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सांख्य-दर्शन में सृष्टि-निर्माण : तुलनात्मक विवेचन
0 सुश्री अंजू सुराना, मागरा
भारतीय दर्शन में सुष्टि-निर्माण का प्रश्न महत्त्वपूर्ण कर्ता एवं स्वामी समझने लगता है। महकार तीन प्रकार रहा है। भारत के सभी विचारकों ने इस पर गहराई से का माना गया है-१. साविक, २. राजस और ३. तामस विचार किया है। भारतीय दर्शनों में सांस्य-दर्शन बहुत सात्विक प्रहंकार से एकादश इन्द्रियों-मन, पाच ज्ञानेन्द्रियों प्राचीन है। वह भी जैन दर्शन की तरह ईश्वरवादी नहीं है और पाच कर्मेन्द्रियों की उत्पत्ति होती है। तामस महंकार अर्थात् ईश्वर को सष्टि का कर्ता एवं निर्माता नही मानता से पांच तन्मात्रामों और पांच महाभूतो की उत्पत्ति होती है। सांख्य-दर्शन की मान्यता है कि प्रकृति और पुरुष का है। राजस अहंकार सत्व एवं तामस का सहयोगी है। संसर्ग होता है तब ससार की उत्पत्ति होती है।
ज्ञानेन्द्रियाँ : नेन्द्रिय, श्रवणेन्द्रिय, घ्राणेन्द्रिय रसनेन्द्रिय सांस्य-दर्शन में सृष्टि-निर्माण के सम्बन्ध में मुरूपता और त्वगेन्द्रिय-इन पांचों इन्द्रियों के द्वारा क्रमशः रूप, प्रकृति की है। क्योकि पुरुष कर्ता नही है, वह निष्क्रिय है। शब्द, गंध, रस और स्पर्श का ज्ञान होता है। ये अहंकार कर्ता स्वयं प्रकृति है। इसलिए परिणमन भी पुरुष में नही, के परिणाम है और पुरुष के निमित्त उत्पन्न होते है। इस. प्रकृति में होता है। कारण स्पष्ट है कि पुरुष निष्क्रिय है, लिए साख्य-दर्शन इनका कर्त्ता प्रकृति को मानता है, पुरुष पौर प्रकृति सक्रिय । प्रकृति त्रिगुणात्मक है। तीनो गुण- को नही । पुरुष का नही, केवल भोक्ता है। रजो गुण, सतो गुण और तमो गुण जब तक साम्य अवस्था कर्मेन्द्रियाँ : पुरुष भोक्ता है। विषय की भोगेच्छा मे रहते है, प्रकृति शान्त रहती है, उसमे किसी तरह को की पूति ज्ञानेन्द्रियों एवं कर्मेन्द्रियो के द्वारा होती है । हलचल नजर नही पाती। जब तीनों गुणों मे विषमता कर्मेन्द्रियाँ भी पांच है-मुख, हाथ, पैर, मलद्वार एवं होती है, तब सष्टि का प्रादुर्भाव होता है। प्रकृति की जननेन्द्रिय । इनके कार्य इस प्रकार हैं-वाक, ग्रहण, गमन, सक्रियता से ही सृष्टि का निर्माण होता है।
मल-त्याग और प्रजनन । वास्तव मे, इन्द्रियाँ अप्रत्यक्ष शक्ति सष्टि-निर्माण का कम :
रूप हैं, जो इन अवयवों में रहती है और अपने-अपने विषयों सर्व प्रथम बुद्धि का उद्भव होता है। यह प्रकृति का को ग्रहण करती हैं। प्रथम विकार है । बाह्य जगत की दृष्टि से बुद्धि बीज स्व. मन : मन प्राभ्यन्तर इन्द्रिय है। वह ज्ञानेन्द्रिय रूप है, जिसमे से विराट् जगत् जन्म लेता है और अन्तर-दष्टि कर्मेन्द्रिय और दोनों से सबद्ध है। मन ही इन्द्रियों से विचार करें तो बुद्धि अर्थात् ज्ञान के द्वारा ही ज्ञाता को अपने-अपने विषयों की प्रोर प्रेरित करता है। ज्ञेय पदार्थों को जानता है। बुद्धि दो प्रकार की मानी गई मन वस्तुतः सूक्ष्म है, फिर भी सावयव है । अत: वह युगपत् है-जब सत्व गुण के प्राधिक्य से अद्धि उबद्ध होती है. भिन्न-भिन्न इन्द्रियों के साथ संयुक्त हो सकता है, क्योंकि तब उसे सात्विक बुद्धि कहते है और जब उसमे तमो गुण वह अन्त:करण है। मन, बुद्धि और अहंकार - ये तीनों की अधिकता होती है, तब उसे तामसिक-बुद्धि कहते है। अन्तःकरण है और ज्ञानेन्द्रियों तथा कर्मेन्द्रियाँ बाह्य करण सात्विक बुद्धि से व्यक्ति धर्म, ज्ञान, वैराग्य एवं साधना को
है। प्राण की क्रिया अन्तःकरण से प्रवर्तित होती है और
अन्तःकरण बाह्य करण से प्रभावित होता है। कुल प्रयोदशपोर गति करता है भोर तामसिक बुद्धि का प्रभाव बढ़ने
करण होते है । पर वह प्रधर्म, प्रज्ञान एव विषय-विकारो की भोर दौड़ता
पांच-तन्मात्रा : शब्द, स्पर्श, रूप, रस पौर गन्ध है। वस्तुत: बुद्धि का व्यापार पुरुष (पारमा) के लिए है। के सक्ष्म तत्त्वो को तन्मात्रा कहते है। पांच विषयो की बुद्धि के सहयोग से पुरुष स्व और पर(प्रकृति) का भेद समझ पाँच तन्मात्राएं होती हैं। ये इतनो सूक्ष्म होती है कि इन्हें कर अपने यथार्थ एव शुद्ध स्वरूप को प्राप्त कर सकता है। प्रत्यक्ष नही देख सकते। अनुमानसे ही इनका बोध होता है।
प्रहंकार :प्रकृति का दूसरा विकार महकार है। पञ्च महाभूत : पञ्च सन्मात्रामों से पञ्च महायह बुद्धि का परिणाम है । बुद्धि की महता और ममता भूतों का प्राविर्भाव होता है। साम्य-दर्शन के अनुसार, भाव अर्थात् मैं और मेरापन का अभिमान ही अहंकार है। शम्द-तन्मात्रा से माकाश महामत की उत्पत्ति होती है। महंकार के कारण पुरुष भ्रम मे पढ़कर स्वयं को कर्म का स्पर्श और शब्द तम्मात्रा के संयोग से वायु की; शब्द, रूप