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पंच परमेष्ठी और णमोकार मंत्र
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इन दो पंक्तियों से यही अर्थ स्पष्ट होता है
विस्तृत और व्यापक हो । प्राकाश निःसीम है, वह किसी सेव वण्णो झाणं लेस्सा य सेसकम्मं च ।
सीमा में बंधता नहीं। साधु भी कोई घेरा नहीं पाहाणं इहि लोए सुमंगलं सेदवणोतु ॥ मानता । वह मुक्त होता है, नितान्त मुक्त भौर उन्मुक्त । ~पंचास्तिकाय, प्रथमखण्ड, पष्ठ ६ घिराव सकोणताह आर उस
घिराव संकीर्णता है और उससे साम्प्रदायिकता जन्म लेती 'मानसार' स्थापत्य एव मूर्तिकला का सुप्रसिद्ध अथ है। साधु प्रसाम्प्रदायिक होता है, व्यापक और उदारमना । - । इसकी रचना पांचवीं शती मे हई थी। इममे पंच- इस ग्रथ में केवल रगों का ही नहीं, अपितु ऊचाई का परमेष्ठी की मूर्तियों का रग निर्धारित किया मया है। भी विवेचन है। लेखक का कथन है कि पचपरमेष्ठी की पंचपरमेष्ठी में प्रत्येक का पृथक रग है । प्रहन्त म्फटिक मतियां १० ताल प्रमाण ऊची होनी चाहिए। ऊंचाई मणि के समान श्वेताभ, सिद्ध मरुणाभ, प्राचार्य पीताभ, उर्व की द्योतक है। जैन परम्परा मे ऊर्ध्व का विस्तत उपाध्याय शस्य-श्यामल एवं साधु नभस्तल के समान विवेचन मिलता है। वे पक्तियां हैंनीलाभ है । यहा उपाध्याय का शस्य श्यामल रंग साभि- स्फटिकश्वेत रक्तं च पीतश्यामनिभं तथा। प्राय है । पृथ्वी शस्य-श्यामला कही जाती है। सिद्ध दिश्च सुगम्याच जनं चाहन्तु पाश्र्वकम् । धान्य को लहराती बालें और उससे सुशोभित
एतत्पंचपरमेष्ठिपंचवणं यथाक्रमम् । धरणी माँ, वैसे ही शस्य-श्यामल है उपाध्याय परमेष्ठी ।
उत्तम् वशतालेन देवांगस्सह मानयेत् ॥ ससार के प्राणियो के प्रति ममता से भरा हृदय और उन्हे
अर्थ-प्ररहन्त का वर्ण स्फटिक के समान श्वेत, सिद्ध
का रक्त-लाल, प्राचार्य का पीत-पीला, उपाध्याय का अक्षर रूपी घान्य से प्राणवन्त बनाने का अदम्प उत्साह,
श्यामल पोर साधु का नभस्तल जैसा होता है। इनकी उपाध्याय का अपना सहज स्वभाव है । इसी कारण उनका
प्रतिभा १० नाल प्रमाण अर्थात् १२० भाग (शिल्पशास्त्र शस्य-श्यामल रग सार्थक है । यदि पृथ्वी शरीर का पोषण
के अनुसार) ऊची होनी चाहिए। उनके पावं में अन्य करती है तो उपाध्याय मन और मस्तिष्क का । साधु को
1 उपाध्याय मन प्रार मस्तिष्क का। साधु को देवों की मूर्तियों का होना भी प्रावश्यक है। नभस्तल के समान नीलवर्ण दिया गया है, वह उचित ही अध्यक्ष, हिन्दी विभाग, दिगम्बर जैन कालेज, बड़ौत हैं। साधु वही है जिसका दृष्टिकोण नभ के समान
(जिला मेरठ) 000
(पृ. ६ का शेषाश) बाये में वज्र है। नीचे के अभिलेख में संवत १२२६ उत्कीर्ण मे एक बिशाल जैन मन्दिर है, जिसमे अनेक मूर्तियां है।
यहा को प्रम्ख प्रतिमा यहां तीर्थंकर महावीर की है। यहां से उपलब्ध अन्य प्रतिमायें पदमावती व अम्बिका साराश यह है कि परमार राजवश के यशस्वी की है। ये क्रमशः पार्श्वनाथ और नेमिनाथ की यक्षिणी सम्राटो के काल में जैन धर्म को चरमोत्कर्ष पर पहुंचने देवियां है। यहां तीर्थकर प्रतिमायें भी प्रचर मात्रा मे का सौभाग्य प्राप्त हुआ। इसका प्रमुख कारण यह है कि उपलब्ध हुई है। उपलब्ध सभी प्रतिमानो को १०वी से भागवत धर्म के अनुयायी होन के बावजूद उन्होंने जैन १३वी सदी के मध्य रखा जा सकता है। इन प्रतिमाओ धम के प्रति न केवल उदार दृष्टिकोण अपनाया, बल्कि पर मालवा के परमार मूर्ति शिल्प को स्पष्ट छाप है। उनक कान में अनेक जन मन्दिरों का निर्माण हुमा और
प्राष्टा से परमार-युगीन अनेक जन प्रतिमाए प्रकाश जैन धर्म के उन्नयन में उन्होने गहरी अभिरुचि भी व्यक्त में पायी हैं। यहां के दुर्ग (किले) से जो मूर्तिया को।
000 उपलब्ध हुई है उनमे पाश्वनाथ, चन्दप्रभ तथा ऋषभनाथ
प्राध्यापक, गवर्नमेन्ट डिग्री कालेज, की सवत १२२४ की प्रतिमायें प्रमुख है। किले के मध्य
डिण्डोरी (मंडला) मध्य प्रदेश