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________________ ६८, वर्ष ३२, कि. ३-४ बनेकान्त के जातीय भेदभाव का कलंक नहीं। डा. राधाकृष्णन् ने पर जितना अधिक जोर दिया गया, शायद वैसा जोर विश्व ठीक कहा है-'जन-दर्शन सर्वसाधारण को पुरोहित के के किसी धर्म में नहीं दिया गया। जैन समाज में बालक समान धार्मिक अधिकार प्रदान करता है। क्या कोई को बचपन मे हो अहिंसा का पाठ मां को गोद में पढ़ाया हरिजन वेद-उपनिषद् का महान् पण्डित होकर इस प्रकार जाता है। अहिंसा भोर सेवा-भाव का प्रसार जैन समाज ने धार्मिक अधिकार ग्रहण कर सकता है हिन्दू समाज मे? इतना अधिक किया है कि समाज के किसी वर्ग ने इतना जैनधर्म तो लोकधर्म है, समाजधर्म है, उसमे व्यक्ति के नहीं किया। अनेक पोषघालय, समाज-सेवी संस्थाएँ, विकास की पूर्ण स्वतन्त्रता है। बदलते हुए सन्दर्भो मे कालेज जैन समाज द्वारा सारे देश में चलाये जा रहे हैं। जैन धर्म का मूल्य उत्तरोत्तर बढ़ता जाता है। समाज मे राष्ट्रीय उद्योग को विकसित पौर संबंधित करने में जैन एकता पौर समानता स्थापित करने के लिए जैनधर्म की उद्योगपतियों का योगदान स्वर्णाक्षरों में लिखने योग्य है। मोर देखना होगा। हम यों नही कहेगे कि जैनधर्म, जो जनधर्म मे तुच्छ-से-तुच्छ पोर हिसक-से-हिंसक प्राणी को भगवान ऋषभदेव से भगवान महावीर तक श्रमण-धर्म की मारने का पूर्ण निषेध है; लेकिन आज को हिंसा पशु-पक्षी शिक्षामों को तात्कालिक प्रावश्यकतामो के अनुकूल प्रचा- को मारने, किसी जीवधारी को सताने तक सीमित नही; रित करता रहा, बदल गया है। हम तो यह मानते है उसने भी अपने क्षेत्र का विस्तार काला धन, उत्कोच, कि वह बदला नहीं, बल्कि उसका क्षेत्र और अधिक विस्तृत चोरी-डकैती, जमाखोरी, खाने-पीने की वस्तुप्रों में मिलावट, हो गया है। वह 'जीव-मूल्यों के साथ 'जीवन-मूल्यों की तस्करी या स्मगलिंग मादि रूपो में किया है। ये सब बातें भी कहने लगा है। उसकी प्राचार गत अहिमा सामाजिक दोष है और समाज विरोधी तत्त्व इन्ही के द्वारा विचारगत अहिंसा की भूमि में पहुंच गयी है। व्यक्तिगत रातो-रात लखपति बन जाते हैं। जैनधर्म में प्रस्तेय का उपलब्धि सार्वजनिक बनती जा रही है। महावीर ने घर. सिद्धान्त जहाँ चोरी डकैती का निषेध करता है, ऐसे पाप. बार छोड़कर जो व्यक्तिगत कैवल्योपलब्धि प्राप्त की वह मय कुकर्म से बचने का प्रादेश देता है, वही अपरिग्रह का सार्वजनिक ही तो है। क्या उनके समवसरण के द्वार सभी मिद्धान्त जमाखोरी, खाने-पीने की वस्तुप्रो मे मिलावट, के लिए खुले नही थे ? कसाई, चोर-जार, ज्ञानी-मूर्ख, तस्करी प्रादि से बाज रखता है। महावीर ने अपरिग्रह बाल-बद्ध, स्त्री-पुरुष मभी बिना किसी भेदभाव के वहीं का मिद्धान्त सामने रखकर वर्तमान यूग की समस्याम्रो का सम्मिलित होते थे। जैनधर्म की यह समन्वयवादी या महिसात्मक समाधान प्रस्तुत किया। बुरे कर्मों से समाज समानतावादी विचारधारा हमारे समाज में एकता स्थापित बुराई मे फंसेगा ही, दुर्गन्ध से वातावरण दुर्गन्धित होगा कर सकती है ; उससे हम अपने राष्ट्र की एकता को अधिक ही। अच्छे कर्मों के फलों की सुगन्ध ही दूर-दूर तक फैलती मजबूत बना सकते है । महावीर ने वर्गहीन समाज को है। नारायणोपनिषद' मे कहा गया हैस्थापना की थी, प्राज हम भी समाजवाद के द्वारा उस यथा वृक्षस्य सपुष्पितस्य दूराद्गंधो वाति । मादशं को छने का प्रयाम कर रहे है। प्राज जातीय बन्धनो एव पुण्यस्य कर्मणो दूराद् गंघो वाति ।। को तोडकर जो एक नया समाज बनता नजर आता है, अर्थात् फूले हुए वृक्ष को सुगन्ध दूर-दूर तक फैल उसने जैनधर्म को प्रात्मसात् क्रिया है, ऐसा मालूम होता जाती है, वैसे ही पवित्र कर्मों की सुगन्ध दूर-दूर तक है। प्राचार्य तुलमी पौर एलाचार्य मुनि विद्यानन्दजी मादि पहुचती है। जैनधर्म का अपरिग्रह का सिद्धान्त भी एक के उपदेशो को उसने मात्मसात् किया है। पुष्पित वृक्ष है, उसके गुणों की सूगन्ध फैलनी ही चाहिये । कालानुसार पुरानी मान्यतामों के रूप बदलते हैं, जहां कही परिग्रह है, लट-खसोट है, उसकी दुर्गन्ध को नवीन और व्यापक होते हैं । अहिंसा प्रवश्य परम धर्म है। अपरिग्रह की सुगन्ध नष्ट कर सकती है। समाचार-पत्रों में किसी को मारना, सताना, पीटना हिसा है। लेकिन भाज पढने को मिलता है कि अमुक गाव या नगर में डाकुमों ने हिंसा युग-सन्दमो मे कुछ नवीन रूप धारण कर सामने घर में घुस कर हत्याएं की पौर हजारों का माल लेकर माती-जाती है। यह मानना होगा कि जैनधर्म मे अहिंसा फरार हो गये, या प्रमक राह चलती स्त्री के गले की स्वर्ण प्रतिको
SR No.538032
Book TitleAnekant 1979 Book 32 Ank 01 to 04
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGokulprasad Jain
PublisherVeer Seva Mandir Trust
Publication Year1979
Total Pages83
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Anekant, & India
File Size5 MB
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