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________________ ६० वर्ष ३२, कि०३-४ भनेकान्त खो जैनाच यं द्वारा लिखित है और प्रकाशित किया प्रलकार प्रादि के ग्रन्थों के प्रकाशन की तो व्यवस्था की गया है। श्री उग्रादित्याचार्य-प्रणीत उक्त वैद्यक ग्रन्थ का है, उसमे रुचि भी दिखायी है और उसके लिए पर्याप्त नाम 'कल्याणकारक' है, जिसका हिन्दी अनुवाद पोर गशि भी व्यय की है, किन्तु प्रायुर्वेद और ज्योतिष के ग्रन्थों सम्पादन प० वर्धमान पार्श्वनाथ शास्त्री (सोलापुर) ने के प्रति उसने कोई ध्यान नही दिया। यही कारण है कि किया है। इस ग्रन्थ का प्रकाशन सन् १९४० मे किया गया इस साहित्य की प्रचुरता होते हुए भी यह अभी अन्धकाराथा। सेठ गोविन्दजी रावजी दोशी (मोलापुर) ने इसे वृत्त है । अब तो स्थिति यहाँ तक हो गयी है कि जनाचार्यों प्रकाशित करवाया था। 10 रावजी सखाराम दोशी को द्वारा प्रणीत जिन ग्रन्थो की रचना का पता चलता है उन उत्कट प्रभिलाषा थी कि जैनाचार्यों द्वारा प्रणीत वंद्यक ग्रन्थों का अस्तित्व ही हमारे सामने नही है। अनेक स्थानों शास्त्र के प्रकाशन के सम्बन्ध में कुछ कार्य होना चाहिये। पर स्वामी ममन्तभद्र के वैद्यक ग्रन्थ का उल्लेख मिलता है, यही कारण है कि 'कल्याणकारक' ग्रन्थ के प्रकाशन के किन्तु वह ग्रन्थ अभी तक प्रप्राप्य है। 'श्रीपूज्यपादोदित' लिए उन्होने अथक परिश्रम किया। जब उन्हे यह मालूम प्रादि कथनो को उद्धृत करते हुए अनेक जनेतर विद्वान हमा कि श्री उग्रादित्याचार्य-प्रणीत एक समग्र जैन वैद्यक वैद्यक में अपना योगक्षेम चलाते हुए देखे गये है। किन्त ग्रन्य मैसूर गवर्नमेट लायब्ररी में मौजूद है, तो बिना किसी अत्यधिक प्रयत्न किये जाने पर भी पूज्यपाद विरचित ग्रन्थ प्रमाद और विलम्ब के तत्काल उन्होने उक्त प्रन्थ की प्रति प्राप्त नहीं हो सका। इसी प्रकार और भी अनेक ग्रन्थों का लिपि कराने की व्यवस्था की । प्रतिलिपि के पूर्ण हो जाने प्रकरणान्तर से उल्लेख तो मिलता है, किन्तु ढूढ़ने पर पर उन्होने प० वर्धमान पार्श्वनाथ शास्त्री से उसके संपादन उनकी उपलब्धि नही होती है। एव मनूवाद का प्राग्रह किया। पहले तो पण्डित जी को वर्तमान में उपलब्ध एवं प्रकाशित वैद्यक ग्रन्थ 'कल्याणसकोच हा कि प्रनभ्यस्त विषय में कसे हाथ डाला जाए कारक, को देखने से ज्ञात होता है कि जनेतर पायबंद के (क्योकि शास्त्रीजी धर्म-न्याय-दर्शन के तो प्रकाण्ड विद्वान प्रन्यो की अपेक्षा जैन बंधक गन्थो में कुछ भिन्नता पौर है, किन्तु मायुर्वेद विषय में उनकी अपेक्षित गति नही है); विशेषता प्रवश्य है । एक मौलिक विशेषता तो यह है कि किन्तु बाद में श्री दोशी के विशेष प्राग्रह के कारण मोर जैन मनीषियो, विद्वानो और विचारकों ने जिस प्रकार जैन वैद्यों का इस मोर उपेक्षा-भाव देखकर उन्होने यह अपने समग्र वाङ्मय प्रौर पाचरण में 'अहिंसा परमोधर्मः' गुरुतर भार अपने कन्धों पर लेना स्वीकार कर लिया। सिद्धान्त का परिपालन किया है, उसी प्रकार वैद्यक ग्रन्थों वैद्यक विषय मे यद्यपि उनकी गति नही थी, तथापि मे भी इस सिद्धान्त का निर्वाह करते हुए उसे प्रक्षण्ण बनाये 'कल्याणकारक' ग्रन्थ के अनुवाद और सपादन को रखा है। यही चारण है कि जैन वैद्यक प्रन्थ 'कल्याणप्रेरणा ने उन्हें इस कार्य हेतु उत्साहित किया. कारक, मे कही भी मद्य, मास और मधु का प्रयोग किसी जिससे उन्होंने 'चरक सहिता' मादि प्रायुर्वेद क ग्रन्थो का भी प्रौषधि मे अनुपान के रूप मे अथवा प्रौषधि के रूप मे मध्ययन किया और वैद्यक सम्बन्धी ज्ञान प्राप्त किया। निर्दिष्ट नही किया गया है। केवल उसी प्रौषधि और इससे उनका कार्य सरल हो गया और उनके लिए 'कल्याण- प्राहार-विहार का निर्देश है जो हिंसा से रहित सात्विक कारक' की दुरूहता भी समाप्त हो गयी। उसके बाद उन्होंने गुणो से युक्त है; क्योकि एक प्राणी की हिंसा से दूसरे प्राणी बड़े उत्साहपूर्वक लगन के साथ इस कार्य को सम्पन्न किया। की रक्षा जैनधर्म को अभीष्ट नहीं है। उसके अनुसार तो इसमें कोई सन्देह नही है कि जैनाचार्यों द्वारा लिखित प्राणि-मात्र को रक्षा उसका परम उद्देश्य है। मायुर्वेद के ग्रन्थो की सख्या प्रचुर है, किन्तु उन ग्रन्थो की कल्याणकारक' में शरीर के स्वास्थ्य की रक्षा और भी वही स्थिति है जो जैनाचार्यों द्वारा लिखित ज्योतिष विकारो से शरीर की मुक्ति हेतु भौषधि-सेवन तथा अन्य के ग्रन्थो की है । जैन समाज ने तथा अन्यान्य जैन सस्थाम्रो उपायो का पर्याप्त विवचन प्रस्तुत किया गया है, किन्तु मे जैनाचार्यों द्वारा प्रणीत धर्म-दशन-साहित्य-काव्य. इसका मूल उद्देश्य यह है कि स्वस्थ शरीर भोतिक रूप से
SR No.538032
Book TitleAnekant 1979 Book 32 Ank 01 to 04
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGokulprasad Jain
PublisherVeer Seva Mandir Trust
Publication Year1979
Total Pages83
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Anekant, & India
File Size5 MB
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