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________________ प्राकृत का बृहद्दव्य-संग्रह और उसकी महत्ता प्रतः अध्यात्म महल में चढने के लिए इस टीका को प्रथम भाषा में ग्रथ के भाव को समझने में सर्वसाधारण को उपमोपान कहा जावे तो अतिशयोक्ति न होगी।" योगी है। जैसे कि ग्रंथ की विस्तृत टीका के सम्बन्ध में उक्त द्रव्य-सग्रह मे तत्त्वार्थ की स्याद्वाद-परक गरिमापूर्ण विद्वान अनवादक महोदय ने अपने विचार व्यक्त किये है, सक्षिप्त विवेचना से प्राकृष्ट होकर स्वांतःसुखाय एक नवीन अध्यात्म का अभ्यास करने की रुचि रखनेवाले पाठको को पद्यानुवाद करने की अंतरंग से मुझे भी जो प्रेरणा मिली थी यह ग्रंथ व उसकी टीका कितनी उपयोगी है, यह सहज ही उसी के फलस्वरूप एक पद्यान वाद समाज की सेवा मे मैंने भी विदित हो जाता है। प्रस्तुत किया है और वह प्रकाशित हुआ है। इसमे राष्ट्र__द्रव्यसंग्रह की हिंदी टीकाग्रो मे एक महत्त्वपूर्ण टीका भाषा के माध्यम से ग्रथ के भाव को स्पष्ट करते हुए उसे (जो इसके भावानबाद को सम्पन्न कर लेने के पश्चात् मुझे गेय और नित्यपाठ करने-कराने के उपयुक्त बनाने का देखने में पाई है) द्रध्य-सग्रह भाषावनिका के नाम से तथा भरसक प्रयास किया गया है । इस प्रयास में सफलता कहा हिदी में ही चौपाई छदो में भाषा-पद्यानुवाद, जयपुर निवासी तक मिली, इसका निर्णय सहृदय विज्ञ पाठक ही कर विद्वद्वर प. जयचन्द्रजी छाबडा ने विक्रम स. १८६३ मे सकेंगे। पद्यानुवाद के साथ ही मूल गाथाओं का भाव स्पष्ट लिखी थी जो वाराणसी से वर्णी ग्रथमाला से प्रकाशित है। करने के उद्देश्य से सरल भाषा में भावार्थ भी दिया गया इन्ही ने समयसार परमात्मप्रकाशादि ग्रयों को सर्वप्रथम है। जैन तत्वज्ञान एवं अध्यात्म मे प्रवेश करने के हिदी मे टीकाए तथा मौलिक रचनाए भी सम्पन्न की है, उत्सुक धर्मबधुप्रो की प्राथमिक ज्ञान-पिपासा कोशात करने जिनसे समाज भलीभाति परिचित है। इसके मिवाय हिंदी में इससे निश्चय-व्यवहार नयो की समन्वित दष्टि से में विद्यार्थियों को विद्यालयों की कक्षाओं में अध्यापनार्थ अध्ययन करने पर यथेष्ट सहायता मिलेगी तथा अनेक अन्य अनेक विद्वानों द्वारो सक्षिप्त टीकाए भी हई है, जिनसे भ्रातिया भी दूर हो सकेंगी। समाज को बडा लाभ हुमा है। अभी-अभी १०५ श्री प्रायिका विदुषी रत्न माता ज्ञानमती जी का हिन्दी मे ही ५/१, तम्बोली बाग्वस, नवीन पद्यानुवाद भी सनावद से प्राप्त हुआ है जो सरल इन्दौर (मध्य प्रदेश) महावीर संवत : भारत का सर्वप्राची संवत भारत का सर्वप्राचीन सवत् महावीर संवत् है। इसकी प्रामाणिकता को सिद्ध करने के लिए मुप्राचीन विपुल माहित्य के अतिरिक्त शिलालेख भी मौजूद है। वीर निर्वाण सन् ८४ (ई० पू० ४४३) का यह शिलालेख अजमेर (राजस्थान) के पास बडली गाव में मिला था। वीर निर्वाण सूचक लेखो मे यह सर्वप्रथम लेख है। राजस्थानातर्गत अजमेर संग्रहालय में यह लेख सप्रति मौजद है, कहना कठिन है। कुछ भी हो. महावीरस्वामी के मोक्ष जाने के थोड़े ही समय के बाद का यह लेख महावीर सवत को सर्वप्राचीन सिद्ध करने के लिए पर्याप्त मुदढ प्रमाण है। "जैन साहित्य सशोधक", खण्ड १, पृष्ठ २११ में प्रसिद्ध इतिहासज्ञ डा० काशीप्रसाद जायसवान्न लिखते हैं कि "जैनो में करीब २५०० वर्षों से प्रचलित सवत्सर गणना की रीति हिन्दुनो मे सर्वोत्तम है। इससे प्राचीन काल से ऐतिहासिक पद्धति की वर्ष गणना हमारे देश में प्रचार मे थी, यह बात स्पष्ट सिद्ध होती है। यह पद्धति अन्यत्र नष्ट होकर सिर्फ जैनो में ही रहा है। जैन वर्ष गणना के प्राचार पर बुद्ध और महावीर के काल के बाद की ऐतिहासिक घटनाओं को मैंने कालक्रम से ठीक किया है । वह सुज्ञात गणना से बिल्कुल ठीक बैठता है। अनेक ऐतिहासिक विचारों का सकेत हमें जनो के ऐतिहासिक लेख एव पट्टालियो से भी मिलता है।"
SR No.538032
Book TitleAnekant 1979 Book 32 Ank 01 to 04
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGokulprasad Jain
PublisherVeer Seva Mandir Trust
Publication Year1979
Total Pages83
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Anekant, & India
File Size5 MB
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