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जैनविद्या - 12 ]
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हुए गरजते हैं, जुनों के कारण वस्त्र का त्याग नहीं किया जाता। यदि बहुत से गुण हों तो भी थोड़े से दोषों का बखान करेंगे । सज्जन वही देखकर शोभा करेंगे । हरिवंश ऐसा महान् वृक्ष है जिसकी जड़ें गहरी हैं और जिसकी बहुत सी शाखाओं में सुन्दर पुण्यफल लगे हुए हैं । वह पुण्य से पवित्र है, दोषरहित है और निर्मलतम है, प्ररिष्टनेमि के चरित्र के कारण जिसका यश उज्ज्वल है, गुणों की खान बुद्धि के सागर महाकविरूपी चन्द्रमानों से जो उद्योतित है । इनमें मैं तो परमाणु के समान हूँ, कुछ भी नहीं जानता, न भक्ति के वश होकर रचना कर रहा हूं ।
धत्ता - राजा दुष्ट ( चालाक ) का दलन करने के लिए और काम लेने के लिए उन्हें धमकाता है और मारता भी है । बलहीन और बुद्धिविहीन हरिण भी चलते-चलते घास पर मुँह तो मार ही लेता है इसमें गर्व की क्या बात है । अथवा जैसे किसान अपने पेड़ों पर नुकसान पहुँचानेवाले कमजोर प्रौर बुद्धिविहीन पशुओं को छोटी सी लकड़ी हाथ में लेकर बकता हुआ उन्हें मारता है फिर भी वे भागते हुए घास तो खा ही लेते हैं वैसे ही बल और बुद्धि से हीन मैं प्रज्ञानी धूर्तों द्वारा धमकाये और तोड़े जाने पर भी उनसे दूर रहते हुए यह छोटी सी रचना कर रहा हूं इसमें गर्व की क्या बात है ? ॥4॥
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इसका मूल कथन तो वीर जिनेन्द्र ने किया है । फिर श्रुतघर मुनीन्द्र गौतम, सुधर्म स्वामी, जंबू स्वामी, विष्णु सेन, नंदिमित्र, अपराजित गोवर्धन तथा मुनि भद्रबाहु फिर विशाख, प्रोष्ठिल', क्षत्रिय, फिर जयसेन के साथ बहुश्रुत सिद्धार्थ, धीरसेन हुए । विजय बुद्धिल, गंगसेन, धर्मसेन हुए, मुनीन्द्र नक्षत्र, जयपाल, पण्डु, धवसेन और कस ये प्राचार्य तथा वसुभद्र, जयभद्र, फिर यशोभद्र, लोहाचार्य, फिर बहुत काल के पश्चात् श्रुत की हानि होते-होते यह शास्त्र जिनसेन को प्राप्त हुआ, फिर जिनसेन ने इसे उद्योतित किया । अम्बसेन ऋषि ने मुझे द्योतित किया । इसी प्रकार मैं भव्यजनों के लिए इसे प्रकट कर रहा हूँ । प्रकटित का पूर्ण अर्थ भी बताता हूँ जिससे बालबुद्धि भी सुगमता से जान ले और मूर्ख भी स्थिर होकर अच्छी तरह बूझ लें (समझ लें ) ।
घत्ता - यह प्रिय तथा पूर्णरूप से पवित्र क्रम, क्रम से पहले से चला आ रहा है । भव्यजन, पापों का नाश करने वाले और प्रत्यन्त गुणशाली स्थिर और स्वस्थ चित्त से
इसे
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इस कवक की तीसरी पंक्ति में 'बुद्धिलु' जो नाम आया है उसके स्थान पर जिनसेन के हरिवंशपुराण एवं पूजा आदि में 'प्रोष्ठिल' नाम लिखा है ||15||