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________________ भगवान महावीर का विचार तथा कृतित्व : समस्त विश्व के लिए अनुपम धरोहर डा० रामकुमार वर्मा जिस समय राजर्षि पुरुषोत्तमदास टंडन ने मुझसे प्रत्येक परिस्थिति में वस्तुस्थिति की ही वास्तविकता के विशेष प्राग्रह किया था कि मैं हिन्दी साहित्य का पालोच- रहस्य को पहचाना है। इसलिए उसने विरोध की अपेक्षा नात्मक इतिहास लिखू तो मैंने इस संदर्भ मे विशेष अध्ययन महयोग को जीवन का तथ्य समझा है। करना प्रारम्भ कर दिया था। हिन्दी साहित्य के प्रादिकाल जैनधर्म के इस सर्वब्यापी महत्व ने ही मुझे चौबीसवें का विश्लेषण करते समय मझे उत्तर अपभ्रश को शैली मे तीर्थकर वर्धमान महावीर के प्रति अपनी श्रद्धा समर्पित हेमचन्द जैन ध्यावरणाचार्य के दोहे तथा प्रबन्ध लेखक करने के लिए प्रेरित किया। उन्होने जीवन में उपलब्ध स्वयंभू पोर पुष्पदन्त की रचनाओं को पढकर, उनके सभी प्रकार के इन्द्रिय जनिन मुखो का परित्याग कर साहित्यिक उत्कर्ष से प्रसन्नता मिश्रित पूतहल भी हया सबोधि की प्राप्ति के लिए अपना जीवन उत्सर्ग कर दिया। था। इन चरित काब्यो को पढ़ने पर जीवन के यथाथ के तेइसवें तीर्थकर पाश्र्वनाथ के चातुर्याम (अहिंसा, सत्य, साथ, उमके उदात्त स्वरूप का जो निर्वाह किया गया है, अस्तेय और अपरिग्रह ) में महाबीर ने पचयाम (ब्रह्मचर्य) वह वास्तव में साहित्यिक शैली का एक उत्कृष्ट रूप ज्ञात जोडकर जीवन को जिस सुदृढ पथ पर प्रतिष्ठित किया, हुमा । उसके साथ ही साथ जैन साहित्य के अन्तर्गत धर्म वह संभवत: उनके पूर्ववर्ती किसी तीर्थकर द्वारा सम्भव मोर दर्शन की जो मीमासा प्रस्तुत की गई, वह इतनी नही हमा। वर्धमान महावीर वैशाली के अधिपति सिद्धार्थ विश्वसनीय और व्यावहारिक ज्ञात हुई कि मैन जैन साहित्य नरेश के राजकूमार थे। शक्ति, मौन्दर्य और साहस मे के प्रचुर प्रन्यो की खोज की और मुझे हिन्दी साहित्य के प्रतिम, किन्तु शैशव से ही परिवार में पार्श्वनाथ की मादिकाल की सामग्री यथेष्ट रूप मे प्राप्त हो गयी। अपने उपासना होने के कारण वे ऋजुता सहित वीतरागी थे। मालोचनात्मक इतिहास मे जैन धम और दशन की व्याख्या महात्मा बुद्ध से मैं उन्हें इस बात में श्रेष्ठ मानता ह क्योकि करते हुए, मैंने यह अनुभव किया कि हिन्दी साहित्य के बुद्ध के मन मे वैराग्य भावना तब द्रवित हुई, जब उन्होने विकास मे इन ग्रन्धो का विशेष महत्त्व है। श्रमणाचार और रोगो, वृद्ध पौर मृतक को देखा। तब उन्होने जीवन की श्रावकाचार के माध्यम से उन्होने जीवन क माध्यत्मिक नश्वरता का अनुभव किया, किन्तु महाबीर बधमान के भौर लौकिक परिवेशो का विभाजन करत हुए भी, उनम लिए इन उपादानो की कोई प्रावश्कता नही थी। इसीएक सामजस्य स्थापित कर दिया। इस सन्दर्भ में एक लिए मैंने उनके वैराग्य को उनका ऋजुसस्कार कहा है, जिज्ञासा मेरे हृदय में उत्पन्न हुई कि महात्मा बुद्ध वष्णव अर्थात् यह सस्कार उन पर बाहर से नही पाया किन्तु वह धर्म के अवतारो मे स्वीकृत होकर भी, धार्मिक दृष्टिकोण जन्मजात था। इस दृष्टि से मैं उन्हें महात्मा बुद्ध से महानतर मानता हूं। से इस देश से निर्वासित क्यो हो गये, जबकि जैनधर्म जो "जय वर्धमान" नाटक की रचना करते समय उनकी बौद्धधर्म के समानान्तर ही चलता रहा, माज देश की जनता वैराग्य भावना का वास्तविक रूप प्रखर करने के लिए मैंन का एक अविभाज्य अंग बना हमा है। इसका समाधान एक वस्तुबादी रूपरेखा प्रस्तुत की है । नाटक में सुप्रिया, मझे जैनधर्म के पनकान्त या स्याद्वाद में मिला । जन. रभा, तिलोत्तमा जैसी सुन्दर प्रप्सरामों को (सतो, रजो धम ने सत्य को विविध रूपा में देखा है, इसलिए उसन (शेष पृ० ६४ पर)
SR No.538032
Book TitleAnekant 1979 Book 32 Ank 01 to 04
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGokulprasad Jain
PublisherVeer Seva Mandir Trust
Publication Year1979
Total Pages83
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Anekant, & India
File Size5 MB
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