Book Title: Anekant 1979 Book 32 Ank 01 to 04
Author(s): Gokulprasad Jain
Publisher: Veer Seva Mandir Trust
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Page #1 -------------------------------------------------------------------------- ________________ त्रैमासिक शोष-पत्रिका अनेकान्त व ३२: किरण १.२ जनवरी-जून १६७४ विषय सम्पादन-मण्डल ज्योतिप्रसाद जैन डा०प्रेमसागर जैन भी गोकुलप्रसाद जैन मम्पादक श्री गोकुलप्रसाद न एम.ए., एल-एल. बी. साहित्यरत्न विषयानुक्रमणिका क्र० १. मंगलाचरण-सम्मइसुस २ संत साहित्य पोर जैन अपभ्रंश काव्य -डा. राममूति पिपाठी, उज्जैन .. मालवा के परमार नरेश और जैनधर्म -डा. शिवकुमार नामदेव, हिण्डोरी (मण्डला) . ४. पचपरमेष्ठी मोर णमोकार मंत्र -डा० प्रेमसागर जैन, बड़ौत ५. मादि जिन, शिव एव दांव परम्परा -श्री मुनीशचंद्र जोशी, नई दिल्ली ६. जैन धर्म : उद्भव और विकास -डा. रवीन्द्र जैन, मद्राम ७. जैन काम्य मे व्यवहृत 'जान' शब्द : रूप-स्वरूप -डा. अरुणलता जैन, फरुखाबाद ८. मथुरा को जैन कला -डा. रमेशचन्द्र जैन, विजनौर ६. अनेकान्त-डा. शोभनाथ पाठक १०. एलाचार्य : शब्द-मीमांशा -डा.देवेन्द्रकुमार शास्त्री, नीमच (म.प्र.) ३२ ११. श्रमण संस्कृति का उदात्त दृष्टिकोण -प्रो० श्री जन मूरिदेव १२. मूति-पूजा की प्रतीकात्मकता -डा. भागचन्द्र जैन 'मागेन्दु | वार्षिक मूल्य ६) रुपये इस किरण का मूल्य : १ रुपया ५० पैसे प्रकाशक वीर सेवा मन्दिर, २१ दरियागंज, नई दिल्ली-२ Page #2 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ram me ना . . ranal ! Mara FONIANTRA । -- - . असर EN REAR BARA राष्ट्र के सर्वोच्च पुरस्कार के प्रतिष्ठापक श्र [प्रथम पुरस्कार समर्पण के अवसर पर डा० सम्पूर्णानन्द एवं पुरस्कार विजेता मलयालम कविश्री शंकर कुरूप के साथ Page #3 -------------------------------------------------------------------------- ________________ त्रैमासिक शोष-पत्रिका अनेकान्त ३२: किरण १.२ जनवरी-जून १९७६ सम्पावन-मण्डल ज्योतिप्रसाद जैन हा प्रेमसागर जैन भी गोकुलप्रसाद जैन मम्पादक धो गोकुलप्रसाद जैन एम.ए., एल-एल. बी. साहित्यरत्न विषयानुक्रमणिका विषय १. मंगलाचरण-सम्मइसुस २ सत साहित्य और जैन अपभ्रंश काव्य -~-डा. राममूर्ति त्रिपाठी, उज्जैन ३. मालवा के परमार नरेश भोर जैनधर्म -हा. शिवकुमार नामदेव, डिण्डोरी (मण्डला) ७ ४. पचपरमेष्ठी और णमोकार मंत्र -डा. प्रेमसागर जैन, बड़ौत ५. मादि जिन, शिव एव दांव परम्परा -श्री मुनीशचन्द्र जोशी, नई दिल्ली ६. जैन धर्म : उद्भव और विकाम -डा. रवीन्द्र जैन, मद्रास ७. जैन काव्य मे व्यवहत 'ज्ञान' शब्द : रूप-स्वरूप -हा. मरणलता जैन, फरुवाबाद ६. मथुरा को जैन कला -डा. रमेशचन्द्र जैन, विजनौर ६. मनेकान्त-डा. शोभनाथ पाठक १०. एलाचार्य : शब्द-मीमांशा -1. देवेन्द्रकुमार शास्त्री, नीमच (म.प्र.) ३२ ११. श्रमण संस्कृति का उदात्त दृष्टिकोण -प्रो० श्री रजन मूरिदेव १२. मूति-पूजा की प्रतीकात्मकता ~. भागवन्द्र जैन 'मागेन्दु' वार्षिक मूल्म ६) रुपये इस किरण का मूल्य: १ रुपया ५० पैसे प्रकाशक वीर सेवा मन्दिर, २१ दरियागंज, नई दिल्ली-२ Page #4 -------------------------------------------------------------------------- ________________ भगवान महावीर के जीवनकाल की मुख्य तिथियां (जैनागमों के प्राधार पर ) ईसा पूर्व ईसा पूर्व - - ५९९-त्र शुक्ल त्रयोदशी (३० मार्च) को बज्जीसंघ की ५५२-काशी जनपद में विहार तथा अठारहवा वर्षावास राजधानी वैशाली के निकट क्षत्रिय-कंडग्राम में ज्ञात. राजगह में। कुल में जन्म । पिता के तीन नाम-सिद्धार्थ, श्रेयांस ५५१-मगष जनपद में विहार तथा उन्नीसवी वर्षावास तथा यशस्वी। गोत्र-काश्यप। माता के तीन नाम- पुनः राजगृह में। त्रिशला, विदेहदिन्ना तथा प्रियकाशिनी। गोत्र- ५५०-वक्त जनपद में विहार तथा २०वा वर्षावास वैशाली में वासिष्ठ । ५४६-विदेह, कोशल तथा पंचाल जनपद में विहार तथा ५७१-२८ वर्ष की प्रवस्था में माता-पिता का देहावसान । इक्कीसवां वर्षावास वाणिज्यग्राम में। ५७०-मार्गशीर्ष वदी दशमी (११ नबम्बर) को गृहत्याग ५४८-मगध में भ्रमण तथा बाईसवाँ वर्षावाम राजगन में। करके भनगार श्रमण वन पाना । ५४७-कोशन जनपद में विहार तथा तेईसवां वर्षावास ५६९-केवल-ज्ञान की प्राप्ति से पूर्व साढे बारह वर्ष के वाणिज्यनाम में । छनस्थ काल का प्रथम वर्षावास पास्थेक ग्राम ५४६-7 तथा मगर जनपद में विहार तथा चौवीसवां (वजनीसंघ) में। वर्षावाम राजगह में। ५६८-छयस्थकाल का द्वितीय वर्षाधाम नालंदा में । ४४५-प्रग तथा विदेश जनपद में बिहार तथा पच्चीसवां ५६७-चम्पा में छास्थ काल का तृतीय वर्षावास । वर्षावास मिथिला में । ५६६-प्रयम्घ काल का चतुर्थ वर्षावास पृष्ठ चम्पा में। ५१ ५४४-अम जनपद में बिहार तथा छब्बीमा वर्षावास ५६५-भतिया (अंग देश) में छयस्य काल का पाचवा । पन : मिथिला में। ५४३-कोशल जनपद में बिहार तथा सत्ताईपा वर्षावास वर्षावास। ५६४-छपस्थ काल का छठा वर्षावास पुनः भद्धिया में। पूनः मिथिला मे । ५४२-कोशल, पचाल तण कुरु जनपद में बिहार तथा ५६३-पालभिया (काशी जनपद) में छप्रस्थ काल का अट्ठाईसवाँ वर्षावाम वाणिज्य ग्राम में । सातवा वर्षावास । ५४१-मगध जनपद में भ्रमण तथा उन्तीसवी वर्षावास ५६२-छप्रस्थ काल का पाठवा वर्षावास राजगृह में। राजगह में। ५६१-लाद देश की दूसरी बार यात्रा। इस बार भी वहाँ ५४०-प्रग तथा विदेह जनपद में विहार तथा तीसवा घनघोर उपसर्ग सहन करने पड़े। वर्षावास वाणिज्यग्राम में। ५६०-लाढ बेश से लौटने के बाद छास्थ काल का दसवा ५३६-कोशल तथा पंचाल जनपद में विहार तथा बर्षावास श्रावस्ती में । इकतीसा वर्षावास वैशाली में । ५५६-वंशाली में छपस्थ काल का ग्यारहवी वर्षाबास। ५३८-विदेह, कोशल तथा काशी जनपद में विहार तथा ५५८-उपस्थ काल का बारहवा तथा अंतिम वर्षावास बतीमा वर्षावास पुन. वैशाली में। ५३७-मगध तथा अंग जनपद में विहार तथा तेतीसा चम्पा में। ५५७-वैशाख शुक्ल दशमी (२६ अप्रैल)को जंभिय प्राम वर्षावास राजगह में। ५३६-मगध में विहार तथा चौतीसा वर्षावास नालन्दा में। (कुछ विद्वानों के अनुसार राजगह से लगभग ३० मील पर बर्तमान जमई ग्राम) में केवल-ज्ञान की ५३५-विदेह जनपद में बिहार तथा पैतीस वर्षावास प्राप्ति । केवल ज्ञान-प्राप्ति के ६६वें दिन श्रावण वैशाली में। कृष्ण प्रतिपदा (१ अगस्त) को मगध की राजधानी ५३४-कोशल, पंचाल, शूरसेन तथा विदेहे जनपद में राजगृह के विपुलाचल पर प्रथम प्रवचन, जिसमें विहार तथा छत्तीमा वर्षावास मिथिला में। मगधराज श्रेणिक बिम्बसार अपनी रानी चेलना के ५३३-मगध में विहार तथा सैतीसा वर्षावास राजगृह में। सहित उपस्थित । उनके इसी प्रवचन से उनके तीर्थ ५३२-मगध में विहार तथा पड़तीमा वर्षावास नालदा में। (चतुर्विध संघ) की स्थापना हुई। ११-विदेह जनपद में विहार तथा उन्तालीसा वर्षावास ५५६-विदेह जनपद में बिहार तथा चौव्हवा वर्षावास मिथिला में। वैशाली में। ५३०-विदेह जनपद में विहार तथा चालीसा वर्षावाम ५५५-वत्स तथा कौशल जनपद में विहार तथा पन्द्रहवा मिथिला में। वाणिज्य ग्राम (वज्जी संघ) में। ५२६-मगध में विहार तथा ४१वा वर्षावाम राजगह में । ५५४-मगध में बिहार तथा सोलहवां वर्षावास राजगह में। ५२८-मगध में विहार तथा ४२ वर्षावास मध्यम पावा में ५५३-अंग व विदेह जनपद में विहार तथा सहा वर्षा- ५२७-दीपावली को मध्यम पावा मे ७२ वर्ष की भायु मे वास वाणिज्य ग्राम मे । निर्वाण । 000 Page #5 -------------------------------------------------------------------------- ________________ मोम पहन নীকান परमागमस्य बीज निषिद्धजात्यन्धसिन्धुरविधानम् । सकलनयविलसितानां विरोधमथनं नमाम्यनेकान्तम् ॥ वर्ष ३२ वीर-सेवा-मन्दिर, २१ दरियागंज, नई दिल्ली-२ 5 जनवरी-जम किरण १ और २४ वीर-निर्वाण संवत् २५०५, वि० सं० २०३५ । १९७९ सम्मइसुत्तं णयकंड सिद्धं सिद्धस्थाणं ठाणमणोवमसह उवगयाणं । कुसमयविसासणं सासणं जिणाणं भवजिणाणं । [सिद्ध सिद्धार्थानां स्थानमनुपमसुखमुपगतामाम् । समयविशासनं शासनं जिनानां भवजिनानाम् ॥] जिन-शासन स्वतः प्रमाण-सिद्ध है भावार्थ :-जो संसार के दुःखों को जीत कर अनुपम सुख को उपलब्ध हो चुके हैं, उन जिनेन्द्र भगवान का प्रमाण-प्रसिद्ध अर्थों का स्थान जिन-शासन स्वतः सिद्ध है। वह मिथ्यामतो का खण्डन करने वाला है। जिन-शासन स्वत: प्रमाण इसलिए है कि वह वीतरागी देव द्वारा प्रकाशित है। कोई भी जीव स्वयं वीतरागी बन कर उसे प्रमाणित कर सकता है। अतः प्रमाण वीतरागता ही है। राग द्वेष से रहित अवस्था हो वीतरागता है। विशेष-ग्रन्थ के प्रारम्भ में 'सिद्ध' शब्द का प्रयोग मगल सूचक है। ग्रन्थ-कर्ता के नाम का सूचक भी 'सिद्ध' शब्द कहा जाता है। तित्थयरवयणसंगहविसेसपत्थारमुलवागरणी । दवटियो य पज्जवणयो य सेसा वियप्पा सि ॥ [तीर्थकरवचनसंग्रह विशेषप्रस्तारमूलव्याकरणी। द्रव्याथिकश्च पर्यवनयश्च शेषा विकल्पास्तयोः ।। तीर्थकर-वाणी : सामान्य-विशेषात्मक भावार्थ-तीर्थकरों के वचन सामान्य-विशेषात्मक हैं। वे सामान्य रूप से द्रव्य के प्रतिपादक हैं और विशेष रूप से पर्याय के। द्रव्याथिक (निश्चय या परमार्थ) और पर्यायाथिक (व्यवहार) नयों (सापेक्ष दृष्टियों) से मूल वस्तुओं की व्याख्या की गई है। शास्त्रों में जिन सात नयों का वर्णन मिलता है, वह इन दो नयों का विस्तार है। सभी नय द्रव्यात्मक और पर्यायाथिक इन दो नयों में गभित हैं। इनमें द्रव्याथिक नय का विस्तार नैगम, संग्रह एवं व्ययहार रूप है तथा पर्यायाधिक नय का विस्तार ऋजसूत्र, शब्द, समभिरूढ़ पीर एवंभन रूप है। मुल जिनवाणी का विवेचन करने वाले ये दो ही नय हैं। 000 Page #6 -------------------------------------------------------------------------- ________________ संत साहित्य और जैन अपभ्रश काव्य मध्यकालीन हिन्दी निर्माण साहित्य के लिए "संत साहित्य" शब्द रूढ हो गया है। मध्यकालीन समस्त भार तीय साधनाए श्रागम प्रभावित है- सत-साहित्य भी । सत साहित्य को " प्रभावित" कहने की अपेक्षा मैं तो यह कहना चाहता हूं कि 'वाविक दृष्टि" का ही यह लोक भाषा में सहज, प्रस्फुरण है । प्रतः " प्रभावित" की जगह उसे "प्रागमिक कहना मगत है "प्रागमिक दृष्टि" को यद्यपि धार० डी० रानाडे ने अपने (Mysticims in Maharashtra) मेदिक सिद्धान्त का सायनात्मक श्रविच्छेद्य पार्श्व बताया है। इस प्रकार के आगम को यद्यपि नगमिक कहना चाहते है, पर इससे आगम के व्यक्तित्व का विलोप नहीं होता । प्राचीन प्रार्य ऋषियो की एक दृष्टि का जैसा विकास और परिष्कार मागमों में मिलता है, वसा नैगमक दर्शनो' में नही । इसलिए मैं जिसे "प्रागमिग दृष्टि" कहना चाहता हू, उसका संकेत भले ही वैदिक वाङमय में हो, पर उसका स्वतन्त्र विकास और प्रतिष्ठा आगमों में हुई, यह विशेष रूप से ध्यान में रखने की बात है । 'आगम' यद्यपि भिन्न-भिन्न प्रथ मे प्रचलित और प्ररूढ सब्द है, तथापि यहा एकविशेश धर्य में वांचित है और वह अपात्र की परमार्थिक स्थिति । द्वय हैशक्ति और शिव । विश्व निर्माण के लिए स्पिन्दनारमक अपेक्षा है और विश्वातीत स्थिति के लिए निःस्पद शिव । स्पद और निस्पद की बात विश्वात्मक और विश्वाती दृष्टियों से की जा रही है, दृष्टि निरपेक्ष होकर उसे कोई संज्ञा नहीं दी जा सकती वह विश्वातीत तो है ही, विश्वात्मक परिणति की संभावना से संवातीत होने के कारण विश्वात्मक भी वैज्ञानिक भाषा मे इन्हे ही ऋणात्मक तथा मनात्मक तत्व कह सकते है। विशेषतया इतनी ही है कि 'मागम' में इन्हें डा० राममूर्ति त्रिपाठी, उज्जैन 'चिन्मय' कहा गया है। नैगमिक दर्शनो मे कोई भी ( न्याय, वैशेषिक, सांख्य, पातजल, पूर्व मीमासा तथा उत्तर मीमासा) 'शक्ति' की 'चिन्मय' रूप में कल्पना नही करता कुछ तो ऐसे है जो 'वात' तब ही नही मानते, कुछ मानते भी है तो 'जड' | 'ग्रागम' ( श्रद्वयवादी ) 'शक्ति' को 'चिन्मय' कहते है मोर 'शिव' की अभिन्न क्षमता के रूप में स्वीकार करते है । मद्वयस्थ वही द्वयात्मक मीना के निमित्त दिया विभक्त होकर परस्पर हित हो जाती हैं, पृथक् हो जाती है। इस व्यवधान या पार्थकय के कारण समस्त सृष्टि अस्थिर, बेचैन, मिया सिन्न है। इस स्थिति से उबरने के लिए इस व्यवधान को समाप्त करना पड़ता है, शक्ति से शिव का मेल या सामरस्य अपेक्षित होता है । निर्गुनिए सत पहले साधक है, इसके बाद और कुछ, और इनकी साधना है - सुरत शब्दयोग । यह सुरत या सुरति और कुछ नहीं, उक्त 'शक्ति' ही है, जो श्रादिम मिलन या युद्धावस्था को स्वामी मे सभी बद्धात्मा मे पड़ी हुई है। प्रत्येक व्यक्ति मे यही प्रसुप्त चिन्मयी 'कुण्डलिनी' कही जाती है । अथर्ववेद में यही 'उच्छिष्ट' हे पुराणो में यही 'शेषनाग' है । स्थूलतम पार्थिकात्मक परिणति के बाद कुटप्ति 'शक्ति' विश्व और व्यष्टि उभयत्र मूलाधार में स्थित है । कह भीखा सब मौज साहब की मौजी बापू कहायत । भीखा साहब प्रागमिकों की शक्तिमान (शिव) धीर शक्ति की भाति मौजो श्रोर मौज की बात करते है । मोजी को एक दूसरे सत ने शिव तथा मोज को स्पष्ट ही कहा है सुरति सुहामिनि उति के मिली सबद में जाय । मिली सबद में जाय कन्त को बस में कीन्हा । Page #7 -------------------------------------------------------------------------- ________________ संत साहित्य और जन अपभ्रंश काव्य चलन सिव के पोर जाय जब सक्ती लीन्हा । देखना असम्भव लगता है। जैन धारा कृच्छ एवम् पच्छेदफिर सक्ती भी ना रहे, सक्ति से सीव कहाई । वादी होने से शरीर स्वयं ससार से पूर्ति विरक्त दृष्टि अपने मन के फेर और ना दूजा कोई। रखता है। यही कारण है कि जैन साहित्य मे यही निर्वेदसक्ती शिव है एक नाम कहने को दोई। भाव पुष्ट होकर शांत रस के रूप में लहराता हुपा पलटू सक्ती सीव का भेद कहा प्रलगाय । दृष्टिगोचर होता है। शृगार का चित्रण सर्वदा उनकी सुरति सुहागिनि उलटि के मिली शब्द में जाय। कृतियों मे विदसावसामो और वैराग्यपोषक रूप मे हमा पलटूदास की इन पक्तियो के साक्ष्य पर उक्त स्थापना है। जैन काव्य का प्रत्येक नायक निर्वद के द्वारा अपनी कि प्रागमिक दृष्टि ही सतों की दृष्टि है, सिद्ध हो जाती हर रंगीन और सांसारिक मादक वृत्ति का पर्यवसान 'शांत' में ही करता है। प्रागम की भांति सतजन भी बहिर्याग की अपेक्षा पर इन तमाम भेदक तत्त्वो के बावजूद छठी-सातवी अंतर्याग की ही महत्ता स्वीकृत करते है पोर इस पतर्याग शती के ताधिक मत के प्रभाव-प्रसार ने जैनियों पर भी को कार्यान्विति 'गुरु' के निर्देश में ही सभव है। आगमो प्रभाव डाला--फलतः कतिपय अपभ्रश-बद्ध जैन रच. की भांति सतजन मानते है कि गुरु की उपलब्धि पारमेश्वर नामों में 'सत' का-सा स्वर भी धतिगोचर होता है । चरम पनुग्रह से ही संभव है। यह गुरु ही है जिसकी उपलब्धि लक्ष्य से विछिन्न फलतः विजडित एवम् रूढप्राय प्राचार होने पर 'साधना' (प्रतर्याग) सभव है। यह तो कार बाहल्य के प्रति एक तीखी प्रतिक्रिया और मतर्याग के ही कहा जा च का है कि द्वयात्मक प्रद्वय सत्ता विश्वात्मक प्रति लगाव का सत सवादी विद्रोही स्वर कतिपय रचनामो भी है और विश्वातीत भी। विश्वात्मक रूप में उसके में विद्यमान है । पाहुड़, दोहा, योगसार, परमात्म प्रकाश, अवरोहण की एक विशिष्ट प्रक्रिया है और उमी प्रकार वैराग्यसार, प्रानन्दा, सावय घम्म दोहा मादि रचनाए प्रारोहण की भी। विचार पक्ष से जहां प्रागमो ने द्वया- ऐसी ही है। इनमें संतसंवादी मनःस्थिति का प्रभाव या स्मक अद्वय तत्व की बात की है वही प्राचार पक्ष से प्रतिबिम्बस्पष्ट दिखाई पड़ता है। जिस प्रकार अन्य रहस्यवासना (काषाय) दमन की जगह वासना शोधन की बात वादी रचयितानों ने क्रमागत रूढियों एवम् बाह्याचारों भी। जैनधारा न तो 'द्वयात्मक प्रदय' की बात स्वीकार का खण्डन करते हुए पारमाथिक तत्त्वों की उपलब्धि के करती है और न ही वासना के शोघन चिन्मयोकरण को, अनुरूप यत्नों और दिशानों को महत्त्व दिया है-यही जबकि 'सत' जन विचार और प्राचार दोनों पक्षो में स्थिति इन जैन मुनियों की भी है। लगता है कि इस 'मागम' धारा को मानते है। मौजी श्रीर मौज, सुरत मोर अवधि में प्राचार या साधन को ही साध्यता की कोटि शब्द के 'योग' अथवा 'सामरस्य' में जहा सत जन 'द्व या- प्राप्त होती जा रही थी-फलतः कट्टर साम्प्रदायिक त्मक प्रय' को स्वीकार करते है, वहा काम मिलावे राम । लकीरों और रेखामों के प्रति इनके मन में भी उप को' द्वारा प्रेम की महत्ता का गान करते हुए तन्मय प. प्राक्रोश था और उस अझलाहट को वे उसी उग्र स्वर में मात्मा की उपलब्धि में वामन। के शोधन और चिन्मयीकरण व्यक्त करते है जिस स्वर में सिद्धो नाथों भौर निगुकी भी स्थिति स्वीकार करते है। प्रागम सम्मत संत नियो ने माक्रोश-गर्म उद्गार व्यक्त किए थे। प्रो० हीरा परम्परा से जैन धारा का एक तीसरा अन्तर यह भी है लाल जैन ने ठीक लिखा है कि "इन दोहों में कि जहा पहला अद्वयवादी है वहा दूसरा भेदवादी। वह जोगियों का अगम, प्रचित्-चिन्, देह, देवली, शिवशक्ति न केवल अनेक प्रात्मा की ही बात करता है अपितु ससार संकल्प-विकल्प, सगुण-निर्गुण, अक्षरबोध विधि, वाम ससार को भी प्रनादि और शाश्वत सत्य मानता है। इस बक्षिण अध्व, दो पथ रवि-शशि, पवन, काल प्रादि ऐसे प्रकार, ऐसे अनेक भेदक तत्व उभरकर सामने प्राते है शब्द है और उनका ऐसे गहन रूप में प्रयोग हुप्रा है कि जिनके कारण 'सत' साहित्य के सदर्भ में जन साहित्य को उनमे हमे योग और तांत्रिक ग्रथों का स्मरण हुए बिना Page #8 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ४, वर्ष ३२, कि०१-२ अनेकान्त हा नहीं रहता। संप्रति, मागम संत-संवादो स्वरों में से एक- मण मिलियउ परमेसर हो, परमेसह जिमणस्य। एक का पर्यवेक्षण प्रस्तुत है। विणि वि समरसिहइ रहिय पुज्जु चडावउ कस्स ।। मन परमेश्वर से तथा परमेश्वर मन से मिलकर सम(१) परतत्व संबन्धी वैचारिक या सैद्धान्तिक पक्ष - रस हो जाता है और जब यह सामरस्य हो गया, तब त ऊपर यह स्पष्ट कहा जा चुका है कि जैन धारा मे का विलय भी जाता है । द्वंत का विलय हो जाने से कौन मात्मा ही मुक्त दशा में परमात्मा है, वह अनेक है और पूजक और कौन पूज्य ? कौन पाराधक और कौन मनन्त ज्ञान, अनन्त दर्शन, पनन्त सुख और अनन्त वीर्य आराध्य ? फिर तो का भण्डार है । अशुद्ध दशा में उनके ये गुण कमों से ढके ___"तुभ्यं मां नमो नमः" रहते है। पर इस मान्यता के साथ-साथ उक्त ग्रंथों मे ऐमी की स्थिति प्रा जाती है। इस तरह सामरस्य की कई बातें पाई जाती हैं, जो नि.सन्देह प्रागमिक धारा अनेकत्र चर्चा उपलब्ध हो जाती है। है की है । संतों की भांति जैन मनियों के भी वे ही तात्रिक देह महेली एह बढ़ तउ सत्तावइ ताम। ग्रंथ स्रोत हैं । बौद्धों की भांति जैनो पर भी यह प्रभाव चित्तु णिरंजणु परिण सिहु समरसि होइ ण जाम ॥ दृष्टिगत होता है। प्रागमिकों की भांति जैन मनियो ने। लक्ष्य के रूप मे इमी 'सामरस्य' की उपलब्धि भी भी परमात्म भाव को 'समरस' ही नहीं कहा है, 'शिव उन्हे इष्ट है । संतों ने जिन मन्मोन्मती दशा की ओर शक्ति' का समरूप या पद्वयात्मक रूप भी कहा है। मनि हकेत किया है--उसका पूर्वाभास इन लोगो मे भी रामसिंह ने कहा है (पाहु दोहा) उपलब्ध है-- सिब विगु सन्ति वावरह, सिर पुणु सन्ति विहीण। तुइ बुद्धि तड़त्ति जहि मण न वणहं जाद। बोहि मि जाहिं सयल जग, बुज्झइ मोह विण ॥ सो सामिय उ एसु कहि अणहि देहि काइ॥ इस सामरस्य की उपलब्धि हो जाने पर बुद्धि का शक्तिरहित शिव कुछ नहीं कर सकता और न तो पाहंकारिक 'अध्यवसाय' तथा मन की संकल्प विकल्पात्मक शक्ति ही शिव का प्राधार ग्रहण किए बिना कुछ कर वतियां समाप्त हो जाती है । प्रागम संवादीसंतो के स्वर सकती है। समस्त जगत् शिव-शक्तिमय है । जड़ परमाणु में अन्य देवताबों की उपासना से विरति तथा उक्त अपनी समस्त संरचना में गतिमय था, सस्पंद है-जो गंतव्य की उपलब्धि ही स्वामी की प्रोर से इन्हे निदिष्ट है । शक्ति का ही स्थूल परिणाम है। दूसरी पोर, जीवन भी कही-कहीं तो संतों और इन जैन मुनियो की उक्तियां एकडी० एन० ए० तथा भार० एन० ए० के संयुक्त रूप में दूसरे का रूपान्तर जान पड़ती है। नमक और पानी के दयात्मक है । एकत्र वही शक्ति शिव ऋणात्मक धनात्मक एक ही दृस्टान्त से जो बात रामसिंह कहते है, वही कबीर अवयव हैं जो अपनी निरपेक्ष स्थिति मे अद्वयात्मक है। भी। संत साहित्य के अन्तर्गत राधास्वामी साहित्य तथा गुरु जिमि लोण विलिज्जह पाणियह चित्त बिलिज्ज। नानक की 'पुराण संगत्री' मे भी इस सिद्धान्त का वृहद् समरसि वइ जीवहा काह समाहि करिज्ज? रूप से निरूपण है। परतत्व या परमात्मा को समरस ठीक इसी की प्रतिध्वनि कबीर मे देखेंकहना द्वयात्मकता सापेक्ष ही तो है। अभिप्राय यह कि मन लगा उनमन् सौ उनमन मनहि विलग। मूल धारणा मागम सम्मत है-वही इन जैन मुनियो की लूंण विलगा पांणपा, पाणी लण विलग ।। उक्तियों में तो प्रतिबिम्बित है ही, सतों ने भी 'सुरत' (२) वासना दमन की जगह वासना शोषन पोर तथा 'शब्द' के द्वारा तांत्रिक बौद्ध सिद्धो ने 'शून्यता' और उसकी सहजानंद मे स्वाभाविक परिणति के संकेत'करुणा' तथा 'प्रज्ञा' और 'उपाय' के रूप मे उसी धारणा बौद्ध सिद्धो के समकालीन इन जैन संतो मे भी चरको स्वीकार किया है। अन्यत्र 'समरसीकरण' की भी मावस्था के लिए 'सहजानंद' शब्द का किया गया प्रयोग उक्तियां है मिलता है। संतों ने शतशः, सहस्रसः 'सहज' की बात कही Page #9 -------------------------------------------------------------------------- ________________ संत साहित्य मोर जन अपभ्रंश काव्य है। भारतीय साधना धारा मे जैन मुनियों के 'कृच्छ' के इस प्रकार जैन धारा जिन बातों में अपना स्थान विपरीत ही 'सहज' साधना और साध्य की बात सभव पृथक रखती पा रही है-(१) परतत्व की द्वयात्मकता हैं कि प्रचलित हुई हो। अध्यात्म साधना मे मन का एकाग्री (२) द्वत की ममस्तविष निवेध तथा (३) वासना शोधन करण विक्षेप मूल वासना या काषाय के शोषण से तो का सहज मार्ग-उन प्रागमिक विशेषतामों का प्रभाव मण' मानते ही थे. दूसरे प्रवत्तिमार्गी प्रागमिक साधक प कायों में उपलब्ध होता है। BETET की ऐसी कुशलता सहज पा लेना चाहते थे कि वासनारूप भाषाबद्ध अन्यान्य रचनामों मे पागमसवादी सतो की जल में रहकर ही विपरीत प्रवाह में रहना उसे पा जाय। पारिभाषिक पदावलियां इतनी अधिक उदग्र होकर भाई साधको को यह प्रक्रिया दमन की अपेक्षा अनुकूल लगी। है कि जैन कवियों या मनियो का नाम हटा देने पर तदर्थ वासनाजन्य की मघवर्ती स्थिति का उध्वकिरण पर्याप्त भ्रम की गंजाइश है। अगमित था। जैन साधको के अपभ्रश काव्य मे सकेत इन महत्वपूर्ण प्रभावों के अतिरिक्त ऐसी कई पौर खोजे जा सकते हैं-पर भाषाकाव्य मे कबीर बाद स्पष्ट भी बातें है जिन्हें सतों के सदर्भ में देखा जा सकता कथन मिलने लगते है । जैन मरमी मानदधन की रचनाए है। उदाहरण के लिए -(१) पुस्तकी ज्ञान की निंदा साक्षी है । वे कहते है (२) भीतरी साधना पर जोर (३) गुरु की महत्ता (४) प्राज सुहागन नारी, अवधू माज सुहागन नारी। बाह्याचार का खडन प्रादि । मेरे नाथ पाप सुध लोनी, कोनी निज मंगचारी। (१) पागम 'वहिर्याग' की अपेक्षा 'प्रतर्याग' को प्रेम प्रतीति राग रुचि रंगत, पहिरे झीनी सारी। महत्ता देते है और सैद्धान्तिक बोध को अपेक्षा व्यावहारिक महिती भक्ति रंग की रांची, भावजन सुखकारी। साधना को भी । सैद्धान्तिक वाच्यबोध मे जीवन खपाने सहज सुभाव बुरी मै पहिनी, थिरता कंकन भारी॥ को प्रत्येक साधक ध्यर्थ समझता है-यदि वह क्रिया के इत्यादि... प्रग रूप में नहीं है । सतो ने स्पष्ट ही कहा है--"पोथी इन पंक्तियों में क्या 'सतो' का स्वर नही है ? सतो पढ़ि-पढ़ि जग मप्रा पडित भया न कोय" । परमात्म प्रकाश की भांति इन अपभ्रंश जैन कवियों में भी 'सहज' शब्द का सार का काहना है-- प्रयोग साधन और साध्य के लिए हुआ है । मानन्दतिलक ने सस्थ पढ़तुं विहोइ जहु जो ण हणोह वियप्पु । 'प्राणदा' नामक काव्य मे स्पष्ट कहा है कि कृच्छ साधना बहि वसंतु विणिम्मलक णावि मउह परमप्पु ।। से कुछ नही हो सकता, तदर्थ 'सहज समाधि' प्रावश्यक शास्त्रानुशीलन के बाद भी यदि विकल्प जाल का विनाश न हुया तो ऐमा शास्त्रानुशीलन किस काम का ? जापु जबाइ बहु तव तवई तो विण कम्म हणोइ। इसी बात को शब्दान्तर से 'योगसार' कार ने भी कहा सहज समाधिहि जाणियइ माणवा ने जिण सासणि साह । जो वि जण प्रप्यु पर वि परमाउ चएइ । इसी प्रकार मुनि जोगीन्दु ने भी कहा है कि सहज जो जाणत सत्य इं समल गहु सिव सुबस लहेह ।। स्वरूप में ही रमण करना चाहिए जिसने मकल शास्त्र का ज्ञान प्राप्त करके भी यह सहज सहवह जइ रमहि तो पायहि सिव सन्तु न जाना कि क्या उपादेय और हेय है-प्रात्मीय भौर (योगसार) परकीय है, सकीर्ण स्वपर भाव में व्यस्त रहकर जिसने सहज स्वरूप में जो रमता है-वही शिवत्व की परभाव का त्याग नहीं किया-यह शिवात्मक सुख की उपलब्धि कर सकता है। छोहल ने तो चरमप्राध को उपलब्धि किम प्रकार कर सकता है ? इसी प्रकार दोहा 'सहजानद' ही कहा है --- "हउ महजाणद सरूव सिंह" पाहड़कार का भी विश्वास है कि जिस पंडित शिरोमणि रामसिंह तो सहावस्था की बात बार-बार कहते हैं। ने पूस्तकीय ज्ञान में तो जीवन खपा दिया, पर प्रान्म लाभ Page #10 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ६, वर्ष ३२, कि. १.२ अनेकान्त न किया, उसने कनक को छोड़कर भूसा ही कूटा है। देवलि पाहणु तिथि जलु पुत्थई सम्बई कन्च । पंडिल पंडिय पंडिया कण छविवि तुस कंडिया । वत्थु जु वीस्सइ कुसुभियउ इषय होसइ सम्खु ।। प्रत्ये गये तुठो सि परमस्थ ण जाणहि मूढ़ोसि ॥ इत्यादि... इन पक्तियों में स्पष्ट ही कहा गया है कि देवालय(२) पुस्तकी ज्ञान की अवहेलना के साथ संतो का गमन या तीर्थभ्रमण से कुछ नही होने का-जब तक मन दूसरा सवादी स्वर है -भीतरी साधना या अंतर्याग पर में काषाय शेष है। मनोगत काषाय का संबरण पौर बल । सिद्धो, नाथो पोर सतो की भांति इन जैन मुनियो म ने भी कहा है कि जो साघु बाह्य लिंग से तो युक्त है किंतु (४) चौथी समानता संतों, सिद्धों और रहस्यवादी प्रांतरिक लिंग मे शन्य है वह सच्चा साधक ता है ही नाथों से प्रागमिक परम्परा से प्रभावित इन जैन मुनियो नही, विपरीत इसके मार्गभ्रष्ट है। सच्चा लिग भाव की की यह है कि ये भी वहिम खी साधना से हटकर शरीर है-भाव शुद्धि से ही प्रात्म प्रकाश सम्भव है । मोरूब नारी के भीतर की साधना पर बल देते है । देवसेनाचार्य ने 'तत्वपाहुड में कहा गया है--- सार' में स्पष्ट कहा है - बाहिर लिगेण जदो प्रम्यंतरलिग रहिय परियम्मो। पक्के मण संकप्पे रुद्दे प्रव वाण विषयवावारे । सो सगचरित्तभट्टो मोव व पहविणासगो साहू ।। पगट इ वंमसरूवं अप्पा झाणे जो ईणं ॥ इसी बात को शब्दान्तर से कुन्दकुन्दाचार्य ने 'भाव पाहुड़' मे भी कहा है प्रात्मोलब्धि करनी है तो मनोदर्पणगत काषाय मल का भावो हि पढ़मलिग न दिव्यालगं च जाण परमत्थं। अपवारण आवश्यक है । रत्नत्रय ही मोक्ष है-किन्तु उसका भावो कारणमदो गुणदोसाणं जिणाविति ॥ पोथियों मे नही, स्वसंवेदन से ही सवेतवा संभव है। स्व. (३) अन्तर्याग पर बल ही नहीं, उसे विच्छिन्न मूल संवेदन अपने से ही अपने को जानना है । इसलिए उक्त दोहे वहिर्याग, वालिग अथवा बाह्याचार का उसी प्रावेश में कहा गया है कि यह उक्तसंवेन ही है जिसके द्वारा मन के और विद्रोह की मुद्रा में इन जैन मुनियों ने खण्डन भी संकल्प मिट जाते है, इन्द्रियां विषयों से उपरत हो जाती है किया है। प्रानन्दतिलक ने स्पष्ट ही कहा है कि कुछ और प्रात्मध्यान से योगी अपना स्वरूप जान लेता है। लोग या तो बालों को नुचवाते है अथवा व्यर्थ मे वहन (५) पाँचवा साम्य है --गुरु माहात्म्य या महत्व करते है, परन्तु इन सबका फल जो आत्मबिन्दु का बोध का। प्रागमसम्मत धारा कि साधन को सर्वाधिक महत्व है, उससे अपने को वचित रखते है देती है, अतः निर्देशक के प्रभाव मे वह कार्यान्वित हो के केस लुचाहिं, केह सिर ज भारू। प्रबिणजाहि, पाणंदा। किम जावहिं भयपारू? १ नही सकती। संतों ने 'गुरु' को परमात्मा का शरीरी रूप मनि योगीन्दु ने भी कहा है कि जिन लोगों ने केवल ही कहा है । जैन मुनियो मे भी गुरु महिमा का स्वर उतना ही उदग्र है । मुनि रामसिंह ने पाहुण दोहा मे गुरु जिनवरों का बाहरी वेष मात्र अपना रखा है. भस्म से __ की वंदना की है और कहा हैकेश का लुचन किया है किन्तु अपरिग्रही नहीं हुप्राउसने दूसरों को नही अपने को ठगा है। इसी प्रकार इन गुरु विणयरु गुरु हिमकिरणु गुरु दीवउ गुरु देउ । अप्पापरहं परंपरह जो बरिसाव भेउ। मुनियो ने तीर्थभ्रमण तथा देवालय गमन का भी उग्र स्वर मे विरोध किया है। मनि योगीन्दु ने तीर्थ भ्रमण के अर्थात् गुरु दिनकर, हिमकर, दीप तथा देव सब कुछ विषय में कहा है-- है। कारण, बही तो प्रात्मा और अनात्मा का भेद स्पष्ट तित्थई तित्य भमंताह मणह मोव वण होह। करता है । यह सद्गुरु ही है जिसके प्रसाद से केवल ज्ञान णाण वि वज्जिउ जेण जिय मुनिधरु होइ ण सोइ॥ का स्फुरण होता है उमी की प्रसन्नता का यह परिणाम है देवलगमन तथा भर्तिपूजा के विपक्ष के उद्गार देखें - कि साधक मुक्ति रूपी स्त्री के घर निवास करता है। पत्तिम पाणि चव तिल सम्बइ जाणि सवष्णु । कवलणणवि उपज्जइ सद्गुरु वचन पसावु । जं पुण मोव वहं जाइवउ तं कारण कुछ अण्णु । निष्कर्ष यह कि अपभ्रंशबद्ध जैन काव्यो मे उस स्वर पत्तिय तोडि म जोहया फसहि ज इत्थु म बाहि । का स्पष्ट ही पूर्वाभास उपस्थित है जो सतों मे लक्षित जसु कारणि तोदेहि तुहु सोउ एत्थु चाहि ॥ होता है। 000 विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन Page #11 -------------------------------------------------------------------------- ________________ मालवा के परमार नरेश और जैन धर्म डा. शिवकुमार नामदेव, डिण्डौरी (मला) मालवा के परमार राजवंशीय शासकों ने प्राचीन परमार नरेश वाक्पति मुंज ने जैन आचार्य अमितभारतीय इतिहास में एक महत्वपूर्ण भाग का अभिनय गति, महाक्षेत्र, धनपाल व घनेश्वर प्रादि को राजाश्रय किया और किसी समय मे उच्च चक्रवर्ती पद को मी प्राप्त प्रदान किया। अमितगति बहुमुखी प्रतिभा के विद्वान थे। किया। कभी वे मालवा के अधिपति के रूप मे पोर कभी जैन धर्म के अतिरिक्त सम्कृत के क्षेत्र में भी उनका ऊंचा प्रवती नरेश के नाम से अभिहित किये जाते थे। परमार स्थान माना जाता है। इनका 'सुभाषित रत्न संदोह' नरेश उज्जैन और घास के शासकों के नाम से भी सुवि- नामक ग्रंथ प्रसिद्ध है। अमितगति माधवसेन का शिष्य था ख्यात थे । परमार राजवशीय नरेशों को प्रारम्भिक राज• जिमका गुरु माथुरसंघ के जैन साधुपो का प्रधान नेमिषण धानी उज्जयिनी थी परन्तू भोन के काल में उनकी राज- था । जैनाचार्य धनपाल को जैन ग्रन्थों से राजा भोज का ta नीतिक राजधानी का केन्द्र धारा नगरी हो गई। अपने समकालीन माना गगा है। परन्तु घार के इतिहास में उत्कर्ष के काल में उनके राज्य की सीमा उत्तर में वर्त इनको राजा मुंज का समकालीन तथा उनका कुल पुरो. मान कोटा और बूदी, पूर्व में विदिशा, होशगाबाद एव । एव हित बताया गया है। सस्कृत एवं प्राकृत दोनों भाषामों सागर के भाग एवं दक्षिण मे ग्वान्देश प्रदेश एवं गोदावरी पर इनका समान अधिकार था। ये श्वेताम्बर सम्प्रदाय क्षेत्र नक के भूभ ग परमार नरेशो के अधीन थे। के अनुयायी थे इस सम्प्रदाय में इन्हे इनके भाई ने मध्य भाग में स्थित होने के कारण परमार राज्य का दीक्षित किया था। इनका छोटा भाई शोमन भी जैनाचार्य सपर्क उत्तर न लेकर दक्षिण तक तथा पूर्व से लेकर पश्चिम था । तक के अनेक ममकालीन राज्यो मे हुया। इमसे न केवल परमार नरेश भोजदेव ने प्रभाचन्द्र मुनि को सम्मान मालवा को सस्कृति की श्रीवृद्धि हुई अपितु परमारकालीन प्रदान किया। दिगम्बराचार्य श्री शान्ति सेन ने भोज की कला ने अन्य राज्यों की कला तथा संस्कृति पर गहरा सभा मे सैकड़ों विद्वानों से वादविवाद करके उन्हे पराजित प्रभाव डाला। किया था। 'चतुर्विशति प्रबन्ध' से ज्ञात होता है कि परमार काल मे मालवा मे जैन धर्म का पर्याप्त उज्जयिनी मे विशालकोति नामक दिगंबराचार्य के शिष्य समन्नत विकास हमा । यद्यपि परमार नरेश ब्रह्मण धर्म मदनकीर्ति ने परवादियों पर विजय पाकर 'महाप्रमाणिक' के अनुसरणकर्ता थे, परन्तु उन्होने जैन धर्म के उत्थान व की पदवी प्राप्त की थी। सूराचार्य व देवभद्र ऐमे जैनाचार्य प्रसार मे अभूतपूर्व योगदान दिया। परमार नरेशो ने जैन थे जिनका भोज के दरबार मे प्रादर किया जाता था। विद्वानों को राजाश्रय प्रदत्त किया। उज्जैन एवं धारा एवं धारा साथ ही नयनदि, जिनवर सूरि अन्य जैन कवि थे, जिन्हे नगरी जैन प्राचार्यों के स्थायी स्थान बने भोर जैना आदर प्राप्त था। चार्यों ने बहुत बड़ी सरूपा म प्रना को जैन धर्म की डोर ब्राह्मण धर्म के साथ ही साथ जैन धर्म भी मालवा प्राकषित किया । इसी काल मे अनेक जैन तीथों की भी। मे फला-फूला । ११वी शताब्दी ई. के प्रारम्भिक भाग मे नीव पड़ी और जैनाचार्यों ने पूर्व परम्परा से चले आए हुए महान जैन श्वेताम्बर गुरु अम्भदेव परमार राज्य के स्थानों की महत्ता बताई तथा वहां पर तीर्थों का शुभारभ खान्देश मे थे। उन्होंने जैन सिद्धान्तों का प्रचार किया मौर भनेक लोगों को इस धर्म में दीक्षित हुमा। Page #12 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ६, पर्ष ३२, कि. १.२ बनेका किया। इस भू-भाग पर अनेक जैन देवालयों का निर्माण अंतिम क्षोर पर निमाड़ के मैदानी क्षेत्र में ऊन नामक इमा। ११वीं शताब्दी ई. के मध्य में निर्मित किये गए एक ऐतिहासिक स्थान है जो जिला मुख्यालय खरगोन से जैन देवालय निमाड़ जिले के ऊन में भी पाये गयेहै। इससे लगभग १६ कि०मी० की दूरी पर अवस्थित है। परमार वंश यह प्रमाणित होता है कि उस काल में जैन धर्म न केवल के शासनकाल में यह एक महत्वपूर्ण नगर एवं वास्तु सक्रिखान्देश तक ही सीमित था अपितु परमार राज्य की यता का एक मुख्य केन्द्र था। इसके प्राचीन गौरव के सीमानों के मध्य प्रदेश मे और पूर्व मे भी उसका प्रसार साक्ष्य स्वरूप यहां पर अब भी अनेक जैन एवं हिन्दू मदिर था। वर्तमान है। यहां के मंदिरों की वास्तुशंली खजुराहोविन्ध्याचल पर्वत के उत्तर मे भी जैन धर्म की समूह के सदृश है : यहा के एक मन्दिर की दीवाल पर प्रत्यधिक प्रगति हुई थी। जैनाचार्यों ने परमार नरेशों को परमार नरेश उदयादित्य का एक अभिलेख है। सदा ही प्रभावित करने का प्रयास किया। राजा नरवमन ऊन मे दो महत्वपूर्ण जैन मदिर है -(१) चौबार जैन धर्म के प्रति सभाधना रखते थे। वे जैन गुरु वल्लभ डेरा क्रमाक २ तथा (२) शातिनाथ । के प्रति बड़ी श्रद्धा रखते थे । परमार नपति विन्ध्य वर्मन चौबारडरा क्रमाक २ एक प्राचीन जैन मन्दिर है। जैनियों का बड़ा आदर करता था। जैन व्याकरण एव इसका प्राकार वर्गाकार है और इसके मध्य पाठ स्तम्भों जैन सम्प्रदाय के समस्त सिद्धान्तों के महान विद्वान् पडित पर एक गुम्बज है। इसमे चार द्वार मार्ग है जिनमें से एक धारासन के शिष्य महावीर को विन्ध्यवर्मन ने संरक्षण गर्भगृह का जाता है । गभंगह मे दो विशाल जैन मूर्तियां पदान किया था। इसी काल में प्राशाधर अपने सपूर्ण है। इनमें से एक मूर्ति तीर्थ कर शातिनाथ की है। इसका परिवार के साथ पाकर मालवा मे बस गया और महावीर स्थापना काल माघ शुक्ल ७ स. २८२ वि. मति पर को अपना पथप्रदर्शक बनाया। विन्ध्यवर्मन का उत्तराधि- प्रकित है। दूसरी मूर्ति का स्थापनाकाल स. १२६३ कारी सुभट वर्मन जैन धर्म का विरोधी था। अर्जुन वर्मन वि है। के सिंहासनारोहण के पश्चात् मालवा मे पुनः जैन धर्म की सड़क के दक्षिण की प्रोर कुछ दूरी पर एक टेकड़ी के प्रगति हुई। याशाधर ने लिखा है कि अर्जुन वर्मन का प्रदेश ऊपर श्री शातिनाथ मदिर है, जा ग्वालेश्वर मंदिर के नाम जैन श्रावकों से भरा था और वह स्वय जैन धर्म के पक्ष से प्रसिद्ध है। इसका प्रामलक शिला एव कलश नष्ट हो गए का प्रसार करने के लिए नलकच्छपुर नगर में रहता था। है। मण्डप चार गुम्बदयुक्त एक वर्गाकार कक्ष है। इसमें उसने जैन धर्म सप्रदाय के विभिन्न पक्षों का निरूपण करने दालान नहीं है । गर्भगृह सभा मण्डप से लगभग १० फुट के लिए अनेक यो रचना की थी। जैन धर्म सुदीर्घ काल नीचा है। गर्भगृह से मडप में पाने के लिए सीढ़ियां बनी तक मालवा मे फलता-फूलता रहा । हुई है। मुख्य शिखर के चारों ओर उसी प्रकार के शृंग जैन कला एवं स्थापत्य को परमार काल में चरमो. है जैस कि खजुराहो के पाश्वनाथ मन्दिर में है। गर्भगृह के स्कर्ष पर पहुंचने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। इसका कारण अन्दर तीन दिगम्बर जैन प्रतिमानो की एक पंक्ति एक यह भी है कि भागवत धर्म के अनुयायी होने के बावजूद पादपीठ पर खड़ी है। उनमें से भगवान शातिनाथ की उन्होने जैन धर्म के प्रति न केवल उदार दृष्टिकोण पप. प्रतिमा १८' ऊची है जिनके दोनों ओर भरहतनाथ तथा नाया बल्कि उनके काल में अनेक जैन मन्दिरों का निर्माण कुन्थनाथ की प्रतिमाएं कायोत्सर्ग मुद्रा मे खड़ी है। मध्य हुमा और जैन धर्म के उन्नयन मे उन्होने गहरी अभिरुचि की प्रतिमा पर स्थापना काल ज्येष्ठ शुक्ल १३ सं० १२६३ व्यक्त की। मंकित है। परमारों के प्रतापी शासनकाल मे भनेकानेक भव्य भोपाल से लगभग २५ कि. मी. की दूरी पर स्थित एवं विशाल देवालयो का निर्माण हुमा जिनके कुछ उदा- समरूगढ़ नामक एक छोटा-सा ग्राम है। ग्राम के बायें हरण माज भी उपलब्ध है । सतपुड़ा पर्वत श्रेणी के उत्तरी अचल में अनेक पुरात्वीय अवशेष मंदिरों के भग्नावशेषों Page #13 -------------------------------------------------------------------------- ________________ मालवा के परमार नरेश पोर मन धर्म के रूप में मौजूद हैं जिनमें प्राचीन जैन मन्दिर की जगतो की भांति यद्यपि वे विविध प्रकार की नहीं हैं, परन्तु वे एवं अधिष्ठान पर पुननिर्मित जैन मन्दिर एवं उसके लेख युक्त है। इन प्रतिमानो में प्रादिनाथ, श्रेयांसनाय, प्रहाते मे रखी हई प्राचीन जैन प्रतिमायें एवं स्थापत्यखड धर्मनाथ, शातिनाथ, नेमिमाथ, नमिनाथ एव महावीर की है। स्थापत्य विद्या एव मूलि शिल्प के आधार पर प्राचीन प्रतिमाये उल्लेखनीय है। जैन मन्दिर लगभग १३वी शदी का प्रांका जा सकता है। मध्य प्रदेश के उज्जैन जिले की महीदपुर तहसील से इस स्थान का सम्बन्ध धाराधिपति भोज द्वारा निर्मित उस पूर्व दिशा में १५ कि० मी० दूर झारड़ा ग्राम अपने जनाप्राचीन जैन मन्दिर से रहा होगा जो भोजपुर में प्राज भी वशेषों के कारण कला जगत में अधिक प्रसिद्धि प्राप्त कर पुननिमित अवस्था मे खड़ा है। चुका है। यहां से उपलब्ध वि० स० १२०८ के अभिलेख भोजपुर से लगभग १० किलोमीटर की दूरी पर वाली रोहिणी की एक कलात्मक प्रतिमा २' ५' ऊंची सावरी नामक ग्राम है। यहा परमारकालीन मदिरों के और १७" चौड़ी है। १६ विद्या देवियों में रोहिणी कई स्थलों पर अवशेष उपलब्ध है। इन्हीं स्थलो मे एक प्रसिद्ध है। प्रतिमा का वाहन गाय है। अतः यह श्वेताम्बर समह जैन मन्दिर के अवशेष का है जो ग्राम की पश्चिम परम्परा में निर्मित है। चतुभजी रोहिणी की इस प्रतिमा दिशा पर कुछ ही दूरी पर है । मदिर के अवशेषों में मात्र के ऊर्ध्व वाम हस्त में कलश एवं दायें हाथ में शख, जगती शेष रह गई है। इसी जगती पर यत्र-तत्र बिखरी प्रधो वाम हस्त में कमल एवं चौथा हाथ भग्न है । प्रतिमा हई लगभग दो दर्जन जैन प्रतिमायें पड़ी है जिसमे सुप्राव. एक विशिष्ट मूर्तिकला का उदाहरण प्रस्तुत करती है। भाष जैन चतुष्टि का, ऋषभनाथ, गोभेद अम्बिका, इसमें वाहन के प्राधार पर जैन देवी श्वेताम्बरी है परन्त अम्बिका तथा अन्य तीर्थंकरों की प्रतिमायें सम्मिलित है। आयुध के प्राघार पर दिगबर है। मभवतः यह परमार पतिमा विज्ञान की दष्टि से वी सती का वंश के महान यशस्वी सम्राट् राजाधिराज भोज के समय पाका जा सकता है। संस्थापित धार्मिक समन्वय के कर्तृत्व द्वारा प्रभावित थी। नेगावर से ३३ मील पश्चिम की पोर एव इन्दौर देवी की शरीर यष्टि विशुद्ध रूप से परमार शिल्प से मन प्राणित है। से ४६ मील पूर्व में स्थित विजयवाड़ा में महान जैन मन्दिर पूर्ण ध्वम्तावस्था में है। इसमें तीन भीमाकार यहां से उपलब्ध दूसरी महत्वपूर्ण प्रतिभा यश्वरी की है। परमार मतिकला में प्रथम तीर्थंकर ऋषभनाथ दिगम्बर जैन प्रतिमाएं सर्वाधिक अाकर्षक हैं। इनमें से की शासन देवी चक्रेश्वरी परमार मूर्तिकला में विशेष रूप एक के पादपीठ पर संवत १२३४, तदनुसार ११७७ ई० उत्कीर्ण है। से अकित मिलती है । भारड़ा से उपलब्ध चक्र श्वरी की इस प्रतिमा में देवी गसड़वाहना और अष्टभुजी है। परमार गजदश के उत्कर्ष काल में मालवा के लोगों प्रतिभा के चक्र, पाश, वाण, वरद, प्रकुश, वच्च प्रायुध ने भवन निर्माण सम्बन्धी कितनी दक्षता प्राप्त की थी, यह सुस्पष्ट है, एवं दो हाथों के आयुध भग्न है । इस प्रतिमा उपुक्त विवरण से स्पष्ट हो जाता है। इसी काल में पर प्रकित अभिलेख अस्पष्ट है । अभिलेख के प्राधार पर जैन शिल्प कला का भी बहुत उत्कर्ष हुआ। विवेच्य युगीन इसका काल १३वी शताब्दी ई० निर्धारित किया जा जैन प्रतिमायें अनेक स्थलों से उपलब्ध हुई है। भोजपुर सकता है। से तीन मील की दूरी पर पाशापुरी नामक ग्राम में सोलह विद्या देवियो में प्रसिद्ध अच्युता की यहा से शातिनाथ की प्रतिमा सुरक्षित है । सतपुड़ा पर्वत श्रेणियों उपलब्ध काले स्लेटी प्रस्तर की इस प्रतिमा में देवी को के मिरे के निकट निमाड़ के मैदान में स्थित ऊन नामक अश्वारूत दिखाया गया है । यह प्रतिमा ५'४" लंबे एव ग्राम में स्थित जैन मन्दिरो मे जैन धर्म की भनेक सुन्दर ३'७" चौड़े पाषाण फलक पर उभारी गई है। दो हायो मूर्तियां स्थापित है। केन्द्रीय संग्रहालय, इंदौर में परमार से नमस्कार मुद्रा की प्रज्ञप्ति व दाये हाथ में खड्ग तपा युगीन भनेक जैन प्रतिमाये सुरक्षित है। ब्राह्मण मूर्तियो (शेष पृष्ठ १३ पर) Page #14 -------------------------------------------------------------------------- ________________ पंच परमेष्ठी और णमोकार मंत्र डा० प्रेमसागर जैन, बड़ौत अरिहन्त, सिद्ध, प्राचार्य, उपाध्याय और साधु को वह सूत्र है.---"णमो अरिहन्ताणं" मन्त्र । उसमें पंच परमेष्ठी पच परमेष्ठी कहते है। जैन शासन उनकी महिमा से को समान रूप मे नमस्कार किया गया है। मन्त्र होने के समन्वित है। उन्हे अधिष्ठातृ देव माना जाता है। साधु कारण यहाँ नमस्कार का अर्थ है -साक्षात् करना । तभी से मरिहन्त तक का क्रम उत्तरोत्तर अधिकाधिक प्रात्म- मन्त्र की सार्थना है। साक्षात का अर्थ है-अनुभूति की शुद्धि की दृष्टि से किया गया है। सिद्ध के पूर्ण पावन होने गहराइयों में स्पष्ट दर्शन । पर भी, लोकोपकार की दृष्टि से अरिहन्त को प्रथम जन परमग मे यह मन्त्र, मुष्टि की भांति ही अनास्थान प्राप्त हया है। पाठो कर्मों को जीतने से सिद्धों को दिनिधन माना जाता है। भगवान महावीर ने १४ पूर्वो पूर्ण शाश्वत प्रात्म-सुख प्राप्त हो जाता है । वे "लोयगणि- की विद्या अपने गणवरो को स्वयं प्रदान की थी। पूर्व वासिणो", "लोयसिंहरत्यो" और "लोकत्रयशिखरपुरी. विद्या का अर्थ है, भगवान महावीर से पहले की विद्या, वासिनः" कहलाते है। इसके विपरीत, अरिहन्त केवल जो श्रवण कर-करके सतत चली पा रही थी। हो सकता चार घातियां कर्मों का क्षय कर पाते है। अतः चार अवा- है कि तीर्थकर पाश्वनाथ के समय में भी १४ पूर्व पहले से तिया कमी के चुकने तक उन्हे इस संसार मे रुकना होता पाई हई विद्या के रूपमे प्रतिष्ठित हों। जो कुछ हो, १४ पूर्त है। इस बीच उन्हे समवशरण को बिभूति प्राप्त हो जाती में एक पूर्व था-विद्यानुवाद । उसका प्रारम्भ णमोकार है और उसके माध्यम से वे अपनी दिव्य ध्वनि का प्रमार । मन्त्र से हवा था, अर्थात् पंच परमेरठी के नमस्कार से हुमा करते है, जिससे संसार का भला होता है। जैनाचार्या ने था। विद्यानुवाद एक अद्भत मन्त्रग्रन्थ था। प्राज वह जागतिक उपकार को ही मुख्यता दी है, इसी कारण सिद्ध हा मुख्यता दी है। इसी कारण सिद्ध विनुन माना जाता है, किन्तु कहा जाता है कि उसकी से पूर्व परिहन्त को मान्यता मिली है। इसी सन्दर्भ मे बिखरी सामग्री का संकलन मनि सुकुमार सेन (७वी 'षट् खण्डागम' का एक उद्धरण महत्वपूर्ण है शती ईगवी) के विद्यानुशामन में हुआ है। "असत्यहत्याप्तागमपदार्भावगमो न भवेवस्मदादीनां, विद्यानुशासन की हस्तलिखित प्रति जयपुर और संजातश्चैतद् प्रमादावित्युपकारापेक्षया अजमेर के शास्त्र-भण्डारो में मौजूद है। श्री मोहनलाल वादाहन्नमस्कारः क्रियते ।" । भगवानदास झावेरी ने ऐतिहासिक दृष्टि से जैन मन्त्र इसका अर्थ है कि यदि ग्रहन्त न होते तो हम को शारत्र का प्रारम्भ ईमा से ८५० वर्ष पूर्व, अर्थात् तीर्थकर प्राप्तागम में कहे हुए पदार्थों का प्रवगम न हो पाता। पाश्र्वनाथ के समय मे स्वीकार किया है । झावेरी की इस महन्तो के प्रसाद के कारण ही हम प्रामाणिक श्रुत को प्राप्त मान्यता के सम्बन्ध मे डा० पाल्तेकर ने लिखा है।कर सके है, अत: उन्हे आदि मे नमस्कार करना उचित "Mr. Jhaveri thinks that Mantrashastra among the Jains is also of hoary antiquity. ___ यद्यपि प्रास्मशुद्धि की दृष्टि से साधु सबसे नीचे है He claims that its antiquity goes back to the भौर गिद्ध सबसे ऊपर, किन्तु जैनाचार्यों ने पांचों को days of parsuvnatha, the 23rd Tirthankata, समान रूप से वन्दनीय कहा है। शायद यही कारण who fiourished about 850 B. C." है कि पांचों का सम्गुम्फन एक ही सूत्र में किया गया है। उपलब्ध पुरातात्विक आधार पर णमोकार मन्त्र का Page #15 -------------------------------------------------------------------------- ________________ पंच परमेष्ठी और णमोकार मंत्र प्राचीनतम उल्लेख हाथीका शिलालेख में प्राप्त होता है । उसकी प्रथम पंक्ति है --"नमो अरहंतानं ॥नमो समिधानं ।। ।" श्री बी० ए० स्मिथ ने अपने प्रसिद्ध ग्रंथ "Early History of India" मे इम शिलालेख का निर्माता कलगाधिपति सम्राट् खारवेल को ईसा से १७० वर्षमाना है। जहाँ तक निति साहित्य का सम्बन्ध है पाचार्य दन्त भूतनिका पण्डान समे पहला ग्रंथ है, जिसका श्रारम्भ णमोकार मन्त्र के मंगलाचरण से हमा है । पट्खण्डागम श्री वीरसेनाचार्य की संस्कृत टीका के माथ, डा० श्री हीरालाल जैन के सम्पादन में, अमरावती से वि० सं० १९६६ में प्रकाशित हो चुका है। भूतबलि का समय ईसा की दूसरी शताब्दी माना जाता है । णमोकार मन्त्र अपूर्वशक्ति का प्रतीक है। उसके उच्चारण में, ध्यान मे दहनोविक वैभव तो मिलते ही है. पारलौकिक गिद्धि भी प्राप्त होती है। भद्रबाहु ने 'उबसमाहर स्तोत्त' में लिखा है - 'सम्मते लढे चितामणिकपवायवम्भहिए। पार्वति प्रविण जीवा परामरं ठाणं || तुह अर्थ - पचनमस्कार मंत्र से चिन्तामणि और कल्पवृक्ष से भी अधिक महत्वशाली सम्यग्दर्शन प्राप्त होता है, जिसके कारण जीव को मोक्ष मिलता है । श्राचार्य कुन्दकुन्द को विश्वास है कि मंत्र से भव-भव सुख प्राप्त होता है। उनका तात्पर्य केवल इहलौकिक सुख से ही नही अपितु पालौकिक सुख से भी है। उनका कथन है हा सिद्धार्थारिया उवझाया साहू पंचपरमेट्टि । एवे पंच गोवारा भवे भवे मम ।। अर्थ - अर्हन्त, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय और साधु अर्थात् पचपरमेष्ठि मुझे भव-भव मे सुख देवेभय भव लगा देने से इहलौकिक सुख स्वतः ही प्राभासित होता है और सुख का वास्तविक अर्थ तो प्रात्मब्रह्म का परमानन्द है ही। प्राचार्य देवनन्दि पूज्यवाद ने णमोकार मन्त्र को प्रथम कहा। उन्होंने स्पष्ट स्वीकार किया है कि यह सब पापों को नष्ट करने वाला है और जीवों का कल्याण करने में पूर्ण रूप से सक्षम है- एष पंचनमस्कारः सर्वपापप्रणाशिनः । मंगला व प्रथमं मंगलं भवेत् ॥ #t मुनि वादिराज (११वीं शताब्दी विक्रम) ने एकीभाव स्तोत्र में लिखा है- "जब पापाचारी कुत्ता भी मोकार मंत्र को सुनकर देव हो गया, तब यह निश्चित है कि उस मंत्र का जाप करने वाला इन्द्र श्री को प्राप्त कर ही सकता है।" श्री जिनप्रभरि ने पचपरमेष्ठिनमस्कार कल्प" मे लिखा है- 'इस मंत्र की प्राराधना करने वाले योगिजन त्रिलोक के उत्तम पद को प्राप्त कर लेते है । यहाँ तक हो नहीं. महस्रों पापो का सम्पादन करने वाले पौर को जन्तुओं की हत्या करने वाले तियंच भी इस मन्त्र की भक्ति से स्वर्ग में पहुंच जाते हैं। उनका कथन एतमेव महायन्त्रं समाराध्येह योगिनः । त्रिलोक्वाऽपि महोयन्तेऽधिगताः परमपदम् ॥ कृत्वा पापसहस्राणि हत्वा जन्तुशतानि च । प्रमं मन्त्र समाराध्य तियंचोऽपि दिवंगतः || जनावापों ने समोकार मन्त्र की गति को देवता कहा है। उसमें आध्यात्मिक श्राधिभौतिक और श्राधिदैविक सोनो ही प्रकार की शक्तियाँ समिति है वे मोह के दुर्गमन को रोकने मे पूर्ण रूप से समर्थ है स्तम्भं दुर्गमनं प्रति प्रयततो मोहस्य सम्मोहनम् । पापात्पंचनमस्त्रियामयी सपना देवता ।। इस मंत्र की विशेषता है पाच को एक स्थान पर समवेत करना | पाच का समवेत रूप हो मन्त्र है। यदि इनमें से एक भी हटा दिया जाये तो यह मन्त्र शक्तिहीन हो जायेगा। यह श्रात्मशुद्धि का एक सम्गुम्फित हर है। सीढ़ी के क्रम में यदि एक भी कम कर दी जाये तो ऊपर जान का मार्ग भंग हो जाता है। इस सीढ़ी मे पाच श्राधार है और पाचो प्रनिवार्य । ग्रहन्त और सिद्ध जितने अनिवार्य है उतन ही साधु भीम की दृष्टि सभी समरून मे मूल्यवान है, अर्थात् मन्त्र की सिद्धि पाचो के राम रूप में है, पृथनकरण में नहीं यहाँ किसी एक म ब्रह्मक्ति केन्द्रित नहीं है । "एको ब्रह्म" से ही लोक में Page #16 -------------------------------------------------------------------------- ________________ १२, वर्ष ३२, कि० १-२ भनेकान्त सर्वसत्ता सम्पन्न "राजा" का प्रादुर्भाव हुमा। दुनियावी "पंचब्रह्ममयमन्त्रः सकलीकृत्य निष्कलम् । परं तत्वमनुध्याराजा अपने को ब्रह्म का एकमात्र प्रतिनिधि कहने लगे। यन् योगी स्वाद ब्रह्मतत्व वित् ।' अर्थात् जो योगी पचउसर राजा ने किसी को अपना सिर ऊपर नही उठाने नमस्कार मन्त्र के द्वारा परमतत्व परमात्मा का ध्यान दिया। एक ब्रह्म के एकमात्र प्रतिनिधि इस राजा नाम के करता है, वही ब्रह्मतत्व को जान पाता है। प्राचार्य जीव ने सारी दुनिया को सिसक-सिसक कर जीने पर शुभचन्द्र का 'ज्ञानार्णव' में कथन है कि पचपरमेष्ठी की विवश कर दिया और वह भाग्यवाद के झांसे मे ऐसी फंसी स्तुनि करने से ही नित्य परमानन्द प्राप्त होता है । 'उपकि प्राज तक उबर नही पायी। जैनाचार्यों ने न तो ब्रह्म देशरमायनराम' में श्री जिनदत्तमूरि ने कहा है कि जो प्रतिको एक माना और न उसके प्रतिनिधि की कल्पना ही दिन पंचामेष्ठियो का स्मरण करता है, उसकी धार्मिक की। उसने लोकतन्त्र को प्रेरणा दी। इच्छायो को शासन देवता प्रसन्न होकर पूरा करते है-- पचपरमेष्ठी नमस्कार मत्र पर अनेकानेक ग्रथो पोर निच्चु वि सुगरु देवपयमतह, पणपरमिट्ठि सरंतहु संतहं । स्तुति-स्तोत्रो की रचना होती रही। ईमा की छठी सासणसुर पान्न ते भम्बई, धम्मियकज्ज पसाहहि सवई । शताब्दी के श्री विद्यानन्द पात्रकेशरी ने 'बहत्पचनमस्कार इम विवेचन में सपष्ट है कि जैनाचार्य सैद्धान्तिक दृष्टि से स्तोत्र' और चौदहवी शताब्दी के श्री जिनप्रभसूरि न पचपरमेष्ठी को अनादिकालीन मानते है । ऐतिहासिक 'पंचपरमेष्ठियनमस्कार कल्प' जैसे बड़े-बडे स्तोत्रो पोर दृष्टि में उनकी मान्यता के प्रमाण ईसा से ८५० वर्ष पूर्व कल्पो की रचना की। प्राकृत भाषा मे प्राचार्य कुन्दकुन्द तक के मिलन है। इसका अर्थ हया कि तीर्थकर महावीर ने "दशभक्ति" की रचना की थी। पचगुरुप्रो के चरणी के पहले से ही पचपरमेष्ठी के चरणो में श्रद्धा-पुष्प चढ़ाये में अपने भाव सुमन चढ़ाते हुए उन्होने लिखा है - जाते थे । पुरातात्विक रूप से सम्राट् खारवेल का शिला. झायवि पंचवि गुरवे मगलचउसरण लोयपरियरिए। लेख उनका मानस्तम्भ ही है। इस सबके बीच उनकी जरसुरखेयरमहिए भाराहण्णायरे बोरे ॥ प्राचीनता निविवाद और प्रामाणिक है। जहा तक आज अर्थ-पंचपरमेष्ठी उत्तम है, वीर है, नर-सुर तथा उनकी मान्यता का सम्बन्ध है, वह सार्वभौम है-जैसी विद्याधरों से पूज्य है । ससार के दुखाभिभूत प्राणियो के श्वेताम्बरों मे, वैसी ही दिगम्बरो में। कोई तरतमांश नही लिए वे ही एकमात्र शरण है। उनका स्वभाव मंगतरूप है। वे एकता के प्रतीक हैं, प्रत. प्राज भी बिखराव को समेटकर एक सूत्र में बाधने की उनमे क्षमता है। माला के प्राकृत का ही एक अन्य ग्रंथ है--भगवती पाराधना। टूटे मोती फिर एक माला के रूप मे सजाये जा सकते है, रचयिता थे प्रसिद्ध प्राचार्य शिवार्यकोटि । उन्होंने लिखा यदि जैन लोक पवपरमेष्टी को सार्वभौमिकता पर ध्यान है-"जो पुरुष पंचपरमेष्ठी में भक्ति नहीं करता, उसका है। संयम धारण करना. ऊसर खेत मे बीज बोने के समान साहित्य के पृष्ठो पर सूक्ष्म भावनामों तक के रंग है। पंचपरमेष्ठी की भक्ति के बिना यदि कोई अपनी निर्धारित किए गए है, तो वहां पंचपरमेष्ठी के रगो की माराधना चाहता है, तो वह ऐसा ही है, जैसे बीज के भी बात मिली। जैन ग्रथ 'बृहद्रव्य संग्रह" मे पाच मूल बिना धान्य की इच्छा करना और बादल क बिना पानी वर्ण माने गये है-श्वेतपीतनीलारुणकृष्णसज्ञाः चाहना। पचवर्णाः ।" इनमे श्वेत रग क्षाणलेश्या और पूर्ण मात्मतेसि माराहण्णा, यगाण ण करेज्ज जो णरोति । शुद्धि का प्रतीक है । लेश्या और कर्मों के क्षीण हो जान त्ति पि सजम तो, सालि सो ऊसरे क्वदि । ५३।। पर ही प्रात्मा नितान्त पावन, अनन्तदर्शन, ज्ञान भोर बीएण विणा सस्सं, इच्छदि सो वासमभएणं विणा।। बल-युक्त हो पाती है। लाल रग मगल का द्योतक है, शायव पारायणछिन्ता, पाराभक्तिभकर तो ।। ५४।। इसी कारण विवाहादि के अवसरों पर लाल वस्त्र धारण भगवज्जिनसेनाचार्य ने महापुराण में लिखा है- करना सौभाग्य का चिह्न समझा जाता है। प्राकृत का Page #17 -------------------------------------------------------------------------- ________________ पंच परमेष्ठी और णमोकार मंत्र १३ इन दो पंक्तियों से यही अर्थ स्पष्ट होता है विस्तृत और व्यापक हो । प्राकाश निःसीम है, वह किसी सेव वण्णो झाणं लेस्सा य सेसकम्मं च । सीमा में बंधता नहीं। साधु भी कोई घेरा नहीं पाहाणं इहि लोए सुमंगलं सेदवणोतु ॥ मानता । वह मुक्त होता है, नितान्त मुक्त भौर उन्मुक्त । ~पंचास्तिकाय, प्रथमखण्ड, पष्ठ ६ घिराव सकोणताह आर उस घिराव संकीर्णता है और उससे साम्प्रदायिकता जन्म लेती 'मानसार' स्थापत्य एव मूर्तिकला का सुप्रसिद्ध अथ है। साधु प्रसाम्प्रदायिक होता है, व्यापक और उदारमना । - । इसकी रचना पांचवीं शती मे हई थी। इममे पंच- इस ग्रथ में केवल रगों का ही नहीं, अपितु ऊचाई का परमेष्ठी की मूर्तियों का रग निर्धारित किया मया है। भी विवेचन है। लेखक का कथन है कि पचपरमेष्ठी की पंचपरमेष्ठी में प्रत्येक का पृथक रग है । प्रहन्त म्फटिक मतियां १० ताल प्रमाण ऊची होनी चाहिए। ऊंचाई मणि के समान श्वेताभ, सिद्ध मरुणाभ, प्राचार्य पीताभ, उर्व की द्योतक है। जैन परम्परा मे ऊर्ध्व का विस्तत उपाध्याय शस्य-श्यामल एवं साधु नभस्तल के समान विवेचन मिलता है। वे पक्तियां हैंनीलाभ है । यहा उपाध्याय का शस्य श्यामल रंग साभि- स्फटिकश्वेत रक्तं च पीतश्यामनिभं तथा। प्राय है । पृथ्वी शस्य-श्यामला कही जाती है। सिद्ध दिश्च सुगम्याच जनं चाहन्तु पाश्र्वकम् । धान्य को लहराती बालें और उससे सुशोभित एतत्पंचपरमेष्ठिपंचवणं यथाक्रमम् । धरणी माँ, वैसे ही शस्य-श्यामल है उपाध्याय परमेष्ठी । उत्तम् वशतालेन देवांगस्सह मानयेत् ॥ ससार के प्राणियो के प्रति ममता से भरा हृदय और उन्हे अर्थ-प्ररहन्त का वर्ण स्फटिक के समान श्वेत, सिद्ध का रक्त-लाल, प्राचार्य का पीत-पीला, उपाध्याय का अक्षर रूपी घान्य से प्राणवन्त बनाने का अदम्प उत्साह, श्यामल पोर साधु का नभस्तल जैसा होता है। इनकी उपाध्याय का अपना सहज स्वभाव है । इसी कारण उनका प्रतिभा १० नाल प्रमाण अर्थात् १२० भाग (शिल्पशास्त्र शस्य-श्यामल रग सार्थक है । यदि पृथ्वी शरीर का पोषण के अनुसार) ऊची होनी चाहिए। उनके पावं में अन्य करती है तो उपाध्याय मन और मस्तिष्क का । साधु को 1 उपाध्याय मन प्रार मस्तिष्क का। साधु को देवों की मूर्तियों का होना भी प्रावश्यक है। नभस्तल के समान नीलवर्ण दिया गया है, वह उचित ही अध्यक्ष, हिन्दी विभाग, दिगम्बर जैन कालेज, बड़ौत हैं। साधु वही है जिसका दृष्टिकोण नभ के समान (जिला मेरठ) 000 (पृ. ६ का शेषाश) बाये में वज्र है। नीचे के अभिलेख में संवत १२२६ उत्कीर्ण मे एक बिशाल जैन मन्दिर है, जिसमे अनेक मूर्तियां है। यहा को प्रम्ख प्रतिमा यहां तीर्थंकर महावीर की है। यहां से उपलब्ध अन्य प्रतिमायें पदमावती व अम्बिका साराश यह है कि परमार राजवश के यशस्वी की है। ये क्रमशः पार्श्वनाथ और नेमिनाथ की यक्षिणी सम्राटो के काल में जैन धर्म को चरमोत्कर्ष पर पहुंचने देवियां है। यहां तीर्थकर प्रतिमायें भी प्रचर मात्रा मे का सौभाग्य प्राप्त हुआ। इसका प्रमुख कारण यह है कि उपलब्ध हुई है। उपलब्ध सभी प्रतिमानो को १०वी से भागवत धर्म के अनुयायी होन के बावजूद उन्होंने जैन १३वी सदी के मध्य रखा जा सकता है। इन प्रतिमाओ धम के प्रति न केवल उदार दृष्टिकोण अपनाया, बल्कि पर मालवा के परमार मूर्ति शिल्प को स्पष्ट छाप है। उनक कान में अनेक जन मन्दिरों का निर्माण हुमा और प्राष्टा से परमार-युगीन अनेक जन प्रतिमाए प्रकाश जैन धर्म के उन्नयन में उन्होने गहरी अभिरुचि भी व्यक्त में पायी हैं। यहां के दुर्ग (किले) से जो मूर्तिया को। 000 उपलब्ध हुई है उनमे पाश्वनाथ, चन्दप्रभ तथा ऋषभनाथ प्राध्यापक, गवर्नमेन्ट डिग्री कालेज, की सवत १२२४ की प्रतिमायें प्रमुख है। किले के मध्य डिण्डोरी (मंडला) मध्य प्रदेश Page #18 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रादि जिन, शिव एवं शैव परम्परा श्री मुनीशचन्द्र जोशी, नई दिल्ली जैन और ब्राह्मण परम्परायें भारतीय मूल की होने पर भी है (एवं) केशी ही ज्योतिस्वरूप (ज्ञान के तेज से प्रकाशपरस्पर मौलिक रूप मे मिन्न है। इन दोनों विचारपाययो मान) कहे जाते है। केशी का यह वर्णन जैन मान्यतामो में, इनके दार्शनिक तत्वो के पृथकत्व के साथ-साथ, प्रधान से बहुत दूर नहीं है, और इसे अादि जिन मे सम्बद्ध अन्तर है इनके प्रादों की कल्पना में । जैन धर्म मनुष्य मानना उचित ही लगता है। भगवान ऋपभ का ब्राह्मणी को देवता से श्रेष्ठ मानता है और मनुष्यत्व का ही चरम परम्परामो में ऊचा स्थान है। उन्हे भागवतादि पूगण विष्ण विकसित रूप जित्व मे देखता है और कैवल्य द्वारा प्राणि । के चौबीम अवतारों में गिनते है। अन्य ब्राह्मण पुगणों में मात्र के लिए खुला है। किन्तु ब्राह्मण परम्पराग्रो मे भी उनकी गणना महापुरुषो में हुई है। ब्रह्माण्डपुराण उन्हें ब्रह्माण्ड के नियन्ता के रूप में ईश्वर की स्थिति सर्वोपरि श्रेष्तम नरेश (पार्थिव श्रेष्ठ) तथा सभी क्षत्रियो के मल. है और वहां तक पहुंच पाना ही उपासक का उच्चतम लक्ष्य पुरुष के रूप में (मर्वक्ष त्रस्य पूर्वजम् ) उल्लिखित करता है। साथ ही देवयोनि मनुष्य योनि से श्रेष्ठतर अवस्था है। ब्राह्मण परम्परा उनके महायोगी एवं मनिराट के के रूप में मान्य है। ग्वरूप में भी परिचित है। तभी तो 'योगवाशिष्ट' के ____ इतना सब कुछ होन पर भी जन धर्म एवं ब्राह्मगो लेखक ने राम के मुख से कहलवाया है-- विचारधारा से अनुप्रेरित सम्प्रदायो ने एक दूसरे को नाह रामो न ने वाञ्छा भावेष न च मे मनः । प्रभावित किया है। विद्वानों ने इस विषय पर काफी शान्तभासितुमिच्छामि स्वात्मनीव जिनो यथा ।। विवेचन किया है । इसलिए हम इस लेख में केवल इस प्रकार अर्थात् (राम अपने लिए कहते है) न तो मै अभिराम के सांस्कृतिक एवं दार्शनिक पादान-प्रदान के सर्वाधिक हूं, न मैं इच्छा मुक्त हूं (किन्तु ) मैं सर्वमयी जिन की भांति महत्त्वपूर्ण पक्ष पर पुन: विचार करना चाहेगे। यह महत्व (शाश्वत ) शान्ति प्राप्त करना चाहता है।' पूर्ण पक्ष है : आदि तीथंकर भगवान ऋषभ के स्वरूप का किन्तु ऋषभनाथ के पुनीत स्वरूप का दूसरा पक्ष है ब्राह्मण परम्पराग्रो पर प्रभाव । उनका भगवान शकर से सादृश्य । शिवपुराणकार ने इसका ___डा. हीरालाल प्रभत्ति विद्वानों ने ऋग्वेद के कुछ अनुमोदन करते हुए उन्हें शिव का अवतार कहा है : मंत्रों में केशी पौर ऋषभ के नाम से प्रादि जिन सम्बन्धी इत्थप्रभावऋषभोऽवतारशंकरस्य मे। सन्दर्भ देखे है । डा० हीरालाल जैन के अनुमार तो सम्भ- सतां गतिर्दीनबन्धु वमकथितस्तु नः ॥ वतः ऋग्वेदीय जनो मे केशो, अर्थात् ऋषभ वात रशना --शि० पुराण १-४१ मनियों के प्रधान के रूप में मान्य थे। उन्होने इस सम्बन्ध शंकर मोर ऋषभ दोनों जटाधारी है, योगी हैं, धर्ममे ऋग्वेद की निम्नस्थ ऋचा का उल्लेख किया है: शास्ता है तथा कैलाश एव वृषभ से घनिष्ठ रूप से सम्बद्ध केश्यग्नि केशी विषं केषी विभति रोदसी। है तथा दिगम्बरत्व भी शंकर का एक लक्षण है। यही नहीं केशी विश्वं स्वदशे केशीदं ज्योतिरुच्यते ॥ वरन् शव तथा शाक्त परम्पराग्रो में मादिगुरु तथा आग ऋग्वेद १०, १३६-१ मादि के सर्वप्रथम उपदेष्टा के रूप में शंकर को प्राविनाथ प्रर्थात 'केशी (ऋषभ) अग्नि, जल, स्वर्ग तथा पृथ्वी की संज्ञा से विभूषित किया गया है। शाक्ततत्रों में स्वगुरु को धारण करते है' समस्त विश्व के तत्त्वो का दर्शन कराते को श्रीनाथ कहा गया है। Page #19 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रावि जिन, शिव एवं शेष परम्परा शरीर मे गुरु की स्थिति सहस्रार में मानी गयो है दिया जा सकता है। कुछ विद्वानों ने शिवपूजा का मूल. (महस्रारे महापद्म करधवलो गुरु) । जैन देव प्रति- प मिन्धु संस्कृति के अवशेषों में माना है, परन्तु यह केवल मानो के मुकुट या मुकुट के ऊपर प्रकित लघु जिनविम्ब मनुमान मात्र है, किन्ही ठोस प्रमाणो पर प्रात नहीं। शायद तीर्थकर का गुरुत्व ही दर्शाता है। लगता है कि हाल मे विख्यात पुराविद् डा० हंसमुख धीरजलाल प्राचार्य जिनसेन ऋषभ एवं शिव के समान लक्षणों से साकलिया ने सिन्धु सभ्तता के कुछ स्थलों से प्राप्त लिंगाअवात थे। तभी तो उन्होने अपने जिन सहस्रनाम का कृति पत्थरों के शिवलिङ्ग होने में पूर्ण शका व्यक्त की। प्रारम्भ इन शब्दों से किया है : वैदिक साहित्य विशेषकर यजुर्वेद मे शंव सम्प्रदाय श्रीमान् स्वयम्भूवृषभ: शम्भव. शम्मरात्मभूः। का मूल विद्यमान है, किन्तु परवर्ती पौराणिक शैव मत स्वय प्रभः प्रभुभोक्ता विश्वभरपुर्नभवः ॥२॥ से यह काफी अलग है। ऐतिहासिक युग में शैवमत के इस प्रकार की प्रतिध्वनि वप्पट्टि सूरि कृत शारदा. पुनरुत्थान का श्रेय लकुलीश नामक माहेश्वराचार्य को स्नोत्र में भी मिलती है : दिया जाता है। लकुशील पाशुपत सम्प्रदाय का जन्मदाता जिनपतिप्रथिताखिलवाङ्मया। था और उसका उद्देश्य पशु (जीव) की रागात्मक गणधरानन मण्डपनर्तकी ॥ प्रवृत्तियों (पाश) का उच्छेद कर उसे मोक्षमार्गी बनाना गुरुम्ग्वाम्बुजखेलनहंसिका । था । प्राशुपत मत से ही कालान्तर मे अन्य शैव सम्प्रदाय विजयते जगति श्रनदेवता ॥३॥ तथा शाक्त विचारधारा का विकास हुपा। इतिहासकारो सम्भवन जैन परम्परा में सरस्वती (शारदा=श्रुत- ने विविध प्रमाणो के आधार पर लकुलीश को एक ऐतिदेवता) की कल्पना जिनवाणी के रूप मे काफी पहले से हासिक पुरुष माना है और उसकी तिथि ईसवी सन् के की गई थी। इसका प्रमाण मथुरा (ककाली टीला) से प्रारम्भ के आस-पास स्थिर की है। मथुरा लकुलीशप्राप्त कुषाण कालीन जैन सरस्वती की लेखाङ्कित प्रतिमा पाशुपत प्राचार्यों का प्रारम्भिक काल मे मुख्य केन्द्र था। है। यह अभी तक प्राप्त सरस्वती की मूर्तियो मे से इसकी पुष्टि मथुरा के ही एक गुप्तकालीन अभिलेख, प्राचीनतम है। इसमें उत्कीर्ण लेख के अनुसार, इस प्रतिमा से होती है जिसमे पाशुपत गुरु-परम्परा का उल्लेख है। का दान धानुकार गोव ने वाचक (घमं-व्याख्याता) प्रार्य इस सन्दर्भ मे यह बताना उपयुक्त ही होगा कि हस्तहस्तिन के शिष्य वाचक प्राय्यं देव की प्रार्थना पर पाशुपत मत की स्थापना के पूर्व ही मथुरा जैन धर्म का किया था। गुप्तयुगीन संस्कृत कोश 'नामलिङ्गानुशास- उत्तर भारत में एक प्रधान केन्द्र बन चुका था; तो क्या नम्' या अमरकोश मे सरस्वती को वाणी या भाषा का यह सम्भव नहीं था कि वह जैन मान्यताप्रो और विश्वासो पर्याय माना है और कालान्तर मे शाक्त उपासको ने देवी से प्रभावित हो। लकुलीश पाशुपतों ने शिव को एक को शब्दब्रह्ममयी कहा (शब्दब्रह्ममयी परात्परमयी ज्यो- अनठे रूप में प्रस्तुत किया था। यह था शिव का शास्ता तिर्मयी वाङ्मयी)। अभिनवगुप्त ने तो यहां तक कह या गुरु रूप । इसी रूप में शकर ने भागमादि शास्त्रों का डाला है कि 'हे देवी ससार मे कौन मी ध्वनि (वाङ्मय) उद्घोष किया था। चतुमुख लिङ्ग शिव का यही रूप तुम्हारी स्तुति नही है क्योकि तुम्हाग सम्पूर्ण शरीर ही दर्शाते है और शिव लिङ्ग का यह स्वरूप मथुरा की शब्दमय है (तब च का किल न स्तुतिरम्बिके ! सकल प्राचीन चतुजिन युक्त सर्वतोभद्रिका प्रतिमानो से प्रेरित शब्दमयी किल ते तनुः) । है। चतु:जिन संघार शायद मूलतः मानस्तम्भो के शीर्ष के प्रश्न उठता है कि क्या ब्राह्मण परम्पराम्रो का इस रूप में स्थित थे और शायद इन्हे पुनीत जिनवाणी के प्रकार का विकास जैन विचारधारा से किसी प्रकार चहिक प्रसार का प्रतीक मrat चतुर्दिक प्रसार का प्रतीक माना गया था। स्तम्भ या प्रभावित है या नहीं ? इस प्रश्न का उत्तर शैव सम्प्रदाय दण्ड शिव का भी प्रतीक कहा गया है। यही नही स्वयं के ऐतिहासिक विकास का विवेचन करने के बाद ही (शेष पृ० २१ पर) Page #20 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जैनधर्म : उद्भव और विकास - डा. रवीन्द्र जैन, मद्रास जैन धर्म विश्व के प्रमुख एवं प्राचीन धर्मों में अपना याकोबी ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक के नवम भाग मे स्पष्ट महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है। बीसवी शती के प्रथम चरण लिखा है--पार्श्वनाथ जैनधर्म के संस्थापक थे, इसका कोई पर्यंत अनेक पौर्वात्य एव पाश्चात्य विद्वान इस धर्म को भी प्रमाण नही है। जैन परम्परा प्रथम तीर्थंकर ऋषभहिन्दू धर्म की एक सुधारवादी शाखा के रूप में स्वीकार देव को जैनधर्म का सस्थापक मानने मे एकमत है।' करते थे। इसकी ऐतिहासिकता को भी श्रमण महावीर विश्वविख्यात दार्शनिक डा. राधाकृष्णन ने भी से पधिक प्राचीन नहीं मानते थे। दूसरी पोर अन्य धर्मा- अपनी प्रख्यात पुस्तक 'भारतीय दर्शन" मे स्पष्ट लिखा वलम्बियों के समान जैन धर्मानुयायी विद्वान अनेक है --'नि मन्देह जैन धर्म वर्धमान और पार्श्वनाथ से भी विश्वासमूलक एव पौराणिक तर्कों के प्राधार पर जैनधर्म पहने प्रचलित था। यजुर्वेद में ऋषभदेव, अजितनाथ और को प्रनाद्यनन्त भी सिद्ध करते चले पा रहे थे। प्राचीनता अरिष्टनेमि इन तीन तीर्थकरों के नामो का निर्देश है। में महानता देखना मानव मात्र को संस्कारी प्रवृत्ति है भागवत पुराण द्वारा भी इस बात का समर्थन होता है भोर भारत मे तो यह चरम पर रही है। कि ऋषभदेव जैनधर्म के सस्थापक थे।' पाज ऐतिहासिक एव वैज्ञानिक अनुसंधान कार्यों के ऋग्वेद मे वातरशना मनियों पौर केशी से सम्बफलस्वरूप अनेक प्रामाणिक परिणाम सामने पाये है। न्धित कथायें भी जैनधर्म की प्रागैतिहासिक प्राचीनता का इन परिणामों का श्रेय मूलतः पाश्चात्य विद्वानों को है। पुष्कल प्रमाण प्रस्तुत करती है। ऋषभदेव और केशी का प्रस्तुत निबन्ध मे उक्त तथ्यों के प्रालोक मे जैनधर्म को साथ-साथ उल्लेख भी इसी प्राचीनता का द्योतक है। प्राचीनता एव परम्परा का अनुसधान प्रस्तुत किया गया वैदिक साहित्य मे मुनियो के माथ यतियों और व्रात्यो का है। प्राच्य विद्याओं के विश्वविख्यात अनुसन्धाता डा० वर्णन पर्याप्त मात्रा मे प्राप्त होता है। ये तीनो मूलतः हर्मन याकोवी ने अपनी जैन सूत्रों की व्याख्या में जैनधर्म श्रमण परम्परा के ही है। इनके माचरण भोर स्वभाव की प्राचीनता पर पर्याप्त ठोस प्रमाण प्रस्तुत किये है। मे तथा वैदिक ऋषियो के सामान्य स्वभाव और प्राचरण उनके अभिमत का सार है :-'इस तथ्य से अब सब सह- मे जो व्यापक मन्तर है, वह सहज ही स्पष्ट दृष्टिगोचर मत हैं कि वर्धमान बुद्ध के समकालीन थे। स्वय बौद्ध होता है। प्राहार, तप और यज्ञादि की हिंसात्मक या प्रन्यों में इस बात के प्रमाण है कि श्रमण महावीर से पूर्व शिथिल प्रवृत्ति मे श्रमण साधु विश्वास नहीं रखते थे । जैन या माहंत धर्म विद्यमान था और महावीर इसके ये स्वभावतः अधिक शान्त और सयमी थे। संस्थापक थे ऐसा कोई भी उल्लेख बौद्ध ग्रन्थों में प्राप्त इस विवेचन से यह स्पष्ट है कि जैनधर्म प्रत्यन्त नहीं होता है।' प्राचीन है। इतिहास भी अभी तक उसके समय का पूर्ण जैनधर्म की प्राचीनता पर जर्मन विद्वान डा० हर्मन निश्चय नही कर सकता है। ऐसी अवस्था मे हमें पुराणों "There is no doubt that Jainism prevai- Ajitnath and Aristnemi. The Bhagvat led even before Vardhmana or Parswa- Purana endorses the view that Rishabha nath. The Yajurveda mentions the was the founder of Jainism."--Indian names of three Tirthankars Rishabhanath, philosophy, Vol. V, P. 288. Page #21 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जैनधर्म: उदभव और विकास पौर लोक मान्यतामों का प्राश्रय लेना पड़ता है । पुराण भमि की व्यवस्था मारम्भ हुई। ज्यों-ज्यों भोग्य वस्तयों पौर जनश्रति केवल उमग पोर भावुकता की उपज नहीं का प्रभाव बढ़ता गया, मानव मे संयमबत्ति, होर पोर है। उनमे इतिहास के जड़ सत्य, भौतिक सत्य प्ररि घटना ईर्ष्या भी बढ़ने लगी। इसी के परिणाम स्वरूपात चक्के मतही स्तर को पार कर जीवन प्रोर उसके रस का सभ्यता का विकास हपा। मादान-प्रदान, श्रम, बाजार, भीतर से देखने और चखने की अद्वितीय क्षमता होती है। नाता-रिश्ता, दण्ड व्यवस्था प्रादि का क्रम प्राया। फिर माता-रिश्ता टा जैन परम्परा : भी यह सब अत्यन्त प्रारम्भिक अवस्था ही थी।माज की जैन परम्परा के अनुसार यह दृष्यमान जगत सदा नगर-मभ्यता से इसकी तुलना नहीं की जा सकती। कालचक्र में नियन्त्रित रहता है । इस कालचक्र के दो कल्प उक्त चौदह कुलकरों मे अन्तिम कुलकर नाभिराय माने गये है। ये छ: भागो मे विभक्त है। सुखमा सुखमा, हुए। ये हा भगवान ऋषभदेव के पिता थे । पादि तीर्थकर ऋषभदेव से ही कर्मभमि व्यवस्था का सच्चा, नैतिक एवं सुखमा, सुखमा-दुखमा, दुखमा-सुखमा, दुखमा-दुखमा । जिस प्रकार गाडी का पहिया ऊपर से नीचे और नीचे से वैज्ञानिक मूत्रपात हुआ। पाप-पुण्य, धर्म-अधर्म, सुख-दुख, हिसा-अहिंसा मादि का ज्ञान महाश्रमण मादिनाथ ने ही ऊपर घूमता रहता है, उसी प्रकार यह कालचक्र भी घूमता । समस्त विश्व को कराया। प्रतः पूर्व कुलकरों के द्वारा रहता है, अर्थात् जगत एक बार सुख से दुख की ओर जाता है और दूसरी बार दुग्व से सुख की पोर पाता है। सुख से प्रारम्भिक स्थूल जीवन क्रिया का ही प्रारम्भ किया जा दुग्व की ओर जाने को अवसपिणीकाल कहते है और दुख से सकता था। कुलकरों के इस तृतीय काल के पश्चात् सुख की कोर पाने को उत्सपिणीकाल कहते है। इन चतुर्थकाल मे जिन सठ शलाका पुरुषों, अर्थात् गणनीय महान् पुरुषों ने कर्मभूमि की सभ्यता का विकास अपने दोनो कल्पों की अवधि लाखों वर्षों की होती है। लोकोत्तर चरित्र और उपदेशों द्वारा किया, वे हैं--- इम ममय दुखमा नामक पंचम अवसर्पिणीकाल चल २४ तीर्थकर :-ऋषमदेव, अजितनाथ, सम्भवनाय, रहा है। अभिनन्दन, सुमतिनाथ, पद्मप्रभु, सुपाश्वनाथ, चन्द्रप्रभु, पुराणों मे प्रारम्भ के दो कालो को भोगभूमिकाल कहा गया है। इन कालों मे अाधुनिक ग्राम-सभ्यता या पुष्पदन्त, शातलनाथ, श्रयासनाथ, वासुपूज्य, विमलनाथ, नगर-सभ्यता नहीं थी। इस युग में कल्पवृक्षो से ही जीवन अनन्तनाथ, धर्मनाथ, शांतिनाथ, कुंथुनाथ, अरहनाथ, अ. की सारी ग्रावश्यकतायं पूरी होती थी। मनुष्य इस युग मल्लिनाथ, मुनिसुव्रत, नमिनाथ, नेमिनाथ, पार्श्वनाथ, मे परिवार और घर जैसी चीजो से अपरिचित थे। कृषि महावीर । प्रादि का ऋण भी उस काल मे नही था। भाई-बहिन में १२ चक्रवर्ती :-भरत, सगर, मघव, सनतकुमार, विवाह अनायास हो जाता था। माता-पिता पर सन्तान शान्ति, कुन्थु, परह, सुभोम, पद्म, हरिषेण, जयसेन, ब्रह्मका कोई उत्तमदायित्व न था। सदा युगल जन्म होता दत्त ।। था। ये दोनो भाई-बहिन धीरे-धीरे बड़े होकर पति- ६ वलभद्र :-प्रचल, विजय, भद्र, सुप्रभ, सुदर्शन, पत्नी बन जाते थे। माता-पिता का इनके बड़े होने में प्रानन्द, नन्दन, पद्म, रामचन्द्र । कोई हाथ न था। अंगुष्ठचषण प्रादि क्रियानो के द्वारा वासुदेव नारायण :-त्रिपुष्ट, द्विषष्ठ, स्वयम्भ, ये दोनो ४६ दिनो में तरुण हो जाते थे। इस समस्त पुरुषोत्तम, पुरुषसिंह, पुरुषपुण्डरीक, दत्त, नारायण, कृष्ण। व्यवस्था को पुराणो में भोगभूमि व्यवस्था कहा गथा है। ६ प्रतिवासुदेव प्रतिनारायण :-प्रश्वग्रीव तारक यह व्यवस्था सहस्रो लाखों वर्ष चली। फिर तीसरे काल मेरक, मधु, निशुम्भ, बलि, प्रहलाद, रावण, जरासन्ध । में यह भोगमि की व्यवस्मा क्रमशः कम होती चली गई। जैन पुराणो मे भारतवर्ष का इतिहास उसकी भौगोइसी तृतीय सुग्वमा दुखमा नामक काल में चोदह कुलकरो लिक स्थिति के सदर्भ के साथ वणित है। भारत जम्ब. का जन्म हुमा । इन कुलकरो के द्वारा ही धीरे-धीरे कर्म- द्वीप के दक्षिणी भाग में स्थित है। इसके उत्तर में हिम Page #22 -------------------------------------------------------------------------- ________________ १८, वर्ष ३२, कि० १.२ प्रनेकान्त वान पर्वत स्थित है और मध्य में विजयाघ पर्वत । पूर्व में भगवान प्रादिनाथ ने सूदीर्घकाल तक तप किया। गंगा नदी बहती है और पश्चिम में सिन्धु नदी। इससे अनेक दुस्सह परिषह सहे और अन्तत: केवलज्ञान प्राप्ति उत्तर भारत के तीन खण्ड हो जाते हैं। दक्षिण भारत मे के बाद सहस्रो वर्षों तक प्राणीमात्र को मुक्ति मार्ग का भी पूर्व, मध्य और पश्चिम दिशामों में तीन खण्ड है। सदुपदेश देते रहे। पुराणों में भारत के ये ही छह खण्ड वणित है जिन्हे जीत जिस प्रकार ऋषभदेव आदि तीर्थकर हुए, उसी कर कोई सम्राट् चक्रवर्ती उपाधि प्राप्त करता था। प्रकार उनके ज्येष्ठ पुत्र भरत प्रादि चक्रवर्ती हुए। भरत मादि तीर्घकर ऋषभदेव :- उल्लेखित त्रेमठ शलाका प्रत्यन्त पराक्रमी, धैर्यशील, सुयोग्य नीतिज्ञ एव प्रत्यन्त पुरुषो मे प्रादि पुरुष प्रादि तीर्थंकर ऋषभदेव थे। इन्ही चरित्रवान व्यक्ति थे। वे संसार मे रहते समय भी सदा से जैनधर्म का प्रारम्भ हुआ। अन्तिम कुलकर नाभिराय जल में कमल की भाति निलिप्त ही रहे। कभी उन्होंने पौर उनकी पत्नी मरुदेवी ही इनके पिता-माता थे । भारत चक्रवर्ती होने का गर्व नही किया। जैन पुराणों में बाहुकी प्रथम राजधानी इक्ष्वाकुभूमि-अयोध्या में ऋषभदेव का बली को वीरता और स्वाभिमान दोनों की भूरि-भरि जन्म हुमा था। अपने माता-पिता की मृत्यु के पश्चात् सराहना की गयी है और आज तक जनमानस पर भी ऋषभनाथ राजसिंहासन पर बैठे। उन्होने सर्व प्रथम वही छाप है। भरत के चक्रवर्ती पद के प्राग्रह के कारण प्रसि, मसि, कृषि, शिल्प, वाणिज्य और विद्या का छह दोनो भाइयो में युद्ध हुआ। बाहुबली विजयी होकर भी माजीविका साधनों के रूप में सूत्रपात किया। इन संसार से विरक्त होकर तप करने चले गये। बाद में साधनों की विधिवत शिक्षा भी जनता को वी। कर्म की भरत के कारण ही बाहुबली का शल्य दूर हुया और उन्हे क्षमता मोर योग्यता के आधार पर जातियों का सुवि केवलज्ञान प्राप्त हुआ। अन्ततः बाहुबलि ने मुक्ति प्राप्त भाजन भी मादिनाथ ने किया। प्रशासन के लिए प्राप की। भरत चक्रवर्ती ने भी दीर्घकाल तक राजसुख भोगा, ने गणों की स्थापना की। इससे जन-जीवन में व्यवस्था सुशासन किया और फिर श्रमण दीक्षा ग्रहण कर तप का पारम्भ हुआ। करते हुए मुक्ति प्राप्त की। भरत चक्रवर्ती नाम के आधार भगवान प्रादिनाथ के भरत और बाहुबलि नामक पर उनकी महान स्मृति को अमर रखने के लिए इस देश दो प्रसिद्ध पुत्र थे। ब्राह्मी और सुन्दरी नाम की दो का नाम भारत रखा गया। पुत्रियां भी थी। सर्व प्रथम अपनी इन सन्तानो को प्रादिनाथ ने सभी कलाय और विद्यायें सिखाई, फिर परम्परा जैन पुराणो में ऋषभदेव के पश्चात् हए अन्य तेईस से ये सभी समस्त मानव-जाति मे फैल गई। तीर्थकरों का विस्तृत जीवनवृत्त पाया जाता है। परन्तु ___ एक दिन नीलांजना नाम की राजनर्तकी की नृत्य प्रतिम चार तीर्थंकरों के अतिरिक्त अन्य किसी के तुलकरते राज-सभा में ही मृत्यु हो गयी। इस घटना से नात्मक अध्ययन का कोई प्राधार अाज तक प्राप्त नही ससार को प्रसारता और क्षणभगुरता का तीब्रतम बोध हो सका है। अतः इन चार का अर्थात नमि, नेमि, पाश्वंप्रादिनाथ को हुा । ससार से उन्होने वैराग्य ले लिया। नाथ और महावीर का यहा सक्षेप में उल्लेख करना अपने ज्येष्ठ पुत्र भरत को राज्य-भार सौपकर पापने संगत है। प्रादिनाथ के समान इन चार तीर्थकरो का श्रमण धर्म में दीक्षा ग्रहण की ओर विश्व के सर्व प्रथम जनतर पुराणो एवं खनन कार्यों से पर्याप्त हवाला मिला महाश्रमण बने । १. मादिपुराण में ऋषभदेव की मायु ८४ हजार वर्ष माज के मानव को यह अविश्वसनीय सा लग सकता पूर्व भौर शरीर को ऊचाई ६०० धनुष बताई गयी है। पर आज भी अनेक माश्चर्यजनक बातें होती हैं। है । एक पूर्व करोड़ो वर्षों का होता है और एक प्रजन, भीम और हनुमान का पराकम भी तो लोकोधनुष की सामान्य ऊचाई चार हाथ की होती है। त्तर ही था। Page #23 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जनधर्म : उदभव और विकास १९ तीर्थकर नमि: जीवन में अहिंसक वृत्ति का ऐतिहासिक परिधि के अंतर्गत कीसवें तीर्थकर नमिनाय थे। ये मिथिला के राजा प्राप्त होने वाला उत्तम उदाहरण यह ही है। महाभारत थे।हिन्द पुराणो में इन्हे राजा जनक का पूर्वज माना का काल ईसा से लगभग १००० वर्ष पूर्व या इससे कुछ गया है। नमि प्रत्यन्त शाली होते हुए भी अनासक्त वृत्ति और पहले माना जाता है। प्रतः नेमिनाथ का समय भी के थे। 'नमि की यही अनासक्त वृत्ति मिथिला राजवश में इसी के प्रासपास स्वीकार किया जा सकता है। जनक तक पाई जाती है। प्रतीत होता है कि जनक के कुल तीर्थकर पाश्र्वनाथ : की इसी प्राध्यात्मिक परम्परा के कारण वह वश तथा तेईसवें तीर्थकर पार्श्वनाथ की ऐतिहासिकता पर तो उनके समस्त प्रदेश विदेह अर्थात् देह से निमुक्त या जीवन प्राज पर्याप्त प्रमाण प्राप्त हो चुके है। वे एक इतिहासमुक्त कहलाया और उनकी अहिंसात्मक प्रवृत्ति के कारण प्रसिद्ध महापुरुष के रूप में स्वीकृत भी हो चुके है । उदयही उनका धनुष प्रत्यचाहीन रूप में उनके क्षत्रियस्व का गिरि, मथुरा, श्रवणवेलगोला प्रादि के शिलालेखों से वेद, प्रतीक मात्र सुरक्षित रहा। सम्भवतः यही वह जीर्ण भागवत एव पुराणो से एवं अनेक ऐतिहासिक ग्रन्थों से घनुष था जिसे राम ने चढाया और तोड़ डाला।' तीर्थकर भगवान पाश्वनाथ की ऐतिहासिकता सिद्ध की जा चुकी नमि के विषय में और अधिक प्रमाण प्राप्त नही है। है और अब यह निर्विवाद रूप से स्वीकृत भी है। पार्वनेमिनाथ: नेमि अथवा अरिष्टनेमि नामक बाईसवें तीर्थंकर नाथ इक्ष्वाकुवशाय राजा अश्वसन पोर महारानी की सन्तान थे। महावीर से २५० वर्ष पूर्व वाराणसी में महाभारत काल मे हुए। ये श्री कृष्ण के चचेरे भाई थे। इनका जन्म हुप्रा । तीस वर्ष की अवस्था में प्रापने श्रमण ये जैन परम्परा के अत्यन्त मान्य एवं लोकप्रिय तीर्थकर दीक्षा ग्रहण की और सम्मेदशिखर पर्वत पर दीर्घकाल हए । इनके जीवन पर आधारित विपुल एव विशिष्ट पर्यन्त कर्मनाशिनी पौर मुक्तिदायिनी तपस्या की। अनेक साहित्य भी उपलब्ध है। शौरीपुर के यादववंशी राजा विघ्न-बाधामो के बीच भी पार्श्वनाथ सुमेरुपर्वत की समद्रविजय के घर महारानी शिवा के गर्भ से उत्पन्न भाति स्थिर रहे। राक्षसी उपद्रव भी उनकी अजरामर हुए थे। समुद्रविजय के लघु भ्राता वसुदेव के कृष्ण प्रात्मा से टकराकर चूर-चूर हो गये। केवलज्ञान प्राप्त होने दासुदेव उत्पन्न हुए। अतः स्पष्ट है कि दोनों चचेरे भाई के सत्तर वर्ष बाद तक वे प्राणीमात्र को प्रात्मकल्याण और थे। नेमिगाथ का विवाह राजा उग्रसेन की बेटी राजल से मुक्तिमार्ग का उपदेश देते रहे। पार्श्वनाथ की श्रमण होना निश्चित हा। जब बारात लेकर नेमि राजल को परम्परा पर बहुत गहरी छाप पड़ी। आपने जैन सस्था ब्याहने पहुंचे तो बरातियो के भोजनार्थ बध हुए असख्य को ठोम एव स्थायी रूप मे संगठित करने के लिए उसे पशुषों को देखकर, उनकी छटपटाहट और चीत्कार सुनकर श्रमण-श्रमणी और धावक-श्राविका इन चार भागो में नेमिनाथ का परम हिसक हृदय तड़प उठा। वे ससार विभक्त किया। इन चारों के कार्यक्षेत्र की सीमाए भी की इस मांसाहारीवत्ति और भोगलिप्सा के इस नारकीय निश्चित की गयी। दृश्य को देखकर लोकोत्तर विरक्ति से भर गये। वे तत्काल वहां से लौटकर सीधे गिरनार पर्वत पर तय करने तीर्थकर नेमिनाथ के अहिंसा एव प्राचार के महोपचले गये। राजुल भी परम पतिव्रता नारी थी। जब उसे देश को पार्श्वनाथ ने प्रत्यन्त वैज्ञानिक ढग से चातुर्याम अपने भावी प्राणनाथ की विरक्ति का पता लगा, तो वह व्यवस्था के अन्तर्गत रखा और इनके पालन के लिए भी तत्काल उनके पीछे गिरनार पहची और उन्ही से सर्वथा नयी दृष्टि भी प्रदान की। बाद में रचे गय जैन दीक्षा ग्रहण कर तपस्विनी बनी। सुदीर्घ तपश्चरण के प्रागमो और बौद्ध ग्रन्थो में भी इन चातुर्यामो का वर्णन पश्चात् तीर्थकर नेमिनाथ ने मुक्ति प्राप्त की। भारतीय किया गया है। पाश्वनाथ ने वेदविहित हिंसा के विरुद्ध १. 'भारतीय संस्कृति मे जैन धर्म का योगदान'-लेखक डा. हीरालाल जैन, पष्ट २६ । Page #24 -------------------------------------------------------------------------- ________________ २०, पर्व ३२, कि० १-२ अनेकान्त इन चातुर्यामों का उपदेश दिया था। ये चातुर्याम है- मान, सन्मति और प्रतिवीर कहलाए। महावीर जयन्ती पहिसा, सत्य, मस्तेय, अपरिग्रह । महावीर पार्श्वनाथ के और वीर निर्वाण दिवस भर्थात दीपावली बीरप्रभ के श्रमण धर्म के अनुयायी थे। महावीर ने अपने युग में लोकोत्तर स्मरण में ही मनायी जाती है। श्रमण महावीर समाज में स्वतंत्र ब्रह्मचर्य की प्रावश्यकता का गहरा धनु- अन्तिम तीर्थकर थे। इनके साथ ही तीर्थकरों की परम्परा भव किया और चातुर्याग में अलग ब्रह्मचर्य को मिलाकर समाप्त हो गयी। चक्रवर्ती वलभद्र, वासुदेव, प्रतिवासुदेव पंच महाव्रतों का उपदेश दिया। पार्श्वनाथ के जीवन से पाटिभी के प्रचार.air Heral सम्बन्धित पनेक प्रभावक कथाए बाज भी जेन जनताम योगदान रहा है। विस्तारमय से यहा उनको चर्चा नहीं प्रपना पूर्ण प्रभाव रखती है । कमठ का उपसर्ग तथा नाग-नीज नाग की जा रही है। वैमे तीर्थडुरो के वर्णन द्वाग उनकी नागिन की कथा ऐसे हो लोमहर्षक प्रसंग है। पाश्वनाथ बहुत कुछ पूर्ति भी हो जाती है। राजस्थान, उड़ीसा, बंगाल आदि की प्रादिम जैनेतर धन गठ शलाका पुरुषो के पश्चात् गणघरो, थनजातियों में भी पूज्य है। ये जातियां आज भी पाश्वनाथ केवलियो और जैनाचार्यों की विशाल परम्परा प्रारम्भ की पूजा करती है। सम्भवतः भारत में नाग पूजा का हुई । यह परम्परा तिगिक, सैद्धान्तिक, पौराणिक एवं मूल भाषार पाश्र्वनाथ का चिह्न नाग रहा होगा। साहित्यिा दृष्टि से अत्यन्त महत्वपूर्ण है । श्रमण महावीर : श्रमण महावीर के पश्चात - पार्श्वनाथ के लगभग २५० वर्ष बाद वैशाली के उप- श्रमण महावीर पर्यत जिनवाणी लेखन का प्रारम्भ नगर कुण्डग्राम अथवा कुण्डलपुर मे चैत्र शुक्ला त्रयोदशी नही हना था। महावीर के गणधरों द्वारा उनकी वाणी के दिन महावीर का जन्म हुमा। भगवान महावीर का के निलित रूप का भी शुभारंभ हुआ। अब जैन-धर्म का सम्पूर्ण जीवन पाज दर्पण के समान स्पष्ट है। उनके शंशव- विस्तार देश के विभिन्न भागो मे पर्याप्त वेग से होने लगा कशोर, तारुण्य मोर परवर्ती जीवन की महानता सुविदित था। नीर निर्वाण की द्वितीय शताब्दी तक समस्त जैन मुनि है। अहिंसा और अपरिग्रह के वे अवतार थे। धर्म में एक प्राचार्य एक सूत्र में प्रावद्ध थे। उनम कोई मतभेद न वौद्धिकता-निजविवेक को महावीर ने पर्याप्त महत्व दिया। था। इसी शनी मे बिहार में द्वादशवर्षीय दुभिक्ष पड़ा। अन्धविश्वास और अन्धानुकरण का तथा व्ययसाध्य सहस्रो मनि दक्षिण भारत मे तथा राजस्थान, गुजरात मे प्राडम्बर और क्रियाकाण्ड का भी श्रमण महावीर ने अनो- प्रस्थान कर गये। जहां उन्हे परिस्थितिवश नग्नत्व ढकने के चित्य सिद्ध किया और जीवन भर इनका विरोध भी लिए कुछ वस्त्र धारण करने की सघाचायों द्वारा अनुमति करते रहे। दे दी गयो । अकाल समाप्त होने पर मुनिगण पुनः एकत्र धर्म मे पाधार से भी अधिक वैचारिकता को महत्त्व हुए और वस्त्रोपयोग की वैकल्पिकता पर उनमें बहुत मतदिया। महावीर समदी और अनेकान्तवादी थ । मतः भेद हो गया। परिणामतः यही से जैन साधुग्रो के दो विरोध करते समय विरोधी के प्रति भी उनके मन में पूरा वर्ग हो गये। फिर ये दिगम्बर पौर श्वेताम्बर शाखाए सद्भाव होता था। फलत: विरोधी भी अन्ततः उनका अनेक उपशाखामो के साथ विकसित हुई। धीरे-धीरे मित्र बन जाता था। तीस वर्ष की आयु में ही महावीर मुनिमार्ग, सिद्धान्तपक्ष और प्राचार परम्परा मे भी अन्तर ने दीक्षा ले ली। तत्पश्चात् बारह वर्ष तक वे तप में आ गया। लीन रहे । अन्तिम तीस वर्ष तक वे धर्मोपदेश देते रहे। भगवान महावीर के ग्यारह गणधर थे । इनमे प्रधान ७२ वर्ष की आयु में नश्वर शरीर को त्याग कर श्रमण गगधर गौतम इन्द्रभूति थे। इन्होंने महावीर के उपदेशो महावीर ने मुक्तिवधू का वरण किया। महावीर अपने को बारह अंगो और चौदह पूर्वो में निबद्ध किया। जैन जीवन के पांच महाप्रसंगो के कारण वीर, महावीर, वर्ध- परम्परा के अनुसार ज्ञानियो के दो ही पद सर्वश्रेष्ठ माने Page #25 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जनधर्म उपभव और विकास गये हैं। वे हैं-केवलज्ञानी और श्रुतकेवली। प्रत्यक्ष के द्वारा जिनवाणी के भण्डार को अजरामर शक्ति दी है। ज्ञानियों में केवलज्ञानी माते हैं पोर परोक्ष ज्ञामियों मे इसी प्रकार अनेक सम्राटों और राजानों ने भी जैनधर्म श्रुतकेवली । जो उक्त अंगों और पूर्वो में पारंगत होता को अपनाया और उसके प्रचार-प्रसार में योग भी दिया । था वह श्रुतकेवली कहलाता था। भगवान महावीर के मगधाधिपति राजा विबसार, पूरा नन्दवश, सम्राट चन्द्रपश्चात् तीन केवलज्ञानी और पांच श्रुतकेवली हुए। इनमें गुप्त, सम्राट अषोक, सम्राट सम्प्रति-प्रशोक के पोत्र अन्तिम श्रुतकेवली भद्रबाह थे । और कलिंग के चक्रवर्ती खारवेल प्रादि जैन धर्म के धारक एव प्रसारक थे । इन सभी के कार्यों का संक्षिप्त उल्लेख इसके पश्चात् जैनाचार्यों को विशाल परम्परा चली भी एक स्वतन्त्र विशाल निबन्ध की अपेक्षा रखता है। पौर प्राज तक अक्षुण्ण रूप से चली आ रही है। दिगम्बर एवं श्वेताम्बर परम्परा में उत्कृष्ट कोटि के शताधिक दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा, प्राचार्य हुए है। इन प्राचार्यों ने अपनी देशकालजयी कृतियों टी० नगर, मद्रास (तमिलनाडु) 100 (पृष्ठ १५ का शेषाश) लकुलीश को उष्णीषधारी मूर्तियां जिन प्रतिमानों से ही मान्य हो चुका था। गुप्तयुगीन कोशकार अमरसिंह ने प्रभावित है। पाशुपतों ने जातिगत बन्धनो की कठोरता इसे इन शब्दों में स्पष्ट किया है : पर विश्वास न कर विदेशी शको एवं कुषाण जातियो सर्वज्ञस्तु जिनेद्रस्यास्सुगते शंकरऽपि च । को शंव दीक्षा दी थी। इस प्रकार की मान्यता श्रमण यह भी प्रसम्भव नहीं कि कैलाशवासी मादिगुरु एवं मतो के प्रभाव के बिना नही बन सकती थी। महायोयो के रूप में शिव की कल्पना ऋषभ के मानवी ___ स्मरण रहे कि लकूलीश पाशुपतों ने प्राचीन शवमत चरित्र का देवो सस्करण हो, क्योंकि हिन्दू पुराणकारों ने का पुनरुत्थान किया था और शिव को प्रादिगुरू (सर्वज्ञ) शिव स्वरूप का वैविध्य परस्पर विपरीत मान्यतामों के से रूप में प्रतिष्ठित किया था। शकर के इस रूप की प्राधार पर कल्पित किया है, अन्यथा स्थाणु और नटराज कल्पना शिव की वैदिक मान्यतामों से प्रभावित न होकर के नाम से एक ही देवता कैसे सम्बोधित किया जा प्रादिजिन के मानुषी चरित्र से अनुप्रेरित ज्ञात होती है। सकता है । ऐतिहासिक साक्ष्यो के प्राधार पर हम यह कह सकते हैं यह भी एक सम्भावना है कि जैन पंच परमेष्ठियों कि शायद मथुरा के प्राचीन जिन केन्द्र से ही पाशुपत के प्राधार शाम्भवों ने गुरु परमगुरु, परात्पर गुरु तथा प्राचार्य विशेष रूप से प्रभावित हुए थे। गुप्तकाल मे जिन, परमेष्ठी गुरु की मान्यता का निर्माण किया हो। बुद्ध एवं शंकर तीनो के लिए 'सर्वज्ञ' शब्द का व्यवहार निदेशक, गष्ट्रीय संग्रहालय, जनपथ, नई दिल्ली 077 Page #26 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जैन काव्य में व्यवहृत 'ज्ञान' शब्द : रूप-स्वरूप - डा. अरुणलता जैन, फरुक्खाबाद जंन दर्शनानुसार ज्ञान प्राप्ति का प्रथम सोपान दर्शन तथा प्रवधि, मनःपर्यय तथा केवलज्ञान को प्रत्यक्ष के अन्तर्गत है। इन्द्रिय तथा वस्तु के सम्पर्क से उत्पन्न ज्ञान कुछ माना गया है। इस प्रकार यहाँ ज्ञान के पांच प्रकार मस्पष्ट पहता है । जीव मस्तिष्क में होने वाली विशेषण कहे गये है। प्रत्यक्ष प्रमाण के द्वारा जीव, मन तथा की प्रक्रिया द्वारा इस अस्पष्ट भाभास को स्पष्ट अनुभूति इन्द्रिय की सहायता न लेकर सीधे ज्ञान प्राप्त करता है। में परिवर्तित कर देता है। इस प्रकार दर्शन जिस वस्तु प्रत्यक्ष प्रमाण भी सर्वथा शुद्ध नही होता। कभी कर्म का परिचय कराता है वह क्रमशः ज्ञान में परिणत हो प्रत्यक्ष प्रमाण द्वारा भी भ्रान्ति प्रतीति होती है। इसी जाता है। सच में देखा जाए तो दर्शन में ज्ञान की मत्ता कारण स्वरूप अनुमान को जैन-दर्शन मान्यता देता है । । विद्यमान रहती है। दर्शन ही ज्ञान बदल जाता है । इस तर्क की कसौठी पर खरा उतरने वाला अनुमान कभी प्रकार ज्ञाता द्वारा ज्ञेय वस्तु की वर्शन द्वारा जानकारी ही वास्तविक से परे नही जा सकता। तत्त्वार्थसूत्र मे सम्य ज्ञान की संज्ञा से अभिहित है। ग्ज्ञान को ही प्रमाण कहा है। जैन दर्शन अपनी विशिष्ट मान्यताओं के कारण वस्तुतः जनदर्शन को प्रमाण सम्बन्धी यह मान्यता किसी भी स्वाध्यायी का ध्यान प्राकर्षित कर सकता है। अन्य दर्शनो से भिन्न है क्योकि अन्य दर्शनों में इन्द्रिय जन्य इसके अनुतार चैतन्य ही प्रत्येक जीव का स्वरूप है । यहां ज्ञान प्रत्यक्ष तथा शेष अन्य साधनो द्वारा प्राप्त ज्ञान परोक्ष अन्य दर्शनो को भांति चैतन्य कोई प्राकस्मिक गुण नही माना गया है। इसके विपरीत जैन ज्ञान प्रमाण की यह है। पात्मा सूर्य की भांति ज्योतिर्मान है। सूर्य अपना विशेषना है कि इसमे केवल एक ही प्रकार के प्रत्यक्ष-ज्ञान प्रकाश कभी नही छोड़ता। प्रावरण पड़ने से ढंक जाता को माना गया है और वह है 'केवल-ज्ञान', क्योकि इन्द्रिय है। प्रात्मा अपना स्वाभाविक गुण नही त्यागती। तथा मन को इस सच्चे ज्ञान की प्राप्ति में बाधक माना कर्म-बन्धन मे पड़कर अनंत ज्ञान का प्रमार नही कर गया है। पाती। बन्धन नष्ट होने पर प्रात्मा अनत ज्ञानमय हो प्रत्यक्ष प्रमाण के दो भेद कहे गये है-पारिमार्थिक जाती है। प्रत्यक्ष, सांव्यावहारिक प्रत्यक्ष । जो ज्ञान प्रात्मा के अधीन __ इस अनंत ज्ञान को प्राप्त करने के साधनों को प्रमाण रहकर स्वयं के विषय को विशुद्धता के साथ जानता है, कहते है तथा शेष वस्तुओं को प्रमेय । जैन दर्शन में पारिमार्थिक कहलाता है। जो इन्द्रियों से साक्षात ग्रहण प्रामाणिक ज्ञान दीपक की भांति है जो स्वय प्रकाशमान काल मे जानता है वह साध्यवहारिक प्रत्यक्ष है। पारिहै और अपने चतुर्दिक वातावरण को भी प्रकाशित करता मार्थिक प्रत्यक्ष दो प्रकार का है-एकदेश पारिमार्थिक है। इसके अनुसार प्रमाण स्वभावत: स्पष्ट है, उसमे किसी –दूसरा सवंदेश पारिमाथिक । अवधिज्ञान और सनःपर्यय प्रकार की भ्रान्ति नहीं है। इसलिए दृश्यमान जगत यथार्थ देश प्रत्यक्ष और केवलज्ञान सर्व प्रत्यक्ष है। है। यहाँ ज्ञान के प्रान्तरिक तथा बाह्य दोनों पक्षों को परोक्ष ज्ञान इन्द्रियों द्वारा अनुबन्धित है। मति, श्रुति स्वीकार किया गया है। से जो जाना है, वह परोक्ष प्रभाव है । स्मृति, प्रत्यभिज्ञान, जैन ज्ञान-मीमांसा मे ज्ञान को दो भागो में प्रमाजित तर्क, अनुमान तथा मागम का समावेश परोक्ष प्रमाण के किया गया है-प्रत्यक्ष, परोक्ष । मति, श्रुति को परोक्ष अन्तर्गत होता है। स्मृति पूर्व में जो पदार्थ जाना था Page #27 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जैन काव्य में तबहुत 'ज्ञान' शब्द : रूप स्वरूप १. ग्रह उसके स्मरण मात्र को स्मृति कहते है। प्रत्यभिज्ञान- पूर्व बातों का स्मरण कर प्रत्यक्ष पदार्थ के साथ जोड कर निश्चय करने को कहते हैं।' जैन दर्शन के अनुसार वस्तु के भिन्न-भिन्न प्रकार के प्रत्यक्ष तथा परोक्ष ज्ञान होते है। उनसे स्पष्ट है कि उनके अनेक स्वभाव है। जैन दर्शन में स्वभाव को ही धर्म कहा गया है । केवली केवलज्ञान के द्वारा वस्तुनों के अनंतधर्म का ज्ञान पाता है । अब इन परोक्ष- प्रत्यक्ष प्रमाणो के अन्तर्गत सदभित पाच प्रकार के ज्ञान के रूप-स्वरूप पर दृष्टिपात कर लेना भी समीचीन होगा। प्रत्येक शब्द स्वयं मे एक अर्थ ममेटे होता है। उस अर्थ को समझने के लिए हमे शब्द व्युत्पत्ति की गहराई में जाना होता है। यहां सम्बन्धी शब्दों की निष्पत्ति को समझना होगा तथा यह भी देखना होगा कि हिन्दी जन काव्य के वविताओं ने उन शब्दों का इन्ही अर्थों में अपने काव्य में उपवहार किया है। मतिज्ञान : मति बुद्धि ज्ञानम् इति मतिज्ञान मतिज्ञान शब्द यौगिक शब्द है-मति - ज्ञान । मति का अर्थ है मनन करना । मनन करके जो ज्ञान उत्पन्न हो उसे मतिज्ञान कहते हैं। मतिज्ञान इन्द्रिय घोर मन की सहायता से उत्पन्न होता है । मति-ज्ञान' चार प्रकार से वर्णित है। १. पुरुषार्थ सिपाय नाव पर हिन्दी टीका, राजचन्द्र जैनशास्त्रमाला, श्राभास, वि० सं० २०२२, पृष्ठाक २२-२३ । २. 'पंचभिरेन्द्रियेर्मन च यदर्थग्रहण तन्मतिज्ञान ।" अर्थात् - पाच इन्द्रियो और मन मे जो पदार्थ का ग्रहण ग्रहण होता है. उसे मतिज्ञान कहते है। घवला, ११, १, ११५। ३५४०१, जैनेन्द्रसिद्यान्त कोश, भाग २, जिनेन्द्रवर्णी, भारतीय ज्ञानपीठ २०२९. पृष्ठांक २६१ । ३. (घ) “मति घृति ज्ञान दोऊ है परोक्ष वाण औष मन पजय, प्रत्यक्ष एक देश पेखिए ॥" ब्रह्मविलास, भैया भगवतीदास, जैन ग्रन्थरत्नाकर कार्यालय, बम्बई ३४३० पृष्ठांक ३५ । (ब) "मति श्रुति अवधि मनपर्ज के विषयक दोऊ । २३ किसी वस्तु का अवलोकन करने से चित्त में उसका जो रूप स्थिर होता है, उस रूप को ही जानना वस्तुतः प्रव कहलाता है। २. ईहा उस वस्तु को पूर्णरूप से समझने की प्राकाक्षा होना ही ईहा कहलाती है । ३. प्रवीय - उस रूप रंग का निश्चय करना ही प्रवीय है । ४. धारणा - प्रवीय द्वारा निर्णय किये गये पदार्थ का प्रवि स्मरण न होने वाला संस्कार ही धारणा है । संस्कृत जैन वाङ्मय में व्यवहृत 'मतिज्ञान' शब्द हिन्दी जैन काव्य में प्रयुक्त हुआ है । १७वीं शती से लेकर २०वीं शती तक के कवियों की काव्यधारा में मतिज्ञान शब्द अपने इसी मे सुरक्षित है ' श्रुतिज्ञानान : 'श्रुति ज्ञानम्' - श्रुति ज्ञानं प्रर्थात् सुना हुआ ज्ञान । धातु ने 'क्त' प्रत्यय करने पर भूति शब्द निष्पन्न हुआ । 'ज्ञ' धातु मे युट प्रत्यय करने पर ज्ञान शब्द की निष्पत्ति हुई। इस प्रकार किसी पदार्थ के विषय मे सुनने के आधार पर जानकारी प्राप्त करना श्रुतिज्ञान है है ।" जैन दर्शन मे इन्द्रिय धौर मन के द्वारा एक पदार्थ को जानकर उसके आश्रय से तत्सम्बन्धी अन्य प्रकार के प्ररूपण करने मे जो ज्ञान समर्थ है उसे श्रुतिज्ञान कहा विषय कहावत क्षयोपशम पथ में ||" - प्रवचनसार, वृन्दावनदास, सरस्वती सेवक, नाथुराम प्रेमी, रायचन्द्र जैन शास्त्रमाला, वम्बई १९०५, पृष्ठांक ५१ । ४. " तत्थ सुदणाण णाम इदएहि गहिल्यादो तदो पुवगुदरपम्महणं जहा सद्दाहोड़ावी भुवलभो घुनादो श्रग्गिस्सु वलभो वा ।" अर्थात् इन्द्रियों से ग्रहण किए पदार्थ से उससे पृथक् भूत पदार्थ का ग्रहण करना घुतिज्ञान है, जैसे शब्द से 'घट' बादि पदार्थों का जानना प्रथवा धूम्रादि से अग्नि को ग्रहण करना । ६११-१४१२१०६ जैनेन्द्र सिद्धान्तकोश, भाग ४, जिनेन्द्र वर्णों, भारतीय ज्ञानपीठ, २०३०, पुष्ठांक ५६ । Page #28 -------------------------------------------------------------------------- ________________ २४, वर्ष ३२, कि० १.२ भनेकान्त है। श्रुतिज्ञान के दो भेद है'-- है जिसका अर्थ है-समयातपूर्व बान अर्थात् समय से पूर्व १. अर्थलिंगज-पदार्थ को देखकर उसमे इष्ट अथवा ज्ञान होना । जिनवाणी के अनुसार जो ज्ञान द्रव्य, क्षेत्र, अनिष्टता का ज्ञान होना। यह ज्ञान एके- काल, भाव की मर्यादा के लिए रूपी पदार्थ को स्पष्ट व न्द्रिय से लेकर पंचेन्द्रिय सभी मे होता है। प्रत्यक्ष जाने, वह अवधिज्ञान है।' अवधिज्ञान दो प्रकार से २. शब्दलिंगज-वह ज्ञान है जो वाचक शब्दों को सुन कहा गया है करके वाच्य का ज्ञान कराए। यह लौकिक १. भव प्रत्यय -भव की मुख्यता से होने वाला अवधिज्ञान तथा लोकोत्तर दोनों प्रकार का होता है। देव और नारकी जीवो के होता है। संस्कन-प्राकृत जैन वाड्मय मे व्यवहत 'श्रतिज्ञान' २. गुण प्रत्यय -शेष रहे हुए मनुष्य और तियंचों के क्षयोशब्द हिन्दी जैन काव्य मे गृहीत है। १७वी शताब्दी से पशम से होता है। लेकर २०वी शताब्दी तक के हिन्दी जैन काव्य मे यह शब्द सस्कृत-प्राकृत जैन काव्य में प्रयुक्त 'प्रवधिज्ञान' शब्द अपने इसी अर्थ में प्रतुत है। इसी प्रर्थ को समेटे हा हिन्दी जैन काव्य मे व्यवहुत है। प्रवधि ज्ञान-- १६वी शती में लेकर २०वी शती तक के कवियो के काव्य अवधि-+ ज्ञान के मिश्रण से इस शब्द को समष्टि हई मे अवधिज्ञान शब्द इसी प्रथं में दर्शनीय है। "त दुविह सद्दलिगज, प्रत्य लिगज चेदि। ३ "तथैव च स एवात्मा प्रवधिज्ञानावरणीय क्षयोप' तत्थात सद्दलिगज तदुविह लोइय लोउत्तरिय चेदि ॥" शमामूत्त वस्तुयदेकदेशप्रत्ययक्षेण सविकल्प जानाति समण्णा पुरि सवयण बिगिग्गयवयण वल्लावज णियाणं तदवधिज्ञानम् ।" लोइप सह असच्य कारण विणिम्मुक्क पुरि सवयण अर्थात् -- इसी रीति से वही पात्मा प्रवधि ज्ञानाविगिगयवयण क्लाव जणिय सुदणाण लोउत्तरिय वरण के क्षयोपशम से मूवस्तु को जो एकदेश घुमादि प्रत्य लिगज पुण प्रणमाणणाम ।' प्रत्यय द्वारा विकल्प जानता है वह अवधिज्ञान है। अर्थात्-थतिज्ञान शब्द लिगज और अर्थ लिंगजके भद वहद द्रव्य सग्रह, नेमिचन्द्राचार्य, श्रीमद राजचन्द्र से दो प्रकार का है। उनमे भी जो शब्दलिगज श्रतिज्ञान जैन शास्त्रमाला मागास । है वह लौकिक और लोकोत्तर के भेद से दो प्रकार का ४. "भवप्रत्ययोऽवधिदेवनारकाणाम् ।२१। क्षयोपशमहै। सामान्य पुरुष के मुख से निकले हुए वचन समुदाय निमित्त षड्विकल्पशेषाणाम् ।२२॥ से जो ज्ञान उत्पन्न होता है वह लौकिक शब्दलिगज अर्थात् - भव की मुख्यता से होने वाला प्रवधिज्ञान श्रतिज्ञान है। प्रमत्य बोलने के कारणों से रहित पुरुष देव तथा नागकी जीवो को होता है। शेष रहे हुए के मुख से निकले हुए वचन समुदाय से जो ज्ञान उत्पन्न मनुष्य और तियंचो को क्षयोपशम से प्रवधिज्ञान होता है वह लौकिक शब्दलिंगज श्रुतिज्ञान है। होता है। कषायहाड़ १।१-१५॥३०८-३०६।३४०-३४१॥५, तत्त्वार्थ सूत्र, उमास्वामी, श्री अखिल विश्व जनजनेन्द्र सिद्धान्त कोष, भाग ४, जिनेन्द्र वर्णी, भार मिशन, अलीगंज, सन् १९५७, पृष्ठाक १०-१२, ज्ञानपीठ-२०३०, पृष्ठाक ५६ । प्रध्याय संख्या १, सूत्राक २१-२२। २. (म) "सम्यक् गुरु प्रसाद जिनश्रुत है, ५. (क) "कोणीक भवधिज्ञान-भण्डार, निज स्वरूप मे पागा रे।" कोणिक जातिस्मरण कहाए । पावदास पदावली, कवि पार्श्वदास, श्री दिगम्बर ___ ज्ञान वले कहयो उपदेश, प्रज्ञा लोक सुषेर ध्याये॥' जैन समाज, समीरगंज-टोक, १९०२, पृष्ठांक १८, मादि पुराण रास, ब्रह्मजिनदास, लिपि सम्वत् १८५६, छन्दांक ३४ । पामेर शास्त्र भण्डार, जयपुर, पृ० १३, छन्दाक १३ । (ब) "मति, श्रुति, अवधिविराज, (ब) "ताहि को पति है कोन, तवं मुनि को लिया। पूजी जिनचरण हितकारी।" मुझ पर होय दयाल, अवधि द्रिम खोल दिया।" शोतलनाथ पूजा, कवि मनरग लाल, ज्ञानपीठ पूजा- जम्बस्वामिचरित, पांडे जिनदास, पत्रांक ३५, मामेर जलि, भारतीय ज्ञानपीठ, पृष्ठांक ३५२ । शास्त्र भण्डार, जयपुर, पुष्ठांक १६, परिल्ल छ०८। Page #29 -------------------------------------------------------------------------- ________________ २५ जन काव्य में व्यवहत 'मान' शब्द : रूप-स्वरूप मन:पर्यय तथा पर्यायों को बाह्य इन्द्रिय की सहायता लिए बिना _ 'मनःपर्यय' योगिक शब्द है। मनस: पर्ययणा ज्ञानम् ही जानता है। यह जान कर्मक्षय से उत्पन्न होता है। मनःपर्यय अर्थात् मन से किसी चीज को समझा जाए। संस्कृत, प्राकृत जैन वाङ्मय के व्यवहृत 'केवलज्ञान' 'मनःपर्यय कर्म का क्षयोपशम होने पर ही प्रगट होता है। बाट हिम्टी जैन काव्य मे भी गहीत है। कवि बनारसीदास मन.पर्यय ज्ञान के दो भेद है के काव्य मे यह शब्द इसी अर्थ मे प्रयुक्त है।' १. ऋजुमति-जो मनुष्य मरलता से सोच रहा हो उसका इस प्रकार उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि जैन ज्ञान । ज्ञान-मीमांसा अपने मे ज्ञान सम्बन्धी निजी महत्त्व समेटे २. विपुलमति-बक्रभाव से भूत, भविष्य बर्तमान का ज्ञान । सस्कृत, प्राकृत काव्य में व्यवहृत मनःपर्यय शब्द हुए है। वह केवल एक ही प्रकार के प्रत्यक्ष ज्ञान को हिन्दी जैन काव्य में इसी अर्थ मे गृहीत है। महत्त्व देता है और वह है केवलज्ञान । अन्य ज्ञान केवल ज्ञान तक पहुंचने के विभिन्न सोपान हैं। ज्ञान-बोध बिना केवलज्ञान-- के बल त्रिकालविषयकजानम् अभ्यासतीति केवलज्ञान। जीव सन्मार्ग को प्राप्त नहीं कर सकमा। ज्ञान-बोध ही कंवलज्ञान वह ज्ञान है जिसके द्वारा जीव त्रिकाल व्यक्ति में शाश्वत प्रानन्द की सृस्टि करता है। विषयक भूत, भविष्य, वर्तमान समस्त द्रव्यों, उनके गुणो ६, रामलाल कयूमगंज, फरुखाबाद (उ०प्र०) (स) "अवधि ज्ञान मन पर्यय दोहै देश प्रतच्छ । अलीगंज, १६५७, पृष्ठांक ११, अध्याय संख्या १, द्रव्य क्षेत्र परिमान लिए जाने जिय स्वच्छ ॥" सूत्रांक २३ । छहढाला, (कवि दौलतराम), श्री दिगम्बर जैन स्वा- ४. (क) "मनपर्जय जानाहि मतभेद, ध्याय मन्दिर ट्रस्ट, सोनगढ़, पृष्ठाक ६२, ढाल केवलज्ञान प्रगट सब वेद ।" सख्या ४। बनारसी विलास, कवि बनारसीदास, भंवरलाल जैन, "परकीयमचोगतोऽथो मन इत्युच्यते । साहचर्यात्रस्य केशरलाल बख्शी-श्री नानूलाल स्मारक ग्रन्थमाला, पर्ययण परिगमन मनःपर्ययः।" न्यू कालोनी, जयपुर, २०१२, पृष्ठांक १०५। अर्थात् -दूसरे के मनोगत अर्थ को मन कहते है। (ब) "बिपुल मनःपर्यय परमाविधि सभी विधि । उसके मन के मम्बन्ध मे उस पदार्थ का परिगमन ठीक लहै मोक्ष तति इन्हें शीश नाइए ॥" करने को मन:पर्यय कहते हैं। चर्चाशतक, कवि द्यानतराय, सरस्वती भण्डार, चोरु सर्वार्थ सिद्धि १, ६।१४३-जनेन्द्र, सिद्धान्तकोश, भाग का रास्ता. जयपुर, पृष्ठाक २१८ । ३, जिनेन्द्र वर्णी, भारतीय ज्ञानपीठ, २०२६, पृष्ठाक ५. 'केवलम् सहाय मिदियालोय गिरवेक्खं तिकाल भोय राण तपज्जाय समवेदाणं तवत्थु परिमसकुडिय सवत्तं "तदावरणकर्मक्षयोपशमादि-द्वितीय निमित्तपशातपर केवलणाण ।" कीय-मनोगतार्थ-ज्ञान मनःपर्ययः । प्रर्थात् - 'केवल' असहाय को कहते है जो ज्ञान प्रस हाय अर्थात् इन्द्रिय और आलोक की अपेक्षा रहित अर्थात - मन पर्यय ज्ञानावरणादि कर्म के क्षयाप है, त्रिकाल गोचर वाला है, सर्व व्यापक है पौर शमादिरूप सामग्री के निमित्त मे परकीय मनोगत अर्थ प्रतिपक्षी रहित है, उसे केवलज्ञान कहते है। को जानना मनःपर्यय ज्ञान है। घवला ६।१,६-१, १४॥२६॥५, जैनेन्द्र सिद्धान्त कोश, राजवातिक १९।४।४७।१६, जैनेन्द्र मिद्धान्तकोश, भाग १, जिनेन्द्र वर्णी, भारतीय ज्ञानपीठ, २०२८, भाग ३, जिनेन्द्र वर्णी, भारतीय ज्ञानपीठ २०२६, पृष्ठाक १४५। पृष्ठाक २७३ । ५. "जोग धरी रहै जो त्रसु भिन्न, "ऋजु विपुलमती मनःपर्यय:।२३। अनन्त गुणातन केवलज्ञानी। प्रर्थात्--- मनःपर्ययय ज्ञान ऋजुमति अर्थात् जो मनुष्य तासु हृदय द्रह मो निकसि सरिता, सरलभाव से सोच रहा है उसका ज्ञान तथा विपुल सम वहे श्रुत-सिन्धु समानी।" मति दो प्रकार का है। नाटक समयसार, पं.बनारसीदास, सस्ती ग्रन्थमाला, तत्त्वार्थसूत्र, उमास्वाति, अखिल विश्व जैन सिशन, ७/३३ दरियागंज, दिल्ली, सं० २४७६, पृ० १०। Page #30 -------------------------------------------------------------------------- ________________ मथुरा की जैन कला 3 डा. रमेशचन्द जैन, बिजनौर मथुरा की जैन कला भारतीय कला में अपना दोनो पोर सिंह भी उत्कीर्ण रहते हैं। कभी-कभी ये सिंह विशिष्ट स्थान रखती है। अभिलेखों तथा साहित्यिक प्रासन को धारण किए हुए दिखलाए गए है। ऋषभदेव ग्रन्थों से यह स्पष्ट ज्ञात होता है कि मथुरा के कंकाली के कधों पर नटे और सूपार्श्वनाथ के मस्तक के पीछे टीले वाले भूभाग पर ईसा की कई शती पहले से सर्पफण का टोप दिखाया गया है। चौकी पर कही-कहीं लेकर ११वी शती तक जैन स्तूपों, मन्दिरो एवं श्रावक (गृहस्थ) भी बनाए गए है जो धर्मचक्र या तीर्थ. विविध मूतियों का निर्माण होता रहा । इतने लम्बे कर की पूजा के लिए पाए है । कला की दृष्टि से इन समय तक वास्तु तथा मूर्तिकला के विकास का केन्द्र होने मूर्तियों की शैनी कुछ स्थिर है. जैसा उनकी तपोमुद्रा या के कारण ककाली टीले का क्षेत्र असाधारण महत्व समाधि से संगत था । गुप्तकालीन कुछ मूर्तियो मे सौदर्य रखता है। मथुरा जन कला को निम्नलिखित भागों में और अगों में गतिशीलता है और कुछ अलकर भी है। बाटा जा सकता है: महावीर की एक मूति के जो उस्थित पद्मासन में बैठी है, मस्तक के पीछे पद्मातपत्र और ऊपर छल्लेदार केश है । १ तीर्थकर मतियां : जिससे संसार सागर को पार हरामे अंगों का विन्याम लोव भरा है और मख पर दिव्य किया जाय उसे तीर्थ कहते हैं। तीर्थ को जो प्रवृति छवि है। कई चतुर्मखी प्रतिमायें भी प्राप्त हुई है। इन्हे करे उसे तीर्थकर कहते है । जैनों मे तीर्थकर मूर्तियो को 'सर्वतोभद्रिका' कहा जाता है। गुप्तों के राज्यकाल में स्थापना बहुत प्राचीन काल से प्रचलित है । ये सख्या में साहित्य के साथ-गाथ कला एवं स्थापत्य का खूब मंवर्धन २४ होते है । मथुरा कला मे आदिनाथ, नेमिनाथ, पाश्व हुमा । इग काल मे शिल्पशास्त्र पर भी पुस्तकें लिखी नाथ, महावीर प्रादि तीर्थवरो की मूर्तियां प्राप्त हुई है जाने लगी। मदिरों और प्रतिमानो की रचना कैसे होनी जो प्रायः पचासन है। कुछ खड्गासन मूर्तियाँ भी प्राप्त चाहिए, इसका भी विशद विवेचन किया गया । यही हुई है। समस्त मूर्तियां लग्न, नासाग्रदृष्टि मोर ध्यान कारण है कि गुकान की मूर्तियाँ भाव से परिपूर्ण है । मुद्रा में है। कुषाणकालीन प्रतिमानों में नाना तीर्थकरों उनमे शान्ति है तथा उनकी रचना सुरुचिपूर्ण ढंग से की मे भेद सूचित करने वाले बैल आदि चिन्ह नही प्राप्त गई है। कला के जो भी उदाहरण मिलते हैं उनमें इस होते है। अधिकाश मूर्तियों के वक्षःस्थल पर श्रीवत्स काल की विशेषता विद्यमान रहती है। इन विशेपतामो चिन्ह पाया जाता है तथा हस्ततल व चरणतल एवं सिहा- के आधार पर उन्हें पहनानना बहा प्रामान है। इमी सन पर धर्मचक, उष्णीष तथा भौहो के बीच रोमगुच्छ काल से जिन पतिमाओ पर तीर्थ करो के लॉछन भी उत्कीर्ण भी बहत-सी मूर्तियों में पाए जाते है । अन्य परिकरों में किए जाने लगे, यद्यपि बिना लांछन के भी प्रतिमानों का प्रभावल, दोनों पावों में चमरवाहक तथा सिंहासन के निर्माण जारी था। १. श्री कृष्णदत्त वाजपेयी : कंकाली टोला की जैन कला का योगदान, पृ० ३४३ । ___ का अनुशीलन (बरेया स्मृति ग्रन्थ, पृ.६०८) ४. डा. वासुदेवशरण अग्रवाल : भारतीय कला, पृ. २८४ । २. श्री कृष्णदत्त वाजपेयी : मथुरा, पृ० ३३ ५ . श्री हरिहरसिंह : तीर्थकर प्रतिमामों का उद्भव और ३. डा. हीरालाल जैन : भारतीय संस्कृति में जैन धर्म विकास (श्रमण वर्ष २५, अंक १-२), पृ० ५० । Page #31 -------------------------------------------------------------------------- ________________ मयुरा को जैन कला २७ २. देव-देवियों को मतियां : प्रतिमा लक्षण की दृष्टि और इसी रूप में इनकी अधिकांश मूर्तियां मिली। से जनधर्म मे शासन देवतामों का बहुत महत्व है । इनके संग्रहालय में संख्या सी० २, सी०५ तथा सो. ३१ कुबेर अलकरण से जिन प्रतिमानो की पहचान और सरल हो की उल्लेखनीय मूर्तियां है, जिनमें वे सुरापान करते हुए जाती है। क्योंकि प्रत्येक तीर्थकर के अलग-अलग यक्ष चित्रित किए गये हैं। इनके हाथों में सुरापात्र बिजोरा. पौर यक्षी होते है तथा उनके लक्षण भिन्न-भिन्न होते है। नी तथा सोको शासन देवतागों के अलंकरण से परिकर में भी काफी देवियों की भी मूर्तिया मिली हैं जो अधिकतर गुप्तकाल विकास होता है। प्रनमानतः ऐसी प्रतिमाये सातवी. तथा मध्यकाल की हैं। इनमे नेमिनाथ की यक्षिणी प्राठवी सदी से निर्मित होने लगी। मधुरा शैली को अम्बिका तथा भी यथार्थ में जैनधर्म से प्रेरणा मिली। प्रारभिक काल में मूनियां दर्शनीय है।" चक्रेश्वरी देवी की एक ढाई फट मरा के कलाकार संकल्पित पट्टिया बनाते थे, जिसमे एक ऊंची पाषाण मूर्ति मथुरा संग्रहालय में विराजमान है। नमान नग्न तीर्थकर की पाल्थी मारे बैठी हुई आकृति यह मूर्ति एक गहड पर प्राधारित प्रासन पर स्थित हैं। पोजिमने बौद्धो को अपने गुरु का इस मुद्रा इसका सिर व भ जायें टूट फूट गई है, तथापि उमका करने की प्रेरणा दी। मथ गशला के महत्व- प्रभावल प्रफुल्ल कमलाकार सुप्रल कृत विद्यमान है। से एक स्तप की पाषाण वेष्ठनियो पर बनो भुजायें दश रही है और हाथ मे एक चक्र रहा है। मूति या है। यह स्तप जन स्तप था। 4 प्राभूषणास के दोनों पावों में एक-एक द्वारपालिका है जिनमे दायीं वियाँ जिनकी प्राकृतियां नितम्ब पर अत्यन्त प्रोर वाली एक चमर तथा बायीं ओर वाली एक पपबोसो तथा कमर पर पतनी है, चपल मद्रा में सट्टा र माला लिए हुए है। ये तीनो प्रतिमाये कुछ खण्डिन है। सिन्धु घाटी सभ्यता की नर्तकी बाला का स्मरण कराती प्रधान मूर्ति के ऊपर पचासन व धनस्थ जिन प्रतिमा है और उनकी प्रसन्न एव स्पष्ट काम कता, धर्मनिष्ठा एवं है, जिसके दोनों ओर बदनमालाये लिए हुए उडती कई त्याग के सन्दर्भ में जीवन के प्रति भारतीय दृष्टिकोण के मूर्तियाँ बनी है। यह मूर्ति भी कंकाली टोले से प्राप्त प्रधिकारविरोध का उदाहरण है, जिग इस प्रकार के है।" अम्बिका देवी को एक उल्लेखनीय पाषाण प्रतिमा सान्निध्य में कुछ भी प्रसगत नही प्रतीत होता । तारानाथ १ फुट ६ इंच ऊंचो मथुरा संग्रहालय में है। प्रक ने लिखा है कि मौर्यकालीन कला यक्षों द्वारा और उससे एक वृक्ष के नीचे सिंह पर स्थित कमलासन पर विराजपर्वकालीन देवो द्वारा निर्मित हई । मथ ग कला में यक्ष, मान है । बायां पैर ऊपर उठा हुग्रा व दाया पथ्वी पर किन्नर, गधर्व, सुपर्ण तथा अप्सरामो को अनेक मूर्तियां है । दायें हाथ में फलो का गुच्छा है व बाया हाथ वायी मिलती है। ये सुख-समृद्धि तथा विलास के प्रतिनिधि है। जंघा पर बैठे हुए बालक को सम्हाले है। बालक वक्षयक्षो मे कुबेर तथा उनका स्त्री हारीती का स्थान बडे स्थल पर झूलते हुए हार से खेल रहा है। प्रबोभाग महत्व का है। इनको अनेक मूर्तियाँ मथुरा में प्राप्त हुई वस्त्रालंकृत है और ऊपर वक्षस्थल पर दोनों स्कन्धो से है । कुबेर यक्षो के अधिपति तथा धन के देवता माने गए पीछे की ओर डाली हुई घोड़नी है। सिर पर सन्दर है । बौद्ध, जैन तथा हिन्दू तीनो धर्मों में इनका पूजन मकुट है, जिसके पीछे शोभनीय प्रभाबल है। गले मे दो मिलता है। कुबेर जीवन के प्रानन्दमय रूप के द्योतक है लड़ियों वाला हार, हाथ मे चूड़िया, कटि में मेखला व ६. वहा पृ० ५२। ६. श्री कृष्णदत्त बाजपेयी : मथुरा, पृ० ३५, ३६ । ७. ए. एन. बाशम : अद्भुन भारत, पृ० ३७४ ।। (The wonder that was India का वेंटेशचद्र १०. वही, पृ० ३३ । पाडय कृन हिन्दी अनुवाद) । ११.१० हीरालाल : भारतीय संस्कृति में जैन धर्म का ८. डा. वासुदवशरण अग्रवाल : भारतीय कला, प. २७६। योगदान, पृ० ३५४ । Page #32 -------------------------------------------------------------------------- ________________ २८, वर्ष ३२, कि० १.२ अनेकारत पैरों में नपूर माभूषण हैं । बालक नग्न है किन्तु गले में मथुरा की जैन शिल्प कला मे पायागपट्टों का महत्वपूर्ण हार, बाहों में भुजबन्ध, कलाई मे कड़े तथा कमर मे कर• स्थान है । विशुद्ध सौन्दर्य की दृष्टि से उन पर जो मलंकरणों धनी पहने हुए है। अम्बिका की बाजू से एक दूसरा बालक के संपूजन की छवि है वह नेत्रो को मोहित कर देती है । खड़ा है, जिसका दायाँ हाथ अम्बिका के दायें घुटने पर है। उदाहरण के लिए, सिहनादिक द्वारा स्थापित प्रायागपट्ट इसके अतिरिक्त, इस अम्बिका मूर्ति के साथ गणेश, कुबेर, पर ऊपर-नीचे प्रष्ट मांगलिक चिन्ह अंकित हैं और दोनो नर्तकियां, जिनमूति, बलराम तथा वासुदेव की मूर्ति प्रादि पावों में से एक ओर चक्रांकित ध्वजस्तम्भ तथा दूसरी मूर्तियां हैं। इस प्रकार इसमे जैन व वैदिक परम्परा के मोर गजाकित स्तम्भ है। बीच में त्रिरत्नो के मध्य मे अनेक देवी-देवतानो का सुन्दर समीकरण मिलता है। तीर्थकर की बद्ध पद्मासन स्थित मूर्ति है । (लखनऊ संग्रमथरा के ककाली टीले से एक सरस्वती की मूर्ति हालय जे० २४६)। लखनऊ संग्रहालय में एक दूसरा प्राप्त हुई है। इसका दाया हाथ अभय मुद्रा मे है और प्रायागपट्ट है (जे० २५०) जिसके मध्य भाग में एक बड़ा बायें हाथ में पुस्तक लिए है। इसकी स्थापना कुषाण स्वस्तिक अंकित है और उस स्वस्तिक के गर्भ में एक छोटी सं०५४ मे हुई। सरस्वती की इतनी प्राचीन प्रतिमा तीर्थकर मूर्ति है । स्वस्तिक के आवेष्टन के रूप में सोलह अन्यत्र प्राप्त नहीं हुई।" जैन पुराणो मे हिरण, मेढे देव योनियों से अलकत देव योनियो से प्रल कृत एक मण्डल है जिसके चार कोनो अथवा बकरा जैसे मुख वाले एक देवता का उल्लख नंग पर चार महोरम मूर्तिया है। नीचे की ओर अष्ट मांगमषिनगमेश, नंगमेय, नंगमशिन, हरिणिमिांस हरि लिक चिन्हो की वेल है। इस प्रकार के पूजापट्ट का प्राचीन नंग मेसि.हारि इत्यादि नामो स विभिन्न ग्रन्था म हुमा परिभाषा म स्वस्तिक पट्ट कहते थे। एक तीसरे पायागपट्ट है। मथुरा के कंकाली टोले से प्राप्त शुग-शक-कुषाणकालीन प्राचीन जैन अवशेषों मे भी इस देवता के कई को प्राकृति अकित है। उसके चारा और तीन मण्डल है। मूर्तादून मिले है जिनमे से एक पर 'भगवने मेसो' भगवान पहले में १६ नन्दिपद, दूसर मे अष्टदिक्कुमारिकाये और नैगमेश नाम भी अंकित है । इस देवता का देवराज इन्द्र तीसरे मे कुण्डलित पुष्पकर स्रज-कमलो की माला है और का अनुचर, इन्द्र की पंदल सेना का कप्तान बताया जाता चार कोनो में चार महोरग मूतिया है । इस प्रकार का है और शिशमो के जन्म, पोषण और सरक्षण से उसका पूजापट्ट प्राचीनकाल मे चक्रपट कहलाता था। बिशेष सम्बन्ध है । हरिवंश पुराण के अनुसार, इस देवता मथुरा सग्रहालय में एक सुन्दर आयागपट्ट है जिसे, ने कस के बन्दीगृह से देवकी द्वारा प्रसूत शिशुनों को, उस पर लिखे हुए लेख के अनुसार लवणशोभिका नामक इद्र की प्राज्ञा से अलका सठानी की गोद में स्थानान्तरण वेश्या की लड़की वसु ने दान दिया था। इस मायागपट्ट कर रक्षा की थी।" पर एक विशाल स्तूप का चित्र तथा वेदिकामो सहित ३. मायागपट्ट तथा विकास्तम्भ-मायागपट्ट का तोरणद्वार बनाया है। प्रायागपड़ो के अतिरिक्त अन्य मल है प्रायंकपट प्रर्थात् पूजा के लिए स्थापित शिलापट्ट विविध शिलापट्र तथा वेदिका स्तम्भ भी मिले हैं, जिन पर जिस पर तीर्थकर, स्तूप, स्वस्तिक, नद्यावर्त प्रादि पूज- जैनधर्म सम्बन्धी मूर्तियां तथा चिन्ह अंकित है। इन कलानीय चिन्ह उत्कीर्ण किए जाते थे। स्तूप के प्रांगण में इस कृतियों पर देवता, यक्ष-यक्षी, पुष्पित लता-वृक्ष, मीन, प्रकार के पूजा शिलापट्ट या पायागपट्ट ऊचे स्थंडिलों पर मकर, गज, सिंह, वृषभ, मंगलघट, कीर्तिमुख भादि बड़े स्थापित किए जाते थे और दर्शनार्थी उनकी पूजा करते थे। कलात्कक ढंग से उत्कीर्ण मिलते है।" १२. वही पृ० ३५५.३५६ । १६. डा. वासुदेवशरण अग्रवाल : मथुरा की जैन कला १३. वासुदेवशरण अग्रवाल : भारतीय कला, १० २८३ । (महावीर जयन्ती स्मारिका, जयपुर, अप्रैल १९६२, १४. भारतीय संस्कृति मे जैनधर्म का योगदान,प. ३५८ । पृ० १९-२० । १५. जैन सन्देश शोधांक, १९७४ । १७. श्री कृष्णदत्त बाजपेयी: मथुरा पु० ३३ । Page #33 -------------------------------------------------------------------------- ________________ मपुरा की जन कला २९ ४. स्तूप- कंकाली टोले की खुदाई में जैन शिल्प दूसरा जैन स्तूप कुषाणकाल में बनवाया गया। इसमें की प्रदर्भात सामग्री प्राप्त हुई है। इस टीले की भूमि भनेक लेख लिखवाए गए जिन पर कुषाण सवत में तिथियाँ पर एक प्राचीन जैन स्तप और दो प्रासाद या मन्दिरों के दी गई हैं । यह नए स्तूप की विशेषता थी। इन लेखों से चित्र मिले हैं । महतनन्द्यावर्त प्रर्थात् अठारहवें तीर्थकर उस समय के माथुर जैन संघ पर अच्छा प्रकाश पड़ता अरनाथ की एक प्रतिमा की चौकी पर खुदे हुए एक लेख है। गच्छ, पुर पौर शाखामों के जो नाम माए है वे ही में लिखा है कि कोट्टियगण की वज़ी शाखा के वाचक भद्रवाह के कल्पसूत्र में है।" प्रार्य वृद्धहस्ती की प्रेरणा से एक श्राविका ने देव-निर्मित स्तुप में पहंत प्रतिमा स्थापित की।" यह लेख सवत जैन स्तप के वास्तु विभ्यास का स्वरूप लगभग वही ८६ अर्थात् कुषाण सम्राट वासुदेव के राज्यकाल का ई० था जो बौद्ध स्तुपों का था । जैन स्तप के मध्य में बद१६७ का है । वलर, म्मिथ मादि विद्वानों का विचार है बुदाकार, बड़ा पौर ऊंचा व्यूहा होता था और उसके कि उस समय स्तप के बास्तविक निर्माणकर्तामों के विषय चारो ओर वेदिका पौर चार विशामों में चार द्वार तोरण में लोगो का ज्ञान विस्मृत हो गया था और उसके लिए होते थे । उसके ऊपर भी हमिका भौर छत्रावली का देव निर्मित इस नाम की कल्पना संभव हुई।" विधान रहता था। वह भी वेदिका सहित विमेधियो पर बनाया जाता था। उसके चार पापों में तीर्थकरो की मूर्तियां लगाई जाती थीं । वेदिका के स्तम्भों पर शाल'अनेकान्त' के स्वामित्व सम्बन्धी विवरण भज्जिका मूर्तियों की रचना की जाती थी। उनके बहुत प्रकाशन स्थान-बीरसेवामन्दिर, २१ दरियागज, नई दिल्ली | से नमूने कंकाली टीले से मिले है और अब लखनऊ मद्रक-प्रकाशन -वीर सेबा मन्दिर के निमित्त संग्रहालय में सुरक्षित है। वेदिका का निर्माण वास्तु प्रकाशन अवधिमासिक श्री ओमप्रकाश जैन विन्यास का उत्कृष्ट कर्म था। उसमें ऊध्वं स्तम्भ, माड़ी राष्ट्रिकता-भारतीय पता-२३, दरियागंज दिल्ली-२ सूचियां, उष्णीष, पालम्बन, तोरण, पाश्व स्तम्भ, धाभिक चिन्ह, स्तम्भ और पायागपट्ट संज्ञक उत्कीर्ण शिलापट्ट, सम्पादक ---श्री गोकुलप्रसाद जैन तोरणद्वारो के मुखपट्ट, पुष्पाधानी या पुष्प ग्रहणी वनिराष्ट्रिकता-भारतीय पता-वीर सेवा मन्दिर २१. दरियागंज, नई दिल्ली-२ कायें, सोपान, उतार-चढ़ाव की छोटी पार्श्वगत वेदिकाये और ध्वजस्तम्भ आदि नाना प्रकार की सामग्री लगाई स्वामित्व-वीर सेवा मन्दिर, २१, दरियागज, नई दिल्ली-२ गई थी। इन स्तूपो का रूप-सम्पादन बड़े उत्सा, से मैं, मोमप्रकाश जैन, एतद्द्वारा घोषित करता हूं कि किया जाता था। उनके शिल्पो शिल्प-कौशल में निष्णात मेरी पूर्ण जानकारी एवं विश्वास के अनुमार उपयुक्त विवरण सत्य है। -प्रोमप्रकाश जैन, प्रकाशक वर्द्धमान कालेज, बिजनौर (उ० प्र०) १८. इपिग्राफिका इंडिका, भाग २, लेख २० । १९. महावीर जयन्ती स्मारिका, जयपुर, पृ० १७ । २०. भारतीय कला पृ० २८० । २१. वही पु० २६३ । Page #34 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अनेकान्त D डा. शोभनाथ पाठक, मेघनगर भगवान महावीर प्रणीत दर्शन के चिन्तन की शैली परखने की प्रतभनि-भिपति एक माथ ही नहीं वरन का नाम अनेकांत दृष्टि, और प्रतिपादन की शैली का क्रमानुसार ही होती है । इसो क्रमबद्ध अभिव्यक्ति की नाम स्यादवाद है। अनेकात दृष्टि का तात्पर्य हे वस्तु पद्धति को स्थावान् कहा गया है । स्यात् शब्द तिङन्त का सर्वतोमखी विचार । वस्तु म अनेक धर्म होने है, अतः प्रतिरूपक अव्यय है। इसके प्रशंमा, अस्तित्व, विवाद, सभी धर्मों के प्रति समान सद्भावना ही अनेकान्त दृष्टि विचारण, अनेकांत-सशय प्रश्न प्रादि अनेक अर्थ है। का कार्य है, यथा--- महावीर ने इसे अनेकात कहा या स्याद्वाद् अर्थात् पनेभने के अन्ता. धर्माः यस्मिन् पानेकान्त.' कान्तात्मक वाक्य जिसका स्पष्ट रूप है सुनिश्चित तासय यह है कि वस्तु के स्वरूप का सभी दृष्टियो दष्टि कोण । से प्रतिपादन । जो वस्तु नित्य मालूम होती है, वह अनेकात शब्द वाक्य है और स्यादवाद् वाचक । अनित्य भी है। जहां नित्यता का प्रतीति हाता है वहा स्यात् शब्द जोकि निपात है, एकात का खण्डन करके प्रनित्यता के अभाव में नित्यता का पह वान नही हो अनेकात का समर्थन करता है, यथा-वाक्येस्वनेकात द्योती सकती । नित्यता और अनित्यता सापक्ष है। गम्य प्रति विशेषकः । स्यान्निपातोयोगित्वात् तव 'अनकात" शब्द बहुव्रीहि समासयुक्त है जिसका केवलिनामपि, १०३ (प्राप्तमीमासा)। भगवान महावीर ने तात्पर्य है प्र-क अर्थात् एक स अधिक धमा, रूपो, गुणो वस्तु की यथार्थता को उजागर करने के लिए ही इसकी और पर्यायो वाला पदाथ । पदाथ अनेक गुण रूपात्मक उपयोगिता को अक्षुण्ण माना है, इसकी स्पष्टता को इस हान के साथ विविक्षा और दृष्टि कोणा क आधार पर मा प्रकार भी परखें अनेकात है, यथा “वदेवतत् तदव प्रतत् वदवक तदवा मर्वधात्वनिषधको अनेकान्तताद्यातका नक यदव सतत् वासत्य देव नित्य, तदवानित्य --- कथ चिदर्थस्यात् गब्दो निपात् (पचास्तिकाय) मित्यकवस्तु----वस्तुत्वानस्पादपरसरावरुद्धशान्ति - य यही नही वरन् स्यावा मजरी मे भी बताया गया प्रकाशनमनकान्त ।' है कि स्यादित्यव्यय मनेकन्तताद्योतकं ततः स्याद्वाद् अनेकान्तवाद इति । अनेकान्त वस्तु की अनेकान्त अनेक मथोत् जावतु तत्स्वरूप है वहा अतत्स्वरूप भी है, जो वस्तु एक है वहा अनेक भी है, जो वस्तु सत् है वहा धामिकता सिद्ध करता है और स्वावाद उसकी व्याख्या करने मे एक सापेक्षिक मार्ग का सूत्रपात करता है, जब असत् भी है । जी वस्तु नित्य है वहा अनित्य भी है। इस कि सातभगी उस मार्ग का व्यवस्थित विश्लेषण कर उसे प्रकार भनकान्त एक ही वस्तु म उसक वस्तुत्व गुण पयाय पूर्णता प्रदान करती है । अतः यह कहा जा सकता है कि सत्ता के निष्पादक अनक धम युगला का प्रकाशित करता वस्तु यथार्थता को परखने के लिए अनेकान्त, स्यादवाद है। इस स्पस्टत. इस उदाहरण म भी परख--- और सप्तभंगी की अक्षुण्ण उपयोगिता है। "सदसन्नित्यानित्यादिससथैकात प्रतिक्षेपलक्षणो भनेकान्त प्रमाण और नय की दृष्टि से कथंचित अनकान्त' अनेकान्त रूप और कथचित एकान्तरूप है । प्रमाण का वस्तु सत् अथवा मसत् है, नित्य है अथवा प्रनित्य विषय होने से वह अनेकान्त रूप है । सामान्यतः इसके दो मादि परखने की पद्धति का नाम अनेकांत है। वस्तु के भेद इस प्रकार है:-(१) सम्यगनकान्त झार मिथ्या Page #35 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अनेकान्त अनेकान्त । परस्पर सापेक्ष अनेक धर्मों का सकल भाव से इच्छन् प्रधान सत्वाछविरुद्धंगुम्फितं गुणः। ग्रहण करना सम्यगनेकान्त है और परस्पर निरपेक्ष अनेक सांख्य संख्यावतां मुख्योनानेकान्त प्रतिक्षिपेत ।' घमों का ग्रहण मिध्या अनेकान्त है । अन्य सापेक्ष एक अर्थात एक ज्ञान को अनेकाकार मानने वाले समझघम का निषेध करके एक की अवधारणा करना ही। दार बौद्धों को अनेकान्त का प्रतिक्षेप नहीं करना चाहिए मिथ्य कान्त है। उसी अनेक प्राकार वाले एक चित्र रूप को मानने वाले अनेकान्त अर्थात सकलादेश का विषय प्रमाणाधीन नयायिक और वैशेषिकों को अनेकान्त प्रतिक्षेप नहीं करना होता है और यह एकान्त की अर्थात् नयाधीन विफलादेश चाहिए । साख्याचार्यों व अन्य को भी इसका प्रतिक्षेप नही के विषय की अपेक्षा रखता है। यही तथ्य यू परख । करना चाहिए क्योकि भनेकान्त तो वस्तु के यथार्थ रूप अनेकान्तोऽप्यने कान्त. प्रमाणनयमाधनः । को परखने का माध्यम है। अनेकानप्रमाणात्ते तदेकान्तोर्शतान्नयात् ।। प्रत्येक वस्तु विराट है और अनन्त-प्रनन्त अंशों धर्मों प्रति प्रमाण और नय का विषय होने से अनेकान्त, गुणों और शक्तियों का पिंड है अर्थात वस्तु का अनेक पाने व धर्मवाला पदार्थ भी अनेकान्न रूप है वह जब धर्मात्मक होना स्वाभाविक है।' प्रमाण के द्वारा समग्रभाग से गहीत होता है तब वह अने एक मनुष्य जिस रूप में वस्तु को देख रहा है उसका कान्त पने धर्मात्मक है और जब किमी विवक्षित नय स्त्ररूप उतना ही नही वरन् विभिन्न दृष्टिकोणों से कुछ का विषय होता है तब एकान्त, एक धर्म रूप है । उम और भी है। जल पदि एक मनुष्य की प्यास बुझाकर समय शेष धर्म पदार्थ में विद्यमान रहकर भी दृष्टि के तृप्ति प्रदान करता है, तो वही जल एक हैजे के रोगी के मापने नही होते । इस तरह पदर्थ की स्थिति हर हालत में लिए विष तुल्य मृत्यु का कारण भी बन जाता है । इसी अनेकान्त रूप ही सिद्ध होती है। प्रकार यदि दूध स्वास्थ्यवर्द्धक है तो वही अतिसार के अनेकान्त दृष्टि या नय दृष्टि विराट वस्तु को जानने रोगी के लिए विप तुल्य मृत्यु का कारण भी है । कहने का वह प्रकार है जिसमे विवक्षित धर्म को जानकर भी का तात्पर्य कि एक ही वस्तु विविध रूप प्रकट करने म अन्य धर्मों का निषेध नही किया जा सता, वरन् उन्हे सक्षम है। गौण गा प्रविवक्षित कर दिया जाता है । इग प्रकार, जब पनृष्ण की दृष्टि अनेकान्त को दृष्टिगत करने वाली बन वस्तु वोध ही धर्म और दर्शन का उद्देश्य है बोध जाती तब उसके समभाने का ढंग भी निराला हो मुक्ति का माधन है यपि वोध के साथ नम्रता, उदारता, जाता है, अर्थात वस्तु तत्व का यथार्थ प्रतिदिन किया निष्पक्षता, सहिष्णुता और सात्विक जिज्ञासा है तब वह जाता है। प्रात्म विकास की सीढी है। अनेकान्त की वरीयता को परराव कर हो प्राचार्य अनेकान्त दष्टि परस्पर विरोधी वादो का समन्वय हेमचद ने वीतराग स्तोत्र मे पहा है कि --- करने वाली परिपूर्ण सत्य की प्रतिष्ठा करने वाली और विज्ञानस्य कमाकार नानाकारक रम्वितम् । बुद्धि में उदारता, नम्रता, महिष्णुता तथा सात्विकता इच्छस्तथागतः प्राज्ञा नानेकान्त प्रतिक्षिपेत ।। उत्पन्न करने वाली है। यह विश्व दर्शन के लिए एक चित्रमेकमनेक च रूपम् प्रामाणिक वदन् । अनुपम थाती है। 07 योगो वैशेषिको वापि नानेकान्तप्रतिक्षिपेत ।। मेघनगर (म. प्र.) १. डा. महेन्द्रकुमार--- जैन दर्शन, पृ० ५२५ । ३. वीतराग स्तोत्र, ८ से १०। २. बृहत्स्यम्भूस्तोत्र १०२। ४. स्यावाद मम्जरी, कारिका-५ । Page #36 -------------------------------------------------------------------------- ________________ एलाचार्य : शब्द-मीमांसा डा० देवेन्द्रकुमार शास्त्री, नीमच (म.प्र.) [प्रत्येक लेखक अपने विचारों के लिए स्वतन्त्र होता है । प्रस्तुत लेख के विद्वान् लेखक ने भी अपने स्वतन्त्र विचार व्यक्त किये हैं । यह आवश्यक नहीं कि सम्पादन-मण्डल लेखक के सभी विचारों से सहमत हो।-सम्पादक] प्रत्येक भाषा के शब्द रूपो के निर्माण के अपने कुछ (३) "एदेण वयणेण सुत्तस्म देसभासियत जेण जाणानियम होते है । उन नियमों के अनुसार ही उसकी शब्द. विद नेण च उण्ह गईण उतुच्चारणाबलेण एलाइसम्पदा का वैभव वृद्धिगत होता रहता है। उस सम्पत्ति रियपसाएण य मेमकम्मापा ग्रूवणा कीरदे।" को देख कर हम किसी भी युग में उस भाषा की शब्द. __ - -कषायपाहुड, भा० ४ १० १६६ । सामर्थ्य, शब्द-निर्माण की क्षमता, रूपगत विकास एव (४) "एत्थ एलाइरियवच्छयस्म णिच्छयो ..." प्राकृति का निर्णय कर सकते हैं। इसी सन्दर्भ में प्रस्तुत - जयधवला, प्रे० १० १९५३ । "एलाचार्य" शब्द का विचार करना ही हमे इष्ट है। (५) "एत्थ ण बाहइ जीव्ममेलाइरिवच्छतो अलद्धोवजैन समाज का बौद्धिक वर्ग यह भली भांति जानता देसत्तादो, दोण्हमेकसा बाहाणवलम्भादो। है कि जब से उपाध्याय मनिश्री विद्यानन्द जो को 'एला. __-कषायपाहुड, भा० १, पृ० ८१ । चार्य" पद से विभूषित किया गया, तब से इस शब्द की (६) काले गते कियत्यपि ततः पुनश्चित्रकूटपुरवासी। मोर सभी का ध्यान आकृष्ट हमा है। जिन्होंने कभी श्रीमानेलाचार्यो बभूव सिद्धान्ततत्वज्ञः ।। "एलाचार्य" नाम तक नही सुना था, वे भी इसके विषय तस्य समीपे मकलं सिद्धान्तमधीत्य वीर सेन गुरुः । मे जिज्ञासा रखते है । कई लोग पूछ चुके है कि यह कौन उपरितम निबन्धनाद्याधिकारानष्ट च लिलेख ।। सा पद है ? तथा "एलाचार्य" का मतलब क्या होता है ? - इन्द्रनन्दि श्रुतावतार, श्लो० १७७, १७८ । सर्वप्रथम हमे यह देखना है कि "एलाचार्य' शब्द इनके अतिरिक्त, "कषायपाहुड" मे "एलाइरिय" किन-किन ग्रन्थों में पाया है ? यह तो निश्चित है कि शब्द कई स्थानो पर मिलता है । प्राचार्य वीरसेन स्वामी प्राकृत तथा संस्कृत दोनों भाषाओं में रचित जिनागम में ने स्वय मतभेदो का उल्लेख करते हुए स्पष्ट रूप से निर्देश उक्त शब्द का प्रयोग हुमा है । मूल ग्रन्थों के उद्धरण इस किया है कि भट्टारक एलाचार्य के द्वारा उपदिष्ट व्याध्यान प्रकार हैं समीचीन होने के कारण ग्रहण करने योग्य है । उनके ही एलायरियस्स दिणाण दस, मायरियस्स पण्णरस दिवसा। शब्दों में--- छिज्जति परगणगयस्स, पुण सपण्णस्स वीसदिणा ॥ "तदो पुवुत्तमेलाइरियमडारएण उवइट्ठवक्खाणमेव -प्रायश्चित्त ग्रन्थ गा० २५७ पट्ठाणभावेण एत्थ घेतव्य ।" (१) एलायरियस्स दिणाण..... छेदपिंड, गा० २५१ । -कषायपाहुड, भा० १, पृ० १६२ । (२) जस्साएसेण मए सिद्धांतमिदं हि अहिलहुदं । उक्त सभी प्रसगो को ध्यान से देखने पर स्पष्ट है मह सो एलाइरियो पसियउ वरवीरसेणस्स ।। कि “छेदपिण्ड" को छोड़ कर सभी स्थलों पर "एलाइ. -घवला टीका, पुस्तक १६, मन्स्यप्रशस्ति, गा.१ रिय" शब्द अभिषानवाचक है। प्राचार्य वीरसेन के गुरु Page #37 -------------------------------------------------------------------------- ________________ एलाचा शब्द मीमांसा को नाम एलाचार्य था। वे चित्तौड़ (राजस्थान ) मे निवास करते थे। जैनागम साहित्य मे "एलाचार्य" नाम के अन्य विद्वानों का भी उल्लेख प्राप्त होता है। पं परमानन्द शास्त्री ने "जैनधर्म का प्राचीन इतिहास" (भाग २) मे सूरस्त गण के विद्वान रविनन्दी प्राचार्य के शिष्य व तपस्वी एलाचार्य का परिचय दिया है। अपने उसी ग्रन्थ में विद्वान् लेखक ने कौण्डकुन्दान्वय के भट्टारक कुमारनन्दि के शिष्य "एलाचार्य" का भी उल्लेख किया है, जिनके शिष्य वर्धमान गुरू थे । सम्भव है कि 'एलाचार्य श्रीर 'एलवाचार्य' एक ही व्यक्ति का नाम रहा हो, जो बोलीभेद से उच्चारण में भिन्न रहा हो। दोनों का समय भी लगभग समान कहा जाता है । 'एलाचार्य' शब्द के अर्थ का विचार करें, इसके पहले यह उचित प्रतीत होता है कि शब्द रचना की दृष्टि से मीमांसा करना उपयुक्त होगा । 'एलाचार्य' प्राकृत 'एलाइरिय' शब्द का रूपान्तरण है। प्राकृत और संस्कृत दोनों शब्द दो-दो शब्दो से संयुक्त होकर बने है, जैसे कि १. एला । २. एल + आचार्य । I इन दोनों शब्दों में 'एल' मूल शब्द है । श्राचार्य शब्द सामान्य है। आचार्य शब्द के कई अर्थ है । प्रकरण के अनुशर वाचक होता है जैन शास्त्रों में गृहस्थाचार्य, नियापिकाचार्य, पत्राचार्य सिद्धान्ताचार्य आदि शब्दो मे सामान्य अर्थ में ही 'प्राचार्य' शब्द का प्रयोग मिलता है । जो अपने-अपने विधि-विधानों को विशेष रूप से जानते हा, विज्ञ हो, उनको सामान्य रूप से प्राचार्य कहा जाता है, जैसे कि प्रतिष्ठा की विधि भली भांति जानता हो, उसे प्रतिष्ठाचार्य कहते है। इनके अतिरिक्त छत्तीस गुणों के धारक जैनाचार्य साधु की विशिष्ट संज्ञा है । उससे यहां कोई अभिप्राय नही है। जिनागम में प्राचार्य परमेष्ठी के किसी भेद का वर्णन नही मिलता सा प्राचार्य उसे कहते है, जो पाच प्रकार के प्राचार का पालन करते है । प्राचार्य के ३६ गुण हे वारह् प्रकार के तप, छह श्रावश्यक, पाच प्रकार के श्राचार, दस प्रकार के धर्म धौर तीन गुप्तियों का पालन करने वा 'एलाचार्य' शब्द की मीमांसा करते हुए सर्वप्रथम 'एल' शब्द का विचार करना इष्ट है। यह विचारणीय है कि 'एल' शब्द' प्राकृत का है या संस्कृत का है ? इस शब्द का मूल संस्कृत प्राकृत के शब्दकोशो को पलटने से 'एल' शब्द का एक ही अर्थ लक्षित हुआ है, जो इस प्रकार है हपरे चंदणम्पि एक्कंगं । पविसंतम्मि एमाणो ॥ हे - देशीनाममाला १,१४४ 'पाइप्रसद्द महण्णव' मे 'एल' शब्द के दो अन्य प्रथं मृगो को एक जाति, भेड़ । ये दोनों ही प्रथं सस्कृत से प्रागत प्रतीत होते है। प्राकृत मे यह एक देशी शब्द है जो का वाचक है। दूसरे शब्दो मे कुशल श्राचार्य को 'एलाइरिय' या 'एलाचार्य' कहा जाता था । यह शब्द भारतीय प्रार्य भाषाओं के विकास काल मे प्रयुक्त नही होता था। किसी प्राचीन परम्परा से आगत शब्द है । इस शब्द की रचना प्रवृत्ति यह रही है कि चाहे प्राकृत हो, चाहे संस्कृत दोनो मे समान रूप से एक जैसी रूप-रचना में इसका प्रचलन रहा है जैसे कि एलाचार्य, वालाचार्य कालकाचार्य प्रादि एलो कुसले एक्को एलोप्य एमप्यहूदि 1 मूल शब्द भी एक जैसी रचना की समानता को घोषित करने वाले है; जैसे कि एल, वेल, फेल प्रादि । 'एल' शब्द से 'य' स्वाधिक प्रत्यय जुड़ कर प्राकृत में 'एलय' तथा संस्कृत में 'क' स्वार्थिक प्रत्यय संयुक्त होकर 'एलक' मद की रचना हुई। जैन शास्त्रों में 'ऐलक' मोर 'क्षुल्लक' दोनो शब्द 'बाल' या 'लघु' पर्व में प्रयुक्त होते है । केवल एलाचार्य, बालाचार्य ही नही हेलाचार्य, कूवि लाचार्य, गोल्लाचार्य, तुम्बुलचार्य, तोरणाचार्य, उग्रदित्याचार्य तथा महावीराचार्य जैसे नाम भी जैन इतिहास मे मिलते है। कुछ नामो के श्रभिधान का कारण उन-उन स्थानों में निवास करने वाले व्यक्ति को वहा का कहा जाता है; जैसेकि कोण्डकुन्द' (कौण्डकुण्डल) स्थान के निवासी होने के कारण धाचार्य कुन्दकुन्द को 'कोण्ड कुन्दाचार्य' कहा जाता था। इसी प्रकार 'गोल्ल' देश के राजा होने के कारण गोल्लाचार्य नाम प्रसिद्ध हो गया । Page #38 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ३४, वर्ष ३२, कि०:१२ अनेकान्त इसी तरह, भाचार्य वीरसेन के गुरू भी किसी 'एल' ग्राम अपनी प्रवशिष्ट प्राय का विचार कर अपने शिष्य समुदाय के निवासी रहे हों, जिसके कारण उनका नाम 'एलाचार्य' को मोर अपने स्थान में जिसकी स्थापना की है ऐसे बाल पड़ गया हो। प्राचार्य को बुला कर सौम्यतिथि, करण, नक्षत्र पौर लन जैसे कि पंचपरमेष्ठी के पदो मे 'प्राचार्य' एक पद है, के समय शभ प्रदेश में बालाचार्य को अपना गण विसजित वैसे ही पा 'एलाचार्य' भी कोई पब है ? जब मैं यह कर देते है। लेख लिख रहा हूं, तभी गुरुवर्य सिद्धान्ताचार्य पं० कैलाश- इस प्रकरण में 'बालाचार्य' कोई पद नहीं है। जैसे चन्द्र जी सिद्धान्तशास्त्री का एक लेख 'एलाचार्य पद कि बालाचार्य, युवाचार्य, वृद्धाचार्य अवस्था से सम्बन्ध कल्पना' देखने में प्राया। इस लेख में कई महत्त्वपूर्ण बातों रखने के कारण प्रयुक्त होने वाले शब्द हैं, वैसे ही वहां का उल्लेख किया गया है। प्रयम यह 'प्राचार्य कुन्दकुन्द पर जिसने अभी-अभी गण को सम्हाला है, वह 'बालाचार्य' को और वीरसेन स्वामी के गुरु को उनके विशिष्ट गुणों कहा गया है। वास्तव मे पद तो 'माचार्य' का है, 'बाल' के कारण यह पद दिया गया था, यह कहा लिखा है ?' शब्द तो दशा का वाचक है। गण की परिपाटी चलाने के (जैन सन्देश, पृ० २४६) । लिए इस विधि का निर्देश किया गया है। जैसे बालमुनि, दूसरे, टीका ग्रन्थों में 'एलाचार्य' और 'बालाचार्य' वृद्धमनि का व्यपदेश किया जाता है, उसी प्रकार बालासमान अर्थ में प्रयुक्त हुए है। तीसरे, जब कोई प्राचार्य चायं या एलाचार्य समझना चाहिए। समाधि प्रहण करता है, तो वह अपने योग्य शिष्य को 'भगवती माराधना' की माथा २७५ की मूलाराधना प्राचार्य बनाता है। समाधि का काल बारह वर्ष तक है। टोका ये 'दिसं' का अर्थ 'एलाचार्य' किया गया है किन्तु इतने लम्बे काल तक यदि प्राचार्य जीवित रहते है, तो विजयोदया' में 'दिस प्राचार्य' कह कर प्राचार्य अर्थ किया उनके द्वारा स्थापित प्राचार्य एलाचार्य या बाला वार्य गया है। वास्तव में क्या शब्द-रचना की दृष्टि से, क्या शब्द कहलाता है । (वही, पृ० २५.) । से और क्या अर्थ से प्राकृत का 'एल' शब्द संस्कृत 'बाल' यह निश्चित है कि 'एलाचार्य' के पद के सम्बन्ध मे का वाचक है। दोनों के मूल भाव में प्राज भी 'प्रज्ञानता' 'भगवती पाराधना' और 'मूलाचार' ग्रन्थों में मुख्य रूप का भाव छिपा हुआ है। प्रागम में बाल प्राचार्य ही नहीं से विवरण मिलता है । यहा पर निम्नलिखित उद्धरणो के ज्ञानघाल और चारित्रवाल का विवरण भी मिलता है। प्राधार पर सक्षिप्त विचार प्रस्तुत है : उक्त अभिप्राय का समर्थन निम्नलिखित गाथा से भी (१) 'मनुगुरोः पश्चात् दिशति विधत्तं चरणक्रम- होता है। कहा हैमिश्यनुदिक एलाचार्यस्तस्मै विधिना।'-मूलाराधना भा० प्रागमदो जो बालो परियारण व हवेज जो बालो। १, बा. १७७ की टीका। तस्स सगं दुवरियं पालोचेदूण बालमदी ।। अर्थात्-गुरू के पश्चात् जो मुनि चरित्र का क्रम -मूलाराधना, गा० ५९८ जो मनि मागम से बाल है अर्थात् जिसको पागम का मुनि और प्रार्यादिक को कहता है, उसको अनुदिश अर्थात् ज्ञान नही है तथा जो चारित्रबाल है अर्थात् चारित्र भी एलाचार्य कहते है। अनुदिश का अर्थ क्या है ? यह भी जिसका श्रेष्ठ नहीं है उसको वाल कहते हैं। ऐसे मुनि के उसी ग्रन्थ से जानना चाहिए। कहा है पास जाकर लोई कल्पज्ञानी मुनि अपने दोषों को पालोकाल संभाविता सव्वगणमणु दिस च वाहरिय। चना करता है। सोमतिहिकरणणखतविलग्गे मगलोगास ।। यथार्थ में प्राकृत के 'एल' और संस्कृत के 'एलक'बा - मूलाराधना, गा० २७३ 'एला' अथवा लक' शब्द में अर्थ मेद होने पर भी मूल इस गाथा की विजयोदया टीका में लिखा है भाव में कोई असर नही है। सस्कृत में 'एला' इलायची को 'सध्वगणं सवंगणं अणु दिस च बालाचार्य च । वाइरिय कहते है। यह अर्थ उसके लघु प्राकार के कारण प्रसिद्ध ध्याहृत्य ।' (पृ० ४५२)। 000 भाव यह है कि सल्लेखना के लिए उद्यत प्राचार्य २४३, शिक्षक कालोनी, नीमच (म०प्र०) Page #39 -------------------------------------------------------------------------- ________________ श्रमण संस्कृति का उदात्तदृष्टिकोण मानव समाज में जब वैचारिक हास प्रा जाता है, तब उसमें संकीर्णता का प्रवेश होता है और उसकी चिन्तन धारा का उदास दृष्टिकोण संध केवलके में दिग्भ्रान्त हो जाता है। ऐसी स्थिति में विशेष रूप से जाति और धर्म ही सीता के प्रवेश द्वार हुआ करते हैं। जाति और धर्म के प्रति दुराग्रह या ठाग्रह ही वैचारिक सकीर्णता को जन्म देता है। इस संदर्भ में श्रमण-संस्कृति का दृष्टिकोण इसलिए उदास है कि यह वैचारिक संकीर्णता का सर्वथा प्रत्याख्यान करती है । श्रमण संस्कृति घोर वैदिक संस्कृति के बीच ऐति हासिक दृष्टिकोण से कोई स्पष्ट विभाजक रेखा नहीं खींची जा सकती। ये दोनों संस्कृतियां चक्रगति के अनुक्रम से समय-समय अपनी सत्ता स्थापित करती रही है। जिस संस्कृति में जितनी कि वैचारिक उदारता रहेगी, अधिक उसकी सत्ता उतनी ही अविचल प्रोर लोकादृत होगी । अधुना श्रमण संस्कृति के प्रति अत्यधिक लोकाग्रह का कारण उसकी वैचारिक उदारता ही है। कोई भी संस्कृति मानव-जिजीविषा की पूर्ति के साधनों की प्राप्ति के उपायों का समर्थ निर्देश तभी कर सकती है, जब कि वह वैचारिक दृष्टि से अपने को कभी अनुदार नही होने देती। इसीलिए, जनकल्याण के निमित्त वैचारिक उदारता की शर्त आवश्यक ही नही, अनिवार्य मानी गई है। लोहमार्ग का नेतृत्व वही कर सकता है। जो विचार से उदार होता है और प्राचार की दृष्टि से 'प्रात्मनेपदी' जो प्राचार की दृष्टि से केवल 'परस्मैपदी' होता है, उसका विचार या प्राचार कभी लोकशाप नही होता । इसीलिए, सम्पूर्ण भारतीय संस्कृति में श्रात्मचिन्तन को सर्वोपरि महत्व दिया गया है। उदारवादी दृष्टि से यह स्पष्ट है कि प्रात्मचिन्तन का सम्बन्ध प्रात्म-संयम या श्रात्मनियन्त्रण या श्रात्मदमन से जुड़ा हुआ है। भ्रमण तीर्थकर भगवान् महावीर ने श्रात्मदमन को बड़ा कठिन बताया है। उन्होंने कहा है : अप्पाचे दमेव प्रप्पा हु खलु दुद्दम । प्पा दन्तो सुही होइ सि लोए परस्य य ॥ - ( उत्तरा०, १०१५) D प्रो० श्री रंजन सूरिवेद पढ़ना निश्चय ही दुर्दम घारमा का दमन करने वाला व्यक्ति ही इस लोक और परलोक में सुखी होता है । प्रारमदमन आत्मपीडन का पर्याय है। बात्मा के धनुकूल वेदनीय सुख है और प्रतिकूल वेदनीय दुख तीर्थंकर पुरुष चूंकि स भूतहित के प्राकांक्षी होते है, इसलिए वे प्रतिकूल वेदनीयता पर विजय पाने के निमित्त भात्मदमन या भात्मपीड़न करते हैं, अर्थात् परजान के लिए प्रतिकूल को अनुकूल बनाकर पात्मसुख धनुभव करते हैं और सही मायने में उदार व्यक्ति वही होता है, जो पल के विनाश के लिए प्रात्मदुःख के वरण करने में ही सुख का अनुभव करता है। इसीलिए 'वसुदेवहिण्टी' के 'धम्मिल चरित' मे धर्म की परिभाषा करते हुए संघदासगणिवाचक ने कहा है- 'परस्स दुक्खकरणं घमोत्ति ।' इस प्रकार, सम्पूर्ण धामण्य संस्कृति पर दुःख को विनाशमूलक उदारता की उदात्त भावना से श्रोतप्रोत है । भगवान् महावीर के पंचयाम धर्म में श्रमण संस्कृति के उदात्त दृष्टिकोण का ही भव्यतम विनियोग हुआ है । महिमा, सत्य, अस्तेय, बानयं और अपरिग्रह ये पत्रों साधारण जन जीवन को उदात्त दृष्टिकोण से सबलित करने वाले ऐसे विचार-बिन्दु है, जिनसे सम्यक दर्शन, सम्पक ज्ञान पोर सम्यक्चारित्र की उपलब्धि सम्भव होती है और मोक्ष का मार्ग उद्घाटित होता है। । लोकपणा या लोकहित श्रमण संस्कृति के उदात्त दृष्टिकोण का महनीय पक्ष है। चाधुनिक लोकदृष्टि इस लिए अनुदार हो गई है कि वह हिंसा, असत्य, चोयंवृति, कामला और सपति से माकात है अनुदारता ही संकीर्ण विचार की जननी है। धाम के वकबड़ चोग श्राज वक्रजड़ दुपख्या के विष में मूर्छित है । प्रात्महित के लिए पर हित का प्रत्याख्यान उनका धर्म हो गया है। भास-पड़ोस के जलते हुए घरो के बीच अपने घर को सुरक्षित समझने का प्रमाद ही उनका श्रात्मसंस्कार बन गया है। परदु:ख के विनाश मे ग्राम को सहो न मानकर वे भ्रात्मसुख को परदुःख का कारण बनाना उचित समझते है | श्रमणसंस्कृति इसी अनुदार दृष्टि के निर्मूलन के प्रयास के प्रति सतत मास्याशील है । Page #40 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ३६, वर्ष ३२, कि० १.२ अनेकान्त श्रमण-संस्कृति अहिंसा, अपरिग्रह और अनेकान्त के मिलावट, तस्करी प्रादि का व्यापार परिग्रह का ही जघन्यउदात्त दृष्टिकोण की त्रिपुटी पर माधृत है । अनेकान्त की तम रूप है । हम धन से दूसरे की सहायता करते भी है, उदार विचारधारा श्रमण-संस्कृति का महाघं अवदान है। तो स्वामित्व की भावना रखकर ही । स्वामित्व की भावना अनेकान्त यदि वैचारिक उदात्त दृष्टिकोण का प्रतीक है, का त्याग हम नही कर पाते। इसमे अपरिग्रह का सही | और अपरिग्रह प्राचारगत उदारता का परि- रूप तिरोहित ही रह जाता है। प्रोर फिर, हम संकीर्ण चायक । श्रमण-संस्कृति का अहिंसावाद भी सीमित परिघि भावना से ऊपर नही उठ पाते, हमारा वैचारिक दष्टिकी वस्तु नहीं है । प्राणिवध जैसी द्रव्यहिंसा से भी अधिक कोण उदात्त नही हो पाता । श्रमण-संस्कृति अपरिग्रह के ध्यापक भावहिंसा पर श्रमण-संस्कृति बल देती है । उसका माध्यम से हमें उदात्त दष्टिकोण प्रदान करती है, जिससे मन्तव्य है कि मूलतः भावहिंसा ही द्रव्यहिंसा का कारण हमारे अन्तर्मन मे सर्वोदय की भावना का संचार होता है है। यदि भावहिंसा पर नियन्त्रण हो जाय, तो फिर द्रव्य- और जनमानस ग्रहण की सकीर्ण भावना से त्याग की सा का प्रश्न ही नही उठे। आज सामाजिक जीवन मे उदात्तभमि की पोर अभिमख होता है। भावहिंसा की प्रधानता से ही द्रव्याहिंसा होती है और यही श्रमण-मंस्कृति का अनेकान्तबाद उसकी उदात्त दृष्टि फिर भयकर युद्ध और भीषण रक्तपात मे परिणत हो का एक ऐसा प्रकाश-स्तम्भ है, जिससे सम्पूर्ण विश्व का जाती है। जीवन-दर्शन पालोकित है। अनेकान्त, जनसमुदाय को जाति और धर्म की भावना में सकीर्णता पाने पर दुराग्रहवादिता को सकीर्ण मनोवृत्ति से मुक्त होने की हिंसा का उदय स्वाभाविक है। इस स्थिति मे पुण्य की प्रेरणा देता है। दर्शन के क्षेत्र में या फिर जीवन के परिभाषा परोपकार न होकर सामान्य वैयक्तिक पूजा- व्यावहारिक जगत् मे व्याप्त श्रेष्ठ-अश्रेष्ठ की भावना के में नि.शेष हो जाती है । जात्यभिमान हपे अधःपतन व्यामोह का विलोप अनेकान से ही सम्भव है। नीरकी मोर ले जाता है और इससे हम मानवता का निरादर क्षीर विवेक की सम्प्राप्ति एकमात्र अनेकान्त से ही हो कर बैठते हैं। इसीलिए, भगवान् महावीर ने कर्मणा जाति सकती है। सत् के प्रति आसक्ति और असत् के प्रति की परिभाषा प्रस्तुत करते हुए कहा : वैराग्य अनेकान्त की भावना से ही आता है। कम्मुणा बम्भणो होइ कम्मुणा होइ खन्तिप्रो। भाषिक शुद्धि की दृष्टि से स्थाद्वाद और वैचारिक कम्मणा बइस्सो होइ सुद्दो हवइ कम्मणा ।। शुद्धि की दृष्टि से अनेकान्तवाद की स्थापना श्रमण-- उत्तरा०, २५१३१ । सस्कृति की उदात्तता ही पार्यन्तिक रूप है। आज हम महिसाबाद पर अनास्था के कारण हो अाज समाज किसी वस्तु को एकान्त दृष्टि से सत्य मानने का भ्रम में जातिगत हीनभावना का विस्तार हो रहा है। जाति पालते है। किन्त, अनेकान्तवाद इस म्रम को दूर करता के सम्बन्ध में हमारा दृष्टिकोण उदात्त नहीं रह गया है। है। किसी वस्तु को हम एकान्त दृष्टि से सत्य मानकर हम इसीलिए ऊँच-नीच, छुपात भादि के घेरे में बन्दी अपनी अनुदात्त दृष्टि का ही परिचय देते हैं। कोई भी बनते जा रहे है। श्रमण-संस्कृति इसी दुरभिमान को मानव एकान्त भाव से पूर्ण नहीं होता। यदि हम किसी चनौती देती है और सघोष उद्घोषणा करती है : 'मेत्ती दर्शन तत्वज्ञ को पण्डित मान लेते है, तो यह एकान्त मे सव्वभूएसु।' दष्टि हुई । सम्भव है, उस पण्डित को सांख्यिकी मे तत्वसामाजिक अवधारणा के सदर्भ में अपरिग्रहवाद भी ज्ञता प्राप्त नही, तो फिर उसे एकान्त भाव से पण्डित श्रमण-सस्कृति के उदात्त दृष्टिकोण का परिचय प्रस्तुत कहना उचित भी नही। अनेकान्त दृष्टि से दर्शन की करता है। अपरिग्रह का तात्पर्य धन के प्रति स्वामित्व की अपेक्षा यदि वह पण्डित है, तो सांख्यिकी की अपेक्षा पडित भावना का परित्याग है। अनावश्यक संचय से सामान्य नही भी है : इमी विचारधारा के आधार पर अनेकान्त मे लोकजीवन को कष्ट पहुंचता है। धूसखोरी, जमाखोरी, 'सप्तभंगी नय' की प्रतिष्ठा हुई है । इस नथ के द्वारा हम Page #41 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अमग-संस्कृति का उदात्त वृष्टिकोण एकान्त से अनेकान्त की पोर प्रस्थान करते है, जहाँ हमें सिद्धान्त का समर्थन करती है। वह जना (तद्वति तत्प्रकारक सम्पूर्ण जागतिक स्थिति का सही मभिज्ञान प्राप्त होता है ज्ञान) पर प्रास्था रखती है, बाहरी चाकचिक्य को नकार पौर उदात्त दृष्टिकोण से संवलित होने का अवसर मिलता देती है। वह सिद्धान्तो के भटकाव की स्थिति नही उत्पन्न है। सर्वधर्मसमन्वय की समस्या का समाधान भी अनेकान्त करती। वह तो जीवन को सन्त्रास, कुण्ठा, प्रनास्था, ही दे सकता है। विसगति मादि दुर्भावनामों के घात प्रतिधातो से बचने को ज्ञान प्रोर दया श्रमण-संस्कृति के मेरुदण्ड है। ये प्रेरित करती है, ताकि मानव अपनी मानवता की चरम दोनों ऐसे दिव्य तत्त्व है, जिनमें उदात्त दृष्टिकोण का परिणति के सुमेरु पर विराजमान हो सके, सिशिला पर अपार सागर तरंगित होता रहता है। कोई भी ज्ञानी प्रासीन होकर पल्योपम भूमि को प्रायत्त कर सके । पुरुष अनदार नही हो सकता और किसी भी दयालु की प्राज का मानव नितान्त परिग्रही हो गया है । उसने विचारधारा सकीर्ण नहीं होती। किन्तु, दया की भावना अपने इर्द-गिर्द अनेक प्राडम्बर चिपका रखे है। अज्ञानता का उदय विना ज्ञान के सम्भव नही । इसीलिए, जिनवाणी और दयाहीनता के कारण वह अनपेक्षित माभिजात्यकी मात्रिक भाषा है : 'पढम पाण तो दया।' श्रमण- भावना मे पडकर मानवता को गरिमा से परिच्युत हो संस्कृति मे ज्ञान को ही प्रमाण माना गया है। ज्ञान भी गया है। वह बाह्य जगत् मे प्रकर्म को कर्म भोर कर्म को ऐसा, जो स्व प्रौर पर को समान रूप से प्राभासित करे प्रकर्म मान बैठा है। भौतिकता से प्रतिपरिचय के कारण और उसमे किसी प्रकार का बाधा-व्यवधान न हो। इसी- वह पाध्यात्मिकता की अवज्ञा कर रहा है। उसका कोई लिए प्राचार्य सिद्धसेन ने कहा है . 'प्रमाण स्वपराभामि भी कथन न तो सुचिन्तित होता है, न ही वह कोई सुविज्ञानं बाघविवजितम् ।' उदात्त दृष्टिकोण के लिए ज्ञान चारित कार्य कर पाता है। कुल मिलाकर, प्राधुनिक का होना अनिवार्य है और ज्ञान का क्रियान्वयन दया- मानव-समाज मे प्रात्मप्रदर्शन की मिथ्या गतानुगतिकता, भावना से ही सम्भव है। ज्ञान की ही सक्रिय अवस्था की ऐमी लहर छा गई है कि वह सिवाय दूसरे का छीनने दया है। ज्ञान को सक्रियता के लिए दया अनिवार्य है। के अलावा और कुछ सोच ही नहीं सकता। श्रमणकहना चाहिए कि ज्ञान और दया दोनों एक ही सिक्के सस्कृति ने इसीलिए, अस्तेय-भावना को मामाजिक जीवन के दो पहलू हैं। इसीलिए, अनन्त ज्ञान से सम्पन्न तीर्थकर मे प्रतिष्ठा दी है। 'दयालु' या 'कल्याणमित्र' की संज्ञा से सम्बोधित हुए। ईशोपनिषद् की 'तेन त्यक्तेन भुजी था मा गृधः ब्रह्मचर्य की व्याख्या में भी थमण-संस्कृति ने उदार कस्यस्विद्धनम्' जैमी सामाजिक भावना को उद्बद्ध करने दष्टिकोण से काम लिया। है अन्यत्र जहाँ 'मरण विन्दुपातेन वाली चेतावनी को प्राज के मानव ने नजरन्दाज कर दिया जीवनं बिन्दुधारणात्' का कठोर निर्देश मिलता है, वहा है, इसीलिए उसमें चौर्यवृत्ति या गई है : प्रात्मधन की श्रमण-संस्कृति ने 'स्वदारसंतोषित्व व्रत' को ब्रह्मचर्य का अपेक्षा परधन के प्रति तृष्णा से निरन्तर पाकुल-व्याकुल हो दर्जा दिया है। प्राज ब्रह्मचर्य के नाम पर उन्मुक्त योन- रपा है। फलतः, उसके सयम का चाबुक बेकार हो गया मेघ का जो नग्नताण्डव दष्टिगत होता है, उसका संयमन है और इन्द्रियों के घोड़े बेलगाम हो गये है। उसके जैसा 'स्वदार-सन्तोषित्व-व्रत' से सहज ही सम्भव है। एकमात्र कामगड व्यक्ति काम से ही काम को शान्त करना चाहता अपनी पत्नी में ही संतोष के व्रत का पालन किया जाय, है, और इसके लिए वह चोयवृत्ति से ही अपने सुखतो कामोष्मा से प्रतप्त माधुनिक समाज मे सयम के स्वर्गिक सन्तोष की सामग्री जटाने मे प्रबल पुरुषार्थ मान रहा है सुख की प्रतारणा हो जाय। और हिंसा तथा मिथ्यात्व के प्रति एकान्त प्राग्रहशील हो श्रमण-सस्कृति अपने उदात्त दृष्टिकोण के कारण ही उठा है। व्यष्टिगत धारणा की अपेक्षा समष्टिगत धारणा के प्रति सारस्वत जगत में भी प्राज अजीव छीना-झपटी चल मामहशील है। वह 'भूमा वे सुखं नाल्पे सुखमस्ति' के रही है। गीता की 'स्वधर्म निधन यः परधर्मो भयावहः' Page #42 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ३८, वर्ष ३२, कि. १-२ की चेतावनी भी उसे याद नहीं रह गई है। फलतः उसकी निस्सन्देह, केवल सिर मला लेने से कोई श्रमण नहीं जिन्दगी की गाड़ी समतल सडक को छोड़ ऊबड़-खाबड़ होता, न ही प्रकार के जप से ब्राह्मण । जंगल में रहने से रास्ते में दौड़ पड़ी है। कृत्रिम पाश्चात्य संस्कृति की ही मुनि नहीं होता थोर व कुश तथा चीवर धारण करने चकाचौंव में पड़ कर उसने अपनी सहज पौरस्य सस्कृति से तपस्वी । वस्तुतः, जो समता से सम्पन्न है, वही श्रमण की उपेक्षा कर दी है। यहां तक कि वह अपनी भाषा और है, ब्रह्म वयं का उपासक ही ब्राह्मण है, ज्ञानी ही मुषि हैं साहित्य को भी वह मूल्यहीन मानने लगा है। उसके पोर तप करने वाला हो तपस्वी।। मूल्यांकन को तुला ही प्रभारतीय हो गई है। इस प्रकार, श्रमण-संस्कृति ने प्रत्येक व्यक्ति को उत्थान यही कारण है कि प्राधुनिक मानव विभिन्न मतवादों के मार्ग का अधिकारी घोषित किया है। अपनी साधना पौर साम्प्रदायिक रूढ़ियों की वात्या मे विलुण्ठित हो रहा से सर्वसामान्य व्यक्ति भी पारमश्वयं को सिद्धि सुलभ कर है । उपका अपना ज्ञानबोध अहंकार के अधेरे में डब गया सकता है। श्रमण-संस्कृति ने ईश्वर के कर्तुत्व को नकारते है। ऐसी स्थिति में श्रमण-सस्कृति के पयाम धर्म को हुए मानव के मजेय पुरुषार्थ के प्रति प्रडिग पास्था मभिप्रोज्ज्वल प्रभा उसके तिमिरावत हृदय को भास्वर बना व्यक्त की हैं। प्रात्मशक्ति के प्रति विश्वास हो जाने के सकती है। उसके दिग्भ्रष्ट जीवन-पोत के लिए अनेकाम्त कारण ही वह किसी पारमेश्वरी शक्ति की कल्पना कर जयपताका दिशासूचक यात्र का काम कर सकती है। उसके प्रति समर्पित हो जाता है। परवर्ती-कालीन भक्त क्योंकि, श्रमण-संस्कृति के पचयाम धर्म में मानव की कवि चण्डीदास की प्रसिद्ध काम्य-पंक्ति-'संवार ऊपरे चेतना को अनावश्यक प्राग्रह से अलग कर प्रक्षित प्रना- मानुस सत्य' मे श्रमण संस्कृति का ही उदात्त दष्टिकोण ग्रह के ज्योतिपथ की पोर ले चलने की अपरिमित शक्ति समाहित है। है। कहना न होगा कि श्रमण-सस्कृति मे जीवन के श्रमण-संस्कृति के उदात्त विचारप्रधान दार्शनिक से प्रवाह धार्मिक चितन ने राष्ट्रपिता महात्मा गान्धी को भी अनुकलित किया arva परिपालक प्राडम्बरो था और गान्धी जो के प्रसिद्ध ग्यारह व्रतों मे प्रारम्भ के का प्रतिक्षेप, सैद्धान्तिक मतों का समन्वय, सामाबिक पांच व्रत भगवान् महावीर के ही पंचयाम धर्म से प्राकलित जीवन मे समतावाद की स्थापना के द्वारा स्त्री-पुरुषों के हैं। कहना यह चाहिए कि महात्मा गान्धी का जीवन-दर्शन लिए ममान प्रगति की योजना, अधिक धन का प्रत्याख्यान श्रमण सस्कृति के जीवन-दर्शय का ही परवर्ती व्यापक पौर प्राप्त धन का स्वामित्व-हीन समान वितरण, पुजी- विस्तार है, जिसकी उदान विचारधारा परम्परानुक्रम से वाद का विरोध, ऊंच-नीच और स्पृश्यास्पृश्य जैसी समा- विकसित होकर पाज की सामाजिक एवं भाथिक अभ्यूजोत्थान-विरोधी भावना का निराकरण प्रादि--प्रति- त्यानमूलक राष्ट्रीय योजना विंश-सूत्री कार्यक्रम से प्रा जुड़ी निहित है, जिनसे उसके उदात्त दृष्टिकोण का प्रत्यक्ष है। इसलिए, यह कहना अतिशयोक्ति न होगी कि राष्ट्रीय परिज्ञान प्राप्त होता है। अभियान के प्रत्येक पड़ाव पर या सामाजिक जीवन के हर श्रमण-सस्कृति में श्रमण, ब्राह्मण, मनि और नापस मोड़ पर प्रगति और उत्कर्ष का मन्त्र फकने वाली श्रमणके लिए किसी निर्धारित वेश-विशेष की भावश्यकता नहीं। संस्कृति को किसी विशिष्ट देश, काल, मायु, नाम, गोत्र भगवान महावीर ने इनकी परिभाषा उपस्थित करते हुए मादि की सीमा में रखकर देखने की अपेक्षा सम्पूर्ण विश्व निर्देश किया है : के सन्दर्भ मे मगलकारी उदात्त दष्टिकोण का ही पर्याय न वि मुण्डिएण समणो न मोकारेण बम्भणो । समझना समीचीन है। न मुणी र ण वासेण कुसचीरेण न तावसो । समयाए समणो होइ बम्पचेरेण बम्मणो। सम्पादक, 'परिषद्-पत्रिका', बिहार-राष्ट्रभाषा-परिषद्, णाणेण य मुणो होइ तवेण होइ तापसो।। पदना-८००००४ Page #43 -------------------------------------------------------------------------- ________________ मूर्ति-पूजा की प्रतीकात्मकता प्रतीक की स्वीकृति मानव संस्कृति मे प्रतीक की स्वीकृति उत्तनी ही प्राचीन है जितनी मानव की ज्ञान चेतना । प्रत्यक्ष वस्तु को शब्दों द्वारा प्रकट करने की प्रथम चेष्टा ने ही प्रतीक की मान्यता का सूत्रपात किया प्रतीक विकास । समय के साथ प्रतीक का भी विस्तार होता गया और वह अब शब्दों तक ही सीमित न रह गया। शब्दो स अधिक सरल और सक्षिप्त प्रतीक दूसरा नहीं, परन्तु कभीकभी अस्पष्ट या प्रदृश्य वस्तुओ का सर्वसाधारण को बोध कराने में शब्द असफल भी हो जाते है। ऐसी स्थिति में किसी को प्रभीष्ट वस्तु का प्रतीक माना जाने लगा । वस्तु एक वस्तु के प्रतीक के रूप में दूसरी वस्तु की ही स्वीकृति अपने प्राप मे एक बहुत बड़ी घटना थी । प्रतीकात्मक वस्तु ही आगे चलकर दो रूपों में परिणत हुई । उसका प्रथम रूप था -- प्रतदाकार, जिसे हम यथार्थ शब्दो में "नगढ़" कहे तो अधिक प्रच्छा होगा। मिट्टी के ढेले या पत्थर के टुकड़े से पर्वत का और जल की क्षुद्र धारा से विशाल नदी का बोध कराना भी प्रतीकों में स्थान पाता है । यही द्वितीय तक्षकार प्रतीक की मान्यता का सूत्रपात है । प्रतीक के विभिन्न रूप , अब हमारे समक्ष प्रतीक के सीन रूप स्पष्ट है : (१) शब्दात्मक, ( २ ) प्रतदाकार श्रीर (३) तदाकार । वर्तमान विचारको प्रोर दार्शनिकों के विचार से अब कदाचित् शब्दात्मक प्रतोक को प्रतीक कोटि मेन रखा जाए, पर शेष दो प्रतीक ती अब भी मान्य हैं । मानव की विवेचनात्मक या उपयोगी अनुपयोगी वस्तुओं में मतभेद करने की योग्यता के विकास के साथ प्रतीक मान्यता ने भी विभिन्न रूप धारण किये उपयोगी [D] डा० भागचन्द्र जंन 'भागेन्दु' वस्तु का प्रतीक शुभ माना जाने लगा और अनुपयोगी वस्तु का प्रतीक प्रशुभ । यही से प्रतीको के प्रति सम्मान या सम्मान का भाव जागृत होता है। उपयोगी या धभीष्ट वस्तु के प्रतीक की कल्पना अधिक सुन्दर रूप मे की गयी । प्रारम्भ मे उसकी तदाकारता या प्रतदाकारता पर कम ध्यान दिया गया, परन्तु मानव मे ज्यों-ज्यो कलाबोध विकसित हुमा यो पो प्रतीक की तदाकारा की महत्व मिलता गया । तदाकार प्रतीक को महत्त्व इसलिए भी मिला कि वह मानव-भावना को अदाकार प्रतीक की अपेक्षा अधिक शीघ्रता एवं सुन्दरता से जामूत कर लेता है। मूर्ति - कल्पना प्रतीक के क्षेत्र मे मानव की सुन्दरतम उपलब्धि थी मूर्ति की कल्पना उसने प्रारम्भ मे जब अपने सर्वाधिक प्रिय व्यक्ति को मूर्ति के रूप में प्रस्तुत कर लिया तब वह अपनी प्रपूर्व सफलता पर झूम उठा होगा। मूर्ति रूप प्रतीक की लोकप्रियता निरन्तर बढी और अब भी बढ रही है । यह प्रतीक भी समय कम से शुभ एवं प्रशुभ के रूप मे विभक्त हो चला। प्रशुभ वस्तु को मूर्तरूप प्रतीक देने में मानव ने अपना अनुमान अनुभव किया और यही कारण है कि अनुयोगी या दुरुपयोगी वस्तु के प्रतीक या तो मूर्तरूप नहीं होते या उनका मूर्तरूप उतना सुघड़ तथा कलापूर्ण नही होता, जितना कि उपयोगी वस्तुप्रो का | मूर्ति-पूजा का जन्म मूरूप प्रतीक चूंकि उपयोगी या प्रभीष्ट वस्तु का ही बनाया जाने लगा, अतः उसकी मान्यता भी बढ चली। यह मान्यता विभिन्न रूपों में प्रकट हुई। मूर्ति को सुरक्षित तथा सुन्दर स्थान में रखा गया। अभीष्ट प्रेरणा या शक्तिसवार के लिए उसके सामयिक या दैनिक दर्शन का विधान किया जाने लगा। यही से "मूर्तिपूजा" की प्रथा को जन्म मिला । Page #44 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ४०, वर्ष ३२, कि०१.२ अनेकान्त इस दृष्टि से, इतने से उद्देश्य-से ही यदि मूर्ति पूजा दिया गया या मुख्य मूर्ति के समीप कही। स्वीकृति मान लें तो कहना होगा कि आज संसार में जैन धर्म और मूर्ति-पूजा कदाचित् ऐसा कोई व्यक्ति नही, जो मूर्ति-पूजक न हो। जैन मूर्तियो के निर्माण और उनकी पूजा-प्रतिष्ठा के परन्तु मानव ने जब जब से भौगोलिक, सास्कृतिक एवं विवरण प्राचीनकाल से ही प्राप्त होते है । जैन धर्म में दो राजनीतिक दृष्टियों से अपनी सीमायें सकीर्ण की या ऐसी प्रकार की मूर्तिया स्वीकार की गयी है-१. कृत्रिम तथा सीमामों का अनुभव किया, तबसे उसकी मूर्ति-पूजा ने भो २. प्रकृत्रिम । जन साहित्य में कृत्रिम मूर्तियों की अपेक्षा देश, काल तथा परिस्थिति के अनुकल रूप-रूपान्तर धारण अकृत्रिम मतियों की संख्या असंख्य गुणी वणित है। जैसे किए। कही तदाकार मूर्ति-रूप प्रमीक की पूजा प्रारम्भ कृत्रिम और प्रकृत्रिम के भेद से मूर्तियां दो प्रकार की हुई, हुई तो कही अतदाकार मूर्ति-रूप की। उसी प्रकार चैत्यालय भी दो प्रकार के होते है-१. कृत्रिम जहा तक भारत का प्रश्न है. यहा तदाकार मूर्तरूप चैत्यालय एवं २. अकृत्रिम चैत्यालय। प्रतीक को ही अधिकतर पूजा प्राप्त हुई। अब से पचास ये चैत्यालय नन्दीश्वर द्वीप, सुमेरु, कुलाचल, वैताढ्य शत की पूर्व यहा मूर्ति-पूजा प्रचलित थी। उससे पच्चीस पर्वत, शाल्मली वृक्ष, जम्बूवृक्ष, वक्षारगिरि, चंत्यवृक्ष, शताब्दो पश्चात् यहा उसकी जड़े इतनी गहरी जम चको रतिकरगिरि, रुचकगिरि, कंडलगिरि, इष्वाकारगिरि, थी कि महात्मा बुद्ध जैसे अद्भुत प्रभावशाली व्यक्ति के अंजन गिरि, मानुषोत्तर पर्वत, दधिमुख पर्वत, ज्योतिर्लोक, प्रादेश का उल्लघन करके भी मनुष्य ने मूर्ति-पूजा च लू व्यन्तरलोक, स्वर्गलोक तथा भवनवासियो के पाताल लोक रखी। मे प्राप्त होते है। इन प्रकृत्रिम चैत्यालयों में प्रकृत्रिम पूजा पूज्य पुरुष की की जाती है। यदि पूज्य पुरुष मूर्तियां विराजमान हैं। युग के प्रारम्भ मे सोधर्मेन्द्र ने विद्यमान न हो तो उसकी मूर्ति बनाकर उसके माध्यम से अयोध्या में पांच मन्दिर,बनाए तथा उनमें प्रकृत्रिम मूर्तियां पूज्य पुरुष की पूजा की जाती है। तदाकार स्थापना का स्थापित की। अभिप्राय भी ऐसा ही है। सर्वप्रथम भरत चक्रवर्ती ने अयोध्या एवं कैलाश मे मूर्तियों के पात्र मदिरों का निर्माण कराकर स्वर्ण और रत्नों की कृत्रिम " मूर्ति के पात्रो के रूप मे भारत में -शिव, विष्ण, मूर्तियां विराजमान कराई तथा जिस स्थान पर बाहुबली ऋषभ -पाश्र्वनाथ, महावीर और बुद्ध जैसी महान् विभू ने एक वर्ष तक प्रचल प्रतिमायोग धारण किया था, उस तिया स्वीकृति को जाने लगी। किन्तु कदाचित् जनसख्या स्थान पर उन्ही के प्राकार (५२५ धनुष) को मूर्ति बनके बिस्तार व रुचि-वभिन्य के फलस्वरूप मूर्ति के पात्रो वायी। ग्रन्थों मे वर्णन प्राप्त होता है कि-द्वितीय तीर्थमे वृद्धि हो चली। प्राकृतिक शक्तियो को, जिन्हे प्रब ङ्कर अजितनाथ के समय में चक्रवर्ती सगर सुपुत्रों ने एवं तक शब्दात्मक या प्रतदाकार प्रतीक ही प्राप्त थे, अब २०वें तीर्थकर मुनिसुव्रतनाथ के तीर्थ मे मुनिराज वाली मृतरूप प्रतीक प्राप्त होने लगे, यद्यपि ऐसी मूर्तियो को एवं प्रतिनारायण रावण ने कैलाश पर्वत पर उन जिनावह मान्यता कभी नहीं मिली जो पूर्व स्वीकृत शिव मादि लयो के और श्री रामचन्द्र तथा सीता ने बाहुबली स्वामी की मूर्तियों को प्राप्त हुई और फिर इन पात्रो की संख्या की उक्त मूर्ति के दर्शन-पूजन किए थे। प्रधिक बढी कि उनके प्रति पूजा की भावना अपेक्षाकृत जैन धर्म में प्रतीक निर्बल हो गयी। फलस्वरूप उन्हे वह मलकरण और स्थान प्रतीक का अस्तित्व जैन-धर्म मे मादिकाल से रहा भी प्राप्त न हो सका जो पूर्व स्वीकृत मूतियो को हुमा। है। शास्त्रीय विधानों के अनुसार कुछ मूर्तियां भोर मंदिर यही कारण है कि अन्य मूर्तियो को पूर्व-स्वीकृत मूतियो के (जिनका उल्लेख ऊपर के अनुच्छेद में किया गया है) तो परिचायक या पूरक के रूप में प्रस्तुत किया गया। जब ऐसे हैं जो केवल प्रकृति की देन है', उनका न घाटि है एक मति के लिए मन्दिर का निर्माण किया गया तब अन्य भौर न पन्त । यह दूसरी बात है कि वर्तमान मनुष्य उन मतियों को या तो मदिर के सज्जागत तत्वा म स्थान तक पहुंचनका कत्याकत्रिम चारु चैत्यानिलयान् नित्यं त्रिलोकोगतान् । वन्दे भावनध्यतरान् पतिवरान् स्वर्गामरावासगान् ।। Page #45 -------------------------------------------------------------------------- ________________ मनुष्य द्वारा निर्मित प्रानीनतम जन मूर्ति कौन है, किसी एक या अधिक को मूर्ति के साथ उत्कीर्ण किया यह विचारणीय है। पटना संग्रहालय में लोहानीपुर से ' जाता था। परवर्ती काल में लान्छनों की व्यवस्था प्राप्त मौर्यकालीन एक जन मूर्ति प्रदर्शित है'। लोहानीपुर और उन्हें भूतियों के पादपीठ पर उत्कीर्ण किया जाने लगा। (पटना) में एक जैन मन्दिर की नीव भी मिली है। जन-धर्म में समवशरण, सहनकूट, सिद्धचक्र, प्रष्टहड़प्पा में भी एक नग्न मूर्ति प्राप्त हुई है। इन दोनों मंगल, प्रष्टप्रातिहार्य, सोलह स्वप्न, चरणपादुका, नवनिषि, मतियों में परम्परा पोर लक्षणों की दृष्टि से इतनी अधिक नवग्रह मादि भी प्रतीक रूप में स्वीकृत होकर पूजित हैं। समानता है कि हडप्पा की मूर्ति को जैन कहने में संकोच उपर्युक्त विवेचन से यह सुस्पष्ट है कि-पूजा पूज्य नहीं होता। स्व. प्रो. प्राणनाथ विद्यालकार (बनारस पुरुष को होती है। पूज्य पुरुष के समक्ष न होने पर प्रतीक हिन्द विश्वविद्यालय) ने सिन्धु घाटी में ही प्राप्त एक मुद्रा रूप में उसकी मूर्ति के माध्यम से उसके गुणों का स्मरण (क्रमांक ४४६) पर "जिनेश्व" पढ़ा था। इन सबके कर अपने विकास-उत्थान पोर कल्याण का मार्ग सुनिविचत प्राधार पर जन मूति की प्राचीनता अब स लगभग ५००० किया जाता है। इस प्रकार यह स्पष्ट है कि सांसारिक वर्ष पूर्व मानी जाएगी। तब से निरन्तर अनेक प्रकारीय कार्य कलापो मे उलझे प्राणी मूर्ति को प्रतीक रूप में ही उपादानों से मूर्तियों का निर्माण होता पाया है। इस क्रम मानते घोर पूजते है । इस उपासना का तात्पर्य यही है कि जीवन्त स्वामी की मूर्ति तथा कलिंगाधिपति खारवेल के सर्वसाधारण प्राणी ऐसे महापुरुषों के दर्शन-पूजन से उनके हाथी गुम्फा अभिलेख में उल्लिखित जिन प्रतिमा के संदर्भ चरण-चिह्नो पर चलने तथा उनकी शिक्षामों को मारमतथा मथरा, देवगढ़, पभोसामादि में उपलब्ध प्राचीन जैन सात करने की प्रेरणा प्राप्त कर सकें, जिन्होंने स्वयं अपने मूर्तियां विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। पुरुधार्थ से "परमात्मा पद" पाया है। क्योंकि साधना के जैन धर्म में प्राचीनकाल से तदाकार प्रतीकों के प्रति पश्चात् वह स्वय अनुभव करने लगेगा किरिक्त मतदाकार प्रतीकों को मान्यता भी रही है। प्रतवा- "य परमात्मा स एवाह, योऽहं स: परमस्ततः । कार प्रतीकों में मुख्य और परम्परागत है-धर्म चक्र, स्तूप, प्रहमेव मयोपास्यो नान्यः कश्चिदिति स्थितिः।। विरत्न, चैत्यवृक्ष, पूर्णघट, श्रीवत्स, शराब सम्पुट, पुष्पपात्र, जो परमात्मा है वही मैं हूं, जो मैं हूं, वही परमात्मा है। पुष्प पटलक, स्वस्तिक प्रादि । एक अन्य महत्त्वपूर्ण प्रतीक मेरे और परमात्मा के स्वभाव मे कोई अन्तर नहीं है। 'मायागपट्ट, भी रहा है। यह एक वर्गाकार या भायताकार अतः मेरे द्वारा मैं स्वयं ही उपासना के योग्य हूं, अन्य कोई शिलापट्ट होता है जिस पर कुछ अन्य प्रतीक उत्कीर्ण होते नही, वास्तविक स्थिति ऐसी ही है । है। कुछ पर मध्य में तीथंकर की लघुमूर्ति प्रकित होती परन्तु यह मार्ग उसी साधक के लिए उपतुक्त है जो है। कुछ अभिलिखित मायागपट्टों से विदित होता है कि मात्मानुभव के प्रमृत-मार्ग में पूर्णतः प्रविष्ट हो गया है। वे पूजा के उद्देश्य से स्थापित किए जाते थे। मथुरा तथा सांसारिक विषय-वासना मे व्यस्त मानव को प्राथमिक कौशाम्बी से भनेक सुन्दर शक-कुषाणकालीन भायागपट्ट विकास का मार्ग प्रतीक रूप में प्रयुक्त मूर्तियो की पूजाप्राप्त हुए हैं। उपासना से ही प्राप्त होता है। 00 तीर्थकरों के लाञ्छन भी प्रतीक कहे जा सकते हैं । प्राध्यापक, शासकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, पहचान के लिए तीर्थकर का नाम या पंचकल्याणकों में से दमोह (म.प्र.) १. देखिये, (म) विसेंट ए. स्मिथ : ए हिस्ट्री घाफ इन इडिया एण्ड सीलोन, फलक दी, प्राकृति स तथा फाइन मार्ट इन इडिया एण्ड सीलोन, पृ. २० तथा फनक १०, माकृति-स । (ब) मार० सी० मजमदार: मदार: ३. प्रौर भी देखिए, (म) पं० सुमेरचन्द्र दिवाकर : जैन ३. दी एज माफ इम्पीरियल यूनीटी, पृ० ४२६ । शासन, पृ० ३१३, (ब) मुनि विद्यानन्द : श्रमण संस्कृति का इतिहास : सन्मति सम्देश (अगस्त २. देखिए, बी. ए. स्मिथ: ए हिस्ट्री माष फाइन मार्ट १६६६), पृ० १३। Page #46 -------------------------------------------------------------------------- ________________ R. N. 10591/82 वीर-सेवा-मन्दिर के उपयोगी प्रकाशन पुरातम मवाल्य-सूची: प्राकृत के प्राचीन ४६ मूल-ग्रन्थों की पद्यानुक्रमणी, जिसके साथ टीकादि प्रन्थों में उदृत दूसरे पक्षों की भी अनुक्रमणी लगी हुई है । सब मिलाकर २५३५३ पयवाक्यों की सूची । संपादक मुस्तार थी जुगलकिशोर जी की गवेषणापूर्ण महत्त्व की ७ पृष्ठ की प्रस्तावना से अलंकृत, डा. कालीदास नाग, एम. ए., डी. लिट. के प्राक्कथन (Foreword) और म० ए. एन. उपाध्ये, एम. ए.,डी.लिट. की भूमिका (Introduction) से भूषित है। शोष-खोज के विद्वानों के लिए प्रतीव उपयोगी, बड़ा साइज, मजिल्द । १५... माप्तपरीभा: श्री विद्यानन्दाचार्य की स्वोपज्ञ सटीक भपूर्व कृति, प्राप्तों की परीक्षा द्वारा ईश्वर-विषयक सुन्दर विवेचन को लिए हए, न्यायाचार्य पं दरबारीलालजी के हिन्दी अनुवाद से युक्त, सजिल्द । ६.०० स्वयम्भू स्तोत्र : समन्तभद्र भारती का पूर्व प्रग्य, मुख्तार श्री जुगलकिशोरजी के हिन्दी अनुवाद तथा महत्व की गवेषणापूर्ण प्रस्तावना से सुशोभित । स्कृतिविद्या : स्वामी समन्तभद्र की मनोखी कृति, पापों के जीतने की कला, मटीक, मानुवाद मोर थी जुगल. किशोर मुस्तार की महत्व की प्रस्तावनादि से मल कृत, सुन्दर, जिल्द-सहित । अध्यात्मकमलमासण : पंचाध्यायीकार कवि राजमल की सुन्दर प्राध्यात्मिक रचना, हिन्दी-अनुवाद-सहित । पश्यनुशासन : तत्त्वज्ञान से परिपूर्ण, समन्तभद्र की असाधारण कृति, जिसका प्रभी तक हिन्दी अनुवाद नही हुमा था । मुस्तार श्री के हिन्दी अनुवाद और प्रस्तावनादि से अलकृत, सजिल्द । ... १.२५ समीचीन धर्मशास्त्र : स्वामी समन्तभद्र का गृहस्थाचार-विषयक प्रत्युत्तम प्राचीन ग्रन्थ, मुख्तार श्रीजुगलकिशोर जी के विवेचनात्मक हिन्दी भाष्य और गवेषणात्मक प्रस्तावना से युक्त, सजिल्द । .. ३९० मप्राप-प्रशस्ति संग्रह, भाग १: संस्कृत और प्राकृत के १७१ अप्रकाशित ग्रन्थो की प्रशस्तियो का मगलाचरण सहित अपूर्व संग्रह, उपयोगी ११ परिशिष्टों मोर पं० परमानन्द शास्त्रो की इतिहास-विषयक साहित्य - परिचयात्मक प्रस्तावना से अलंकृत, सजिल्द । ... समाधितन्त्र और इस्टोपदेश : अध्यात्मकृति, प० परमानन्द शास्त्री की हिन्दी टीका सहित पावणबेलगोल और दमिण के अन्य जैन तीर्थ : श्री राजकृष्ण जैन .... १.२५ मध्यात्म रहस्य :पं. माशाधर की सुन्दर कृति, मुख्तारधी के हिन्दी अनुवाद सहित । जनपम्प-प्रशस्ति संग्रह, भाग २: अपभ्रंश के १२२ अप्रकाशित ग्रन्पो की प्रशस्तियो का महत्वपूर्ण सह। पचपन। प्रन्थकारों के ऐतिहासिक ग्रंथ-परिचय पोर परिशिष्टों सहित । स. प. परमानन्द शास्त्री। मजिल्द। १२.०० ग्याय-बीपिका : मा. अभिनव धर्मभूषण की कृति का प्रो०० दरबारीलानजी न्यायाचा द्वारा स• अनु। ७.०० कम साहित्य और इतिहास पर विशर प्रकाश : पृष्ठ सल्या ७४, सजिल्द । कसायपाहुमसुत्त : मूल अन्य की रचना माज से दो हजार वर्ष पूर्व श्री गुणधराचार्य ने की, जिस पर श्री पतिवृषभाचार्य ने पन्द्रह सौ वर्ष पूर्व छह हजार श्लोक प्रमाण चूणिसूत्र लिखे । सम्पादक प हीरालालजी सिद्धान्त-शास्त्री। उपयोगी परिशिष्टो पोर हिन्दी अनुवाद के साथ बड़े साइज के १००० से भी अधिक पृष्ठों में। पुष्ट कागज और कपड़े की पक्की जिल्द । ... २०.०० Reality : मा. पूज्यपाद की सर्वार्थसिद्धि का अंग्रेजी में अनुवाद । बडे प्राकार के ३०० पृ., पक्की जिल्द शंन निवाब-रत्नावली : श्री मिलापचन्द्र तथा श्री रतनलाल कटारिया ध्यानशतक (ध्यानस्तव सहित) : संपादक पं. बालचन्द्र सिद्धान्त-शास्त्री १२-०० भावक धर्म संहिता : श्री बरयावसिंह सोषिया अन लमणावली (तीन भागों में): (तृतीय भाग मुद्रणाधीन) प्रथम भाग २५.००; द्वितीय भाग २५.०० Jain Bibliography (Universal Encyclopaedia of Jain References) (Pages 250C) (Under print) प्रकाशक-बीर सेवा मन्दिर के लिए रूपाणी प्रिटिंग हाउस, दरियागज, नई दिल्ली-२ से मुद्रित। Page #47 -------------------------------------------------------------------------- ________________ त्रैमासिक शोध-पत्रिका अनेकान्त बर्ष ३२ : किरण ३.४ जुलाई-रितम्बर १९७९ विषयानुन मणिका सम्पावन-मण्डल हा.ज्योतिप्रसासन क्र. विषय डा०प्रेमसागर जैन । १. महावीर स्तवन श्री गोकुलप्रसाद जैन २. श्रमण परम्परा-सिद्धान्ताचार्य प० कैलापा चन्द्र जैन शास्त्री, वाराणसी ३. ध्यान विषयक महत्त्वपूर्ण जैन ग्रंय ध्यान शतक मोर उसके विविध संस्करण -श्री मगर चन्द्र नाहाटा, वीकानेर ४. जैन वाङ्गमय का संगीत पक्ष -बी प्यारेलाल श्रीमाल 'सरस पंडित' ५ प्राकृत का बृहद्रव्य-संग्रह और उसकी महत्ता -पं० नाथूराम जैन 'डोंगरीय', इन्दौर सम्पादक ६. महावीर सवत् : भारत का सर्वप्राचीन संवत् ५७ श्री गोकुलप्रसाद जैन एम.ए., एल-एल. बी., ७. भगवान महावीर के विचार तथा कृतित्व : ५७ साहित्यरत्न समस्त विश्व के लिए अनुपम धरोहर - डा. रामकुमार वर्मा ८. जैनाचार्य और प्रायुर्वेद-श्री राज कुमार जैन ५६ ..बद्ध और महावीर-डा. देव महाय त्रिवेद ६२ ११. सांख्य-दर्शन मे सृष्टि-निर्माण : तुलनात्मक विवेचन -सुश्री मंज सुराना, मामरा ११. जैन धर्म की प्रासंगिकता-डा. निजामुद्दीन ६७ वार्षिक मूल्य ६) रुपये ५) पप | १२. जिनागम में प्रतिपादित उपचरित कथन का इस अंक का मूल्य: । रहस्य -श्री महाचन्द्र जैन, इम्फाल १पये ५०पैसे (पासाम) ६५ একহিক वीर सेवा मन्दिर, २१ दरियागंज, नई दिल्ली-२ Page #48 -------------------------------------------------------------------------- ________________ वीर-सेवा-मन्दिर के मनस्वो महासचिव श्री महेन्द्र सेन जैनी का देहावसान साहित्य-जगत् एवं समाज की प्रपूरणीय क्षति अत्यन्त खेद है कि वीर-सेवा-मन्दिर, दिल्ली के उदारचेता महासचिव श्री महेन्द्र सेन जैनी का दीर्घकालीन रुग्णता के पश्चात् ४ सितम्बर, १९७६ को स्वर्गवास हो गया। वे प्रत्यात धर्मात्मा, साहित्य-प्रेमी, समाजसेवी एव अध्यवसायी थे। उनके निधन से साहित्य जगत् पौर समाज की जो भारी क्षति हुई है, उसकी प्रतिपूर्ति दुर्लभ है। श्री जैनी का जन्म 20 जनवरी, १९२० को लखनऊ मे हुमा था। उच्च शिक्षा संप्राप्ति के पश्चात् मापने सक्रिय जीवन में प्रवेश किया तथा पूर्ण लगन और अनवरत अध्यवसायपूर्वक प्रापने विभिन्न कार्य-क्षेत्रों मे पूर्ण सफलता प्राप्त की एवं ऊंचे-से-ऊंचे पदों को सशोभित किया। पाप सरिता एव कारवा नामक पत्रिकामों में सेक्रेटरी रहे और तत्पश्चात भारत सरकार के "मंनिक समाचार" नामक पत्र में मापने विज्ञापन प्रबन्धक के पद पर इलाघनीय कार्य किया। तदनन्तर प्रापने अनेक वर्ष पर्यन्त भारत सरकार के प्रकाशन विभाग (सूचना श्री महेन्द्र सेन जैनी एव प्रसारण मत्रालय) मे महायक व्यापार प्रबन्धक और तदुपरान्त व्या. पार प्रबन्धक जसे गरिमापूर्ण पदो पर कार्य किया। इसके बाद प्रापने विधि, न्याय भोर कम्पनी कार्य मत्रालय के विधि-साहित्य-प्रकाशन मे प्रकाशन एव विक्रय प्रबन्धक के महत्वपूर्ण पद पर कार्य किया पौर वही से १ फरवरी, १९७८ को प्राप सेवा-निवृत्त हुए। सामाजिक क्षेत्र में भी श्री जनीग्रनेक महत्त्वपूर्ण सस्थानों से सम्बद्ध रहकर महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। पाप जैन सभा, दरियागज, दिल्ली के अनेक मत्र पर्यन्त मत्री रहे तथा मापने लगभग १० वर्ष पर्यन्त जन हायर सेकण्डरी स्कल, दरियागज, दिल्ली के मत्री एवं प्रबन्धक के उत्तरदायित्वपूर्ण पदों पर रहकर सराहनीय कार्य किया। तदुपरान्त प्राप जन ममाज की एकमात्र शोधपीठ वीर-सेवा-मन्दिर के अनेक सत्र पर्यन्त महासचिव रहे और जीवन के अन्तिम क्षण तक भी पाप इस महत्वशाली कार्य का निर्वाह करते रहे। माहित्य-साधना के क्षेत्र में भी प्रापने अनेक सराह्म कार्य किए। मापने विविध सांस्कृतिक, सामाजिक, सैद्धान्तिक प्रादि विषयो पर महत्वपूर्ण लेख लिखे जो समय-समय पर विभिन्न पत्रलोकप्रिय पत्र-पत्रिकामो में प्रकाशित होते रहे। आपने अनेक पुस्तको का प्रणयन एवं सम्पादन भी किया जो प्रापके ज्ञान-गाम्भीर्य और विश्लेषक बुद्धि के परिचायक है। मापने भारत सरकार द्वारा प्रकाशित “हिन्दी विघि समाचार" नामक पत्र के अनेक वर्ष तक सम्पादक रह कर सरकारी क्षेत्र में हिन्दी के प्रचार और प्रमार में प्रशसनीय योगदान किया। श्री जैन के विविध सेवाकार्यों का पावन पुण्य करते हुए शोकाकुल वीर-सेवा मन्दिर एव अनेकान्त परिवार भगवान जिनेन्द्र से प्रार्थना करता है कि दिवंगत प्रात्मा को मुगति तथा शान्ति प्राप्त हो। पौर उनके शोकातं परिवार को यह दारुण दुख सहन करने का बल और घेर्य प्राप्त हो। Page #49 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रोम् प्रहम् ঠাকান परमागमस्य बीजं निषिद्धजात्यन्धसिन्धुरविधानम् । सकलनयविलसितानां विरोधमथनं नमाम्यनेकान्तम् ॥ वर्ष ३२ किरण ३ ओर ४ वीर-सेवा-मन्दिर, २१ दरियागंज, नई दिल्ली-२ वीर-निर्वाण मवन् २५०५, वि० स० २०३५ जुलाई-दिसम्बर १६७६ । महावीर स्तवन णमो जिणाणं वड्ढमाणं. जिय भयाणं । महावीरा मगलम्, महावीरा लोगुत्तमा, महावीरे सरणं गच्छामि । __णिस्मंसयकरो महावीरो जिणुत्तमो। रागदोस-भयादोदो धम्म-तीस्थस्स कारो॥ इक्कोवि णमुक्कारो जिणवर वसहस्स बध्धमाणस्स । संसार सागराम्रो तारेइ नरं वा नारि वा ।। सव्वण सोमदंसण अपुणभव भवियजण-मणाणन्द । जय चिन्तामणि जगयगुरू जय जय जिण वीर प्रकलक।। -प्रज्ञात प्रातिथ्यं रूपमासरं महावीरस्य नग्नहु । रूपमुपसदामेतत्तिस्रो रात्रोः सुरासुता ।। ___-यजुर्वेद, अ. १६, मं. १४ निगठो प्रावुसो नातपुत्तो सव्वजु सव्वदरस्सी। अपरिसेसे गाण दस्संण परिजानाति ।। -मझिमनिकाय, भा-१ भयादिक ममम्त विकार भावो के विजेता वर्द्धमान जिनेन्द्र को नमस्कार हो; भगवान महावीर मगल स्वरूपी है, लोकोत्तम है, उन्ही को शरण मुझे प्राप्त हो। संशयो के निर्मल करने मे वीर, जिनोत्तम भगवान महावीर राग द्वेष भय प्रादि विवारी में रहित हैप्रतीत है; वे धर्मतीर्थ के कर्ता या संस्थापक है। जिनेन्द्र भगवान ऋषभदेव (प्रथम तीर्थकर) अथवा बर्द्धमान महावीर (प्रतिम तीर्थकर) को एक बार भी भावपूर्वक नमस्कार करने से नर हो या नारी, ममार सागर से निर जात है -पार हो जाते है। सर्वज्ञ, सोमदर्शन, अपुनर्भव, भव्य जन-मनान्द, चिन्तामणि, जगद्गुरु, अकलक वीर जिनन्द्र की जय हो, जय हो, जय हो ! प्रतिथि स्वरूप पूज्य मासोपवासी नग्न (दिगम्बर, महावीर की उपासना करो, जिसमे (मशय-विपर्ययअनध्यवसाय रूप) तीन प्रज्ञान, प्रथवा (धन-शरीर-विद्या रूप) मदत्रय की उत्पत्ति नहीं होती। पायुष्मान निर्गन्ध ज्ञातृपुत्र (भगवान महावीर) सर्वज्ञ और सब दर्शी है । अपने अपरिशेष (पनन्त ) ज्ञानदर्शन द्वारा वह सब कुछ जानते-देखते है । 000 Page #50 -------------------------------------------------------------------------- ________________ श्रमण परम्परा O सिद्धान्ताचार्य पं. कैलाशचन्द जैन शास्त्री, वाराणसी भगवान महावीर का जन्म इमी बिहार प्रदेश में हमा भाग माना जाता है। इसी से विद्वान उसका रचना काल था। इसी प्रदेश में कठोर तपस्या के द्वारा उन्होने केवल- पाठवी शताब्दी ईस्वी पूर्व मानते है । यही समय भगवान झान प्राप्त किया था। इसी प्रदेश के बिपुलाचल पर महावीर के पूर्वज तीर्थर पार्श्वनाथ का है जो काशी उनको प्रथम धर्म देशना हुई थी और जिस लोक नगरी में जन्मे थे । उनके जीवन की घटना है कि एक दिन भाषा में हुई थी उसका नाम भी इसी प्रदेश के नाम पर वह गंगा के तट पर गये । वहा कुछ तापस पञ्चाग्नि तप प्रघंमागधी है और इसी प्रदेश से उन्होंने निर्वाण लाभ करते थे। वहदारक उपनिषद (४.३-१२) मे ही हम किया। इस तरह यह प्रदेश भगवान महावीर के जीवन तापसो और श्रमणो का निदेश मात्र पाते है । याज्ञवल्लम के साथ इतना समम्बद्ध है कि न तो इस प्रदेश के बिना जनक से प्रात्मा का स्वरूप बतलातेहा कहते है कि इस भगवान महावीर को देखा जा सकता है और न महावीर मुषप्तावस्था में श्रमण प्रश्रमण और तापम प्रतापम हो के बिना इम प्रदेश की हो गरिमा का अनान किया जा जाता है। सकता है। शतपथ ब्राह्मण में ही तप से विश्व की उत्पत्ति तीर्थकर तो प्रनेकों हा किन्तु जिनके पांचो कल्याणक बतलाई है। प्रतिदिन अग्निहोत्र करना एक प्रघान कर्म अपने जन्म प्रदेश में ही हए ऐसे एकाको तीर्थकर महावीर था। इसकी उत्पत्ति की कथा इस प्रकार बनलाई हैही है। सर्वम्व त्याग कर देने पर भी मानो वह अपनी "प्रारम्भ में प्रजापति एकाकी था । उसको अनेक होन की इम जन्ममि का मोह नही त्याग मके थे। मानाम इच्छा हुई। उमने तपस्या की। उसके मुख से अग्नि उत्पन्न मोर मातृभाषा सचमुच में माता से भी बढ़ कर है। हुई। चूकि सब देवताओ में अग्नि प्रथम उत्पन्न हुई मनीषियों का विचार है कि प्रङ्ग, मगध, काशी, इमी से उसे अग्नि करते है। उसका यर्थाथ नाम अनि है। कासल और विदेह में वैदिक सभ्यता का प्रवेश बहत काल मुख से उत्पन्न होने के कारण अग्नि का भक्षक होना पश्चात् हुअा था। शत ब्रा (१-४-१) में लिखा है कि स्वाभाविक था । किन्नु उस समय पृथ्वी पर कुछ भी नहीं 'सरस्वती नदी से अग्नि ने पूर्व की ओर प्रयाण किया। था। अत: प्रजापति को चिन्ता हई। तब उसने अपनी उसके पीछे विदेव माधव मोर गोतम राहुगण थे । सबको वाणी को पाहुति देकर अपनी रक्षा की। जब वह मरा जलाती और मार्ग की नदियो को सुखाती हई वह अग्नि तो उसे अग्नि पर रखा गया। कितु अग्नि ने उसके शरीर सदानीग के तट पर पहुंची। उसे वह नही जला सकी: को ही जलाया । अतः प्रत्येक व्यक्ति को अग्निहोग करना तब माधव ने अग्नि से पूछा ' मैं कहा रह" तो उसने उतर चाहिए।' यदि नया जीवन प्राप्त करना चाहते हो तो दिया कि "तेरा निवास इस नदी के पूरब में हो" । अब अग्नि होत्र करो। तक भी यह नदी कोसलों और विदेहों की सोमा है।' ऋग्वेद का पहला मन्त्र है 'अग्निभीडे पुरोहितम् । इसे वैदिक पायर्यों के सरस्वतो नदी तट से सदानीरा यज्ञस्य देवमृस्विजम् । होतार रत्नधातमम् । अग्नि देवो के के तट तक बढ़ने के रूप मे लिया जाता है। बहुत समर पुरोहित है । पुरोहित का भयं है पागे रखा हुमा । प्रग्नि तक यह नदी पार्यो के संसार की सीमा मानी जाती थी। में आहुति देकर हो देवों तुष्ट किया जा सकता है। इसके मागे यथेच्छ उनका माना जाना था ? ब्राह्मण ग्रयो के काल में यज्ञों का प्राधान्य रहा । वहदारण्यक उपनिषद् शतपथ ब्रह्मग का प्रन्तित उनके पश्चात प्रारण्यो का समय प्राता है। देवता विशेष Page #51 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धमण परम्पराकी प्राचीनता के उद्देश्य से द्रव्य का त्याग ही यज्ञ है यह मारण्यकों को उपनयन का विधान है किन्तु चार प्राश्रमों का उल्लेख मान्य नही है। हाह्मण ग्रंथो का सर्वोच्च लक्ष्य स्वर्ग था छा० उप० में है। बाल्मीकि रामायण में किसी सन्यासी पौर उमकी प्राप्ति का मार्ग था यज्ञ । किन्तु प्रारण्यको के दर्शन नहीं होते, सर्वत्र वानप्रस्थ मिलते हैं। मैं यह बात नही है । तैत्तिरीय पारण्यक में ही प्रथम बार लोकमान्य तिलक ने अपने गीता रहस्य में लिखा श्रमण शब्द तपस्वी के अर्थ में प्रागा है। है.वेद संहिता और ब्राह्मणों में सन्यास को प्रावश्यक नहीं ऋग्वेद के सकलयिता ऋषि प्ररण्यवासी ऋषियो से कहा। उल्टे जैमिनि ने वेदों का यही स्पष्ट मत बतलाया भिन्न थे। वे अरण्य मे नही रहते थे। वैदिक माहित्य में है कि गहस्थाश्रम में रहने से ही मोक्ष मिलता है (देखो परण्य शब्द के जो अर्थ पाये जाते है उनमे इस पर प्रकाश वेदान्तसूत्र ३,४,१७,२०) मोर उनका यह कथन कुछ पडता है कि ऋग्वेद में गांव के बाहर की बिना जुती जमोन निराधार भी नही है क्योकि कर्मकाण्ड के इस प्राचीन के अर्थ में अरण्य शब्द का प्रयोग हुमा है। शतपथ ब्राह्मण मार्ग को गौण मानने का प्रारम्भ उयनिषदो में ही पहले मे (५-३-३५) लिखा है 'परण्य मे चोर बसते है।' पहल देखा जाता है। उपनिषत्काल में ही यह मत अमल वहदा 'उप' (५.११) में लिखा है "मर्दे को प्ररण्य में ल में प्राने लगा कि मोक्ष पाने के लिए ज्ञान के पश्चात जाते है". किन्तु छा० उप. (८१५।३) मे लिखा है कि अरण्य वैराग्य से कर्म सन्यास करना चाहिए।' इत्यादि में तपस्वी जन निवास करते है। किन्तु प्राचीन उपनिषदो में वही पुरानी ध्वनि मिलती विद्वानो का मत है कि जब वैदिक आर्य पूरब की पोर बढे तो यज्ञ पीछे रह गये और यज्ञ का स्थान तप ने ले है-शतपथ ब्रा० (१३, ४.१.१) में लिखा है- एतद् वं लिया। किन्तु तप को स्वीकार करने पर भी प्रायं देव जरामयं मत्रं यद अग्निहोत्रम्' अर्थात जब तक जियो अग्नि प्रग्नि होत्र करो। ईशा-उप में कहा है 'कुर्वन्नेवेह तामो के पुरोहित अग्नि को नहीं छोड़ सके, प्रतः पञ्चाग्नि तप प्रवर्तित हुना। भगवान पार्श्वनाथ को गंगा के तट कर्माणि जिजीवेपत शत समाः' अर्थात् एक मनुष्य को पर पञ्चाग्नि तप तपने वाले ऐसे ही तपस्वी मिले थे। अपने जीवन भर कर्म करते हुए सौ वर्ष तक जाने की चार प्राश्रमो की व्यवस्था भो चिन्त्य है। ब्राह्मण इच्छा करनी चाहिए । बौघायन प्रौर प्रापस्तम्ब सूत्री में को ब्रह्मचारी और गहस्थ के रूप में जीवन बिताने के बाद भी गृहस्थाश्रम को ही मुख्य कहा है। स्मृतियो की भी सन्यासी हो जाना चाहिए यह नियम है वैदिक साहित्य में कुछ ऐसी ही स्थिति है। मनुस्मृति में सन्यास पाश्रम का नहीं मिलता । पौराणिक परम्परा के अनुसार राज्य त्याग कथन करके भी अन्य प्राश्रमो की अपेक्षा गृहस्थाश्रम को कर वन में चले जाने की प्रथा क्षत्रियो में प्रचचित थी। ही श्रेष्ठ कहा है। कवि-कुलगुरु कालिदास ने रघुवंश में रघुपो का इसके विपरीत जैन धर्म ले अनुमार, श्रमण-धर्म को वर्णन करते हुए कहा है अपनाये बिना मोक्ष की प्राप्ति सम्भव नही है। गृहस्थ शैशवेऽभ्यस्तविद्याना यौवने विषयषिणाम् । धर्म मुनि का लघुरूप है और जो मुनि घम को पालन वार्धक्ये मुनिवृत्तीना योगेनान्ते तनु त्यजाम् ॥ करने में असमर्थ होता है वह गृहस्थ धर्म का पालन प्रर्थात् शैशवकाल में विद्याभ्यास करते है, यौवन में करता है । विषय-भोग भोगते है, वृद्धावस्था में मनिवृत्ति प्रर्थात् वान- माचार्यकल्प प्राशाघर ने कहा हैप्रस्थाश्रम में रहते है और अन्त में योग के द्वारा शरीर त्याज्यानजनं विषयान् पश्यतोपि जिनाज्ञया । त्याग करते हैं। मोहात्यक्सुमशक्तस्य गृहिधर्मोऽनुमन्यते ॥ गौतम धर्म सूत्र (0/%) में एक प्राचीन प्राचार्य मत जो जिन देव के उपवेशानुसार मसार के विषयों को दिया है कि वेदो को तो एक गृहस्थाश्रम हो मान्य है। त्याज्य जानते हुए भी मोहवश छोडन मे असमर्थ हे उसे अथर्ववेद मौर ब्राह्मण ग्रंथो में ब्रह्मचर्याश्रम का विशेषतः गृहस्थ धर्म का पालन करने की अनुमति दी जाती है। पणाम् Page #52 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ४४, वर्ष ३२, कि.३-४ अनेकान्त जैन धर्म के पांच व्रत प्रसिद्ध है : अहिमा, सत्य, प्रचौर्य, प्राणीमात्र के एक स्वामी थे। उन्होंने प्राकाश सहित पृथ्वी भनेकान्त पौर अपरिग्रह । इनका सर्व देश पालन श्रमण करते को धारण किया। हैं और एक-देश गृहस्थ पालता है । प्रतः श्रमणों के व्रतों उघर महाभारत, शान्तिपर्व अ० ३४६ मे हिरण्यगर्भ को महावत और गृहस्थो के व्रतो को प्रणुव्रत कहते हैं। को योग का वक्ता कहा हैभगवान ऋषभदेव से लेकर महावीर पर्यम्त चौबीस "हिरण्यगर्भः योगस्य वक्ता नान्यः पुरातनः ।" तीपंडों ने गहवास छोड़कर श्रमण धर्म को मनोकार प्रर्यात हिरण्यगर्भ योग-मार्ग के प्रवर्तक है अन्य कोई उनसे किया था। प्राचीन नही है, तो क्या ऋषम ही तो हिरण्यगर्भ नही है ? श्रीमदभागवत में ऋपभदेव का जो चित्रण है वह भी भगवान ऋषभ इक्ष्वाकुवंगी थे। इक्ष्वाकु मूलतः पुरु जैन मान्यता का ही समर्थन करता है । उसमे उनकी गजामा को एक परम्परा थो। यद्यपि ऋग्वेद मे पुरुषो को तपस्या का वर्णन करते हुए कहा है -उम समय के बल सरस्वती के तट पर बनाया है। किन्तु नतर इवाकूमों शरीर मात्र उमके पास था और वे दिगम्बर बेश मे नग्न का सम्बन्ध प्रयोध्या में था। जैन शास्त्रो में अयोध्था का विचरण करत थे। मोन मे रहने थे । काई डगये मार, ही ऋषभदव का जन्म स्थान माना गया है। उधर कार थके, पत्थर फेक, मूत्र-विष्टा फकता इन मबका साम्पायन धोत्र मुत्र में हिरण्यगम को कौशल्य कहा है। भार ध्यान नही देते थे। यह शरीर असत् पदार्थों का घर । अयोध्या का काशल देश में कहा है । अत: कोशल देश में मा समझकर पहकार-ममकार का त्यान करक प्रकल जन्म लन सपनदेव का कोशध्य कहा जा सकता है। श्रमण करते थे। उनका कामदेव के समान सुन्दर शगर इस तरह कयानक वक्ता हिरण्यगम के साथ योगी ऋपभ मलिन हो गया था, प्रादि । की एकरूपता अन्वेषणीय है। इसी में यह भी कहा है कि वातरशन श्रमणों के धर्म का धर्म का मिन्धु घाटी क उत्खनन के सहयोगी रामप्रसाद चदा ... उपदेश देने के लिए उनका घवतार हुपा। जन्महीन ने अपने तक लेख में लिया ने अपने एक लेख में लिखा है-'माहन जोदड़ो से प्राप्त ऋषभदेव जी का अनुकरण करना तो दूर अनुकरण करने लाल पापाण की मूति, निमे पुजारी की मनि समझ लिया का मनारथ भी कोई अन्य योगो नही कर सकता, क्यो कि गया है, मुझे एक योगी की मूर्ति प्रतीत होती है पोर वह मा जिस योगवल को ऋषभ जी ने प्रसार समझकर ग्रहण नहीं मझ दम निस्कर्ष पर पहचने के लिए प्रेरित करती है कि किया. अन्य योगी उसी के पाने की चेष्टाय करने है। मिन्धुपाटी में उस समय योगाभ्यास होता था और योगी जैन ग्रन्थो में ऋषभ को हिरण्य गर्भ भी कहा है क्यो की मुद्रा में मूर्तियां पूजी जाती थी। मोहे-जोदडो पोर कि उन के गर्भ में पाने पर माकाश से स्वण को वर्षा हुई हरप्पा से प्राप्त मोहरे, जिन पर मनुष्य रूप में देवो की थी। यथा प्राकृति प्रकित है, मेरे इस निष्कर्ष को प्रमाणित करती है। 'गद्रियम्य जस्स उ हिरण्णवुटी सकवणापडिया। मिन्धुघाटी में प्रा मोहरो पर बैठी अवस्था मे तेण हिरणगम्भो जयम्मि उवगिज्जए उसभी ।। अकित मूर्तियाँ हो योग को मुद्रा मे नहीं है किन्तु खडी प्रर्थात जिसके गर्भ में पाने पर सुवर्ण की वष्टि हुई अवस्था में अकित मूतिया भी योग की कायोत्सर्ग मृद्रा को उसी में ऋषभ जगत मे हिरण्यगर्भ कहलाये। बतलाती है। मथग म्यूजियम मे दूसरी शती की कायोत्सर्ग ऋग्वेद मं० १०, मूत्र १२१ को पहनी ऋचा इम। में स्थित एक ऋषभदेव जिन की मूर्ति है। इस मूर्ति की प्रकार है शैली मिन्धु से प्राप्त मोहरो पर अक्ति खड़ी हुई देव 'हिरण्यगर्भ समवन्ताग्रे भूतस्य जातः पतिरेक प्रासीन । मूर्तियो को गनी से बिल्कुल मिलती है। सदाचार पृथिवी द्या मुतेमा कस्मै देवाय हविषा विधेम ॥ ऋषभ या वृषभ का प्रथं बल होता है और ऋषभदेव इस में कहा गया है कि पहले हिरण्यगर्भ हुए। वह तीर्थदर का चिह्न बल है। मोहर नं ३ से ५ तक के ऊपर Page #53 -------------------------------------------------------------------------- ________________ श्रमण परम्परा की प्राचीनता ४५ अकित देवमूर्तियो के साथ बल भी अकित है जो ऋषभ का उक्त तथ्यों के प्रकाश में जैन धर्म के प्रथम तीर्थडुर पूर्णरूप हो सकता है। योगी ऋषभ देव का स्थिति पुरातत्वज्ञो के लिए अन्वेषण इसी पर डा. राधाकुमद मकर्जी ने अपनी हिन्दू का रुचिकर विषय हो सकती है, और उनकी स्थिति सभ्यता नामक पुस्तक मे लिखा है - 'श्री चन्दा ने ६ प्रन्य स्पष्ट होने पर श्रमण परम्परा के उदगम पर भी प्रकाश महरो पर खड़ी हई मूर्तियो की भोर भी पान दिलाया पड सकता है। श्रीमद् भागवत में जो 'वातरशनना श्रमणाहै । फलक १२ पोर ११८ प्राकृति ७ (माशलकृति, मोहे नामषीणा' प्रादि लिखा है ये शब्द अनुसन्धान की दृष्टि से जोदडो) कोयत्म नामक योगामन मे बड हये देवताप्रो महत्व के है। को सूचित करती है। यह मद्रा जैन योगियों की तपश्चर्या नतिय प्रार. में भी इसी प्रकार कहा है-'बात मे विशेष रूप से मिलती है, जैसे मथुरा मग्रहालय में रशनाह ऋषयः श्रमणा उध्वंपन्थिनो वभुवः' (२-७)। स्थापित तीर्थदर श्री ऋषभदेव की मूर्ति मे ऋषभ का ऋग्वेद (१०-१३६-२) मे भी मुनियो के जिए वातअर्थ है बैल जो प्रादिनाथ का लक्षण है। महर सख्या रशना कहा है । अथर्ववेद (२।५।३) मे इन्द्र के द्वारा एफ० जी० एच. फलक दो पर अकित देवमूर्ति मे एक यतियो का वध किये जाने को कथा पाती है। यह कथा बल ही बना है। मम्भव है यह ऋषभ का ही पूर्वरूप हो। एतेश्य प्रा० (७-२८) पोर पञ्चविमा० (१३१४१७, यदि ऐमा हो तो शैवधर्म की तरह जैन धर्म का मून भी ८१४४) मे भी प्राई है। सायण ने अपने भाष्य में ताम्रयुगीन सिन्धु सभ्यता नक चला जाना है। (हि. स० लिखा है२३-२४) यतिनं यतयो नाम नियम घोला प्रामुर्या प्रजा ।... यद्वात्र यति शब्देन वेदान्तायं विचार शन्या: परिव्राजका विवक्षिता । (अर्थव०), अर्थात् यति माने प्रत नियम का 'अनेकान्त' के स्वामित्व सम्बन्धी विवरण पालन करने वाले असुर लोग । अथवा यहाँ प्रति शब्द से वेदान्न के विचार से शन्य परिव्राजक लेना चाहिए । प्रकाशन स्थान-वीर सेवामन्दिर, २१ दरियागज, नई दिल्ली पंचविश ब्राह्मण की व्याख्या में सायण ने एक स्थान मद्रक-प्रकाशन-वीर सेवा मन्दिर के निमिन पर यति का अर्थ 'यजनविरोधी जना:' किया है अर्थात् इन्द्र प्रकाशन अवधि-मामिक श्री प्रोमप्रकाश जैन ने जिन यतियो को मारा वे मव यज्ञयागादि विरोधी पौर राष्ट्रि कता-भारतीप पता-२३, दरियागज दिल्ली-२ वेद विरुद्ध व्रतनिवयादि का पालन करने वाले थे। । ऋग्वेद के वातरशन मनि, तं० प्रा० के वातरशन मम्पादक- श्री गोकुलप्रमाद जैन श्रमण भिन्न प्रतीत नही होते। वे ही सम्भवतः यति भी राष्ट्रिकता-भारतीय पता-वीर सेवा मन्दिर २१, हो। श्रीमद भागवत में उन्ही वातरशन थमणों के धर्म के दरियागज नई दिल्ल-२ माथ ऋषभावतार को जोडा गया है। यह प्राकस्मिक | स्वामित्व धोर मेवा मन्दिर, २१, दरियागंज, नई दिल्ली-२ प्रतीत नही होता। इन सबके प्रकाश में श्रमण परम्परा की मैं, मोमप्रकाश जैन, एतद्वारा घोषित करता हूं कि प्राचीनता के दर्शन होते है। उमी परम्परा को भगवान मेरी पूर्ण जानकारी एवं विश्वास के अनुसार उपर्युक्त महावीर ने प्रपनाकर प्राज से २५०५ वर्ष पहले पावा से विरण सत्य है। निर्वाण लाभ किया था। हैम उनकी उम शुद्ध-बुद्ध मात्मा -प्रोमप्रकाश जैन, प्रकाशक को नमन करके अपनी श्रद्धाजलि अर्पित करते है । - Page #54 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ध्यान विषयक महत्त्वपूर्ण जैनग्रंथ ध्यानशतक और उसके विविध संस्करण श्री अगरचन्द नाहटा, बीकानेर [यह द्यावश्यक नहीं कि सम्पादन मण्डल विद्वान् लेखक के सभी विचारों से सहमत हो सम्पादक ] जंन बागमो से यह तो विदित है कि भ० महावीर की साधना का मुख्य केन्द्र 'ध्यान' था । साढ़े बारह वर्षों के साधना काल मे उन्होंने अधिक से अधिक समय ध्यान श्रोर मौन मे बिताया था । उन्होने ध्यान करते-करते ही कैवल्य ज्ञान प्राप्त किया था और अपने साधु-साध्वियों के लिए, पाठ प्रहर में से चार प्रहर स्वाध्याय, दो प्रहर ध्यान, एक प्रहर निद्रा, एक प्रहर बाहार आदि शारीरिक मादि शारीरिक कार्यों के लिए निहित कार्यों के लिए निहित किए थे। ग्राम्यतरिक तप मे भी उन्होंने स्वाध्याय और ध्यान को तप में सम्मिलित किया है। छह भाववयकों मे भी कामोत्सर्ग-ध्यान नित्य करने को एक प्रावश्यक कार्य बतलाया गया है । खेद है भागे चलकर ध्यान की वह परम्परा जैन धर्म मे कम होती गई । बौद्ध धर्म मे आज भी ध्यान का एक स्वतन्त्र सम्प्रदाय विद्यमान है, जिसकी एक प्रक्रिया विपासना का प्रचार श्री सत्यनारायण जी गोयन्दका श्रभी भारत मे जगह-जगह कर रहे है एवं उससे लोगो को बडी शान्ति मिलती है । समय-समय पर ध्यान की साधना करने वाले कई जैन सन्त हुए हैं और कई लेखकों ने इस विषय पर छोटे-बड़े ग्रन्थ लिखे है। जहाँ तक मेरी जानकारी है, ध्यान विषयक प्राप्त प्रथो मे सबसे पहला प्रथ ध्यान शतक" है । इसका मूलनाम ध्यानाध्ययन है । प्राकृत भाषा की एक सो पाच गाथाओं का यह ग्रंथ है । इस पर ० हरिभद्रसूरिजी सक्षिप्त टीका संस्कृत में छप चुकी है पर हिन्दी-गुजराती मे इमी प्रथ का विवेचन प्रका शित न होने के कारण साधारण जनता के लिए यह सुलभ और सहज नहीं था। इधर छह-सात वर्ष के भीतर इस ग्रंथ के कई महत्वपूर्ण संस्करण प्रकाशित हो चुके है। उनको जानकारी इस लेख मे इसीलिए दे रहा " है कि इस विषय मे रुचि रखने वाले इन प्रकाशित सम्करणों को मगा का पूरा लाभ उठायें । to मान्यतानुसार इस ग्रन्थ के अन्त मे एक ऐसी गाधा मिलती है जिसमे ग्रन्थकर्ता का नाम जिनभद्र श्रमण पाया जाता है। इस नाम वाले प्राचार्य छठीसातवी शताब्दी में हो गये है, जिनके रचित विशेष भाष्य बहुत ही प्रसिद्ध ग्रन्थ है। इस ग्रंथ के महत्व के सम्बन्ध में विचारक विद्वान मुनि नथमलजी ने कहा है ' इस ग्रन्थ के पढने से लगता है कि इसके रचयिता जैन-ध्यान प्रणाली के विशेष ज्ञाता प्रौर पुरस्कर्ता थे । वे स्वय ध्यान के क्रियात्मक भोर संद्धांतिक पक्ष के पारगामी विद्वान् थे ध्यान के क्रियात्मक अनुभव के बिना, इतनी सूक्ष्ममा सेनपण होना सम्भव है। जब तक ध्यान सिद्ध नही होता तब तक उसके निरूपण मे वह सूक्ष्मता या सत्यता प्रकट नही हो सकती ।" यह ग्रन्थ अपने आप मे पूरा ग्रंथ है । इस पर यदि विस्तार से व्याख्या ग्रन्थ लिखा जाय तो ध्यान के क्षेत्र मे कई नये तथ्य प्रकट हो सकते है ।" १. मुनि खुल्लराज जी ने मुनि नयमलजी से प्रेरणा प्राप्त करके सन् १९७१ मे इसका हिन्दी एवं अग्रेजी में अनुवाद करके मूल सहित बाद साहित्य सथ, चुरू से सन् १९७२ मे प्रकाशित करवाया मूल्य १) है। उसके प्रारम्भ के 'दो शब्द' में उन्होंने इस ग्रन्थ के एक अन्य सस्करण की सूचना भी दी है। २. "मभी-अभी प्रो. एस. के. रामचन्द्र राव ने इस ग्रन्थ पर कार्य किया है और उसको मोरिएण्टल रिसर्व इस्टीट्यूट, मद्रास से छपाया भी है। उसमें ध्यान शतक' का मूल हरिभद्र वृत्ति, प्रग्रेजी - मनुवाद घोर सक्षिप्त (शेष पृष्ठ ४८ पर ) Page #55 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जैन वाङमय का संगीत पक्ष 0 श्री प्यारेलाल श्रीमाल 'सरस पंडित' भारतीय संगीत को सुदीर्घ परम्पग मे जन मनीषियो स्वभाव से स्वरों का सम्बन्ध, ग्राम मर्छनाएं, गीत के ने भी समय-समय पर योगदान किया है । मगीन सम्बन्धी गुण-दोष प्रादि का विवेचन दिया गया है। उदाहरणार्थजैन ग्रन्थो के प्रबलोकन से तत्कालीन गीत, वाद्य एब सज्ज तु अग्गजे पाए उरण रिसभ सरम । नत्य-पद्धति की पर्याप्त जानकारी प्राप्त होती है। प्राचीन कण्ठगएण गधारं मज्झ जिप्राए मझियम् ।। शास्त्रकारों से लेकर प्राज के स्तवन रचयितानो तक के मामाए पंचमं बूया दतोठेणय घेवयम् । जैन विद्वानो ने संगीत कला की प्रकथनीय सेवा की है। मद्धाणेपयेण सायं मरठाणा वियाहिया ॥ जैन परम्परा के अनुसार संगीत के प्राचीन प्राचार्यों अर्थात् षहज अग्रज है, उर स्थान से ऋषभ, कण्ठ से मे भरत तथा विशाखिल का स्थान सर्वोपरि है। भरत के गान्धार, मध्य से मध्यम, नासा से पचम एवं दन्तोष्ठ से शिष्य दत्तिल कोहल नथा विशान्विल नीनों ने मगीन गथों धवत का उद्भव होता है। की रचना की थी। तीनों प्रन्यो का नाम क्रमशः दत्तिलम्, सज्ज रवइ मयूरी ककुभी ऋषभं स्वरम् । कोहलियम् तथा विशाखिलम् था। 'विशाखिलयम्' ग्रन्थ हंसौ णदई गधार मज्झिम तु गवं लगा ॥ अप्राप्य है । प्रर्धमागधी (प्राकृन) मे रचित अटट कुमभसंभव काले कोइला पंचम सरम् । 'अनुयोगद्वारमृत्त' में पद्यबद्ध मगीत विषयक सामग्री छठं च सारसा कोचा साय सतमैगमन ।। उपलब्ध होनी है। यह मूत्र ईपा को पहनी शताब्दी की अर्थात् पड्ज ध्वनि मयूर की, ऋषभ कुकुट की, रचना मानी जाती है । जैन प्रागमों को रचना का क्रमिक गान्धार हस की, मध्यम गौनों को, पंचम कोकिल की, विकास भगवान महावीर स्वामी के निर्वाण के उपरान्त घेवत क्रौंच की तथा निपाद सारस पक्षी की ध्वनि है। ईसवी पूर्व चौथो शताब्दी से लेकर ईसा की प्रथम शताब्दी तक अनवरत रूप से चलता रहा तथा ईमा की छठी मूत्र के अनुसार गीत के छः दोष तथा पाठ गुण बताए शताब्दी तक वर्तमान स्वरूप को प्राप्तहा । 'अनुयोगद्वार- गए है-डर कर गाना, शीघ्र गाना, धीरे गाना, तालरहित सुत्त' के अतिरिक्त 'ठाणांगसुत', 'नन्दोमुत्त', 'कप्पसुत', माना, काक स्पर से गाना तथा नाक से गाना । पाठ गुण 'रायपमेणीय' प्रादि ऐमें जैन ग्रन्थ है जिनमें मगीत हैं-पूर्ण कला से गाना, राग को रजक बनाकर गाना, विषयक सामग्री प्रचर मावा में उपलब्ध होती है। अन्य स्वर विशेष से अलंकृत करके गाना, स्पष्ट गाना, अनुयोगारमुत्त' में स्वर, गोत, वाद्य, मूछना प्रादि प्राकोशविहीन स्वर में गाना, मधुर स्वर मे गाना, तालयुक्त का सूनबद्ध विवरण दिया गया है, किन्तु मर्छनामो के गाना तथा सुकुमार रोति में गाना। नामो का क्रम भरत के समान नही है। रायहसेणीय' के जैन प्रागमों के मार्वजनिक प्रचार हेतु 'चलित' नामक अनुसार, प्राचार्यों के तीन वगं माने जाते थे-कलायरिय गीतो का प्रयोग किया जाता था। जैन सूत्रों के पठन(कलाचार्य), सिपायरिय (शिल्पाचार्य) तथा वम्मायरिय पाठन हेतु वैदिक साहित्य की उदात्त, अनुदात्त एवं स्वरित (धर्माचार्य)। गायन, वादन पौर नत्य का उल्लेख इस वाली स्वरोच्चारण प्रणाली प्रयुक्त थी। 'रायपसेणीय' प्रकार मिलता है..... 'नद्रप्रीत वाईय सरगर्म पुक्खरगय तथा 'मनुयोगद्वार' के अतिरिक्त 'बियाहषण्णत्ति', समताल' (राय, पृ० १६७) । 'ठाणागसुत्त' मे स्वरोत्पत्ति, जीवाभिगम', 'चम्बहीबपण्पत्ति' प्रादि जैन ग्रन्थों में पशु-पक्षियों की ध्वनि से सप्तस्वरों का सम्बन्ध, मानव- तत्कालीन प्रचलित वाद्यों का उल्लेख मिलता है Page #56 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ४८, बर्ष ३२, कि०३.४ अनेकान्त 'ठाणांगसुत्त' के संस्कृत टीकाकार अभयदेव के अनुसार महस्व नरचन्द्रसूरि का सगीतज्ञ के रूप में इस ग्रंथ मे उल्लेख चौदह पुध ग्रथों में से एक था-~'पूर्वगतस्वरप्राभूत' । इसमें किया गया है । 'जंन साहित्य का बहद् इतिहास' के अनुइक्कीस मर्छनाम्रो तथा ग्यारह अलंकारों का वर्णन था। सार जैन ग्रन्थावली मे 'सगीत दीपक', 'संगीत रत्नावली' दिगम्बर जैन मुनि पभयचन्द्र के प्रशिष्य पावचन्द्र तथा 'सगीत सहपिंगल' का उल्लेख है। किन्तु इनके ने लगभग विक्रम संवत् १३८० में 'संगीतसमयसार' सम्बन्ध में विशेष जानकारी प्राप्त नहीं हुई है। वि० स० नामक महत्वपूर्ण संगीत आय की रचना की। यह ग्रन्य १४६० में माण्डव के सुल्तान मालमगाह के मन्त्रिमण्डल त्रिवेन्द्रम सस्कृत प्रथमाला में प्रकाशित हो चुका है। इसमे ने 'संगीन मण्डन' नामक ग्रन्थ की रचना की। ग्रन्थ उपनो प्रधिकरण है, जिनमे नाद, ध्वनि, स्थायो, राग, वाद्य, उपलब्ध है, किन्तु अप्रकाशित है। अभिनय, ताल प्रस्तार तथा प्राध्वयोग का सविस्तर कच्छ के महाराज लखपत (सं० १८१७ मे स्वर्गवास) उल्लेख है। इसी ससय प्राचार्य गजशेखरमूरि के शिष्य ने जैन यति भट्टारक कनककुशल व उनके शिष्य कुवरसुधाकलश ने 'मगीतोपनिषद्' नामक बृहत् ग्रन्थ की कुशल के सहयोस से 'बृजभाषा पाठशाला' स्थापित की रचना की, जो अनुपलब्ध है । किन्तु इसी लेखक की थी, जिसमें कई हिन्दी कवि तैयार हुए। कुबरकुशल विक्रम संवत १४०६ की रचना 'सगीतोपनिपत्मागेद्धार' संगीतशास्त्र के भी पण्डित थे। उनकी पाठ रचनाम्रो का उपलब्ध है, जो गायकवाड पोरिएण्टल सीरीज, बडौदा से परिचय 'बल्लभमूरि स्मृति-ग्रन्थ' मे शोधमनीषी श्री पगरप्रकाशित हो चुकी है। यह प्रति 'मगीतोपनिषद' की सार चन्द जी नाहटा ने दिया है । पाठवीं रचना 'रागमाला' है, रूप है तथा संगीत मकरन्द', 'सगीत पारिजात' जैसे जिममे राग-गगिनियो के स्वरूप तथा लक्षण दिये गये है। सगीत जगत् के मान्य ग्रन्थों से कही अधिक महत्वपूर्ण ऐसे और भी अनेक जैन ग्रन्थ हो सकते है, जिनमे है। गीत-प्रकाशन, ताल.प्रकाशन, रागादि प्रकाशन, वाद्य- सगीत विषयक महत्त्वपूर्ण सामग्री समाविष्ट है, किन्तु कई प्रकाशन नृत्यांग-प्रकाशन, तथा नृत्य-पद्धति-प्रकाशन, कालकवलित हो चुके है पोर कई शोध का विषय बने इस प्रकार इसके छह अध्याय ६१० इलोको मे निबद्ध है। हए हैं। १० ४६ का शेषाश] विवरण है। कही-कही उनके और मेरे द्वारा प्रस्तुत की है, पाठक स्त्रय समझ सकेंगे । पण्डित जी ने ध्यानभनुवाद मे बहुत बड़ा प्रन्तर पा गया है।" शतक की अन्तिम गाया को मान्यता नही दो, इसीलिए ३. इसी समय के अासपास ध्यानशतक का कुछ इसके रचयिता जिनभद्रगणि क्षमाश्रमण के होने मे सन्देह विवेचन गुजराती में पूज्य मुनिश्री पन्यास भानुविजय किया है क्योकि हरिभद सरि ने १०५ गाथाम्रो की भी जी ने लिखा, जो कि स. २०२७ मे दिव्यदर्शन कार्यालय, टीका की एवं ग्रन्थकार का नाम नही दिया। पर लगता है अहमदाबाद से प्रकाशित हुप्रा है । ३२२ पृष्ठो का यह हरिभद्र सूरि को जो प्रति मिली है, उममे ग्रंथकार के ग्रन्थ गुजराती विवेचन दृष्टि से बड़े महत्व का है । इसका नाम वाली अन्तिम गाथा नही होगी । जब अन्य प्रतियों मल्प ३) १. है। मे वह मिलती है तो, मेरी गय में, पण्डित जी को शंका नही ४. सन् १९७६ मे ध्यानशतक का एक महत्वपूर्ण करनी चाहिए थी। श्वे० परम्परा मे तो यह जिनभद्र ग्रन्थ वीर सेवा मन्दिर, दिल्ली से प्रकाशित हपा है, क्षमारूमण की ही कृति है, यह मान्यता बहुत प्रसिद्ध जिसमें पालोचनात्मक प्रस्तावना, हिन्दी अनुवाद, विविध है। यहाँ तो मुझे विगत छ: वर्षों में ध्यानशतक के जी परिशिष्ट एव सस्कृत टीका भी है । साथ ही दि. भास्कर हिन्दी के दो, अंग्रेजी के दो, गुजराती का एक अनुवाद नन्दी के ध्यानस्तव को भी अनुवाद के साथ ही दिया प्रकाशित हो चुके है, उन चार ग्रन्थों से पाठको को गया है । मू०१० रु. है । पं० बालचन्दजी शास्त्री ने परिचित करना ही प्रभीष्ट है। इस प्रथ के सम्पादन मे बहुत श्रम किया है । मूल ग्रंथ तो प्राशा है कि पाठक उनसे लाभ उठायेंगे एवं हिन्दी में टीका, अनुवाद के साथ ७२ पृष्ठो मे ही है, किन्तु इसकी कोई विस्तत विवेचन षीघ्र प्रकाशित किया जायेगा। प्रस्तावना ८५ पृष्ठो की है। इसी से वह कितनी पठनीय Page #57 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्राकृत का बृद्दव्यसंग्रह और उसकी महत्ता -पं० नाथूराम जैन 'डोंगरीय', इन्दौर बुद्रव्यसंग्रह प्राकृत भाषा में निबद्ध भगवान् महावीर थे। दूसरे नेमिचन्द्र वसुनंदि सिद्धातिदेव के गुरु थे, जो द्वारा उपदिष्ट अनेकांतात्मक वस्तु स्वरूप का प्रतिपादक, प्रथम (सिद्धांतचक्रवर्ती नेमिचन्द्र) से करीब ६० वर्ष जैन दर्शन का एक लघुकाय किंतु सारगर्भित एवम् महत्व पश्चात् हुए और जिनका समय विक्रम की बारहवीं शताब्दी पूर्ण ग्रंथ है। इसका समाज में व्यसग्रह के नाम से पठन- निश्चित होता है । ये सिद्धांतिदेव के पद से विभूषित थे। त्रा पाठन बडी श्रद्धा और रुचिपूर्वक किया जाता है। प्रचलित तीसरे नेमिचन्द्र गोमट्रसार (प्राकृत) की सम्कृत टीका परंपरानसार इसके रचयिता गोम्मटसार, त्रिलोकसारादि जीवतत्त्वप्रदीपिका के निर्माता थे। सिद्धांत ग्रंथो के निर्माता एवम् श्रवणवेलगोला में विराज वस्तुत: इस गथ के र यता कौन से नेमिचन्द्राचार्य थे मान् भगवान् बाहुबली के बिशाल बिब के प्रतिष्ठापक तथा इसका निर्णय इतिहास के पुष्ट प्रमाणो से ही हो सकता है, तत्कालीन राजा चामडराय के गुरु प्राचार्य प्रवर श्रीमन्नेमि कित इतना तो निश्चित ही है कि मूल ग्रथकर्ता श्रीमन् चन्द्र सिद्धातचक्रवर्ती थे इसके हिदी मे वाद्यवनिका एवम् वम् नेमिचन्द्राचार्य है और चूकि वे वीतरागी सत थे प्रत. ग्रंथ भाषा पद्यानुवाद कर्ता स्व प. जयचन्दजी छाबड़ा ने अब से की प्रामाणिकता एवम् उपादेयता भी प्रसदिग्ध है। करीब पौने दो सौ वर्ष पूर्व अपनी कृति मे इन्ही प्राचार्य को द्रव्यसग्रह का मूलकर्ता माना है तथा इसकी ब्रह्मदेव ग्रंप की विशेषता एवम वर्तमान सामाजिक परिस्थिति के सरि कृत संस्कृत टीका के हिन्दी टीकाकार श्री पं. जवाहर- संदर्भ में उपयोगिता लाल जी शास्त्री ने भी ग्रंथ की प्रस्तावना मे सिद्धांतचक्रवर्ती आचार्य नेमिचन्द्र का ही प्रथकर्ता के रूप मे उल्लेख किया यह है कि इसमें जीवादिक द्रव्यो, पाम्रवादि तत्त्वों है। इनका समय विक्रम सं. १०३५ (ग्यारहवी शताबी) एवम् मोक्षमार्ग का निरूपण व्यवहार तथा निश्चय-उभयनय है। कितु, ग्रथ की सस्कृत टीका के कर्ता श्रीमह्मदेव सूरि सापेक्ष (प्रायः प्रत्येक गाथा मे साथ २) किया गया हैने अथकर्ता नेमिचन्द्र प्राचार्य की उपाधि का उल्लेख ताकि अनेकांतमयी वस्ततत्त्व का सक्षेप में यथार्थज्ञान प्राप्त 'सिद्धांतचक्रवर्ती' न कर 'सिद्धांतिदेव' के नाम से किया है। कर मानव प्रात्मकल्याण की प्रोर अग्रसर हो सके तथा हो सकता है कि कालांतर में सिद्धांतचक्रवर्ती को ही मान सर्वथा निश्चयंकांत या व्यवहारकांत के प्राश्रय से कदाग्रही देकर संक्षेप मे सिद्धातिदेव' कहा जाने लगा हो। बनकर एकातमिथ्यात्त्व के कुचक्र मे न फंसे । अतः इसका आधुनिक इतिहासज्ञ मनीषियों की शोधखोज के निष्पक्ष एवम् जिज्ञासु भाव से अध्ययन करने पर अनेक अनुसार नेमिचन्द्र नाम के तीन प्राचार्य हुए हैं, जिनमें प्रथम प्रातियों का -जो नयों की खींचतान से उत्पन्न हो रही या राजा चामुण्डराय के गुरु सिद्धातचक्रवर्ती के पद से अलंकृत हो सकती है-सहज ही निराकरण भी हो जाता है। Page #58 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ५०, वर्ष ३२, कि० ३-४ अनेकांत आज समाज के अधिकाश विद्वज्जनो, पत्र-पत्रिकामो, वस्तु का-जैसी कि वह है-ज्ञान करना-कराना हो धर्मसभाम्रोएवम घर-घर में पिना पुत्र से, भाईबहिन से पति हितकर, प्रामाणिक व मत्य हो सकता है, न कि एक नय पत्नी से तथा एक धर्मबंधु इतर धर्मबधू से विभिन्न नयो की सर्वथा एकान-दृष्टि से । श्रीमदमतचन्द्र स्वामी ने द्वारा प्रतिपादित वस्तु स्वरूप के सम्बन्ध मे सर्वथा एकात पुरुषार्थसिद्ध्युपाय मे नयो की एकानपरक खीचतान करनेदृष्टिपक्ष को ग्रहणकर परस्पर में विसंवाद करता दिखाई वालो को इसी लिए चेतावनी देते हए लिखा भी है .है रा है पीर हम प्रकार दष्टिमोर वा दगग्रही बनकर "अत्यतनिशितधार दुरामद जिनवरम्य नयनकम। अपने प्रिय नय पक्ष को ही पूर्ण सत्य एव इतर पक्ष को खंडयति धार्यमाण मूर्धान झटिति दुर्विदग्धानाम् ॥" मर्वथा मिथ्या मान व प्रतिपादन कर वस्त के अनेकातमयी (अर्थात्) जिनेन्द्र का नयचक अत्यत तीक्ष्ण धारवाला स्वरूप एव उसके भगवद्वाणो द्वारा स्याद्वाद रूप प्रति- होने में बड़ी मावधानी में प्रयोग करने योग्य है : क्योकि पादन का खडन वा उपहास करने में अपनी अज्ञतावश इसकी मूर्खतापूर्ण खीचतान कर प्रयोग करने वालो के मस्तक (स्वय को सर्वज्ञ मान) तनिक भी सकोच नहीं कर रहा। को यह तुरन्त ही विदीर्ण कर डालता है, अर्थात् निश्चया अनेक विद्वज्जन भी वीतराग वाणी का बीतगग भाव भास की तेज धार से सद्ज्ञान का घात कर उसे मार्गभ्रष्ट से प्रतिपादन न करते हुए पक्षव्यामोह के कुचक्र में पड़कर कर देता है। अनेकात और स्याद्वाद को सत्यतापरक गरिमा को भलाकर तात्पर्य यह है कि जैन मिद्धान वैज्ञानिक सत्य पर प्राधाया जानवभकर अथवा अज्ञतावश (जाने-अनजान रित है और वह मत्य अनेकानात्मक है, जबकि प्रत्येक नय अनेकानमयी वस्तु स्वम्प का स्याद्वाद रूप प्रतिपादन करने यदि वह मुनय है तो वह इनग्नय मापेक्ष होकर ही सत्य का से दिनादिन विमुख होते जा रहे है । इससे कभी-कभी ऐसा द्योतक कहा जाता है और यदि वह इतर नय निरपेक्ष है, प्रतीत होने लाता है कि जैनसिद्धात या तो अन्य साख्य अर्थात् अन्य मुनय द्वारा प्रतिपादित वस्तु में विद्यमान धर्म वेदातादि दर्शनों के समान मर्वथा एकातपरक है (जैसा कि को गौण न करके उसका निषेध कर उसे झुठलाने और वे प्रतिपादन कर रहे है) और या भगवान ने जो अनेकात बंडन करने लगता है तो वह एकान मिथ्यात्व का पोपक को परमागम का प्राण तथा नयो के भिन्न विषयो सबधी दुर्न य बन जाता है। परमपूज्य स्वामी समन्तभद्र ने निम्नपरस्पर विरोध को मथन करने वाला प्रतिपादन किया है लिखित श्लोकांश द्वारा इसी तथ्य को प्रगट किया है :-- वह शायद ठीक नहीं है या फिर जैन सिद्धांत अभी अनिर्णीत “निरपेक्षा नया मिथ्या मापेक्षा यस्तु नेऽर्थकुन्।" और विवादास्पद है, जिसका निर्णय होना शायद अभी शेष (अर्थान) कोई भी नय इतर नय निरपेक्ष होकर मिथ्या बन जाता है और इतर नय मापेक्ष होकर वस्तु के स्वरूप जंनी जिस स्यादाद प्रणाली द्वारा दुनिया के मत- का प्रकाशक । मतान्तरो के सर्वथा एकात पक्षजन्य विवादो का निर्मलन भगवान महावीर ने अनेकानात्मक वस्तु को, एक नय कर सत्य और समन्वय के उदार दृष्टिकोण द्वारा द्वाग वस्नु में विद्यमान एक धर्म को मध्य तथा ग्रेप धर्मों साप्रदायिकता का विनाश एव विश्वबन्धुत्व की भावना के को गौण (न कि निषेध) कर प्रतिपादन करने की गति प्रचार-प्रसार से मानव समाज में पारस्परिक सद्भाव एव एव नीति को ही वस्तु स्वरूप का यथार्थ बोध करानेवाला विश्व में सत्य व शाति की प्रतिष्ठा करने का दावा करने या कहा है, जैसा कि पुरुषार्थमिद्ध्युपाय के अन्तिम पद्य में रहे है, उन्हें स्वय ही एकात की तलवार लेकर परस्पर में श्रीमदमतचन्द्र स्वामी ने दरशाया है :-- प्रहार करते देखकर बड़ा खेद और पाश्चर्य होता है। "एकनाकर्पन्ती इलथयतो च वस्तुतत्त्वमितरेण । प्रत्येक वस्तु के अनेकानात्मक (निश्चय-व्यवहारात्मक) अन्तेन जयति जैनीनीतिमथान नेत्रामव गोपी।" होने से निश्चय और व्यवहार नय उसका यथा ज्ञान (अर्थात्) जिस प्रकार गापिका दहा से मक्खन निकालने कगने के साधन है, अत निष्पक्ष भाव से उभय नयो द्वारा के लिए मथानी की रम्सी के एक छोर को अपनी ओर Page #59 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्राकत का बृवष्य संग्रह और उसको महत्ता खींचती व दूसरे छोर को ढील देते हुए भी पकडे रहकर, नय को प्रधानकर ग्रहण करें तो मिथ्यात्त्व के बिना चरित फिर उसे अपनी प्रोर खीचती व प्रथम को ढील देती है मोह के पक्ष से गग रहे और जब नय पक्ष को छोड़ वस्तएवं अपनी इस बारंबार की प्रक्रिया द्वारा ही मक्खन स्वरूप को केवल जानता ही हो तब उस काल श्रतज्ञानी निकालने में समर्थ होती है (यदि वह ऐसा न करे और भी केवली की तरह वीतराग के समान ही होता है ऐसा रस्सी के किसी एक छोर को पकडकर ही खीचती जाय तो जानना।"-(समयसार, पृष्ठ २०७, परथत प्रभावक दही से मक्खन नही निकल सकता) उसी प्रकार जैनी नीति मंडल द्वारा प्रकाशित-सन् १९१६) भी वस्तु विषयक एक नय पक्ष को मख्य व शेष को गौण बात असल में यह है कि वस्तु स्वय अनेकान्तात्मक या तथा पुन. शेष को मुख्य व मख्य को गौण कर वस्तु स्वरूप निश्चय व्यवहारात्मक है । तभी वह निश्चय और व्यवहार का यथार्थ प्रतिपादन व ज्ञान करने में समर्थ होती है, अन्यथा नय का विषय होकर निश्चय नय द्वारा उसके स्थाई अश को नहीं। ध्रौव्य रूप मे तथा व्यवहार नय के द्वारा उसी के अस्थायी पूज्य स्वामी जी ने इसके पूर्व ग्रंथ की प्रस्तावना में अश (पर्याय) को उत्पादश्ययात्मक अध्र व रूप में प्रतीत अपने शिष्यो को यह भी स्पष्ट किया है कि होती है। उत्पादव्ययघ्रीव्ययुक्त सत्' एवं 'सद्रव्यलक्षण' 'व्यवहारनिश्चयो य. प्रबद्धय तत्वेन भवति मध्यस्थः। इन मूत्रो द्वारा वस्तु के इस अनेकांतमयी स्वरूप का ही प्राप्नोति देशनाया. म एवफलमविकल शिष्य. ॥" तत्त्वार्थ-मूत्रकार ने प्रतिपादन किया है। "प्रपितानपिन (अर्थात) व्यवहार और निश्चय द्वारा प्रतिपादित सिद्ध.'' अर्थात् प्रयोजन वश कभी प्रयायो को गोण कर द्रव्य अनेकान्तात्मक वस्तु के स्वरूप को जानकर जो मध्यस्थ की मख्यता मे उसका (वस्तु का) नित्य (ब्रोव्य) रूप कथन बना रहता है-किमी न य के पक्ष व्यामोह में न ही पडता- और कभी पर्यायो की मुख्यता से द्रव्य दष्टि को गौण कर वही शिष्य भगवान की देशना के सम्पूर्ण फल को प्राप्त पदार्थ का अनित्य रूप (उत्पादव्ययान्मक) कथन कर वस्त करता है, अर्थात् सम्यक ज्ञानी बनकर आत्म कल्याण का में कथचित नित्यता और अनित्यता की मिद्धि होती है, पात्र होता है, एकाती नही। किन्त हम प्राज मताग्रही जैमी वि प्रत्येक वस्तु सामान्य विशेषात्मक या निन्याबनकर मध्यस्थ भाब का परित्याग करते जा रहे है। नित्यात्मक स्वतः सिद्ध है। न तो वम्त में नित्यता परमपूज्य भगवन् कद-कद स्वामी ने यही बात समय- असत्त है और न अनित्यता । यही बात भेद-अभेद, बद्धमार में भी स्पष्ट रूप में घोषित कर दी है । वे ग्रथ के कर्ता अबद्ध, शुद्ध-अशुद्ध प्रादि दृष्टियो में भी लागू होती है। कर्माधिकार में कहते है उदाहरण के रूप में, प्रत्येक जीव जीवत्व (चैतन्य )मामान्य "दोहषि णयाण भणिय जाण इ णवरंतु समयपडिबद्धा। की प्टि में (अजीव द्रव्य के गण पर्याय से रहित) शुद्ध ण दु णयपक्व निहदि किचिवि णयपक्व परिहीणो । निना की Tier निश्चय नय की अपेक्षा शुद्ध है, कित व्यवहार नय स (अर्थात् प्रात्मा के स्वरूप को जाननेवाला ज्ञानी दोनो कामी, क्रोधी, मानी आदि कोई स मार्ग है और कोई ही नयौ (निश्चय और व्यवहार) के कथन को केवल परमात्म्य दशा को प्राप्त अग्हत या सिद्ध है। इसी प्रकार, जानता ही है, परन्तु नय पक्ष को किचित् भी ग्रहण नही भेद-प्रभेद आदि दृष्टियों से भा वर्णन किया जाता है। करता, क्योकि वह नयो के पक्षपान से रहित (मध्यस्थ) अपने-अपने विषय को मध्य और शेप का गौण कर कथन होता है। करनेवाले इस प्रकार सभी नय सत्य है । न तो पर्याय दष्टि इस गाथा के मावार्थ में समयसार के मर्वप्रथम हिंदी से जीव का मसाग या मक्तपना झूठा है और न जीवत्व टीकाकार श्रद्धेय स्व. श्रीमान् प. जयचद जी छाबड़ा ने दष्टि से उसका शुद्ध चतन्यपना। इसी प्रकार, भेद दष्टि निम्न वाक्य लिखे हैं -- से जो मसारी है बह मुक्त नही, जो देव है वह मनुष्य एक नय की पक्ष के सर्वथा ग्रहण करें तो मिथ्यात्व नही। अभेद दृष्टि से मनुष्य भी जीव है, देव भी, तया से मिला हुआ पक्ष का राग हो तथा प्रयोजन के वश से एक ससारी भी और मुक्त भी। Page #60 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ५२ वर्ष ३२, कि० -४ निक युग में कुछ मनीषी उत्पादव्ययात्मक पर्यायों को प्रात्मा या वस्तु से सर्वथा भिन्न व मिथ्या मान उनको बिषय करनेवाले व्यवहार नय को भी सर्वथा मिथ्या मान व घोषित कर अपने को सम्पदृष्टि मान रहे हैं। वे यहां तक मानते और दूसरो को प्रतिपादन करते है कि जो अपनी शुद्ध पर्याय को भी अपनी मानता है वह मिथ्या दृष्टि है । यह सूविरुद्ध भ्रमपूर्ण मान्यता अनेकात मिद्धात का स्पष्टतया अपलाप है । क्या कोई भी वस्तु या आत्मा कभी भी पर्याय रहित होती या हो सकती है? पर्यायें शुद्ध पौर अशुद्ध परिस्थिति के अनुसार हो सकती है और है । किन्तु वे हैं द्रव्य की ही । न तो कभी द्वत्य पर्यायों से भिन्न या शून्य होता है और न पर्यायें ही स्वतंत्र रूप में द्रव्य से भिन्न कभी और कही उत्पन्न होती या हो सकती है। पाखिर पर्यायें स्वतंत्र वस्तु न होकर द्रव्य का परिणमन ही तो हैं, जो कि वस्तु का स्वभाव है। परमपूज्य द्याचार्य कूदकूद देव ने प्रवचनसार में इसी सत्य को उद्घाटित करते हुए गाथा नं. १०१ मे स्पष्ट किया है। अनेकांत "उप्पादट्ठिदिभगा विज्जते पज्जयेसु पज्जाया । दव्वति सतिणियदं तम्हा दव्वं हवदि सव्व ।। " (अर्थात् उत्पाद स्थिति (प्रोव्य) और विनाश पर्यायो में रहते है और निश्चय करके ये पर्याय द्रव्य में रहती है। इस कारण निश्चित रूप में वे उत्पाद व्यय धीव्य मयी पर्यायें द्रव्य ही है। उपर्युक्त कथन की पुष्टि में प्रागे उन्होंने गाथा नं. १०२ से १०५ तक इसी सत्य और तथ्य को निरूपित कर और भी स्पष्टीकरण किया है। यहां साचार्य महोदय ने न केवल उत्पादव्यय-स्वरूप अशों को ही पर्याय माना है, प्रत्युत वादा को भी पर्याय ही मानकर द्रव्य को पर्यायों का समूह प्रतिपादित किया है। यदि पर्यायों और उनमें भी अपनी शुद्ध पर्यायों को दृष्टि अपनी नहीं मानता तो किसको मानता है? यदि वह अपनी शुद्ध पर्याय को अपनी मानने से मिध्यादृष्टि हो जाता है, तब अाचार्य श्री का उक्त कथन ही मिथ्या सिद्ध होगा जो कि इनकी मान्यता से सर्वथा मेल नही खाता और चाचार्य श्री के कथन को मिथ्या तथा इन मनीषियो के कथन को सम्यकू मानकर श्रद्धान करना सभव नहीं है; क्योंकि वह सत्य और तथ्य शून्य होकर प्रत्यक्षादि प्रमाणों से भी विरुद्ध है । यहां प्रश्न हो सकता है कि तब फिर शास्त्रो में पर्यायदृष्टि को मिध्यादृष्टि क्यो कहा ? समाधान यह है कि पर्याय को द्रव्य की जानने या पर्यायो पर दृष्टि डालनेवालों को मिथ्यादृष्टि नहीं कहा है, बल्कि उस व्यक्ति को मिध्यादृष्टि कहा है कि जो केवल मनुष्य देवादि रूप संयोगी पर्याय मात्र को ही आत्मा मानकर अपने चैतन्य स्वरूप श्रात्मद्रश्य को न समझता हुआ भ्रमित हो रहा है, अर्थात् मनुष्यादि अशुद्ध पर्यायों में अहंकार ममकार करता हुआ अपने वास्तविक रूप को भुला देता है और अपने वास्तविक गुण पर्यायों के स्वरूपो को न जानता हुआ सयोगी पर्याय में ही मृग्ध हुआ उसे अपना स्वरूप मान तावन्मात्र अपनी श्रद्धा कर लेता है। प्रवचनसार की गाथा ६३ और ६४ में इसी तथ्य को मूल ग्रंथकर्ता आचार्य श्री ने तथा उसके टीकाकारों ने स्पष्ट भी किया है । वास्तविकता यह है कि विभिन्न नयों द्वारा परस्पर बिरोधी कथन का होना - वस्तु में विद्यमान परस्पर विरोधी जैसे धर्मो गुण या पर्यायों की विभिन्नता को विषय करने के कारण स्वाभाविक है। जैसे एक नय वस्तु को द्रव्यत्व या गुणों के अन्वयी भाव के कारण नित्य व शुद्ध जानता व प्रतिपादन करता है तो दूसरा उसी वस्तु की पर्यायों की मुख्यता से अनित्य व अशुद्ध नित्यता द्रव्यगुण सापेक्ष और प्रनित्यता पर्याय सापेक्ष है । इसीलिए उभय नयों का कथन भी परस्पर में सापेक्ष व एक दूसरे का पूरक होकर अनेकातात्मक वस्तु का यथार्थ ज्ञान कराने में सहायक होता है, न कि एक-दूसरे के विषय का खंडन करके सभी नयो को अपने-अपने विषय को मुख्य करके कथन करने को स्वतंत्रता एवं अधिकार है, साथ ही उन्हें उस समय दूसरे नम के विषय को गौण करते हुए उनसे मित्रता (सापेक्षता) बनाए रखना भी अनिवार्य है, यदि वे सुनय है। एक सुनय दूसरे मुनय के विषय में न तो हस्तक्षेप करता है और न उसका खडन ही । श्रतः दूसरे नयो के विषय की सत्यता को वह भलीभांति जानता है। इसके सिबाय दूसरे नयो या उनके विषयो को खडन करने प्रथबा 1 - Page #61 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्राकृत का दाव्य संग्रह और उसकी महत्ता झठलाने का उसे कोई अधिकार भी नहीं हैं, क्योकि वस्तु वस्तु को द्रव्य की मुख्यता से जानने या कथन करने को के भनेकातात्मक होने से दूसरा नय भी तो उसी वस्तु मे द्रव्याथिक नय कहते हैं। पर्यायों या गुणों को वस्तु के अंश विद्यमान उससे भिन्न दूसरे सत्याश को ही ग्रहण व प्रति- या भेद रूप में ग्रहण कर जानने वा कथन करने को पादन कर रहा होता है। पर्यायाथिक नय कहते हैं। नैगमसग्रहादि इन्ही नयों के भेद प्रतः किसी भी नय का पक्षपाती बनकर दुराग्रह करना हैं। अध्यात्म ग्रन्थों में इन्हीं नयों का निश्चय पोर व्यवहार न तो उचित है और न वह जिनागम के अनुकूल है। हो नय के नाम से प्रतिपादन एव प्रयोग किया गया हैसकता है कि किसी को किसी नय विशेष से अधिक प्यार द्रव्याथिक को निश्चय व पर्यायाथिक को व्यवहार । इनमे और उसी को परम सत्य मानने का भ्रम हो गया हो, निश्चय नय को प्रायः भूतार्थ और व्यवहार नय को प्रभूतार्थ किन्तु ऐसे मोही जन ही एकांत मिथ्यात्वी कहे जाते है, यह कहा गया है। हमें सदैव ध्यान में रखना है। भूतार्थ शब्द-भूत+अर्थ, इस प्रकार दो शब्दों के योग ___इसीलिए वक्ता और श्रोता दोनो को नयों के स्वरूप से बना है। भूत शब्द के अनेक अर्थ हैं-हित, सत्य, द्रव्य, को भलीभांति समझकर ही निष्पक्ष भाव से वस्तु तत्त्व जीव, प्रेतियोनि, अतीतकाल, मूलतत्त्व प्रादि । इसी प्रकार, जानना व अन्य को प्रतिपादन करना स्व पर हिन उपा- अर्थ शब्द भी अनेक अर्थों में प्रयुक्त होता है, जैसे-प्रयोजन, देय व उचित है; क्योकि शास्त्र की गादी पर वक्ता जैन अभिप्राय, धन, हेतु, विषय प्रादि । यहा किस अर्थ में भूत सिद्धात का प्रतिपादक होता है, न कि अपनी निजी का अर्थ शब्द का प्रयोग किया गया है, यदि इसपर विचार संकुचित एव कल्पित मान्यताओं और पक्षपातपूर्ण एकातिक करें तो प्रकरण को देखते हुए भूत शब्द द्रव्यवाचक एवं रुचि व विचारधारा का। अर्थ शब्द विषय या प्रयोजन वाचक सुसगत प्रतीत होता है। तदनुसार द्रव्य (सामान्य) है। प्रयोजन या विषय जिसका प्रमाण और नय वह भूतार्थ नय है और जिसका विषय द्रव्य नही है"प्रमाणनयरधिगम." मोक्षशास्त्र के इस सूत्र के अन पर्यायादि विशेष हैं, वह अभूतार्थ नय है । यतः शुद्ध निश्चय सार वस्तु तत्त्व का ज्ञान प्रमाण और नयों से होता है. नय (अपर नाम द्रव्याथिक नय) पर्यायादि भेदो को गौण अर्थात् प्रमाण और नय वस्तु स्वरूप को जानने के साधन कर द्रव्य (सामान्य व अभेद) दृष्टिप्रधान है, अत: वह है। अनेकातमयी वस्तु के सर्वांग ज्ञान को प्रमाण तथा भूतार्थ है तथा व्यवहार नय द्रव्य को गौण कर पर्याय उसके किसी अश की मुख्यता को लेकर एकागी ज्ञान या (विशेष) दृष्टि प्रधान है अत. प्रभूतार्थ है। उसके प्रगट करने के अभिप्राय को नय कहते है। प्रत्येक भूत शब्द का अर्थ सत्य भी है जिससे निश्चय नय को वस्तु अनेकातात्मक-अपने अनंत गुणो और पर्यायों का सत्यार्थ एव व्यवहार नय को असत्यार्थ भी कहा गया हैप्रखड पिड है। प्रत. उसको प्रमाण द्वारा वैसा ही जानकर जिसका उल्लेख श्रीमज्जयसेनाचार्य कृत समयसार की उसमे विद्यमान एक गुण, धर्म या पर्याय को मुख्य तथा शेष ११वी गाथा की टीका में पाया जाता है। किन्तु इसी को गौणकर कथन करने को स्याद्वाद कहा जाता है। प्रमाण ११वी गाथा को टीका मे उक्त प्राचार्य ही गाथा का के प्रत्यक्ष-परोक्ष के भेद से दो भेद हैं । इन्द्रियों और मन द्वितीय रूप में व्याख्यान करते हुए व्यवहार नय को भी आदि पर वस्तु की सहायता से होने वाला ज्ञान परोक्ष भूतार्थ और अभूतार्थ के भेद से दो भागों में विभक्त करते प्रमाण है तथा बिना किसी की सहायता के अात्मिक शक्ति है। वे लिखते है कि व्यवहार नय भूतार्थ और अभूतार्थ के प्रद होनेवाला ज्ञान प्रत्यक्ष प्रमाण कहलाता है। भेद से दो भेद रूप हैं, उसी प्रकार शुद्ध नय भी भूतार्थ और नय के भी मुख्य दो भेद हैं-(१) द्रव्याथिक अभूतार्थ (शुद्ध निश्चय और अशुद्ध निश्चय) के भेद से दो (२)पर्याथिक । द्रव्य-गुण-पर्याय के प्रखंड पिंड स्वरूप भेद रूप हैं । उनके शब्द हैं Page #62 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ५४, वर्ष ३२, कि० ३-४ अनेकांत "द्वितीय व्याख्यानेन पुनः ववहारो प्रभूदत्थो- जैन सिद्धांत में नयो को अश-अंग रूप मे बस्तु का परिज्ञान व्यवहारोऽभूतार्थो भूदन्थो भूतार्थश्च देसिदो देशितः कथितः करानेवाला होने से उनको परस्पर मैत्री-भाव (अन्य नय न केवलं व्यवहारो देशितः, सुद्धणयो शुद्ध निश्चय नयोऽपि । सापेक्षता) रखकर ही वस्तु के सत्यांश का प्रतिपादक माना दु शब्दादय शुद्ध निश्चय नयो पि द्विधा शुद्धनिश्चया- गया है। शुद्धनिश्चयभेदेन निश्चय नयोऽपि द्विधा इति न य चतुष्टयं । भूत शब्द का अर्थ हित भी है, अतः इस दृष्टि से कोई -समयसार, रामचन्द्र शास्त्रमाला, पृष्ठ २४। कोई मनीषी केवल निश्चय नय को ही प्रात्मा का हित श्रीमदमतचन्द्र स्वामी ने भी समयसार की १४वी साधक मान निश्चय को भूतार्थ व व्यवहार नय को अहितगाथा की टीका में व्यवहाग्नय की दृष्टि प्रधान कथन को कारी मान उसे अभूतार्थ व सर्वथा हेय प्रतिपादन करते देखे कथंचित भूतार्थ कहा है और उसी प्रकार शुद्ध निश्चय नय जाते है। किन्त शिष्यों को तत्त्व बोध कराने में व्यवहार नय की दृष्टि प्रधान कथन को भी कचित् ही भूतार्थ कहा है। ही प्रयोजनबान होने से, हितकारी भी सिद्ध होता है; वे कहते है-मात्मा का प्रबद्ध, अस्पष्ट, अनन्य, नियत, यहा तक कि सभी जीवों को प्रारभिक अज्ञान दशा में प्रविशेष और प्रसयुक्तपना शुद्ध निश्चय नय की दृष्टि से व्यवहार नय ही तत्त्व बोध करने में अनिवार्प साधन है अतः विचारने पर भूतार्थ है और व्यवहार न य की दृष्टि से देखने इस अर्थ में भी व्यवहार नय भूतार्थ सिद्ध होता है। पर बद्ध, स्पष्ट, अन्य, अनियत, मविशेष तथा सयुक्तपना इस प्रकार, ममयमार में श्रीमदमतचन्द्राचार्य ने तथा भी भूतार्थ है । यत दोनो नयो के विषय भिन्न है । शुद्ध नय श्रीमज्जयसेनाचार्य ने जो निश्चय और व्यवहार दोनो नयो का विषय गुण पर्यायो के भेदो को गौण कर शुद्ध एक अखड का भूतार्थ व अभूतार्थ रूप में प्रतिपादन किया है वह नित्य चैतन्य स्वरूप प्रात्मा है, जबकि व्यवहार नय द्वारा उल्लिखित विवरण में गभीरतापूर्वक भली-भाति विचाग्ने द्रव्यदृष्टि को गौण एवं पर्यायो को मुख्य कर कथन करने पर यथार्थ व न्यायोचित सिद्ध हो जाता है। से प्रात्मा ससार दशा में बद्ध, स्पृष्ट यादि रूप में ग्रहण व इमके सिवाय थीमज्जयसेनाचार्य ने ममयमार की ही प्रतिपादन करन म पाता है। अतः इस दृष्टि से व्यवहार ११५वी गाथा की टीका करते हए, निश्चय पोर व्यवहार नय भी सत्यार्थ है ? क्योकि आत्मा स्वय उत्पाद व्यय- पोकोहोलोजीमजादी और उनके सापेक्ष ध्रीव्यात्मक व स्वभावतः गुण पर्यायान्मक है । अतः अपने होने पर ही दोनो को सत्य सिद्ध किया है। उनके शब्द निम्न अपने विषय को मध्य तथा अन्य नय के विषय को गौण प्रकार :कर कथन करते हए दोनो ही नय सत्यार्थ या भूतार्थ है कि च. शद निश्चयेन जीवस्याकतं त्वमयोक्तत्व च एव मूनय होकर वस्तु का यथार्थ ज्ञान करने-कराने मे गोशातिर करन-कराने में क्रोधादिम्यश्च भिन्नत्व भवतीति व्याख्याने कृते मति द्वितीय सहायक है। पक्ष व्यवहारेण कर्तृत्व भोक्तत्वे च क्रोधादिम्यश्चाभिन्नत्व वस्तुतः एक नय (सुनय) अन्य नयो के विषय को गौण च लभ्यते एव । कस्मात् ? निश्चयव्यवहारयो परस्पर एव अपने दृष्टिगत विषय को मुख्य कर कथन करने का ही सापेक्षत्वात् । कथमिति चेत् ? यथा “दक्षिणेन चक्ष षा अधिकारी है । वस्तु में विद्यमान धर्म, गण या पर्याय को, पश्यत्ययं देवदत्तः” इत्युक्ते वामेन न पश्यतीत्युनुक्तजो अन्य नय का विषय हैं, निषेध करने या उसे झुठलाने सिद्धमिति । ये पुनरेवं परस्परसापेक्षनयविभागं न मन्यन्ते का न तो उसे कोई अधिकार व इष्ट ही होता है और न साख्यसदाशिवमतानुसारिण स्तेषां मते य-थाशुद्ध निश्चयवस्तु का वैसा (सर्वथा एकातमयी) स्वरूप ही है। जब भी नयेन कर्ता न भवति, क्रोधादिम्यश्च भिन्नो भवति तथा एक नय दूसरे नय को कदाग्रह या अहकार अथवा पक्षपात- व्यवहारेणापि,नतश्च क्रोधादिपरिणमनाभावे सति सिद्धानावश झठलाएगा या उसके विषय को गौण न कर निपेष मिव कर्मबधाभावः । कर्म बंधाभावे संसाराभावः । संसाराकरेगा तभी वह स्वय भी निरपेक्ष हो जाने से मिथ्र्यकात के भावे सर्वदा मुक्तत्वं प्राप्नोति । स च प्रत्यक्ष विरोध:-- गर्त में गिरकर प्रसत्य की कोटि में चला जाएगा । अतः ससारस्य प्रत्येक्षण दृश्यमानत्वात् ।" Page #63 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्राकृत का बद्रव्यसंग्रह और उसकी महत्ता (अर्थात्) "दूसरी बात यह है कि शुद्ध नय से जीव के कहने पर भी मिट्टी के घड़े को घी का बना हुआ घडा अकपिना, अभोक्तापना और क्रोधादिक से भिन्नपना मानकर नही चलता, प्रत्युत श्रोता उम घडे को घी के घड़े है-इस प्रकार व्याख्यान करने पर दूसरे पक्ष में व्यवहार के नाम से जानता है अतः उसको उसकी समझ के अनुसार से कपिना, भोक्तापना और क्रोधादिक से अभिन्नपना समझाने का ही रहता है, अतः प्राचार्यों ने भी विभिन्न भी जोव में पाया हो जाता है। किस कारण से ? यदि ऐसा प्रकार के जीवों को उनकी समझ व योग्यतानमार वस्तु पूछो, तो उत्तर यह है कि जैसे देवदत्त दक्षिण नेत्र (दाहिनी का स्वरूप समझाने के लिए विभिन्न नयो का उपयोग किया पाख) से देखता है, ऐसा कथन करने पर बाम नेत्र (वायी है, जो जीवों के हित में है। आख) से नही देखता, यह बात बिना कह सिद्ध हो जाती इस प्रकार, नयो द्वारा वस्तु का ज्ञान विभिन्न दृष्टियों है।" अर्थात् निश्चय-व्यवहार दोनो नय दाय-बाय नेत्र मे पात्रानुसार कराया जाता है, अत: नयो का स्वरूप भी के समान है। यथार्थ रूप में जानना नितांत आवश्यक है, क्योंकि प्राचार्यों अागे चलकर वे कहते है--"जो इस प्रकार परस्पर ने जो कुछ भी वस्तु के सम्बन्ध में कथन किया है वह किसी सापेक्ष नय विभाग को नहीं मानते. ऐसे जो मारूप और नय की मुख्य दृष्टि से ही किया है और वह अन्य नय सापेक्ष सदाशिव मतानयायो है उनके मन में जैसे शुद्ध निश्चय नय होकर वस्तु का अंश रूप में ज्ञान करानेवाला है, अत. सत्य से जीव कर्ता नही है और क्रोधादिक से भिन्न है, उसी है। प्रकार व्यवहार नय से भी मानना पड़ेगा। इसमे संसारी समयसारादि प्राध्यात्मिक ग्रंथों में शुद्ध नय की अभेदजीव के क्रोधादि रूप परिणमन करने के अभाव में मिद्ध प्रधान सामान्य दृष्टि की प्रधानता से प्रात्मादि तत्त्वो के भगवान् के ममान कम बधन का प्रभाव मानना पड़ेगा म्वरूप का प्रतिपादन किया गया है तथा गोमटसारादि और कर्म बध के अभाव में जीव को सर्वदा मक्तपने का। ग्रथो में भेद-नय प्रधान व्यवहार दृष्टि से गुणस्थानादि गत प्रमग पावेगा, जबकि यह सारी जीव सर्वदा मुक्त है' जीव के ही भावो तथा गति इन्द्रियादि अवस्थानों के कथन इस कथन और मान्यता में प्रत्यक्ष मे ही विरोध है; क्योकि द्वारा तत्व ज्ञान कराने का परमपूज्य आचार्यों ने प्रयाम कर, इस जीव का मसार प्रत्यक्ष ही दिखाई दे रहा है।" तत्त्व जिज्ञामुग्रो की पावानमार ज्ञानपिपासा को शात करके प्राचार्यश्री के उक्त कथन से-दोनो नयो की परम्पर. महान उपकार किया है जिसमे हमे, नयो के पक्षव्यामोह विरोधी दृष्टिया होने पर भी वे सापेक्ष होकर दोनो ही सत्य । का परित्याग कर सम्यक्ज्ञान की प्रागधना द्वाग वीतराग है और निरपेक्ष दोनो ही प्रमाण विरुद्ध होने मे मिथ्या विज्ञान की प्रोर अग्रसर होना ही श्रेयस्कर है। है-यह स्पष्ट हो जाता है। __नयो के पक्षपात-वश उनसे राग-द्वेष करना अथवा इसके मिवाय, व्यवहार नय के अन्तर्गत उपचरित नय तत्त्वचर्चा में उसका प्रयोग कर विसंवाद करना और एक भी पाता है, जिसमें एक वस्तु के गण धर्मो को कारणवश दूसरे को मिथ्यादृष्टि कहकर संबोधन करना या परम्पर दूमरी वस्तु में प्रागेपित कर मथन किया जाता है, जैसे शव तापूर्ण व्यवहार करना-कगना न तो आवश्यक और घी रखे रहने के कारण मिट्टी के घडे को घी का घड़ा उचित है और न इससे अनादिकालीन मोह का विनाश कहते है अथवा पौद्गलिक देह में जीव के रहने में देह को होकर मम्तग्दर्शन की प्राप्तिपूर्वयः तत्त्व ज्ञान की उपलब्धि भी जीव कहकर व्यवहार किया जाता है। यह नय भी व चारित्र की पवित्रता ही सभव है। प्रत विद्वानों और म्लेक्षो को म्ले भाषा में ज्ञान कराने के समान, अजानियो प्रवचनकारी का यह परम कर्तव्य है कि वे अज्ञता वश अपने को जिस प्रचलित व्यवहार व भाषा मे तन्व समझाने की किसी प्रिय नय के मर्वथा पक्ष-व्यामोह के कुचक में फसकर आवश्यकता है उसी के सहारे तत्त्व बोध कराने में सहायक ग्रनेकांनात्मक जैन शामन का गला घोट एकातमिथ्यान्व के होने से हितकारी माना जाकर शास्त्रों व प्रव वनो मे उप- प्रचार-प्रसार से दूर रहे नया ममाज को नगर-नगर और योग में लाया जाता है। वक्ता का अभिप्राय घी का घडा गांव-गांत में इमी आधार पर फट डालकर दो भागो में Page #64 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ५६, वर्ष, ३२, कि०३-४ अनेकांत बांटने और लड़ाने का प्रयत्न न करें । भगवान् महावीर के रूप व्यवहार-चरित्न का पालन करते हुए पात्म-स्वरूप में अनुगामी होने के कारण उनपर जो अनेकांतपरक सत्य स्थिरतामयी वीतराग-निश्चय-चरित्र की प्राप्ति का सिद्धांत की ज्तोति पूर्वाचार्य परंपरा से प्रक्ष ण्ण रूप में, अभ्यास करमात्मस्वरूप में लीन होने को मोक्ष मार्ग दर्शाया मागम व अध्यात्मशास्त्रों में जगमगा रही है उसे अपनी है। प्रतः इसे यदि जिनवाणी का संक्षिप्त-गागर-में-सागर मझतावश ढंकने या बुझाने का दुरभिमान, चालाकी या जैसा सार कहा जाय तो अतिशयोक्ति न होगी। नासमझी से प्रयत्न करना और अपने दूषित अभिप्रायों को उस पर लादने का प्रयत्न करना सर्वथा अनुचित है-इस मंच को बृहद्रव्य संग्रह टीका व अन्य टीकाएं पर ध्यान दें। इस ग्रंथ की श्रीमद्ब्रह्मदेवकृत संस्कृत में एक विस्तृत प्रध में प्रतिपादित विषय अध्यात्मपरक प्रथम टीका है जो श्री परमश्रुत प्रभावक मंडल प्रगास द्वारा प्रकाशित है । यह संस्था सुविख्यात अध्यात्म यह ग्रंथ तीन अधिकारों में विभाजित है। प्रथम मर्मज्ञ श्रीमद्रायचन्द्रजी द्वारा संस्थापित है। ग्रंथ में प्रतिजीवाजीवाधिकार में केवल जीवद्रव्य का विभिन्न दष्टियों पादित विषय एवम् उसकी संस्कृत टीका के सम्बन्ध में उसकी से अवान्तर नव अधिकारी द्वारा प्रतिपादन किया गया है प्रस्तावना में हिन्दी में अनुवादकर्ता जयपुर निवासी तथा अजीव द्रव्य एवं उसके मेदों का लक्षणात्मक वर्णन सुप्रसिद्ध स्व. विद्वान् श्री पं. जवाहरलालजी शास्त्री ने अब करते हुए पचास्तिकाय में सम्मिलित द्रव्यो का सकारण से करीब ६५ वर्ष पूर्व वीर नि. २४४२ में निम्न वाक्य लिखे निरूपण भी है। दूसरे तत्वनिरूपणाधिकार में प्रास्रवादि हैं : तत्त्वो का भाव तथा द्रव्य स्वरूप उनके भेदों का सक्षेप में “इसमें ग्रथ के नामानुसार केवल जीवाजीवादि षट्दिग्दर्शन कराते हुए पुण्य और पाप का भी वर्णन किया द्रव्यो का ही वर्णन नही है। कित षट् द्रव्यो के परिज्ञान को गया है। तीसरे अधिकार में निश्चय और व्यवहार मोक्ष आत्मप्राप्ति का साधन दिखलाया गया है। इसीलिए यह मार्ग का स्वरूप दर्शाकर सम्यकनर्शन, ज्ञान, चारित्र का टीका अध्यात्म विषय का एक अच्छा ग्रथ है । प्रायः निश्चय उभय नयो से प्रतिपादन एव ध्यान की उपयोगिता, स्वरूप नय की मुख्यता को लिए हुए कथन होने से अध्यात्म विषय व भेदों को स्पष्ट करते हुए अंत मे तपश्रुतव्रत सहित सबसे कठिन विषय है। अल्पज्ञो की तो शक्ति ही नही है (व्यवहार चरित्र का भली-भाति परिपालन करनेवाला) कि वे इसके मर्म को समझ सके और जो बुद्धिमान है वे मात्मा ही निश्चय (ध्यान स्वरूप वीतराग) चरित्र का पान भी अनेकान्तमय मार्ग के मर्म को न जानने से पद २ पर हो सकता है, इसलिए तपश्रुतव्रत रूप व्यवहार धर्म के परि प्रमान्वित हो जाते हैं। यही नहीं, किन्तु कितने ही तो जैसे पालन की अनिवार्य रूप मे आवश्यकता एवं सार्थकता दिखा भाषा के प्रसिद्ध कवि और अध्यात्मरस के रसिक पं. कर अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए उनमे सदा ही लीन बनारसीदासजी केवल समयसार के पढ़ने से-'करणी को रहने की प्रेरणा की गई है। रस मिट गयो भयो न आतम स्वाद । हुई बनारसि की दशा इस प्रकार, व्यवहार मोक्ष मार्ग को निश्चय मोक्ष मार्ग जेम ऊंट को पाद।" इस दोहे के अनुसार एक बार व्यवहार का साधक दर्शाते हुए प्रथकर्ता ने दोनों नयो से उन्हें परस्पर चरित्र को जलांजलि दे चुके थे। उसी प्रकार, अन्य जन भी सापेक्ष मैत्री-भाव द्वारा जीवादि द्रव्यों एवं तत्त्वों का एकान्त निश्चय मार्ग का अवलम्बन कर अनेकान्तमय जिन निरूपण किया है तथा जीवादिक जिन प्रणीत तत्त्वो की धर्म के शिखर से पतन को प्राप्त हो जाते हैं । परन्तु निश्चय यथार्थ श्रद्धा एवम् सशय-विपर्यय-अनध्यवसाय रहित के साथ व्यवहार का कथन भी विद्यमान होने से इस ग्रंथ सम्यकज्ञान की प्राराधना करते हुए अशुभ क्रियामो से में सोने में सुहागा की कहावत चरितार्थ होती है और इसके निवृत्ति एवम् शुभ (व्रत समिति-गुप्ति)क्रियामों में प्रवृत्ति- पढ़ने से भ्रम उत्पन्न होने के बदले भनेक भ्रम भाग जाते हैं। Page #65 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्राकृत का बृहद्दव्य-संग्रह और उसकी महत्ता प्रतः अध्यात्म महल में चढने के लिए इस टीका को प्रथम भाषा में ग्रथ के भाव को समझने में सर्वसाधारण को उपमोपान कहा जावे तो अतिशयोक्ति न होगी।" योगी है। जैसे कि ग्रंथ की विस्तृत टीका के सम्बन्ध में उक्त द्रव्य-सग्रह मे तत्त्वार्थ की स्याद्वाद-परक गरिमापूर्ण विद्वान अनवादक महोदय ने अपने विचार व्यक्त किये है, सक्षिप्त विवेचना से प्राकृष्ट होकर स्वांतःसुखाय एक नवीन अध्यात्म का अभ्यास करने की रुचि रखनेवाले पाठको को पद्यानुवाद करने की अंतरंग से मुझे भी जो प्रेरणा मिली थी यह ग्रंथ व उसकी टीका कितनी उपयोगी है, यह सहज ही उसी के फलस्वरूप एक पद्यान वाद समाज की सेवा मे मैंने भी विदित हो जाता है। प्रस्तुत किया है और वह प्रकाशित हुआ है। इसमे राष्ट्र__द्रव्यसंग्रह की हिंदी टीकाग्रो मे एक महत्त्वपूर्ण टीका भाषा के माध्यम से ग्रथ के भाव को स्पष्ट करते हुए उसे (जो इसके भावानबाद को सम्पन्न कर लेने के पश्चात् मुझे गेय और नित्यपाठ करने-कराने के उपयुक्त बनाने का देखने में पाई है) द्रध्य-सग्रह भाषावनिका के नाम से तथा भरसक प्रयास किया गया है । इस प्रयास में सफलता कहा हिदी में ही चौपाई छदो में भाषा-पद्यानुवाद, जयपुर निवासी तक मिली, इसका निर्णय सहृदय विज्ञ पाठक ही कर विद्वद्वर प. जयचन्द्रजी छाबडा ने विक्रम स. १८६३ मे सकेंगे। पद्यानुवाद के साथ ही मूल गाथाओं का भाव स्पष्ट लिखी थी जो वाराणसी से वर्णी ग्रथमाला से प्रकाशित है। करने के उद्देश्य से सरल भाषा में भावार्थ भी दिया गया इन्ही ने समयसार परमात्मप्रकाशादि ग्रयों को सर्वप्रथम है। जैन तत्वज्ञान एवं अध्यात्म मे प्रवेश करने के हिदी मे टीकाए तथा मौलिक रचनाए भी सम्पन्न की है, उत्सुक धर्मबधुप्रो की प्राथमिक ज्ञान-पिपासा कोशात करने जिनसे समाज भलीभाति परिचित है। इसके मिवाय हिंदी में इससे निश्चय-व्यवहार नयो की समन्वित दष्टि से में विद्यार्थियों को विद्यालयों की कक्षाओं में अध्यापनार्थ अध्ययन करने पर यथेष्ट सहायता मिलेगी तथा अनेक अन्य अनेक विद्वानों द्वारो सक्षिप्त टीकाए भी हई है, जिनसे भ्रातिया भी दूर हो सकेंगी। समाज को बडा लाभ हुमा है। अभी-अभी १०५ श्री प्रायिका विदुषी रत्न माता ज्ञानमती जी का हिन्दी मे ही ५/१, तम्बोली बाग्वस, नवीन पद्यानुवाद भी सनावद से प्राप्त हुआ है जो सरल इन्दौर (मध्य प्रदेश) महावीर संवत : भारत का सर्वप्राची संवत भारत का सर्वप्राचीन सवत् महावीर संवत् है। इसकी प्रामाणिकता को सिद्ध करने के लिए मुप्राचीन विपुल माहित्य के अतिरिक्त शिलालेख भी मौजूद है। वीर निर्वाण सन् ८४ (ई० पू० ४४३) का यह शिलालेख अजमेर (राजस्थान) के पास बडली गाव में मिला था। वीर निर्वाण सूचक लेखो मे यह सर्वप्रथम लेख है। राजस्थानातर्गत अजमेर संग्रहालय में यह लेख सप्रति मौजद है, कहना कठिन है। कुछ भी हो. महावीरस्वामी के मोक्ष जाने के थोड़े ही समय के बाद का यह लेख महावीर सवत को सर्वप्राचीन सिद्ध करने के लिए पर्याप्त मुदढ प्रमाण है। "जैन साहित्य सशोधक", खण्ड १, पृष्ठ २११ में प्रसिद्ध इतिहासज्ञ डा० काशीप्रसाद जायसवान्न लिखते हैं कि "जैनो में करीब २५०० वर्षों से प्रचलित सवत्सर गणना की रीति हिन्दुनो मे सर्वोत्तम है। इससे प्राचीन काल से ऐतिहासिक पद्धति की वर्ष गणना हमारे देश में प्रचार मे थी, यह बात स्पष्ट सिद्ध होती है। यह पद्धति अन्यत्र नष्ट होकर सिर्फ जैनो में ही रहा है। जैन वर्ष गणना के प्राचार पर बुद्ध और महावीर के काल के बाद की ऐतिहासिक घटनाओं को मैंने कालक्रम से ठीक किया है । वह सुज्ञात गणना से बिल्कुल ठीक बैठता है। अनेक ऐतिहासिक विचारों का सकेत हमें जनो के ऐतिहासिक लेख एव पट्टालियो से भी मिलता है।" Page #66 -------------------------------------------------------------------------- ________________ भगवान महावीर का विचार तथा कृतित्व : समस्त विश्व के लिए अनुपम धरोहर डा० रामकुमार वर्मा जिस समय राजर्षि पुरुषोत्तमदास टंडन ने मुझसे प्रत्येक परिस्थिति में वस्तुस्थिति की ही वास्तविकता के विशेष प्राग्रह किया था कि मैं हिन्दी साहित्य का पालोच- रहस्य को पहचाना है। इसलिए उसने विरोध की अपेक्षा नात्मक इतिहास लिखू तो मैंने इस संदर्भ मे विशेष अध्ययन महयोग को जीवन का तथ्य समझा है। करना प्रारम्भ कर दिया था। हिन्दी साहित्य के प्रादिकाल जैनधर्म के इस सर्वब्यापी महत्व ने ही मुझे चौबीसवें का विश्लेषण करते समय मझे उत्तर अपभ्रश को शैली मे तीर्थकर वर्धमान महावीर के प्रति अपनी श्रद्धा समर्पित हेमचन्द जैन ध्यावरणाचार्य के दोहे तथा प्रबन्ध लेखक करने के लिए प्रेरित किया। उन्होने जीवन में उपलब्ध स्वयंभू पोर पुष्पदन्त की रचनाओं को पढकर, उनके सभी प्रकार के इन्द्रिय जनिन मुखो का परित्याग कर साहित्यिक उत्कर्ष से प्रसन्नता मिश्रित पूतहल भी हया सबोधि की प्राप्ति के लिए अपना जीवन उत्सर्ग कर दिया। था। इन चरित काब्यो को पढ़ने पर जीवन के यथाथ के तेइसवें तीर्थकर पाश्र्वनाथ के चातुर्याम (अहिंसा, सत्य, साथ, उमके उदात्त स्वरूप का जो निर्वाह किया गया है, अस्तेय और अपरिग्रह ) में महाबीर ने पचयाम (ब्रह्मचर्य) वह वास्तव में साहित्यिक शैली का एक उत्कृष्ट रूप ज्ञात जोडकर जीवन को जिस सुदृढ पथ पर प्रतिष्ठित किया, हुमा । उसके साथ ही साथ जैन साहित्य के अन्तर्गत धर्म वह संभवत: उनके पूर्ववर्ती किसी तीर्थकर द्वारा सम्भव मोर दर्शन की जो मीमासा प्रस्तुत की गई, वह इतनी नही हमा। वर्धमान महावीर वैशाली के अधिपति सिद्धार्थ विश्वसनीय और व्यावहारिक ज्ञात हुई कि मैन जैन साहित्य नरेश के राजकूमार थे। शक्ति, मौन्दर्य और साहस मे के प्रचुर प्रन्यो की खोज की और मुझे हिन्दी साहित्य के प्रतिम, किन्तु शैशव से ही परिवार में पार्श्वनाथ की मादिकाल की सामग्री यथेष्ट रूप मे प्राप्त हो गयी। अपने उपासना होने के कारण वे ऋजुता सहित वीतरागी थे। मालोचनात्मक इतिहास मे जैन धम और दशन की व्याख्या महात्मा बुद्ध से मैं उन्हें इस बात में श्रेष्ठ मानता ह क्योकि करते हुए, मैंने यह अनुभव किया कि हिन्दी साहित्य के बुद्ध के मन मे वैराग्य भावना तब द्रवित हुई, जब उन्होने विकास मे इन ग्रन्धो का विशेष महत्त्व है। श्रमणाचार और रोगो, वृद्ध पौर मृतक को देखा। तब उन्होने जीवन की श्रावकाचार के माध्यम से उन्होने जीवन क माध्यत्मिक नश्वरता का अनुभव किया, किन्तु महाबीर बधमान के भौर लौकिक परिवेशो का विभाजन करत हुए भी, उनम लिए इन उपादानो की कोई प्रावश्कता नही थी। इसीएक सामजस्य स्थापित कर दिया। इस सन्दर्भ में एक लिए मैंने उनके वैराग्य को उनका ऋजुसस्कार कहा है, जिज्ञासा मेरे हृदय में उत्पन्न हुई कि महात्मा बुद्ध वष्णव अर्थात् यह सस्कार उन पर बाहर से नही पाया किन्तु वह धर्म के अवतारो मे स्वीकृत होकर भी, धार्मिक दृष्टिकोण जन्मजात था। इस दृष्टि से मैं उन्हें महात्मा बुद्ध से महानतर मानता हूं। से इस देश से निर्वासित क्यो हो गये, जबकि जैनधर्म जो "जय वर्धमान" नाटक की रचना करते समय उनकी बौद्धधर्म के समानान्तर ही चलता रहा, माज देश की जनता वैराग्य भावना का वास्तविक रूप प्रखर करने के लिए मैंन का एक अविभाज्य अंग बना हमा है। इसका समाधान एक वस्तुबादी रूपरेखा प्रस्तुत की है । नाटक में सुप्रिया, मझे जैनधर्म के पनकान्त या स्याद्वाद में मिला । जन. रभा, तिलोत्तमा जैसी सुन्दर प्रप्सरामों को (सतो, रजो धम ने सत्य को विविध रूपा में देखा है, इसलिए उसन (शेष पृ० ६४ पर) Page #67 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जैनाचार्य और आयुर्वेद [जनाचार्यों ने भी अन्य भाचार्यों की भांति प्रायुर्वेद साहित्य के सजन ये अपना अपूर्व योगदान किया है। भावश्यकता इस बात की है कि अनुसन्धान द्वारा उम साहित्य को प्रकाश मे लाकर मायुर्वेद-साहित्य की वृद्धि की जाए और प्रायुर्वेद की दृष्टि से उसका समुचित मूल्यांकन किया जाए।] 0 श्री राजकुमार जैन संस्कृत-साहित्य की श्रीवृद्धि मे जैनाचार्यों ने अपना प्राश्चर्य होता है कि किस प्रकार उन्होंने अनेक विषयों पर जो महत्त्वपूर्ण योगदान किया है, वह सुविदित है । सस्कृत- अपनी अधिकारपूर्ण लेखनी चलाकर अपनी अद्भुत विषयसाहित्य का ऐसा कोई विषय या क्षेत्र नही बचा है जिस प्रवणता और विलक्षण बुद्धि-वैभव का परिचय दिया है। पर जैनाचार्यों ने अपनी लेखनी न चलायी हो। इसका इससे यह भी स्पष्ट होता है कि उन्हे उन सभी विषयों में मुख्य कारण यह है कि जैनाचार्य केवल एक विषय के प्रौढ प्रभुत्व प्राप्त था। उनका पाण्डित्य सर्वपदगत व्यापी अधिकारी नहीं थे, अपितु वे प्रत्येक विषय में निष्णात थे; था और उनका ज्ञान-रवि अपनी प्रखर रश्मियो से सम्पूर्ण अतः उनके विषय में यह कहना सम्भव नही है कि उनका साहित्य-जगत् को पालोकित कर रहा था। अधिकृत विषय कौन-सा है? जैनाचार्यों ने जिस प्रकार काव्य, अलंकार, कोश, छन्द, न्याय, दर्शन व धर्मशास्त्रों का प्रायुर्वेद-साहित्य के प्रति जैनाचार्यों द्वारा की गयी निर्माण किया था, उसी प्रकार ज्योतिष और वैद्यक विषय सेवा भी उतनी ही महत्त्वपूर्ण है, जितनी अन्य साहित्य के भी उनकी लेखनी से पछते नही रहे। अनेक उपलब्ध प्रति; किन्तु दुख इस बात का है कि जैनाचार्यों ने जितना प्रमाणो से पब यह स्पष्ट हो चका है कि जैनाचार्यों ने वैद्यक साहित्य निर्मित किया है वह अभी तक प्रकाशित नहीं प्रचुर मात्रा मे स्वतन्त्र रूप से वैद्यक ग्रन्थो का निर्माण कर किया जा सका है। यही कारण है कि वर्तमान में उनके मायुर्वेद साहित्य को वृद्धि मे अपना प्रभूतपूर्व योग दिया द्वारा लिखित अनेक वैद्यक ग्रन्थ या तो लुप्त हो गये हैं है। इस मम्बन्ध मे एक लम्बी सूची प्राप्त हुई है, जिससे अथवा खण्डिन रूप में होने से अपूर्ण है। काल-कवलित जैनाचार्यों द्वारा लिखित वैद्यक सम्बन्धी कृतियो का संकेत हुए अनेक वैद्यक प्रन्थो का उल्लेख विभिन्न प्राचार्यों की मिलता है । इनमे से कुछ कृतियाँ मूलरूप से संस्कृत भाषा वर्तमान में उपलब्ध पन्यान्य कृतियों में मिलता है। विभिन्न मे लिपिबद्ध हैं और कुछ हिन्दी मे पद्य रूप मे । जैन भण्डारों या मन्दिरो मे खोजने पर अनेक वैद्यक प्रन्यों के प्राप्त होने की सम्भावना है। प्रत: विद्वानों द्वारा इस जिन जैनाचार्यों ने धर्म-दर्शन-न्याय-काव्य-प्रलंकार दिशा मे प्रयत्न किया जाना अपेक्षित है। सम्भव है कि इन मादि विषयो को अधिकृत कर विभिन्न ग्रन्थों का प्रणयन वैद्यक ग्रन्थों के प्रकाश में प्राने से मायुर्वेद के उन महत्त्वकिया है, उन्ही प्राचार्यों ने वैद्यक शास्त्र का निर्माण कर पूर्ण तथ्यों और सिद्धान्तो का प्रकाशन हो सके जो प्रायुर्वेद अपनी मलौकिक प्रतिभा का परिचय दिया है। पूज्यपाद के प्रचुर साहित्य के काल कवलित हो जाने से विलुप्त हो स्वामी, स्वामी समन्तभद्र, प्राचार्य जिनसेन, गुरु वीरसेन, गये है। जैनाचार्यों द्वारा लिखित वंद्यक प्रन्थो के प्रकाशन गुणसागर श्री गुणभद्र, महर्षि सोमदेव, सिद्धवर्णी रत्नाकर से प्रायुर्वेद के विलुप्त साहित्य और इतिहास पर भी प्रकाश तथा महापण्डित पाशापर मादि जैनाचार्यों की विभिन्न पड़ने की पूरी सम्भावना है। कृतियों पर जब हम दृष्टिपात करते है तब यह देखकर बड़ा वर्तमान में केवल एक ही ऐसा वैयक ग्रन्थ उपलब्ध है Page #68 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ६० वर्ष ३२, कि०३-४ भनेकान्त खो जैनाच यं द्वारा लिखित है और प्रकाशित किया प्रलकार प्रादि के ग्रन्थों के प्रकाशन की तो व्यवस्था की गया है। श्री उग्रादित्याचार्य-प्रणीत उक्त वैद्यक ग्रन्थ का है, उसमे रुचि भी दिखायी है और उसके लिए पर्याप्त नाम 'कल्याणकारक' है, जिसका हिन्दी अनुवाद पोर गशि भी व्यय की है, किन्तु प्रायुर्वेद और ज्योतिष के ग्रन्थों सम्पादन प० वर्धमान पार्श्वनाथ शास्त्री (सोलापुर) ने के प्रति उसने कोई ध्यान नही दिया। यही कारण है कि किया है। इस ग्रन्थ का प्रकाशन सन् १९४० मे किया गया इस साहित्य की प्रचुरता होते हुए भी यह अभी अन्धकाराथा। सेठ गोविन्दजी रावजी दोशी (मोलापुर) ने इसे वृत्त है । अब तो स्थिति यहाँ तक हो गयी है कि जनाचार्यों प्रकाशित करवाया था। 10 रावजी सखाराम दोशी को द्वारा प्रणीत जिन ग्रन्थो की रचना का पता चलता है उन उत्कट प्रभिलाषा थी कि जैनाचार्यों द्वारा प्रणीत वंद्यक ग्रन्थों का अस्तित्व ही हमारे सामने नही है। अनेक स्थानों शास्त्र के प्रकाशन के सम्बन्ध में कुछ कार्य होना चाहिये। पर स्वामी ममन्तभद्र के वैद्यक ग्रन्थ का उल्लेख मिलता है, यही कारण है कि 'कल्याणकारक' ग्रन्थ के प्रकाशन के किन्तु वह ग्रन्थ अभी तक प्रप्राप्य है। 'श्रीपूज्यपादोदित' लिए उन्होने अथक परिश्रम किया। जब उन्हे यह मालूम प्रादि कथनो को उद्धृत करते हुए अनेक जनेतर विद्वान हमा कि श्री उग्रादित्याचार्य-प्रणीत एक समग्र जैन वैद्यक वैद्यक में अपना योगक्षेम चलाते हुए देखे गये है। किन्त ग्रन्य मैसूर गवर्नमेट लायब्ररी में मौजूद है, तो बिना किसी अत्यधिक प्रयत्न किये जाने पर भी पूज्यपाद विरचित ग्रन्थ प्रमाद और विलम्ब के तत्काल उन्होने उक्त प्रन्थ की प्रति प्राप्त नहीं हो सका। इसी प्रकार और भी अनेक ग्रन्थों का लिपि कराने की व्यवस्था की । प्रतिलिपि के पूर्ण हो जाने प्रकरणान्तर से उल्लेख तो मिलता है, किन्तु ढूढ़ने पर पर उन्होने प० वर्धमान पार्श्वनाथ शास्त्री से उसके संपादन उनकी उपलब्धि नही होती है। एव मनूवाद का प्राग्रह किया। पहले तो पण्डित जी को वर्तमान में उपलब्ध एवं प्रकाशित वैद्यक ग्रन्थ 'कल्याणसकोच हा कि प्रनभ्यस्त विषय में कसे हाथ डाला जाए कारक, को देखने से ज्ञात होता है कि जनेतर पायबंद के (क्योकि शास्त्रीजी धर्म-न्याय-दर्शन के तो प्रकाण्ड विद्वान प्रन्यो की अपेक्षा जैन बंधक गन्थो में कुछ भिन्नता पौर है, किन्तु मायुर्वेद विषय में उनकी अपेक्षित गति नही है); विशेषता प्रवश्य है । एक मौलिक विशेषता तो यह है कि किन्तु बाद में श्री दोशी के विशेष प्राग्रह के कारण मोर जैन मनीषियो, विद्वानो और विचारकों ने जिस प्रकार जैन वैद्यों का इस मोर उपेक्षा-भाव देखकर उन्होने यह अपने समग्र वाङ्मय प्रौर पाचरण में 'अहिंसा परमोधर्मः' गुरुतर भार अपने कन्धों पर लेना स्वीकार कर लिया। सिद्धान्त का परिपालन किया है, उसी प्रकार वैद्यक ग्रन्थों वैद्यक विषय मे यद्यपि उनकी गति नही थी, तथापि मे भी इस सिद्धान्त का निर्वाह करते हुए उसे प्रक्षण्ण बनाये 'कल्याणकारक' ग्रन्थ के अनुवाद और सपादन को रखा है। यही चारण है कि जैन वैद्यक प्रन्थ 'कल्याणप्रेरणा ने उन्हें इस कार्य हेतु उत्साहित किया. कारक, मे कही भी मद्य, मास और मधु का प्रयोग किसी जिससे उन्होंने 'चरक सहिता' मादि प्रायुर्वेद क ग्रन्थो का भी प्रौषधि मे अनुपान के रूप मे अथवा प्रौषधि के रूप मे मध्ययन किया और वैद्यक सम्बन्धी ज्ञान प्राप्त किया। निर्दिष्ट नही किया गया है। केवल उसी प्रौषधि और इससे उनका कार्य सरल हो गया और उनके लिए 'कल्याण- प्राहार-विहार का निर्देश है जो हिंसा से रहित सात्विक कारक' की दुरूहता भी समाप्त हो गयी। उसके बाद उन्होंने गुणो से युक्त है; क्योकि एक प्राणी की हिंसा से दूसरे प्राणी बड़े उत्साहपूर्वक लगन के साथ इस कार्य को सम्पन्न किया। की रक्षा जैनधर्म को अभीष्ट नहीं है। उसके अनुसार तो इसमें कोई सन्देह नही है कि जैनाचार्यों द्वारा लिखित प्राणि-मात्र को रक्षा उसका परम उद्देश्य है। मायुर्वेद के ग्रन्थो की सख्या प्रचुर है, किन्तु उन ग्रन्थो की कल्याणकारक' में शरीर के स्वास्थ्य की रक्षा और भी वही स्थिति है जो जैनाचार्यों द्वारा लिखित ज्योतिष विकारो से शरीर की मुक्ति हेतु भौषधि-सेवन तथा अन्य के ग्रन्थो की है । जैन समाज ने तथा अन्यान्य जैन सस्थाम्रो उपायो का पर्याप्त विवचन प्रस्तुत किया गया है, किन्तु मे जैनाचार्यों द्वारा प्रणीत धर्म-दशन-साहित्य-काव्य. इसका मूल उद्देश्य यह है कि स्वस्थ शरीर भोतिक रूप से Page #69 -------------------------------------------------------------------------- ________________ नाचार्य मोर मापूर्वर हृष्ट-पुष्ट हो कर केवल इन्द्रिय जन्य विषय-भोगों में ही में से एक भेद पूर्व (पूर्वगत) हैं। इस 'पूर्व' वेद के भी अनुरक्त न रहे, अपितु वह पात्मकल्याण हेतु प्रयत्न करे। पुनः चौदह भेद है। इन चौदह भेवो मे (पूर्व) 'प्राणावाय' जैनाचार्यों को दष्टि में शारीरिक स्वास्थ्य प्रारम-स्वास्थ्य नाम का एक भेद है। इसी प्राणायाय नामक प्रग में के लिए है, इन्द्रियजन्य विषय-भोगों के लिए नहीं। इस अष्टांग मायुर्वेद का कथन किया गया है। जैनाचार्यों के तथ्य का प्रतिपावन जैनाचार्यों ने स्थान-स्थान पर किया अनुसार मायुर्वेद या वैद्यक शास्त्र का यही मूल है। इसी के है। 'कल्याणकारक में सर्वत्र ही प्रौषधि के लिए केवल अनुसार अथवा इसी के माधार पर जैनाचार्यों ने वैद्यक बनस्पति, खनिज, क्षार, रस, रत्न, मक्ता, प्रवाल आदि शास्त्र का निर्माण अथवा प्रायुर्वेद के विषय का प्रतिपादन द्रव्यों का प्रयोग वणित है। इस प्रकार हिमाजनक द्रव्यो किया है। जैनागम के अन्तर्गत प्रतिपादित प्राणवायपूर्व का के सेवन का निषेध करते हुए अहिंसा के उपादान भून द्रव्यों। निम्न लक्षण बतलाया गया है- 'कायचिकित्साद्यष्टांगके सेवन से ही शारीरिक स्वास्थ्य-रक्षा का उपदेश दिया -रक्षा का उपदेश दिया आयुर्वेदः भूतकर्मजागुलिप्रक्रमः प्राणपानविभागोऽपि यत्र गया है। इसी प्रकार, शारीरिक स्वास्थ्य के लिए माचरण विस्तरेण वणितस्तत्प्राणावायम्" अर्थात जिस शास्त्र मे की शुद्धता पर भी जैन मनीषियों ने विशेष जोर दिया है। काय, तद्गत दोष तथा चिकित्सा प्रादि अष्टाग प्रायुर्वेद का भाचरण की शुद्धता शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के वर्णन विस्तारपूर्वक किया गया हो, पृथ्वी प्रादि महाभतों लिए तो उपयोगी है ही, उससे प्रात्मकल्याण का मार्ग भी की क्रिया, विषले जानवर और उनकी चिकित्सामादि तथा प्रशस्त होता है। इस प्रकार, केवल इहलौकिक सुख की प्राणापान का विभाग जिसमे किया गया हो उसे प्राणावायप्राप्ति हेतु ही शरीर को स्वस्थ, निरोग व हृष्ट-पुष्ट बनाना पूर्व शास्त्र कहते है। जैनाचार्यों को अभीष्ट नही था, अपितु इसलिए था कि द्वादशांग के अन्तर्गत निरूपित प्राणावायपूर्व नामक स्वस्थ शरीर के माध्यम से वह प्रात्मानचिन्तन और अग मूलतः मधमागधी भाषामे लिपिबद्ध है। इस प्राणावायमात्मपरिशीलन करता हुमा प्रात्मसाधन कर सके तथा पूर्व कमा म न वा पूर्व के प्राधार पर ही अन्यान्य जैनाचार्यों ने बंधक अन्यों ससार के समस्त बन्धनों को काट कर अपवर्ग को प्राप्त का प्रणयन किया है। श्री उग्रादित्याचार्य ने भी प्राणावायकर जीवन को सार्थकता को प्रतिपादित कर सके। पूर्व के प्राधार पर 'कल्याणकारक' नामक वैद्यक प्रग्य की जैन वाङ्मय मे अन्य शास्त्रों या विषयों की भांति रचना की है। इस तथ्य का उल्लेख प्राचार्यश्री ने स्थानमायुर्वेदशास्त्र या वैद्यक विषय की प्रामाणिकता भी प्रति- स्थान पर किया है। इसके अतिरिक्त ग्रन्थ के अन्त में पादित है। जैनागम मे वैद्यक विषय को भी प्रागम के उन्होंने स्पष्ट रूप से लिखा हैअग के रूप में स्वीकार किया गया है। जैनागम में केवल सर्वार्धाधिकमागघीयविलसदभाषापरिशेषोज्ज्वल प्राणावाय महागमादवितथ संगम संक्षेपतः । उसो विषय, प्रागम या शास्त्र की प्रामाणिकता है जो सर्वज्ञ प्रतिपादित है। सर्वज्ञ कथन के अतिरिक्त उग्रादित्यगुरुर्गुरुग्णरुद्भासिसौख्यास्पदं अन्य किसी विषय या स्वरुचिविराचस्व को कोई शास्त्र सस्कृतभाषयारचितवानित्येष भेदस्तयोः ।। -कल्याणकारक, अध्याय २५, श्लोक ५४ महत्त्व या स्थान नही है। सर्वज्ञ परमेष्ठी के मख मर्थात सर्व प्रर्थ को प्रतिपादित करने वाली सर्वार्धसे जो दिव्यध्वनि निकलती है, उसे श्रुतज्ञान के धारक मागधी भाषा मे जो अत्यन्त सुन्दर प्राणावाय नामक महागम गणघर परमेष्ठी ग्रहण करते हैं। गणधर-गृहीत वह दिव्य. (महाशास्त्र) अंग है उससे यथावत् सक्षेप रूप से सग्रह कर ध्वनि (जो ज्ञानरूप होती है। उनके द्वारा बारह भेदों मे उग्रादित्य गुरु ने उत्तम गुणो से युक्त सुख के स्थान भूत इस विभक्त की गयी, जिसे प्राचारांग प्रादि के रूप में उन्होंने शास्त्र की सस्कृत भाषा मे रचना की। इन दोनो (प्राणानिरूपित किया। गणधर द्वारा निरूपित बारह भेदो को वाय प्रग और कल्याणकारक) मे यही अन्तर है। 'द्वादशांग' की संज्ञा दी गयी है। इन द्वादशांगों में प्रथम इस प्रकार नागम मे मायुर्वेद या वैद्यक शास्त्र की प्राचाशंग है और बारहवाँ दृष्टिवाद नाम का अंग है। प्रामाणिकता प्रतिपादित है। प्रायुर्वेद, जिसे जैनागम में उस बारहवें दृष्टिवादांग के पांच भेद है। उन पांच भेदो (शेष पृ. ६४ पर) Page #70 -------------------------------------------------------------------------- ________________ बुद्ध और महावीर • देवसहाय त्रिवेद अभी तक लोग मानते रहे है कि नातपुत्र-ज्ञातृपुत्र महावीर का सुधार सम्प्रदाय पंचयाम धर्म के नाम से भगवान् बुद्ध के समकालिक थे क्योंकि सामान्यतः सभी स्यात है। चातुर्याम धर्म हैं-अहिंसा, सत्य, अस्तेय, मान लेते हैं कि ज्ञातृपुत्र ही महावीर वर्द्धमान है तथा अपरिग्रह जिनमे महावीर ने ब्रह्मचर्य जोड़कर पंचयाम निगंठ, निग्रंथ (बिना बंधन के) बौद्ध संघ की स्थापना धर्म की संज्ञा दी। के पूर्व भी एक महान सम्प्रदाय के रूप में विद्यमान थे। गोत्र-बौद्धों के अनुसार नातपुत्र का गोत्र था अग्निपाश्चात्य विद्वानों ने तो प्रारम्भ में भगवान् बुद्ध व महा- वेसान-पग्निवेश्यायन, किन्तु जैनो के अनुसार महावीर वीर को एक ही समझ लिया था। किन्तु अब यह शका का गोत्र या काश्यप । प्रतः तीर्थकर के गोत्र के विषय में प्रबल होती जा रही है कि क्या ये दोनों महापुरुष बद्ध हमे जैन परम्परा को ही श्रेय मानना चाहिए । बौद्ध प्रयों व महावीर समकालिक थे ? मे प्राय: निग्रंठ नाथपुत्र की चर्चा है तथा कभी-कभी नातनिगंठ-समगामसुत्त के अनुसार जब भगवान बद्ध पुत्र का भी उल्लेख मिलता है। किन्तु जैन परम्परा के शाक्य प्रदेश के सामगाम मे डेरा डाले थे, निगठ नाथपूत्र अनुसार महावीर का जन्म ज्ञातृकुल मे हुमा पा। इलाहाकी मृत्यु का समाचार एक शिष्य ने मानन्द को सुनाया। बाद विश्वविद्यालय के साक्टर बाबूराम सक्सेना अपने पत्र प्रचलित माम्य परम्परा के अनुसार भगवान बुद्ध व महा- ५ सितम्बर १९४० में कहते हैं-ज्ञात या ज्ञाति का रूप वीर की निर्वाण तिथि हैं--५२७ ख० पू० तथा ५४३ नय, नाइ, जाय या जाइ हो सकता है किन्तु नाथ का रूप खु० पू० (सिंहल)। प्रतः स्वयं बुद्ध गौतम भगवान ही नाय या नाइ नहीं हो सकता । नाथ का प्राकृत रूप होगा तीर्थकर महावीर निर्वाण के १६ वर्ष पूर्व ही (५४३- नाह या णाह। महाप्राण प्रक्षर मेरी समझ मे अबतक ५२७) चल बसे थे। मज्झिमनिकाय का उपालिसूत्त इतने विकृत नही हुए हैं। नाय का 'या' किसी व्य जन के कहता है कि निगंठ नाथपुत्र भगवान बद्ध की प्रशसा न लोप का द्योतक है। सह सके प्रतः उनके मुख से लाल रक्त टपकने लगा। चेटक-बौद्ध ग्रन्थों मे वैशाली के राजा सिंह का अत: यह मानना होगा कि निगंठ नाथपुत्र का निधन बुद्ध उल्लेख है किन्तु जैन ग्रन्थों मे वैशाली का राजा है चेटक। निर्वाण के बहुत पहले ही हो गया था। वैशाली जनों का गढ़ था। बौद इसे घृणा की दृष्टि से चातुर्याम - यह शंकास्पद है कि बुद्ध-महावीर प्रायः देखते थे, क्योकि यह प्रनास्तिकों व विद्रोहियों का अड्डा समकालिक थे जैसा कि लोग अभी तक मानते पा रहे है। था। बौद्धो के अनुसार वैशाली का शासन राजा, उपराज किन्तु इतना निश्चित है कि निगठ नाथपुत्र का निधन व सेनापति की सहायता से सध के द्वारा करता था किन्तु बुर निर्वाण से पूर्व हुमा । स्यात् यह निगंठ नाथपुत्र महा. जनों के निरयावली-सुत्त के अनुसार, काशी व कोसल में वीर का कोई पूर्ववर्ती जैन महंत था। दीघनिकाय में १८ गणराज्य थे । इनके सिवाय लिच्छवी, मल्लकी तथा निगठ नाथपुत्र के चातुर्याम सवर सवृत्तों का उल्लेख है। वैशाली के राजा थे चेटक । पाली चातुर्याम का प्राकृतरूप है चतुज्जाम जो तीर्थकर दो महान समाज सुधारक एक ही काल तथा क्षेत्र में महावीर के सभी पूर्ववर्ती सिद्धान्तों पर लाग होता है। अपने सिद्धान्त का प्रचार करें तथा वेद-ब्राह्मण धर्म को १. (क) भारत का नया इतिहास, पुणे १९७८, पृ० १.। (ख) भारतीय विद्या, बम्बई, भाग ८, पृ० २३४ । Page #71 -------------------------------------------------------------------------- ________________ बरमौर महावीर उखाड़ फेकने की चेष्टा करें, किन्तु दोनों मापस में कभी करण मगधराज बिम्बिसार से तथा उसके पुत्र कुणिकमिलकर इसे समूल नष्ट करने का यत्न न करें, यह एक कोणिक पजात-शत्रु से किया है जिससे बुद्ध और महावीर विचारणीय प्रश्न है। मेरे ख्याल से यदि वे समकालिक समकालिक सिद्ध किये जा सकें । किन्तु इस समीकरण में होते तो प्रवश्य मिलते। उनका कदापि सम्मेलन न होना अनेक दोष हैं। बिम्बिसार शिशुनागवशी क्षत्रीजा का पाश्चर्यजनक है। उत्तराधिकारी व पुत्र था। किन्तु श्रेणिक का पिता है कुमारिल भट्ट-तीर्थकर महावीर ही नही, पाश्र्वनाथ उपश्रेणिक जिसने श्रेणिक को घर से बाहर निकाल दिया (निर्वाण ८४६ ख० पू०) के पहले भी जैन धर्म प्रच- था और चिलाति को राज्य दिया। चिलाति भयोग्य था। लित था। ऋषभदेव (७६७३ ख. पू.) जैनी के प्रादि वह राज्य न संभाल मका । प्रतः मंत्रियो ने उसे राजपद तीर्थकर है। बौद्ध ग्रन्थों मे जैन सिद्धान्तों का खण्डन है से हटाकर श्रेणिक को राजा बनाया। कोणिक की माता किन्तु जैन ग्रन्थों मे बौद्ध सिद्धान्तों का पता भी नहीं थी चेल्लना जो वैशाली गण के राजा चेटक की कन्या थी। चलता। खुष्टपूर्व षष्ठ शती मे बौद्ध धर्म की जड़ जर्जर प्रजातशत्रु की माता थी कोसलदेवी जो कोसलराज प्रसेनहो गयी थी। कुमारिल भट्ट ने सनातन वैदिक धर्म श्लोक जित की बहन थी। कणिक की पट्टमहिषी थी पप्रावतीको दृढ तर्कसगत करने के लिए महावीर का शिष्यत्व घारिणी-सुभद्रा किन्तु अजातशत्रु की महिषी थी वजिरा किया। गुरुद्रोह के शाप से मक्त होने के लिए कुमारिल जो कोसलराज प्रसेनजित की पुत्री थी। अजातशत्र की भट्ट ने तीर्थराज प्रयाग में तुषानल मे अपना शरीर भस्म राजधानी थी पाटलिपुत्र किन्नु कुणिक की राजधानी थी कर देना उचित समझा, किन्तु शकराचार्य' (५०८-४७६ चम्पा, न कि पाटलिपुत्र । ख० पू०) ने उन्हें बचा लिया। उन्होंने भारत से बौद्धो पितघातक-कुणिक व अजातशत्रु दोनो पितृघातक का पत्ता काट दिया तथा मार्य वैदिक धर्म की पनाका भले ही हों, किन्तु स्वप्नेच्छा, अंगुष्ठपीडा तथा कोराफहरायी। यातना के विवरण में प्राकाश-पाताल का अन्तर है। श्रेणिक - श्रेणिक जैन संघ का नेता तथा महावीर का पिता की मृत्यु के बाद कुणिक ने चम्पा को अपनी राजसमकालिक था। उसकी रानी चेल्लना साध्वियों की नेत्री धानी बनाया। उसने अपना राज्य, सेना व कोष अपने थी। संस्कृत श्रेणिक के प्राकृत व पाली रूप क्रमशः सेणिय ११ भाईयो के लिए ११ भागो मे बांट दिया । चेल्लना के व सनिय है । कुछ प्राधुनिक विद्वानों ने श्रेणिक का समी- दो पुत्र हल्ल व बेहल्ल कुणिक के सगे भाई थे। श्रेणिक २. एज प्राव शकर, मद्राम, १९१६ यज्ञेश्वरः पिता यस्य जिन विजय नामक ग्रंथ में नारायण शास्त्री द्वारा महावादिर्महान् घोरः श्रुतीना चाभिमानवान् । लिखित लेख मे निम्न देखे जा सकते हैं । इसके अनुसार जिनानामन्तकः साक्षात् गुरुद्व ष्यातिपापवान् ।। जैन युधिष्ठिर संवत् का प्रारम्भ ४६८ कलि सवत् में ऋषिवारस्तथा पूर्ण मत्स्याक्षो वाम मेलनात् । हुप्रा । इनका जन्म युधिष्ठिर सवत् २०७७ तथा पराभव एकीकृत्य लभेताः क्रोधी स्यत्तत्र वत्सरः॥ २१०० है । अतः कुमारिल भट्ट का जन्मकाल है कलि भट्टाचार्यकुमारस्य कर्मकाण्डस्यवादिनः। संवत् २५४५ (२०७७+४६८) खष्टपूर्व ५५६ (३१०१- ज्ञेयः प्रादुर्भवस्तस्मिन् वर्षे यौधिष्ठिरे शके ॥ २५४५)। इनका पराभव ३२ वर्ष की अवस्था मे हुमा नन्दाः पूर्णभूश्च नेत्रे मनुजाना च वामतः । तथा शकर इनसे १६ वर्ष की अवस्था में प्रयाग मे ख. मेत्यजे वत्सरो धाता युधिष्ठर शकस्य वै॥ पू० ४६२ मे मिले थे। भट्टाचार्य कुमारस्य कर्मकाण्डस्य वादिनः । माघ्रोत्कलानां सयोगे पवित्र जयमगले ।। जात: पराभवस्तस्मिन विज्ञेयो वत्सरे शुभे । ग्रामे तस्मिन् महानदयां भट्टाचार्य कुमारकः ॥ ३. इण्डियन क्रोनोलाजी, भारतीय विद्या भवन, पान्घ्रजातिस्तैत्तिरीयो माता चन्द्रगुणा सती। बम्बई, १९६३ । Page #72 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ६४, वर्ष ३२, कि० ३-४ अनेकान्त ने सेचानक हाथी भोर १८ रनो का हार अपने पेटपोछना नथमल टाटिया की अध्यक्षता में हुई। इसमें प्राचार्य देवीसारले बेहाल को दे दिया था। इन्हे पाकर बेहाल गंगा चन्द शर्मा, लूणकरण विद्यार्थी, फूलचन्द जैन, नाथूलाल तीर पर मौज से इठलाता था। इसे देखकर कुणिक की जैन, वीणा जैन, कुसुम जैन, विजयकुमार धर्माधिकारी राजमहिषी पद्मावती की छाती पर साँप लोटने लगा। तथा जगतपाल जी ने भाग लिया। समवेत अभिमत पा कुणिक ने उन्हे हथियाना चाहा और सौंप देने की प्राज्ञा कि इस विषय पर गहन चिन्तन व विचार की प्रावश्यदी। मतः बेहल्ल सहायता के लिए अपने मामा चेटक के कता है । वया अन्य विद्वज्जन भी इस विषय पर समुचित पास पहुंचा। चेटक ने काशी व कोशल के १८ गणराज्यों 03 को, ह मल्लकी और ६ लिच्छवियो की सहायता से कुणिक (शेषांष पृ०५८ का) से लोहा लिया। किन्तु बौद्ध साहित्य मैं वंशाली व मगध तमो गणी प्रबतियों प्रतीक मानकर) उन्हें वैराग्य पथ से राज्य मे युद्ध का कारण है रस्नो की खान । कुणिक ने विचलित करने का प्रयास करते हुए दिखलाया गया है, श्येन व्यूह की रचना की तथा चेटक ने शकटव्यूह की। किन्तु जिस वैराग्य पर ये तीनों प्रवृत्तियाँ प्रभाव नही डाल इस प्रकार हम देखते है कि प्रजातशत्रु तथा कुणिक दोनों सकती, वह सर्वोपरि अभिनन्दनीय है। इसीलिए भगवान् की युद्ध नीति, सग्राम शंलो तथा दुर्गपतन की प्रक्रिया में महावीर के वैराग्य को जो अप्रतिम गौरव प्राप्त हपा है, महान् अन्तर है। वह उनकी कृतसंकल्प भावना पर प्राधारित है। मुनि नगराज ने अपने "श्रेणिक बिम्बिसार तथा ससार के किसी भी भय से सत्रस्त न होने के कारण कुणिक अजातशत्रु" मे भगवान महावीर की परम्परा तिथि उनकी निर्भयता उस समय प्रगट हुई है जिस समय शूल५३७ खु० पू० ठीक करने के लिए बुद्ध का निर्वाणकाल पाणि नामक यक्ष उन्हें सबस्त करने में असफल होता है। खु० पू० ५०२ मनमाने ढंग से मान लिया है। प्रतः बुद्ध निर्वाण की ५० तिथियां विद्वानो को चक्कर में डाल देती है। इस ख्याति में वर्धमान महावीर का ई०पू० ७०० वर्ष से मानवता के कल्याण के लिए बारह वर्ष तक जो अमर अतः प्रतीत होता है कि प्रचलित मान्य समीकरण संदेश वायुमण्डल मे गूजा है वह सदैव मानवता-विजय केतु निराधर है । दोनो सम्प्रदायाचार्य एक समय मे थे ही नहीं। इसी कारण बौद्ध व जैनो के धर्म ग्रंथ की भाषा भी एक को फहराने के लिए प्रत्येक युग को प्रेरित करता रहेगा। दूसरे से भिन्न है यद्यपि दोनो सम्प्रदाय अपने प्राचार्य के मानव-जीवन पथ को प्रशस्त करने के लिए भगवान महावीर वचनो को उद्धृत करने का दम्भ भरते है।। का विचार तथा कृतित्व समस्त विश्व के लिए एकअनुपम प्रतः मानना होगा कि प्रजातशत्रु ने खष्ट पूर्व घरोहर है। (वीर-निर्वाण-सेवा, इन्दौर के सौजन्य से) १९वी शती में भले ही वैशाली गणराज्य को हड़प लिया (शेषाश पृ० ६१ का) था किन्तु वहां पर पुनः छोटे-छोटे गणराज्य पनपने लगे। ' 'प्राणवाय' की मज्ञा दी गयी है, द्वादशाग का ही एक अंग .... तीर्थकर महावीर के काल में दक्षिण में बाधा का सितारा है। न वाङमय में द्वादशाग की प्रामाणिकता सर्वोपरि है, चमक रहा था। मगध में ही नहीं, समस्त उत्तरापथ में अतः उसके अन्तर्गत प्रतिपादित 'प्राणावाय' की प्रामाणिकता छोटे-छोटे सामन्त दो चावल को अपना खिचड़ा पकात भी सिद्ध हो जाती है। इस प्रकार जिस अष्टांग-परिपूर्ण थे। श्रेणिक व कूणिक इन्ही सामन्त राजामी म स था वैद्यकशास्त्र को इतर प्राचायो-महषियों ने प्रायुर्वेद की संज्ञा प्रतः कहा जा सकता है कि बुद्ध का निर्वाण खु०पू० १७६३, दी है उसे जैनाचार्यों ने 'प्राणावाय' की संज्ञा दी है। प्रजातशत्र के पाठवें वर्ष मे हुमा तथा भगवान महावीर का उपयुक्त विवेचना से यह स्पष्ट है कि जैनाचार्यों ने भी प्रादुर्भाव बुद्धनिर्वाण के प्राय: १२०० वर्ष बाद (१७६३- अन्य प्राचार्यों की भांति आयुर्वेद-साहित्य के सृजन में अपना ५२७+७२) हुमा। इसी कारण वे कभी न मिल सके अपूर्व योगदान किया है । प्रावश्यकता इस बात की है कि तथा बौद्ध प्रथो में महावीर का कही उल्लेख नही है। मनसन्धान द्वारा उम साहित्य को प्रकाश में लाकर मायुर्वेद इस विषय मे एक सगोष्ठी, जंन विश्वभारती, लाडन, साहित्य की वद्धि की जाए और मायुर्वेद की दृष्टि से उनका राजस्थान मे २१ जनवरी, १९७६ को निदेशक डाक्टर उचित मूल्यांकन किया जाए। ४. जैन विश्वभारती लाय, १९७४ । Page #73 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सांख्य-दर्शन में सृष्टि-निर्माण : तुलनात्मक विवेचन 0 सुश्री अंजू सुराना, मागरा भारतीय दर्शन में सुष्टि-निर्माण का प्रश्न महत्त्वपूर्ण कर्ता एवं स्वामी समझने लगता है। महकार तीन प्रकार रहा है। भारत के सभी विचारकों ने इस पर गहराई से का माना गया है-१. साविक, २. राजस और ३. तामस विचार किया है। भारतीय दर्शनों में सांस्य-दर्शन बहुत सात्विक प्रहंकार से एकादश इन्द्रियों-मन, पाच ज्ञानेन्द्रियों प्राचीन है। वह भी जैन दर्शन की तरह ईश्वरवादी नहीं है और पाच कर्मेन्द्रियों की उत्पत्ति होती है। तामस महंकार अर्थात् ईश्वर को सष्टि का कर्ता एवं निर्माता नही मानता से पांच तन्मात्रामों और पांच महाभूतो की उत्पत्ति होती है। सांख्य-दर्शन की मान्यता है कि प्रकृति और पुरुष का है। राजस अहंकार सत्व एवं तामस का सहयोगी है। संसर्ग होता है तब ससार की उत्पत्ति होती है। ज्ञानेन्द्रियाँ : नेन्द्रिय, श्रवणेन्द्रिय, घ्राणेन्द्रिय रसनेन्द्रिय सांस्य-दर्शन में सृष्टि-निर्माण के सम्बन्ध में मुरूपता और त्वगेन्द्रिय-इन पांचों इन्द्रियों के द्वारा क्रमशः रूप, प्रकृति की है। क्योकि पुरुष कर्ता नही है, वह निष्क्रिय है। शब्द, गंध, रस और स्पर्श का ज्ञान होता है। ये अहंकार कर्ता स्वयं प्रकृति है। इसलिए परिणमन भी पुरुष में नही, के परिणाम है और पुरुष के निमित्त उत्पन्न होते है। इस. प्रकृति में होता है। कारण स्पष्ट है कि पुरुष निष्क्रिय है, लिए साख्य-दर्शन इनका कर्त्ता प्रकृति को मानता है, पुरुष पौर प्रकृति सक्रिय । प्रकृति त्रिगुणात्मक है। तीनो गुण- को नही । पुरुष का नही, केवल भोक्ता है। रजो गुण, सतो गुण और तमो गुण जब तक साम्य अवस्था कर्मेन्द्रियाँ : पुरुष भोक्ता है। विषय की भोगेच्छा मे रहते है, प्रकृति शान्त रहती है, उसमे किसी तरह को की पूति ज्ञानेन्द्रियों एवं कर्मेन्द्रियो के द्वारा होती है । हलचल नजर नही पाती। जब तीनों गुणों मे विषमता कर्मेन्द्रियाँ भी पांच है-मुख, हाथ, पैर, मलद्वार एवं होती है, तब सष्टि का प्रादुर्भाव होता है। प्रकृति की जननेन्द्रिय । इनके कार्य इस प्रकार हैं-वाक, ग्रहण, गमन, सक्रियता से ही सृष्टि का निर्माण होता है। मल-त्याग और प्रजनन । वास्तव मे, इन्द्रियाँ अप्रत्यक्ष शक्ति सष्टि-निर्माण का कम : रूप हैं, जो इन अवयवों में रहती है और अपने-अपने विषयों सर्व प्रथम बुद्धि का उद्भव होता है। यह प्रकृति का को ग्रहण करती हैं। प्रथम विकार है । बाह्य जगत की दृष्टि से बुद्धि बीज स्व. मन : मन प्राभ्यन्तर इन्द्रिय है। वह ज्ञानेन्द्रिय रूप है, जिसमे से विराट् जगत् जन्म लेता है और अन्तर-दष्टि कर्मेन्द्रिय और दोनों से सबद्ध है। मन ही इन्द्रियों से विचार करें तो बुद्धि अर्थात् ज्ञान के द्वारा ही ज्ञाता को अपने-अपने विषयों की प्रोर प्रेरित करता है। ज्ञेय पदार्थों को जानता है। बुद्धि दो प्रकार की मानी गई मन वस्तुतः सूक्ष्म है, फिर भी सावयव है । अत: वह युगपत् है-जब सत्व गुण के प्राधिक्य से अद्धि उबद्ध होती है. भिन्न-भिन्न इन्द्रियों के साथ संयुक्त हो सकता है, क्योंकि तब उसे सात्विक बुद्धि कहते है और जब उसमे तमो गुण वह अन्त:करण है। मन, बुद्धि और अहंकार - ये तीनों की अधिकता होती है, तब उसे तामसिक-बुद्धि कहते है। अन्तःकरण है और ज्ञानेन्द्रियों तथा कर्मेन्द्रियाँ बाह्य करण सात्विक बुद्धि से व्यक्ति धर्म, ज्ञान, वैराग्य एवं साधना को है। प्राण की क्रिया अन्तःकरण से प्रवर्तित होती है और अन्तःकरण बाह्य करण से प्रभावित होता है। कुल प्रयोदशपोर गति करता है भोर तामसिक बुद्धि का प्रभाव बढ़ने करण होते है । पर वह प्रधर्म, प्रज्ञान एव विषय-विकारो की भोर दौड़ता पांच-तन्मात्रा : शब्द, स्पर्श, रूप, रस पौर गन्ध है। वस्तुत: बुद्धि का व्यापार पुरुष (पारमा) के लिए है। के सक्ष्म तत्त्वो को तन्मात्रा कहते है। पांच विषयो की बुद्धि के सहयोग से पुरुष स्व और पर(प्रकृति) का भेद समझ पाँच तन्मात्राएं होती हैं। ये इतनो सूक्ष्म होती है कि इन्हें कर अपने यथार्थ एव शुद्ध स्वरूप को प्राप्त कर सकता है। प्रत्यक्ष नही देख सकते। अनुमानसे ही इनका बोध होता है। प्रहंकार :प्रकृति का दूसरा विकार महकार है। पञ्च महाभूत : पञ्च सन्मात्रामों से पञ्च महायह बुद्धि का परिणाम है । बुद्धि की महता और ममता भूतों का प्राविर्भाव होता है। साम्य-दर्शन के अनुसार, भाव अर्थात् मैं और मेरापन का अभिमान ही अहंकार है। शम्द-तन्मात्रा से माकाश महामत की उत्पत्ति होती है। महंकार के कारण पुरुष भ्रम मे पढ़कर स्वयं को कर्म का स्पर्श और शब्द तम्मात्रा के संयोग से वायु की; शब्द, रूप Page #74 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ६६, वर्ष ३२, कि० ३-४ अनेकान्त मोर स्पर्श के सयोग से अग्नि की; रस, शब्द, स्पर्श और द्रव्य ऐसे हैं, जो सक्रिय है। पात्मा (पुरुष) शुद्ध है, उसका रूप तम्मात्रामों के योग से जल की; और पांचों तन्मात्रामों परिणमन अपने स्वरूप में होता है। कर्म पुद्गलों (प्रकृति) के संयोग से पृथ्वी की उत्पत्ति होती है । इसलिए इन पांचों से संबद्ध होने के कारण वह ससार में परिभ्रमण करता है। महाभूतों के गुण भी क्रमशः शब्द, स्पर्श, रूप, रस और यह सत्य है कि कर्म-पुद्गल एव उनसे बने योगों से ही नये गध है। कर्मों का पागमन होता है। कर्म पुद्गल ही पुद्गलों को विकास के दो रूप : प्रकृति का विकास एवं फैलाव प्राषित करते है। परन्तु यह भी उतना ही सत्य है कि दो रूपों में होता है-बुद्धि-सर्ग मोर भौतिक मर्ग । प्रथम प्रचेतन होने के कारण जड़-पुदगल (प्रकृति) स्वत: कुछ अवस्था मे बुद्धि, प्रहकार और मन प्रादि एकादश इन्द्रियों नहीं कर पाते। योगो मे स्पन्दन तभी तक होता है, की उत्पत्ति होती है। उसके पश्चात् तन्मात्रामो एव महाभूतों जब तक वे प्रात्मा से सबद्ध है और उन योगों से प्रागत कर्मकी उत्पत्ति होती है, जिसे भौतिक तत्त्व कहते है। पांच पुद्गलो का बन्ध जो होता है वह योगों से नही, परिणामों महाभूतों की उत्पत्ति के साथ ही सष्टि-निर्माण का कार्य एवं भावना से होता है। परिणाम (भाव) पास्मा के है। पूरा हो जाता है, इस प्रकार प्रकृति से मष्टि साकार रूप भले ही वे शुद्ध भाव (स्वभाव) नहीं है, अशुद्ध-भाव लेती है और वह विलोन भी प्रकृति में होती है। साख्य. (विभाव) है । परन्तु है प्रात्मा के हो। इसलिए इस अपेक्षा दर्शन के अनुसार मसार का सारा खेल प्रकृति का है, पुरुष से जैन-दर्शन संसारी प्रात्मा को कर्मा भी मानता है, केवल उसमे कुछ नही करता है। वह केवल इस खेल का द्रष्टा एवं भोक्ता है। भोक्ता नही। वह अपने प्राबद्ध कर्मों का कर्ता भी है, प्रकृति अचेतन है, जड़ है। परन्तु वह चेतन पुरुष से भोक्ता भी है और उनकी निर्जरा करके उनसे मुक्त होने सबद्ध होने के कारण क्रिया उसी मे होती है। पुरुष शुद्ध वाला भी वही है। इस तरह सृष्टि के निर्माण में दोनों में है, उसमे क्रिया नही होती, इसलिए उसे बन्ध भी नही यह ममानना भी है कि पुरुष (प्रात्मा) एव प्रकृति (कम. होता। कर्म, सुख-दुख, शुभ-अशुभ सब प्रकृति के धर्म है. पुद्गल) के सयोग से ही संसार गतिशील) है। इमलिए प्रकृति म ही होते है। पुरुष को फल का भोग इस. जैन-दर्शन पास्मा पुरुष) को ज्ञान स्वरूप मानता है लिए मिलता है कि वह भोक्ता है; जैसे राजा के मामने नतंकी और साख्य-दर्शन उसे (बुद्धि को, ज्ञान को) प्रकृति से नत्य करती है । नत्य की क्रिया गजा नहो करता, वह तो उत्पन्न मानता है। वह भी जैन-दर्शन की तरह ज्ञान के केवल द्रप्टा बनकर देवता है और उम नत्य का प्रानन्द शुद्ध-अशुद्ध दोनो रूप मानता है, परन्तु उसे पुरुष का लेना है। इसी प्रकार प्रकृति नृत्य करने वालो नर्तकी है स्वभाव नहीं मानता और वस्तु स्थिति यह है कि ज्ञान को और पुरुष इस ममार के इस नत्य का द्रष्टा एवं भोका प्रात्मा से पृथक किया नहीं जा सकता। वह तब भी मात्मा प्रर्थात् मानन्द लेने वाला, भोग करने वाला है। अचेतन में रहना है, जब कि मुक्त अवस्था में प्रकृति (कर्म एव प्रकृति सक्रिय कैसे होती है ? इसके लिए मांस्य-दर्शन में कमजन्य माधन) नहीं रहती।। बताया है कि गाय के सामने जब बछड़ा ग्राना है। नब मांख्य-दर्शन प्रकृति को परिणामी मानता है और उसके स्तनो में दूध की धारा स्वतः ही प्रवहमान हो जातो पुरुष को प्रपरिणामो। परन्तु जैन-दर्शन प्रकृति (पुदगल) है। इसी प्रकार पुरुष का विम्ब पड़ने सही प्रकृति में की तरह पुरुष (प्रात्मा) को भी परिणामी नित्य मानता सक्रियता प्रा जानी है और वह सष्टि- निर्माण के कार्य में है। पात्मा का परिणमन अपने स्वभाव मे एवं अपने स्वरूप सक्रिय हो जाती है। में होता है। लोक मे स्थित छहो द्रव्य-धर्म, अधर्म, पाकाश, सारूप-दर्शन जन-दर्शन के काफी निकट है। जैन-दर्शन काल, पुद्गल एव जीव अपने-अपने गुणों मे परिणमन करते भी ईश्वर का सृष्टि का कर्ता स्वीकार नहीं करता। मृष्टि है। प्रत्येक द्रव्य अनन्त गुणों एवं पर्यायों से युक्त होता है। मनादि-अनन्त है। उसका निर्माता कोई ईश्वर नही है। प्रतः द्रव्य की अपेक्षा से नित्य रहते हुए उसकी पर्यायों में इस बात को जन-दर्शन भी स्वीकार करता है कि प्रात्मा परिण मन होता है। परिणमन से उमकी नित्यता मे कोई स्वरूप की दृष्टि से शुद्ध है । मात्मा और पुद्गल-दो ही बाधा उपस्थित नहीं होती। Page #75 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जैन धर्म की प्रासंगिकता 0 डा० निजामुद्दीन ["भनेकान्तवादी समन्वयवादी होता है, वह परस्पर-विरोधी मतों, विचारधारामों में सहिष्णुता की मिठास घोल कर उनकी कटुतामों को नष्ट कर उन्हे सर्वग्राही बनाता है। जैनधर्म का यह सिद्धान्त प्राज के संघर्षा कूल युग के लिए बहुत ही प्रावश्यक एवं उगदेय है। इसकी शरण में पाकर साप्रदायिक और राजनीतिक समी प्रकार के संघर्षद्वन्द्व समाप्त हो जाते हैं । प्राधुनिक बौद्धिक एवं ताकिक युग मे पनाग्रह दृष्टि बनाता है। जैन धर्म का यह सिद्धान्त प्राज के संघर्षा कुल द्वारा ही सत्याग्वेषण किया जा सकता है। प्राग्रहजन्य युग के लिए बहुत ही भावश्यक और उपादेय है। इसकी मात्यन्तिक दृष्टि मिथ्यावाद की धुन्ध मे लिपट कर मनुष्य शरण में पाकर साप्रदायिक और राजनीतिक सभी प्रकार को अपने धर्म से विचलित कर देती है। उसकी वह दृष्टि के संघर्ष-द्वन्द्व समाप्त हो जाते है। विश्व की सबसे दूसरों को तो भली प्रकार देख नही पाती, स्वयं को भी बड़ी शान्ति स्थापित करने वाली सस्था यू०एन० प्रो. नही देख पाती। एक मन्तुलित एव मम्यक दृष्टि जब अपने मिशन मे प्रमफल हुई तो इम कारण ही कि प्राप्त कर हम दूसरों को, अपने को, देखकर ज्ञान-लोक में सदस्य देश सकीर्ण विचार धारा मे बाहर नही निकल उतर सकते है। जैनधर्म की प्रासगिकता इस दृष्टि से स्वय- सके, वे एक-दूसरे के प्रति सहिष्ण नहीं बन सके. सिद्ध है कि उसका अनेकान्तवाद का मिद्धान्त सभी प्रकार उनके विचार-तन्तु ममन्वयात्मक दृष्टि मे से उद्भूत नहीं के दुराग्रहो की घन्ध को विच्छिन्न करता है और एक थे, वे अनेकान्तवाड़ी नहीं थे। अपने ही देश में गजनीतिक सामंजस्यपूर्ण दृष्टिकोण को पल्लवित करता है, समतामय उथल-पुथल पर दृष्टि डालकर देखिये तो यहाँ भी विचारधारा को विकसित करता है। आज समाज मे, देश अनेकान्त-रहित दृष्टि ही प्रमख कारण है। जैनधर्म तो मे, विश्व मे विचारो का संघर्ष है। सभी अपने-अपने दष्टि- एकत्व और भनेकत्व दोनों को सत्य मानकर अगीकार कोण को मूल्यवान समझकर दूसरों के दप्टिकोण को करता है । जैनधर्म में भगवान महावीर ने मामाजिक और अवहेलित तथा खण्डित करते है । दूसरो की बात को, मन राजनीतिक, प्रार्थिक और साम्प्रदायिक मभी प्रकार की समस्याओं का अहिंसात्मक समाधान अनेकान्तवाद द्वारा को सहानुभूति और महिष्णुता के साथ न सुनना पारम्परिक प्रस्तुत किया है, जिसकी उपयोगिता प्राज अधिक तीव्रता सघर्ष को हवा देना है। हमारे देश मे माप्रदायिक दगो की मे अनुभव की जा रही है। विभीषिका देश को प्राक्रान्त किये है। सिक्खो के जत्थों में जैनधर्म की प्रामगिकता पर विचार करते हए कई बार खून-खराबा हो चुका है। पिछले कुछ महीनो में सामाजिक एकता को सामने रखना होगा। प्राज हमारा हिन्दू-मुसलमानो के दंगों में मनुष्य-जाति का अनमोल रक्त समाज न जाने कितनी जातियो-उपजातियों में विभक्त है बहाया गया, हिंसा का क्रूरतम रूप कभी सभल, कभी और उस पर तुर्रा यह कि ये जातियाँ-उपजानियाँ ऊँच-नोच की हीनता की ग्रन्थि मे इतनी बुरी तरह फैपी है कि जो अलीगढ़, कभी जमशेदपुर प्रादि में देखा गया। बेचारे नीच घोषित कर दी गयो वह बम प्रलय काल तक -सृष्टि असख्य हरिजनों को धधकती ग्राम में जीवित झोका गया। के अन्त तक-नीच ही बनी रहेगी। हरिजनो का ही ये हृदयविदारक घटनाएं केवल इसलिए हई कि लोगों में लीजिये; मंविधान में समानता के अधिकार की घोशणा वैचारिक सहिष्णुता नही, पनाग्रह दष्टि नही, सर्वधर्म-सम की गयो, फिर भी शामन को, सरकार को हरिजनों को र भावका उदारवादी दृष्टिकोण नही, जो जैनधर्म के अनेकान्त- संविधा के लिए. उनके जीवन स्तर को ऊंचा उठाने के लिए बाद मे पभिनिहित है। अनेकाम्तवादी संघर्षवादी नही हो विशेषाधिकारो की घोषणा करनी पड़ी; परन्तु इन सकता, अनेकान्तवादी दुराग्रह द्वारा अपने मत को सर्वोत्तम विशेषाधिकारी को भोग कर अपना जीवन स्तर ऊपर नहीं कह सकता । अनेकान्तवादी समन्वयवादी होता है, वह उठाने वाले क्या समाज में समादत है ? नहीं। बाबू परस्पर विरोधी मतों, विचार-धारामो में सहिष्णुता को जगजीवन राम हमेशा से मन्त्री पद पर रहे हैं, परन्तु माम मिठास घोलकर उनकी कटुता को नष्ट कर सर्वग्राही लोगो ने इन्हे 'हरिजन' ही समभा। जैनधर्म में इस प्रकार Page #76 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ६८, वर्ष ३२, कि. ३-४ बनेकान्त के जातीय भेदभाव का कलंक नहीं। डा. राधाकृष्णन् ने पर जितना अधिक जोर दिया गया, शायद वैसा जोर विश्व ठीक कहा है-'जन-दर्शन सर्वसाधारण को पुरोहित के के किसी धर्म में नहीं दिया गया। जैन समाज में बालक समान धार्मिक अधिकार प्रदान करता है। क्या कोई को बचपन मे हो अहिंसा का पाठ मां को गोद में पढ़ाया हरिजन वेद-उपनिषद् का महान् पण्डित होकर इस प्रकार जाता है। अहिंसा भोर सेवा-भाव का प्रसार जैन समाज ने धार्मिक अधिकार ग्रहण कर सकता है हिन्दू समाज मे? इतना अधिक किया है कि समाज के किसी वर्ग ने इतना जैनधर्म तो लोकधर्म है, समाजधर्म है, उसमे व्यक्ति के नहीं किया। अनेक पोषघालय, समाज-सेवी संस्थाएँ, विकास की पूर्ण स्वतन्त्रता है। बदलते हुए सन्दर्भो मे कालेज जैन समाज द्वारा सारे देश में चलाये जा रहे हैं। जैन धर्म का मूल्य उत्तरोत्तर बढ़ता जाता है। समाज मे राष्ट्रीय उद्योग को विकसित पौर संबंधित करने में जैन एकता पौर समानता स्थापित करने के लिए जैनधर्म की उद्योगपतियों का योगदान स्वर्णाक्षरों में लिखने योग्य है। मोर देखना होगा। हम यों नही कहेगे कि जैनधर्म, जो जनधर्म मे तुच्छ-से-तुच्छ पोर हिसक-से-हिंसक प्राणी को भगवान ऋषभदेव से भगवान महावीर तक श्रमण-धर्म की मारने का पूर्ण निषेध है; लेकिन आज को हिंसा पशु-पक्षी शिक्षामों को तात्कालिक प्रावश्यकतामो के अनुकूल प्रचा- को मारने, किसी जीवधारी को सताने तक सीमित नही; रित करता रहा, बदल गया है। हम तो यह मानते है उसने भी अपने क्षेत्र का विस्तार काला धन, उत्कोच, कि वह बदला नहीं, बल्कि उसका क्षेत्र और अधिक विस्तृत चोरी-डकैती, जमाखोरी, खाने-पीने की वस्तुप्रों में मिलावट, हो गया है। वह 'जीव-मूल्यों के साथ 'जीवन-मूल्यों की तस्करी या स्मगलिंग मादि रूपो में किया है। ये सब बातें भी कहने लगा है। उसकी प्राचार गत अहिमा सामाजिक दोष है और समाज विरोधी तत्त्व इन्ही के द्वारा विचारगत अहिंसा की भूमि में पहुंच गयी है। व्यक्तिगत रातो-रात लखपति बन जाते हैं। जैनधर्म में प्रस्तेय का उपलब्धि सार्वजनिक बनती जा रही है। महावीर ने घर. सिद्धान्त जहाँ चोरी डकैती का निषेध करता है, ऐसे पाप. बार छोड़कर जो व्यक्तिगत कैवल्योपलब्धि प्राप्त की वह मय कुकर्म से बचने का प्रादेश देता है, वही अपरिग्रह का सार्वजनिक ही तो है। क्या उनके समवसरण के द्वार सभी मिद्धान्त जमाखोरी, खाने-पीने की वस्तुप्रो मे मिलावट, के लिए खुले नही थे ? कसाई, चोर-जार, ज्ञानी-मूर्ख, तस्करी प्रादि से बाज रखता है। महावीर ने अपरिग्रह बाल-बद्ध, स्त्री-पुरुष मभी बिना किसी भेदभाव के वहीं का मिद्धान्त सामने रखकर वर्तमान यूग की समस्याम्रो का सम्मिलित होते थे। जैनधर्म की यह समन्वयवादी या महिसात्मक समाधान प्रस्तुत किया। बुरे कर्मों से समाज समानतावादी विचारधारा हमारे समाज में एकता स्थापित बुराई मे फंसेगा ही, दुर्गन्ध से वातावरण दुर्गन्धित होगा कर सकती है ; उससे हम अपने राष्ट्र की एकता को अधिक ही। अच्छे कर्मों के फलों की सुगन्ध ही दूर-दूर तक फैलती मजबूत बना सकते है । महावीर ने वर्गहीन समाज को है। नारायणोपनिषद' मे कहा गया हैस्थापना की थी, प्राज हम भी समाजवाद के द्वारा उस यथा वृक्षस्य सपुष्पितस्य दूराद्गंधो वाति । मादशं को छने का प्रयाम कर रहे है। प्राज जातीय बन्धनो एव पुण्यस्य कर्मणो दूराद् गंघो वाति ।। को तोडकर जो एक नया समाज बनता नजर आता है, अर्थात् फूले हुए वृक्ष को सुगन्ध दूर-दूर तक फैल उसने जैनधर्म को प्रात्मसात् क्रिया है, ऐसा मालूम होता जाती है, वैसे ही पवित्र कर्मों की सुगन्ध दूर-दूर तक है। प्राचार्य तुलमी पौर एलाचार्य मुनि विद्यानन्दजी मादि पहुचती है। जैनधर्म का अपरिग्रह का सिद्धान्त भी एक के उपदेशो को उसने मात्मसात् किया है। पुष्पित वृक्ष है, उसके गुणों की सूगन्ध फैलनी ही चाहिये । कालानुसार पुरानी मान्यतामों के रूप बदलते हैं, जहां कही परिग्रह है, लट-खसोट है, उसकी दुर्गन्ध को नवीन और व्यापक होते हैं । अहिंसा प्रवश्य परम धर्म है। अपरिग्रह की सुगन्ध नष्ट कर सकती है। समाचार-पत्रों में किसी को मारना, सताना, पीटना हिसा है। लेकिन भाज पढने को मिलता है कि अमुक गाव या नगर में डाकुमों ने हिंसा युग-सन्दमो मे कुछ नवीन रूप धारण कर सामने घर में घुस कर हत्याएं की पौर हजारों का माल लेकर माती-जाती है। यह मानना होगा कि जैनधर्म मे अहिंसा फरार हो गये, या प्रमक राह चलती स्त्री के गले की स्वर्ण प्रतिको Page #77 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जंग की प्रासंगिकता रहण चेन खींच कर कोई भाग गया, या प्रमक युवती को दहेज भमि को छ सकता है। हमारे नेतामों-राजनेतामों की कम लाने पर गला घोंट कर या मिट्टी का तेल छिड़क बातों में कोई तालमेल नहीं होता; जो वे कहते है, वह कर हत्या कर दी गयी । इन सब के पीछे परिग्रह को करके नहीं दिखाते-शायद वे कानून अपने लिए नहीं, दूसरों बुराई है। वह परिग्रह जिसे जैनधर्म में बजित घोषित के लिए पास करते है । समाज की प्रार्थिक विषमता का किया है। मनुष्य घनाजंन करे, परन्तु उचित साधनों से समाधान जैनधर्म के अपरिग्रहवाद मे खोजना होगा। प्राज पोर उचित मात्रा में उससे दूसरों की सेवा करें। अपरिग्रह उसकी उपादेयता महावीर के युग से काफी अधिक है। को हमें महावीर के इम पादर्श को सामने रखकर ग्रहण हमारा देश जैसा वहुधर्मी है, वैसा बहुभाषी भी है। करना चाहिये कि जिससे दूसरो की सेवा की जा सके, यहां संकीर्ण विचारधारा के कारण लोग भाषा को भी देश का नवनिर्माण किया जा सके, प्रपने से अधिक दूसरो धर्म का चश्मा चढा कर देखते है । मुसलमानो की भाषा को सुख पहुचाया जा सके। महावीर नही चाहते थे कि कोई उई बतायो जाती है, सरकार भी इस भावना का शोषण गरीब हो, गरीबी के अभिशाप मे फँसा हो । जैनधर्म की करती है । कही उर्दू अकादमी बनाकर, कही गालिब दृष्टि समाजवादी है, लेकिन दूसरे प्रकार की। मपरिग्रह प्रकादमी खोलकर, कहीं उर्द-प्रध्यापकों की भर्ती का नारा को हम समाजवाद के निकट रख सकते है, लेकिन लगाकर सरकार मुसलमानो की भावना से उचित-अनुचित अपरिग्रह को समाजवाद नहीं कह सकते । समाजवादी लाभ उठा रही है। हिन्दी को अहिन्दी-भाषियों पर प्रादशं यह है कि कोई मुझसे बड़ा न हो, सब मेरे बराबर थोपने का बे-सिर-पैर का नारा लगाकर दक्षिण प्रदेश के हों। अपरिग्रहवादी प्रादर्श यह है कि कोई मुझसे छोटा लोगों को भडकाया जाता है। कश्मीर भी एक महिन्दी न हो, बड़ा चाहे हों। वह जो कुछ अपने पास रखता है उसे भाषी प्रान्त है। यहाँ की बहुसंख्यक प्राबादी मुसलमानों को दूसरो में भी बांटना चहता है। केवल मरीबी मिो या है, उनकी मातृभाषा कश्मीरी है, जिसमे संस्कृत के ७० वस्तुमो के मूल्य कम करो के नारे लगाने से समस्या का प्रतिशत शब्द व्यवहृत हैं। यहाँ के मुख्य मंत्री शेख मोहम्मद निदान नही हो सकता । गरीबी यदि मिटानी है, वस्तुप्रो अब्दुल्ला ने आठवी कक्षा तक सरकारी स्कूलों में हिन्दी के मूल्यो को बढ़ने से रोकना है, जमाखोरी या तस्करी अनिवार्य घोषित की मोर 'मोकाफ ट्रस्ट' की मोर से जो को नष्ट करना है तो जैनधर्म मे निर्दिष्ट अपरिग्रहवाद को विद्यालय चलाये जाते हैं उनमे भी शेख साहब ने हिन्दी को स्वीकार करना होगा । प्राज इसी सिद्धान्त की समाज अनिवार्य विषय घोषित किया। 'प्रोकाफ ट्रस्ट' के अध्यक्ष को मधिक पावश्कता है । इसी के द्वारा प्रायिक विषमता शेख साहब हैं । यहा भाषा की समस्या को शेख साहब ने जन्य अनेक समस्यामों को सरलता से हल किया जा सकता धर्म से नही जुडने दिया। दूसरे प्रान्तो मे अवश्य प्रान्तीयता है। जब तक परिग्रहजन्य छीना-झपटी रहेगी, वस्तुप्रो का या धर्म की सकीणता को लेकर भाषा का होमा खड़ा किया सचय किया जाता रहेगा, वस्तुओं के मूल्य बढ़ते रहेगे- जाता रहा है। जब जनधर्म पर दृष्टि डालते है, तब गरीब और गरीब, अमीर और अमीर होते रहेंगे पोर देखते हैं कि उसका भाषा के प्रति कोई दुराग्रह नही रहा समाज या देश सुख-शान्ति से वञ्चित रहेगा। लोग दरिद्रता कोई सकीर्ण विचार नहीं रहा । संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रश, के चक्र में फंसे मसहाय दम तोड़ते रहेगे । देश दुर्व्यसनो हिन्दी, अंग्रेजी, गुजराती प्रादि अनेक भाषामों में उसका मे जकड़ा रहेगा। कानून पास करने से हृदय नही बदलता। माहित्य है। यहाँ जैनधर्न को प्रासंगिकता स्पष्ट है। मतहृदय बदलता है, ज्ञान से, अहिंसा से, अभ्यास से। यहाँ भेदो को सामंजस्यपूर्ण उदारता और शालीनता से दूर कथनी और कम में समानता होनी पावश्यक है । लोग हृदय किया जा सकता है। भाषा को अपने युग की विचारसे अपरिग्रही हों, तभी वे भौतिकता से ऊपर उठ कर घारा को व्यक्त करने का माध्यम मानकर ही स्वीकार माध्यात्मिक लोक मे पहुंच सकते हैं । इस प्रकार परिग्रह करना चाहिए । जैनधर्म में उसी भाषा को स्वीकार किया भौतिकता भोर माध्यात्मिकता के बीच सुदढ़ सेतु का जाता रहा जो उस युग में प्रचलित थी। भाषा-भेद को काम करता है। वह बचनानुसार कर्म कर के अध्यात्म. मिटाने के लिए जैनधर्म की नीति अपनानी होगी। 00 Page #78 -------------------------------------------------------------------------- ________________ - जिनागम में प्रतिपादित उपचरित कथन का रहस्य 0 श्री महाचन्द्र जैन, इम्फाल (आसाम) मोक्षमार्ग की समझ के लिए वचन के अर्थभूत उप- संशय, विपर्यय, और अनध्यवसाय रूप समझ हो जाने चरित पदार्थ के कथन को जिस प्रकार से किया जाता है, के कारण ऐसे प्रतिपादन करने वाले वचनों को मिथ्या उसी प्रकार से मानना भी चाहिए या इस प्रकार से किये वचन कहते है तथा प्रथंभूत पदार्थ जैसा है, वैसा ही यथार्थ हुए कथन के समझने मे कुछ विशेषता है, इसके रहस्य समझ हो जाने के कारण ऐसे प्रतिपादन करने वाले को समझने के लिए सर्वप्रथम कथन के प्रर्थात् वचन के । भेदों-प्रभेदों द्वारा स्वरूप को समझना पावश्यक है। ____ सत्य वचन द्वारा अर्थभूत पदार्थ जैसा है, वैसा प्रतिमोक्षमार्ग तथा संसार मार्ग एक दूसरे के विरुद्ध अलग पादन अभिधेय रूप मे मभिधा-वृत्ति नामक शक्ति द्वारा लक्ष्य रूप में लक्ष्णावति नामक शक्ति द्वारा तथा व्यंग रूप अलग मार्ग है, इसलिए संसार मार्ग की अपेक्षा एवं मोक्ष मार्ग की अपेक्षा से कथन की समझ भी भिन्न प्रकार से मे ब्य जनावृत्ति नामक पदार्थ प्रतिपादन शक्ति द्वारा किया होनी चाहिए, यदि मोक्षमार्ग के कयन की समझ भी जाता है। विशेष इतना समझना चाहिए कि अभिधेय रूप संसार मार्ग के कथन की तरह मे ही समझी या मानी जावे प्रतिपादित पदार्थ का कथन मख्य व उपचरित के भेद से दो प्रकार का होता है। तो समझ की शुरुआत हो विपरीत होने की वजह से । इम प्रकार कथन की अपेक्षा से समझने के लिए पदार्थ मिथ्यात्व की ग्रन्थि खोलने का गब्द द्वारा वचन मे अभि मे भी मुख्य व उपचार का भेद किया जाता है। प्राय रखते हुए भी समझने का समस्त पुरुषार्थ विपरीत हो मुख्य कथन वह कहलाता है जिसका अस्तित्व स्वयं जाने के कारण मिथ्यात्व की गाट नहीं खुल सकेगी। सिद्ध हो तथा जिमका अस्तित्व स्वयसिद्ध नही होकर जिस तरहसे संसार मार्ग के लिए जीवन में प्रति समय निमित्त तथा प्रयोजनके प्राधार पर सिद्ध हो, वह उपचारित गुजरने वाले सम्बन्धो तथा सम्पकों के लिए समझ अपनाई कथन कहलाता है। जाती है; उससे भिन्न प्रकार की समझ रंगमच पर नाटक इसी उपचरित कथन द्वारा स्वयं के अस्तित्व की वगैरह मे अभिनय करते समय, मुख से सभी तरह के वचन सिद्धि में जो निमित्त रूप प्राधार कथन होता है, वह लक्ष्य कहते हुए भी उन वचनों द्वारा अपनी समझ या मान्यता रूप पदार्थ का कथन कहलाता है और इसी उपचरित को विपरीत न बनाते हुए जिम पात्र की भूमिका मिली है, कथन द्वारा स्वयं को सिद्धि मे जो प्रयोजन रूप प्राधार उसका यथार्थ की तरह अभिनय करते है। उसी तरह से कथन होता है वह व्यंग रूप पदार्थ का कथन कहलाता है। मोक्षमार्ग की समझ अपनाने वाले जीव भी इस संसार को इससे यह प्रमाणित होता है कि उपचरित पदार्थ का कथन ही एक रगमच मानकर मिली हुई भूमिका अनुसार स्वयं लक्ष्य रूप या व्यंग रूप पदार्थ का कथन नही है लेकिन यथार्थ की तरह अभिनय करते हुए वचन के द्वारा कहे गये स्वय के कथन की सिद्धि याने ज्ञान होने मे निमित्त पड़ कथन की यथार्थ समझ द्वारा जीवन में विशेष दृष्टिकोण रहे लक्ष्य रूप पदार्थ के कथन की सिद्धि करने के विशेष अर्थात् स्वभाव दृष्टि अपनाते है। प्रयोजन को लेकर उपचरित कथन 'अपितानपित सिद्धः" वचन के दो प्रकार के भेद मे जो निरर्थक वचन होते सूत्र अनुसार प्रतिपादित किया जाता है। है, जैसे बध्यासुत, पाकाश कुसम वगैरह, उनके विषय में इससे यह सिद्ध हुप्रा कि उपचरित कथन स्वयं को विचार नही करके सार्थक वचन याने जो वचन पदार्थ का अपेक्षा कल्पित एवं निरर्थक प्रतिपादित कथन नहीं है प्रतिपादन करने में समर्थ है, उनके विषय मे हो यहां चर्चा लेकिन निमित्त तथा प्रयोजन के प्राधार पर उपचार किया करना प्रपेक्षणीय है। हुमा कथन है, अर्थात् निमित्त तथा प्रयोजन के माधार पर पदार्थ के प्रतिपादक सार्थक वचन भी समझ की कल्पित किया हुमा कथन प्रा । इसलिए जैनागम में उपप्रपेक्षा से दो प्रकार के कहलाते है : १. मिध्यावचन, पोर चरित कयन को मारोपित, मागन्तुक,मापेक्षिक, पर-सापेक्ष, २. सत्यवचन। नैमित्तिक, कल्पित या व्यवहार रूप से कहा गया है। Page #79 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जिनागम में प्रतिपादित उपचरित कपन का रहस्य स्वयं पदार्थ में मुख्य तथा उपचार का भेद नसी है यह हमा कि विवक्षित उपादान कारण से किसी विवक्षित लेकिन वचन द्वारा पदार्थ में मुख्य अथवा उपचारपना कार्य की उत्पत्ति की सिद्धि वचन द्वारा मुख्य रूप से स्वयं कल्पित किया जाता है। इसलिए वचन द्वारा ही किसी सिद्ध भी होती है तथा उपचरित कथन द्वारा भी होती है। पन्य पदार्घ में किसी अन्य मुख्य पदार्थ की अपेक्षा उपचार इसीलिए उपचरित कथन का अपना अस्तित्व स्वयंसिद्ध करके उस उपचरित कथन द्वारा मुख्य पदार्थ के कथन को नही है, कारण जहां मुख्यपने का प्रभाव हो तथा निमित्त समझा जाता है। पौर प्रयोजन का सद्भाव हो, वही पर उपचार प्रवृत्त इसके लिए जैनागम मे कुभकार वगैरह का दृष्टांत दिया जाता है जिसका शाब्दिक सीधा प्रर्थ कुभ मादि उपरोक्त कथन से यही सिद्ध होता है कि जो कथन को करने वाला व्यक्ति होता है; परन्तु विचारणीय तथ्य उपादान कारणभत वस्तु की कार्यरूप परिणति का ज्ञान यह है कि जैन मान्यता के अनुमार कर्ता वही पदार्थ कह- होने में सहायक होता है, उसी को उपचरित कारण लाता है, जो स्वयं कार्य रूप परिणत होता है तथा कार्य निमित्त कारण या सहकारी कारण कहा जाता है। रूप परिणत होने वाली वस्तु की कार्यरूप परिणति की इसी अपेक्षा से श्रीमद् प्रकल क देव ने अपनी प्राप्त सिद्धि प्रर्थात ज्ञान होने में सहायक होना उस सहायक होने मीमांसा कारिका १० की अष्टाती टीका मे निम्न कथन वाली वस्तु को कर्तृत्व सिद्धि मे कारण रूप है, कर्तृत्व रूप किया है। नही है। इसलिए यही निर्णीत होता है कि कार्यरूप परि- तद मामयम् खण्डयदकिंचित्करं कि सहकारीकारणं णत होने वाली वस्तु की कार्यरूप परिणति की सिद्धि मे स्यात् ? जो कथन वास्तविक रूप से सहायक होता है।। अर्थात - सहकारी कारण यदि कार्यरूप परिणत होने उसमे वास्तविक रूप से विद्यमान उस सहायकपन के न की योग्यता रखने वाली उपादान कारणभूत वस्तु की कार्य माघार पर कर्तत्व का उपचार किया जाता है और यही रूप परिणत न हो सकने रूप असामर्थ्य (प्रशक्ति) का कारण है कि इस प्रकार के कर्तृत्व को उपचरित, प्रारो खण्डन नहीं करता हुमा सर्वथा प्रकिचित्कर ही रहता है पित, प्रागन्तुक, प्रापेक्षिक, परसापेक्ष, कल्पित या व्यवहार तो फिर उमे सहकारी कारण कहा जा सकता है क्या ? अर्थात् नहीं कहा जा सकता। शब्दों से पुकारा जाता है, जिसका तात्पर्य यह होता है उपरोक्त कथन में खण्डन शब्द विशेष ध्यान देने योग्य कि कार्यरूप परिणत होने वाली वस्तु की कार्यरूप परि है क्योकि खण्डन-मण्डन रूप क्रिया शब्द द्वारा कथन मे गति को सिद्धि याने ज्ञान होने में सहायक होने वाले कथन होया करती मे यद्यपि कार्यरूप परिणत होने रूप स्वयसिद्ध या स्वाश्रित मोक्षमार्ग को ममझने के लिए सर्व प्रथम कथन करने मुख्य कर्तृत्व विद्यमान नही है फिर भी कार्यरूप परिणत की पद्धति को यथार्थ पमझ होना प्रत्यंत प्रावश्यक है, होने वाली उस वस्तु को कार्यरूप परिणति की सिद्धि याने क्योकि यदि कथन को पद्धति ही नही समझ सके तो वक्ता ज्ञान होने में सहायक होने के प्राधार पर उपचरित रूप का अभिप्राय भी मही समझ में नहीं प्रा मकेगा। कर्तृत्व तो उसमे विद्यमान है ही। वचन के प्रथंभून पदार्थ का कथन मख्य तथा उपचारित इस विवेचन से यह निष्कर्ष निकलता है कि कर्तृत्व दोनो ही प्रकार से हम्रा करता है। कथन दो प्रकार से का उपचार या पारोप भी उसी कथन में हुमा करता है होने पर लक्ष्य रूप पदार्थ को भी दो प्रकार का मान लेवे जो कथन कार्यरूप परिणत होने वाली वस्तु की उस काय तो समझ मे भून रह जाती है । उपचरित कथन का अभिरूप परिणति की सिद्धि में सहायक हुमा करता है। इस प्राय भी उपचरित कथन की मुख्यता प्रतिपादित करना तरह कार्यरूप परिणत होने वाली वस्तु की कार्यरूप परि- न होकर उम एक लक्ष्य रूप प्रर्थभूत पदार्थ का प्रतिपादन णति की सिद्धि याने ज्ञान होने में निमित्त कहे जाने वाले करना ही है। अपेक्षा में दोनों तरह के कथन करने में कथन का, सिद्धि याने ज्ञान होने मे सहायकपना तो वास्त- भिन्न-भिन्न हैं। मुख्य कथन स्व-अपेक्षा किया गया कथन विक है लेकिन कर्तवपना उपचरित है। इसका तात्पर्य है तथा उपचरित कथन पर-प्रपेक्षा किया गया कथन है। Page #80 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ७२, बर्ष ३२, कि० ३.४ स्वप्रपेक्षा का कथन स्वयंसिद्ध होता है, इसलिए ऐसा इस प्रकार सिद्ध हुआ कि उपचरित कथन मुख्य कथन कथन उत्पत्ति मार्ग तथा शप्ति मार्ग दोनों का ज्ञान कराने के अर्थभूत पदार्थ का ज्ञान करने में निमित्त है, न कि मुख्य वाला होता है तथा पर-प्रपेक्षा का कथन निमित्त तथा कयन के प्रथमत पदार्थ के उत्पन्न होने में। प्रयोजन के प्राधार पर सिद्ध होता है इसपिये यह कथन पदार्थ प्रतिपादन रूप शब्द, पदार्थ, पदार्थ का ज्ञान मात्र ज्ञाप्तिमार्ग अर्थात ज्ञान कराने वाला कथन है। इन्हीं क्रमशः शब्दनय, अर्थनय तथा ज्ञाननय के विषय हैं। दोनों प्रकार के कथन को प्रध्यात्म कयन-प्रागम कथन, शब्द में ज्ञान का उपचार याने व्यवहार किया जाता है तथा निश्चय कथन-व्यवहार कथन नाम से भी कहा जाता तथा ज्ञान स्वय ज्ञानरूप है ही; इसलिये पदार्थ धर्थात् पर्थ है तथा यही अपेक्षा भिन्नता ज्ञान के अनेकान्त स्वरूप को नय को समझने के लिये शब्द द्वारा जो भी कथन या वचन समझाने के लिये स्यानाद नाम से प्रसिद्ध है। रूप में व्यवहार होता है, वह सब शब्दनय का विषय है तथा किसी भी कथन की विवेचना करते समय पहले कथन शब्द द्वारा पदार्थ का जो ज्ञान होता है वह ज्ञाननय का को भली प्रकार समझना जरूरी है कि इस कथन का विषय है। इस प्रकार से पदार्थ को जानने का मार्ग ही ज्ञप्ति शब्दार्थ, नयार्थ मतार्थ पागमार्थ तथा भावार्थ क्या है ? मार्ग, मागम मार्ग, व्यवहार मार्ग कहलाता है । इस मार्ग मुख्य कथन तो स्वयसिद्ध होने के कारण, उसकी । के द्वारा मात्र पदार्थ के कथन का ज्ञान होता है, स्वय पदार्थ समझ में तो विशेष बाधा नही पाती है लेकिन उपचरित नही हुमा करता। लेकिन मूल में भूल वश इस ज्ञप्तिमार्ग कथन में उपचरित कथन के लक्षण का ध्यान नहीं रखने द्वारा पदार्थ का होना मान लिया जाता है याने ज्ञप्तिमार्ग के कारण अन्यथा समझ अपना ली जाती है। इस विपरीत से पदार्थ की उत्पत्ति मान लेते है। इस कारण विपरीतता ममझ के कारण उपचरित कथन मे मिथ्यापन का प्रारोप की विपरीत मान्यता के कारण अनादिकाल मे जीव को मा जाता है क्योंकि उपचरित कथन का मुख्य रूप से अपने मात्मस्वभाव की सम्यक् प्रतीति नही हो पा रही है प्रतिपादन करना या समझना ही विपरीत याने मिथ्या है। जिसके फलस्वरूप इष्ट पनिष्ट कल्पना तथा रागद्वेष रूप उपचरित कथन स्वयं ही यह घोषित करता है कि मैं मख्य परिणमन का अभिप्राय निरन्तर मिथ्यात्त्व एवं अनंतानुबंधी कथन नही हैं। मुख्य को समझने के लिये ही मेरे में मुख्य कषाय के रूप में प्रतिफलित हो रहा है। का उपचार किया गया है, इसीलिए उपचरित कथन स्वय पदार्थ की उत्पत्ति उपादान कारण से भी और निमित्त सिद्ध नही होकर निमित्त एवं प्रयोजन के प्राधार पर ही कारण से भी याने दोनो कारणों से उत्पत्ति मानना ही तो सिद्ध होता है। उपचरित कथन कहो या निमित्त नमैतिक सम्बन्ध मिथ्या अनेकान्त है । जबकि उपादान कारण भिन्न अपेक्षा कहो, एक ही बात है। उपचरित क्थन का लक्षण निमित्त याने उत्पत्ति की अपेक्षा से कारण है तथा निमित्त कारण नैमित्तिक सम्बन्ध को सिद्ध करने वाला है। जब उपरित याने उपचरित कारण भिन्न प्रपेक्षा ज्ञप्ति याने जानने की कथन निमित्त रूप में माना जावे तो उपचरित कपन का अपेक्षा से कारण है तथा यह अपेक्षा-भिन्नता ही सम्यक लक्ष्य या प्रयोजन नमित्तिक माना जाता है तथा उपचरित अनेकान्त है। कथन का लक्ष्य या प्रयोजन जब निमित्त रूप से प्रतिपादित इसी अनेकान्त स्वरूप को समझने के लिये ही समय होता है तो वही उपचरित कथन मुख्य रूप होकर नैमित्तिक सार गाथा १२ की टीका में श्रीमद् प्राचार्य देव ने जो कहलाता है। इस तरह से सभी उपचरित कथन निमित्त मार्मिक चेतावनी दी है, उसका सही भाव समझना भी नैमित्तिक सम्बन्धको लियेहए है। इसलिए उपचरित कथन अपक्षित है। तथा उसका लक्ष्य प्रापस मे एक दूसरे की अपेक्षा निमित्त जह जिणमय हवज्जह ता मा ववहार णिच्छए मयह । रूप भी है तथा नैमित्तिक रूप भी है। ए एण विणा छिज्जा तिस्थ प्रणेण उण तच्चं । Page #81 -------------------------------------------------------------------------- ________________ हे भव्यकीयो ! यदि तुम जिनमत का प्रवर्तन करना पादित प्रवृत्ति के कथन को निश्चयनय द्वारा प्रतिपादित चाहते हो तो व्यवहार पोर निश्चय दोनों को मत छोड़ो, प्रवृत्ति के ज्ञान का साधन नही मान कर निश्चय नय द्वारा क्योंकि व्यवहार के बिना तो तीर्थ (धर्म तीर्थ याने ज्ञान प्रतिपादित प्रवृत्ति की उत्पत्ति का साधन मानना मात्र तीर्थ जो कि तस्वरूप निज शुद्धात्म स्वरूप के निकट समझ की विपरीतता ही है। इस तरह से सत्य प्रतिपादन किनारे गक पहुंचाने का साधन है) का नाश हो जावेगा करने की क्षमता रखने वाले उपचरित कपन को अपनी तथा निश्चय के बिना तत्व (निज शुद्धात्म स्वरूप साध्य विपरीत समझ के द्वारा मिथ्या मान्यता रूप मानना स्वयं रूपमात्मतत्व का नाश हो जावेगा)। अपनी ही भूल है। प्राचार्यों के कथन करने में भल नहीं है। इसके लिये समयसागर मूलगाथा १२ मे श्रीमद् कुन्द- इस विवेचना का यही निष्कर्ष निकलता है कि उपकुन्दाचार्य देव ने स्पष्ट निर्देश किया है कि अपरम भाव चरित कथन का कहना तो व्यवहार है लेकिन उसको वैसा (विकल्पात्मक अवस्था) में व्यवहार प्रयोजनीय है, अर्थात् ही मानना मिथ्यात्व है; जैसे कि राग को धर्म कहना भेदज्ञान का विकल्प याने दोनो नयो द्वारा वस्तु स्वरूप को। व्यवहार है, उपचार है लेकिन राग को धर्म मानना जानने रूप व्यवहार जानने की अपेक्षा प्रयोजनवान् है मिथ्यात्व है। क्योंकि राग रूप से कहना तो मुख्य कथन है, तथा परमभाव (निर्विकल्प अवस्था) में निश्चय नय द्वारा यथार्थ कथन है. सत्य वचन है तथा राग को धर्म का व्यव. प्रतिपादित स्वयं के शुद्धात्म स्वरूप का अर्थात् प्रात्मज्ञान हार है. उपचरित कथन है; उपचार रूप से यथार्थ है, सत्य का ज्ञान प्राश्रय ग्रहण करने की अपेक्षा से प्रयोजनीय है। वचन है क्योकि अपने लक्ष्य रूप धर्म के कथन का ज्ञान भेद नाम व्यवहार का है। निश्चय तथा व्यवहार रूप कराने की अपेक्षा प्रयोजनवान है । लेकिन राग में धर्म उपभेद मात्र ज्ञान का ही भेद है । ज्ञान की अपेक्षा याने सम- चार किया अर्थात् राग को धर्म कहा इसलिये राग को भी झने की अपेक्षा से अन्य गणों में भी निश्चय व्यवहार के धर्म मान लिया जावे या राग से धर्म की उत्पत्ति मान ली भेद का प्रयोग शब्द द्वारा किया जाता है लेकिन उस प्रयोग जावे तो यह मानना विपरीत हो जाता है तथा ऐसा मानना करने के यथार्थ अभिप्राय को भूलकर श्रद्धा मोर प्रवृत्ति मिथ्यात्व कहलाता है। वगैरह में भी जो निश्चय व्यवहार की मान्यता मान ली इसी तरह से प्रात्म-स्वभाव की अपेक्षा शरीर मादि जाती है, इसी समझ की भूल के कारण उपचरित कथन नोकर्म तथा ज्ञानावरणादि द्रव्यकर्म रूप परपदार्थ तथा के सही माशय को भूलकर विपरीत मान्यता बनी रहती है। रागादिक परभावरूप भावकर्म को अपना कहना प्रारमयह समझ बहुत मोटी भूल है। प्रबुद्ध जिज्ञासुपों को इस स्वभाव का उपचार है। लेकिन इनको अपना मानना अर्थात विषय पर विशेष ध्यान देकर चिन्तन-मनन करके निर्णय मबको अपना प्रारम स्वभाब मानना मिथ्यात्व है। ज्ञानी करना चाहिये । अन्य गुणों का परिणमन शुद्ध या प्रशुद्ध जीव के स्वभाव दृष्टि की वजह से मान्यता में यह विलयथार्थ ही है। मात्र ज्ञान को प्रपेक्षा शब्द द्वारा उनमें क्षणता पाई जाती है। निश्चय व्यवहार का उपचार किया जाता है। ___ सारांश यही है कि बिल्ली में शेर का उपचार करके जैनागम में जगह-जगह व्यवहारनय को निश्चयनय शेर का ज्ञान तो किया जा सकता है लेकिन बिल्ली में शेर का साधन कहा है, क्योकि निश्चय नय के प्रथंभूत निज का उपचार करने के कारण बिल्ली को भी शेर मान लेना शुद्धात्म तत्व पात्मज्ञान का कथन वचनरूप व्यवहार या बिल्ली से शेर की उत्पत्ति मान लेना स्वयं अपनी ही द्वारा होता है। इस तरह से बचनरूप व्यवहार जान समझ को भूल है। निश्चय साध्यरूप प्रात्मज्ञान के ज्ञान का साधन है। लेकिन इस प्रकार से अचरित कथन का सही प्रयोजन समझ निज के ज्ञान स्वभाव को भूलकर व्यवहारनय द्वारा प्रति- कर भव्य जोब जिनवाणी के यथार्थ रहस्य की समझ द्वारा पादित प्रवृत्ति के कथन को निश्चयनय द्वारा प्रति. स्वभाव दष्टि को अपना कर अपना कल्याण करें। . Page #82 -------------------------------------------------------------------------- ________________ R.N. 10591/82 वीर-सेवा-मन्दिर के उपयोगी प्रकाशन पुगतन नवाक्य-सूची: प्राकृत के प्राचीन ४६ मूल-ग्रन्थों की पद्यानुक्रमणी, जिसके साथ ४८ टीकादि ग्रन्थों में उद्धृत दूसरे पद्यो की भी अनुक्रमणी लगी हुई है । सब मिलाकर २५३५३ पय-वाक्यों की सूची । संपादक मुख्तार थी जुगलकिशोर जी की गवेषणापूर्ण महत्त्व की ७ पृष्ठ की प्रस्तावना से अलंकृत, डा. कालीदास नाग, एम. ए., डी. लिट.के प्राक्कथन (Foreword) और डा० ए. एन. उपाध्ये, एम. ए.,डी. लिट. की भूमिका (Introduction) से भूषित है। शोध-खोज के विद्वानो के लिए प्रतीव उपयोगी, बड़ा साइज, सजिल्द। १५.०० स्वयम्भ स्तोत्र : समन्तभद्र भारती का पूर्व ग्रन्थ, मुख्तार श्री जुगलकिशोरजी के हिन्दी अनुवाद तथा महत्त्व की गवेषणापूर्ण प्रस्तावना से सुशोभित । २-०० स्तुतिषिया : स्वामी समन्तभद्र की अनोखी कृति, पापा के जीतने की कला, सटीक, सानुवाद भोर श्री जगल. किशोर मुख्तार की महत्त्व की प्रस्तावनादि से अलंकृत, सुन्दर, जिल्द-सहित । मन्यात्मकमलमार्तड:पंचाध्यायीकार कवि राजमल की सुन्दर प्राध्यात्मिक रचना, हिन्दी-अनुवाद-सहित । १.५० पक्रयनुशासन : तत्त्वज्ञान से परिपूर्ण, समन्तभद्र की असाधारण कृति, जिसका अभी तक हिन्दी अनुवाद नहीं हुमा था। मुख्तार श्री के हिन्दी अनुवाद और प्रस्तावनादि से अलंकृत, सजिल्द । ... समीचीन धर्मशास्त्र : स्वामी समन्तभद्र का गृहस्थाचार-विषयका अत्युत्तम प्राचीन ग्रन्थ, मुख्तार श्रीजुगलकिशोर जी के विवेचनात्मक हिन्दी भाष्य और गवेषणात्मक प्रस्तावना से युक्त, सजिल्द ।। अनन्य-प्रशस्ति संग्रह, भाग १: संस्कृत और प्राकृत के १७१ अप्रकाशित ग्रन्थों की प्रशस्तियों का मंगलाचरण सहित अपूर्व संग्रह, उपयोगी ११ परिशिष्टों और पं० परमानन्द शास्त्री की इतिहास-विषयक साहित्यपरिचयात्मक प्रस्तावना से अलंकृत, सजिल्द । ... ४.०० समाधितन्त्र पोर इष्टोपदेश : प्रध्यात्मकृति, पं० परमानन्द शास्त्री की हिन्दी टीका सहित ४.०० पावणबेलगोल और दक्षिण के अन्य जैन तीर्थ : श्री राजकृष्ण जैन ... १.२५ जनसम्प-प्रशस्ति संग्रह, भाग २: अपभ्रश के १२२ मप्रकाशित ग्रन्थों की प्रशस्तियों का महत्त्वपूर्ण संग्रह । पचपन अन्धकारों के ऐतिहासिक ग्रंथ-परिचय और परिशिष्टों सहित । सं.पं. परमानन्द शास्त्री। सजिल्द । १२.० म्याय-दीपिका :मा० अभिनव धर्मभूषण की कृति का प्रो०० दरबारीलालजी न्यायाचार्य द्वारा सं० अनु०। ७.० बन साहित्य और इतिहास पर विशव प्रकाश : पृष्ठ संख्या ७४, सजिल्य । कसायपारसुत्त : मूल ग्रन्थ की रचना माज से दो हजार वर्ष पूर्व श्री गुणधराचार्य ने की, जिस पर श्री यतिवृषभाचार्य ने पन्द्रह सौ वर्ष पूर्व छह हजार श्लोक प्रमाण चूणिसूत्र लिखे । सम्पादक पं हीरालालजी सिवान्त-शास्त्री। उपयोगी परिशिष्टों और हिन्दी अनुवाद के साथ बड़े साइज के १००० से भी अधिक पृष्ठों में । पुष्ट कागज मोर कपड़े की पक्की जिल्द । २०.०० Reality :मा. पूज्यपाद की सर्वार्थ सिद्धि का अंग्रेजी में मनुवाद । बड़े भाकार के ३००१., पक्की जिल्द जैन निवाब-रत्नावली : श्री मिलापचन्द्र तथा श्री रतनलाल कटारिया ध्यानशतक (ध्यानस्तव सहित):संपादक पं. बालचन्द्र सिवान्त-शास्त्री १२.०० पावक धर्म संहिता: श्री दरबावसिंह सोषिया गलकामावली (तीन भागों में):सं.पं.बालपाद सिद्धान्त शास्त्री १२०.०० Jain Bibliography (Universal Encyclopaedia of Jain References) (Pages 250c) (Under print) प्रकाशक-वीर सेवा मन्दिर के लिए रूपवाणी प्रिंटिंग हाउस, दरियागंज, नई दिल्ली-२ से मुद्रित । Page #83 -------------------------------------------------------------------------- _