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नाचार्य मोर मापूर्वर
हृष्ट-पुष्ट हो कर केवल इन्द्रिय जन्य विषय-भोगों में ही में से एक भेद पूर्व (पूर्वगत) हैं। इस 'पूर्व' वेद के भी अनुरक्त न रहे, अपितु वह पात्मकल्याण हेतु प्रयत्न करे। पुनः चौदह भेद है। इन चौदह भेवो मे (पूर्व) 'प्राणावाय' जैनाचार्यों को दष्टि में शारीरिक स्वास्थ्य प्रारम-स्वास्थ्य नाम का एक भेद है। इसी प्राणायाय नामक प्रग में के लिए है, इन्द्रियजन्य विषय-भोगों के लिए नहीं। इस अष्टांग मायुर्वेद का कथन किया गया है। जैनाचार्यों के तथ्य का प्रतिपावन जैनाचार्यों ने स्थान-स्थान पर किया अनुसार मायुर्वेद या वैद्यक शास्त्र का यही मूल है। इसी के है। 'कल्याणकारक में सर्वत्र ही प्रौषधि के लिए केवल अनुसार अथवा इसी के माधार पर जैनाचार्यों ने वैद्यक बनस्पति, खनिज, क्षार, रस, रत्न, मक्ता, प्रवाल आदि शास्त्र का निर्माण अथवा प्रायुर्वेद के विषय का प्रतिपादन द्रव्यों का प्रयोग वणित है। इस प्रकार हिमाजनक द्रव्यो किया है। जैनागम के अन्तर्गत प्रतिपादित प्राणवायपूर्व का के सेवन का निषेध करते हुए अहिंसा के उपादान भून द्रव्यों। निम्न लक्षण बतलाया गया है- 'कायचिकित्साद्यष्टांगके सेवन से ही शारीरिक स्वास्थ्य-रक्षा का उपदेश दिया
-रक्षा का उपदेश दिया आयुर्वेदः भूतकर्मजागुलिप्रक्रमः प्राणपानविभागोऽपि यत्र गया है। इसी प्रकार, शारीरिक स्वास्थ्य के लिए माचरण विस्तरेण वणितस्तत्प्राणावायम्" अर्थात जिस शास्त्र मे की शुद्धता पर भी जैन मनीषियों ने विशेष जोर दिया है। काय, तद्गत दोष तथा चिकित्सा प्रादि अष्टाग प्रायुर्वेद का भाचरण की शुद्धता शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के वर्णन विस्तारपूर्वक किया गया हो, पृथ्वी प्रादि महाभतों लिए तो उपयोगी है ही, उससे प्रात्मकल्याण का मार्ग भी की क्रिया, विषले जानवर और उनकी चिकित्सामादि तथा प्रशस्त होता है। इस प्रकार, केवल इहलौकिक सुख की प्राणापान का विभाग जिसमे किया गया हो उसे प्राणावायप्राप्ति हेतु ही शरीर को स्वस्थ, निरोग व हृष्ट-पुष्ट बनाना पूर्व शास्त्र कहते है। जैनाचार्यों को अभीष्ट नही था, अपितु इसलिए था कि द्वादशांग के अन्तर्गत निरूपित प्राणावायपूर्व नामक स्वस्थ शरीर के माध्यम से वह प्रात्मानचिन्तन और अग मूलतः मधमागधी भाषामे लिपिबद्ध है। इस प्राणावायमात्मपरिशीलन करता हुमा प्रात्मसाधन कर सके तथा पूर्व कमा
म
न वा पूर्व के प्राधार पर ही अन्यान्य जैनाचार्यों ने बंधक अन्यों ससार के समस्त बन्धनों को काट कर अपवर्ग को प्राप्त
का प्रणयन किया है। श्री उग्रादित्याचार्य ने भी प्राणावायकर जीवन को सार्थकता को प्रतिपादित कर सके। पूर्व के प्राधार पर 'कल्याणकारक' नामक वैद्यक प्रग्य की
जैन वाङ्मय मे अन्य शास्त्रों या विषयों की भांति रचना की है। इस तथ्य का उल्लेख प्राचार्यश्री ने स्थानमायुर्वेदशास्त्र या वैद्यक विषय की प्रामाणिकता भी प्रति- स्थान पर किया है। इसके अतिरिक्त ग्रन्थ के अन्त में पादित है। जैनागम मे वैद्यक विषय को भी प्रागम के उन्होंने स्पष्ट रूप से लिखा हैअग के रूप में स्वीकार किया गया है। जैनागम में केवल
सर्वार्धाधिकमागघीयविलसदभाषापरिशेषोज्ज्वल
प्राणावाय महागमादवितथ संगम संक्षेपतः । उसो विषय, प्रागम या शास्त्र की प्रामाणिकता है जो सर्वज्ञ प्रतिपादित है। सर्वज्ञ कथन के अतिरिक्त
उग्रादित्यगुरुर्गुरुग्णरुद्भासिसौख्यास्पदं अन्य किसी विषय या स्वरुचिविराचस्व को कोई
शास्त्र सस्कृतभाषयारचितवानित्येष भेदस्तयोः ।।
-कल्याणकारक, अध्याय २५, श्लोक ५४ महत्त्व या स्थान नही है। सर्वज्ञ परमेष्ठी के मख
मर्थात सर्व प्रर्थ को प्रतिपादित करने वाली सर्वार्धसे जो दिव्यध्वनि निकलती है, उसे श्रुतज्ञान के धारक
मागधी भाषा मे जो अत्यन्त सुन्दर प्राणावाय नामक महागम गणघर परमेष्ठी ग्रहण करते हैं। गणधर-गृहीत वह दिव्य.
(महाशास्त्र) अंग है उससे यथावत् सक्षेप रूप से सग्रह कर ध्वनि (जो ज्ञानरूप होती है। उनके द्वारा बारह भेदों मे
उग्रादित्य गुरु ने उत्तम गुणो से युक्त सुख के स्थान भूत इस विभक्त की गयी, जिसे प्राचारांग प्रादि के रूप में उन्होंने
शास्त्र की सस्कृत भाषा मे रचना की। इन दोनो (प्राणानिरूपित किया। गणधर द्वारा निरूपित बारह भेदो को
वाय प्रग और कल्याणकारक) मे यही अन्तर है। 'द्वादशांग' की संज्ञा दी गयी है। इन द्वादशांगों में प्रथम
इस प्रकार नागम मे मायुर्वेद या वैद्यक शास्त्र की प्राचाशंग है और बारहवाँ दृष्टिवाद नाम का अंग है। प्रामाणिकता प्रतिपादित है। प्रायुर्वेद, जिसे जैनागम में उस बारहवें दृष्टिवादांग के पांच भेद है। उन पांच भेदो
(शेष पृ. ६४ पर)