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६४, वर्ष ३२, कि० ३-४
अनेकान्त
ने सेचानक हाथी भोर १८ रनो का हार अपने पेटपोछना नथमल टाटिया की अध्यक्षता में हुई। इसमें प्राचार्य देवीसारले बेहाल को दे दिया था। इन्हे पाकर बेहाल गंगा चन्द शर्मा, लूणकरण विद्यार्थी, फूलचन्द जैन, नाथूलाल तीर पर मौज से इठलाता था। इसे देखकर कुणिक की जैन, वीणा जैन, कुसुम जैन, विजयकुमार धर्माधिकारी राजमहिषी पद्मावती की छाती पर साँप लोटने लगा।
तथा जगतपाल जी ने भाग लिया। समवेत अभिमत पा कुणिक ने उन्हे हथियाना चाहा और सौंप देने की प्राज्ञा
कि इस विषय पर गहन चिन्तन व विचार की प्रावश्यदी। मतः बेहल्ल सहायता के लिए अपने मामा चेटक के
कता है । वया अन्य विद्वज्जन भी इस विषय पर समुचित पास पहुंचा। चेटक ने काशी व कोशल के १८ गणराज्यों
03 को, ह मल्लकी और ६ लिच्छवियो की सहायता से कुणिक
(शेषांष पृ०५८ का) से लोहा लिया। किन्तु बौद्ध साहित्य मैं वंशाली व मगध तमो गणी प्रबतियों प्रतीक मानकर) उन्हें वैराग्य पथ से राज्य मे युद्ध का कारण है रस्नो की खान । कुणिक ने विचलित करने का प्रयास करते हुए दिखलाया गया है, श्येन व्यूह की रचना की तथा चेटक ने शकटव्यूह की। किन्तु जिस वैराग्य पर ये तीनों प्रवृत्तियाँ प्रभाव नही डाल इस प्रकार हम देखते है कि प्रजातशत्रु तथा कुणिक दोनों
सकती, वह सर्वोपरि अभिनन्दनीय है। इसीलिए भगवान् की युद्ध नीति, सग्राम शंलो तथा दुर्गपतन की प्रक्रिया में
महावीर के वैराग्य को जो अप्रतिम गौरव प्राप्त हपा है, महान् अन्तर है।
वह उनकी कृतसंकल्प भावना पर प्राधारित है। मुनि नगराज ने अपने "श्रेणिक बिम्बिसार तथा
ससार के किसी भी भय से सत्रस्त न होने के कारण कुणिक अजातशत्रु" मे भगवान महावीर की परम्परा तिथि
उनकी निर्भयता उस समय प्रगट हुई है जिस समय शूल५३७ खु० पू० ठीक करने के लिए बुद्ध का निर्वाणकाल
पाणि नामक यक्ष उन्हें सबस्त करने में असफल होता है। खु० पू० ५०२ मनमाने ढंग से मान लिया है। प्रतः बुद्ध निर्वाण की ५० तिथियां विद्वानो को चक्कर में डाल देती है।
इस ख्याति में वर्धमान महावीर का ई०पू० ७०० वर्ष से
मानवता के कल्याण के लिए बारह वर्ष तक जो अमर अतः प्रतीत होता है कि प्रचलित मान्य समीकरण
संदेश वायुमण्डल मे गूजा है वह सदैव मानवता-विजय केतु निराधर है । दोनो सम्प्रदायाचार्य एक समय मे थे ही नहीं। इसी कारण बौद्ध व जैनो के धर्म ग्रंथ की भाषा भी एक
को फहराने के लिए प्रत्येक युग को प्रेरित करता रहेगा। दूसरे से भिन्न है यद्यपि दोनो सम्प्रदाय अपने प्राचार्य के
मानव-जीवन पथ को प्रशस्त करने के लिए भगवान महावीर वचनो को उद्धृत करने का दम्भ भरते है।।
का विचार तथा कृतित्व समस्त विश्व के लिए एकअनुपम प्रतः मानना होगा कि प्रजातशत्रु ने खष्ट पूर्व
घरोहर है। (वीर-निर्वाण-सेवा, इन्दौर के सौजन्य से) १९वी शती में भले ही वैशाली गणराज्य को हड़प लिया
(शेषाश पृ० ६१ का) था किन्तु वहां पर पुनः छोटे-छोटे गणराज्य पनपने लगे।
' 'प्राणवाय' की मज्ञा दी गयी है, द्वादशाग का ही एक अंग
.... तीर्थकर महावीर के काल में दक्षिण में बाधा का सितारा है। न वाङमय में द्वादशाग की प्रामाणिकता सर्वोपरि है, चमक रहा था। मगध में ही नहीं, समस्त उत्तरापथ में अतः उसके अन्तर्गत प्रतिपादित 'प्राणावाय' की प्रामाणिकता छोटे-छोटे सामन्त दो चावल को अपना खिचड़ा पकात भी सिद्ध हो जाती है। इस प्रकार जिस अष्टांग-परिपूर्ण थे। श्रेणिक व कूणिक इन्ही सामन्त राजामी म स था वैद्यकशास्त्र को इतर प्राचायो-महषियों ने प्रायुर्वेद की संज्ञा प्रतः कहा जा सकता है कि बुद्ध का निर्वाण खु०पू० १७६३, दी है उसे जैनाचार्यों ने 'प्राणावाय' की संज्ञा दी है। प्रजातशत्र के पाठवें वर्ष मे हुमा तथा भगवान महावीर का उपयुक्त विवेचना से यह स्पष्ट है कि जैनाचार्यों ने भी प्रादुर्भाव बुद्धनिर्वाण के प्राय: १२०० वर्ष बाद (१७६३- अन्य प्राचार्यों की भांति आयुर्वेद-साहित्य के सृजन में अपना ५२७+७२) हुमा। इसी कारण वे कभी न मिल सके अपूर्व योगदान किया है । प्रावश्यकता इस बात की है कि तथा बौद्ध प्रथो में महावीर का कही उल्लेख नही है। मनसन्धान द्वारा उम साहित्य को प्रकाश में लाकर मायुर्वेद
इस विषय मे एक सगोष्ठी, जंन विश्वभारती, लाडन, साहित्य की वद्धि की जाए और मायुर्वेद की दृष्टि से उनका राजस्थान मे २१ जनवरी, १९७६ को निदेशक डाक्टर उचित मूल्यांकन किया जाए। ४. जैन विश्वभारती लाय, १९७४ ।