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________________ जैन काव्य में तबहुत 'ज्ञान' शब्द : रूप स्वरूप १. ग्रह उसके स्मरण मात्र को स्मृति कहते है। प्रत्यभिज्ञान- पूर्व बातों का स्मरण कर प्रत्यक्ष पदार्थ के साथ जोड कर निश्चय करने को कहते हैं।' जैन दर्शन के अनुसार वस्तु के भिन्न-भिन्न प्रकार के प्रत्यक्ष तथा परोक्ष ज्ञान होते है। उनसे स्पष्ट है कि उनके अनेक स्वभाव है। जैन दर्शन में स्वभाव को ही धर्म कहा गया है । केवली केवलज्ञान के द्वारा वस्तुनों के अनंतधर्म का ज्ञान पाता है । अब इन परोक्ष- प्रत्यक्ष प्रमाणो के अन्तर्गत सदभित पाच प्रकार के ज्ञान के रूप-स्वरूप पर दृष्टिपात कर लेना भी समीचीन होगा। प्रत्येक शब्द स्वयं मे एक अर्थ ममेटे होता है। उस अर्थ को समझने के लिए हमे शब्द व्युत्पत्ति की गहराई में जाना होता है। यहां सम्बन्धी शब्दों की निष्पत्ति को समझना होगा तथा यह भी देखना होगा कि हिन्दी जन काव्य के वविताओं ने उन शब्दों का इन्ही अर्थों में अपने काव्य में उपवहार किया है। मतिज्ञान : मति बुद्धि ज्ञानम् इति मतिज्ञान मतिज्ञान शब्द यौगिक शब्द है-मति - ज्ञान । मति का अर्थ है मनन करना । मनन करके जो ज्ञान उत्पन्न हो उसे मतिज्ञान कहते हैं। मतिज्ञान इन्द्रिय घोर मन की सहायता से उत्पन्न होता है । मति-ज्ञान' चार प्रकार से वर्णित है। १. पुरुषार्थ सिपाय नाव पर हिन्दी टीका, राजचन्द्र जैनशास्त्रमाला, श्राभास, वि० सं० २०२२, पृष्ठाक २२-२३ । २. 'पंचभिरेन्द्रियेर्मन च यदर्थग्रहण तन्मतिज्ञान ।" अर्थात् - पाच इन्द्रियो और मन मे जो पदार्थ का ग्रहण ग्रहण होता है. उसे मतिज्ञान कहते है। घवला, ११, १, ११५। ३५४०१, जैनेन्द्रसिद्यान्त कोश, भाग २, जिनेन्द्रवर्णी, भारतीय ज्ञानपीठ २०२९. पृष्ठांक २६१ । ३. (घ) “मति घृति ज्ञान दोऊ है परोक्ष वाण औष मन पजय, प्रत्यक्ष एक देश पेखिए ॥" ब्रह्मविलास, भैया भगवतीदास, जैन ग्रन्थरत्नाकर कार्यालय, बम्बई ३४३० पृष्ठांक ३५ । (ब) "मति श्रुति अवधि मनपर्ज के विषयक दोऊ । २३ किसी वस्तु का अवलोकन करने से चित्त में उसका जो रूप स्थिर होता है, उस रूप को ही जानना वस्तुतः प्रव कहलाता है। २. ईहा उस वस्तु को पूर्णरूप से समझने की प्राकाक्षा होना ही ईहा कहलाती है । ३. प्रवीय - उस रूप रंग का निश्चय करना ही प्रवीय है । ४. धारणा - प्रवीय द्वारा निर्णय किये गये पदार्थ का प्रवि स्मरण न होने वाला संस्कार ही धारणा है । संस्कृत जैन वाङ्मय में व्यवहृत 'मतिज्ञान' शब्द हिन्दी जैन काव्य में प्रयुक्त हुआ है । १७वीं शती से लेकर २०वीं शती तक के कवियों की काव्यधारा में मतिज्ञान शब्द अपने इसी मे सुरक्षित है ' श्रुतिज्ञानान : 'श्रुति ज्ञानम्' - श्रुति ज्ञानं प्रर्थात् सुना हुआ ज्ञान । धातु ने 'क्त' प्रत्यय करने पर भूति शब्द निष्पन्न हुआ । 'ज्ञ' धातु मे युट प्रत्यय करने पर ज्ञान शब्द की निष्पत्ति हुई। इस प्रकार किसी पदार्थ के विषय मे सुनने के आधार पर जानकारी प्राप्त करना श्रुतिज्ञान है है ।" जैन दर्शन मे इन्द्रिय धौर मन के द्वारा एक पदार्थ को जानकर उसके आश्रय से तत्सम्बन्धी अन्य प्रकार के प्ररूपण करने मे जो ज्ञान समर्थ है उसे श्रुतिज्ञान कहा विषय कहावत क्षयोपशम पथ में ||" - प्रवचनसार, वृन्दावनदास, सरस्वती सेवक, नाथुराम प्रेमी, रायचन्द्र जैन शास्त्रमाला, वम्बई १९०५, पृष्ठांक ५१ । ४. " तत्थ सुदणाण णाम इदएहि गहिल्यादो तदो पुवगुदरपम्महणं जहा सद्दाहोड़ावी भुवलभो घुनादो श्रग्गिस्सु वलभो वा ।" अर्थात् इन्द्रियों से ग्रहण किए पदार्थ से उससे पृथक् भूत पदार्थ का ग्रहण करना घुतिज्ञान है, जैसे शब्द से 'घट' बादि पदार्थों का जानना प्रथवा धूम्रादि से अग्नि को ग्रहण करना । ६११-१४१२१०६ जैनेन्द्र सिद्धान्तकोश, भाग ४, जिनेन्द्र वर्णों, भारतीय ज्ञानपीठ, २०३०, पुष्ठांक ५६ ।
SR No.538032
Book TitleAnekant 1979 Book 32 Ank 01 to 04
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGokulprasad Jain
PublisherVeer Seva Mandir Trust
Publication Year1979
Total Pages83
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Anekant, & India
File Size5 MB
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