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श्रमण परम्परा
O सिद्धान्ताचार्य पं. कैलाशचन्द जैन शास्त्री, वाराणसी
भगवान महावीर का जन्म इमी बिहार प्रदेश में हमा भाग माना जाता है। इसी से विद्वान उसका रचना काल था। इसी प्रदेश में कठोर तपस्या के द्वारा उन्होने केवल- पाठवी शताब्दी ईस्वी पूर्व मानते है । यही समय भगवान झान प्राप्त किया था। इसी प्रदेश के बिपुलाचल पर महावीर के पूर्वज तीर्थर पार्श्वनाथ का है जो काशी उनको प्रथम धर्म देशना हुई थी और जिस लोक नगरी में जन्मे थे । उनके जीवन की घटना है कि एक दिन भाषा में हुई थी उसका नाम भी इसी प्रदेश के नाम पर वह गंगा के तट पर गये । वहा कुछ तापस पञ्चाग्नि तप प्रघंमागधी है और इसी प्रदेश से उन्होंने निर्वाण लाभ करते थे। वहदारक उपनिषद (४.३-१२) मे ही हम किया। इस तरह यह प्रदेश भगवान महावीर के जीवन तापसो और श्रमणो का निदेश मात्र पाते है । याज्ञवल्लम के साथ इतना समम्बद्ध है कि न तो इस प्रदेश के बिना जनक से प्रात्मा का स्वरूप बतलातेहा कहते है कि इस भगवान महावीर को देखा जा सकता है और न महावीर मुषप्तावस्था में श्रमण प्रश्रमण और तापम प्रतापम हो के बिना इम प्रदेश की हो गरिमा का अनान किया जा जाता है। सकता है।
शतपथ ब्राह्मण में ही तप से विश्व की उत्पत्ति तीर्थकर तो प्रनेकों हा किन्तु जिनके पांचो कल्याणक बतलाई है। प्रतिदिन अग्निहोत्र करना एक प्रघान कर्म अपने जन्म प्रदेश में ही हए ऐसे एकाको तीर्थकर महावीर था। इसकी उत्पत्ति की कथा इस प्रकार बनलाई हैही है। सर्वम्व त्याग कर देने पर भी मानो वह अपनी "प्रारम्भ में प्रजापति एकाकी था । उसको अनेक होन की इम जन्ममि का मोह नही त्याग मके थे। मानाम इच्छा हुई। उमने तपस्या की। उसके मुख से अग्नि उत्पन्न मोर मातृभाषा सचमुच में माता से भी बढ़ कर है। हुई। चूकि सब देवताओ में अग्नि प्रथम उत्पन्न हुई
मनीषियों का विचार है कि प्रङ्ग, मगध, काशी, इमी से उसे अग्नि करते है। उसका यर्थाथ नाम अनि है। कासल और विदेह में वैदिक सभ्यता का प्रवेश बहत काल मुख से उत्पन्न होने के कारण अग्नि का भक्षक होना पश्चात् हुअा था। शत ब्रा (१-४-१) में लिखा है कि स्वाभाविक था । किन्नु उस समय पृथ्वी पर कुछ भी नहीं 'सरस्वती नदी से अग्नि ने पूर्व की ओर प्रयाण किया। था। अत: प्रजापति को चिन्ता हई। तब उसने अपनी उसके पीछे विदेव माधव मोर गोतम राहुगण थे । सबको वाणी को पाहुति देकर अपनी रक्षा की। जब वह मरा जलाती और मार्ग की नदियो को सुखाती हई वह अग्नि तो उसे अग्नि पर रखा गया। कितु अग्नि ने उसके शरीर सदानीग के तट पर पहुंची। उसे वह नही जला सकी: को ही जलाया । अतः प्रत्येक व्यक्ति को अग्निहोग करना तब माधव ने अग्नि से पूछा ' मैं कहा रह" तो उसने उतर चाहिए।' यदि नया जीवन प्राप्त करना चाहते हो तो दिया कि "तेरा निवास इस नदी के पूरब में हो" । अब अग्नि होत्र करो। तक भी यह नदी कोसलों और विदेहों की सोमा है।' ऋग्वेद का पहला मन्त्र है 'अग्निभीडे पुरोहितम् ।
इसे वैदिक पायर्यों के सरस्वतो नदी तट से सदानीरा यज्ञस्य देवमृस्विजम् । होतार रत्नधातमम् । अग्नि देवो के के तट तक बढ़ने के रूप मे लिया जाता है। बहुत समर पुरोहित है । पुरोहित का भयं है पागे रखा हुमा । प्रग्नि तक यह नदी पार्यो के संसार की सीमा मानी जाती थी। में आहुति देकर हो देवों तुष्ट किया जा सकता है। इसके मागे यथेच्छ उनका माना जाना था ?
ब्राह्मण ग्रयो के काल में यज्ञों का प्राधान्य रहा । वहदारण्यक उपनिषद् शतपथ ब्रह्मग का प्रन्तित उनके पश्चात प्रारण्यो का समय प्राता है। देवता विशेष