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मूर्ति-पूजा की प्रतीकात्मकता
प्रतीक की स्वीकृति
मानव संस्कृति मे प्रतीक की स्वीकृति उत्तनी ही प्राचीन है जितनी मानव की ज्ञान चेतना । प्रत्यक्ष वस्तु को शब्दों द्वारा प्रकट करने की प्रथम चेष्टा ने ही प्रतीक की मान्यता का सूत्रपात किया प्रतीक विकास
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समय के साथ प्रतीक का भी विस्तार होता गया और वह अब शब्दों तक ही सीमित न रह गया। शब्दो स अधिक सरल और सक्षिप्त प्रतीक दूसरा नहीं, परन्तु कभीकभी अस्पष्ट या प्रदृश्य वस्तुओ का सर्वसाधारण को बोध कराने में शब्द असफल भी हो जाते है। ऐसी स्थिति में किसी को प्रभीष्ट वस्तु का प्रतीक माना जाने लगा । वस्तु एक वस्तु के प्रतीक के रूप में दूसरी वस्तु की ही स्वीकृति अपने प्राप मे एक बहुत बड़ी घटना थी । प्रतीकात्मक वस्तु ही आगे चलकर दो रूपों में परिणत हुई । उसका प्रथम रूप था -- प्रतदाकार, जिसे हम यथार्थ शब्दो में "नगढ़" कहे तो अधिक प्रच्छा होगा। मिट्टी के ढेले या पत्थर के टुकड़े से पर्वत का और जल की क्षुद्र धारा से विशाल नदी का बोध कराना भी प्रतीकों में स्थान पाता है । यही द्वितीय तक्षकार प्रतीक की मान्यता का सूत्रपात है ।
प्रतीक के विभिन्न रूप
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अब हमारे समक्ष प्रतीक के सीन रूप स्पष्ट है : (१) शब्दात्मक, ( २ ) प्रतदाकार श्रीर (३) तदाकार । वर्तमान विचारको प्रोर दार्शनिकों के विचार से अब कदाचित् शब्दात्मक प्रतोक को प्रतीक कोटि मेन रखा जाए, पर शेष दो प्रतीक ती अब भी मान्य हैं ।
मानव की विवेचनात्मक या उपयोगी अनुपयोगी वस्तुओं में मतभेद करने की योग्यता के विकास के साथ प्रतीक मान्यता ने भी विभिन्न रूप धारण किये उपयोगी
[D] डा० भागचन्द्र जंन 'भागेन्दु'
वस्तु का प्रतीक शुभ माना जाने लगा और अनुपयोगी वस्तु का प्रतीक प्रशुभ । यही से प्रतीको के प्रति सम्मान या सम्मान का भाव जागृत होता है। उपयोगी या धभीष्ट वस्तु के प्रतीक की कल्पना अधिक सुन्दर रूप मे की गयी । प्रारम्भ मे उसकी तदाकारता या प्रतदाकारता पर कम ध्यान दिया गया, परन्तु मानव मे ज्यों-ज्यो कलाबोध विकसित हुमा यो पो प्रतीक की तदाकारा की महत्व मिलता गया । तदाकार प्रतीक को महत्त्व इसलिए भी मिला कि वह मानव-भावना को अदाकार प्रतीक की अपेक्षा अधिक शीघ्रता एवं सुन्दरता से जामूत कर लेता है। मूर्ति - कल्पना
प्रतीक के क्षेत्र मे मानव की सुन्दरतम उपलब्धि थी मूर्ति की कल्पना उसने प्रारम्भ मे जब अपने सर्वाधिक प्रिय व्यक्ति को मूर्ति के रूप में प्रस्तुत कर लिया तब वह अपनी प्रपूर्व सफलता पर झूम उठा होगा। मूर्ति रूप प्रतीक की लोकप्रियता निरन्तर बढी और अब भी बढ रही है । यह प्रतीक भी समय कम से शुभ एवं प्रशुभ के रूप मे विभक्त हो चला। प्रशुभ वस्तु को मूर्तरूप प्रतीक देने में मानव ने अपना अनुमान अनुभव किया और यही कारण है कि अनुयोगी या दुरुपयोगी वस्तु के प्रतीक या तो मूर्तरूप नहीं होते या उनका मूर्तरूप उतना सुघड़ तथा कलापूर्ण नही होता, जितना कि उपयोगी वस्तुप्रो का | मूर्ति-पूजा का जन्म
मूरूप प्रतीक चूंकि उपयोगी या प्रभीष्ट वस्तु का ही बनाया जाने लगा, अतः उसकी मान्यता भी बढ चली। यह मान्यता विभिन्न रूपों में प्रकट हुई। मूर्ति को सुरक्षित तथा सुन्दर स्थान में रखा गया। अभीष्ट प्रेरणा या शक्तिसवार के लिए उसके सामयिक या दैनिक दर्शन का विधान किया जाने लगा। यही से "मूर्तिपूजा" की प्रथा को जन्म मिला ।