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________________ ४०, वर्ष ३२, कि०१.२ अनेकान्त इस दृष्टि से, इतने से उद्देश्य-से ही यदि मूर्ति पूजा दिया गया या मुख्य मूर्ति के समीप कही। स्वीकृति मान लें तो कहना होगा कि आज संसार में जैन धर्म और मूर्ति-पूजा कदाचित् ऐसा कोई व्यक्ति नही, जो मूर्ति-पूजक न हो। जैन मूर्तियो के निर्माण और उनकी पूजा-प्रतिष्ठा के परन्तु मानव ने जब जब से भौगोलिक, सास्कृतिक एवं विवरण प्राचीनकाल से ही प्राप्त होते है । जैन धर्म में दो राजनीतिक दृष्टियों से अपनी सीमायें सकीर्ण की या ऐसी प्रकार की मूर्तिया स्वीकार की गयी है-१. कृत्रिम तथा सीमामों का अनुभव किया, तबसे उसकी मूर्ति-पूजा ने भो २. प्रकृत्रिम । जन साहित्य में कृत्रिम मूर्तियों की अपेक्षा देश, काल तथा परिस्थिति के अनुकल रूप-रूपान्तर धारण अकृत्रिम मतियों की संख्या असंख्य गुणी वणित है। जैसे किए। कही तदाकार मूर्ति-रूप प्रमीक की पूजा प्रारम्भ कृत्रिम और प्रकृत्रिम के भेद से मूर्तियां दो प्रकार की हुई, हुई तो कही अतदाकार मूर्ति-रूप की। उसी प्रकार चैत्यालय भी दो प्रकार के होते है-१. कृत्रिम जहा तक भारत का प्रश्न है. यहा तदाकार मूर्तरूप चैत्यालय एवं २. अकृत्रिम चैत्यालय। प्रतीक को ही अधिकतर पूजा प्राप्त हुई। अब से पचास ये चैत्यालय नन्दीश्वर द्वीप, सुमेरु, कुलाचल, वैताढ्य शत की पूर्व यहा मूर्ति-पूजा प्रचलित थी। उससे पच्चीस पर्वत, शाल्मली वृक्ष, जम्बूवृक्ष, वक्षारगिरि, चंत्यवृक्ष, शताब्दो पश्चात् यहा उसकी जड़े इतनी गहरी जम चको रतिकरगिरि, रुचकगिरि, कंडलगिरि, इष्वाकारगिरि, थी कि महात्मा बुद्ध जैसे अद्भुत प्रभावशाली व्यक्ति के अंजन गिरि, मानुषोत्तर पर्वत, दधिमुख पर्वत, ज्योतिर्लोक, प्रादेश का उल्लघन करके भी मनुष्य ने मूर्ति-पूजा च लू व्यन्तरलोक, स्वर्गलोक तथा भवनवासियो के पाताल लोक रखी। मे प्राप्त होते है। इन प्रकृत्रिम चैत्यालयों में प्रकृत्रिम पूजा पूज्य पुरुष की की जाती है। यदि पूज्य पुरुष मूर्तियां विराजमान हैं। युग के प्रारम्भ मे सोधर्मेन्द्र ने विद्यमान न हो तो उसकी मूर्ति बनाकर उसके माध्यम से अयोध्या में पांच मन्दिर,बनाए तथा उनमें प्रकृत्रिम मूर्तियां पूज्य पुरुष की पूजा की जाती है। तदाकार स्थापना का स्थापित की। अभिप्राय भी ऐसा ही है। सर्वप्रथम भरत चक्रवर्ती ने अयोध्या एवं कैलाश मे मूर्तियों के पात्र मदिरों का निर्माण कराकर स्वर्ण और रत्नों की कृत्रिम " मूर्ति के पात्रो के रूप मे भारत में -शिव, विष्ण, मूर्तियां विराजमान कराई तथा जिस स्थान पर बाहुबली ऋषभ -पाश्र्वनाथ, महावीर और बुद्ध जैसी महान् विभू ने एक वर्ष तक प्रचल प्रतिमायोग धारण किया था, उस तिया स्वीकृति को जाने लगी। किन्तु कदाचित् जनसख्या स्थान पर उन्ही के प्राकार (५२५ धनुष) को मूर्ति बनके बिस्तार व रुचि-वभिन्य के फलस्वरूप मूर्ति के पात्रो वायी। ग्रन्थों मे वर्णन प्राप्त होता है कि-द्वितीय तीर्थमे वृद्धि हो चली। प्राकृतिक शक्तियो को, जिन्हे प्रब ङ्कर अजितनाथ के समय में चक्रवर्ती सगर सुपुत्रों ने एवं तक शब्दात्मक या प्रतदाकार प्रतीक ही प्राप्त थे, अब २०वें तीर्थकर मुनिसुव्रतनाथ के तीर्थ मे मुनिराज वाली मृतरूप प्रतीक प्राप्त होने लगे, यद्यपि ऐसी मूर्तियो को एवं प्रतिनारायण रावण ने कैलाश पर्वत पर उन जिनावह मान्यता कभी नहीं मिली जो पूर्व स्वीकृत शिव मादि लयो के और श्री रामचन्द्र तथा सीता ने बाहुबली स्वामी की मूर्तियों को प्राप्त हुई और फिर इन पात्रो की संख्या की उक्त मूर्ति के दर्शन-पूजन किए थे। प्रधिक बढी कि उनके प्रति पूजा की भावना अपेक्षाकृत जैन धर्म में प्रतीक निर्बल हो गयी। फलस्वरूप उन्हे वह मलकरण और स्थान प्रतीक का अस्तित्व जैन-धर्म मे मादिकाल से रहा भी प्राप्त न हो सका जो पूर्व स्वीकृत मूतियो को हुमा। है। शास्त्रीय विधानों के अनुसार कुछ मूर्तियां भोर मंदिर यही कारण है कि अन्य मूर्तियो को पूर्व-स्वीकृत मूतियो के (जिनका उल्लेख ऊपर के अनुच्छेद में किया गया है) तो परिचायक या पूरक के रूप में प्रस्तुत किया गया। जब ऐसे हैं जो केवल प्रकृति की देन है', उनका न घाटि है एक मति के लिए मन्दिर का निर्माण किया गया तब अन्य भौर न पन्त । यह दूसरी बात है कि वर्तमान मनुष्य उन मतियों को या तो मदिर के सज्जागत तत्वा म स्थान तक पहुंचनका कत्याकत्रिम चारु चैत्यानिलयान् नित्यं त्रिलोकोगतान् । वन्दे भावनध्यतरान् पतिवरान् स्वर्गामरावासगान् ।।
SR No.538032
Book TitleAnekant 1979 Book 32 Ank 01 to 04
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGokulprasad Jain
PublisherVeer Seva Mandir Trust
Publication Year1979
Total Pages83
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Anekant, & India
File Size5 MB
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