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________________ जैन काव्य में व्यवहृत 'ज्ञान' शब्द : रूप-स्वरूप - डा. अरुणलता जैन, फरुक्खाबाद जंन दर्शनानुसार ज्ञान प्राप्ति का प्रथम सोपान दर्शन तथा प्रवधि, मनःपर्यय तथा केवलज्ञान को प्रत्यक्ष के अन्तर्गत है। इन्द्रिय तथा वस्तु के सम्पर्क से उत्पन्न ज्ञान कुछ माना गया है। इस प्रकार यहाँ ज्ञान के पांच प्रकार मस्पष्ट पहता है । जीव मस्तिष्क में होने वाली विशेषण कहे गये है। प्रत्यक्ष प्रमाण के द्वारा जीव, मन तथा की प्रक्रिया द्वारा इस अस्पष्ट भाभास को स्पष्ट अनुभूति इन्द्रिय की सहायता न लेकर सीधे ज्ञान प्राप्त करता है। में परिवर्तित कर देता है। इस प्रकार दर्शन जिस वस्तु प्रत्यक्ष प्रमाण भी सर्वथा शुद्ध नही होता। कभी कर्म का परिचय कराता है वह क्रमशः ज्ञान में परिणत हो प्रत्यक्ष प्रमाण द्वारा भी भ्रान्ति प्रतीति होती है। इसी जाता है। सच में देखा जाए तो दर्शन में ज्ञान की मत्ता कारण स्वरूप अनुमान को जैन-दर्शन मान्यता देता है । । विद्यमान रहती है। दर्शन ही ज्ञान बदल जाता है । इस तर्क की कसौठी पर खरा उतरने वाला अनुमान कभी प्रकार ज्ञाता द्वारा ज्ञेय वस्तु की वर्शन द्वारा जानकारी ही वास्तविक से परे नही जा सकता। तत्त्वार्थसूत्र मे सम्य ज्ञान की संज्ञा से अभिहित है। ग्ज्ञान को ही प्रमाण कहा है। जैन दर्शन अपनी विशिष्ट मान्यताओं के कारण वस्तुतः जनदर्शन को प्रमाण सम्बन्धी यह मान्यता किसी भी स्वाध्यायी का ध्यान प्राकर्षित कर सकता है। अन्य दर्शनो से भिन्न है क्योकि अन्य दर्शनों में इन्द्रिय जन्य इसके अनुतार चैतन्य ही प्रत्येक जीव का स्वरूप है । यहां ज्ञान प्रत्यक्ष तथा शेष अन्य साधनो द्वारा प्राप्त ज्ञान परोक्ष अन्य दर्शनो को भांति चैतन्य कोई प्राकस्मिक गुण नही माना गया है। इसके विपरीत जैन ज्ञान प्रमाण की यह है। पात्मा सूर्य की भांति ज्योतिर्मान है। सूर्य अपना विशेषना है कि इसमे केवल एक ही प्रकार के प्रत्यक्ष-ज्ञान प्रकाश कभी नही छोड़ता। प्रावरण पड़ने से ढंक जाता को माना गया है और वह है 'केवल-ज्ञान', क्योकि इन्द्रिय है। प्रात्मा अपना स्वाभाविक गुण नही त्यागती। तथा मन को इस सच्चे ज्ञान की प्राप्ति में बाधक माना कर्म-बन्धन मे पड़कर अनंत ज्ञान का प्रमार नही कर गया है। पाती। बन्धन नष्ट होने पर प्रात्मा अनत ज्ञानमय हो प्रत्यक्ष प्रमाण के दो भेद कहे गये है-पारिमार्थिक जाती है। प्रत्यक्ष, सांव्यावहारिक प्रत्यक्ष । जो ज्ञान प्रात्मा के अधीन __ इस अनंत ज्ञान को प्राप्त करने के साधनों को प्रमाण रहकर स्वयं के विषय को विशुद्धता के साथ जानता है, कहते है तथा शेष वस्तुओं को प्रमेय । जैन दर्शन में पारिमार्थिक कहलाता है। जो इन्द्रियों से साक्षात ग्रहण प्रामाणिक ज्ञान दीपक की भांति है जो स्वय प्रकाशमान काल मे जानता है वह साध्यवहारिक प्रत्यक्ष है। पारिहै और अपने चतुर्दिक वातावरण को भी प्रकाशित करता मार्थिक प्रत्यक्ष दो प्रकार का है-एकदेश पारिमार्थिक है। इसके अनुसार प्रमाण स्वभावत: स्पष्ट है, उसमे किसी –दूसरा सवंदेश पारिमाथिक । अवधिज्ञान और सनःपर्यय प्रकार की भ्रान्ति नहीं है। इसलिए दृश्यमान जगत यथार्थ देश प्रत्यक्ष और केवलज्ञान सर्व प्रत्यक्ष है। है। यहाँ ज्ञान के प्रान्तरिक तथा बाह्य दोनों पक्षों को परोक्ष ज्ञान इन्द्रियों द्वारा अनुबन्धित है। मति, श्रुति स्वीकार किया गया है। से जो जाना है, वह परोक्ष प्रभाव है । स्मृति, प्रत्यभिज्ञान, जैन ज्ञान-मीमांसा मे ज्ञान को दो भागो में प्रमाजित तर्क, अनुमान तथा मागम का समावेश परोक्ष प्रमाण के किया गया है-प्रत्यक्ष, परोक्ष । मति, श्रुति को परोक्ष अन्तर्गत होता है। स्मृति पूर्व में जो पदार्थ जाना था
SR No.538032
Book TitleAnekant 1979 Book 32 Ank 01 to 04
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGokulprasad Jain
PublisherVeer Seva Mandir Trust
Publication Year1979
Total Pages83
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Anekant, & India
File Size5 MB
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