________________
जिनागम में प्रतिपादित उपचरित कपन का रहस्य
स्वयं पदार्थ में मुख्य तथा उपचार का भेद नसी है यह हमा कि विवक्षित उपादान कारण से किसी विवक्षित लेकिन वचन द्वारा पदार्थ में मुख्य अथवा उपचारपना कार्य की उत्पत्ति की सिद्धि वचन द्वारा मुख्य रूप से स्वयं कल्पित किया जाता है। इसलिए वचन द्वारा ही किसी सिद्ध भी होती है तथा उपचरित कथन द्वारा भी होती है। पन्य पदार्घ में किसी अन्य मुख्य पदार्थ की अपेक्षा उपचार इसीलिए उपचरित कथन का अपना अस्तित्व स्वयंसिद्ध करके उस उपचरित कथन द्वारा मुख्य पदार्थ के कथन को नही है, कारण जहां मुख्यपने का प्रभाव हो तथा निमित्त समझा जाता है।
पौर प्रयोजन का सद्भाव हो, वही पर उपचार प्रवृत्त इसके लिए जैनागम मे कुभकार वगैरह का दृष्टांत दिया जाता है जिसका शाब्दिक सीधा प्रर्थ कुभ मादि
उपरोक्त कथन से यही सिद्ध होता है कि जो कथन को करने वाला व्यक्ति होता है; परन्तु विचारणीय तथ्य उपादान कारणभत वस्तु की कार्यरूप परिणति का ज्ञान यह है कि जैन मान्यता के अनुमार कर्ता वही पदार्थ कह- होने में सहायक होता है, उसी को उपचरित कारण लाता है, जो स्वयं कार्य रूप परिणत होता है तथा कार्य निमित्त कारण या सहकारी कारण कहा जाता है। रूप परिणत होने वाली वस्तु की कार्यरूप परिणति की
इसी अपेक्षा से श्रीमद् प्रकल क देव ने अपनी प्राप्त सिद्धि प्रर्थात ज्ञान होने में सहायक होना उस सहायक होने मीमांसा कारिका १० की अष्टाती टीका मे निम्न कथन वाली वस्तु को कर्तृत्व सिद्धि मे कारण रूप है, कर्तृत्व रूप किया है। नही है। इसलिए यही निर्णीत होता है कि कार्यरूप परि- तद मामयम् खण्डयदकिंचित्करं कि सहकारीकारणं णत होने वाली वस्तु की कार्यरूप परिणति की सिद्धि मे स्यात् ? जो कथन वास्तविक रूप से सहायक होता है।।
अर्थात - सहकारी कारण यदि कार्यरूप परिणत होने उसमे वास्तविक रूप से विद्यमान उस सहायकपन के
न की योग्यता रखने वाली उपादान कारणभूत वस्तु की कार्य माघार पर कर्तत्व का उपचार किया जाता है और यही
रूप परिणत न हो सकने रूप असामर्थ्य (प्रशक्ति) का कारण है कि इस प्रकार के कर्तृत्व को उपचरित, प्रारो
खण्डन नहीं करता हुमा सर्वथा प्रकिचित्कर ही रहता है पित, प्रागन्तुक, प्रापेक्षिक, परसापेक्ष, कल्पित या व्यवहार
तो फिर उमे सहकारी कारण कहा जा सकता है क्या ?
अर्थात् नहीं कहा जा सकता। शब्दों से पुकारा जाता है, जिसका तात्पर्य यह होता है
उपरोक्त कथन में खण्डन शब्द विशेष ध्यान देने योग्य कि कार्यरूप परिणत होने वाली वस्तु की कार्यरूप परि
है क्योकि खण्डन-मण्डन रूप क्रिया शब्द द्वारा कथन मे गति को सिद्धि याने ज्ञान होने में सहायक होने वाले कथन होया करती मे यद्यपि कार्यरूप परिणत होने रूप स्वयसिद्ध या स्वाश्रित मोक्षमार्ग को ममझने के लिए सर्व प्रथम कथन करने मुख्य कर्तृत्व विद्यमान नही है फिर भी कार्यरूप परिणत की पद्धति को यथार्थ पमझ होना प्रत्यंत प्रावश्यक है, होने वाली उस वस्तु को कार्यरूप परिणति की सिद्धि याने क्योकि यदि कथन को पद्धति ही नही समझ सके तो वक्ता ज्ञान होने में सहायक होने के प्राधार पर उपचरित रूप का अभिप्राय भी मही समझ में नहीं प्रा मकेगा। कर्तृत्व तो उसमे विद्यमान है ही।
वचन के प्रथंभून पदार्थ का कथन मख्य तथा उपचारित इस विवेचन से यह निष्कर्ष निकलता है कि कर्तृत्व दोनो ही प्रकार से हम्रा करता है। कथन दो प्रकार से का उपचार या पारोप भी उसी कथन में हुमा करता है होने पर लक्ष्य रूप पदार्थ को भी दो प्रकार का मान लेवे जो कथन कार्यरूप परिणत होने वाली वस्तु की उस काय तो समझ मे भून रह जाती है । उपचरित कथन का अभिरूप परिणति की सिद्धि में सहायक हुमा करता है। इस प्राय भी उपचरित कथन की मुख्यता प्रतिपादित करना तरह कार्यरूप परिणत होने वाली वस्तु की कार्यरूप परि- न होकर उम एक लक्ष्य रूप प्रर्थभूत पदार्थ का प्रतिपादन णति की सिद्धि याने ज्ञान होने में निमित्त कहे जाने वाले करना ही है। अपेक्षा में दोनों तरह के कथन करने में कथन का, सिद्धि याने ज्ञान होने मे सहायकपना तो वास्त- भिन्न-भिन्न हैं। मुख्य कथन स्व-अपेक्षा किया गया कथन विक है लेकिन कर्तवपना उपचरित है। इसका तात्पर्य है तथा उपचरित कथन पर-प्रपेक्षा किया गया कथन है।