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________________ प्राकृत का बद्रव्यसंग्रह और उसकी महत्ता (अर्थात्) "दूसरी बात यह है कि शुद्ध नय से जीव के कहने पर भी मिट्टी के घड़े को घी का बना हुआ घडा अकपिना, अभोक्तापना और क्रोधादिक से भिन्नपना मानकर नही चलता, प्रत्युत श्रोता उम घडे को घी के घड़े है-इस प्रकार व्याख्यान करने पर दूसरे पक्ष में व्यवहार के नाम से जानता है अतः उसको उसकी समझ के अनुसार से कपिना, भोक्तापना और क्रोधादिक से अभिन्नपना समझाने का ही रहता है, अतः प्राचार्यों ने भी विभिन्न भी जोव में पाया हो जाता है। किस कारण से ? यदि ऐसा प्रकार के जीवों को उनकी समझ व योग्यतानमार वस्तु पूछो, तो उत्तर यह है कि जैसे देवदत्त दक्षिण नेत्र (दाहिनी का स्वरूप समझाने के लिए विभिन्न नयो का उपयोग किया पाख) से देखता है, ऐसा कथन करने पर बाम नेत्र (वायी है, जो जीवों के हित में है। आख) से नही देखता, यह बात बिना कह सिद्ध हो जाती इस प्रकार, नयो द्वारा वस्तु का ज्ञान विभिन्न दृष्टियों है।" अर्थात् निश्चय-व्यवहार दोनो नय दाय-बाय नेत्र मे पात्रानुसार कराया जाता है, अत: नयो का स्वरूप भी के समान है। यथार्थ रूप में जानना नितांत आवश्यक है, क्योंकि प्राचार्यों अागे चलकर वे कहते है--"जो इस प्रकार परस्पर ने जो कुछ भी वस्तु के सम्बन्ध में कथन किया है वह किसी सापेक्ष नय विभाग को नहीं मानते. ऐसे जो मारूप और नय की मुख्य दृष्टि से ही किया है और वह अन्य नय सापेक्ष सदाशिव मतानयायो है उनके मन में जैसे शुद्ध निश्चय नय होकर वस्तु का अंश रूप में ज्ञान करानेवाला है, अत. सत्य से जीव कर्ता नही है और क्रोधादिक से भिन्न है, उसी है। प्रकार व्यवहार नय से भी मानना पड़ेगा। इसमे संसारी समयसारादि प्राध्यात्मिक ग्रंथों में शुद्ध नय की अभेदजीव के क्रोधादि रूप परिणमन करने के अभाव में मिद्ध प्रधान सामान्य दृष्टि की प्रधानता से प्रात्मादि तत्त्वो के भगवान् के ममान कम बधन का प्रभाव मानना पड़ेगा म्वरूप का प्रतिपादन किया गया है तथा गोमटसारादि और कर्म बध के अभाव में जीव को सर्वदा मक्तपने का। ग्रथो में भेद-नय प्रधान व्यवहार दृष्टि से गुणस्थानादि गत प्रमग पावेगा, जबकि यह सारी जीव सर्वदा मुक्त है' जीव के ही भावो तथा गति इन्द्रियादि अवस्थानों के कथन इस कथन और मान्यता में प्रत्यक्ष मे ही विरोध है; क्योकि द्वारा तत्व ज्ञान कराने का परमपूज्य आचार्यों ने प्रयाम कर, इस जीव का मसार प्रत्यक्ष ही दिखाई दे रहा है।" तत्त्व जिज्ञामुग्रो की पावानमार ज्ञानपिपासा को शात करके प्राचार्यश्री के उक्त कथन से-दोनो नयो की परम्पर. महान उपकार किया है जिसमे हमे, नयो के पक्षव्यामोह विरोधी दृष्टिया होने पर भी वे सापेक्ष होकर दोनो ही सत्य । का परित्याग कर सम्यक्ज्ञान की प्रागधना द्वाग वीतराग है और निरपेक्ष दोनो ही प्रमाण विरुद्ध होने मे मिथ्या विज्ञान की प्रोर अग्रसर होना ही श्रेयस्कर है। है-यह स्पष्ट हो जाता है। __नयो के पक्षपात-वश उनसे राग-द्वेष करना अथवा इसके मिवाय, व्यवहार नय के अन्तर्गत उपचरित नय तत्त्वचर्चा में उसका प्रयोग कर विसंवाद करना और एक भी पाता है, जिसमें एक वस्तु के गण धर्मो को कारणवश दूसरे को मिथ्यादृष्टि कहकर संबोधन करना या परम्पर दूमरी वस्तु में प्रागेपित कर मथन किया जाता है, जैसे शव तापूर्ण व्यवहार करना-कगना न तो आवश्यक और घी रखे रहने के कारण मिट्टी के घडे को घी का घड़ा उचित है और न इससे अनादिकालीन मोह का विनाश कहते है अथवा पौद्गलिक देह में जीव के रहने में देह को होकर मम्तग्दर्शन की प्राप्तिपूर्वयः तत्त्व ज्ञान की उपलब्धि भी जीव कहकर व्यवहार किया जाता है। यह नय भी व चारित्र की पवित्रता ही सभव है। प्रत विद्वानों और म्लेक्षो को म्ले भाषा में ज्ञान कराने के समान, अजानियो प्रवचनकारी का यह परम कर्तव्य है कि वे अज्ञता वश अपने को जिस प्रचलित व्यवहार व भाषा मे तन्व समझाने की किसी प्रिय नय के मर्वथा पक्ष-व्यामोह के कुचक में फसकर आवश्यकता है उसी के सहारे तत्त्व बोध कराने में सहायक ग्रनेकांनात्मक जैन शामन का गला घोट एकातमिथ्यान्व के होने से हितकारी माना जाकर शास्त्रों व प्रव वनो मे उप- प्रचार-प्रसार से दूर रहे नया ममाज को नगर-नगर और योग में लाया जाता है। वक्ता का अभिप्राय घी का घडा गांव-गांत में इमी आधार पर फट डालकर दो भागो में
SR No.538032
Book TitleAnekant 1979 Book 32 Ank 01 to 04
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGokulprasad Jain
PublisherVeer Seva Mandir Trust
Publication Year1979
Total Pages83
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Anekant, & India
File Size5 MB
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