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जनधर्म उपभव और विकास
गये हैं। वे हैं-केवलज्ञानी और श्रुतकेवली। प्रत्यक्ष के द्वारा जिनवाणी के भण्डार को अजरामर शक्ति दी है। ज्ञानियों में केवलज्ञानी माते हैं पोर परोक्ष ज्ञामियों मे इसी प्रकार अनेक सम्राटों और राजानों ने भी जैनधर्म श्रुतकेवली । जो उक्त अंगों और पूर्वो में पारंगत होता को अपनाया और उसके प्रचार-प्रसार में योग भी दिया । था वह श्रुतकेवली कहलाता था। भगवान महावीर के मगधाधिपति राजा विबसार, पूरा नन्दवश, सम्राट चन्द्रपश्चात् तीन केवलज्ञानी और पांच श्रुतकेवली हुए। इनमें गुप्त, सम्राट अषोक, सम्राट सम्प्रति-प्रशोक के पोत्र अन्तिम श्रुतकेवली भद्रबाह थे ।
और कलिंग के चक्रवर्ती खारवेल प्रादि जैन धर्म के धारक
एव प्रसारक थे । इन सभी के कार्यों का संक्षिप्त उल्लेख इसके पश्चात् जैनाचार्यों को विशाल परम्परा चली भी एक स्वतन्त्र विशाल निबन्ध की अपेक्षा रखता है। पौर प्राज तक अक्षुण्ण रूप से चली आ रही है। दिगम्बर एवं श्वेताम्बर परम्परा में उत्कृष्ट कोटि के शताधिक
दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा, प्राचार्य हुए है। इन प्राचार्यों ने अपनी देशकालजयी कृतियों
टी० नगर, मद्रास (तमिलनाडु)
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(पृष्ठ १५ का शेषाश) लकुलीश को उष्णीषधारी मूर्तियां जिन प्रतिमानों से ही मान्य हो चुका था। गुप्तयुगीन कोशकार अमरसिंह ने प्रभावित है। पाशुपतों ने जातिगत बन्धनो की कठोरता इसे इन शब्दों में स्पष्ट किया है : पर विश्वास न कर विदेशी शको एवं कुषाण जातियो सर्वज्ञस्तु जिनेद्रस्यास्सुगते शंकरऽपि च । को शंव दीक्षा दी थी। इस प्रकार की मान्यता श्रमण
यह भी प्रसम्भव नहीं कि कैलाशवासी मादिगुरु एवं मतो के प्रभाव के बिना नही बन सकती थी।
महायोयो के रूप में शिव की कल्पना ऋषभ के मानवी ___ स्मरण रहे कि लकूलीश पाशुपतों ने प्राचीन शवमत चरित्र का देवो सस्करण हो, क्योंकि हिन्दू पुराणकारों ने का पुनरुत्थान किया था और शिव को प्रादिगुरू (सर्वज्ञ) शिव स्वरूप का वैविध्य परस्पर विपरीत मान्यतामों के से रूप में प्रतिष्ठित किया था। शकर के इस रूप की प्राधार पर कल्पित किया है, अन्यथा स्थाणु और नटराज कल्पना शिव की वैदिक मान्यतामों से प्रभावित न होकर के नाम से एक ही देवता कैसे सम्बोधित किया जा प्रादिजिन के मानुषी चरित्र से अनुप्रेरित ज्ञात होती है। सकता है । ऐतिहासिक साक्ष्यो के प्राधार पर हम यह कह सकते हैं यह भी एक सम्भावना है कि जैन पंच परमेष्ठियों कि शायद मथुरा के प्राचीन जिन केन्द्र से ही पाशुपत के प्राधार शाम्भवों ने गुरु परमगुरु, परात्पर गुरु तथा प्राचार्य विशेष रूप से प्रभावित हुए थे। गुप्तकाल मे जिन, परमेष्ठी गुरु की मान्यता का निर्माण किया हो। बुद्ध एवं शंकर तीनो के लिए 'सर्वज्ञ' शब्द का व्यवहार निदेशक, गष्ट्रीय संग्रहालय, जनपथ, नई दिल्ली
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