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________________ - जिनागम में प्रतिपादित उपचरित कथन का रहस्य 0 श्री महाचन्द्र जैन, इम्फाल (आसाम) मोक्षमार्ग की समझ के लिए वचन के अर्थभूत उप- संशय, विपर्यय, और अनध्यवसाय रूप समझ हो जाने चरित पदार्थ के कथन को जिस प्रकार से किया जाता है, के कारण ऐसे प्रतिपादन करने वाले वचनों को मिथ्या उसी प्रकार से मानना भी चाहिए या इस प्रकार से किये वचन कहते है तथा प्रथंभूत पदार्थ जैसा है, वैसा ही यथार्थ हुए कथन के समझने मे कुछ विशेषता है, इसके रहस्य समझ हो जाने के कारण ऐसे प्रतिपादन करने वाले को समझने के लिए सर्वप्रथम कथन के प्रर्थात् वचन के । भेदों-प्रभेदों द्वारा स्वरूप को समझना पावश्यक है। ____ सत्य वचन द्वारा अर्थभूत पदार्थ जैसा है, वैसा प्रतिमोक्षमार्ग तथा संसार मार्ग एक दूसरे के विरुद्ध अलग पादन अभिधेय रूप मे मभिधा-वृत्ति नामक शक्ति द्वारा लक्ष्य रूप में लक्ष्णावति नामक शक्ति द्वारा तथा व्यंग रूप अलग मार्ग है, इसलिए संसार मार्ग की अपेक्षा एवं मोक्ष मार्ग की अपेक्षा से कथन की समझ भी भिन्न प्रकार से मे ब्य जनावृत्ति नामक पदार्थ प्रतिपादन शक्ति द्वारा किया होनी चाहिए, यदि मोक्षमार्ग के कयन की समझ भी जाता है। विशेष इतना समझना चाहिए कि अभिधेय रूप संसार मार्ग के कथन की तरह मे ही समझी या मानी जावे प्रतिपादित पदार्थ का कथन मख्य व उपचरित के भेद से दो प्रकार का होता है। तो समझ की शुरुआत हो विपरीत होने की वजह से । इम प्रकार कथन की अपेक्षा से समझने के लिए पदार्थ मिथ्यात्व की ग्रन्थि खोलने का गब्द द्वारा वचन मे अभि मे भी मुख्य व उपचार का भेद किया जाता है। प्राय रखते हुए भी समझने का समस्त पुरुषार्थ विपरीत हो मुख्य कथन वह कहलाता है जिसका अस्तित्व स्वयं जाने के कारण मिथ्यात्व की गाट नहीं खुल सकेगी। सिद्ध हो तथा जिमका अस्तित्व स्वयसिद्ध नही होकर जिस तरहसे संसार मार्ग के लिए जीवन में प्रति समय निमित्त तथा प्रयोजनके प्राधार पर सिद्ध हो, वह उपचारित गुजरने वाले सम्बन्धो तथा सम्पकों के लिए समझ अपनाई कथन कहलाता है। जाती है; उससे भिन्न प्रकार की समझ रंगमच पर नाटक इसी उपचरित कथन द्वारा स्वयं के अस्तित्व की वगैरह मे अभिनय करते समय, मुख से सभी तरह के वचन सिद्धि में जो निमित्त रूप प्राधार कथन होता है, वह लक्ष्य कहते हुए भी उन वचनों द्वारा अपनी समझ या मान्यता रूप पदार्थ का कथन कहलाता है और इसी उपचरित को विपरीत न बनाते हुए जिम पात्र की भूमिका मिली है, कथन द्वारा स्वयं को सिद्धि मे जो प्रयोजन रूप प्राधार उसका यथार्थ की तरह अभिनय करते है। उसी तरह से कथन होता है वह व्यंग रूप पदार्थ का कथन कहलाता है। मोक्षमार्ग की समझ अपनाने वाले जीव भी इस संसार को इससे यह प्रमाणित होता है कि उपचरित पदार्थ का कथन ही एक रगमच मानकर मिली हुई भूमिका अनुसार स्वयं लक्ष्य रूप या व्यंग रूप पदार्थ का कथन नही है लेकिन यथार्थ की तरह अभिनय करते हुए वचन के द्वारा कहे गये स्वय के कथन की सिद्धि याने ज्ञान होने मे निमित्त पड़ कथन की यथार्थ समझ द्वारा जीवन में विशेष दृष्टिकोण रहे लक्ष्य रूप पदार्थ के कथन की सिद्धि करने के विशेष अर्थात् स्वभाव दृष्टि अपनाते है। प्रयोजन को लेकर उपचरित कथन 'अपितानपित सिद्धः" वचन के दो प्रकार के भेद मे जो निरर्थक वचन होते सूत्र अनुसार प्रतिपादित किया जाता है। है, जैसे बध्यासुत, पाकाश कुसम वगैरह, उनके विषय में इससे यह सिद्ध हुप्रा कि उपचरित कथन स्वयं को विचार नही करके सार्थक वचन याने जो वचन पदार्थ का अपेक्षा कल्पित एवं निरर्थक प्रतिपादित कथन नहीं है प्रतिपादन करने में समर्थ है, उनके विषय मे हो यहां चर्चा लेकिन निमित्त तथा प्रयोजन के प्राधार पर उपचार किया करना प्रपेक्षणीय है। हुमा कथन है, अर्थात् निमित्त तथा प्रयोजन के माधार पर पदार्थ के प्रतिपादक सार्थक वचन भी समझ की कल्पित किया हुमा कथन प्रा । इसलिए जैनागम में उपप्रपेक्षा से दो प्रकार के कहलाते है : १. मिध्यावचन, पोर चरित कयन को मारोपित, मागन्तुक,मापेक्षिक, पर-सापेक्ष, २. सत्यवचन। नैमित्तिक, कल्पित या व्यवहार रूप से कहा गया है।
SR No.538032
Book TitleAnekant 1979 Book 32 Ank 01 to 04
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGokulprasad Jain
PublisherVeer Seva Mandir Trust
Publication Year1979
Total Pages83
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Anekant, & India
File Size5 MB
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