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________________ २४, वर्ष ३२, कि० १.२ भनेकान्त है। श्रुतिज्ञान के दो भेद है'-- है जिसका अर्थ है-समयातपूर्व बान अर्थात् समय से पूर्व १. अर्थलिंगज-पदार्थ को देखकर उसमे इष्ट अथवा ज्ञान होना । जिनवाणी के अनुसार जो ज्ञान द्रव्य, क्षेत्र, अनिष्टता का ज्ञान होना। यह ज्ञान एके- काल, भाव की मर्यादा के लिए रूपी पदार्थ को स्पष्ट व न्द्रिय से लेकर पंचेन्द्रिय सभी मे होता है। प्रत्यक्ष जाने, वह अवधिज्ञान है।' अवधिज्ञान दो प्रकार से २. शब्दलिंगज-वह ज्ञान है जो वाचक शब्दों को सुन कहा गया है करके वाच्य का ज्ञान कराए। यह लौकिक १. भव प्रत्यय -भव की मुख्यता से होने वाला अवधिज्ञान तथा लोकोत्तर दोनों प्रकार का होता है। देव और नारकी जीवो के होता है। संस्कन-प्राकृत जैन वाड्मय मे व्यवहत 'श्रतिज्ञान' २. गुण प्रत्यय -शेष रहे हुए मनुष्य और तियंचों के क्षयोशब्द हिन्दी जैन काव्य मे गृहीत है। १७वी शताब्दी से पशम से होता है। लेकर २०वी शताब्दी तक के हिन्दी जैन काव्य मे यह शब्द सस्कृत-प्राकृत जैन काव्य में प्रयुक्त 'प्रवधिज्ञान' शब्द अपने इसी अर्थ में प्रतुत है। इसी प्रर्थ को समेटे हा हिन्दी जैन काव्य मे व्यवहुत है। प्रवधि ज्ञान-- १६वी शती में लेकर २०वी शती तक के कवियो के काव्य अवधि-+ ज्ञान के मिश्रण से इस शब्द को समष्टि हई मे अवधिज्ञान शब्द इसी प्रथं में दर्शनीय है। "त दुविह सद्दलिगज, प्रत्य लिगज चेदि। ३ "तथैव च स एवात्मा प्रवधिज्ञानावरणीय क्षयोप' तत्थात सद्दलिगज तदुविह लोइय लोउत्तरिय चेदि ॥" शमामूत्त वस्तुयदेकदेशप्रत्ययक्षेण सविकल्प जानाति समण्णा पुरि सवयण बिगिग्गयवयण वल्लावज णियाणं तदवधिज्ञानम् ।" लोइप सह असच्य कारण विणिम्मुक्क पुरि सवयण अर्थात् -- इसी रीति से वही पात्मा प्रवधि ज्ञानाविगिगयवयण क्लाव जणिय सुदणाण लोउत्तरिय वरण के क्षयोपशम से मूवस्तु को जो एकदेश घुमादि प्रत्य लिगज पुण प्रणमाणणाम ।' प्रत्यय द्वारा विकल्प जानता है वह अवधिज्ञान है। अर्थात्-थतिज्ञान शब्द लिगज और अर्थ लिंगजके भद वहद द्रव्य सग्रह, नेमिचन्द्राचार्य, श्रीमद राजचन्द्र से दो प्रकार का है। उनमे भी जो शब्दलिगज श्रतिज्ञान जैन शास्त्रमाला मागास । है वह लौकिक और लोकोत्तर के भेद से दो प्रकार का ४. "भवप्रत्ययोऽवधिदेवनारकाणाम् ।२१। क्षयोपशमहै। सामान्य पुरुष के मुख से निकले हुए वचन समुदाय निमित्त षड्विकल्पशेषाणाम् ।२२॥ से जो ज्ञान उत्पन्न होता है वह लौकिक शब्दलिगज अर्थात् - भव की मुख्यता से होने वाला प्रवधिज्ञान श्रतिज्ञान है। प्रमत्य बोलने के कारणों से रहित पुरुष देव तथा नागकी जीवो को होता है। शेष रहे हुए के मुख से निकले हुए वचन समुदाय से जो ज्ञान उत्पन्न मनुष्य और तियंचो को क्षयोपशम से प्रवधिज्ञान होता है वह लौकिक शब्दलिंगज श्रुतिज्ञान है। होता है। कषायहाड़ १।१-१५॥३०८-३०६।३४०-३४१॥५, तत्त्वार्थ सूत्र, उमास्वामी, श्री अखिल विश्व जनजनेन्द्र सिद्धान्त कोष, भाग ४, जिनेन्द्र वर्णी, भार मिशन, अलीगंज, सन् १९५७, पृष्ठाक १०-१२, ज्ञानपीठ-२०३०, पृष्ठाक ५६ । प्रध्याय संख्या १, सूत्राक २१-२२। २. (म) "सम्यक् गुरु प्रसाद जिनश्रुत है, ५. (क) "कोणीक भवधिज्ञान-भण्डार, निज स्वरूप मे पागा रे।" कोणिक जातिस्मरण कहाए । पावदास पदावली, कवि पार्श्वदास, श्री दिगम्बर ___ ज्ञान वले कहयो उपदेश, प्रज्ञा लोक सुषेर ध्याये॥' जैन समाज, समीरगंज-टोक, १९०२, पृष्ठांक १८, मादि पुराण रास, ब्रह्मजिनदास, लिपि सम्वत् १८५६, छन्दांक ३४ । पामेर शास्त्र भण्डार, जयपुर, पृ० १३, छन्दाक १३ । (ब) "मति, श्रुति, अवधिविराज, (ब) "ताहि को पति है कोन, तवं मुनि को लिया। पूजी जिनचरण हितकारी।" मुझ पर होय दयाल, अवधि द्रिम खोल दिया।" शोतलनाथ पूजा, कवि मनरग लाल, ज्ञानपीठ पूजा- जम्बस्वामिचरित, पांडे जिनदास, पत्रांक ३५, मामेर जलि, भारतीय ज्ञानपीठ, पृष्ठांक ३५२ । शास्त्र भण्डार, जयपुर, पुष्ठांक १६, परिल्ल छ०८।
SR No.538032
Book TitleAnekant 1979 Book 32 Ank 01 to 04
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGokulprasad Jain
PublisherVeer Seva Mandir Trust
Publication Year1979
Total Pages83
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Anekant, & India
File Size5 MB
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