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________________ अमग-संस्कृति का उदात्त वृष्टिकोण एकान्त से अनेकान्त की पोर प्रस्थान करते है, जहाँ हमें सिद्धान्त का समर्थन करती है। वह जना (तद्वति तत्प्रकारक सम्पूर्ण जागतिक स्थिति का सही मभिज्ञान प्राप्त होता है ज्ञान) पर प्रास्था रखती है, बाहरी चाकचिक्य को नकार पौर उदात्त दृष्टिकोण से संवलित होने का अवसर मिलता देती है। वह सिद्धान्तो के भटकाव की स्थिति नही उत्पन्न है। सर्वधर्मसमन्वय की समस्या का समाधान भी अनेकान्त करती। वह तो जीवन को सन्त्रास, कुण्ठा, प्रनास्था, ही दे सकता है। विसगति मादि दुर्भावनामों के घात प्रतिधातो से बचने को ज्ञान प्रोर दया श्रमण-संस्कृति के मेरुदण्ड है। ये प्रेरित करती है, ताकि मानव अपनी मानवता की चरम दोनों ऐसे दिव्य तत्त्व है, जिनमें उदात्त दृष्टिकोण का परिणति के सुमेरु पर विराजमान हो सके, सिशिला पर अपार सागर तरंगित होता रहता है। कोई भी ज्ञानी प्रासीन होकर पल्योपम भूमि को प्रायत्त कर सके । पुरुष अनदार नही हो सकता और किसी भी दयालु की प्राज का मानव नितान्त परिग्रही हो गया है । उसने विचारधारा सकीर्ण नहीं होती। किन्तु, दया की भावना अपने इर्द-गिर्द अनेक प्राडम्बर चिपका रखे है। अज्ञानता का उदय विना ज्ञान के सम्भव नही । इसीलिए, जिनवाणी और दयाहीनता के कारण वह अनपेक्षित माभिजात्यकी मात्रिक भाषा है : 'पढम पाण तो दया।' श्रमण- भावना मे पडकर मानवता को गरिमा से परिच्युत हो संस्कृति मे ज्ञान को ही प्रमाण माना गया है। ज्ञान भी गया है। वह बाह्य जगत् मे प्रकर्म को कर्म भोर कर्म को ऐसा, जो स्व प्रौर पर को समान रूप से प्राभासित करे प्रकर्म मान बैठा है। भौतिकता से प्रतिपरिचय के कारण और उसमे किसी प्रकार का बाधा-व्यवधान न हो। इसी- वह पाध्यात्मिकता की अवज्ञा कर रहा है। उसका कोई लिए प्राचार्य सिद्धसेन ने कहा है . 'प्रमाण स्वपराभामि भी कथन न तो सुचिन्तित होता है, न ही वह कोई सुविज्ञानं बाघविवजितम् ।' उदात्त दृष्टिकोण के लिए ज्ञान चारित कार्य कर पाता है। कुल मिलाकर, प्राधुनिक का होना अनिवार्य है और ज्ञान का क्रियान्वयन दया- मानव-समाज मे प्रात्मप्रदर्शन की मिथ्या गतानुगतिकता, भावना से ही सम्भव है। ज्ञान की ही सक्रिय अवस्था की ऐमी लहर छा गई है कि वह सिवाय दूसरे का छीनने दया है। ज्ञान को सक्रियता के लिए दया अनिवार्य है। के अलावा और कुछ सोच ही नहीं सकता। श्रमणकहना चाहिए कि ज्ञान और दया दोनों एक ही सिक्के सस्कृति ने इसीलिए, अस्तेय-भावना को मामाजिक जीवन के दो पहलू हैं। इसीलिए, अनन्त ज्ञान से सम्पन्न तीर्थकर मे प्रतिष्ठा दी है। 'दयालु' या 'कल्याणमित्र' की संज्ञा से सम्बोधित हुए। ईशोपनिषद् की 'तेन त्यक्तेन भुजी था मा गृधः ब्रह्मचर्य की व्याख्या में भी थमण-संस्कृति ने उदार कस्यस्विद्धनम्' जैमी सामाजिक भावना को उद्बद्ध करने दष्टिकोण से काम लिया। है अन्यत्र जहाँ 'मरण विन्दुपातेन वाली चेतावनी को प्राज के मानव ने नजरन्दाज कर दिया जीवनं बिन्दुधारणात्' का कठोर निर्देश मिलता है, वहा है, इसीलिए उसमें चौर्यवृत्ति या गई है : प्रात्मधन की श्रमण-संस्कृति ने 'स्वदारसंतोषित्व व्रत' को ब्रह्मचर्य का अपेक्षा परधन के प्रति तृष्णा से निरन्तर पाकुल-व्याकुल हो दर्जा दिया है। प्राज ब्रह्मचर्य के नाम पर उन्मुक्त योन- रपा है। फलतः, उसके सयम का चाबुक बेकार हो गया मेघ का जो नग्नताण्डव दष्टिगत होता है, उसका संयमन है और इन्द्रियों के घोड़े बेलगाम हो गये है। उसके जैसा 'स्वदार-सन्तोषित्व-व्रत' से सहज ही सम्भव है। एकमात्र कामगड व्यक्ति काम से ही काम को शान्त करना चाहता अपनी पत्नी में ही संतोष के व्रत का पालन किया जाय, है, और इसके लिए वह चोयवृत्ति से ही अपने सुखतो कामोष्मा से प्रतप्त माधुनिक समाज मे सयम के स्वर्गिक सन्तोष की सामग्री जटाने मे प्रबल पुरुषार्थ मान रहा है सुख की प्रतारणा हो जाय। और हिंसा तथा मिथ्यात्व के प्रति एकान्त प्राग्रहशील हो श्रमण-सस्कृति अपने उदात्त दृष्टिकोण के कारण ही उठा है। व्यष्टिगत धारणा की अपेक्षा समष्टिगत धारणा के प्रति सारस्वत जगत में भी प्राज अजीव छीना-झपटी चल मामहशील है। वह 'भूमा वे सुखं नाल्पे सुखमस्ति' के रही है। गीता की 'स्वधर्म निधन यः परधर्मो भयावहः'
SR No.538032
Book TitleAnekant 1979 Book 32 Ank 01 to 04
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGokulprasad Jain
PublisherVeer Seva Mandir Trust
Publication Year1979
Total Pages83
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Anekant, & India
File Size5 MB
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