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________________ २५ जन काव्य में व्यवहत 'मान' शब्द : रूप-स्वरूप मन:पर्यय तथा पर्यायों को बाह्य इन्द्रिय की सहायता लिए बिना _ 'मनःपर्यय' योगिक शब्द है। मनस: पर्ययणा ज्ञानम् ही जानता है। यह जान कर्मक्षय से उत्पन्न होता है। मनःपर्यय अर्थात् मन से किसी चीज को समझा जाए। संस्कृत, प्राकृत जैन वाङ्मय के व्यवहृत 'केवलज्ञान' 'मनःपर्यय कर्म का क्षयोपशम होने पर ही प्रगट होता है। बाट हिम्टी जैन काव्य मे भी गहीत है। कवि बनारसीदास मन.पर्यय ज्ञान के दो भेद है के काव्य मे यह शब्द इसी अर्थ मे प्रयुक्त है।' १. ऋजुमति-जो मनुष्य मरलता से सोच रहा हो उसका इस प्रकार उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि जैन ज्ञान । ज्ञान-मीमांसा अपने मे ज्ञान सम्बन्धी निजी महत्त्व समेटे २. विपुलमति-बक्रभाव से भूत, भविष्य बर्तमान का ज्ञान । सस्कृत, प्राकृत काव्य में व्यवहृत मनःपर्यय शब्द हुए है। वह केवल एक ही प्रकार के प्रत्यक्ष ज्ञान को हिन्दी जैन काव्य में इसी अर्थ मे गृहीत है। महत्त्व देता है और वह है केवलज्ञान । अन्य ज्ञान केवल ज्ञान तक पहुंचने के विभिन्न सोपान हैं। ज्ञान-बोध बिना केवलज्ञान-- के बल त्रिकालविषयकजानम् अभ्यासतीति केवलज्ञान। जीव सन्मार्ग को प्राप्त नहीं कर सकमा। ज्ञान-बोध ही कंवलज्ञान वह ज्ञान है जिसके द्वारा जीव त्रिकाल व्यक्ति में शाश्वत प्रानन्द की सृस्टि करता है। विषयक भूत, भविष्य, वर्तमान समस्त द्रव्यों, उनके गुणो ६, रामलाल कयूमगंज, फरुखाबाद (उ०प्र०) (स) "अवधि ज्ञान मन पर्यय दोहै देश प्रतच्छ । अलीगंज, १६५७, पृष्ठांक ११, अध्याय संख्या १, द्रव्य क्षेत्र परिमान लिए जाने जिय स्वच्छ ॥" सूत्रांक २३ । छहढाला, (कवि दौलतराम), श्री दिगम्बर जैन स्वा- ४. (क) "मनपर्जय जानाहि मतभेद, ध्याय मन्दिर ट्रस्ट, सोनगढ़, पृष्ठाक ६२, ढाल केवलज्ञान प्रगट सब वेद ।" सख्या ४। बनारसी विलास, कवि बनारसीदास, भंवरलाल जैन, "परकीयमचोगतोऽथो मन इत्युच्यते । साहचर्यात्रस्य केशरलाल बख्शी-श्री नानूलाल स्मारक ग्रन्थमाला, पर्ययण परिगमन मनःपर्ययः।" न्यू कालोनी, जयपुर, २०१२, पृष्ठांक १०५। अर्थात् -दूसरे के मनोगत अर्थ को मन कहते है। (ब) "बिपुल मनःपर्यय परमाविधि सभी विधि । उसके मन के मम्बन्ध मे उस पदार्थ का परिगमन ठीक लहै मोक्ष तति इन्हें शीश नाइए ॥" करने को मन:पर्यय कहते हैं। चर्चाशतक, कवि द्यानतराय, सरस्वती भण्डार, चोरु सर्वार्थ सिद्धि १, ६।१४३-जनेन्द्र, सिद्धान्तकोश, भाग का रास्ता. जयपुर, पृष्ठाक २१८ । ३, जिनेन्द्र वर्णी, भारतीय ज्ञानपीठ, २०२६, पृष्ठाक ५. 'केवलम् सहाय मिदियालोय गिरवेक्खं तिकाल भोय राण तपज्जाय समवेदाणं तवत्थु परिमसकुडिय सवत्तं "तदावरणकर्मक्षयोपशमादि-द्वितीय निमित्तपशातपर केवलणाण ।" कीय-मनोगतार्थ-ज्ञान मनःपर्ययः । प्रर्थात् - 'केवल' असहाय को कहते है जो ज्ञान प्रस हाय अर्थात् इन्द्रिय और आलोक की अपेक्षा रहित अर्थात - मन पर्यय ज्ञानावरणादि कर्म के क्षयाप है, त्रिकाल गोचर वाला है, सर्व व्यापक है पौर शमादिरूप सामग्री के निमित्त मे परकीय मनोगत अर्थ प्रतिपक्षी रहित है, उसे केवलज्ञान कहते है। को जानना मनःपर्यय ज्ञान है। घवला ६।१,६-१, १४॥२६॥५, जैनेन्द्र सिद्धान्त कोश, राजवातिक १९।४।४७।१६, जैनेन्द्र मिद्धान्तकोश, भाग १, जिनेन्द्र वर्णी, भारतीय ज्ञानपीठ, २०२८, भाग ३, जिनेन्द्र वर्णी, भारतीय ज्ञानपीठ २०२६, पृष्ठाक १४५। पृष्ठाक २७३ । ५. "जोग धरी रहै जो त्रसु भिन्न, "ऋजु विपुलमती मनःपर्यय:।२३। अनन्त गुणातन केवलज्ञानी। प्रर्थात्--- मनःपर्ययय ज्ञान ऋजुमति अर्थात् जो मनुष्य तासु हृदय द्रह मो निकसि सरिता, सरलभाव से सोच रहा है उसका ज्ञान तथा विपुल सम वहे श्रुत-सिन्धु समानी।" मति दो प्रकार का है। नाटक समयसार, पं.बनारसीदास, सस्ती ग्रन्थमाला, तत्त्वार्थसूत्र, उमास्वाति, अखिल विश्व जैन सिशन, ७/३३ दरियागंज, दिल्ली, सं० २४७६, पृ० १०।
SR No.538032
Book TitleAnekant 1979 Book 32 Ank 01 to 04
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGokulprasad Jain
PublisherVeer Seva Mandir Trust
Publication Year1979
Total Pages83
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Anekant, & India
File Size5 MB
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