं पंचम भाग मूल्य / सम्पादक-डॉ. कस्तूरचन्द कासलीवाल एव प. अनूपचन्द न्यायतीर्थ 150/ 4. जैन ग्रन्थ भण्डार्स इन राजस्थान-लेखक डॉ. कस्तूरचन्द कासलीवाल 50/5. महाकवि दौलतराम कासलीवाल : व्यक्तित्व एव कृतित्व लेखक-डॉ. कस्तूरचन्द कासलीवाल 20/ / 6. राजस्थान के जैन सन्त व्यक्तित्व एवं कृतित्व लेखक-डॉ. कस्तूरचन्द कासलीवाल 20/17. जैन शोध और समीक्षा–लेखक-डॉ. प्रेमसागर जैन / 8. जिणदत्तचरित-सम्पा.-डॉ. माताप्रसाद गुप्त एवं डॉ. कस्तूरचन्द कासलीवाल 12/ 9. प्रद्युम्नचरित-सम्पा -पं. चैनसुखदास न्यायतीर्थ एवं डॉ. कस्तूरचन्द कासलीवाल 12/| 10. सर्वार्थसिद्धिसार–सम्पादक-पं. चैनसुखदास न्यायतीर्थ 10/| 11. चम्पाशतक - सम्पादक-डॉ. कस्तूरचन्द कासलीवाल 6/| 12. वचनदूतम् (पूर्वार्द्ध एवं उत्तरार्द्ध)-प. मूलचन्द शास्त्री प्रत्येक 10/| 13. पं. चैनसुखदास न्यायतीर्थ स्मृति ग्रन्थ 50/| 14. बाहुबली (खण्डकाव्य)-लेखक-पं. अनूपचन्द न्यायतीर्थ 10/| 15. योगानुशीलन-लेखक-श्री कैलाशचन्द बाढदार 16. 'चूनड़िया --मुनि श्री विनयचन्द्र, अनु.पं. भँवरलाल पोल्याका 17. आणंदा—कवि महानन्दि, अनु.-डॉ. देवेन्द्रकुमार शास्त्री 18. णेमीसुर की जयमाल और पाण्डे की जयमाल-मुनि कनककीति एवं कवि नन्हु अनु.—पं. भँवरलाल पोल्याका 2/___19. समाधि-मुनि चरित्रसेन, अनु.-पं. भंवरलाल पोल्याका ___20. बुद्धिरसायण प्रोणमचरित—कवि ने मिप्रसाद, अनु. पं. भँवरलाल पोल्याका 5/21. कातन्त्र रूपमाला-भावसेन त्रैविद्यदेव 12/22. पुराणसूक्तिकोष 15/23. वर्धमानचम्पू-पं. मूलचन्द शास्त्री 25/24. चेतना का रूपान्तरण-ब्र. कुमारी कौशल 15/25. प्राचार्य कुन्दकुन्द : द्रव्य विचार-डॉ. कमलचन्द सोगाणी 15/26. अपभ्रंश रचना सौरभ–ले. डॉ. कमलचन्द सोगाणी 27. प्राचार्य कुन्दकुन्द-पं. भंवरलाल पोल्याका 28. अतीत के पृष्ठों से-डॉ. राजाराम जैन 29. भगवान् महावीर और उनके सिद्धान्त-डॉ. रूपकिशोर गुप्ता 30. पाहुडदोहा चयनिका-डॉ. कमलचन्द सोगाणी 31. सप्ततच्च-अन. पं. भंवरलाल पोल्याका ___32. अपभ्रंश काव्य सौरभ-लेखक -डॉ. कमलचन्द सोगाणी 75/- 33. समाधिमरण स्वरूप - पं. दौलतरामजी, सं.-पं. भंवरलाल पोल्याका 7/__34. पुराणकथा मंजरी- प्रीति जैन ___10/ 5/ 4/