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मनुष्य द्वारा निर्मित प्रानीनतम जन मूर्ति कौन है, किसी एक या अधिक को मूर्ति के साथ उत्कीर्ण किया यह विचारणीय है। पटना संग्रहालय में लोहानीपुर से ' जाता था। परवर्ती काल में लान्छनों की व्यवस्था प्राप्त मौर्यकालीन एक जन मूर्ति प्रदर्शित है'। लोहानीपुर और उन्हें भूतियों के पादपीठ पर उत्कीर्ण किया जाने लगा। (पटना) में एक जैन मन्दिर की नीव भी मिली है। जन-धर्म में समवशरण, सहनकूट, सिद्धचक्र, प्रष्टहड़प्पा में भी एक नग्न मूर्ति प्राप्त हुई है। इन दोनों मंगल, प्रष्टप्रातिहार्य, सोलह स्वप्न, चरणपादुका, नवनिषि, मतियों में परम्परा पोर लक्षणों की दृष्टि से इतनी अधिक नवग्रह मादि भी प्रतीक रूप में स्वीकृत होकर पूजित हैं। समानता है कि हडप्पा की मूर्ति को जैन कहने में संकोच उपर्युक्त विवेचन से यह सुस्पष्ट है कि-पूजा पूज्य नहीं होता। स्व. प्रो. प्राणनाथ विद्यालकार (बनारस पुरुष को होती है। पूज्य पुरुष के समक्ष न होने पर प्रतीक हिन्द विश्वविद्यालय) ने सिन्धु घाटी में ही प्राप्त एक मुद्रा रूप में उसकी मूर्ति के माध्यम से उसके गुणों का स्मरण (क्रमांक ४४६) पर "जिनेश्व" पढ़ा था। इन सबके कर अपने विकास-उत्थान पोर कल्याण का मार्ग सुनिविचत प्राधार पर जन मूति की प्राचीनता अब स लगभग ५००० किया जाता है। इस प्रकार यह स्पष्ट है कि सांसारिक वर्ष पूर्व मानी जाएगी। तब से निरन्तर अनेक प्रकारीय कार्य कलापो मे उलझे प्राणी मूर्ति को प्रतीक रूप में ही उपादानों से मूर्तियों का निर्माण होता पाया है। इस क्रम मानते घोर पूजते है । इस उपासना का तात्पर्य यही है कि जीवन्त स्वामी की मूर्ति तथा कलिंगाधिपति खारवेल के सर्वसाधारण प्राणी ऐसे महापुरुषों के दर्शन-पूजन से उनके हाथी गुम्फा अभिलेख में उल्लिखित जिन प्रतिमा के संदर्भ चरण-चिह्नो पर चलने तथा उनकी शिक्षामों को मारमतथा मथरा, देवगढ़, पभोसामादि में उपलब्ध प्राचीन जैन सात करने की प्रेरणा प्राप्त कर सकें, जिन्होंने स्वयं अपने मूर्तियां विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।
पुरुधार्थ से "परमात्मा पद" पाया है। क्योंकि साधना के जैन धर्म में प्राचीनकाल से तदाकार प्रतीकों के प्रति पश्चात् वह स्वय अनुभव करने लगेगा किरिक्त मतदाकार प्रतीकों को मान्यता भी रही है। प्रतवा- "य परमात्मा स एवाह, योऽहं स: परमस्ततः । कार प्रतीकों में मुख्य और परम्परागत है-धर्म चक्र, स्तूप, प्रहमेव मयोपास्यो नान्यः कश्चिदिति स्थितिः।। विरत्न, चैत्यवृक्ष, पूर्णघट, श्रीवत्स, शराब सम्पुट, पुष्पपात्र, जो परमात्मा है वही मैं हूं, जो मैं हूं, वही परमात्मा है। पुष्प पटलक, स्वस्तिक प्रादि । एक अन्य महत्त्वपूर्ण प्रतीक मेरे और परमात्मा के स्वभाव मे कोई अन्तर नहीं है। 'मायागपट्ट, भी रहा है। यह एक वर्गाकार या भायताकार अतः मेरे द्वारा मैं स्वयं ही उपासना के योग्य हूं, अन्य कोई शिलापट्ट होता है जिस पर कुछ अन्य प्रतीक उत्कीर्ण होते नही, वास्तविक स्थिति ऐसी ही है । है। कुछ पर मध्य में तीथंकर की लघुमूर्ति प्रकित होती परन्तु यह मार्ग उसी साधक के लिए उपतुक्त है जो है। कुछ अभिलिखित मायागपट्टों से विदित होता है कि मात्मानुभव के प्रमृत-मार्ग में पूर्णतः प्रविष्ट हो गया है। वे पूजा के उद्देश्य से स्थापित किए जाते थे। मथुरा तथा सांसारिक विषय-वासना मे व्यस्त मानव को प्राथमिक कौशाम्बी से भनेक सुन्दर शक-कुषाणकालीन भायागपट्ट विकास का मार्ग प्रतीक रूप में प्रयुक्त मूर्तियो की पूजाप्राप्त हुए हैं।
उपासना से ही प्राप्त होता है।
00 तीर्थकरों के लाञ्छन भी प्रतीक कहे जा सकते हैं । प्राध्यापक, शासकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, पहचान के लिए तीर्थकर का नाम या पंचकल्याणकों में से
दमोह (म.प्र.) १. देखिये, (म) विसेंट ए. स्मिथ : ए हिस्ट्री घाफ
इन इडिया एण्ड सीलोन, फलक दी, प्राकृति स तथा फाइन मार्ट इन इडिया एण्ड सीलोन, पृ. २० तथा फनक १०, माकृति-स । (ब) मार० सी० मजमदार:
मदार: ३. प्रौर भी देखिए, (म) पं० सुमेरचन्द्र दिवाकर : जैन
३. दी एज माफ इम्पीरियल यूनीटी, पृ० ४२६ ।
शासन, पृ० ३१३, (ब) मुनि विद्यानन्द : श्रमण
संस्कृति का इतिहास : सन्मति सम्देश (अगस्त २. देखिए, बी. ए. स्मिथ: ए हिस्ट्री माष फाइन मार्ट १६६६), पृ० १३।