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________________ प्रोम् प्रहम् ঠাকান परमागमस्य बीजं निषिद्धजात्यन्धसिन्धुरविधानम् । सकलनयविलसितानां विरोधमथनं नमाम्यनेकान्तम् ॥ वर्ष ३२ किरण ३ ओर ४ वीर-सेवा-मन्दिर, २१ दरियागंज, नई दिल्ली-२ वीर-निर्वाण मवन् २५०५, वि० स० २०३५ जुलाई-दिसम्बर १६७६ । महावीर स्तवन णमो जिणाणं वड्ढमाणं. जिय भयाणं । महावीरा मगलम्, महावीरा लोगुत्तमा, महावीरे सरणं गच्छामि । __णिस्मंसयकरो महावीरो जिणुत्तमो। रागदोस-भयादोदो धम्म-तीस्थस्स कारो॥ इक्कोवि णमुक्कारो जिणवर वसहस्स बध्धमाणस्स । संसार सागराम्रो तारेइ नरं वा नारि वा ।। सव्वण सोमदंसण अपुणभव भवियजण-मणाणन्द । जय चिन्तामणि जगयगुरू जय जय जिण वीर प्रकलक।। -प्रज्ञात प्रातिथ्यं रूपमासरं महावीरस्य नग्नहु । रूपमुपसदामेतत्तिस्रो रात्रोः सुरासुता ।। ___-यजुर्वेद, अ. १६, मं. १४ निगठो प्रावुसो नातपुत्तो सव्वजु सव्वदरस्सी। अपरिसेसे गाण दस्संण परिजानाति ।। -मझिमनिकाय, भा-१ भयादिक ममम्त विकार भावो के विजेता वर्द्धमान जिनेन्द्र को नमस्कार हो; भगवान महावीर मगल स्वरूपी है, लोकोत्तम है, उन्ही को शरण मुझे प्राप्त हो। संशयो के निर्मल करने मे वीर, जिनोत्तम भगवान महावीर राग द्वेष भय प्रादि विवारी में रहित हैप्रतीत है; वे धर्मतीर्थ के कर्ता या संस्थापक है। जिनेन्द्र भगवान ऋषभदेव (प्रथम तीर्थकर) अथवा बर्द्धमान महावीर (प्रतिम तीर्थकर) को एक बार भी भावपूर्वक नमस्कार करने से नर हो या नारी, ममार सागर से निर जात है -पार हो जाते है। सर्वज्ञ, सोमदर्शन, अपुनर्भव, भव्य जन-मनान्द, चिन्तामणि, जगद्गुरु, अकलक वीर जिनन्द्र की जय हो, जय हो, जय हो ! प्रतिथि स्वरूप पूज्य मासोपवासी नग्न (दिगम्बर, महावीर की उपासना करो, जिसमे (मशय-विपर्ययअनध्यवसाय रूप) तीन प्रज्ञान, प्रथवा (धन-शरीर-विद्या रूप) मदत्रय की उत्पत्ति नहीं होती। पायुष्मान निर्गन्ध ज्ञातृपुत्र (भगवान महावीर) सर्वज्ञ और सब दर्शी है । अपने अपरिशेष (पनन्त ) ज्ञानदर्शन द्वारा वह सब कुछ जानते-देखते है । 000
SR No.538032
Book TitleAnekant 1979 Book 32 Ank 01 to 04
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGokulprasad Jain
PublisherVeer Seva Mandir Trust
Publication Year1979
Total Pages83
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Anekant, & India
File Size5 MB
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