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जंग
की प्रासंगिकता
रहण
चेन खींच कर कोई भाग गया, या प्रमक युवती को दहेज भमि को छ सकता है। हमारे नेतामों-राजनेतामों की कम लाने पर गला घोंट कर या मिट्टी का तेल छिड़क बातों में कोई तालमेल नहीं होता; जो वे कहते है, वह कर हत्या कर दी गयी । इन सब के पीछे परिग्रह को करके नहीं दिखाते-शायद वे कानून अपने लिए नहीं, दूसरों बुराई है। वह परिग्रह जिसे जैनधर्म में बजित घोषित के लिए पास करते है । समाज की प्रार्थिक विषमता का किया है। मनुष्य घनाजंन करे, परन्तु उचित साधनों से समाधान जैनधर्म के अपरिग्रहवाद मे खोजना होगा। प्राज पोर उचित मात्रा में उससे दूसरों की सेवा करें। अपरिग्रह उसकी उपादेयता महावीर के युग से काफी अधिक है। को हमें महावीर के इम पादर्श को सामने रखकर ग्रहण हमारा देश जैसा वहुधर्मी है, वैसा बहुभाषी भी है। करना चाहिये कि जिससे दूसरो की सेवा की जा सके, यहां संकीर्ण विचारधारा के कारण लोग भाषा को भी देश का नवनिर्माण किया जा सके, प्रपने से अधिक दूसरो धर्म का चश्मा चढा कर देखते है । मुसलमानो की भाषा को सुख पहुचाया जा सके। महावीर नही चाहते थे कि कोई उई बतायो जाती है, सरकार भी इस भावना का शोषण गरीब हो, गरीबी के अभिशाप मे फँसा हो । जैनधर्म की करती है । कही उर्दू अकादमी बनाकर, कही गालिब दृष्टि समाजवादी है, लेकिन दूसरे प्रकार की। मपरिग्रह प्रकादमी खोलकर, कहीं उर्द-प्रध्यापकों की भर्ती का नारा को हम समाजवाद के निकट रख सकते है, लेकिन
लगाकर सरकार मुसलमानो की भावना से उचित-अनुचित अपरिग्रह को समाजवाद नहीं कह सकते । समाजवादी
लाभ उठा रही है। हिन्दी को अहिन्दी-भाषियों पर प्रादशं यह है कि कोई मुझसे बड़ा न हो, सब मेरे बराबर थोपने का बे-सिर-पैर का नारा लगाकर दक्षिण प्रदेश के हों। अपरिग्रहवादी प्रादर्श यह है कि कोई मुझसे छोटा लोगों को भडकाया जाता है। कश्मीर भी एक महिन्दी न हो, बड़ा चाहे हों। वह जो कुछ अपने पास रखता है उसे
भाषी प्रान्त है। यहाँ की बहुसंख्यक प्राबादी मुसलमानों को दूसरो में भी बांटना चहता है। केवल मरीबी मिो या
है, उनकी मातृभाषा कश्मीरी है, जिसमे संस्कृत के ७० वस्तुमो के मूल्य कम करो के नारे लगाने से समस्या का
प्रतिशत शब्द व्यवहृत हैं। यहाँ के मुख्य मंत्री शेख मोहम्मद निदान नही हो सकता । गरीबी यदि मिटानी है, वस्तुप्रो
अब्दुल्ला ने आठवी कक्षा तक सरकारी स्कूलों में हिन्दी के मूल्यो को बढ़ने से रोकना है, जमाखोरी या तस्करी
अनिवार्य घोषित की मोर 'मोकाफ ट्रस्ट' की मोर से जो को नष्ट करना है तो जैनधर्म मे निर्दिष्ट अपरिग्रहवाद को
विद्यालय चलाये जाते हैं उनमे भी शेख साहब ने हिन्दी को स्वीकार करना होगा । प्राज इसी सिद्धान्त की समाज
अनिवार्य विषय घोषित किया। 'प्रोकाफ ट्रस्ट' के अध्यक्ष को मधिक पावश्कता है । इसी के द्वारा प्रायिक विषमता
शेख साहब हैं । यहा भाषा की समस्या को शेख साहब ने जन्य अनेक समस्यामों को सरलता से हल किया जा सकता
धर्म से नही जुडने दिया। दूसरे प्रान्तो मे अवश्य प्रान्तीयता है। जब तक परिग्रहजन्य छीना-झपटी रहेगी, वस्तुप्रो का
या धर्म की सकीणता को लेकर भाषा का होमा खड़ा किया सचय किया जाता रहेगा, वस्तुओं के मूल्य बढ़ते रहेगे- जाता रहा है। जब जनधर्म पर दृष्टि डालते है, तब गरीब और गरीब, अमीर और अमीर होते रहेंगे पोर देखते हैं कि उसका भाषा के प्रति कोई दुराग्रह नही रहा समाज या देश सुख-शान्ति से वञ्चित रहेगा। लोग दरिद्रता कोई सकीर्ण विचार नहीं रहा । संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रश, के चक्र में फंसे मसहाय दम तोड़ते रहेगे । देश दुर्व्यसनो हिन्दी, अंग्रेजी, गुजराती प्रादि अनेक भाषामों में उसका मे जकड़ा रहेगा। कानून पास करने से हृदय नही बदलता। माहित्य है। यहाँ जैनधर्न को प्रासंगिकता स्पष्ट है। मतहृदय बदलता है, ज्ञान से, अहिंसा से, अभ्यास से। यहाँ भेदो को सामंजस्यपूर्ण उदारता और शालीनता से दूर कथनी और कम में समानता होनी पावश्यक है । लोग हृदय किया जा सकता है। भाषा को अपने युग की विचारसे अपरिग्रही हों, तभी वे भौतिकता से ऊपर उठ कर घारा को व्यक्त करने का माध्यम मानकर ही स्वीकार माध्यात्मिक लोक मे पहुंच सकते हैं । इस प्रकार परिग्रह करना चाहिए । जैनधर्म में उसी भाषा को स्वीकार किया भौतिकता भोर माध्यात्मिकता के बीच सुदढ़ सेतु का जाता रहा जो उस युग में प्रचलित थी। भाषा-भेद को काम करता है। वह बचनानुसार कर्म कर के अध्यात्म. मिटाने के लिए जैनधर्म की नीति अपनानी होगी। 00