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३८, वर्ष ३२, कि. १-२
की चेतावनी भी उसे याद नहीं रह गई है। फलतः उसकी निस्सन्देह, केवल सिर मला लेने से कोई श्रमण नहीं जिन्दगी की गाड़ी समतल सडक को छोड़ ऊबड़-खाबड़ होता, न ही प्रकार के जप से ब्राह्मण । जंगल में रहने से रास्ते में दौड़ पड़ी है। कृत्रिम पाश्चात्य संस्कृति की ही मुनि नहीं होता थोर व कुश तथा चीवर धारण करने चकाचौंव में पड़ कर उसने अपनी सहज पौरस्य सस्कृति से तपस्वी । वस्तुतः, जो समता से सम्पन्न है, वही श्रमण की उपेक्षा कर दी है। यहां तक कि वह अपनी भाषा और है, ब्रह्म वयं का उपासक ही ब्राह्मण है, ज्ञानी ही मुषि हैं साहित्य को भी वह मूल्यहीन मानने लगा है। उसके पोर तप करने वाला हो तपस्वी।। मूल्यांकन को तुला ही प्रभारतीय हो गई है।
इस प्रकार, श्रमण-संस्कृति ने प्रत्येक व्यक्ति को उत्थान यही कारण है कि प्राधुनिक मानव विभिन्न मतवादों के मार्ग का अधिकारी घोषित किया है। अपनी साधना पौर साम्प्रदायिक रूढ़ियों की वात्या मे विलुण्ठित हो रहा से सर्वसामान्य व्यक्ति भी पारमश्वयं को सिद्धि सुलभ कर है । उपका अपना ज्ञानबोध अहंकार के अधेरे में डब गया सकता है। श्रमण-संस्कृति ने ईश्वर के कर्तुत्व को नकारते है। ऐसी स्थिति में श्रमण-सस्कृति के पयाम धर्म को हुए मानव के मजेय पुरुषार्थ के प्रति प्रडिग पास्था मभिप्रोज्ज्वल प्रभा उसके तिमिरावत हृदय को भास्वर बना व्यक्त की हैं। प्रात्मशक्ति के प्रति विश्वास हो जाने के सकती है। उसके दिग्भ्रष्ट जीवन-पोत के लिए अनेकाम्त कारण ही वह किसी पारमेश्वरी शक्ति की कल्पना कर जयपताका दिशासूचक यात्र का काम कर सकती है। उसके प्रति समर्पित हो जाता है। परवर्ती-कालीन भक्त क्योंकि, श्रमण-संस्कृति के पचयाम धर्म में मानव की कवि चण्डीदास की प्रसिद्ध काम्य-पंक्ति-'संवार ऊपरे चेतना को अनावश्यक प्राग्रह से अलग कर प्रक्षित प्रना- मानुस सत्य' मे श्रमण संस्कृति का ही उदात्त दष्टिकोण ग्रह के ज्योतिपथ की पोर ले चलने की अपरिमित शक्ति समाहित है। है। कहना न होगा कि श्रमण-सस्कृति मे जीवन के श्रमण-संस्कृति के उदात्त विचारप्रधान दार्शनिक
से प्रवाह धार्मिक चितन ने राष्ट्रपिता महात्मा गान्धी को भी अनुकलित किया
arva परिपालक प्राडम्बरो था और गान्धी जो के प्रसिद्ध ग्यारह व्रतों मे प्रारम्भ के का प्रतिक्षेप, सैद्धान्तिक मतों का समन्वय, सामाबिक पांच व्रत भगवान् महावीर के ही पंचयाम धर्म से प्राकलित जीवन मे समतावाद की स्थापना के द्वारा स्त्री-पुरुषों के हैं। कहना यह चाहिए कि महात्मा गान्धी का जीवन-दर्शन लिए ममान प्रगति की योजना, अधिक धन का प्रत्याख्यान श्रमण सस्कृति के जीवन-दर्शय का ही परवर्ती व्यापक पौर प्राप्त धन का स्वामित्व-हीन समान वितरण, पुजी- विस्तार है, जिसकी उदान विचारधारा परम्परानुक्रम से वाद का विरोध, ऊंच-नीच और स्पृश्यास्पृश्य जैसी समा- विकसित होकर पाज की सामाजिक एवं भाथिक अभ्यूजोत्थान-विरोधी भावना का निराकरण प्रादि--प्रति- त्यानमूलक राष्ट्रीय योजना विंश-सूत्री कार्यक्रम से प्रा जुड़ी निहित है, जिनसे उसके उदात्त दृष्टिकोण का प्रत्यक्ष है। इसलिए, यह कहना अतिशयोक्ति न होगी कि राष्ट्रीय परिज्ञान प्राप्त होता है।
अभियान के प्रत्येक पड़ाव पर या सामाजिक जीवन के हर श्रमण-सस्कृति में श्रमण, ब्राह्मण, मनि और नापस मोड़ पर प्रगति और उत्कर्ष का मन्त्र फकने वाली श्रमणके लिए किसी निर्धारित वेश-विशेष की भावश्यकता नहीं। संस्कृति को किसी विशिष्ट देश, काल, मायु, नाम, गोत्र भगवान महावीर ने इनकी परिभाषा उपस्थित करते हुए मादि की सीमा में रखकर देखने की अपेक्षा सम्पूर्ण विश्व निर्देश किया है :
के सन्दर्भ मे मगलकारी उदात्त दष्टिकोण का ही पर्याय न वि मुण्डिएण समणो न मोकारेण बम्भणो । समझना समीचीन है। न मुणी र ण वासेण कुसचीरेण न तावसो । समयाए समणो होइ बम्पचेरेण बम्मणो।
सम्पादक, 'परिषद्-पत्रिका', बिहार-राष्ट्रभाषा-परिषद्, णाणेण य मुणो होइ तवेण होइ तापसो।।
पदना-८००००४